बुधवार, 21 अक्तूबर 2020

रवि अरोड़ा की नजर से

 गुलगुलों से परहेज़ / रवि अरोड़ा 


रवि अरोड़ा

अन्य दिनो की तरह कल शाम भी मैं फल लेने को गोविंद पुरम के निकट खड़ी ठेलियों पर रुक गया । यहाँ आजकल फल आदि वही लोग बेच रहे होते हैं जिनका लॉकडाउन के बाद से पुराना रोज़गार चौपट है अथवा छिन चुका है । हापुड़ रोड के इस इलाक़े में पहले इक्का दुक्का ही फल विक्रेता मिलते थे मगर अब इनकी संख्या पचास के भी पार पहुँच चुकी है । ख़ैर , मैं पहचान के एक ठेली वाले से अभी फल तुलवा ही रहा था कि  तभी वहाँ पुलिस की एक जिप्सी आकर रुकी । पुलिस का वहाँ पहुँचना ही था कि ठेली वालों में भगदड़ मच गई । जिसका जिस ओर मुँह था वो उस ओर ही अपनी ठेली लेकर भागा । हड़बड़ाहट में कई ठेलियाँ आपस में टकरा गईं और उनमे रखे सेब, अनार, पपीते और अमरूद आदि सड़क पर बिखर गये । एक डरपोक से बालक की तो ठेली ही पलट गई और उस पर रखे सारे सेब सड़क पर आ गिरे । पुलिस का एसा ख़ौफ़ फल विक्रेताओं पर था कि कोई भी सड़क पर बिखरे अपने फलों को उठाने का साहस नहीं कर रहा था और सभी बचे ख़ुचे माल को लेकर ही सरपट भागे जा रहे थे । महँगाई के ज़माने में सड़क पर फल बिखरे हों तो भला बंदरबाँट को लोगबाग़ क्यों न रुकेंगे ? सो अनेक पैदल अथवा साइकिल सवार फल बटोरने लग गये । कई दुपहिया चालक भी अपना वाहन सड़क पर बेतरतीब खड़ा कर इस लूट में शामिल हो गए । सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इससे सड़क पर ट्रेफ़िक जाम हो गया और सड़क पर निर्बाध आवागमन की गरज से मौक़े से ठेलियों को हटवाने आई पुलिस की इस आमद से ही जाम लग गया । 


ठेली वालों के प्रति मेरी हमदर्दी हो सकता है कि बेवक़ूफ़ाना हो मगर पता नहीं क्यों यह पूरा घटनाक्रम मुझ पर बेहद नागवार गुज़रा । हालाँकि मैं मानता हूँ कि बेहतर नगरीय सुविधाओं के लिये किसी भी शहर में आवागमन की निर्बाध सुविधा होना शुरुआती शर्तों में से एक है । सामान्य दिनो में तो मैं स्वयं इसका हामी हूँ मगर आजकल जब चहुँओर रोटी के लाले हैं तब भी हम सामान्य दिनो जैसा स्वाँग करें तो यह कहाँ तक जायज़ है ? ग्लोबल हंगर इंडेक्स के हिसाब से भूख के मामले में हम 107 देशों में 94वें स्थान तक पहुँच गये हैं । यहाँ तक कि पाकिस्तान, बांग्ला देश और नेपाल जैसे पड़ौसी देशों की स्थिति भी हमसे बेहतर हैं । जानकर बता रहे हैं कि स्थितियाँ उससे अधिक ख़राब हैं , जितना अनुमान लगाया जा रहा है । ऐसे माहौल में यदि कोई सड़क किनारे खड़ा होकर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहा है तो क्या ग़लत है ? मुल्क में लाखों-करोड़ों लोग आजकल इसी ठेली-पटरी के सहारे हैं । मगर सोशल मीडिया पर रोज़ इन पर पुलिसिया क़हर टूटता दिखाई देता है । ये वो लोग हैं जिन्हें कोई बैंक लोन नहीं देता । किसी सरकारी रियायत अथवा योजना में भी इनकी कोई हिस्सेदारी नहीं होती । सरकारी सुविधा के नाम पर इन्हें बस इतना चाहिये कि कोई मुशटंडा इनसे हफ़्ता न वसूले अथवा कोई पुलिस वाला इनकी ठेली न पलटे । मगर हम इन्हें यही सुविधा देने को तैयार नहीं हैं । 


अनलॉक की प्रक्रिया में पूरे मुल्क के बाज़ार खुल गये हैं मगर पैठ और पटरी बाज़ार ही हम नहीं खोल रहे । यूँ ही कहीं भी बेतरतीब खड़े होकर ये लोग कुछ बेंचें तो गोविंद पुरम जैसा पुलिसिया क़हर इन पर टूट पड़ता है । बेशक ये शहर हमने अपने लिए बनाए हैं और इसे साफ़ देखने की हमारी ख़्वाहिश क़तई ग़ैर वाजिब नहीं है । विकसित देशों जैसी नगरीय सुविधाएँ पाने का हमें भी हक़ है मगर जब हम अपने घर के सारे काम ख़ुद नहीं करना चाहते और हमें घरेलू नौकर चाहिये । घर-दुकान की बिजली, पानी अथवा लकड़ी आदि के काम हमें आते नहीं । बड़े-बड़े और महँगे 

शॉपिंग मॉल में ख़रीदारी की हमारी हैसियत नहीं है और सारी जगह घूम कर कोई ठेली-पटरी वाला ही हम ढूंढ़ते हैं तो मुआफ़ कीजिएगा फिर हमें कोई हक़ नहीं कि हम इनके रोज़गार को तिरछी नज़र से देखें । गुड़ खाकर गुलगुलों से परहेज़ का ढकोसला अच्छा नहीं होता जनाब ।

सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

jरामधारी सिंह दिनकर

 द्वन्द्व गीत (1940) ●°•/ *रामधारी सिंह "दिनकर"* 

प्रस्तुति - विमल कुमार  वर्मा 


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            (०१) 

चाहे जो भी फसल उगा ले, 

तू जल धार बहाता चल। 

जिस का भी घर चमक उठे, 

तू मुक्त प्रकाश लुटाता चल। 

रोक नहीं अपने अन्तर का 

वेग किसी आशंका से, 

मन में उठें भाव जो, उन को 

गीत बना कर गाता चल। 


            (०२) 

तुझे फिक्र क्या, खेती को 

प्रस्तुत है कौन किसान नहीं? 

जोत चुका है कौन खेत? 

किसको मौसम का ध्यान नहीं? 

कौन समेटेगा, किस के 

खेतों से जल बह जायेगा? 

इस चिन्ता में पड़ा अगर 

तो बाकी फिर ईमान नहीं। 


            (०३) 

तू जीवन का कण्ठ, भंग 

इसका कोई उत्साह न कर, 

रोक नहीं आवेग प्राण के, 

सँभल सम्भल कर आह न कर। 

उठने दे हुंकार हृदय से, 

जैसे वह उठना चाहे; 

किसका, कहाँ वक्ष फटता है, 

तू इसकी परवाह न कर। 


            *(०४)* 

हम पर्वत पर की पुकार हैं, 

वे घाटी के वासी हैं; 

वे वन में भी गृही, और 

हम गृह में भी, संन्यासी हैं। 

वे लेते कर बन्द खिड़कियाँ 

डर कर तेज हवाओं से; 

झञ्झाओं में पंख खोल 

उड़ने के हम अभ्यासी हैं। 


            (०५) 

जब तब, मैं सोचता कि क्यों 

छन्दों के जाल बिछाता हूँ, 

सुनता भी कोई कि, शून्य में 

मैं झञ्झा सा गाता हूँ! 

आयेगा वह कभी पियासे 

गीतों को शीतल करने, 

जीवन के सपने बिखेर कर 

जिस का पन्थ सजाता हूँ? 


            (०६) 

रोक हॄदय में उसे, अतल से 

मेघ उठा जो आता है। 

घिरती है जो सुधा, बोल कर 

तू क्यों उसे गँवाता है? 

कलम उठा मत दौड़ प्राण के 

कम्पन पर प्रत्येक घड़ी। 

नहीं जानता, गीत लेख 

बनते बनते मर जाता है? 


