रविवार, 8 जनवरी 2012

माया सरकार ने दी जनता को 21 मंत्रियों की सलामी!

चर्चा उत्तर प्रदेश की है, जहाँ मायावती के नेतृत्व में चल रही बहुजन समाज पार्टी ने लोकपाल द्वारा जाँच में भ्रष्टाचार और अन्य मामलों में लिप्त पाए जाने पर बसपा के २१ मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है. यूँ तो मायावती और उनकी सरकार सदैव ही किसी न किसी कारण से विवादों में रही हैं, परन्तु जब भी उन पर या उनकी सरकार पर विपक्षी दलों ने किसी भी प्रकार के आरोपों के घेरे में लेने का प्रयत्न किया उन्होंने दलित महिला का कवच ओढ़ कर उन आरोपों को हवा में उड़ाते हुए सत्ता के मद में अपनी राह चलती रहीं. ऐसा नहीं कि विपक्षी दलों ने मात्र  मीडिया में आरोप लगाने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया. प्रदेश के उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे तमाम मुकद्दमे इस बात के गवाह हैं कि चाहे वह चौक-चौराहे पर मूर्तियों लगाने का काम हो या पत्थर के हाथियों से सुसज्जित उद्यानों के निर्माण का, या पार्टी की रैलियों में लाखों-करोड़ों के नोटों के हार पहनने के मामले हों, उनको विधान सभा में घेरने में असफल दल उन्हें कानून के रास्ते शिकश्त देने का प्रयास भी करते रहे हैं. अभी हाल में ही सीबीआई द्वारा एनएचआरएम में भ्रष्टाचार के मामलों पर चल रही जाँच भी उसी प्रक्रिया का एक अंग है, ऐसा मायावती का मानना है.
यूँ तो भ्रष्टाचार के आरोप सभी दलों की सरकारों पर लगाये जाते रहे हैं परन्तु इस आरोपों से बखूबी स्वयं का पाक दामन प्रस्तुत कर अपने मंत्री या अधिकारी की बलि देने में यह महारत बसपा की सुप्रीमो मायावती के अतिरिक्त किसी अन्य दल के नेता में नहीं दिखती. इतना ही नहीं हर बलि के बाद वो यह सन्देश देना भी नहीं भूलती विपक्षी दल दलित और महिला होने के नाते उन्हें सत्ता से हटाना चाहती हैं, इस प्रकार वह अपने वोट बैंक को और मजबूत करने में भी कामयाब रहती हैं. इन सब के पीछे उनके दबंग व्यक्तित्व के अतिरिक्त और बहुत से कारण भी हैं. अपने राजनैतिक गुरु मरहूम कांशी राम से तिलक,तराजू और तलवार जैसे सांकेतिक प्रतीकों को जूते मारने के नारे की शिक्षा व दलित जातिवाद को हवा देकर तमाम दलित जातियों को हाथी की शरण में लाने वाली यही मायावती पिछले चुनाव में ठीक इसके विपरीत सोशल इंजीनियरिंग के नारे के साथ समाज में सामंजस्यता और भाईचारे के साथ पुनः सिंहासनारूढ़ होने में सफल हुई. प्रदेश में ब्राह्मणों के अतिरिक्त राजपूतों और बनियों ने भी पिछले चुनाव में उनका साथ दिया था, जिनके बलबूते पर ही वह २००७ के चुनाव में अकेले २०६ सीटों पर विजय प्राप्त करने में सफल हुई.
विरोधी और विपक्षी तो उनके इस नारे को एक राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास ही मानते हैं, परन्तु इतना तो है स्पष्ट है कि जूते मारने का नारा देने वाले दल की अध्यक्षा यदि ब्राह्मणों और अन्य जातियों को साथ लेकर चलने की बात करती हैं तो इससे हिंदु समाज में धुर विरोधी जातियों में कटुता समाप्त करते हुए मधुरता की अपेक्षा तो की जा सकती है और ऐसा संभव भी हुआ है. और जहाँ तक मूर्तियों और उद्यानों पर करोड़ों के सरकारी खजाने के दुरपयोग का करने का आरोप है तो यह आरोप भी केद्रीय सरकार में हुए विगत वर्षों में हुए घोटालों और घपलों के सामने तुच्छ हैं. इन उद्यानों से पर्यावरण को लाभ के साथ-साथ एक विशेष वर्ग में स्वाभिमान और सम्मान की भावना पैदा होती है, जिसको दलितों के अतिरिक्त अन्य बहुत से प्रबुद्ध लोगों ने स्वीकारा भी है. जहाँ तक दलित महापुरुषों