बुधवार, 15 मई 2013

हिन्दी का पहला अखबार / उदन्त मार्तण्ड




भारत डिस्कवरी प्रस्तुति

उदन्त मार्तण्ड का मुखपृष्ठ

उदन्त मार्तण्ड

उदन्त मार्तण्ड हिंदी का प्रथम समाचार पत्र था। इसका प्रकाशन 30 मई, 1826 ई. में कलकत्ता से एक साप्ताहिक पत्र के रूप में शुरू हुआ था। कलकता के कोलू टोला नामक मोहल्ले की 37 नंबर आमड़तल्ला गली से पं. जुगलकिशोर शुक्ल ने सन् 1826 ई. में उदन्त मार्तण्ड नामक एक हिंदी साप्ताहिक पत्र निकालने का आयोजन किया। उस समय अंग्रेज़ी, फारसी और बांग्ला में तो अनेक पत्र निकल रहे थे किंतु हिंदी में एक भी पत्र नहीं निकलता था। इसलिए "उदंत मार्तड" का प्रकाशन शुरू किया गया। इसके संपादक भी श्री जुगुलकिशोर शुक्ल ही थे। वे मूल रूप से कानपुर संयुक्त प्रदेश के निवासी थे।

शाब्दिक अर्थ

उदन्त मार्तण्ड का शाब्दिक अर्थ है ‘समाचार-सूर्य‘। अपने नाम के अनुरूप ही उदन्त मार्तण्ड हिंदी की समाचार दुनिया के सूर्य के समान ही था। उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन मूलतः कानपुर निवासी पं. युगल किशोर शुक्ल ने किया था। यह पत्र ऐसे समय में प्रकाशित हुआ था जब हिंदी भाषियों को अपनी भाषा के पत्र की आवश्यकता महसूस हो रही थी। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ‘उदन्त मार्तण्ड‘ का प्रकाशन किया गया था।[1]

उद्देश्य

उदन्त मार्तण्ड के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए जुगलकिशोर शुक्ल ने लिखा था जो यथावत प्रस्तुत है-
‘‘यह उदन्त मार्तण्ड अब पहले पहल हिंदुस्तानियों के हेत जो, आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेज़ी ओ पारसी ओ बंगाली में जो समाचार का कागज छपता है उसका उन बोलियों को जान्ने ओ समझने वालों को ही होता है। और सब लोग पराए सुख सुखी होते हैं। जैसे पराए धन धनी होना और अपनी रहते परायी आंख देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसके रस का मिलना कठिन ही है और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे हैं‘‘[1]

समाज के विरोधाभासों पर तीखे कटाक्ष

हिंदी के पहले समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड ने समाज के विरोधाभासों पर तीखे कटाक्ष किए थे। जिसका उदाहरण उदन्त मार्तण्ड में प्रकाशित यह गहरा व्यंग्य है-
‘‘एक यशी वकील अदालत का काम करते-करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को वह सौंप के आप सुचित हुआ। दामाद कई दिन वह काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला हे महाराज आपने जो फलाने का पुराना ओ संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा था सो आज फैसला हुआ यह सुनकर वकील पछता करके बोला कि तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थे तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठा के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भली-भांति अपना दिन काटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंप करके समझा था कि तुम भी अपने बेटे पाते तक पालोगे पर तुम थोड़े से दिनों में उसको खो बैठे‘‘[1]

प्रकाशन बंद


उदन्त मार्तण्ड
उदन्त मार्तण्ड ने समाज में चल रहे विरोधाभासों एवं अंग्रेज़ी शासन के विरूद्ध आम जन की आवाज़ को उठाने का कार्य किया था। कानूनी कारणों एवं ग्राहकों के पर्याप्त सहयोग न देने के कारण 19 दिसंबर, 1827 को युगल किशोर शुक्ल को उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन बंद करना पड़ा। उदन्त मार्तण्ड के अंतिम अंक में एक नोट प्रकाशित हुआ था जिसमें उसके बंद होने की पीड़ा झलकती है। वह इस प्रकार था-
‘‘आज दिवस लौ उग चुक्यों मार्तण्ड उदन्त। अस्ताचल को जाता है दिनकर दिन अब अंत।।‘‘
उदन्त मार्तण्ड बंद हो गया, लेकिन उससे पहले वह हिंदी पत्रकारिता का प्रस्थान बिंदु तो बन ही चुका था।[1]

विशेष बिंदु

  • यह साप्ताहिक पत्र पुस्तकाकार (12x8) छपता था और हर मंगलवार को निकलता था।
  • इसके कुल 79 अंक ही प्रकाशित हो पाए थे कि डेढ़ साल बाद दिसंबर, 1827 ई. को इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा।
  • इसके अंतिम अंक में लिखा है- उदन्त मार्तण्ड की यात्रा- मिति पौष बदी 1 भौम संवत् 1884 तारीख दिसम्बर सन् 1827। उन दिनों सरकारी सहायता के बिना, किसी भी पत्र का चलना प्रायः असंभव था।
  • कंपनी सरकार ने मिशनरियों के पत्र को तो डाक आदि की सुविधा दे रखी थी, परंतु चेष्टा करने पर भी "उदंत मार्तंड" को यह सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी।
  • इस पत्र में ब्रज और खड़ी बोली दोनों के मिश्रित रूप का प्रयोग किया जाता था जिसे इस पत्र के संचालक "मध्यदेशीय भाषा" कहते थे।