            *(०७)* 

छिप कर मन में बैठ और 

सुन तो नीरव झंकारो को। 

अन्तर्नभ पर देख, ज्योति में 

छिटके हुये सितारों को। 

बड़े भाग्य से ये खिलते हैं 

कभी चेतना के वन में। 

यों बिखेरता मत चल, सड़कों 

पर अनमोल विचारों को। 


            *(०८)* 

तू जो कहना चाह रहा, 

वह भेद कौन जन जानेगा? 

कौन तुझे तेरी आँखों से, 

बन्धु! यहाँ पहचानेगा? 

जैसा तू, वैसे ही तो 

ये सभी दिखाई पड़ते हैं; 

तू इन सबसे भिन्न ज्योति है, 

कौन बात यह मानेगा? 


            (०९) 

जादू की ओढ़नी ओढ़ जो 

परी प्राण में जागी है; 

उसकी सुन्दरता के आगे 

क्या यह कीर्त्ति अभागी है? 

पचा सकेगा नहीं स्वाद क्या 

इस रहस्य का भी मन में? 

तब तो तू, सत्य ही, अभी तक 

भी अपूर्ण अनुरागी है। 


            (१०) 

बहुत चला तू, केन्द्र छोड़ कर 

दूर स्वयम् से जाने को; 

अब तो कुछ दिन पन्थ मोड़ 

पन्थी! अपने को पाने को। 

जला आग कोई जिस से तू 

स्वयम् ज्योति साकार बने, 

दर्द बसाना भी यह क्या 

गीतों का ताप बढ़ाने को! 


            (११) 

कौन वीर है, एक बार व्रत 

ले कर कभी न डोलेगा? 

कौन संयमी है, रस पी कर 

स्वाद नहीं फिर बोलेगा? 

यों तो फूल सभी पाते हैं, 

पायेगा फल, किन्तु, वही, 

मन में जन्मे हुए वृक्ष का 

भेद नहीं जो खोलेगा। 


            (१२) 

तारे लेकर जलन, मेघ  

आँसू का पारावार लिये, 

संध्या लिये विषाद, पुजारिन 

उषा विफल उपहार लिये, 

हँसे कौन? तुझ को तज कर 

जो चला वही हैरान चला, 

रोती चली बयार, हृदय में 

मैं भी हाहाकार लिये। 


            (१३) 

देखें तुझे किधर से आ कर? 

नहीं पन्थ का ज्ञान हमें। 

बजती कहीं बाँसुरी तेरी, 

बस, इतना ही भान हमें। 

शिखरों से ऊपर उठने 

देती न हाय, लघुता अपनी; 

मिट्टी पर झुकने देता है 

देव, नहीं अभिमान हमें। 


            (१४) 

एक चाह है, जान सकूँ, यह 

छिपा हुआ दिल में क्या है। 

सुन कर भी न समझ पाया 

इस आखर अनमिल में क्या है। 

ऊँचे टीले पन्थ सामने, 

अब तक तो विश्राम नहीं, 

यही सोच बढ़ता जाता हूँ, 

देखूँ, मञ्जिल में क्या है। 


            (१५) 

चलने दे रेती खराद की, 

रुके नहीं यह क्रम तेरा। 

अभी फूल मोती पर गढ़ दे, 

अभी वृत्त का दे घेरा। 

जीवन का यह दर्द मधुर है, 

तू न व्यर्थ उपचार करे। 

किसी तरह ऊषा तक टिम टिम 

जलने दे दीपक मेरा। 


            (१६) 

क्या पूछूँ खद्योत, कौन सुख 

चमक चमक छिप जाने में? 

सोच रहा कैसी उमङ्ग है 

जलते से परवाने में। 

हाँ, स्वाधीन सुखी हैं, लेकिन, 

ओ व्याधा के कीर, बता, 

कैसा है आनन्द जाल में 

तड़प तड़प रह जाने में? 


            (१७) 

छू कर परिधि बन्ध फिर आते 

विफल खोज आह्वान तुम्हें। 

सुरभि सुमन के बीच देव, 

कैसे भाता व्यवधान तुम्हें? 

छिप कर किसी पर्ण झुरमुट में 

कभी कभी कुछ बोलो तो; 

कब से रहे पुकार सत्य के 

पथ पर आकुल गान तुम्हें! 


            (१८) 

देख न पाया प्रथम चित्र, 

त्यों, अन्तिम दृश्य न पहचाना, 

आदि अन्त के बीच सुना, 

मैंने जीवन का अफसाना। 

मञ्जिल थी मालूम न मुझ को 

और पन्थ का ज्ञान नहीं, 

जाना था निश्चय, इस से 

चुपचाप पड़ा मुझ को जाना। 


            (१९) 

चलना पड़ा बहुत, देखा था 

जब तक यह संसार नहीं, 

इस घाटी में भी रुक पाया 

मेरा यह व्यापार नहीं। 

कूदूँगा निर्वाण जलधि में 

कभी पार कर इस जग को, 

जब तक शेष पन्थ, तब तक 

विश्राम नहीं, उद्धार नहीं। 


            (२०) 

दिये नयन में अश्रु, हॄदय में 

भला किया जो प्यार दिया, 

मुझमें मुझे मगन करने को 

स्वप्नों का संसार दिया। 

सब कुछ दिया मूक प्राणों की 

वंशी में वाणी दे कर, 

पर क्यों हाय, तृषा दी, उर में 

भीषण हाहाकार दिया? 


            (२१) 

कितनों की लोलुप आँखों ने 

बार बार प्याली हेरी। 

पर, साकी अल्हड़ अपनी ही 

ईच्छा पर देता फेरी। 

हो अधीर मैंने प्याली को 

थाम मधुर रस पान किया, 

फिर देखा, साकी मेरा था, 

प्याली औ’ दुनियाँ मेरी। 


            (२२) 

विभा, विभा, ओ विभा हमें दे, 

किरण! सूर्य! दे उजियाली। 

आह! युगों से घेर रही 

मानव शिशु को रजनी काली। 

प्रभो! रिक्त यदि कोष विभा का 

तो फिर इतना ही कर दे; 

दे जगती को फूँक, तनिक 

झिलमिला उठे यह अँधियाली। 


            *(२३)* 

तू, वह, सब एकाकी आये, 

मैं भी चला अकेला था; 

कहते जिसे विश्व, वह तो 

इन असहायों का मेला था। 

पर, कैसा बाजार? विदा दिन 

हम क्यों, इतना लाद चले? 

सच कहता हूँ, जब आया 

तब पास न एक अधेला था। 


            (२४) 

मेरे उर की कसक हाय, 

तेरे मन का आनन्द हुई। 

इन आँखों की अश्रु धार ही 

तेरे हित मकरन्द हुई। 

तू कहता ’कवि’ मुझे, किन्तु, 

आहत मन यह कैसे माने? 

इतना ही है ज्ञात कि मेरी 

व्यथा उमड़ कर छन्द हुई। 


            (२५) 

मैं रोता था हाय, विश्व 

हिमकण की करुण कहानी है। 

सुन्दरता जलती मरघट में, 

मिटती यहाँ जवानी है। 

पर, बोला कोई कि जरा 

मोती की ओर निहारो तो। 

दो दिन ही तो सही, किन्तु, 

देखो कैसा यह पानी है! 


            (२६) 

रूप, रूप, हाँ रूप, सुना था, 

जगती है मधु की प्याली। 

यहाँ सुधा मिलती अधरों में, 

आँखों में मद की लाली। 

उतराता ही नित रहता 

यौवन रसधार तरंगों में, 

बरसाती मधुकण जीवन में 

यहाँ सुन्दरी मतवाली। 


            (२७) 

सो, देखा चाँदनी एक दिन 

राज अमा पर छोड़ गई। 

खिजाँ रोकता रहा लाख, 

कोयल वन से मुँह मोड़ गई। 

और आज क्यारी क्यों सूनी? 

अरे! बता, किसने देखा? 

गलबाँही डाले सुन्दरता 

काल संग किस ओर गई? 


