शनिवार, 28 जून 2014

संपादक पत्रकार प्रभाष जोशी से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत







सती प्रथा हमारी परंपरा


प्रस्तुति राकेश गांधी/ हिमानी सिंह, वर्धा

 
देश के वरिष्ठ पत्रकार और 'जनसत्ता' के संपादक प्रभाष जोशी क्रिकेट के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करने के लिए उस पर लिखते हैं. उनकी राय में भारतीय क्रिकेटर स्वाभाविक रूप से वह कौशल अर्जित करते हैं, जिसकी जरूरत क्रिकेट में होती है, कुछ वैसे ही जैसे ब्राह्मणों ने ब्रह्म से, वायवीय दुनिया से अपने संपर्क के पारंपरिक कौशल के कारण सिलिकॉन वैली में अपना झंडा गाड़ा. प्रभाष जी का मानना है कि भारत में सती प्रथा समेत तमाम मुद्दों को अपनी परंपरा में देखने की जरूरत है. यहां पेश है, उनसे हाल ही में की गई बातचीत.
प्रभाष जोशी


आज देश में हिंदी पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष माने जाने वाले प्रभाष जोशी एक विदेशी खेल पर इतने लहालोट रहते हैं, कई लोगों को माजरा समझ में नहीं आता. धोती-कुर्ता और ‘अपन’ वाले प्रभाष जोशी के इस क्रिकेट प्रेम का राज क्या है ?

इंदौर में मैं पला-पनपा. इंदौर में बहुत प्रसिद्ध टीम हुआ करती थी होलकर टीम और इंदौर शहर के लिए वो टीम गौरव का प्रतीक थी. क्योकि उसमें सी.के.नायडू जैसे खिलाड़ी थे, जो कि भारतीय क्रिकेट के प्रथम पुरूष हैं. उसमें मुस्ताक अली जैसे खिलाड़ी थे, जिनसे अधिक रोमांटिक खिलाड़ी तो आज तक नहीं हुआ. उसमें चंदू सरवटे, भाऊ साहेब निर्मलकर थे, जिन्होंने किसी भी हिन्दूस्तानी द्वारा सबसे ज्यादा 443 रन बनाने का रिकार्ड कायम किया था; खंजू रामनेकर और भाऊ निवसरकर, ऐसे लोग उसमें थे. तो एक प्रकार से स्थानीय गौरव की भावना अपने को रिलेट करती थी. फिर मैं क्रिकेट खेलता भी था और अगर मैंने विनोबा का रास्ता ना पकड़ा होता तो शायद मैं टेस्ट क्रिकेट खेलता और रिटायर होता.

मुझे लगा कि क्रिकेट खेलने के बाद दूसरा सबसे करीबी प्रेम दिखाने का तरीका उसके बारे में लिखना होता है. लेकिन लिखना भी मैंने कोई अपने आप शुरू किया ऐसा नहीं है. ‘नई दुनिया’ ने पहली बार खेल का कवरेज चालू किया तो मैं वो पेज निकाला करता था. उस पेज में यह था कि नायडू साहब का कुछ छपे, जगदाले साहब का कुछ छपे तो इनकी तरफ से मैं घोस्ट राइटिंग किया करता था. उस घोस्ट राइटिंग के कारण मुझको लगा कि यह मामला लिखकर आगे बढ़ाया जा सकता है.

अब मैं पाता हूं कि मुझे देखने में जो आनंद आता है, उसे लिखकर मैं बहुत अच्छी तरह से अभिव्यक्त कर सकता हूं. क्योंकि मैं जहां भी जाता हूं, कई महिलाएं मुझे मिलती हैं, वे कहतीं हैं कि हम तो क्रिकेट समझते नहीं लेकिन आप जो लिखते हैं, उसे पढ़ने के लिए हम क्रिकेट पर ध्यान देते हैं. और तो और हिंदी के प्रसिद्ध कवि अपने कुंवर नारायण ने मुझसे कहा कि मैं क्रिकेट देखता नहीं हूं, समझता नहीं हूं. मैं क्रिकेट को आपके गद्य के कारण पढ़ता हूं. अब अगर आपको चारों तरफ से इस तरह का रिस्पांस मिलता है और अगर वो आपका पहला शौक है तो फिर आपकी इच्छा होती है कि आप उसे लगातार करते रहें.

कई बार मेरे मन में यह आता है कि अब तो देख लिया, अब क्या लिखना. मुझे याद आता है कि मैं एक बार विदेश यात्रा पर था तो एक महिला ने मुझे चिट्ठी लिखी कि कल फलां-फलां मैच हुआ, उसमें ऐसी-ऐसी स्थिति हुई. आज सबेरे मैंने इस इरादे से अखबार खोला कि देखते हैं उसमें आप क्या कहते हैं. और आपका लेख न देखकर मुझे बहुत निराशा हुई. तो कम से कम जिस पर सब लोग रुचि रखते हैं, उन पर तो आप जरूर लिखा कीजिए. अब उस महिला को मैं जानता नहीं हूं. यूं भी अपने यहां महिलाओं का क्रिकेट में शौक उतना नहीं है, जितना दूसरे देशों में हो सकता है. लेकिन अगर आपको इतनी व्यापक पाठकीय रुचि और प्रतिक्रिया मिलती है तो यार, लिखने वाला इसके अलावा किसके लिए लिख रहा है ? इसलिए मैं वो करता रहता हूं.

खेल राजाओं का
एक सवाल उठता है बार बार कि क्रिकेट सामंती खेल है. देश का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा मानता है कि क्रिकेट को अनावश्यक रूप से बाज़ार के दबाव के कारण बढ़ावा मिला है, उसके बनिस्बत फुटबाल या हॉकी या जो दूसरे बेहतर खेल हो सकते थे, उनको दरकिनार किया गया.

अपने देश में जिस तरह से यह खेल शुरू हुआ है, उस कारण से उसकी यह छवि बनी हुई है. अपने देश में क्रिकेट लाए अंग्रेज, वो अंग्रेज जो आप पर राज करते थे. सबसे पहले उनके साथ किसने खेलना मंजूर किया ? पारसियों ने, जो कि आपकी एक बहुत ही छोटी अल्पसंख्यक कम्युनिटी थी. अंग्रेजों ने उनको इसलिए क्रिकेट में लगाया कि इन लोगों को वो भारतीयों से फोड़ कर, अलग कर के फिर इनका इस्तेमाल कर सकें. उसके बाद यह महाराजाओं की टीमों का खेल बना. उसके बाद पटियाला महाराजा, बड़ौदा के महाराजा, होलकर महाराजा इस तरह से महाराजा लोग इसमें आए. बनारस में रहने वाले महाराज कुमार ऑफ विजयानगरम् ने इसमें रुचि ली क्योंकि वो क्रिकेट के जरिए अंग्रेजों से अपने संबंध ठीक करना चाहते थे. और तो और, क्रिकेट के दूसरे नंबर के दुनिया के सबसे बड़े प्रामाणिक खिलाड़ी रणजीत सिंह जी महाराज कुमार ऑफ जामनगर, वो भी क्रिकेट इसलिए खेलते थे क्योंकि वो अंग्रेजों का खेल था और इसके जरिए वे अपनी रियासत की रक्षा कर सकते थे. इसलिए एक सज्जन ने उन पर पुस्तक भी लिखी है ‘बैटिंग फॉर द एम्पायर’ यानी साम्राज्य के लिए वो खेलते थे.

यह गौरतलब है कि रणजीत सिंह जी इंग्लैंड की टीम से खेले और उनके भतीजे दिलीप सिंह जी, जिनके नाम पर अपने यहां एक प्रतियोगिता भी चलती है; वो जब क्रिकेट खेलने को आए तो इस हालत में थे कि वो भारत के लिए खेल सकते थे और उनको भारत का कप्तान बनाया जाता. लेकिन रणजीत सिंह ने उनको कहा कि तुम इंग्लैंड के लिए खेलो और वो सबसे पहले इंग्लैंड के लिए खेले.

इंग्लैंड के लिए खेलते हुए रणजी ने पहले ही मैच में सेंचुरी बनाई थी. ऐसे में दिलीप सिंह के ऊपर ये दबाव था कि वो भी सेंचुरी बनाएं. तो उन्होंने भी बनाई थी. इसका सबसे मजेदार नतीजा ये निकला कि मंसूर अली खान पटौदी के पिता इफ्तिखार अली पटौदी इंग्लैंड में खेलते थे. वो पहले इंग्लैंड के लिए ही खेले. वो 1932 की बॉडी लाइन सीरीज में थे और जॉर्डिन के साथ नहीं थे. जॉर्डिन वो कैप्टन थ, जिसने बॉडी लाईन बॉलिंग इन्वेंट की थी. ये उससे सहमत नहीं थे. तो इसलिए जॉर्डिन ने इनको साइड लाइन कर दिया था.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ
आद्या आरूही सेन दिल्ली
मुबारक हो प्रभाष जी, आपके साक्षात्कार ने मीडिया में कुंडली मारे बैठे जातिवादियों को फिर से फन फैलाने का अवसर दे दिया है. आश्चर्य नहीं की सारे मिश्रा, त्रिपाठी, जोशी, पांडेय आपके पीछे खड़े नज़र आ रहे हैं...

मेरी मानें तो अब आपकी बुद्धि भी आपकी तरह ही सठिया गई है, अब ईक्कसवीं सदी में जाति के आधार पर समाज से खिलवाड़ बंद कीजिए और अपने पसंदीदा ब्राह्मण प्रधानमंत्री वाजपेयी को रिटायरमेंट में कंपनी देना शुरू कीजिए... चाहें तो खाली वक्त में भारत निर्माण में ब्राह्मणों की भूमिका पर महाग्रंथ भी लिख सकते हैं...
Amrish (amrish2jan@gmail.com) Kolkata
मैं बहुत सामान्य पढ़ा लिखा हूँ, प्रभाष जी की बात पूरी तरह समझ नहीं पाया...क्रिकेट में अजहर और पठान अच्छे खिलाडी हैं, तो सचिन और गावस्कर भी...इसमें उनका मुस्लिम या ब्राह्मण होना सहायक है, ये बात हजम नहीं हो रही...या शायद सही भी हो, आनुवंशिकता के कारण जैसे शारीरिक गुण पीढी-दर-पीढी चलते हैं, वैसे ही मानसिक गुण भी कमोबेश वंशानुगत होते हों...("मैं परंपरा से विभिन्न जातियों के काम के दौरान विकसित हुई कुशलता की बात कर रहा हूं. आप इसे ब्राह्मण जाति या ब्राह्मणवाद से मत जोड़िए.") मेरे विचार से व्यक्ति का रहन-सहन, निजी रुझान, और परिस्थितियां उसकी दशा और दिशा तय करती हैं...
Rakesh Singh () Kansas City
मैं हिमांशु (नोएडा) की प्रतिक्रिया से सहमत हूँ.
आत्महंता () धनबाद
अहसानमंद हैं, गाली नहीं दें
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नहीं मालूम यह कौन सी हवा चली कि लोग अपने दौरों में कीर्तिमान स्थापित करनेवालों को गाली देकर अपनी कालर ऊंची कर रहे हैं। क्रिकेट या टेनिस से मेरी दिलचस्पी मैदान में भारत या भारतीय की मौजदूगी रहने तक सीमित है। लेकिन प्रभाष जी ने खेल पत्रकारिता को जो कलेवर, मिजाज और तेवर दिए वह किसी खेल पत्रकार के बूते की बात नहीं। विषय कोई भी हो, वो अपनी कंटेंट को जिस तरह खोलते हैं, जैसा रिदम पैदा करते हैं विषय की जटिलता या प्रसंग से वाकफियत की कोई जरूरत नहीं होती। आखिर हिंदी का कौन पत्रकार इसे मानने को तौयार नहीं। उन्होंने एक अखबार से/में जो कुछ किया वह हिंदी पत्रकारिता का मानक हुआ। परिदृश्य में उनकी मौजूदगी प्रसंग को अर्थवान बना देती थी।

