मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

न्यूज बैंक इन b4m







A+ A A-

डॉ. कठेरिया के नेतृत्व में महिला फेसबुक उपयोगकर्ता पर हिंदी विवि में हुआ शोध
फेसबुक उपयोग करने वाली 47 प्रतिशत प्रतिभागी फेसबुक के नियम, कानून से परिचित हैं
34 प्रतिशत प्रतिभागी फेसबुक का उपयोग सामाजिक सरोकार के लिए करती हैं
55 प्रतिशत प्रतिभागी फेसबुक का उपयोग सूचना प्राप्त करने के लिए करती हैं
मित्रों से चैट करने के लिए केवल 13 प्रतिशत ही इसका उपयोग करती हैं
युवतियां फेसबुक का उपयोग सामाजिक मुद्दों एवं महत्वपूर्ण विषयों के संदर्भ में अधिक करती हैं
विचारों के आदान-प्रदान के लिए फेसबुक को सशक्त माध्यम की संज्ञा दी गई है
फेसबुक अब फेस और बुक तक ही नहीं रह गया है बल्कि यह किसी भी व्‍यक्ति के चरित्र को चरितार्थ करता है। शोध में प्राप्‍त निष्‍कर्षों के अनुसार 80 प्रतिशत उपयोगकर्ता सामाजिक परिवर्तन के लिए फेसबुक  के योगदान को मानते हैं। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान समय में फेसबुक सामाजिक परिवर्तन का अंग है। यह माध्यम समाज में नई सोच और विचारों को जन्म दे रहा है। खासकर सामाजिक कुरूतियां, महिला उत्पीड़न आदि जैसे विषयों को खत्म करने में महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। आज की महिला इस माध्यम से खुद को जागरूक और शक्तिशाली मान रही हैं। इस संदर्भ में फेसबुक उपयोगकर्ताओं के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं। आज पुरुषों की अपेक्षा महिला उपयोगकर्ताओं की संख्यां तेजी से बढ़ रही है। उक्त आंकड़े महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के जनसंचार विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. धरवेश कठेरिया के नेतृत्व में वर्धा शहर स्थित  हिंदी विवि में विषय-फेसबुक का उपयोग, दायित्व और सीमाएं पर हुए शोध से प्राप्त हुआ है।
आज के युग को सोशल मीडिया का युग कहा जाय तो गलत नहीं होगा। ऐसे में हर कोई सोशल मीडिया पर आना चाहता है। भारत में सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं में महिलाओं की संख्या पुरूषों की अपेक्षा बहुत कम है। इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण शिक्षा भी है। कई महिलाएं तकनीकी रूप से दक्ष नही हैं तो कई सोशल साईट (फेसबुक, ट्वीटर) पर आने से डरती हैं। सोशल साईटों पर महिलाओं की भागीदारी, सामाजिक जिम्मेदारी और सोशल मीडिया का महिलाओं पर प्रभाव को शोध के केंद्र में रखा गया है। शोध में प्राप्त आंकड़ों के अनुसार सबसे ज्यादा 20 प्रतिशत महिलाएं 1वर्ष से फेसबुक का उपयोग कर रही हैं। इससे साफ पता चलता है कि महिलाओं का प्रतिशत हाल के वर्षों में बढ़ा है। फेसबुक पर समय खर्च करने के मामले में 86 प्रतिशत आंकडे़ 1घंटा के आसपास प्राप्त होते हैं। तथ्यों के आधार पर हम कह सकते हैं कि फेसबुक उपयोगकर्ता फेसबुक का सामान्य उपयोग कर रहे हैं। 47 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि वे फेसबुक संबंधी नियम व शर्तों से परिचित हैं। जबकि 15 प्रतिशत उपयोगकर्ता परिचित नहीं हैं। 34 प्रतिशत प्रतिभागी फेसबुक का उपयोग सामाजिक सरोकार के लिए करती हैं वहीं 21 प्रतिशत समय बीताने के लिए और 04 प्रतिशत व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के लिए फेसबुक का इस्तेमाल करती हैं।