            (२८) 

कलिके, मैं चाहता तुम्हें 

उतना जितना यह भ्रमर नहीं, 

अरी, तटी की दूब, मधुर तू 

उतनी जितना अधर नहीं; 

किसलय, तू भी मधुर, 

चन्द्रवदनी निशि, तू मादक रानी। 

दु:ख है, इस आनन्द कुञ्ज में 

*मैं ही केवल अमर नहीं।* 


            (२९) 

दूब भरी इस शैल तटी में 

उषा विहँसती आयेगी, 

युग युग कली हँसेगी, 

युग युग कोयल गीत सुनायेगी, 

घुल मिल चन्द्र किरण में 

बरसेगी भू पर आनन्द सुधा, 

केवल मैं न रहूँगा, यह 

मधु धार उमड़ती जायेगी। 


            (३०) 

बिछुड़े मित्र, छला मैत्री ने, 

जग ने अगणित शाप दिये; 

अश्रु पोंछ तू दूब फूल से 

मन बहलाती रही प्रिये! 

भूलूँगा न प्रिया की चितवन, 

मैत्री की शीतल छाया, 

जाऊँगा जगती से, लेकिन, 

तेरी भी तसवीर लिये। 


            (०३१) 

यह फूलों का देश मनोरम 

कितना सुन्दर है रानी! 

इस से मधुर स्वर्ग? परियाँ 

तुझ सी क्या सुन्दर कल्याणी? 

अरे, मरूँगा कल तो फिर क्यों 

आज नहीं रसधार बहे? 

फूल फूल पर फिरे न क्यों, 

कविता तितली-सी दीवानी? 


            (०३२) 

पाटल सा मुख, सरल, श्याम दृग 

जिन में कुछ अभिमान नहीं, 

सरल मधुर वाणी जिस से 

मादक कवियों के गान नहीं; 

रेशम के तारों से चिकने बाल, 

हृदय की क्या जानूँ? 

आँखें मुग्ध देखतीं, रहता 

पाप पुण्य का ध्यान नहीं। 


            (०३३) 

बार बार द्वादशी चन्द्र की 

किरणों में तू मुस्काई, 

बार बार वनफूलों में तू 

रूप लहर बन लहराई। 

हिम कण से भींगे गुलाब तू 

चुनती थी उस दिन वन में, 

बार बार उसकी पुलक स्मृति 

उमड़ उमड़ दृग में छाई। 


            (०३४) 

ये नवनीत कपोल, गुलाबों 

की जिन में लाली खोई; 

ये नलिनी से नयन, जहाँ 

काजल बन लघु अलिनी सोई; 

कोंपल से अधरों को रंग कर 

कब वसन्त कर धन्य हुआ? 

किस विरही ने तनु की यह 

धवलिमा आँसुओं में धोई? 


            (०३५) 

युग युग से तूलिका चित्र 

खींचते विफल, असहाय थकी, 

उपमा रही अपूर्ण, निखिल 

सुषमा चरणों पर आन झुकी। 

बार बार कुछ गा कर कुछ की 

चिन्ता में कवि दीन हुआ; 

सुन्दरि! कहाँ कला अब तक भी 

तुझे छन्द में बाँध सकी? 


            (०३६) 

उतरी दिव्य लोक से भू पर 

तू बन देवि! सुधा सलिला, 

प्रथम किरण जिस दिन फूटी थी, 

उस दिन पहला स्वप्न खिला।

फूटा कवि का कण्ठ, प्रथम 

मानव के उर की खिली कली, 

मधुर ज्योति जगती में जागी, 

सत् चित् को आनन्द मिला। 


            (०३७) 

जिस दिन विजन, गहन कानन में 

ध्वनित मधुर मंजीर हुई, 

चौंक उठे ये प्राण, शिरायें 

उर की विकल अधीर हुईं। 

तूने बन्दी किया हॄदय में, 

देवि, मुझे तो स्वर्ग मिला, 

आलिंगन में बँधा और 

ढीली जग की जंजीर हुई। 


            (०३८) 

तू मानस की मधुर कल्पना, 

वाणी की झंकार सखी! 

गानों का अन्तर्गायन तू 

प्राणों की गुंजार सखी! 

मैं अजेय सोचा करता हूँ, 

क्यों पौरुष बलहीन यहाँ? 

सब कुछ होकर भी आखिर हूँ 

चरणों का उपहार सखी! 


            (०३९) 

खोज रही तितली-सी वन वन 

तुम्हें कल्पना दीवानी; 

रँगती चित्र बैठ निर्जन में 

रूपसि! कविता कल्याणी। 

मैं निर्धन ऊँघती कली से 

स्वप्न बिछा निर्जन पथ पर 

बाट जोहता हूँ, कुटीर में 

आओ अलका की रानी! 


            (०४०)

कुछ सुन्दरता छिपी मुकुल में, 

कुछ हँसते से फूलों में; 

कुछ सुहागिनी के कपोल, 

काजल, सिन्दूर, दुकूलों में। 

कविते, भूल न इस उपवन पर, 

मृत कुसुमों की याद करे; 

वह होगी कैसी छवि जो 

छिप रही चिता की धूलों में? 


            (०४१) 

आह, चाहता मैं क्यों जाये 

जग से कभी वसन्त नहीं? 

आशा भरे स्वर्ण जीवन का 

किसी रोज हो अन्त नहीं? 

था न कभी, तो फिर क्या चिन्ता 

आगे कभी नहीं हूँगा? 

यदि पहले था, तो क्या हूँगा 

अब से अरे, अनन्त नहीं? 


            (०४२) 

भू की झिलमिल रजत सरित ही 

घटा गगन की काली है; 

मेंहदी के उर की लाली ही 

पत्तों में हरियाली है; 

जुगुनू की लघु विभा दिवा में 

कलियों की मुस्कान हुई; 

उडु को ज्योति उसी ने दी, 

जिसने निशि को अँधियाली है। 


            (०४३) 

जीवन ही कल मृत्यु बनेगा, 

और मृत्यु ही नव जीवन, 

जीवन मृत्यु बीच तब क्यों 

द्वन्द्वों का यह उत्थान पतन? 

ज्योति बिन्दु चिर नित्य अरे, तो 

धूल बनूँ या फूल बनूँ, 

जीवन दे मुस्कान जिसे, क्यों 

उसे कहो दे अश्रु मरण? 


            (०४४) 

जाग प्रिये! यह अमा स्वयम् 

बालारुण मुकुट लिये आई, 

जल, थल, गगन, पवन, तृण, 

तरु पर, अभिनव एक विभा छाई; 

मधुपों ने कलियों को पाया, 

किरणें लिपट पड़ीं जल से, 

ईर्ष्यावती निशा अब बीती, 

चकवा ने चकवी पाई। 


            (०४५) 

दो अधरों के बीच खड़ी थी 

भय की एक तिमिर रेखा, 

आज ओस के दिव्य कणों में 

धुल उसको मिटते देखा। 

जाग, प्रिये! निशि गई, चूमती 

पलक उतर कर प्रात विभा, 

जाग, लिखें चुम्बन से हम 

जीवन का प्रथम मधुर लेखा। 


            (०४६) 

अधर सुधा से सींच, लता में 

कटुता कभी न आयेगी, 

हँसने वाली कली एक दिन 

हँस कर ही झर जायेगी। 

जाग रहे चुम्बन में तो क्यों 

नींद न स्वप्न मधुर होगी? 

मादकता जीवन की पी कर 

मृत्यु मधुर बन जायेगी। 


            (०४७) 

और नहीं तो क्यों गुलाब की 

गमक रही सूखी डाली? 

सुरा बिना पीते मस्ताने 

धो धो क्यों टूटी प्याली? 

उगा अरुण प्राची में तो क्यों 

दिशा प्रतीची जाग उठी? 

चूमा इस कपोल पर, उस पर 

कैसे दौड़ गई लाली? 