दुर्भाग्य ही है कि हिंदी पट्टी की नई बिरादरी जो अभी-अभी मीडिया में प्रवेश ही कर रही है, उसे इन चीजों को देखना-सुनना, परखना-गुनना, सीखना-समझना चाहिए। आखिर जिस साक्षात्कार को लेकर लोग वितंडा खडा कर रहे हैं, क्या उसे समग्रता से, विषय को समूचेपन में उन्होंने देखा है। उन्होंने ब्राह्मण की, ब्राह्मणत्व की चर्चा जरूर की, पर कहीं भी उसे स्थापित करने के लिए तर्क नहीं गढ़े। आखिर सदियों का अभ्यास शारीरिक संरचना, व्यवहार, कौशल व उसके बाद संस्कार को कैसे अप्रभावित रहने देंगे।

यह ठीक है कि उन्होंने किसी के चुनाव प्रचार में सभा को संबोधित कर दिया। आखिर कोई तो बता दे कि इस दुनिया की किसी भी सभ्यता का नायक सभी मायने में आदर्श रहा। मेरा तो मानना है कि सभी नायक लात की पैदाइश थे। यदि उनकी सीमाएं लोगों को स्वीकार्य हैं तो प्रभाष जी तो वह मूर्ति नहीं बने। आखिर उनके दाय को देखते हुए, इन चीजों पर स्वस्थ चर्चा संभव नहीं थी। हमें जिनका कर्जदार होना चाहिए, हम उन्हें गरियाकर कालर ऊंची करके खुश हो लेते हैं।

यह सब मैं इसलिए नहीं लिख रहा कि मुझे उनकी कृपा प्राप्त है, या कृपा की अपेक्षा है। मैंने 14 सालों तक कस्बे में पत्रकारिता की है। और बड़े अखबारों में प्रभावी पदों पर रहने का मौका मिला। चीजों को विकृत होते हुए, विकृति के कारणों को खुली आंखों देखा। अखबार नहीं आंदोलन का नारा बुलंद करनेवाले अखबार में समन्वयक व फीचर प्रभारी का पद इसलिए छोड़ दिया कि प्रबंधन अपनी दिलचस्पी के अनुसार चीजों को चलाने की छूट पा गया था। आज खूब खूशी-खुशी मीडिया से विदा होकर सामाजिक कार्य के क्षेत्र में हूं।
mihirgoswami (mgmihirgoswami@gmail.com) bilaspur c.g
ये आठ पन्ने, ये बता किसे याद रखूं, किसे भूल जाउं.
PremRam Tripathi (prt9999@gmail.com) Satna, Bhopal M.P.
प्रभाष जी के लेख में ऐसी कोई भी बात नहीं दिखाई देती, जो वर्ग विभेद को बढ़ावा दे रही हो या एकपक्षीय हो...ये तो वैसी वाली बात हो गई है कि- "जाकी रही, भावना जैसी, प्रभू मूरत देखी तिन तैसी."
ASHOK TIWARI (ashokktiwari@yahoo.com) M.P.
Joshi says- सूर्य की पूजा हमारी पंरपरा में नहीं है. वो शक लोग लेकर आए. वो ईरान वाले लोग थे जो कि सूर्य पूजक थे. This is absolutely wrong. Thousands of rhymes in Vedas dedicated to SUN God. ancient sun temples are found in India. Many Upanishads are based on SUN God as highest Brahm. Will Joshi say Surya Puran was written by Iranians?
बलराम अग्रवाल (2611ableram@gmail.com) दिल्ली(भारत)
मुझे लगता है कि प्रभाष जी की कुछ बातों को उनके निहित अर्थों से भिन्न समझा और उछाला गया है। हाँ, धारणा सिर्फ ब्राह्मणों में ही होने वाली उनकी बात पर मैं यह अवश्य कहना चाहूँगा कि इस बाम्हनगर्दी ने परशुराम तक को अंधा बना दिया था। उन्हें 'रावण' में कोई आततायीपन नजर नहीं आया था और वे चुन-चुनकर अपने काल के क्षत्रियों को ही काटते रहे थे।
RAGHUVEER RICHHARIYA (raghuveerr@starnews.co.in) NOIDA
साथियों,
रविवार.कॉम में सती प्रथा, सिलकॉन वैली में ब्राह्मण श्रेष्ठता और तेंदुलकर चालीसा का बखान करने वाले प्रभाष जोशी जी के इंटरव्यू को पढ़कर हैरानी हो रही है। उससे ज्यादा परेशानी प्रभाष जी के शिष्यों की अतिवादी प्रतिक्रिया को लेकर। आलोक तोमर जिस तरह से प्रभाष जोशी का बचाव कर रहे हैं (या कहें बचाव के जाल में उन्हें फंसा रहे हैं), उससे हिंदी के इन स्वनामधन्य पत्रकारों के बुद्धि, विवेक पर तरस आता है।

सवाल नं.- 1 जब हम गीता, भागवत, रामचरित मानस, कुरान, बाइबिल में लिखे/छपे तथ्यों, उनके लेखकों पर बहस कर सकते हैं- तो प्रभाष जोशी के सती प्रथा और ब्राह्मणवाद को महिमामंडित करने वाले पोंगापंथी तथ्यों पर क्यों नहीं। ये तो उसी तरह है जैसे जिन्ना पर किताब लिखने वाले जसवंत को बिना पढ़े, सोचे समझे उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। क्या प्रभाष जोशी के लिखे, कहे पर बहस से बचने वाले ऐसा ही नहीं कर रहे हैं।

2- वरिष्ठ पत्रकार और प्रभाष जी के प्रबुद्ध शिष्य आलोक तोमर कह रहे हैं कि प्रभाष जी की मुखालिफत करने लोग वे हैं--जिन्हें जनसत्ता में नौकरी नहीं मिली या जिनके लेख जनसत्ता में नहीं लिखे। तो मेरे भाई आलोक जी, ये तो पता कर लीजिए रविवार.कॉम में जोशी जी का इंटरव्यू करने वाले आलोक प्रकाश पुतुल या जनतंत्र.कॉम चलाने वाले समरेंद्र सिंह ने कब प्रभाष जी से नौकरी मांगी। मेरी जानकारी में कभी नहीं..क्योंकि मैं इन दोनों लोगों को जानता हूं..आलोक ने छत्तीसगढ़ में रहकर देशबंधु औऱ बीबीसी के जरिए जो काम किया है-वो देश के किसी चर्चित पत्रकार के काम से कम नहीं है।

3- तीसरी बात-प्रभाष जी, अपने शिष्यों के बीच हिंदी पत्रकारिता के युगपुरुष कहे जाते हैं-उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ बिगुल बजाने वाले संपादक का खिताब हासिल है( जो शायद उन्हें नहीं बल्कि स्वर्गीय श्री रामनाथ गोयनका जी को मिलना चाहिए)-लेकिन सत्ता से करीबी गांठने में इन महानुभाव के चर्चे बहुत कम हुए हैं। बात चल ही पड़ी है तो मैं प्रभाष जी के साथ घटित अपना एक निजी अनुभव (जो शायद उन्हें याद न हो) बांटना चाहता हूं.। 1996 में हम भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से बीजेएमसी कर रहे थे-विवि के महानिदेशक श्री अऱविंद चतुर्वेदी के खिलाफ छात्रों का आंदोलन हुआ-मुद्दे कई थे (पत्रकारिता विवि की मनमाने ढंग से फ्रेंचाइजी बांटी जा रही थी, जिनमें पत्रकारिता कोर्स नहीं कंप्यूटर की डिग्री/डिप्लोमा बंटते थे, ऑडियो-वीडियो लैब के लिए आई भारी भरकम रकम कहां गई थी--ये चतुर्वेदी जी को छोड़कर किसी को मालूम नहीं था। वगैरह..वगैरह...). अरविंद चतुर्वेदी भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. श्री शंकरदयाल शर्मा के सगे साढ़ू थे-उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता था। प्रभाष जोशी जी और श्री अजीत भट्टाचार्जी विवि के सलाहकार मंडल में थे-छात्रों से समझौता कराने आए-और उन्होंने हमें ऐसा प्रस्ताव दिया कि हम आंदोलन बंद कर दें। बीजेएमसी के छात्रों ने हाथ जोड़ लिए। एक संपादक जो इमर्जेंसी के दौरान सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ दम भरता रहा हो...वो इमर्जेंसी के 21 साल बाद ही सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति ऐसे लोटने लगेगा-ऐसा हम लोगों ने सोचा भी नहीं था।
- उम्र और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करना हमें बचपन से सिखाया गया है। वो हम लोग करत रहेंगे-लेकिन प्रभाष जी के विचारों पर शुरू हुई बहस ऐसे कैसे थम सकती है।
सादर
रघुवीर रिछारिया
abhinaw upadhyay (abhinaw01@gmail.com) delhi
अच्छा लेख है. प्रभाष जी की शैली के अनुकूल.
jawed hasan ksa alahsa
Well Prabash ji very good. आपके विचार बहुत अच्छे हैं.
Mukesh MIshra (mmishrajaipur@yahoo.com) Jaipur
प्रभाष जी की बातों का विरोध करने वाले उनके द्वारा कही गई सच्ची बातों को नहीं पचा पा रहे हैं और खासकर ऐसे दौर में जबकि ब्राह्मणों का विरोध करने एक फैशन बन गया है. मेरा जोशीजी से निवेदन है कि सच्चाई पर मज़बूत रहें और विरोध की परवाह ना करें. We are all with you sir
rohit pandey (aboutrohit@gmail. com) gorakhpur
बोलने के लिए पूरा पढ़ लेते तो भ्रमित न होते.
Rajni (iilloovveeuu1975@yahoo.com) NPM, Near Doljo Beach, Panglao Island, Bohol, Philippines
प्रभाष जी के कहे को जिस तरह से पढ़ा जा रहा है, उसे देख कर मुझे आश्चर्य हो रहा है. हिंदी का प्रबुद्ध समाज इस तरह लाठी लेकर उन्हें दौड़ाने पर तुला हुआ है...समाजशास्त्र में इसे ही भीड़ का तंत्र कहते होंगे, जहां जिसे मौका मिला, अपना हाथ साफ करने लग गया. प्रभाष जोशी जी के मामले में भी अधिकांश जगहों में यही हो रहा है. लोग बिना पूरा साक्षात्कार पढ़े गाली-गलौज पर उतर आये हैं.

प्रभाष जी को एक तरफ गुऱु कह रहे हैं, दूसरी ओर उनकी कुटाई की बात हो रही है. आपको किसने कहा था गुरु बनाने के लिए ? प्रभाष जी ने आपको आवेदन दिया था? नहीं न. तो फिर इतना हंगामा क्यों ? मत मानिए, उनको अपना गुरु और बंद करें यह रोना-धोना.