फेसबुक की शुरूआत फरवरी 2004 में हुई थी। जिसने बहुत कम समय में युवाओं के बीच पहुंच बनाकर प्रसिद्धि पाई। भारत में फेसबुक उपयोगकर्ताओं के बीच स्त्री-पुरुष का अनुपात लगभग 75 और 25 का है। यह स्थिति तब है, जब भारत फेसबुक यूजर्स के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है। महानगरों में फेसबुक की लोकप्रियता शीर्ष पर है। रिसर्च फर्म सोशल बेकर्स के मुताबिक महिला फेसबुक उपयोगकर्ताओं के मामले में भारत, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के साथ खड़ा है, जहां फेसबुक पर महिला-पुरूष अनुपात क्रमश: 78 और 22 का है। जबकि चीन (39 फीसदी), नेपाल (31 फीसदी), पाकिस्तान (30 फीसदी) और श्रीलंका (32 फीसदी), इंडोनेशिया (41 फीसदी) भी भारत से आगे है।
प्राप्त आंकड़ों के विशलेषण के आधार पर 48 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि फेसबुक सामाजिक मुद्दों पर जनमत बनाने में सक्षम है। आप फेसबुक का उपयोग क्यों करती हैं? के संदर्भ में 55 प्रतिशत मत सूचना प्राप्त करने के पक्ष में जाता है। 18 प्रतिशत मत मित्रों से चैट करने के लिए, 13 प्रतिशत मत विचारों के आदान-प्रदान हेतु एवं 14 प्रतिशत मत जनसंपर्क बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। फेसबुक माध्यम तथ्यों के आधार पर वर्तमान समय में सूचना प्राप्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। फेसबुक ने विचारों के आदान-प्रदान में क्रांति लाने का काम किया है? के संदर्भ में फेसबुक 51 प्रतिशत मतों के आधार पर विचारों के आदान-प्रदान में सशक्त भूमिका अदा कर रहा है। इसका मुख्य कारण है कि फेसबुक वाल के माध्यम से लोग एक-दूसरे के क्रांतिकारी विचारों से परिचित हो रहे हैं।

शोध का हवाला देते हुए डॉ. कठेरिया ने कहा कि वर्तमान समय में फेसबुक सूचना आदान-प्रदान के साथ-साथ अकेलापन का साथी भी है। फेसबुक करियर निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। फेसबुक जनसंपर्क माध्यम का सबसे बड़ा हथियार है। कोई भी व्यक्ति अगर इसका उपयोग सही दिशा के लिए करता है तो यह हितकर है नहीं तो इसके परिणाम समाज के लिए बिस्फोटक भी हो सकते हैं। महिलाओं को फेसबुक इस्तेमाल करते समय सचेत रहने की जरूरत है। आप अपने पहचान के लोगों से ही जुड़ें।
शोध संबंधी तथ्यों और आंकड़ों के संकलन के लिए सौ प्रश्‍नावली को आधार बनाया गया है। अध्ययन को स्वरूप देने के लिए शोध विषय-फेसबुक का उपयोग, दायित्व और सीमाएं के अध्ययन में वर्धा शहर में स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में उच्च शिक्षा से जुड़े देश के अलग-अलग प्रांतों से आए अध्ययनरत छात्राओं को शामिल किया गया है। इसमें मुख्य रूप से महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, और उत्तर भारत के अनेक शहरों से आए अध्ययनरत छात्राओं के मतों को आधार बनाया गया है।