            (०४८) 

रति अनंग शासित धरणी यह, 

ठहर पथिक, मधु रस पी ले; 

इन फूलों की छाँह जुड़ा ले, 

कर ले शुष्क अधर गीले; 

आज सुमन मण्डप में सो कर 

परदेशी! निज श्रान्ति मिटा; 

चरण थके होंगे, तेरे पथ 

बड़े अगम, ऊँचे टीले। 


            (०४९) 

कुसुम कुसुम में प्रखर वेदना, 

नयन अधर में शाप यहाँ, 

चन्दन में कामना वह्नि, विधु 

में चुम्बन का ताप यहाँ। 

उर उर में बंकिम धनु, दृग दृग 

में फूलों के कुटिल विशिख; 

यह पीड़ा मधुमयी, मनुज 

बिंधता आ अपने आप यहाँ। 


            (०५०) 

यहाँ लता मिलती तरु से 

मधु कलियाँ हमें पिलाती हैं, 

पीती ही रहतीं यौवन रस, 

आँखें नहीं अघाती हैं। 

कर्म भूमि के थके श्रमिक को 

इस निकुञ्ज की मधुबाला 

एक घूँट में श्रान्ति मिटा कर 

बेसुध, मत्त बनाती है। 


            (०५१) 

यात्री हूँ अति दूर देश का, 

पल भर यहाँ ठहर जाऊँ, 

थका हुआ हूँ, सुन्दरता के 

साथ बैठ मन बहलाऊँ; 

’एक घूँट बस और’ हाय रे, 

ममता छोड़ चलूँ कैसे? 

दूर देश जाना है, लेकिन, 

यह सुख रोज कहाँ पाऊँ? 


            (०५२) 

’दूर देश’ हाँ ठीक, याद है, 

यह तो मेरा देश नहीं; 

इस से हो कर चलो, यहीं तक 

रुकने का आदेश नहीं। 

बजा शंख, कारवाँ चला, 

साकी, दे विदा, चलूँ मैं भी, 

कभी कभी हम गिन पाते हैं 

प्रिये! मीन औ’ मेष नहीं। 


            (०५३) 

सचमुच, मधु फल लिये मरण का 

जीवन लता फलेगी क्या? 

आग करेगी दया? चिता में 

काया नहीं जलेगी क्या? 

कहती है कल्पना, मधुर 

जीवन को क्यों कटु अन्त मिले? 

पर, जैसे छलती वह सब को 

वैसे मुझे छलेगी क्या? 


            (०५४) 

मधुबाले! तेरे अधरों से 

मुझ को रञ्च विराग नहीं, 

यह न समझना देवि! कुटिल 

तीरों के दिल पर दाग नहीं; 

जी करता है हृदय लगाऊँ, 

पल पल चूमूँ, प्यार करूँ, 

किन्तु, आह! यदि हमें जलाती 

क्रूर चिता की आग नहीं। 


            (०५५) 

दो कोटर को छिपा रहीं 

मदमाती आँखें लाल सखी! 

अस्थि तन्तु पर ही तो हैं 

ये खिले कुसुम से गाल सखी! 

और कुचों के कमल? झरेंगे 

ये तो जीवन से पहले, 

कुछ थोड़ा सा मांस प्राण का 

छिपा रहा कंकाल सखी! 


            (०५६) 

बचे गहन से चाँद, छिपाऊँ 

किधर? सोच चल होता हूँ, 

मौत साँस गिनती तब भी जब 

हृदय लगा कर सोता हूँ। 

दया न होगी हाय, प्रलय को 

इस सुन्दर मुखड़े पर भी, 

जिसे चूम हँसती है दुनियाँ, 

उसे देख मैं रोता हूँ। 


            (०५७) 

जाग, देख फिर आज बिहँसती 

कल की वही उषा आई, 

कलियाँ फिर खिल उठीं, सरित पर 

परिचित वही विभा छाई; 

रंजित मेघों से मेदुर नभ 

उसी भाँति फिर आज हँसा, 

भू पर, मानों, पड़ी आज तक 

कभी न दु:ख की परछाईं। 


            (०५८)

रँगने चलीं ओस मुख किरणें 

खोज क्षितिज का वातायन, 

जानें, कहाँ चले उड़ उड़ कर 

फूलों की ले गन्ध पवन; 

हँसने लगे फूल, किस्मत पर 

रोने का अवकाश कहाँ? 

बीते युग, पर, भूल न पाई 

सरल प्रकृति अपना बचपन। 


            (०५९) 

मैं भी हँसूँ फूल सा खिल कर? 

शिशु अबोध हो लूँ कैसे? 

पी कर इतनी व्यथा, कहो, 

तुतली वाणी बोलूँ कैसे? 

जी करता है, मत्त वायु बन 

फिरूँ; कुञ्ज में नृत्य करूँ, 

पर, हूँ विवश हाय, पंकज का 

हिम कण हूँ, डोलूँ कैसे? 


            (०६०) 

शान्त पाप! जग के जंगल में 

रो मेरे कवि और नहीं, 

सुधा सिक्त पल ये, आँसू का 

समय नहीं, यह ठौर नहीं; 

अन्तर्जलन रहे अन्तर में, 

आज वसन्त उछाह यहाँ; 

आँसू देख कहीं मुरझें 

बौरे आमों के मौर नहीं। 


            (६१) 

औ’ रोना भी व्यर्थ, मृदुल जब 

हुआ व्यथा का भार नहीं, 

आँसू पा बढ़ता जाता है, 

घटता पारावार नहीं; 

जो कुछ मिले भोग लेना है, 

फूल हों कि, हों शूल सखे! 

पश्चाताप यही कि नियति पर 

हमें स्वल्प अधिकार नहीं। 


            (०६२) 

कौन बड़ाई, चढ़े श्रृंग पर 

अपना एक बोझ ले कर! 

कौन बड़ाई, पार गये यदि 

अपनी एक तरी खे कर? 

अबुध विज्ञ की माँ यह धरती 

उस को तिलक लगाती है, 

खुद भी चढ़े, साथ ले झुक कर 

गिरतों को बाँहें दे कर। 


            (०६३) 

पत्थर ही पिघला न, कहो 

करुणा की रही कहानी क्या? 

टुकड़े दिल के हुये नहीं, 

तब बहा दृगों से पानी क्या? 

मस्ती क्या जिस को पा कर 

फिर दुनियाँ की भी याद रही? 

डरने लगी मरण से तो फिर 

चढ़ती हुई जवानी क्या? 


            (०६४) 

नूर एक वह रहे तूर पर, 

या काशी के द्वारों में; 

ज्योति एक वह खिले चिता में, 

या छिप रहे मजारों में। 

बहतीं नहीं उमड़ कूलों से, 

नदियों को कमजोर कहो; 

ऐसे हम, दिल भी कैदी है 

ईंटों की दीवारों में। 


            (०६५) 

किरणों के दिल चीर देख, 

सब में दिनमणि की लाली रे! 

चाहे जितने फूल खिलें 

पर, एक सभी का माली रे! 

साँझ हुई, छा गई अचानक 

पूरब में भी अँधियाली, 

आती उषा, फैल जाती 

पश्चिम में भी उजियाली रे! 


            (०६६) 

ठोकर मार फोड़ दे उस को 

जिस बरतन में छेद रहे, 

वह लङ्का जल जाय जहाँ 

भाई भाई में भेद रहे। 

गजनी तोड़े सोमनाथ को, 

काबे को दें फूँक शिवा, 

जले कुराँ अरबी रेतों में, 

सागर जा फिर वेद रहे। 


            (०६७) 

रह रह कूक रही मतवाली 

कोयल कुञ्ज भवन में है,

श्रवण लगा सुन रही दिशायें, 

स्थिर शशि मध्य गगन में है। 

किसी महा सुख में तन्मय 

मञ्जरी आम्र की झुकी हुई, 

अभी पूछ मत प्रिये, छिपी सी 

मृत्यु कहाँ जीवन में है। 


            (०६८) 

तू बैठी ही रही हृदय में 

चिन्ताओं का भार लिये, 

जीवन पूर्व मरण पर भेदों 

के शत जटिल विचार लिये; 

शीर्ण वसन तज इधर प्रकृति ने 

नूतन पट परिधान किया, 

आ पहुँचा, लो अतिथि द्वार पर 

नूपुर की झंकार किये। 


            (०६९) 

वृथा यत्न, पीछे क्या छूटा, 

इस रहस्य को जान सकें; 

वृथा यत्न, जिस ओर चले 

हम उसे अभी पहचान सकें। 

होगा कोई क्षण उस का भी, 

अभी मोद से काम हमें; 

जीवन में क्या स्वाद, अगर 

खुलकर हम दो पल गा न सकें? 