प्रभाष जी के कहे पर आप बहस कर रहे हैं, वह तो ठीक है, जो उन्होंने नहीं कही है, उस पर क्यों बहस कर रहे हैं ? उनके मुंह में शब्द डाल कर क्यों कहलवाना चाह रहे हैं ? इतना भदेसपन मत फैलाइए.

मैंने अपनी टिप्पणी दो और साइटों को भेजी थी, जहां प्रभाष जी बर लगातार बहस हो रही है. लेकिन दोनों ही साइटों ने उसे प्रकाशित नहीं किया. इससे समझ में आता है कि उनके यहां अपनी सुविधानुसार प्रतिक्रियाओं को छापने की चतुराई चल रही है. मैं उम्मीद करती हूं कि आप कम से कम मेरा पत्र जरुर प्रकाशित करेंगे.
anurag meerut
सती प्रथा के बारे में प्रभाष जी का लेख पहले पढ़ चुका हूं. मतभेद हो सकते हैं लेकिन बहुत simplify करके ना देखा जाए.
Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) Noida
सुनंदा जी, लगता है, प्रभाष जी का खरापन लोग पचा नहीं पा रहे हैं और अपनी छद्दम नामों से अपने-अपने ब्लॉग में लेख लिख कर अपनी दुश्मनी निकाल रहे हैं. खुद ही लिख रहे हैं, खुद ही उस पर प्रतिक्रिया भी जमा रहे हैं.

पहली बात तो ये कि प्रभाष जोशी ने कहीं भी सती प्रथा का समर्थन नहीं किया है. अपनी आंखें साफ करके थोड़ा पढ़ लें कि प्रभाष जी ने साफ कहा है कि पति के साथ जल जाना हमारी सती प्रथा नहीं है. हमारी परम्परा में सत्य और निजत्व की बात उन्होंने की है. लेकिन कुछ कुतर्की लोग सती प्रथा वाले वाक्य को हवा में उड़ाए जा रहे हैं. अरे भैया, अपनी औकात बनाओ, फिर प्रभाष जी पर थूको.

दूसरा प्रभाष जोशी ने अपने क्रिकेटरों के बारे में जो कहा कि अजहर या पठान की कला उनकी परंपरा का हिस्सा है. उसको लेकर बात क्यों नहीं करते ? मोतियाबिंद के मरीज की तरह केवल ब्राह्मण वाला हिस्सा लेकर क्यों उड़ रहे हैं जनाब?

तीसरी बात कि प्रभाष जोशी ने पठान या कांबली को लेकर जो कहा है, वो उस सवाल के जवाब में कहा है, जिसमें आलोक जी ने पूछा था कि क्रिकेट सामंतों का खेल है. उन्होंने यह साबित करने के लिए इन लोगों के नाम लिए कि नहीं, ये खेल आम आदमी का खेल है.

इस इंटरव्यू को अपने-अपने तरीके से उठा कर उसको पढ़ने के बजाय समग्रता में पढ़ें. अगर आप में से किसी को प्रभाष जी ने जनसत्ता बाहर किया है ( जैसा कि उन्होंने एक ब्राह्मण राजीव शुक्ला और एक ठाकुर आलोक तोमर के साथ किया था) या फिर आप में से कइयों को नौकरी नहीं दी होगी, तो उसका स्कोर सैटल करने के लिए अपनी गंदगी मत फैलाइए.
Sunanda Singh रांची, झाऱखंड
मैंने कल प्रतिक्रिया लिखते हुए कहा था कि कुछ छुद्र लोग बात का बतंगड़ बना रहे हैं. आज मैंने देखा कि एकाध ब्लॉगों में मेरी प्रतिक्रिया पोस्ट की गई है और रविवार में दी गई कुछ दूसरे लोगों की प्रतिक्रिया भी इस तरह पोस्ट की गई है, जैसे ये उनके ब्लॉग में भेजी गई हो. हमारी प्रतिक्रियाओं को आधार बना कर उस ब्लॉग में लेख भी लिखा गया है.

मतलब ये कि विवाद में रस लेने के लिए जहां-जहां से जो-जो कुछ मिल रहा हो, उसे उठाओ और रसास्वादन करो.
Anindya delhi
इक्कीसवीं सदी में किसी आदमी का जाति व्यवस्था के समर्थन में इस तरह खड़ा होना वाकई हैरतनाक है। अगर किसी को इंदिरा गांधी और सचिन तेंदुलकर की सफलता का कारण उनका ब्राह्मण होना नजर आता है तो उसकी सोच पर तरस ही खाया जा सकता है।

यदि इस इंटरव्यू में व्यक्त विचारों को सही मान लें तो अब भी राजकाज का ठेका राजपूतों और ब्राह्मणों को ही उठना चाहिए क्योंकि कौशल और प्रतिभा का सम्मान करना तो किसी भी समाज का दायित्व है। बाकी तो सिर्फ ठठेरागीरी में माहिर हैं इसलिए उन्हें वही करते रहने देना चाहिए। ब्राह्मणवाद का इस खूबसूरती से बचाव करने के लिए आपको साधुवाद।
ajay patel () varanasi
ये प्रभाष जी की संस्कृति हो सकती है, जहां पति के मरने के बाद पत्नी को सती करवाया जाता होगा और पत्नी के मरने पर अनेक लोगों के साथ शादी करने की छूट थी. कितने पति आज तक सती हुए.
चार्वाक सत्य (charwaksatya11@hotmail.com) कोलकाता
आईटी में ब्राह्मण वर्चस्व के बारे में प्रभाष जोशी गलत बयानी कर रहे हैं । वो या तो तथ्यों से अनभिज्ञ है या बेईमानी कर रहे हैं। फॉर्च्यून- 1000 में शामिल सिलिकॉन वैली की आईटी कंपनियों में गूगल, एचपी, एडोबी, एएमडी, एपल, इ-बे, ओरैकल, इंटेल, याहू, सन माइक्रोसिस्टम्स, सिस्को, नेटएप, सैमेंटेक प्रमुख हैं। इन कंपनियों में किसी एक भी कंपनी में प्रेसिडेंट, चेयरमैन या वाइस चेयरमैन ब्राह्मण नहीं है। इन में से हर कंपनी की साइट पर जाकर चेक करने के बाद ये बात लिखी जा रही है। “सिलिकॉन वैली की हर आईटी कंपनी में प्रेसिडेंट, चेयरमैन या वाइस चेयरमैन ब्राह्मण है”, जैसी बात जोशी जी ने किस आधार पर कह दी, ये आश्चर्यजनक है। ये असावधानी है या अपनी बात को साबित करने की जल्दबाजी। और प्रभाष जी, आईटी कंपनी में सेक्रेटरी कौन सा पद होता।
भारत की दस सबसे बड़ी आईटी कंपनियों में सिर्फ इंफोसिस के मालिक ब्राह्मण हैं। बाकी टीसीएस, विप्रो, टेक महिंद्रा, एचसीएल, पुराने सत्यम, पटनी सभी के मालिक कोई नाडार, कोई टाटा, कोई प्रेमजी, कोई राजू टाइप अब्राह्मण हैं। प्रतिभा किसी जात विशेष की बपौती नहीं है।
ravi (ravivikram53@rediffmail.com) patna
आखिर सच सामने आ ही गया. प्रभाष जी भी अंततः ब्राह्णणवादी ही निकले.वैसे भी जनसत्ता के उनके दिनों में उनके संपादकीय स्टाफ में 80 फीसदी ब्राह्मण ही थे. आज सचिन या कांबली की बात नहीं है, प्रभाष जी भी पत्रकारिता में ब्राह्मणवादी मेधा को ही सबसे काबिल मानते होंगे. मंडल पर प्रभाष जी की राय ब्राह्णणवादी ही होगी.
Arvind Mishra (drarvind3@gmail.com) Varanasi
सभ्य व्यक्ति अब इस व्यवस्था का पोषण नहीं करेगा ! और अगर सिलिकान वैली में ब्राह्मण इंजीनियरों की संख्या एक तथ्य है तो इसमें नाक भौ सिकोड़ने की क्या बात है! प्रभाष जोशी या किसी को अपनी बात कहने का हक है -क्या उन्होंने भारत का कोई कानून तोडा है ?
Ashutosh Noida, UP
सुनंदा जी, आपकी राय बिल्कुल सही है. दिल्ली में कथित प्रगतिशीलों का एक गिरोह है, जिसमें बलात्कारी, छेड़खानी करने वाले और चोरी करने वाले लोग भी शामिल हैं. ये लोग इसी तरह कौव्वा कान ले गया की तर्ज पर आधी-अधूरी चीजों को पेश करके हंगामा खड़ा करते रहते हैं और फिर दारू पी कर उसका जश्न मनाते हैं. उदय प्रकाश पर, चरणदास चोर पर, फिर आलोक मेहता पर अब प्रभाष जोशी पर ये गिरोह पड़ा हुआ है. इनमें हिम्मत है तो प्रभाश जोशी की बातों का सिलसिलेवार जवाब क्यों नहीं देते ?
Sunanda Singh रांची, झारखंड
आज सुबह से कई ब्लागों पर प्रभाष जी का यह इंटरव्यू टुकड़े-टुकड़े में पढने को मिला और मैं सोचती रह गई कि क्या सच में प्रभाष जोशी ने ऐसा कुछ कहा है.

अभी जब रविवार पर पूरा इंटरव्यू पढ़ गई हूं तो सोच रही हूं कि कुछ लोग अपने छुद्र स्वार्थ के लिए और अपने ब्लाग की हिट्स बढ़ाने के लिए संदर्भों से काट कर बकवास कर रहे हैं. यह बेशर्मी है, पत्रकारिता के नाम पर नीचता है. जो कुछ प्रभाष जोशी ने कहा है, उस पर तो बात करो. केवल उन्हें गरियाने के लिए.....शर्म आनी चाहिए.
satyanarayan patel () indore
अपने मालवा में ऐसी कोई प्रथा नहीं है जिसमें औरत को पति के मरने के बाद जला दी जाए या वह खुद चिता में कूद पड़े. राजस्थान तरफ जरूर ऐसा होता रहा है.

मैं उसी गाँव से हूं जिसके बगल वाले गाँव में प्रभाष जी मास्टरी किया करते थे. हमारे इधर इस प्रथा से लोग वाकिफ हैं पर कोई सती नहीं होती, न किसी को विवश किया जाता है. सत शब्द का उपयोग जरूर किया जाता है लेकिन उसकी पत्नी का चिता में जल कर सती होने से कोई लेना देना नहीं है.
Manish Verma Noida
* Sati Pratha is not an Indian tradition. There is no mention or example of Sati in any old Indian scriptures.

* Women in India often committed suicide to protect their honour from invaders. This custom was called Johar. They built big cauldron like pots, lit then with fire and jumped into them, to die voluntarily in order to save their honour and chastity. There was no forced immolation in that process.

* Sati is an ancient Sanskrit term, meaning a chaste woman who thinks of no other man than her own husband. The famous examples are Sati Anusuiya, Savitri, Ahilya etc. None of them committed suicide, let alone being forcible burned. So how is that that they are called Sati? The word ‘Sati’ means a chaste woman, and it has no co-relations with either suicide or murder.