की मूर्तियों की स्थापना का प्रश्न है तो दुःख होता है कि का प्रश्न है समाज विरोधी और देश विरोधी शक्तियां महापुरुषों की पहचान भी उनकी जातियों से करने और उन्हें जातियों में बाँटने से परहेज नहीं करती. महापुरुषों ने देश, धर्म और समाज के लिए उत्कृष्ट कार्य किया था तभी उन्हें महापुरुष कहा जाता है. इस देश की यही विडम्बना रही है कि इन मूर्तियों की स्थापना से पूर्व संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के अतिरिक्त ज्योतिबा फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, नारायण गुरु, रमाबाई आंबेडकर, कांशीराम, गौतम बुद्घ, घासीदास, कबीरदास, संत रविदास और बिरसा मुंडा आदि अनेक ऐसे महापुरुष हैं, जिनका समाज के लिए बहुत योगदान रहा है, का नाम कितने लोग जानते थे?
इन मूर्तियों की स्थापना पर उठाये जा रहे सवाल और ऐतराज गैर-वाजिब है. हाँ, स्वयं मायावती की मूर्ति की स्थापना और फिर उसका स्वयं ही विधिवत उद्घाटन करना अवश्य ही स्थापित परिपाटियों के विपरीत अचरज भरा कार्य ही कहा जा सकता है. मूर्ति स्थापना के आलोचकों पर पलटवार करते हुए मायावती का कहना कि कांग्रेस-भाजपा सहित अन्य विपक्षी दलों ने अपने समाज के महापुरुषों को जिस तरह आदर और सम्मान दिया अगर उसी तरह दलित समाज के महापुरुषों को भी सम्मान दिया होता तो शायद हमें प्रदेश में बहुजन समाज के महापुरुषों, संतो और गुरुओं के स्मारक, संग्रहालय बनवाने और मूर्तियां लगाने की जरुरत नही पड़ती. यह कथन किसी हद तक उचित ही लगता है. आजादी के बाद ना केवल एक दल और एक ही परिवार को ही महिमामंडित करने के लिए अधिकतर मूर्तियाँ, स्मारक, चौक-चौराहों व मार्गों का नामकरण किया गया बल्कि दिल्ली में मीलों लम्बा यमुना का किनारा उन्हीं की समाधियों के लिए सुरक्षित कर दिया गया.
आजादी प्राप्ति के बाद बनी सरकारों के साथ-साथ देश के एक बड़े वर्ग ने चाहे-अनचाहे भ्रष्टाचार को इस कदर अपना लिया है कि कम या अधिक बिना भ्रष्टाचार के आम जन का कोई भी कार्य बिना भ्रष्टाचार के हो ही नहीं सकता. नैतिकता पर अनैतिकता का इतना प्रभाव हो गया है कि समझ में ही नहीं आ रहा है कि कौन सा कृत्य नैतिक है और कौन सा अनैतिक? राजनैतिक दल महंगी चुनाव प्रणाली की दुहाई दे रहे हैं तो नौकरशाह रिश्वत के लिए उधार ली गई रकम लौटने की बात करते हैं. छुटभैयों के पास ऊपर तक पैसा पहुँचाने का बहाना है. भौतिक सुखों की स्पर्धा में रत मानव के लिए बाजारवाद में जीना कठिन हो रहा है. इन सब के लिए उसे खूब पैसों की आवश्यकता है और खूब सारे पैसों की आपूर्ति कहाँ से होगी? अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि यदि रास्ते में किसी को ईमानदार व्यक्ति कह कर पुकारा जाये तो कौतुहलवश रास्ते जाम हो सकते है. नैतिक मूल्यों और सिद्धांतों का ह्रास जितना हो रहा है भ्रष्ट आचरण उतना ही बढ़ रहा है. अब केवल मायावती और उसकी सरकार से ही भ्रष्टाचार मुक्त सरकार की आशा करना व्यर्थ है. इस चुनावी दौर में जनता को भरमाने के लिए ही सही और स्वयं को साफ और ईमानदार छवि वाली नेता घोषित करने के लिए ही सही, माया सरकार ने कम से कम अपने २१ मंत्रियों को भ्रष्टाचार और अन्य अपराधों में लिप्त पाए जाने पर बाहर का रास्ता तो दिखाया है. भ्रष्टाचार के आरोप तो केंद्र और अन्य राज्यों के मंत्रियों पर भी लगते रहे हैं परन्तु है कोई ऐसी दूसरी सरकार जिसने २१ मंत्रियों के रूप में २१ तोपों की सलामी जनता को को दी है?
लेखक विनायक शर्मा हिमाचल से प्रकाशित साप्‍ताहिक अमर ज्‍वाला के

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