            (०७०) 

तुम्हें मरण का सोच निरन्तर 

तो पीयूष पिया किसने? 

तुम असीम से चकित, इसे 

सीमा में बाँध लिया किसने? 

सब आये हँस, बोल, सोच, 

कह, सुन मिट्टी में लीन हुये; 

इस अनन्य विस्मय का सुन्दरि! 

उत्तर कहो दिया किसने? 


            (०७१) 

छोड़े पोथी पत्र, मिला जब 

अनुभव में आह्लाद मुझे, 

फूलों की पत्ती पर अंकित

एक दिव्य सम्वाद मुझे; 

दहन धर्म मानव का पाया, 

अतः, दुःख भयहीन हुआ; 

अब तो दह्यमान जीवन में 

भी मिलता कुछ स्वाद मुझे। 


            (०७२) 

एक एक कर सभी शिखाओं को, 

मैं गले लगाऊँगा, 

भोगूँगा यातना कठिन 

दुर्वह सुख भार उठाऊँगा; 

रह न जाय अज्ञेय यहाँ कुछ, 

आया तो इतना कर लूँ; 

बढ़ने दो, जीवन के अति से 

अधिक निकट मैं जाऊँगा। 


            (०७३) 

मधु पूरित मञ्जरी आम्र की 

देखो, नहीं सिहरती है; 

चू न जाय रस कोष कहीं, 

इस से मन ही मन डरती है! 

पर, किशोर कोंपलें विटप की 

निज को नहीं सम्भाल सकीं, 

पा ऋतुपति का ताप द्रवित 

उर का रस अर्पित करती है। 


            (०७४) 

प्राणों में उन्माद वर्ष का, 

गीतों में मधु कण भर लें; 

जड़ चेतन बिंध रहे, हृदय पर 

हम भी केशर के शर लें। 

यह विद्रोही पर्व प्रकृति का 

फिर न लौट कर आवेगा; 

सखि! बसन्त को खींच हृदय में 

आओ आलिंगन कर लें। 


            (०७५) 

पहली सीख यही जीवन की, 

अपने को आबाद करो, 

बस न सके दिल की बस्ती, 

तो आग लगा बरबाद करो। 

खिल पायें, तो कुसुम खिलाओ, 

नहीं? करो पतझाड़ इसे, 

या तो बाँधो हृदय फूल से, 

याकि इसे आजाद करो। 


            (०७६) 

मैं न जानता था अब तक, 

यौवन का गरम लहू क्या है; 

मैं पीता क्या निर्निमेष? 

दृग में भर लाती तू क्या है? 

तेरी याद, ध्यान में तेरे 

विरह निशा कटती सुख से, 

हँसी हँसी में किन्तु, हाय, 

दृग से पड़ता यह चू क्या है? 


            (०७७) 

उमड़ चली यमुना प्राणों की, 

हेम कुम्भ भर जाओ तो; 

भूले भी आ कभी तीर पर 

नूपुर सजनी! बजाओ तो। 

तनिक ठहर तट से झुक देखो, 

मुझ में किस का बिम्ब पड़ा? 

नील वारि को अरुण करो, 

चरणों का राग बहाओ तो। 


            (०७८) 

दौड़ दौड़ तट से टकरातीं 

लहरें लघु रो रो सजनी! 

इन्हें देख लेने दो जी भर, 

मुख न अभी मोड़ो सजनी! 

आज प्रथम संध्या सावन की, 

इतनी भी तो करो दया, 

कागज की नौका में धीरे 

एक दीप छोड़ो सजनी! 


            (०७९) 

प्रकृति अचेतन दिव्य रूप का 

स्वागत उचित सजा न सकी, 

ऊषा का पट अरुण छीन 

तेरे पथ बीच बिछा न सकी। 

रज न सकी बन कनक रेणु, 

कंटक को कोमलता न मिली, 

पग पग पर तेरे आगे वसुधा 

मृदु कुसुम खिला न सकी। 


            (०८०) 

अब न देख पाता कुछ भी यह 

भक्त विकल, आतुर तेरा, 

आठों पहर झूलता रहता 

दृग में श्याम चिकुर तेरा। 

अर्थ ढूँढते जो पद में, 

मैं क्या उन को निर्देश करूँ? 

चरण चरण में एक नाद, 

बजता केवल नूपुर तेरा। 


            (०८१) 

पूजा का यह कनक दीप 

खण्डहर में आन जलाया क्यों? 

रेगिस्तान हृदय था मेरा, 

पाटल कुसुम खिलाया क्यों? 

मैं अन्तिम सुख खोज रहा था 

तप्त बालुओं में गिर कर। 

बुला रहा था सर्वनाश को 

यह पीयूष पिलाया क्यों? 


            (०८२) 

तुझे ज्ञात जिस के हित इतना 

मचा रही कल रोर, सखी! 

खड़ा पान्थ वह उस पथ पर 

जाता जो मरघट ओर, सखी! 

यह विस्मय! जञ्जीर तोड़ 

कल था जिसने वैराग्य लिया, 

आज उसी के लिये हुआ 

फूलों का पाश कठोर, सखी! 


            (०८३) 

बोल, दाह की कोयल मेरी, 

बोल दहकती डारों पर, 

अर्द्ध दग्ध तरु की फुनगी पर, 

निर्जल सरित कगारों पर। 

अमृत मन्त्र का पाठ कभी 

मायाविनि! मृषा नहीं होता, 

उगी जा रहीं नई कोंपलें 

तेरी मधुर पुकारों पर। 


            (०८४) 

दृग में सरल ज्योति पावन, 

वाणी में अमृत सरस क्या है? 

ताप विमोचन कुछ अमोघ 

गुणमय यह मधुर परस क्या है? 

धूलि रचित प्रतिमे! तुम भी तो 

मर्त्य लोक की एक कली, 

ढूँढ़ रहा फिर यहाँ विरम 

मेरा मन चकित, विवश क्या है? 


            (०८५) 

चिर जाग्रत वह शिखा, जला तू 

गई जिसे मंगल क्षण में; 

नहीं भूलती कभी, कौंध 

जो विद्युत समा गई घन में। 

बल समेट यदि कभी देवता 

के चरणों में ध्यान लगा; 

चिकुर जाल से घिरा चन्द्र मुख 

सहसा घूम गया मन में। 


            (०८६) 

अमित बार देखी है मैंने 

चरम रूप की वह रेखा, 

सच है, बार बार देखा 

विधि का वह अनुपमेय लेखा। 

जी भर देख न सका कभी, 

फिर इन्द्र जाल दिखलाओ तो, 

बहुत बार देखा, पर लगता 

स्यात्, एक दिन ही देखा। 


            (०८७) 

हेर थका तू भेद, गगन पर 

क्यों उडु राशि चमकती है? 