* The phrase, ‘Sati Pratha’ was a Christian Missionary invention. Sati was taken form the above quoted source and ‘Pratha’ was taken from the practice of Johar’, (by distorting its meaning from ‘suicide’ to ‘murder’) and the myth of ‘Sati Pratha’ was born to malign Indian culture.

* When Raja Dashrath dies in Ramayana, none of his queens perform Sati act.

* In Mahabharata, many warriors died in the war, but there is no mention of Sati anywhere.
Suresh C Mathur कोंकर, रांची, झाऱखंड
यह इतिहास की अपनी तरह से की गई व्याख्या लगती है. सती का मतलब सत्य से जरुर रहा होगा, लेकिन जो प्रथा थी, उसमें विधवा को जबरन जला देना ही था.

आप याद करें राजाराम मोहनराय को. उन्होंने अपनी भाभी को इसी तरह सती किए जाने के बाद ही सती प्रथा का विरोध शुरु किया था और लगातार विरोध के कारण 1829 में अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगाया था. इस प्रथा को देखने का तरीका विदेशी या यूरोप का नहीं था. इस परंपरा को शुद्ध रुप से देसी तरीके से ही देखा गया था और राजाराम मोहनराय कोई विदेशी नहीं थे.
Vicky G Bhopal
"...जिस देश की नागरिकता भी छोड़ दी. उस देश के मूल के आप हैं, इसलिए अपनी टीम को आप चियर करते है. अब अगर एक मुसलमान पाकिस्तान की टीम को चियर करता है तो आप को आपत्ति क्यों होनी चाहिए ?...."

यह कैसा तर्क है जोशी जी? ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के लोग भारतीय टीम का सपोर्ट करते है क्योंकि उनका मूल यानी जड़ भारत से जुडा है. इसलिये उनकी भावनाएं भारत से जुडी हैं. आप बताइए कि किस भारतीय मुसलमान की मूल भूमि पाकिस्तान है? भारतीय मुसलमान तो हमेशा से भारत मे रहे, यही पैदा हुए, यही रहना है. फ़िर पाकिस्तान के सपोर्ट की बात आपको सही क्यों लगती है?
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प्रभाष जोशी




प्रस्तुति-- स्वामी शरण

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जन्म १५ जुलाई, १९३६
इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत
मृत्यु ५ नवंबर, २००९
पेशा पत्रकार
धर्म हिन्दू
प्रभाष जोशी (जन्म १५ जुलाई १९३६- निधन ५ नवंबर २००९) हिन्दी पत्रकारिता के आधार स्तंभों में से एक थे। वे राजनीति तथा क्रिकेट पत्रकारिता के विशेषज्ञ भी माने जाते थे। दिल का दौरा पड़ने के कारण गुरुवार, ५ नवंबर, २००९ मध्यरात्रि के आसपास गाजियाबाद की वसुंधरा कॉलोनी स्थित उनके निवास पर उनकी मृत्यु हो गई।

व्यक्तिगत जीवन

प्रभाष जोशी का जन्म भारतीय राज्य मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के निकट स्थित बड़वाहा में हुआ था। उनके परिवार में उनकी पत्नी उषा, माँ लीलाबाई, दो बेटे संदीप और सोपान तथा एक बेटी पुत्री सोनल है। उनके पुत्र सोपान जोशी, डाउन टू अर्थ नामक पर्यावरण विषयक अंग्रेजी पत्रिका के प्रबन्ध सम्पादक हैं।[1] प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था[2]

कार्य जीवन

इंदौर से निकलने वाले हिन्दी दैनिक नई दुनिया से अपनी पत्रकारिता शुरू करने वाले प्रभाष जोशी, राजेन्द्र माथुर और शरद जोशी के समकक्ष थे। देशज संस्कारों और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित प्रभाष जोशी सर्वोदय और गांधीवादी विचारधारा में रचे बसे थे। जब १९७२ में जयप्रकाश नारायण ने मुंगावली की खुली जेल में माधो सिंह जैसे दुर्दान्त दस्युओं का आत्मसमर्पण कराया तब प्रभाष जोशी भी इस अभियान से जुड़े सेनानियों में से एक थे। बाद में दिल्ली आने पर उन्होंने १९७४-१९७५ में एक्सप्रेस समूह के हिन्दी साप्ताहिक प्रजानीति का संपादन किया।[3] आपातकाल में साप्ताहिक के बंद होने के बाद इसी समूह की पत्रिका आसपास उन्होंने निकाली। बाद में वे इंडियन एक्सप्रेस के अहमदाबाद, चंडीगढ़ और दिल्ली में स्थानीय संपादक रहे। प्रभाष जोशी और जनसत्ता एक दूसरे के पर्याय रहे। वर्ष १९८३ में एक्सप्रेस समूह के इस हिन्दी दैनिक की शुरुआत करने वाले प्रभाष जोशी ने हिन्दी पत्रकारिता को नई दशा और दिशा दी। उन्होंने सरोकारों के साथ ही शब्दों को भी आम जन की संवेदनाओं और सूचनाओं का संवाद बनाया। प्रभाष जी के लेखन में विविधता और भाषा में लालित्य का अद्भुत समागम रहा। उनकी कलम सत्ता को सलाम करने की जगह सरोकार बताती रही और जनाकांक्षाओं पर चोट करने वालों को निशाना बनाती रही। उन्होंने संपादकीय श्रेष्ठता पर प्रबंधकीय वर्चस्व कभी नहीं होने दिया। १९९५ में जनसत्ता के प्रधान संपादक पद से निवृत्त होने के बाद वे कुछ वर्ष पूर्व तक प्रधान सलाहकार संपादक के पद पर बने रहे। उनका साप्ताहिक स्तंभ कागद कारे उनके रचना संसार और शब्द संस्कार की मिसाल है। प्रभाष जोशी ने जनसत्ता को आम आदमी का अखबार बनाया। उन्होंने उस भाषा में लिखना-लिखवाना शुरू किया जो आम आदमी बोलता है। देखते ही देखते जनसत्ता आम आदमी की भाषा में बोलनेवाला अखबार हो गया। इससे न केवल भाषा समृद्ध हुई बल्कि बोलियों का भाषा के साथ एक सेतु निर्मित हुआ जिससे नये तरह के मुहावरे और अर्थ समाज में प्रचलित हुए।
अब तक उनकी प्रमुख पुस्तकें जो राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं वे हैं- हिन्दू होने का धर्म, मसि कागद और कागद कारे। उन्हें हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में योगदान के लिए साल २००७-०८ का शलाका सम्मान भी प्रदान किया गया था।[4]
जोशी जी अनुकरणीय क्यों है और उन्हें पत्रकार क्यों माना जाए ? इन दो सवालों के जबाव उनके जीवनकर्म में समाहित हैं .प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे [2] अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था

देहांत

अपनी धारदार लेखनी और बेबाक टिप्पणियों के लिए मशहूर प्रभाष जोशी अपने क्रिकेट प्रेम के लिए भी चर्चित थे। गुरुवार, 5 नवंबर, 2009 को टीवी पर प्रसारित हो रहे क्रिकेट मैच के रोमांचक क्षणों में तेंडुलकर के आउट होने के बाद उन्होंने कहा कि उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं है। इसके कुछ समय बाद उनकी तबियत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। रात करीब 11:30 बजे जोशी को नरेंद्र मोहन अस्पताल ले जाया गया , जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।[5] उनकी पार्थिव देह को विमान से शुक्रवार दोपहर बाद उनके गृह नगर इंदौर ले जाया जाएगा जहां उनकी इच्छा के अनुसार, नर्मदा के किनारे अंतिम संस्कार होगा।[6] सुबह जैसे ही उनके दोस्तों, प्रशंसकों और उनका अनुसरण करने वाले लोगों को उनकी मृत्यु की जानकारी मिली तो सभी स्तब्ध रह गए। समूचा पत्रकारिता जगत उनके इस तरह से दुनिया छोड़कर चले जाने से शोक संतप्त है। हर पत्रकार उन्हें अपने अपने अंदाज में श्रद्धांजलि दे रहा है।[7] प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे [2] अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था

संदर्भ

  1. http://www.ptinews.com/news/364179_Noted-journalist-Prabhash-Joshi-dies
  2. http://www.janokti.com/?p=1091
  3. http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5201659.cms
  4. http://visfot.com/index.php/permalink/32.html
  5. http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2009/11/091105_prabhash_dies_pp.shtml
  6. http://www.livehindustan.com/news/desh/national/39-39-79665.html
  7. http://khabar.ndtv.com/2009/11/06153548/Prabhash-Joshi-tribute.html
10 http://www.tehelkahindi.com/index.php?news=430

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विकल्प तलाशता हाशिए का मीडिया