भारत में हिन्दी पत्रकारिता : एक अवलोकन











हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई और इसका श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है। राजा राममोहन राय ने ही सबसे पहले प्रेस को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ा। भारतीयों के सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक हितों का समर्थन किया। समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियों पर प्रहार किये और अपने पत्रों के जरिए जनता में जागरूकता पैदा की। राममोहन राय ने कई पत्र शुरू किये। जिसमें अहम हैं-साल 1816 में प्रकाशित ‘बंगाल गजट’। बंगाल गजट भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र है। इस समाचार पत्र के संपादक गंगाधर भट्टाचार्य थे। इसके अलावा राजा राममोहन राय ने मिरातुल, संवाद कौमुदी, बंगाल हैराल्ड पत्र भी निकाले और लोगों में चेतना फैलाई। 30 मई 1826 को कलकत्ता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल के संपादन में निकलने वाले ‘उदंत्त मार्तण्ड’ को हिंदी का पहला समाचार पत्र माना जाता है।[1]

हिंदी पत्रकारिता का काल विभाजन

भारत में हिंदी पत्रकारिता का तार्किक और वैज्ञानिक आधार पर काल विभाजन करना कुछ कठिन कार्य है। सर्वप्रथम राधाकृष्ण दास ने ऐसा प्रारंभिक प्रयास किया था। उसके बाद ‘विशाल भारत’ के नवंबर 1930 के अंक में विष्णुदत्त शुक्ल ने इस प्रश्न पर विचार किया, किन्तु वे किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंचे। गुप्त निबंधावली में बालमुकुंद गुप्त ने यह विभाजन इस प्रकार किया –
  • प्रथम चरण – सन् 1845 से 1877
  • द्वितीय चरण – सन् 1877 से 1890
  • तृतीय चरण – सन् 1890 से बाद तक
डॉ. रामरतन भटनागर ने अपने शोध प्रबंध ‘द राइज एंड ग्रोथ आफ हिंदी जर्नलिज्म’ काल विभाजन इस प्रकार किया है–
  • आरंभिक युग 1826 से 1867
  • उत्थान एवं अभिवृद्धि
    • प्रथम चरण (1867-1883) भाषा एवं स्वरूप के समेकन का युग
    • द्वितीय चरण (1883-1900) प्रेस के प्रचार का युग
  • विकास युग
    • प्रथम युग (1900-1921) आवधिक पत्रों का युग
    • द्वितीय युग (1921-1935) दैनिक प्रचार का युग
  • सामयिक पत्रकारिता – 1935-1945
उपरोक्त में से तीन युगों के आरंभिक वर्षों में तीन प्रमुख पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ, जिन्होंने युगीन पत्रकारिता के समक्ष आदर्श स्थापित किए। सन् 1867 में ‘कविवचन सुधा’, सन् 1883 में ‘हिन्दुस्तान’ तथा सन् 1900 में ‘सरस्वती’ का प्रकाशन है।[2]
  • काशी नागरी प्रचारणी द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी साहित्य के वृहत इतिहास’ के त्रयोदय भाग के तृतीय खंड में यह काल विभाजन इस प्रकार किया गया है –
  1. प्रथम उत्थान – सन् 1826 से 1867
  2. द्वितीय उत्थान – सन् 1868 से 1920
  3. आधुनिक उत्थान – सन् 1920 के बाद
  • ‘ए हिस्ट्री आफ द प्रेस इन इंडिया’ में श्री एस नटराजन ने पत्रकारिता का अध्ययन निम्न प्रमुख बिंदुओं के आधार पर किया है –
  1. बीज वपन काल
  2. ब्रिटिश विचारधारा का प्रभाव
  3. राष्ट्रीय जागरण काल
  4. लोकतंत्र और प्रेस
  • डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र ने ‘हिंदी पत्रकारिता’ का अध्ययन करने की सुविधा की दृष्टि से यह विभाजन मोटे रूप से इस प्रकार किया है –
  1. भारतीय नवजागरण और हिंदी पत्रकारिता का उदय (सन् 1826 से 1867)
  2. राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति- दूसरे दौर की हिंदी पत्रकारिता (सन् 1867-1900)
  3. बीसवीं शताब्दी का आरंभ और हिंदी पत्रकारिता का तीसरा दौर – इस काल खण्ड का अध्ययन करते समय उन्होंने इसे तिलक युग तथा गांधी युग में भी विभक्त किया।
  • डॉ. रामचन्द्र तिवारी ने अपनी पुस्तक ‘पत्रकारिता के विविध रूप’ में विभाजन के प्रश्न पर विचार करते हुए यह विभाजन किया है –
  1. उदय काल – (सन् 1826 से 1867)
  2. भारतेंदु युग – (सन् 1867 से 1900)
  3. तिलक या द्विवेदी युग – (सन् 1900 से 1920)
  4. गांधी युग – (सन् 1920 से 1947)
  5. स्वातंत्र्योत्तर युग (सन् 1947 से अब तक)
  • डॉ. सुशील जोशी ने काल विभाजन कुछ ऐसा प्रस्तुत किया है –
  1. हिंदी पत्रकारिता का उद्भव – 1826 से 1867
  2. हिंदी पत्रकारिता का विकास – 1867 से 1900
  3. हिंदी पत्रकारिता का उत्थान – 1900 से 1947
  4. स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता – 1947 से अब तक[2]
उक्त मतों की समीक्षा करने पर स्पष्ट होता है कि हिंदी पत्रकारिता का काल विभाजन विभिन्न विद्वानों पत्रकारों ने अपनी-अपनी सुविधा से अलग-अलग ढंग से किया है। इस संबंध में सर्वसम्मत काल निर्धारण अभी नहीं किया जा सका है। किसी ने व्यक्ति विशेष के नाम से युग का नामकरण करने का प्रयास किया है तो किसी ने परिस्थिति अथवा प्रकृति के आधार पर। इनमें एकरूपता का अभाव है।