देख रहा मैं खड़ा, मगन 

आँखों की तृषा न छकती है। 

मैं प्रेमी, तू ज्ञान विशारद, 

मुझ में, तुझ में भेद यही, 

हृदय देखता उसे, तर्क से 

बुद्धि न जिसे समझती है। 


            (०८८) 

उसे पूछ विस्मृति का सुख क्या, 

लगा घाव गम्भीर जिसे, 

जग से दूर हटा ले बैठी 

दिल की प्यारी पीर जिसे। 

जागरुक ज्ञानी बन कर जो 

भेद नहीं तू जान सका, 

पूछ, बतायेगा, फूलों की 

बाँध चुकी जंजीर जिसे। 


            (०८९) 

हर साँझ एक वेदना नई, 

हर भोर सवाल नया देखा; 

दो घड़ी नहीं आराम कहीं, 

मैंने घर घर, जा जा देखा। 

जो दवा मिली पीड़ाओं को, 

उस में भी कोई पीर नई; 

मत पूछ कि तेरी महफिल में 

मालिक, मैंने क्या क्या देखा। 


            (०९०) 

जिनमें बाकी ईमान, अभी 

वे भटक रहे वीरानों में, 

दे रहे सत्य की जाँच 

आखिरी दम तक रेगिस्तानों में। 

ज्ञानी वह जो, हर कदम धरे 

बच कर तप की चिनगारी से, 

जिन को मस्तक का मोह नहीं, 

उन की गिनती नादानों में। 


            (०९१) 

मैंने देखा आबाद उन्हें 

जो साथ जीस्त के जलते थे, 

मंजिलें मिलीं उन वीरों को 

जो अंगारों पर चलते थे। 

सच मान, प्रेम की दुनियाँ में 

थी मौत नहीं, विश्राम नहीं, 

सूरज जो डूबे इधर कभी, 

तो जा कर उधर निकलते थे। 


            (०९२) 

तुम भीख माँगने जब आये, 

धरती की छाती डोल उठी, 

क्या ले कर आऊँ पास? निःस्व 

अभिलाषा कर कल्लोल उठी। 

कूदूँ ज्वाला के अंक बीच, 

बलिदान पूर्ण कर लूँ जब तक, 

"मत रङ्गो रक्त से मुझे", बिहँस 

तसवीर तुम्हारी बोल उठी। 


            (०९३) 

अब साँझ हुई, किरणें समेट 

दिनमान छोड़ संसार चला, 

वह ज्योति तैरती ही जाती, 

मैं डाँड़ चलाता हार चला। 

"दो डाँड़ और दो डाँड़ लगा", 

दो डाँड़ लगाता मैं आया, 

दो डाँड़ लगी क्या नहीं? हाय, 

जग की सीमा कर पार चला। 


            (०९४) 

छवि के चिन्तन में इन्द्रधनुष सी 

मन की विभा नवीन हुई, 

श्लथ हुए प्राण के बन्ध, चेतना 

रूप जलधि में लीन हुई। 

अन्तर का रङ्ग उँड़ेल प्यार से 

जब तूने मुझ को देखा, 

दृग में गीला सुख बिहँस उठा, 

शबनम मेरी रङ्गीन हुई। 


            (०९५) 

पी चुके गरल का घूँट तीव्र, 

हम स्वाद जीस्त का जान चुके, 

तुम दुःख, शोक बन बन आये, 

हम बार बार पहचान चुके। 

खेलो नूतन कुछ खेल, देव! 

दो चोट नई, कुछ दर्द नया, 

यह व्यथा विरस निःस्वाद हुई, 

हम सार भाग कर पान चुके। 


            (०९६) 

खोजते स्वप्न का रूप शून्य 

में निरवलम्ब अविराम चलो, 

बस की बस इतनी बात, पथिक! 

लेते अरूप का नाम चलो। 

जिन को न तटी से प्यार, उन्हें 

अम्बर में कब आधार मिला? 

यह कठिन साधना भूमि, बन्धु! 

मिट्टी को किये प्रणाम चलो। 


            (०९७) 

बाँसुरी विफल, यदि कूक कूक 

मरघट में जीवन, ला न सकी, 

सूखे तरु को, पनपा न सकी, 

मुर्दों को, छेड़ जगा न सकी। 

यौवन की वह मस्ती कैसी 

जिस को अपना ही मोह सदा? 

जो मौत देख ललचा न सकी, 

दुनियाँ में आग लगा न सकी। 


            (०९८) 

पी ले विष का भी घूँट बहक, 

तब मजा सुरा पीने का है, 

तन कर बिजली का वार सहे, 

यह गर्व नये सीने का है। 

सिर की कीमत का भान हुआ, 

तब त्याग कहाँ? बलिदान कहाँ? 

गरदन इज्जत पर दिये फिरो, 

तब मजा यहाँ जीने का है। 


            (०९९) 

धरती से व्याकुल आह उठी, 

मैं दाह भूमि का सह न सका, 

दिल पिघल पिघल उमड़ा लेकिन, 

आँसू बन बन कर बह न सका। 

है सोच मुझे दिन रात यही, 

क्या प्रभु को मुख दिखलाऊँगा? 

जो कुछ कहने मैं आया था, 

वह भेद किसी से कह न सका। 


            (१००) 

रंगीन दलों पर जो कुछ था, 

तस्वीर एक वह फानी थी, 

लाली में छिप कर झाँक रही 

असली दुनियाँ नूरानी थी। 

मत पूछ फूल की पत्ती में 

क्या था कि देख खामोश हुआ? 

तूने समझा था मौन जिसे, 

मेरे विस्मय की बानी थी। 


            (१०१) 

चाँदनी बनाई, धूप रची, 

भूतल पर व्योम विशाल रचा, 

कहते हैं, ऊपर स्वर्ग कहीं, 

नीचे कोई पाताल रचा। 

दिल जले देहियों को केवल 

लीला कह कर सन्तोष नहीं; 

ओ रचने वाले! बता, हाय! 

आखिर क्यों यह जञ्जाल रचा? 


            (१०२) 

था अनस्तित्त्व सकता समेट 

निज में क्या यह विस्तार नहीं? 

भाया न किसे चिर शून्य, बना 

जिस दिन था यह संसार नहीं? 

तू राग मोह से दूर रहा, 

फिर किस ने यह उत्पात किया? 

हम थे जिस में, उस ज्योति या कि 

तम से था किस को प्यार नहीं? 


            (१०३) 

सम्पुटित कोष को चीर, बीज 

कण को किस ने निर्वास दिया? 

किस को न रुचा निर्वाण? मिटा 

किस ने तुरीय का वास दिया? 

चिर तृषावन्त कर दूर किया 

जीवन का देकर शाप हमें, 

जिस का न अन्त वह पन्थ, लक्ष्य 

सीमा विहीन आकाश दिया। 


            (१०४) 

क्या सृजन तत्त्व की बात करें, 

मिलता जिस का उद्देश नहीं? 

क्या चलें? मिला जो पन्थ हमें 

खुलता उस का निर्देश नहीं। 

किससे अपनी फरियाद करें? 

मर मर, जी जी चलने वाले? 

गन्तव्य अलभ, जिस से हो कर 

जाते वह भी निज देश नहीं। 


            (१०५) 

कितने आये जो शून्य बीच 

खोजते विफल आधार चले, 

जब समझ नहीं पाया जग को, 

कह असत् और निस्सार चले। 

माया को छाया जान भूला, 

पर, वे कैसे निश्चिंत चलें? 

अगले जीवन की ओर लिये 

सिर पर जो पिछला भार चले।


            (१०६) 

जो सृजन असत्, तो पुण्य पाप 

का श्वेत नील बन्धन क्यों है? 

स्वप्नों के मिथ्या तन्तु बीच 

आबद्ध सत्य जीवन क्यों है? 

हम स्वयम् नित्य, निर्लिप्त अरे, 

तो क्यों शुभ का उपदेश हमें? 

किस चिन्त्य रूप का अन्वेषण? 

यह आराधन पूजन क्यों है? 


            (१०७) 

यह भार जन्म का बड़ा कठिन, 

कब उतरेगा, कुछ ज्ञात नहीं, 

धर इसे कहीं विश्राम करें, 

अपने बस की यह बात नहीं। 

सिर चढ़ा भूत यह हाँक रहा, 

हम ठहर नहीं पाये अब तक, 

जिस मञ्जिल पर की शाम, वहाँ 

करने को रुके प्रभात नहीं। 


            (१०८)

हर घड़ी प्यास, हर रोज जलन, 

मिट्टी में थी यह आग कहाँ? 

हमसे पहले था दु:खी कौन? 

था अमिट व्यथा का राग कहाँ? 

लो जन्म; खोजते मरो विफल; 

फिर जन्म; हाय, क्या लाचारी! 

हम दौड़ रहे जिस ओर सतत, 

वह अव्यय अमिय तड़ाग कहाँ? 