प्रस्तुति - निम्मी नर्गिस / शीरिन शेख

"भूमण्डलीकरण की शब्दावली में यह दौर क्वालिटी और सर्विस का है। दुनिया भर में विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों में इस नाम का ढ़ोल बज रहा है। इस नाम पर बाजारवाद पिछले दो दशकों से हमारे देश में क्वालिटी और सर्विस के नाम पर लोगों को ठगता आ रहा है। हाशिए की मीडिया को विकल्पहीनता की ओर ले जाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जितना बड़ा निवेश, उतनी बड़ी खबर। दुर्भाग्य है कि इस पूंजी प्रायोजित मीडिया की दुनिया में मानवीय संवेदनाओं को तार-तार होते हुए हम नहीं देख पा रहे हैं।..."
मीडिया हमेशा से संचार और संवाद का प्रभावी माध्यम रहा है। कागज के अविष्कार से पहले पत्थर के शिलालेख, ताड़ के पत्ते और ताम्रपत्र मीडिया के प्रचलित माध्यम रहे हैं। समय, समाज और सत्ता परिवर्तन तथा विकास के स्थापित होते नए पड़ावों पर कागज और प्रिन्टिंग प्रेस के अविष्कार ने मीडिया को नयी पहचान दी। मीडिया का रंग-रूप और चरित्र लगातार बदलता रहा। राजाज्ञाओं और फरमानों के संचार वाली मीडिया का जन रूप भी सामने आया। मीडिया के विस्तार में ऐसा समय भी आया जब पूरा विश्व संचार क्रान्ति से रूबरू हुआ। एक बटन दबाया नहीं कि असंख्य पन्ने और संदेश दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाते हैं। लेकिन मीडिया के विस्तार यात्रा में कुछ बातें ऐसी हैं जो पीछे छूटती गई हैं। जैसे, जिस प्रिन्ट मीडिया का महत्व कम होना, जिसकी बदौलत समकालीन मीडिया के दूसरे रूपों का विकास हुआ, प्रस्तुति के स्तर पर जन विरोधी विषयों और विधियों का प्रयोग करना आदि। भूमण्डलीकरण के प्रत्यक्ष और परोक्ष हस्तक्षेप से पिछले दो दशकों में मीडिया का चरित्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है। चन्द बड़े घरानों को छोड़ दिया जाए तो मीडिया का बड़ा हिस्सा हाशिए पर पहुंच चुका है।
मौजूदा दौर में मीडिया खासकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यों न एक क्लिक में चैनल बदल जाते हैं, एक क्लिक में संदेश सात समुंदर पार पहुच जाते हैं। इसी को ग्लोबल वल्र्ड भी कहा जा रहा है। जहां सबकुछ एक कमरे बैठकर संचालित किया जाता है। काबिले गौर है कि आम तौर पर मीडिया से अभिप्राय समाचार पत्र और समाचार चैनलों से लगाया जाता है। जबकि मीडिया अपने विस्तृत अर्थों में वह सब है जिसके माध्यम से लिखित, मौखिक या दृश्य रूप में संवाद और संचार होता है। चिट्ठी-पत्री और रेडियो बीते जमाने की बातें लगती हैं, जिसका स्थान एस.एम.एस. और एम.एम.रेडियो ने लिया है। अखबार और पत्र-पत्रिकाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन इसके सापेक्ष बाजार की चुनौतियां भी बढ़ी हैं। बाजार के रवैये ने जन मानस में संवादहीनता और संवेदनहीनता को बढ़ाया है। यही कारण है कि आज कानटेन्ट से अधिक सर्कुलेशन पर ध्यान दिया जा रहा है। क्या छापें, कैसे छापें कि सर्कुलेशन बढ़ जाए। बाजारवाद ने प्रिन्ट मीडिया को इस दिशा में बहुत आगे पहुंचा दिया है। कल तक मीडिया के जो समूह औसत क्षमता रखते थे और जिन्होंने भूमण्डलीकरण के मंत्र को वेद और कुरान मानकर निवेशवादियों से दोस्ती कर ली। आज वही समूह बड़े मीडिया घरानों में शुमार किए जाते हैं। जिन्होंने बाजारवाद के साथ दोस्ती से इंकार कर दिया वो मीडिया समूह कमजोर पड़ गए और हाशिए की मीडिया बन कर रह गए। इनके अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के पास न तो चमक-दमक है और न ही सर्कुलेशन बढ़ाने का कोई नुस्खा। ऐसा संभव भी नहीं है कि अमृत बाजार के इतिहास को दोहराया जाए। क्योंकि अंग्रेजों की आर्थिक गुलामी और अमेरिकी चैधराहट निदेशित ॅज्व्ए प्डथ् और ॅठ की आर्थिक गुलामी में बड़ा फर्क है। इन संस्थाओं की छत्रछाया में मीडिया की जो विकास गाथा लिखी जा रही है उसमें खबर लाने-बनाने की कला बदल चुकी, रिपोर्टिंग और आलेख के आवरण नए अर्थ तलाश रहे हैं। एक पूरी की पूरी संस्कृति ने जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह मीडिया को भी अपने पूंजीवादी आवरण से घेर रखा है। इस आवरण के बाहर की खबरों का कोई मोल नहीं रह गया है, ऐसा तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया के काम-काज से प्रतीत होता है। पूंजीवादी मीडिया जब जैसी खबर लिख या सुना दे, उसकी प्रमाणिकता पर कोई प्रश्न नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि मीडिया के छोटे-छोटे समूह, जो दरअसल मीडिया कर्मी और पाठक वर्ग दोनों ही स्तरों पर संख्या में अधिक हैं, की पहचान ‘‘हाशिए की मीडिया’’ तक सीमित है।
इन्हें मैं हाशिए की मीडिया कहना इसलिए बेहतर समझता हूं क्योंकि मेरी इस छोटी सी समझ में वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा भी निहित है। संख्या बल की दृष्टि से हाशिए की मीडिया चन्द निवेशवादी पूंजीपति घरानों की मीडिया से अधिक मजबूत है। पाठक वर्ग अधिकतर वही हैं जिनका ताल्लुक समाज के निचले और पिछड़े तबके से है। सवाल यह भी है कि मीडिया पर एकछत्र राज करने वाले चन्द लोग शेष जनता की बातें न लिखकर भी उसी जनसमूह में बड़ा कद और पहचान कैसे रखते है? कहीं सामाजिक न्याय का तो कहीं महिला अधिकारों का और कहीं दोहरी नागरिकता और पहचान की समस्याओं से जूझने वाले मीडिया समूह विकल्पहीन क्यों हैं? अब तो शिक्षा, साक्षरता और जागरूकता भी पहले से बढ़ चुकी है।
ऐसा प्रतीत होता है कि तमाम छोटी-बड़ी उपलब्धियों के बाद भी सामंती, ब्राम्हणवादी और पूंजीवादी बंधनों की जकड़ ढ़ीली नहीं हो सकी हैं। शायद इसी वजह से हाशिए की मीडिया संपादक, संवाददाता, लेखक और पाठक किसी भी रूप में अपनी पहचान नहीं बना पा रही है।
भूमण्डलीकरण की शब्दावली में यह दौर क्वालिटी और सर्विस का है। दुनिया भर में विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों में इस नाम का ढ़ोल बज रहा है। इस नाम पर बाजारवाद पिछले दो दशकों से हमारे देश में क्वालिटी और सर्विस के नाम पर लोगों को ठगता आ रहा है। हाशिए की मीडिया को विकल्पहीनता की ओर ले जाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जितना बड़ा निवेश, उतनी बड़ी खबर। दुर्भाग्य है कि इस पूंजी प्रायोजित मीडिया की दुनिया में मानवीय संवेदनाओं को तार-तार होते हुए हम नहीं देख पा रहे हैं।
पिछले दिनों अन्ना आन्दोलन के विस्तार में हिन्दुस्तान के तमाम गांवों को भी शामिल हुआ बताया गया लेकिन पिछले एक महीने में यू.पी. के कम से कम 15 गांव के भ्रमण के दौरान एक व्यक्ति नहीं मिला जो अन्ना को जानता हो। कहने का मतलब यह कि पूंजी आधारित मीडिया का विस्तार और सीमाएं उतनी ही हैं जहां तक सैटेलाइट और बिजली की पहुंच है। जबकि हाशिए की मीडिया के सामने सारा आकाश खुला पड़ा है।
समय आ चुका है कि हाशिए की मीडिया विकल्पहीनता के भंवर से खुद को बाहर निकाले। इससे न सिर्फ हाशिए की मीडिया की अपनी पहचान बनेगी बल्कि निवेश आधारित पूंजीपरस्त मीडिया के वास्तविक चरित्र को भी समझा जा सकेगा। हाशिए की मीडिया को बताना होगा कि ‘‘हम जिन चुनौतियों का सामना करके दुर्गम क्षेत्रों से समाचार लाते हैं या पहुंचाते हैं, अब किसी पूंजीवादी मीडिया घराने के लिए नहीं करेंगे।’’ रही बात क्वालिटी और सर्विस की तो इस तथ्य से कबतक लुका-छिपी का खेल खेला जाता रहेगा कि तथाकथित मुख्य धारा के किसी भी मीडिया घराने की क्वालिटी और सर्विस हाशिए के मीडिया कर्मी के कन्धों पर ही टिकी है। जो कन्धा शोषक मीडिया समूहों के भार को वहन करके सर्विस और गुणवत्ता बनाए रख सकता है, वह कन्धा अपने समाज और देश के लिए क्या वैकल्पिक मीडिया के भार को नहीं उठा सकता? ये बातें परिसंकल्पनात्मक लग सकती हैं लेकिन वास्तविकता के धरातल पर देखा जाए तो बहुत ही व्यावहारिक हैं। यदि हाशिए की मीडिया के लोग वैकल्पिक मीडिया को खड़ा करने में सफल हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर मीडिया जगत को एकाधिकारवादी, अधिनायकवादी चरित्र के कुप्रभावों से बचाया जा सकता है। ऐसी पहल जरूरी है क्योंकि मनोरंजन और समाचार के नाम पर कुछ भी किसी भी रूप में छापने, प्रकाशित और प्रसारित करने के चोर रास्तों को बन्द होना ही चाहिए।