हिंदी पत्रकारिता का उद्भव काल (1826 से 1867)

कलकत्ता से 30 मई, 1826 को ‘उदन्त मार्तण्ड’ के सम्पादन से प्रारंभ हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा कहीं थमी और कहीं ठहरी नहीं है। पंडित युगल किशोर शुक्ल के संपादन में प्रकाशित इस समाचार पत्र ने हालांकि आर्थिक अभावों के कारण जल्द ही दम तोड़ दिया, पर इसने हिंदी अखबारों के प्रकाशन का जो शुभारंभ किया वह कारवां निरंतर आगे बढ़ा है। साथ ही हिंदी का प्रथम पत्र होने के बावजूद यह भाषा, विचार एवं प्रस्तुति के लिहाज से महत्वपूर्ण बन गया।[2]

कलकत्ता का योगदान

पत्रकारिता जगत में कलकत्ता का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रशासनिक, वाणिज्य तथा शैक्षिक दृष्टि से कलकत्ता का उन दिनों विशेष महत्व था। यहीं से 10 मई 1829 को राजा राममोहन राय ने ‘बंगदूत’ समाचार पत्र निकाला जो बंगला, फ़ारसी, अंग्रेज़ी तथा हिंदी में प्रकाशित हुआ। बंगला पत्र ‘समाचार दर्पण’ के 21 जून 1834 के अंक ‘प्रजामित्र’ नामक हिंदी पत्र के कलकत्ता से प्रकाशित होने की सूचना मिलती है। लेकिन अपने शोध ग्रंथ में डॉ. रामरतन भटनागर ने उसके प्रकाशन को संदिग्ध माना है। ‘बंगदूदत’ के बंद होने के बाद 15 सालों तक हिंदी में कोई पत्र न निकला।[2]

हिंदी पत्रकारिता का उत्थान काल (1900-1947)

सन 1900 का वर्ष हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में महत्वपूर्ण है। 1900 में प्रकाशित सरस्वती पत्रिका]अपने समय की युगान्तरकारी पत्रिका रही है। वह अपनी छपाई, सफाई, कागज और चित्रों के कारण शीघ्र ही लोकप्रिय हो गई। इसे बंगाली बाबू चिन्तामणि घोष ने प्रकाशित किया था तथा इसे नागरी प्रचारिणी सभा का अनुमोदन प्राप्त था। इसके सम्पादक मण्डल में बाबू राधाकृष्ण दास, बाबू कार्तिका प्रसाद खत्री, जगन्नाथदास रत्नाकर, किशोरीदास गोस्वामी तथा बाबू श्यामसुन्दरदास थे। 1903 में इसके सम्पादन का भार आचार्य महावर प्रसाद द्विवेदी पर पड़ा। इसका मुख्य उद्देश्य हिंदी-रसिकों के मनोरंजन के साथ भाषा के सरस्वती भण्डार की अंगपुष्टि, वृद्धि और पूर्ति करन था। इस प्रकार 19वी शताब्दी में हिंदी पत्रकारिता का उद्भव व विकास बड़ी ही विषम परिस्थिति में हुआ। इस समय जो भी पत्र-पत्रिकाएं निकलती उनके सामने अनेक बाधाएं आ जातीं, लेकिन इन बाधाओं से टक्कर लेती हुई हिंदी पत्रकारिता शनैः-शनैः गति पाती गई।[2]

हिंदी पत्रकारिता का उत्कर्ष काल (1947 से प्रारंभ)

अपने क्रमिक विकास में हिंदी पत्रकारिता के उत्कर्ष का समय आज़ादी के बाद आया। 1947 में देश को आज़ादी मिली। लोगों में नई उत्सुकता का संचार हुआ। औद्योगिक विकास के साथ-साथ मुद्रण कला भी विकसित हुई। जिससे पत्रों का संगठन पक्ष सुदृढ़ हुआ। रूप-विन्यास में भी सुरूचि दिखाई देने लगी। आज़ादी के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में अपूर्व उन्नति होने पर भी यह दुख का विषय है कि आज हिंदी पत्रकारिता विकृतियों से घिरकर स्वार्थसिद्धि और प्रचार का माध्यम बनती जा रही है। परन्तु फिर भी यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय प्रेस की प्रगति स्वतंत्रता के बाद ही हुई। यद्यपि स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता ने पर्याप्त प्रगति कर ली है किन्तु उसके उत्कर्षकारी विकास के मार्ग में आने वाली बाधाएं भी कम नहीं हैं।[2]