67 प्रतिशत आंकड़े यह दर्शाते हैं कि फेसबुक सामाजिक मुद्दों से अवगत कराता है। 83 प्रतिशत लोगों का मानना है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए फेसबुक का योगदान महत्वपूर्ण है। फेसबुक किताबों से दूर करता जा रहा है के संदर्भ में 54 प्रतिशत उत्तरदाता का मत है कि यह किताबों से दूर नहीं कर रहा है। आंकडे़ दर्शाते हैं कि आज की युवतियां अपने करियर और अध्ययन के प्रति सजग और ईमानदार हैं क्योंकि उसे अपने सपनों को साकार और मूर्त रूप देना है। फेसबुक के कारण आप अपने परिवार, मित्र, संबंधी से दूर हो रही हैं के उत्तर में 79 प्रतिशत आंकडे़ दर्शाते हैं कि फेसबुक परिवार, संबंधी और मित्रों से दूर नहीं करता है। आज की युवतियां फेसबुक का उपयोग परिवार और मित्रों के बीच में बहुत ही संतुलित कर रही हैं।
शोध अध्ययन में डॉ. कठेरिया के अलावा जनसंचार विभाग के सहायक प्रोफेसर, संदीप कुमार वर्मा, पीएच.डी. शोधार्थी, निरंजन कुमार, एमएससी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं एम.ए. जनसंचार के छात्र, अविनाश त्रिपाठी, पंकज कुमार, पूर्णिमा झा, पद्मा वर्मा एवं आईसीएसएसआर परियोजना के शोध सहायक, नीरज कुमार सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 40 प्रतिशत लोगों का मानना है कि फेसबुक व्यक्तिगत सोच को सामाजिक सोच में परिवर्तित करने में सक्षम है। आंकड़ों के अनुसार फेसबुक की लेखनी में मानहानी, अपमानसूचक 18, अश्‍लील विषयक 13, हिंसा और द्वेष उत्प्रेरक विषय 24 व किसी धर्म, जाति आदि के उपेक्षा के संदर्भ में 19 प्रतिशत मत प्राप्त होते हैं।

Tagged under social media

Latest



मौजूदा मीडिया बनाम आपातकाल के दौर की पत्रकारिता




  • Published in विविध

प्रस्तुति- राजेश सिन्हा 

क्या मौजूदा वक्त में मीडिया इतना बदल चुका है कि मीडिया पर नकेल कसने के लिये अब सरकारों को आपातकाल लगाने की भी जरुरत नहीं है। यह सवाल इसलिये क्योंकि चालीस साल पहले आपातकाल के वक्त मीडिया जिस तेवर से पत्रकारिता कर रहा था आज उसी तेवर से मीडिया एक बिजनेस मॉडल में बदल चुका है, जहां सरकार के साथ खड़े हुये बगैर मुनाफा बनाया नहीं जा सकता है। और कमाई ना होगी तो मीडिया हाउस अपनी मौत खुद ही मर जायेगा। यानी 1975 वाले दौर की जरुरत नहीं जब इमरजेन्सी लगने पर अखबार के दफ्तर में ब्लैक आउट कर दिया जाये। या संपादकों को सूचना मंत्री सामने बैठाकर बताये कि सरकार के खिलाफ कुछ लिखा तो अखबार बंद हो जायेगा। या फिर पीएम के कसीदे ही गढ़े। अब के हालात और चालीस बरस पहले हालात में कितना अंतर आ गया है।