वसीम अख्तर

मीडिया का घिनौना चरित्र






डा0 रमा शंकर शुक्ल

किसी ज़माने में रहीम ने एक दोहा लिखा था, जो बार-बार मेरे जेहन में कौध उठता है-
ते रहीम अब बिरिछ कंह जिनकर छांह गंभीर
बागन बिच-बिच देखियत सेहुंड कांस करीर।
पत्रकारिता के जो मानदंड हमारे पुरखों ने अपना सम्पूर्ण जीवन दांव पर लगाकर खड़ा किया था, जेल तक जाने से नहीं हिचके थे, उस परंपरा के लोग अब क्यों नहीं मिलते? इस प्रश्न का उत्तर शायद ही कोई मीडिया समूह देना चाहे। मुझे अरविन्द केजरीवाल की बात सही समझ में आती है कि मीडिया ने उनसे दूरी बना राखी है। क्योंकि उन्हें कबरेज देने से मीडिया का व्यवसाय प्रभावित होता है। शायद उनका आकलन कम है, हम इससे भी ज्यादा महसूस कर रहे हैं। समकालीन मीडिया खासकर हिंदी माध्यम के अखबार महज आंचलिक पम्पलेट मात्र बनकर रह गए हैं। वे एक तरह से पेड़ न्यूज या फिर विग्यप्तिजिवी खबरे छापने तक खुद को सिमित रखना चाहते हैं। सत्ता पक्ष की पार्टी की छोटी छोटी खबरों को तस्वीरों के साथ पांच-पांच कालम में प्रकाशित करना और अन्य दलों खी खबरों को एक-दो कालम में प्रकाशित करना तो सामान्य बात है, लेकिन ख़ास बात है कि संवेदनशील मामलों को दो-चार पंक्तियों में निबटा देना चकित कर दे रहा है। यह दशा तब है, जब हिंदी अखबार एक जिले के पूरे परिक्षेत्र तक भी नहीं पढ़े जा रहे। आंचलिकता की दशा तो यह है कि अपने जिले की खबर आप पडोसी जिले में भी पढना चाहें तो आपको दूर-दूर तक दर्शन नहीं होंगे।
आप कोई भी हिंदी अखबार उठा लीजिये, कहीं भी आपको कोई खोजी खबर नहीं मिलेगी। कारण? 1- उनके पास खोजने की कूवत और हिम्मत ही नहीं है। 2- खोज भी लिए तो उस बड़े सच को प्रकाशित करने की तो कतई हिम्मत नहीं है। 3- यदि किसी ने कोई बड़ा पर्दाफास किया तो उसे प्रकाशित करने में जैसे मौत ही हो जाती है। मै यह बात हवा-हवाई नहीं कर रहा हूँ बल्कि पूरे 15 साल अखबार में उप समादक रहने के बाद प्राप्त अनुभवों के आधार पर कर रहा हूँ। एक जो सबसे अहम् बात है कि पूंजीपति और भ्रष्टाचारी से मीडिया के 90 फ़ीसदी सिपहसालारों की बड़ी गहरी यारी होती है। सम्बंधित व्यक्ति के भ्रष्टाचार पर बात शुरू करते ही ऐसे मीडियाकर्मी इतने परेशान हो जाते हैं कि कांफ्रेंस करने वालों को इधर-उधर के सवालों में बेतरह घुमाना शुरू कर देंगे।
घटना01- उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में लालगंज ब्लाक का एक गाँव है अतरैला राजा। यहाँ के प्रधान डा0 दया शंकर तिवारी पहली बार 2005 में ग्राम प्रधान बने। उन्हें क्षेत्र में एक बेहद शातिर व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। समाज में जितने प्रकार के पद हो सकते हैं, वे उसके स्वयंभू नेता हैं। 2005 के पहले लखपति थे। लेकिन उसके बाद आठ शाल में करोडपति हो गए। आम आदमी पार्टी के एक सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआइ एक्टिविस्ट ने पूरे छह माह मेहनत कर जो साक्ष्य निकाले वे हैरान करने वाले थे। उन्होंने हम लोगों से संपर्क किया। हमने पूरी सावधानी बरतते हुए प्रकरण को अपने साथी और इलाहबाद उच्च न्यायलय के वरिष्ठ अधिवक्ता डा0 अरविदं त्रिपाठी को पूरा प्रकरण सौंप दिया। डा0 त्रिपाठी ने अध्ययन के बाद 24 मार्च 2013 को इसकी जानकारी को देने का कार्यक्रम तय किया। प्रेस कांफ्रेंस में 10 न्यूज चैनल और 05 हिंदी अखबारों के पत्रकार आये। साक्ष्य करीब 70 पन्ने के थे। कुल सो सभी की 15 फ़ाइल बनाने में ही साथियों की कमर टेढ़ी हो गयी। हजारों रुपये खर्च हो गए।
मीडिया को जो जानकारी दी गयी वह संक्षेप में यहाँ प्रस्तुत है :
ग्राम अतारैला राजा, ब्लाक लालगंज, मिर्ज़ापुर के ग्राम प्रधान डा0 दया शंकर तिवारी धसडा राजा, परसिया, गोकुल गाँवों में तब नवम्बर 2006 में गहरीकरण का काम मनारेगा के तहत कराया, जब इन तीनों तालाबों में पानी भरा था। ख़ास बात यह कि गहरीकरण की अनुमति और धन 18-01-2007 को मिली। इसमें भी 56 ऐसे जाब कार्ड धारक रहे, जो इनके ख़ास थे और एक साथ तीनों स्थानों पर काम कर रहे थे। प्रधान जी ने मस्टर रोल बनाकर भारी भुगतान भी कर दिया। ये कार्ड धारक होली के त्यौहार पर भी काम करते दिखाए गए हैं। इन जाब कार्ड धारकों में प्रधान जी के भाई कमला शंकर तिवारी और भतीजा भी शामिल रहे। प्रधान जी ने दूसरी बार 2009-10 में प्रधान बन्ने के बाद 67 इंदिरा, महामाया आवास अपने भाई-बंधुओं और रिश्तेदारों को आवंटित कर दिया। हुई तो जिलाधिकारी संयुक्ता समद्दार ने जिला पंचायत राज अधिकारी को कार्यवाही करने को आदेश दिया। प्रधान जी आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट चले गए। वहां से इनकी याचिका निरस्त हो गयी और प्रधान जी को रिमूवल का आदेश पारित कर दिया। फिर भी जिला पंचायत राज अधिकारी ने प्रधान जी को नहीं हटाया। प्रधान जी ने गाँव की बस्ती के बीच स्थित एक तालाब को मनरेगा के धन से पटवा कर अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा कब्जा करवा दिया। साथ ही इस भूमि पर पक्का मकान भी बनवा दिया। शिकायत पर एसडीम ने तहसीलदार को जांच करने को कहा। आरोप सही मिला। कार्रवाई की बारी आई तो प्रधान जी फिर कोर्ट चले गए। कोर्ट ने 25 हजार की पेनालिटी के साथ प्रधान जी की याचिका निरस्त कर दी। आदेश दिया की इन्हें रिमूव कर दिया जाए। इसके अलावा 10 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से हर साल हुए नुक्सान की वसूली भी की जाए। आदेश के दो माह बीत गए, पर जिला प्रशासन ने कोई कार्रवाई न की। इसके अलावा भी अनेक घपले के मामले हैं। अहम् बात यह है की प्रधान जी के पास पहली बार प्रधान बनने के बाद से लेकर आज तक 01 करोड़ 10 लाख की अतिरिक्त आय अर्जित की गयी। जबकि इनके परिवार में कृषि के अलावा अन्य कोई व्यवसाय नहीं है।
लेकिन इस खबर का प्रसारण हैरतनाक रहा। दूसरी सुबह जब हमारे सामने अखबार आये तो अमर उजाला ने तीन कालम में सरसरी तौर पर आरोप दिखाते हुए प्रधान का वर्जन भी प्रकाशित कर दिया, जिसमे उसने कहा था कि यह उसके पूर्व प्रधान का मामला है। अमर उजाला ने यह नहीं लिखा कि पूर्व प्रधान भी तो वही है। दैनिक जागरण के पत्रकार ने तो कांफ्रेंस में ही प्रधान के पक्ष में चिल्लाना शुरू कर दिया। हिन्दुस्तान अखबार के पत्रकार ने भी आपत्ति जताई थी कि पूरे जिले का मामला क्यों नहीं उठा रहे आप। फिर दोनों अखबारों ने इसे समाचार संक्षेप के कालम में दस पंक्तियों में निबटा दिया। अब यह पाठकगण तय करें कि एक करोड़ 10 लाख का गबन यदि एक ग्राम प्रधान ने किया तो इसका प्रसारण किस रूप में होना चाहिए। हमारा मानना है कि जब एक ग्राम पंचायत में मात्र 08 साल में इतना बड़ा घोटाला हो सकता है और मनरेगा से आय का स्रोत इतना बड़ा हो सकता है तो पूरे देश के गाँवों के विकास में आने वाले पैसे का क्या हस्र होता होगा। सौ-दो सौ की चोरी की खबरों को चार कालम देने, प्रेमी-प्रेमिका फुर्र को बाक्स में सजा कर देने वाले अखबार 01 करोड़ 10 लाख के घोटाले को हलके में दस पंक्तियों में निबटा रहे हैं तो समझा जा सकता है इसके पीछे का सच।
वे पत्रकार हैं लूट की नदी तलाश रहे हैं
पानी गरम हुआ तो डूब कर नहा लेंगे।
लेखक आम आदमी पार्टी से जुड़े है।
मीडिया का घिनौना चरित्र
डा0 रमा शंकर शुक्ल
किसी ज़माने में रहीम ने एक दोहा लिखा था, जो बार-बार मेरे जेहन में कौध उठता है-
ते रहीम अब बिरिछ कंह जिनकर छांह गंभीर
बागन बिच-बिच देखियत सेहुंड कांस करीर।
पत्रकारिता के जो मानदंड हमारे पुरखों ने अपना सम्पूर्ण जीवन दांव पर लगाकर खड़ा किया था, जेल तक जाने से नहीं हिचके थे, उस परंपरा के लोग अब क्यों नहीं मिलते? इस प्रश्न का उत्तर शायद ही कोई मीडिया समूह देना चाहे। मुझे अरविन्द केजरीवाल की बात सही समझ में आती है कि मीडिया ने उनसे दूरी बना राखी है। क्योंकि उन्हें कबरेज देने से मीडिया का व्यवसाय प्रभावित होता है। शायद उनका आकलन कम है, हम इससे भी ज्यादा महसूस कर रहे हैं। समकालीन मीडिया खासकर हिंदी माध्यम के अखबार महज आंचलिक पम्पलेट मात्र बनकर रह गए हैं। वे एक तरह से पेड़ न्यूज या फिर विग्यप्तिजिवी खबरे छापने तक खुद को सिमित रखना चाहते हैं। सत्ता पक्ष की पार्टी की छोटी छोटी खबरों को तस्वीरों के साथ पांच-पांच कालम में प्रकाशित करना और अन्य दलों खी खबरों को एक-दो कालम में प्रकाशित करना तो सामान्य बात है, लेकिन ख़ास बात है कि संवेदनशील मामलों को दो-चार पंक्तियों में निबटा देना चकित कर दे रहा है। यह दशा तब है, जब हिंदी अखबार एक जिले के पूरे परिक्षेत्र तक भी नहीं पढ़े जा रहे। आंचलिकता की दशा तो यह है कि अपने जिले की खबर आप पडोसी जिले में भी पढना चाहें तो आपको दूर-दूर तक दर्शन नहीं होंगे।
आप कोई भी हिंदी अखबार उठा लीजिये, कहीं भी आपको कोई खोजी खबर नहीं मिलेगी। कारण? 1- उनके पास खोजने की कूवत और हिम्मत ही नहीं है। 2- खोज भी लिए तो उस बड़े सच को प्रकाशित करने की तो कतई हिम्मत नहीं है। 3- यदि किसी ने कोई बड़ा पर्दाफास किया तो उसे प्रकाशित करने में जैसे मौत ही हो जाती है। मै यह बात हवा-हवाई नहीं कर रहा हूँ बल्कि पूरे 15 साल अखबार में उप समादक रहने के बाद प्राप्त अनुभवों के आधार पर कर रहा हूँ। एक जो सबसे अहम् बात है कि पूंजीपति और भ्रष्टाचारी से मीडिया के 90 फ़ीसदी सिपहसालारों की बड़ी गहरी यारी होती है। सम्बंधित व्यक्ति के भ्रष्टाचार पर बात शुरू करते ही ऐसे मीडियाकर्मी इतने परेशान हो जाते हैं कि कांफ्रेंस करने वालों को इधर-उधर के सवालों में बेतरह घुमाना शुरू कर देंगे।
घटना01- उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में लालगंज ब्लाक का एक गाँव है अतरैला राजा। यहाँ के प्रधान डा0 दया शंकर तिवारी पहली बार 2005 में ग्राम प्रधान बने। उन्हें क्षेत्र में एक बेहद शातिर व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। समाज में जितने प्रकार के पद हो सकते हैं, वे उसके स्वयंभू नेता हैं। 2005 के पहले लखपति थे। लेकिन उसके बाद आठ शाल में करोडपति हो गए। आम आदमी पार्टी के एक सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआइ एक्टिविस्ट ने पूरे छह माह मेहनत कर जो साक्ष्य निकाले वे हैरान करने वाले थे। उन्होंने हम लोगों से संपर्क किया। हमने पूरी सावधानी बरतते हुए प्रकरण को अपने साथी और इलाहबाद उच्च न्यायलय के वरिष्ठ अधिवक्ता डा0 अरविदं त्रिपाठी को पूरा प्रकरण सौंप दिया। डा0 त्रिपाठी ने अध्ययन के बाद 24 मार्च 2013 को इसकी जानकारी को देने का कार्यक्रम तय किया। प्रेस कांफ्रेंस में 10 न्यूज चैनल और 05 हिंदी अखबारों के पत्रकार आये। साक्ष्य करीब 70 पन्ने के थे। कुल सो सभी की 15 फ़ाइल बनाने में ही साथियों की कमर टेढ़ी हो गयी। हजारों रुपये खर्च हो गए।
मीडिया को जो जानकारी दी गयी वह संक्षेप में यहाँ प्रस्तुत है :
ग्राम अतारैला राजा, ब्लाक लालगंज, मिर्ज़ापुर के ग्राम प्रधान डा0 दया शंकर तिवारी धसडा राजा, परसिया, गोकुल गाँवों में तब नवम्बर 2006 में गहरीकरण का काम मनारेगा के तहत कराया, जब इन तीनों तालाबों में पानी भरा था। ख़ास बात यह कि गहरीकरण की अनुमति और धन 18-01-2007 को मिली। इसमें भी 56 ऐसे जाब कार्ड धारक रहे, जो इनके ख़ास थे और एक साथ तीनों स्थानों पर काम कर रहे थे। प्रधान जी ने मस्टर रोल बनाकर भारी भुगतान भी कर दिया। ये कार्ड धारक होली के त्यौहार पर भी काम करते दिखाए गए हैं। इन जाब कार्ड धारकों में प्रधान जी के भाई कमला शंकर तिवारी और भतीजा भी शामिल रहे। प्रधान जी ने दूसरी बार 2009-10 में प्रधान बन्ने के बाद 67 इंदिरा, महामाया आवास अपने भाई-बंधुओं और रिश्तेदारों को आवंटित कर दिया। हुई तो जिलाधिकारी संयुक्ता समद्दार ने जिला पंचायत राज अधिकारी को कार्यवाही करने को आदेश दिया। प्रधान जी आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट चले गए। वहां से इनकी याचिका निरस्त हो गयी और प्रधान जी को रिमूवल का आदेश पारित कर दिया। फिर भी जिला पंचायत राज अधिकारी ने प्रधान जी को नहीं हटाया। प्रधान जी ने गाँव की बस्ती के बीच स्थित एक तालाब को मनरेगा के धन से पटवा कर अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा कब्जा करवा दिया। साथ ही इस भूमि पर पक्का मकान भी बनवा दिया। शिकायत पर एसडीम ने तहसीलदार को जांच करने को कहा। आरोप सही मिला। कार्रवाई की बारी आई तो प्रधान जी फिर कोर्ट चले गए। कोर्ट ने 25 हजार की पेनालिटी के साथ प्रधान जी की याचिका निरस्त कर दी। आदेश दिया की इन्हें रिमूव कर दिया जाए। इसके अलावा 10 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से हर साल हुए नुक्सान की वसूली भी की जाए। आदेश के दो माह बीत गए, पर जिला प्रशासन ने कोई कार्रवाई न की। इसके अलावा भी अनेक घपले के मामले हैं। अहम् बात यह है की प्रधान जी के पास पहली बार प्रधान बनने के बाद से लेकर आज तक 01 करोड़ 10 लाख की अतिरिक्त आय अर्जित की गयी। जबकि इनके परिवार में कृषि के अलावा अन्य कोई व्यवसाय नहीं है।
लेकिन इस खबर का प्रसारण हैरतनाक रहा। दूसरी सुबह जब हमारे सामने अखबार आये तो अमर उजाला ने तीन कालम में सरसरी तौर पर आरोप दिखाते हुए प्रधान का वर्जन भी प्रकाशित कर दिया, जिसमे उसने कहा था कि यह उसके पूर्व प्रधान का मामला है। अमर उजाला ने यह नहीं लिखा कि पूर्व प्रधान भी तो वही है। दैनिक जागरण के पत्रकार ने तो कांफ्रेंस में ही प्रधान के पक्ष में चिल्लाना शुरू कर दिया। हिन्दुस्तान अखबार के पत्रकार ने भी आपत्ति जताई थी कि पूरे जिले का मामला क्यों नहीं उठा रहे आप। फिर दोनों अखबारों ने इसे समाचार संक्षेप के कालम में दस पंक्तियों में निबटा दिया। अब यह पाठकगण तय करें कि एक करोड़ 10 लाख का गबन यदि एक ग्राम प्रधान ने किया तो इसका प्रसारण किस रूप में होना चाहिए। हमारा मानना है कि जब एक ग्राम पंचायत में मात्र 08 साल में इतना बड़ा घोटाला हो सकता है और मनरेगा से आय का स्रोत इतना बड़ा हो सकता है तो पूरे देश के गाँवों के विकास में आने वाले पैसे का क्या हस्र होता होगा। सौ-दो सौ की चोरी की खबरों को चार कालम देने, प्रेमी-प्रेमिका फुर्र को बाक्स में सजा कर देने वाले अखबार 01 करोड़ 10 लाख के घोटाले को हलके में दस पंक्तियों में निबटा रहे हैं तो समझा जा सकता है इसके पीछे का सच।
वे पत्रकार हैं लूट की नदी तलाश रहे हैं
पानी गरम हुआ तो डूब कर नहा लेंगे।

