बुधवार, 25 जनवरी 2012

मीडिया: स्वामित्व एवं स्वतंत्रता










बड़े घरानों के पास मीडिया कंपनियां पहले भी होती थीं। अविभाजित बिड़ला परिवार के पास दिल्ली में हिंदुस्तान टाइम्स और पटना में सर्चलाइट का स्वामित्व था, डालमिया-साहू जैन (जो बाद में अलग हो गए) के पास बेनेट, कोलमैन (टाइम्स ऑफ इंडिया, इकनॉमिक टाइम्स तथा कुछ अन्य प्रकाशनों के प्रकाशक) थे और टाटा का रिश्ता उस समय कोलकाता से प्रकाशित होने वाले स्टेट्समैन के साथ था। यहां तक कि इंडियन एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका के पास भी एक समय देश की सबसे बड़ी जूट मिल (नैशनल जूट) का स्वामित्व था और उन्होंने इंडियन आयरन ऐंड स्टील पर भी नियंत्रण की कोशिश की थी। चूंकि इन समूहों में से अधिकांश के पास जूट मिलें थीं इसलिए वामपंथी आलोचक इनको 'जूट प्रेस' अथवा निंदात्मक लहजे में 'झूठ प्रेस' तक पुकारा करते थे। इसके बावजूद इन प्रकाशन संस्थानों में देश के पत्रकारिता जगत की कुछ चर्चित हस्तियों का कद बना। 'जूट प्रेस' के ही दौर में कुछ निखालिस मीडिया कंपनियां भी थीं। इनमें कस्तूरी ऐंड सन्स (द हिंदू), एबीपी (आनंद बाजार पत्रिका) जैसे नाम थे जबकि बेंगलूर में डेक्कन हेराल्ड के हित वृक्षारोपण से जुड़े थे। कुछ छोटे अखबार भी थे (फ्री प्रेस जर्नल, मिड-डे, इंडियन पोस्ट और द पायनियर आदि) जिनके मालिक बदल गए और वे या तो चलते रहे या बंद हो गए। बाद में कारोबारी घरानों में बदलाव आया और जो प्रकाशन कभी बड़े घरानों से जुड़े थे, वे तमाम व्यावहारिक कारणों से एकल मीडिया कंपनियों में बदल गए। कुछ कंपनियां शेयर स्वामित्व के रुप में जनता के बीच गईं और शेयर बाजार में सूचीबद्घ हो गईं। उनके मालिक देश के अरबपतियों और राज्य सभा सदस्यों की सूची में दिखाई देने लगे। जब निजी समाचार चैनलों की शुरुआत हुई और वे चलने के लिए संघर्ष करने लगे, साथ ही अखबारों के प्रकाशन बढ़े तो इन संघर्षरत कंपनियों में निवेश अपरिहार्य हो गया। यह काम मनोरंजन टेलीविजन में पहले हो चुका है। मीडिया में बड़े कारोबारियों का प्रवेश नया नहीं है और कोई कानून भी इसमें आड़े नहीं आता। हाल के वर्षों में हमारा देश पहले के मुकाबले विकृत पूंजीवाद के चंगुल में अधिक उलझ गया है और हमारे यहां रूसी ओलिगार्च (निजीकरण के दौर में खूब संपत्ति बटोरने वाले कारोबारी) के ऐसे देसी संस्करण तैयार होने का खतरा उत्पन्न हो गया है जिनमें राजनीतिक और आर्थिक सत्ता निहित हो। अधिकांश समाचार संगठनों में संपादकीय और कारोबारी गतिविधियों को अलग करने वाली दीवार टूट चुकी है। कुछ ने ऐसा अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए किया है तो अन्य ने प्रतिस्पर्धी बाजार में अपना वजूद बचााने के लिए। चूंकि बड़े कारोबारी विभिन्न क्षेत्रों में सरकारी नीतियों को अपने पक्ष में करवाने की क्षमता प्रदर्शित कर चुके हैं इसलिए मीडिया जगत में उनकी बढ़ती ताकत चिंता का विषय है। मीडिया का काम सरकार के साथ-साथ कारोबारी जगत की भी निगरानी करना और उनके बीच माध्यम बनना है तो क्या मौजूदा सुरक्षा उपायों के बीच वह स्वतंत्रतापूर्वक अपनी भूमिका निभा पाएगा? क्या महत्त्वपूर्ण मीडिया कंपनियों पर बड़े कारोबारियों के स्वामित्व का मतलब उनको अधिक शक्ति संपन्न बनाना है? संपादकीय स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए ताकि मीडिया मालिकों के लिए काम करने वाला संस्थान बनकर न रह जाए? इन सवालों का हल तत्काल खोजे जाने की आवश्यकता है।
(घोषणा: कोटक महिंद्रा बैंक की बिज़नेस स्टैंडर्ड में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी है। समाचार पत्र ने लंबे समय से अपने पत्रकारों के लिए आचार संहिता बना रखी है और उसे अपनी बहुप्रतिष्ठित संपादकीय स्वतंत्रता पर गर्व है संपादकीय / January 17, 2012 )


Keyword: media, freedom, india,

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