यह समझने के लिये 40 बरस पहले जून 1975 में लौटना होगा। आपातकाल लगा तो 25 जून की आधी रात के वक्त लेकिन इसकी पहली आहट 12 जून को तभी सुनायी दे गई जब इलाहबाद हाईकोर्ट ने इंदिरागांधी के खिलाफ फैसला सुनाया और समाचार एजेंसी पीटीआई ने पूरे फैसले को जस का तस जारी कर दिया। यानी शब्दों और सूचना में ऐसी कोई तब्दिली नही की जिससे इंदिरागांधी के खिलाफ फैसला होने के बाद भी आम जनता खबर पढने के बाद फैसले की व्याख्या सत्ता के अनुकूल करें । हुआ यही कि आल इंडिया रेडियो ने भी समाचार एजेंसी की कापी उठायी और पूरे देश को खबर सुना दी कि, श्रीमति गांधी को जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 [ 7 ] के तहत भ्रष्ट साधन अपनाने के लिये दोषी करार दिया गया । और प्रधानमंत्री को छह वर्षों के लिये मताधिकार से वंचित किया गया। और 600 किलोमीटर दूर बारत की राजधानी नई दिल्ली में इलाहबाद में दिये गये फैसले की खबर एक स्तब्धकारी आघात की तरह पहुंची। इस अविश्वसनीय खबर ने पूरे देश को ही जैसे मथ डाला। एक सफदरजंग मार्ग पर सुरक्षा प्रबंध कस दिये गये। ट्रकों में भरकर दिल्ली पुलिस के सिपाही पहुंचने लगे। दल के नेता और कानूनी विशेषज्ञ इंदिरा के पास पहुंचने लगे। घर के बाहर इंदिरा  के समर्थन में संगठित प्रदर्शन शुरु हो गये। दिल्ली परिवहन की कुल 1400 बसों में से 380 को छोडकर बाकी सभी बसों को भीड़ लाद लाद कर प्रदर्शन के लिये 1, सफदरजंग पहुंचाने पर लगा दिया गया । और यह सारी रिपोर्ट भी समाचार एजेंसी के जरीये जारी की जाने लगी। असल में मीडिया को ऐसे मौके पर कैसे काम करना चाहिये या सत्ता को कैसे काम लेना चाहिये यह सवाल संजय गांधी के जहन में पहली बार उठा।
और संजय गांधी ने सूचना प्रसारण मंत्री इन्द्र कुमार गुजराल को बुलाकर खूब डपटा कि प्रधानमंत्री के खिलाफ इलाहबाद हाईकोर्ट के पैसले को बताने के तरीके बदले भी तो जा सकते थे। उस वक्त आल इंडिया रेडियो में काम करने वाले न्यूज एडिटर कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक वह पहला मौका था जब सत्ता को लगा कि खबरें उसके खिलाफ नही जानी चाहिये। और पहली बार समाचार एजेंसी पीटीआई-यूएनआई को चेताया गया कि बिना जानकारी इस तरह से खबरें जारी नहीं करनी है। और चूंकि तब समाचार एजेंसी टिकी भी सरकारी खर्च पर ही थी तो संजय गांधी ने महसूस किया कि जब समाचार एजेंसी के कुल खर्च का 80 फिसदी रकम सरकारी खजाने से जाती है तो फिर सरकार के खिलाफ खबर को एजेंसियां क्यों जारी करती है । उस वक्त केन्द्र सरकार रेडियो की खबरों के लिये 20 से 22 लाख रुपये समाचार एजेंसी पीटीआई-यूएनआई को देती थी ।
बाकि समाचार पत्र जो एजेंसी की सेवा लेते वह तीन से पांच हजार से ज्यादा देते नहीं थे। यानी समाचार एजेंसी तब सरकार की बात ना मानती तो एजेंसी के सामने बंद होने का खतरा मंडराने लगता। यह अलग मसला है कि मौजूदा वक्त में सत्तानुकूल हवा खुद ब खुद ही एजेंसी बनाने लगती है क्योंकि एजेंसियों के भीतर इस बात को लेकर ज्यादा प्रतिस्पर्धा होती है कि कौन सरकार या सत्ता के ज्यादा करीब है । लेकिन दिलचस्प यह है आपातकाल लगते ही सबसे पहले आपातकाल का मतलब होता क्या है इसे सबसे पहले किसी ने महसूस किया तो सरकारी रेडियो में काम करने वालों ने ही । और पहली बार आपातकाल लगने के बाद सुबह तो हुई लेकिन मीडिया के लिये 25 जून 1975 की रात के आखरी पहर में ही घना अंधेरा छा गया । असल में उसी रात जेपी यानी जयप्रकाश नारायण को गांधी पीस फाउंडेशन के दफ्तर से गिरफ्तार किया गया और जेपी ने अपनी गिरप्तारी के वक्त मौजूद पत्रकारों से जो शब्द कहे उसे समाचार एंजेसी ने जारी तो कर दिया लेकिन चंद मिनटों में ही जेपी के कही शब्द वाली खबर किल..