प्रस्तुति-- बलि कोकट, वर्धा

भारत में हिंदी पत्रकारिता






प्रस्तुति-- राकेश गांधी / दक्षम दिवेदी / रतन सेन भारती / निम्मी नर्गिस
वर्धा

हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई और इसका श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है। राजा राममोहन राय ने ही सबसे पहले प्रेस को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ा। भारतीयों के सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक हितों का समर्थन किया। समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियों पर प्रहार किये और अपने पत्रों के जरिए जनता में जागरूकता पैदा की। राममोहन राय ने कई पत्र शुरू किये। जिसमें अहम हैं-साल 1816 में प्रकाशित ‘बंगाल गजट’। बंगाल गजट भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र है। इस समाचार पत्र के संपादक गंगाधर भट्टाचार्य थे। इसके अलावा राजा राममोहन राय ने मिरातुल, संवाद कौमुदी, बंगाल हैराल्ड पत्र भी निकाले और लोगों में चेतना फैलाई। 30 मई 1826 को कलकत्ता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल के संपादन में निकलने वाले ‘उदंत्त मार्तण्ड’ को हिंदी का पहला समाचार पत्र माना जाता है।[1]
हिंदी पत्रकारिता का काल विभाजन

भारत में हिंदी पत्रकारिता का तार्किक और वैज्ञानिक आधार पर काल विभाजन करना कुछ कठिन कार्य है। सर्वप्रथम राधाकृष्ण दास ने ऐसा प्रारंभिक प्रयास किया था। उसके बाद ‘विशाल भारत’ के नवंबर 1930 के अंक में विष्णुदत्त शुक्ल ने इस प्रश्न पर विचार किया, किन्तु वे किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंचे। गुप्त निबंधावली में बालमुकुंद गुप्त ने यह विभाजन इस प्रकार किया –

प्रथम चरण – सन् 1845 से 1877
द्वितीय चरण – सन् 1877 से 1890
तृतीय चरण – सन् 1890 से बाद तक

डॉ. रामरतन भटनागर ने अपने शोध प्रबंध ‘द राइज एंड ग्रोथ आफ हिंदी जर्नलिज्म’ काल विभाजन इस प्रकार किया है–

आरंभिक युग 1826 से 1867
उत्थान एवं अभिवृद्धि
प्रथम चरण (1867-1883) भाषा एवं स्वरूप के समेकन का युग
द्वितीय चरण (1883-1900) प्रेस के प्रचार का युग
विकास युग
प्रथम युग (1900-1921) आवधिक पत्रों का युग
द्वितीय युग (1921-1935) दैनिक प्रचार का युग
सामयिक पत्रकारिता – 1935-1945

उपरोक्त में से तीन युगों के आरंभिक वर्षों में तीन प्रमुख पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ, जिन्होंने युगीन पत्रकारिता के समक्ष आदर्श स्थापित किए। सन् 1867 में ‘कविवचन सुधा’, सन् 1883 में ‘हिन्दुस्तान’ तथा सन् 1900 में ‘सरस्वती’ का प्रकाशन है।[2]

काशी नागरी प्रचारणी द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी साहित्य के वृहत इतिहास’ के त्रयोदय भाग के तृतीय खंड में यह काल विभाजन इस प्रकार किया गया है –

प्रथम उत्थान – सन् 1826 से 1867
द्वितीय उत्थान – सन् 1868 से 1920
आधुनिक उत्थान – सन् 1920 के बाद

‘ए हिस्ट्री आफ द प्रेस इन इंडिया’ में श्री एस नटराजन ने पत्रकारिता का अध्ययन निम्न प्रमुख बिंदुओं के आधार पर किया है –

बीज वपन काल
ब्रिटिश विचारधारा का प्रभाव
राष्ट्रीय जागरण काल
लोकतंत्र और प्रेस

डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र ने ‘हिंदी पत्रकारिता’ का अध्ययन करने की सुविधा की दृष्टि से यह विभाजन मोटे रूप से इस प्रकार किया है –

भारतीय नवजागरण और हिंदी पत्रकारिता का उदय (सन् 1826 से 1867)
राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति- दूसरे दौर की हिंदी पत्रकारिता (सन् 1867-1900)
बीसवीं शताब्दी का आरंभ और हिंदी पत्रकारिता का तीसरा दौर – इस काल खण्ड का अध्ययन करते समय उन्होंने इसे तिलक युग तथा गांधी युग में भी विभक्त किया।

डॉ. रामचन्द्र तिवारी ने अपनी पुस्तक ‘पत्रकारिता के विविध रूप’ में विभाजन के प्रश्न पर विचार करते हुए यह विभाजन किया है –

उदय काल – (सन् 1826 से 1867)
भारतेंदु युग – (सन् 1867 से 1900)
तिलक या द्विवेदी युग – (सन् 1900 से 1920)
गांधी युग – (सन् 1920 से 1947)
स्वातंत्र्योत्तर युग (सन् 1947 से अब तक)

डॉ. सुशील जोशी ने काल विभाजन कुछ ऐसा प्रस्तुत किया है –

हिंदी पत्रकारिता का उद्भव – 1826 से 1867
हिंदी पत्रकारिता का विकास – 1867 से 1900
हिंदी पत्रकारिता का उत्थान – 1900 से 1947
स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता – 1947 से अब तक[2]

उक्त मतों की समीक्षा करने पर स्पष्ट होता है कि हिंदी पत्रकारिता का काल विभाजन विभिन्न विद्वानों पत्रकारों ने अपनी-अपनी सुविधा से अलग-अलग ढंग से किया है। इस संबंध में सर्वसम्मत काल निर्धारण अभी नहीं किया जा सका है। किसी ने व्यक्ति विशेष के नाम से युग का नामकरण करने का प्रयास किया है तो किसी ने परिस्थिति अथवा प्रकृति के आधार पर। इनमें एकरूपता का अभाव है।
हिंदी पत्रकारिता का उद्भव काल (1826 से 1867)

कलकत्ता से 30 मई, 1826 को ‘उदन्त मार्तण्ड’ के सम्पादन से प्रारंभ हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा कहीं थमी और कहीं ठहरी नहीं है। पंडित युगल किशोर शुक्ल के संपादन में प्रकाशित इस समाचार पत्र ने हालांकि आर्थिक अभावों के कारण जल्द ही दम तोड़ दिया, पर इसने हिंदी अखबारों के प्रकाशन का जो शुभारंभ किया वह कारवां निरंतर आगे बढ़ा है। साथ ही हिंदी का प्रथम पत्र होने के बावजूद यह भाषा, विचार एवं प्रस्तुति के लिहाज से महत्त्वपूर्ण बन गया।[2]
कलकत्ता का योगदान

पत्रकारिता जगत में कलकत्ता का बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रशासनिक, वाणिज्य तथा शैक्षिक दृष्टि से कलकत्ता का उन दिनों विशेष महत्व था। यहीं से 10 मई 1829 को राजा राममोहन राय ने ‘बंगदूत’ समाचार पत्र निकाला जो बंगला, फ़ारसी, अंग्रेज़ी तथा हिंदी में प्रकाशित हुआ। बंगला पत्र ‘समाचार दर्पण’ के 21 जून 1834 के अंक ‘प्रजामित्र’ नामक हिंदी पत्र के कलकत्ता से प्रकाशित होने की सूचना मिलती है। लेकिन अपने शोध ग्रंथ में डॉ. रामरतन भटनागर ने उसके प्रकाशन को संदिग्ध माना है। ‘बंगदूदत’ के बंद होने के बाद 15 सालों तक हिंदी में कोई पत्र न निकला।[2]
हिंदी पत्रकारिता का उत्थान काल (1900-1947)