प्रतिबंधित पत्र-पत्रिकाएँ

भारत के स्वाधीनता संघर्ष में पत्र-पत्रिकाओं की अहम भूमिका रही है। आजादी के आन्दोलन में भाग ले रहा हर आम-ओ-खास कलम की ताकत से वाकिफ था। राजा राममोहन राय, महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, बाल गंगाधर तिलक, पंडित मदनमोहन मालवीय, बाबा साहब अम्बेडकर, यशपाल जैसे आला दर्जे के नेता सीधे-सीधे तौर पर पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े हुए थे और नियमित लिख रहे थे। जिसका असर देश के दूर-सुदूर गांवों में रहने वाले देशवासियों पर पड़ रहा था। अंग्रेजी सरकार को इस बात का अहसास पहले से ही था, लिहाजा उसने शुरू से ही प्रेस के दमन की नीति अपनाई। 30 मई 1826 को कलकत्ता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल के संपादन में निकलने वाले ‘उदंत्त मार्तण्ड’ को हिंदी का पहला समाचार पत्र माना जाता है। अपने समय का यह ख़ास समाचार पत्र था, मगर आर्थिक परेशानियों के कारण यह जल्दी ही बंद हो गया। आगे चलकर माहौल बदला और जिस मकसद की खातिर पत्र शुरू किये गये थे, उनका विस्तार हुआ। समाचार सुधावर्षण, अभ्युदय, शंखनाद, हलधर, सत्याग्रह समाचार, युद्धवीर, क्रांतिवीर, स्वदेश, नया हिन्दुस्तान, कल्याण, हिंदी प्रदीप, ब्राह्मण,बुन्देलखण्ड केसरी, मतवाला सरस्वती, विप्लव, अलंकार, चाँद, हंस, प्रताप, सैनिक, क्रांति, बलिदान, वालिंट्यर आदि जनवादी पत्रिकाओं ने आहिस्ता-आहिस्ता लोगों में सोये हुए वतनपरस्ती के जज्बे को जगाया और क्रांति का आह्नान किया।[1]
नतीजतन उन्हें सत्ता का कोपभाजन बनना पड़ा। दमन, नियंत्रण के दुश्चक्र से गुजरते हुए उन्हें कई प्रेस अधिनियमों का सामना करना पड़ा। ‘वर्तमान पत्र’ में पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा लिखा ‘राजनीतिक भूकम्प’ शीर्षक लेख, ‘अभ्युदय’ का भगत सिंह विशेषांक, किसान विशेषांक, ‘नया हिन्दुस्तान’ के साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और फॉसीवादी विरोधी लेख, ‘स्वदेश’ का विजय अंक, ‘चॉंद’ का अछूत अंक, फॉंसी अंक, ‘बलिदान’ का नववर्षांक, ‘क्रांति’ के 1939 के सितम्बर, अक्टूबर अंक, ‘विप्लव’ का चंद्रशेखर अंक अपने क्रांतिकारी तेवर और राजनैतिक चेतना फैलाने के इल्जाम में अंग्रेजी सरकार की टेढ़ी निगाह के शिकार हुए और उन्हें जब्ती, प्रतिबंध, जुर्माना का सामना करना पड़ा। संपादकों को कारावास भुगतना पड़ा।

गवर्नर जनरल वेलेजली

भारतीय पत्रकारिता की स्वाधीनता को बाधित करने वाला पहला प्रेस अधिनियम गवर्नर जनरल वेलेजली के शासनकाल में 1799 को ही सामने आ गया था। भारतीय पत्रकारिता के आदिजनक जॉन्स आगस्टक हिक्की के समाचार पत्र ‘हिक्की गजट’ को विद्रोह के चलते सर्वप्रथम प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। हिक्की को एक साल की कैद और दो हजार रूपए जुर्माने की सजा हुई। कालांतर में 1857 में गैंगिंक एक्ट, 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, 1908 में न्यूज पेपर्स एक्ट (इन्साइटमेंट अफैंसेज), 1910 में इंडियन प्रेस एक्ट, 1930 में इंडियन प्रेस आर्डिनेंस, 1931 में दि इंडियन प्रेस एक्ट (इमरजेंसी पावर्स) जैसे दमनकारी कानून अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करने के उद्देश्य से लागू किए गये। अंग्रेजी सरकार इन काले कानूनों का सहारा लेकर किसी भी पत्र-पत्रिका पर चाहे जब प्रतिबंध, जुर्माना लगा देती थी। आपत्तिजनक लेख वाले पत्र-पत्रिकाओं को जब्त कर लिया जाता। लेखक, संपादकों को कारावास भुगतना पड़ता व पत्रों को दोबारा शुरू करने के लिए जमानत की भारी भरकम रकम जमा करनी पड़ती। बावजूद इसके समाचार पत्र संपादकों के तेवर उग्र से उग्रतर होते चले गए। आजादी के आन्दोलन में जो भूमिका उन्होंने खुद तय की थी, उस पर उनका भरोसा और भी ज्यादा मजबूत होता चला गया। जेल, जब्ती, जुर्माना के डर से उनके हौसले पस्त नहीं हुये।[1]

बीसवीं सदी की शुरुआत

बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रचार प्रसार और उन आन्दोलनों की कामयाबी में समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही। कई पत्रों ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रवक्ता का रोल निभाया। कानपुर से 1920 में प्रकाशित ‘वर्तमान’ ने असहयोग आन्दोलन को अपना व्यापक समर्थन दिया था। पंडित मदनमोहन मालवीय द्वारा शुरू किया गया साप्ताहिक पत्र ‘अभ्युदय’ उग्र विचारधारा का हामी था। अभ्युदय के भगत सिंह विशेषांक में महात्मा गांधी, सरदार पटेल, मदनमोहन मालवीय, पंडित जवाहरलाल नेहरू के लेख प्रकाशित हुए। जिसके परिणामस्वरूप इन पत्रों को प्रतिबंध- जुर्माना का सामना करना पड़ा। गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’, सज्जाद जहीर एवं शिवदान सिंह चैहान के संपादन में इलाहाबाद से निकलने वाला ‘नया हिन्दुस्तान’ राजाराम शास्त्री का ‘क्रांति’ यशपाल का ‘विप्लव’ अपने नाम के मुताबिक ही क्रांतिकारी तेवर वाले पत्र थे। इन पत्रों में क्रांतिकारी युगांतकारी लेखन ने अंग्रेजी सरकार की नींद उड़ा दी थी। अपने संपादकीय, लेखों, कविताओं के जरिए इन पत्रों ने सरकार की नीतियों की लगातार भतर्सना की। ‘नया हिन्दुस्तान’ और ‘विप्लव’ के जब्तशुदा प्रतिबंधित अंकों को देखने से इनकी वैश्विक दृष्टि का पता चलता है।[1]