किल..किल कर जारी कर दी गई । और समूचे आपाकताल के दौर यानी 18 महीनों तक जेपी के शब्दो को किसी ने छापने की हिम्मत नहीं की । और वह शब्द था , “ विनाशकाले विपरीत बुद्दी “ ।
जेपी ने 25 की रात अपनी गिरफ्तारी के वक्त इंदिरा गांधी को लेकर इस मुहावरे का प्रयोग किया था कि जब विनाश आता है तो दिमाग भी उल्टी दिशा में चलने लगता है । कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक वह रात उनके लिये वाकई खास थी । क्योंकि उनका घर रउफ एवेन्यू की सरकारी कालोनी में था। जो गांधी पीस फाउंडेशन के ठीक पीछे की तरफ थी । तो रात का बुलेटिन कर जब वह घर पहुंचे और खाने के बाद पान खाने के लिये मोहन सिंह प्लेस निकले तबतक उनके मोहल्ले में सबकुछ शांत था । लेकिन जब वापस लौटे को बडी तादाद में पुलिस की मौजूदगी देखी । एक पुलिस वाले से पूछा, क्या हुआ है। तो उसने जबाब देने के बदले पूछा, तुम किधर जा रहे है। इसपर जब अपने घर जाने की बातकही तो पुलिस वाले ने कहा देश में इमरजेन्सी लग गई है। जेपी को उठाने आये हैं। और कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक उसके बाद तो नींद और नशा दोनों ही फाख्ता हो गये। स्कूटर वापस मोड़ रेडियो पहुंच गये। रात डेढ बडे न्यूज डायरेक्टर भट साहेब को फोन किया तो उन्होने पूछी इतना रात क्या जरुरत हो गई । जब आपातकाल लगने और जेपी की गिरफ्तारी अपनी आंखों से देखने का जिक्र किया तो भट साहेब भी सकते में आ गये। खैर उसके बाद ऊपर से निर्देश या कि सुबह आठ बजे के पहले बुलेटिन में आपातकाल की जानकारी और उस पर नेता, मंत्री , सीएम की प्रतिक्रिया ही जायेगी। इस बीच पीटीआई ने जेपी की गिरफ्तारी की खबर, विनाशकाले विपरित बुद्दी के साथ भेजी जिसे चंद सेकेंड में ही किल किया जा चुका था। तो अब समाचार एंजेसी पर नहीं बल्कि खुद ही सभी की प्रतिक्रिया लेनी थी तो रात से ही हर प्रतिक्रिया लेने के लिये फोन घनघनाने लगे। पहला फोन बूटा सिंह को किया गया। उन्हें जानकारी देकर उनकी प्रतिक्रिया पूछी तो जबाब मिला, तुस्सी खुद ही लिख दो, मैनू सुनाने दी जरुरत नही हैगी। मै मुकरुंगा नहीं। इसी तरह कमोवेश हर सीएम , नेता ने यही कहा कि आप खुद ही लिख दो। कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक सिर्फ राजस्थान के सीएम सुखाडिया ने एक अलग बात बोली कि लिख तो आप ही दो लेकिन कड़क लिखना। अब कडक का मतलब आपातकाल में क्या हो सकता है यह कोई ना समझ सका। लेकिन सभी नेता यह कहकर सो गये ।