सन 1900 का वर्ष हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण है। 1900 में प्रकाशित सरस्वती पत्रिका]अपने समय की युगान्तरकारी पत्रिका रही है। वह अपनी छपाई, सफाई, कागज और चित्रों के कारण शीघ्र ही लोकप्रिय हो गई। इसे बंगाली बाबू चिन्तामणि घोष ने प्रकाशित किया था तथा इसे नागरी प्रचारिणी सभा का अनुमोदन प्राप्त था। इसके सम्पादक मण्डल में बाबू राधाकृष्ण दास, बाबू कार्तिका प्रसाद खत्री, जगन्नाथदास रत्नाकर, किशोरीदास गोस्वामी तथा बाबू श्यामसुन्दरदास थे। 1903 में इसके सम्पादन का भार आचार्य महावर प्रसाद द्विवेदी पर पड़ा। इसका मुख्य उद्देश्य हिंदी-रसिकों के मनोरंजन के साथ भाषा के सरस्वती भण्डार की अंगपुष्टि, वृद्धि और पूर्ति करन था। इस प्रकार 19वी शताब्दी में हिंदी पत्रकारिता का उद्भव व विकास बड़ी ही विषम परिस्थिति में हुआ। इस समय जो भी पत्र-पत्रिकाएं निकलती उनके सामने अनेक बाधाएं आ जातीं, लेकिन इन बाधाओं से टक्कर लेती हुई हिंदी पत्रकारिता शनैः-शनैः गति पाती गई।[2]
हिंदी पत्रकारिता का उत्कर्ष काल (1947 से प्रारंभ)

अपने क्रमिक विकास में हिंदी पत्रकारिता के उत्कर्ष का समय आज़ादी के बाद आया। 1947 में देश को आज़ादी मिली। लोगों में नई उत्सुकता का संचार हुआ। औद्योगिक विकास के साथ-साथ मुद्रण कला भी विकसित हुई। जिससे पत्रों का संगठन पक्ष सुदृढ़ हुआ। रूप-विन्यास में भी सुरूचि दिखाई देने लगी। आज़ादी के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में अपूर्व उन्नति होने पर भी यह दुख का विषय है कि आज हिंदी पत्रकारिता विकृतियों से घिरकर स्वार्थसिद्धि और प्रचार का माध्यम बनती जा रही है। परन्तु फिर भी यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय प्रेस की प्रगति स्वतंत्रता के बाद ही हुई। यद्यपि स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता ने पर्याप्त प्रगति कर ली है किन्तु उसके उत्कर्षकारी विकास के मार्ग में आने वाली बाधाएं भी कम नहीं हैं।[2]
प्रतिबंधित पत्र-पत्रिकाएँ

भारत के स्वाधीनता संघर्ष में पत्र-पत्रिकाओं की अहम भूमिका रही है। आजादी के आन्दोलन में भाग ले रहा हर आम-ओ-खास कलम की ताकत से वाकिफ था। राजा राममोहन राय, महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, बाल गंगाधर तिलक, पंडित मदनमोहन मालवीय, बाबा साहब अम्बेडकर, यशपाल जैसे आला दर्जे के नेता सीधे-सीधे तौर पर पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े हुए थे और नियमित लिख रहे थे। जिसका असर देश के दूर-सुदूर गांवों में रहने वाले देशवासियों पर पड़ रहा था। अंग्रेजी सरकार को इस बात का अहसास पहले से ही था, लिहाजा उसने शुरू से ही प्रेस के दमन की नीति अपनाई। 30 मई 1826 को कलकत्ता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल के संपादन में निकलने वाले ‘उदंत्त मार्तण्ड’ को हिंदी का पहला समाचार पत्र माना जाता है। अपने समय का यह ख़ास समाचार पत्र था, मगर आर्थिक परेशानियों के कारण यह जल्दी ही बंद हो गया। आगे चलकर माहौल बदला और जिस मकसद की खातिर पत्र शुरू किये गये थे, उनका विस्तार हुआ। समाचार सुधावर्षण, अभ्युदय, शंखनाद, हलधर, सत्याग्रह समाचार, युद्धवीर, क्रांतिवीर, स्वदेश, नया हिन्दुस्तान, कल्याण, हिंदी प्रदीप, ब्राह्मण,बुन्देलखण्ड केसरी, मतवाला सरस्वती, विप्लव, अलंकार, चाँद, हंस, प्रताप, सैनिक, क्रांति, बलिदान, वालिंट्यर आदि जनवादी पत्रिकाओं ने आहिस्ता-आहिस्ता लोगों में सोये हुए वतनपरस्ती के जज्बे को जगाया और क्रांति का आह्नान किया।[1]

नतीजतन उन्हें सत्ता का कोपभाजन बनना पड़ा। दमन, नियंत्रण के दुश्चक्र से गुजरते हुए उन्हें कई प्रेस अधिनियमों का सामना करना पड़ा। ‘वर्तमान पत्र’ में पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा लिखा ‘राजनीतिक भूकम्प’ शीर्षक लेख, ‘अभ्युदय’ का भगत सिंह विशेषांक, किसान विशेषांक, ‘नया हिन्दुस्तान’ के साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और फॉसीवादी विरोधी लेख, ‘स्वदेश’ का विजय अंक, ‘चॉंद’ का अछूत अंक, फॉंसी अंक, ‘बलिदान’ का नववर्षांक, ‘क्रांति’ के 1939 के सितम्बर, अक्टूबर अंक, ‘विप्लव’ का चंद्रशेखर अंक अपने क्रांतिकारी तेवर और राजनीतिक चेतना फैलाने के इल्जाम में अंग्रेजी सरकार की टेढ़ी निगाह के शिकार हुए और उन्हें जब्ती, प्रतिबंध, जुर्माना का सामना करना पड़ा। संपादकों को कारावास भुगतना पड़ा।
गवर्नर जनरल वेलेजली

भारतीय पत्रकारिता की स्वाधीनता को बाधित करने वाला पहला प्रेस अधिनियम गवर्नर जनरल वेलेजली के शासनकाल में 1799 को ही सामने आ गया था। भारतीय पत्रकारिता के आदिजनक जॉन्स आगस्टक हिक्की के समाचार पत्र ‘हिक्की गजट’ को विद्रोह के चलते सर्वप्रथम प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। हिक्की को एक साल की कैद और दो हजार रूपए जुर्माने की सजा हुई। कालांतर में 1857 में गैंगिंक एक्ट, 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, 1908 में न्यूज पेपर्स एक्ट (इन्साइटमेंट अफैंसेज), 1910 में इंडियन प्रेस एक्ट, 1930 में इंडियन प्रेस आर्डिनेंस, 1931 में दि इंडियन प्रेस एक्ट (इमरजेंसी पावर्स) जैसे दमनकारी क़ानून अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करने के उद्देश्य से लागू किए गये। अंग्रेजी सरकार इन काले क़ानूनों का सहारा लेकर किसी भी पत्र-पत्रिका पर चाहे जब प्रतिबंध, जुर्माना लगा देती थी। आपत्तिजनक लेख वाले पत्र-पत्रिकाओं को जब्त कर लिया जाता। लेखक, संपादकों को कारावास भुगतना पड़ता व पत्रों को दोबारा शुरू करने के लिए जमानत की भारी भरकम रकम जमा करनी पड़ती। बावजूद इसके समाचार पत्र संपादकों के तेवर उग्र से उग्रतर होते चले गए। आजादी के आन्दोलन में जो भूमिका उन्होंने खुद तय की थी, उस पर उनका भरोसा और भी ज्यादा मजबूत होता चला गया। जेल, जब्ती, जुर्माना के डर से उनके हौसले पस्त नहीं हुये।[1]
बीसवीं सदी की शुरुआत

बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रचार प्रसार और उन आन्दोलनों की कामयाबी में समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही। कई पत्रों ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रवक्ता का रोल निभाया। कानपुर से 1920 में प्रकाशित ‘वर्तमान’ ने असहयोग आन्दोलन को अपना व्यापक समर्थन दिया था। पंडित मदनमोहन मालवीय द्वारा शुरू किया गया साप्ताहिक पत्र ‘अभ्युदय’ उग्र विचारधारा का हामी था। अभ्युदय के भगत सिंह विशेषांक में महात्मा गांधी, सरदार पटेल, मदनमोहन मालवीय, पंडित जवाहरलाल नेहरू के लेख प्रकाशित हुए। जिसके परिणामस्वरूप इन पत्रों को प्रतिबंध- जुर्माना का सामना करना पड़ा। गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’, सज्जाद जहीर एवं शिवदान सिंह चैहान के संपादन में इलाहाबाद से निकलने वाला ‘नया हिन्दुस्तान’ राजाराम शास्त्री का ‘क्रांति’ यशपाल का ‘विप्लव’ अपने नाम के मुताबिक ही क्रांतिकारी तेवर वाले पत्र थे। इन पत्रों में क्रांतिकारी युगांतकारी लेखन ने अंग्रेजी सरकार की नींद उड़ा दी थी। अपने संपादकीय, लेखों, कविताओं के जरिए इन पत्रों ने सरकार की नीतियों की लगातार भतर्सना की। ‘नया हिन्दुस्तान’ और ‘विप्लव’ के जब्तशुदा प्रतिबंधित अंकों को देखने से इनकी वैश्विक दृष्टि का पता चलता है।[1]
‘चाँद’ का फाँसी अंक

फाँसीवाद के उदय और बढ़ते साम्राज्यवाद, पूंजीवाद पर चिंता इन पत्रों में साफ़ देखी जा सकती है। गोरखपुर से निकलने वाले साप्ताहिक पत्र ‘स्वदेश’ को जीवंतपर्यंत अपने उग्र विचारों और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण की भावना के कारण समय-समय पर अंग्रेजी सरकार की कोप दृष्टि का शिकार होना पड़ा। खासकर विशेषांक विजयांक को। आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा संपादित ‘चाँद’ के फाँसी अंक की चर्चा भी जरूरी है। काकोरी के अभियुक्तों को फांसी के लगभग एक साल बाद, इलाहाबाद से प्रकाशित चॉंद का फाँसी अंक क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास की अमूल्य निधि है। यह अंक क्रांतिकारियों की गाथाओं से भरा हुआ है। सरकार ने अंक की जनता में जबर्दस्त प्रतिक्रिया और समर्थन देख इसको फौरन जब्त कर लिया और रातों-रात इसके सारे अंक गायब कर दिये। अंग्रेज हुकूमत एक तरफ क्रांतिकारी पत्र-पत्रिकाओं को जब्त करती रही, तो दूसरी तरफ इनके संपादक इन्हें बिना रुके पूरी निर्भिकता से निकालते रहे। सरकारी दमन इनके हौसलों पर जरा भी रोक नहीं लगा सका। पत्र-पत्रिकाओं के जरिए उनका यह प्रतिरोध आजादी मिलने तक जारी रहा।[1]

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