‘चाँद’ का फाँसी अंक

फाँसीवाद के उदय और बढ़ते साम्राज्यवाद, पूंजीवाद पर चिंता इन पत्रों में साफ़ देखी जा सकती है। गोरखपुर से निकलने वाले साप्ताहिक पत्र ‘स्वदेश’ को जीवंतपर्यंत अपने उग्र विचारों और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण की भावना के कारण समय-समय पर अंग्रेजी सरकार की कोप दृष्टि का शिकार होना पड़ा। खासकर विशेषांक विजयांक को। आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा संपादित ‘चाँद’ के फाँसी अंक की चर्चा भी जरूरी है। काकोरी के अभियुक्तों को फांसी के लगभग एक साल बाद, इलाहाबाद से प्रकाशित चॉंद का फाँसी अंक क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास की अमूल्य निधि है। यह अंक क्रांतिकारियों की गाथाओं से भरा हुआ है। सरकार ने अंक की जनता में जबर्दस्त प्रतिक्रिया और समर्थन देख इसको फौरन जब्त कर लिया और रातों-रात इसके सारे अंक गायब कर दिये। अंग्रेज हुकूमत एक तरफ क्रांतिकारी पत्र-पत्रिकाओं को जब्त करती रही, तो दूसरी तरफ इनके संपादक इन्हें बिना रुके पूरी निर्भिकता से निकालते रहे। सरकारी दमन इनके हौसलों पर जरा भी रोक नहीं लगा सका। पत्र-पत्रिकाओं के जरिए उनका यह प्रतिरोध आजादी मिलने तक जारी रहा।[1]


Seealso.jpg इन्हें भी देखें: पत्रकारिता एवं भारत में समाचार पत्रों का इतिहास


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 1.4 प्रतिरोध के सामूहिक स्वर, परतंत्र भारत में प्रतिबंधित पत्र-पत्रिकाएँ (हिंदी) सृजनगाथा। अभिगमन तिथि: 25 दिसम्बर, 2012।
  2. 2.0 2.1 2.2 2.3 2.4 2.5 विश्व में पत्रकारिता का इतिहास (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) आइये सीखें पत्रकारिता (ब्लॉग)। अभिगमन तिथि: 25 दिसम्बर, 2012।

बाहरी कड़ियाँ

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अरुंधति राय
By Pramod Ranjan,

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लगभग तीन साल पहले दिल्ली के मीडिया स्टडीज ग्रुप ने हिंदी-अंग्रेजी राष्‍ट्रीय मीडिया के प्रमुख पदों पर कार्यरत लोगों की सामाजिक पृष्‍ठभूमि का सर्वे किया था। दिल्ली स्थित 37 मीडिया संस्थानों पर किये गये उस सर्वे में हर संस्थान के 10 सर्वोच्च पदों पर काबिज अधिकारियों की सामाजिक पृष्‍ठभूमि के बारे में जानकारी हासिल की गयी थी। राष्‍ट्रीय मीडिया में ‘फैसला लेने वाले’ पदों पर उच्च जाति हिंदू पुरुषों का हिस्सा 71 फीसदी था। पिछड़े 4 फीसदी थे। उच्च जाति हिंदू महिलाओं की मौजूदगी 17 प्रतिशत थी। दलित और आदिवासी की संख्या शून्य थी।
बिहार के मीडिया संस्थानों के सर्वे के लिए शुरू में हमने भी यही तकनीक अपनानी चाही, जिसके उपरोक्त किंकर्तव्यविमूढ़ कर देने वाले परिणाम सामने आये।
राष्‍ट्रीय मीडिया के सर्वे में जिन 37 संस्थानों को शामिल किया गया था, उनमें से अधिकांश का मुख्यालय दिल्ली में ही होने के कारण ‘बड़े’ पदों की संख्या पर्याप्त थी। इसलिए सर्वोच्च 10 पदों को चुनना संभव था। पटना के मीडिया संस्थानों में यह सुविधा न थी।
पटना के मीडिया संस्थानों में हमने 5 पदों (1) संपादक (2) समाचार संपादक (3) ब्यूरो चीफ (4) मुख्य/विशेष संवाददाता और (5) प्रोविंस डेस्क इंचार्ज – को ‘फैसला लेने वाले’ के रूप में चिन्हित किया।
पटना के अनेक मीडिया संस्थानों में उपरोक्त सभी 5 पद भी नहीं हैं। कई अखबारों, समाचार एजेंसियों और इलैक्ट्रॉनिक चैनलों में कार्यरत पत्रकारों की संख्या बहुत कम है तथा यहां कार्यरत कई राष्‍ट्रीय मीडिया संस्थानों के ब्यूरो कार्यालयों में तो अकेले (ब्यूरो) ‘चीफ’ का ही पद है। ऐसी स्थिति में इन पदों के समकक्ष कार्य कर रहे लोगों को भी ‘फैसला लेने वाला’ माना गया। ऐसे पत्रकारों की संख्या किसी संस्थान में 5, कहीं 3, कहीं 2 है तो कहीं अकेले ‘ब्यूरो चीफ’ ही ‘फैसला’ लेते हैं। इसके तहत 42 मीडिया संस्थानों के राज्यस्तरीय सर्वोच्च पदों पर कार्यरत 78 पत्रकारों की सामाजिक पृष्‍ठभूमि जांची गयी। इनमें हिंदी-अंग्रेजी प्रिंट (उर्दू नहीं), इलैक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थान, समाचार एजेंसियां व पत्रिकाएं शामिल थीं।