और अगली सुबह जब बुलेटिन चला तो पहली बार समाचार एजेंसी के रिपोर्टर आल इंडिया रेडियो पहुंचे। सारे नेताओ का प्रतिक्रिया लिखकर ले गये। और उसी वक्त तय हो गया कि अब देश भर में फैले पीआईबी और आलइंडिया रेडियो ही खबरों का सेंसर करेंगे। यानी पीआईबी हर राज्य की राजधानी में खुद ब खुद खबरों को लेकर दिशा-निर्देश बताने वाला ग्राउंड जीरो बन गया। यानी मौजूदा वक्त में पीआईओ के साथ खड़े होकर जिस तरह पत्रकार खुद को सरकार के साथ खडे होने की प्रतिस्पर्धा करते है वैसे हालात 1975 में नहीं थे। यह जरुर था कि सरकारी विज्ञापनों के लिये डीएवीपी के दप्तर के चक्कर जरुर अखबारो के संपादक लगाते। क्योंकि उस वक्त डीएवीपी का बजट सालाना दो करोड़ रुपये का था। लेकिन अब के हालात में तो विज्ञापन के लिये सरकारों के सामने खबरो को लेकर संपादक नतमस्तक हो जाते हैं क्योंकि हर राज्य के पास हजारो करोड़ के विज्ञापन का बजट होता है।
इसे एक वक्त हरियाणा के सीएम हुड्डा ने समझा तो बाद में राजस्थान मे वसुधंरा से लेकर बिहार में नीकिश कुमार से लेकर दिल्ली में केजरीवाल तक इसे समझ चुके है। यानी अब खबरो को स्थायी पूंजी की छांव भी चाहिये। लेकिन अब की तुलना में चालिस बरस के कई हालात उल्टे भी थे। मसलन अभी संघ की सोच के करीबियों को रेडियो, दूरदर्शन से लेकर प्रसार भारती और सेंसर बोर्ड से लेकर एफटीआईआई तक में फिट किया जा रहा है तो चालीस साल पहले आपातकाल लगते ही सरकार के भीतर संघ के करीबियों और वामपंथियों की खोज कर उन्हें या तो निकाला जा रहा था या हाशिये पर ढकेला जा रहा था । वामपंथी धारा वाले आंनद स्वरुप वर्मा उसी वक्त रेडियो से निकाले गये। हालांकि उस वक्त उनके साथ साम करने वालो ने आईबी के उन अधिकारियो को समझाया कि रेडियो में कोई भी विचारधारा का व्यक्ति हो उसके विचारधारा का कोई मतलब नहीं है क्योंकि खबरो के लिये पुल बनाये जाते हैं। यानी जो देश की खबरें जायेगी उसके लिये पुल वन, विदेशी खबोर क लिये पुल दू। और जिन खबरों को लेना है जब वह सेंसर होकर पुल में लिखी जा रही है और उससे हटकर कोई दूसरी खबर जा नहीं सकती तो फिर विचारधारा का क्या मतलब। और आनंद स्वरुप वर्मा तो वैसे भी उस वक्त खबरों का अनुवाद करते हैं। क्योंकि पूल में सारी खबरें अंग्रेजी में ही लिखी जातीं। तो अनुवादक किसी भी धारा का हो सवाल तो अच्छे अनुवादक का होता है।
लेकिन तब अभी की तरह आईबी के अधिकारियों को भी अपनी सफलता दिखानी थी तो दिखायी गई। फिर हर बुलेटिन की शुरुआत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नाम से होनी चाहिये। यानी इंदिरा गांधी ने कहा है। और अगर किसी दिन कही भी कुछ नहीं कहा तो इंदिरा गांधी ने दोहराया है कि..., या फिर इंदिरा गांधी के बीस सूत्री कार्यक्रम में कहा गया है कि.. । यानी  मौजूदा वक्त में जिस तरह नेताओ को सत्ताधारियों को कहने की जरुरत नहीं पडती और उनका नाम ही बिकता है तो खुद ब खुद ही अब तो नेताओं को खुश करने के लिये उनके नाम का डंका न्यूज चैनलों में बजने लगता है। वह चालीस बरस पहले आपाताकाल के दबाब में कहना पड़ रहा था। फिर बडा सच यह भी है कि मौजूदा वक्त में जैसे गुजरात के