शुरुआत के शुरू में

सर्वे का विचार वस्तुत: अगस्त, 2008 में कोसी नदी में आयी प्रलंयकारी बाढ़ के बाद आया था। बाढ़ में हजारों लोग मारे गये थे। जिस इलाके में बाढ़ आयी थी, वह यादव और दलित बहुल था। जबकि राज्य में एक ऐसी सरकार थी, जो लोकतंत्र के पिछले पंचबरसा त्योहार में यादव राज खत्म कर चुकने की दुदुंभी बजाती फिर रही थी। इस नयी सरकार के एक घटक (जदयू) का मुख्य वोट बैंक भूमिहार, कुरमी-कोईरी और अत्यंत पिछड़ी जातियां हैं। जबकि दूसरे घटक (भाजपा) का वोट बैंक वैश्यों तथा अन्य सवर्ण जातियों में है। सामंती संस्कार वाली यह सरकार बाढ़ की तबाही के बाद लगभग दो महीने तक पीड़ितों को राहत पहुंचाने में बेहद क्रूर कोताही बरतती रही। इस मामले पर पक्ष और विपक्ष – दोनों की राजनीति अत्यंत निचले किस्म की जाति-आधारित थी। इसके बावजूद बिहार की पत्रकारिता न सिर्फ इस घटिया राजनीति पर मौन थी बल्कि उसमें बाढ़ की विभीषिका को कम से कम कर दिखाने और राज्य सरकार के राहत कार्यों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने की होड़ लगी थी।
पत्रकारिता के इस जघन्य दुष्कर्म ने आरंभ में हमें पटना में कार्यरत पत्रकारों की भौगोलिक पृष्‍ठभूमि के सर्वेक्षण के लिए प्रेरित किया। हमारे सामने एक ख्याल था कि क्या राजधानी पटना में कार्यरत पत्रकारों में बहुत कम संख्या कोसी के बाढ़ग्रस्त जिलों के वासियों की है? क्या इसलिए वे अपनी पेशागत जरूरतों के विपरीत बाढ़-पीड़ितों के प्रति इतने कम संवेदनशील हैं? काम शुरू हुआ। हम इसे बेहद आसान समझ रहे थे। हमारी सोच थी कि इसे दो-तीन मित्र मिल कर आसानी से निपटा लेंगे। लेकिन जिस भूखंड में आदमी की मुख्य पहचान जाति हो, वहां क्या शिक्षा और क्या भूगोल, सब द्वितीयक किस्म के परिचय हैं। हम किसी एक पत्रकार से दूसरे पत्रकार का गृह जिला पूछते तो कोई उसे भोजपुर का बताता, तो कोई दरभंगा का। किसी तीसरे से इनमें से सही को चिन्हित करने के लिए जानकारी लेते तो वह उसे नालंदा का निवासी बता देता। पर तीनों, उसकी जो जाति खुद बिना पूछे बता डालते वह सभी मामलों में समान रहती। कुछ मामलों में तो ऐसा हुआ कि हमने किसी पत्रकार मित्र से पूछा कि फलां अखबार का प्रोविंस डेस्क कौन देखता है? उत्तर मिला, ‘जानता हूं, पर नाम याद नहीं आ रहा। वह जो गोरा-गोरा सा है, बाल थोड़े-थोड़े पके हैं। राजपूत है। अलां पार्टी के फलां सिंह का नजदीकी है।’ इस तरह के इन उत्तरों से पत्रकारों की भौगोलिक पृष्‍ठभूमि की जानकारी तो क्या मिलती! जब नाम पूछने पर उत्तर में उनकी जाति सामने आती हो और बोनस के तौर पर उनकी किसी खास नेता से नजदीकी की सूचना…
इसी परिदृश्य में हमने जून, 2009 में इस सर्वे को विस्तृत करने का फैसला किया। बाकायदा सभी मीडिया संस्थानों के ‘राज्य स्तर पर फैसला लेने वाले’ पत्रकारों की सूची तैयार की गयी। उनके नाम, गृह जिला, शिक्षा, धर्म और जाति के कॉलमों को विभिन्न स्रोतों से जानकारी लेकर भरने का काम शुरू किया गया। इसमें हिंदी और अंग्रेजी के 45 संस्थानों के पत्रकारों को रखा गया, जिनमें से 42 संस्थानों के पत्रकारों के धर्म, जाति, लिंग की जानकारी हम जमा कर पाये। गृह जिला से संबंधित सूचनाएं भी कमोबेश जमा हो गयी हैं लेकिन शिक्षा संबंधी कॉलमों को 5 फीसदी भरने में भी हम सफल नहीं हो सके हैं। यह सोचना भी कितना शर्मनाक है कि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं, जहां का बौद्धिक तबका अपने साथियों की पहचान उनकी शिक्षा या अन्य व्यक्तिगत गुणों-अवगुणों के आधार पर नहीं, जाति के आधार पर करता है।

इस सर्वेक्षण में ‘फैसला लेने वालों’ की जातिगत पृष्‍ठभूमि के जो नतीजे आये, उनका जिक्र पहले हो चुका है। भौगोलिक और सांस्कृतिक पृष्‍ठभूमि के सर्वे के नतीजे अलग से जारी किये जाएंगे।

उपस्थिति की तलाश

‘फैसला लेने वाले पदों’ पर वंचित तबके के लोग नहीं हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि बिहार की पत्रकारिता में इनकी उपस्थिति शून्य है। भले ही वे कक्षा के दलपति न बन सके हों लेकिन कहीं-कहीं पिछली बेंचों पर तो दिखते ही हैं। इनमें से कई ने अंगूठा भी गंवाया है लेकिन इन एकलव्यों की धनुर्धरता पर संदेह की हिमाकत द्रोणों ने भी नहीं की है।
बिहारी पत्रकारिता में इन तबकों की उपस्थिति (फैसला लेने वाले पदों के अतिरिक्त) जांचने के लिए हमने कुछ और विस्तृत सर्वेक्षण आरंभ किया। इस बार हिंदी-अंग्रेजी के 42 संस्थानों के अलावा पटना से प्रकाशित उर्दू के 5 अखबारों को भी इसमें शामिल किया गया। कुल 47 मीडिया संस्थानों के 230 पत्रकारों को सर्वे में समेटते हुए हमने पाया कि 73 फीसदी पदों पर ऊंची जाति के हिंदुओं (ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, कायस्थ) का कब्जा है। अन्य पिछड़ा वर्ग के हिंदू 10 फीसदी, अशराफ मुसलमान 12 फीसदी तथा पसमांदा मुसलमान 4 फीसदी हैं। महिलाओं की उपस्थिति लगभग 4 फीसदी रही। पटना के मीडिया संस्थानों में महज 3 दलित पत्रकार मिले (तालिका-1)। फैसला लेने वाले पदों पर शषित जातियों की शून्य नुमाइंदगी के कारण पिछली सीटों की उपस्थिति कभी-कभार इनके ‘प्रतिनिधित्व’ का भ्रामक आभास भी सृजित करती है।
जून, 2009 के अंत में संपन्न हुए इस सर्वेक्षण में उन्हीं पत्रकारों को शामिल किया गया, जो ‘खबरों’ से जुड़े हैं। फीचर आदि प्रभागों को इसमें शामिल नहीं किया गया। अधिक पत्रकारों वाले अखबारों (हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर और राष्‍ट्रीय सहारा) से अवरोही (ऊपर से नीचे) क्रम में 20-20 पत्रकारों को लिया गया। जबकि अन्य छोटे अखबारों के लगभग सभी पत्रकारों (यह संख्या प्रति अखबार 13 से लेकर 4 तक रही) को शामिल किया गया। यह फार्मूला इलैक्ट्रॉनिक चैनलों पर भी लागू किया गया। दिल्ली समेत अन्य महानगरों से संचालित होने वाले राष्‍ट्रीय मीडिया संस्थानों के पटना प्रमुखों को भी इसमें रखा गया है। ऐसे दैनिक समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज चैनलों और समाचार एजेंसियों के प्राय: दो या एक ही पत्रकार पटना में पदस्थापित हैं। इन सभी को इसमें शामिल किया गया है।

हिंदी प्रिंट : 87/13

बिहार की राजधानी में काम कर रहे हिंदी समाचार पत्रों, पत्रिकाओं के पत्रकारों में 87 फीसदी पत्रकार सवर्ण हिंदू परिवारों से हैं। इनमें 34 फीसदी ब्राह्मण, 23 फीसदी राजपूत, 14 फीसदी भूमिहार तथा 16 फीसदी कायस्थ हैं। हिंदू पिछड़ी-अति पिछड़ी जाति, अशराफ मुसलमान और दलित समाज से आने वाले पत्रकार महज 13 फीसदी हैं। इनमें बिहार की सबसे बड़ी जाति यादव की उपस्थिति सर्वाधिक, लगभग 3 फीसदी है (तालिका-3)। ओबीसी से आने वाले अन्य पत्रकार वैश्य, कुशवाहा, कानू, केवट, कहार और चौरसिया जातियों के हैं। इनकी मौजूदगी प्राय: एक-एक फीसदी है। इसके अतिरिक्त अन्य दर्जनों पिछड़ी-अति पिछड़ी जातियों की कोई नुमाइंदगी न हिंदी-अंग्रेजी प्रिंट में दिखती है, न ही इलैक्ट्रॉनिक में। हिंदी प्रिंट में महिला (उच्च जाति हिंदू) की भागीदारी एक फीसदी है (तालिका-4)