रिपोर्टरों या पीएम के करीबी पत्रकारों को अपने अपने सस्थानो में जगह मिल रही है चालिस साल पहले आपातकाल के वक्त जेपी के दोलन पर नजर रखने के लिये खासतौर से तब बिहार में चाक चौबंद व्यवस्था की गई। चूंकि रेडियो बुलेटिन ही सबकुछ होता था तो पटना में होने शाम साढे सात बजे के सबसे लोकप्रिय बुलेटिन के लिय़े शम्भूनाथ मिश्रा तो रांची से शाम छह बजकर बीस मिनट पर नया बुलेटिन शुरु करने के लिये मणिकांत वाजपेयी को दिल्ली से भेजा गया। फिर अभी जिस तरह संपादकों को अपने अनुकूल करने केलिये प्रधानमंत्री चाय या भोजन पर बुलाते हैं।
या फिर दिल्चस्प यह भी है कि चालीस बरस पहले जिस आपातकाल के शिकार अरुण जेटली छात्र नेता के तौर पर हुये वह भी पिछले दिनो बतौर सूचना प्रसारण मंत्री जिस तरह संपादकों से लेकर रिपोर्टर तक को घर बुलाकर अपनी सरकार की सफलता के प्रचार-प्रसार का जिक्र करते रहे। और बैठक से निकलकर कोई संपादक बैठक की बात तो दूर बल्कि देश के मौजूदा हालात पर भी कलम चलाने की हिम्मत नहीं रख पाता है । जबकि आपातकाल लगने के 72 घंटे के भीतर इन्द्र कुमार गुजराल की जगह विघाचरण शुक्ल सूचना प्रसारण बनते ही संपदकों को बुलाते हैं। और दोपहर दो बजे मंत्री महोदय पद संभालते है तो पीआईबी के प्रमुख सूचना अधिकारी डां. ए आर बाजी शाम चार दिल्ली के बडे समाचार पत्रा को संपादकों को बुलावा भेजते है। मुलगांवकर { एक्सप्रेस } ,जार्ज वर्गीज { हिन्दुस्तान टाइम्स },गिरिलाल जैन { स्टेटेसमैन  } , निहालसिंह {स्टेटसमैन }  और विश्वनाथ { पेट्रियाट  } पहुंचते हैं।
बैठक शुरु होते ही मंत्री महोदय कहते है कि सरकार संपादकों के कामकाज के काम से खुश नहीं है। उन्हें अपने तरीके बदलने होंगे। इसपर एक संपादक जैसे ही बोलते हैं कि ऐसी तानाशाही को स्वीकार करना उनके लिये असम्भव है। तो ठीक है कहकर मंत्री जी भी उत्तर देते है कि , “ हम देखेगें कि आपके अखबार से कैसा बरताव किया जाये “ । तो गिरिलाल जैन बहस करने के लिये कहते हैं कि ऐसे प्रतिबंध तो अंग्रेजी शासन में भी नहीं लगाय़े गये थे। शुक्ल उन्हें बीच में ही काट कर कहते है , “यह अंग्रेजी शासन नहीं है । यह राष्ट्रीय आपातस्थिति है “।  और इसके बाद संवाद भंग हो जाता है। और उसके बाद अदिकत्र नतमस्तक हुये। करीब सौ समाचारपत्र को सरकारी विज्ञापन बंद कर झुकाया गया। लेकिन तब भी स्टेटसमैन के सीआर ईरानी और एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका ने झुकने से इंकार कर दिया। तो सरकार ने इनके खिलाफ फरेबी चाले चलने शुरु की । लेकिन पीएमओ के अधिकारी ही सेंसर बोर्ड में तब्दिल हो गये । प्रेस परिषद भंग कर दी गई । आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन पर रोक का घृणित अध्यादेश 1975 लागू कर दिया गया । यह अलग बात है कि बावजूद चालिस साल पहले संघर्ष करते पत्रकार और मीडिया हाउस आपातकाल में भी दिखायी जरुर दे रहे थे । लेकिन चालीस साल बाद तो बिना आपातकाल सत्ता झुकने को कहती है तो हर कोई सरकारों के सामने लेटने को तैयार हो जाता है।