अंग्रेजी प्रिंट : महिलाओं की मौजूदगी

अंग्रेजी अखबारों की स्थिति काना राजा सी है। इसमें महिलाओं की भागीदारी 7 फीसदी है। इसमें से पिछड़ी जाति की 4 फीसदी महिलाओं की मौजूदगी भी ध्यान खींचती है। हिंदू ओबीसी की उपस्थिति हिंदी प्रिंट (9 फीसदी) की तुलना में अंग्रेजी प्रिंट में दुगनी से ज्यादा (19 फीसदी) है। उच्च जाति हिंदुओं का कब्जा यहां 75 फीसदी है। अशराफ मुसलमान 4 प्रतिशत हैं। दलितों की उपस्थिति शून्य है। (तालिका-3 व 4)
हिंदी और अंग्रेजी प्रिंट में एक रोचक अंतर भूमिहार और राजपूतों की संख्या का है। हिंदी प्रिंट की तुलना में यहां इन दो जातियों की संख्या आधी से भी कम (राजपूत 11 फीसदी और भूमिहार 6 फीसदी) हो गयी है। अंग्रेजी प्रिंट पर ब्राह्मणों (36%) तथा कायस्थों (21%) का आधिपत्य दिखता है। (अंग्रेजी प्रिंट में तीन हिंदू ओबीसी, एक ईसाई व एक अशराफ मुसलमान (पुरुष) ‘फैसला लेने वाले’ पद पर भी हैं। हिंदी प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक में इन पदों पर निरपवाद रूप से ऊंची जाति के पुरुष काबिज हैं)

इलैक्ट्रॉनिक : 10 बनाम 90

पिछड़ों के नेता शहीद जगदेव प्रसाद का नारा था – दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा / सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है। यह 1971-72 की बात है। उसके बाद से बिहार की पिछड़ा राजनीति की नदी में बहुत पानी बह चुका। लेकिन इस धारा का सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व ज्ञान की सत्ता पर काबिज होने के रास्तों को पहचानने में नाकाम रहा। सांस्कृतिक सत्ता का तो इनके लिए कोई मोल ही नहीं रहा। 100 में से 90 पर दावा करने वाले जगदेव का एक दूसरा नारा यह भी था – भैंस पालो, अखाड़ा खोदो, राजनीति करो। लालू प्रसाद ने तो 15 साल आईटी को समझने से इनकार करते हुए ही गुजार दिये। पिछड़े नेताओं ने कभी शिक्षा की बात की भी तो वह कई कारणों से साक्षरता से आगे नहीं बढ़ सकी।
बहरहाल, हिंदी-अंग्रेजी इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का सामाजिक परिदृश्य सर्वाधिक एकरस है। इनमें 90 फीसदी पदों पर ऊंची जाति के हिंदुओं का कब्जा है। हिंदू ओबीसी 7 प्रतिशत हैं। अशराफ मुसलमानों की नुमाइंदगी 3 फीसदी है। महिलाएं ज़रूर 10 फीसदी हैं, जो ऊंची जाति के हिंदू परिवारों से आती हैं। दलित यहां भी सिरे से नदारद हैं। (तालिका – 3 व 4)

उर्दू प्रिंट : पसमांदा आंदोलन का प्रभाव

हिंदी और अंग्रेजी प्रिंट मीडिया के विपरीत उर्दू मीडिया की ओर देखना कई मामलों में सुखद है। पटना से उर्दू के पांच दैनिक छपते हैं – कौमी तंजीम, रोजनामा (राष्‍ट्रीय सहारा), संगम, पिंदार और फारूकी तंजीम। आश्चर्यजनक रूप से इनमें से तीन – संगम, पिंदार और फारूकी तंजीम – का मालिकाना हक पसमांदा तबक़े के पास है। इन तीनों के संपादक भी इसी समुदाय के हैं। हिंदी या अंग्रेजी मीडिया के संबंध में फिलवक्त ऐसी कल्पना भी असंभव है। वस्तुत: बिहार में हिंदुओं का सामाजिक न्याय का राजनीतिक आंदोलन अपने विरोधाभासों में घिर कर मरणासन्न स्थिति में है। जबकि पसमांदों का आंदोलन एक जीवंत आंदोलन है। पिछले चार-पांच वर्षों से इसका तेज और तेवर देखते बन रहा है।
पिछड़े हिंदुओं का ‘सामाजिक न्याय’ मुसलमानों को एक इकाई मान कर उनके अशराफ तबके से गठजोड़ करता रहा है, उन्हें भौतिक लाभ पहुंचाता रहा है और उनकी धार्मिक सनक को संरक्षित करता रहा है। इसके विपरीत मुसलमानों के सामाजिक न्याय के आंदोलन – पसमांदा आंदोलन – में हिंदुओं के दलित-पिछड़े तबकों को साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति एक सहज और अधिक प्रगतिशील सामाजिक ध्रुवीकरण का वाहक बनने की संभावना रखती है। इस आंदोलन का प्रतिबिंब उर्दू पत्रकारिता पर भी दिखता है। संगम का लक्ष्य प्रत्यक्ष रूप से पसमांदा आंदोलन को गति देने का रहा है। फारूकी तंजीम और पिंदार की संपादकीय नीति भी कमोबेश इस आंदोलन के पक्ष में रही है। जबकि सैयद वर्चस्व वाले कौमी तंजीम और रोजनामा इस आंदोलन का प्रत्यक्ष-परोक्ष विरोध करते रहे हैं। उर्दू अखबारों के कुल पदों में 66 फीसदी प्रतिनिधित्‍व अशराफ तबके का है जबकि पसमांदा तबके के (ओबीसी) पत्रकार 26 फीसदी हैं। इन तथ्यों के साथ यह देखना विचलित करता है कि उर्दू समेत पूरी पत्रकारिता में दलित मुसलमानों और मुसलमान महिलाओं की कोई नुमाइंदगी नहीं है (तालिका-3 व 4)। एक और प्रतिगामी बात यह है कि पसमांदा नेतृत्व वाले उर्दू अखबार भी मुसलमानों के दैनंदिन जीवन पर धर्म की जकड़बंदी को ढीला करने की कोई कोशिश नहीं कर रहे।
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