            (१०९) 

गत हुए अमित कल्पान्त, सृष्टि 

पर, हुई सभी आबाद नहीं, 

दिन से न दाह का लोप हुआ, 

निशि ने छोड़ा अवसाद नहीं। 

बरसी न आज तक वृष्टि जिसे 

पी कर मानव की प्यास बुझे 

हम भली भाँति यह जान चुके 

तेरी दुनियाँ में स्वाद नहीं। 


            (११०) 

हम ज्यों ज्यों आगे बढ़े, दृष्टि पथ 

से छिपता आलोक गया, 

सीखा ज्यों ज्यों नव ज्ञान, हमें 

मिलता त्यों त्यों नव शोक गया। 

हाँ, जिसे प्रेम हम कहते हैं, 

उस का भी मोल पड़ा देना, 

जब मिली संगिनी, अदन गया, 

कर से विरागमय लोक गया। 


            (१११) 

भू पर उतरे जिस रोज, धरी 

पहिले से ही जञ्जीर मिली, 

परिचय न द्वन्द्व से था, लेकिन, 

धरती पर सञ्चित पीर मिली। 

जब हार दुखों से भाग चले, 

तब तक सत्पथ का लोप हुआ, 

जिस पर भूले सौ लोग गये, 

सम्मुख वह भ्रान्त लकीर मिली। 


            (११२) 

नव नव दु:ख की ज्वाला कराल, 

जलता अबोध संसार रहे, 

हर घड़ी सृष्टि के बीच गूँजता 

भीषण हाहाकार रहे। 

कर नमन तुझे किस आशा में 

हम दुःख शोक चुपचाप सहें? 

मालिक कहने को तुझे हाय, 

क्यों दु:खी जीव लाचार रहे? 


            (११३) 

भेजा किसने? क्यों? कहाँ? 

भेद अब तक न, क्षुद्र यह जान सका। 

युग युग का मैं यह पथिक श्रान्त 

अपने को अब तक पा न सका। 

यह अगम सिन्धु की राह, और 

दिन ढला, हाय! फिर शाम हुई; 

किस कूल लगाऊँ नाव? घाट 

अपना न अभी पहचान सका। 


            (११४) 

हम फूल फूल में झाँक थके, 

तुम उड़ते फिरे बयारों में, 

हमने पलकें कीं बन्द, छिटक 

तुम हँसने लगे सितारों में। 

रो कर खोली जब आँख, तुम्हीं 

सा आँसू में कुछ दीख पड़ा, 

उँगली छूने को बढ़ी, तभी 

तुम छिपे ढुलक नीहारों में। 


            (११५) 

तिल तिल कर हम जल चुके, 

विरह की तीव्र आँच कुछ मन्द करो, 

सहने की अब सामर्थ्य नहीं, 

लीला प्रसार यह बन्द करो। 

चित्रित भ्रम जाल समेट धरो, 

हम खेल खेलते हार चुके, 

निर्वापित करो प्रदीप, शून्य में 

एक तुम्हीं आनन्द करो। 


                 ❤️ 

 

🌹🌻🌼🌹🌼🌻🌹

रविवार, 18 अक्तूबर 2020

किताब

 किताब गली / घूमो मगर प्यार से 


कई बार गंभीर व्यंग्य की तीक्ष्णता से आम पाठक उचटने लगते हैं, जबकि बाज दफा हास्य की अधिक मात्रा विषय को ही हल्का कर देती है। इस चुनौती के बीच, अर्चना चतुर्वेदी के व्यंग्य ‘मध्यमार्गी’ हैं और धीमी रफ्तार से जोर का झटका लगा देते हैं...


 


घूरो मगर प्यार से


व्यंग्यकार : अर्चना चतुर्वेदी


प्रकाशक : भावना प्रकाशन, दिल्ली


मूल्य : 195 रुपए


 


व्यंग्य में साफ नज़र आते किरदार


भवानी प्रसाद मिश्र ‘कलम अपनी साध’ का आह्वान करते हुए लिखते हैं – ‘जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख / और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख’। इस तरह वे लेखन में सहज और ईमानदार होने की सीख देते हैं। व्यंग्यकार अर्चना चतुर्वेदी के जीवन और सृजन पर ये बात अलहदा तरीके से लागू होती है। वे स्वयं स्पष्ट और बिंदास हैं और उनका लेखन भी इसका प्रतिबिंब है।


अर्चना ने नए व्यंग्य संग्रह ‘घूरो मगर प्यार से’ में धारदार शैली बरकररार रखी है और सामाजिक विसंगतियों पर मीठी चुटकी भी ली है। गौरतलब है कि व्यंग्य में जब हास्य समाहित होता है, तब उसकी तीक्ष्णता कम हो जाती है। बावजूद इसके समकालीन व्यंग्य लेखन अधिकतर जगह हंसगुल्ले बन गया है। इस स्थिति से निराशा होती है, लेकिन अर्चना की सफलता कहेंगे कि वे मध्यमार्ग का निर्माण कर पाई हैं। उनका व्यंग्य एकबारगी तो घायल नहीं करता, लेकिन ऐसे निशान ज़रूर बना देता है, जिससे देर में, देर तक दर्द होता रहता है।


अर्चना हास्य की चाशनी में मिर्च के पकौड़े डुबाकर रखने के कौशल से लैस हैं। ये कला उन्हें अलग स्तर तक पहुंचाती है। 49  व्यंग्य आलेखों के संग्रह में एक रचना ‘कविवर, कैब और कन्या’ याद आती है। इसमें कैब यात्रा के दौरान लोलुप कविवर ‘हनी ट्रैप’ का शिकार हो जाते हैं। ये देखना मनोरंजक है और साहित्य जगत में आई गिरावट भी बयां करता है।


पिछले एक दशक से व्यंग्य की दुनिया में सक्रिय अर्चना चतुर्वेदी ने लेखक समाज की कुरीतियों और कृत्रिमता पर बेधड़क कलम चलाई है। ‘जंग बहादुर की पहली किताब’, ‘लेखक की आत्मा’, ‘साहित्यिक दिगम्बर’, ‘हिंदी की व्यथा’ जैसी रचनाएं इसका नायाब उदाहरण हैं। दृश्य-श्रव्य माध्यमों से जुड़ाव के चलते उनके व्यंग्य में भरपूर चित्रात्मकता है, जो अर्चना के लेखक को लाभ पहुंचाती है। दरअसल, राजनीति पर व्यंग्य लिखना कदरन सरल है, क्योंकि वहां वर्णित पात्रों की देह भाषा और चरित्र की बुनावट पाठक के जेहन में पहले से छपी होती है, लेकिन सामाजिक मुद्दों पर लिखा व्यंग्य पढ़ते समय ‘इमेजिनेशन’ का सहारा लेना पड़ता है। अर्चना की बिंबात्मकता यहीं पर कारगर सिद्ध होती है। वे हमारे आसपास के लोगों, रिश्तों, चाल-बनावट और व्यवहार को व्यंग्य का विषय बनाती हैं, फिर भी उनके किरदार साफ नज़र आते हैं।


-    चण्डीदत्त शुक्ल

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

दुर्लभ ग्रंथ

 अति दुर्लभ एक ग्रंथ ऐसा भी है हमारे सनातन धर्म मे


इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए ---


यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ


क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो राम कथा के रूप में पढ़ी जाती है और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े

तो कृष्ण कथा के रूप में होती है ।


जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है।


इस ग्रन्थ को

‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे

पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और

विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा (उल्टे यानी विलोम)के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक।


पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।"


उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः


वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।

रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥


अर्थातः

मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो

जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।


अब इस श्लोक का विलोमम्: इस प्रकार है


सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥


अर्थातः

मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के

चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ

विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।


" राघवयादवीयम" के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-


राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।

रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥


विलोमम्:

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥


साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।

पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥


विलोमम्:

वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।

राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥


कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।

सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥


विलोमम्:

भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।

कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥


रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।

नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥


विलोमम्:

यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।

तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥


यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।

तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥


विलोमम्:

तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।

सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥


मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।

काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥


विलोमम्:

तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।

तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥


रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।

कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥


विलोमम्:

मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।

तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥


सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।

साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥


विलोमम्:

हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।

यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥


सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।

सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥


विलोमम्:

सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।

यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥


तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।

यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥


विलोमम्:

हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।

सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥


वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।

भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥


विलोमम्:

सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।

होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥


यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।

सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥


विलोमम्:

भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।

वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥


रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।

यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥


विलोमम्:

नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।

हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥


यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।

सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥


विलोमम्:

यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।

गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥


दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।

ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥


विलोमम्:

नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।

हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥


सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।

तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥


विलोमम्:

हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।

जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥


सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।

न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७ विलोमम्:

तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।

सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥


तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।

वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥


विलोमम्:

केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।

ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥


गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।

सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥


विलोमम्:

हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।

यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥


हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।

राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥


विलोमम्:

घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।

धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥


ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।


हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ २१॥


विलोमम्:

विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।

ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥


भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।

चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥


विलोमम्:

ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।

हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥


हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।

तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥


विलोमम्:

योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।

जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥


भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।

तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥


विलोमम्:

विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।

तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥


हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।

राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥


विलोमम्:

यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।

निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥


सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।

तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥


विलोमम्:

जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।

हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥


वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।

तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥


विलोमम्

नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।

सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥


हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।

चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥


विलोमम्

हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।

सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥


नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।

रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥


विलोमम्:

नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।

कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥


साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥

निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥


विलोमम्:

भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।स

गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥


॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री ।।


कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें कि यह दुनिया में कहीं भी ऐसा न पाया जाने वाला ग्रंथ है ।

जय श्री कृष्णा....

साभार...

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2020

रिया रिया रिया का चक्कर

 Riyहर तरफ रिया ही रिया.../ राज किशोर सत्संगी 


का

एक मेधावी छात्र, छोड़ इंजीनियरिंग, पहुंच गया मुंबई 'नगरिया'


फिल्में क्या हिट हुईं, जौहर-खान की आंख में 'किरकिरिया'


रिया आई जिंदगी में, देख सुशांत की भरी हुई 'तिजोरिया'


करके काला जादू, बन बैठी बिन-व्याहे उसकी 'गुजरिया'


बुला लाई भूत-प्रेत, वह तो बेचारा चैन से कर रहा था 'बसरिया'


यूरोप का ट्रिप, घिरा मानसिक-अवसाद का बादल 'घनेरिया' 


नशा ना टूटे, उसी के पैसे से लाती ड्रग्स की भर-भर 'गगरिया'


जब तक सब ठीक, तब तक था वह भला-मानुष साजन 'सांवरिया'


आई दिशा, खुला भेद, लड़ी-भागी, बदल ली अपनी 'नजरिया'


मोबाइल पर किया ब्लॉक, ना ली कोई खोज ना 'खबरिया' 


तेरह की रात, कैमरे बंद, फांद कर आया कोई 'चाहरदीवरिया'


टपकवाकर निर्दयता से, खुश हुई, इस्टा पर मटकाई अपनी 'कमरिया' 


मौत में रहस्य गहरा, होना ही था, हुआ जग 'जाहिरिया' 


दोष मढ़े सुशांत पर, आज-तक पे, बैठ बीच 'बजरिया'


बोल रही है, वह था पहले से डरपोक-नशेड़ी और 'बीमरिया'


अपने को सुपर स्मार्ट, सभी को समझ रही ढोल 'गंवरिया'


इतराती फिर रही ओढ़कर, अंडरवर्ल्ड की 'छतरिया' 


किया कीमती वकील, महेश भट्ट की कर रही 'शुकरिया'


सीबीआई कितना भी पूछे, बन जाती है 'झिंगुरिया'


ED-CBI-NCB देख एक साथ, पूरे परिवार को हुआ 'डायरिया'


फिल्म व ड्रग्स की संग-संग, दिखती एक ही 'डगरिया' 


जनता टकटकी लगाए टीवी पर, छूटी पड़ी है जो उनकी 'नौकरिया'


गर होती यूपी पुलिस, निकाल देती नौटंकी, ना कर पाती वह कोई 'तिरिया'


नचा रही है ऊंगली पर सबको, मदारी नचावे जैसे बंदर 'बंदरिया' 


सहमी-सकपकाई भी हुई है, छाई देखकर गिरफ्तारी की काली 'बदरिया'


मीडिया से बच रही, पहन के हुड, तो कभी ओढ़कर 'चुनरिया'


बन के एक विष-कन्या, उजाड़ दी एक चमकते सितारे की, अच्छी-खासी हरी-भरी 'फुलवरिया'

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(राज किशोर सतसंगी)

शनिवार, 10 अक्तूबर 2020

परंपरा, संस्कृति और ज्ञान पर आधारित है नयी शिक्षा नीति : संजय द्विवेदी

*'ग्लोबल सिटीजन' तैयार करेगी नई शिक्षा नीति : प्रो. द्विवेदी*


*कोलकाता, 10 अक्टूबर ।* ''नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों को अपनी परंपरा, संस्कृति और ज्ञान के आधार पर 'ग्लोबल सिटीजन' बनाते हुये उन्हें भारतीयता की जड़ों से जोड़े रखने पर आधारित है।'' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक *प्रो. संजय द्विवेदी* ने रविवार को भारतीय संस्कृति संसद, कोलकाता द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त किए। 


दो सत्रों में आयोजित इस संगोष्ठी के पहले सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार *राहुल देव* ने की। कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल *श्री केसरी नाथ त्रिपाठी* भी विशिष्ट तौर पर उपस्थित थे। 


*'राष्ट्रीय शिक्षा नीति और आज का समय'* विषय पर मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए *प्रो. द्विवेदी* ने कहा कि नई शिक्षा नीति सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ व्यवहारपरक ज्ञान पर बल देती है, जिससे बच्चों के कंधे से बैग के बोझ को हल्का करते हुये उनको भावी जीवन के लिये तैयार किया जा सके। इसके अलावा वैदिक गणित, दर्शन और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विषयों को महत्त्व देने की कवायद भी नई शिक्षा नीति में की गई है।


प्रो. द्विवेदी ने कहा कि इस शिक्षा नीति का सबसे बड़ा पहलू ये है कि इस नीति से शिक्षा की गुणवत्ता और उपयोगिता, दोनों को ही बल मिलेगा। स्कूली स्तर पर ही छात्रों को किसी न किसी कार्य कौशल से जोड़ दिया जाएगा। इसका अर्थ है, जब बच्चा स्कूल से पढ़कर निकलेगा, तो उसके पास एक ऐसा हुनर होगा, जिसका वह आगे की जिंदगी में इस्तेमाल कर सकता है। उन्होंने कहा ​कि यह सिर्फ एक नीतिगत दस्तावेज नहीं है, बल्कि 130 करोड़ से अधिक भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है।


उन्होंने कहा कि 21वीं सदी ज्ञान की सदी है। यह सीखने और अनुसंधान की सदी है। और इस संदर्भ में भारत की नई शिक्षा नीति अपनी शिक्षा प्रणाली को छात्रों के लिए सबसे आधुनिक और बेहतर बनाने का काम कर रही है। इस शिक्षा नीति के माध्यम से हम सीखने की उस प्रक्रिया की तरफ बढ़ेंगे, जो जीवन में मददगार हो और सिर्फ रटने की जगह तर्कपूर्ण तरीके से सोचना सिखाए।   


संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार *राहुल देव* ने कहा कि नई शिक्षा नीति में शिक्षा के अभूतपूर्व ढांचे को प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा कि हर बच्चा विशिष्ट है और उसकी क्षमताओं के आधार पर उसके विकास की बात नई शिक्षा नीति करती है। पांचवी कक्षा तक, शिक्षा प्रदान करने के माध्यम के रूप में मातृभाषा को बढ़ावा देने की पहल, सरकार का एक महत्वपूर्ण और प्रशंसनीय निर्णय है।  


इस संगोष्ठी के दूसरे सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति *डॉ. गिरीश्वर मिश्र* ने की। इस सत्र में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति *प्रो. बलदेव भाई शर्मा* और नेशनल लाइब्रेरी के पूर्व महानिदेशक *डॉ. अरुण चक्रवर्ती* ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इस आयोजन में भारतीय संस्कृति संसद के अध्यक्ष *डॉ. बिट्ठलदास मूंधड़ा* एवं सचिव *विजय झुनझुनवाला* एवं *राजेश दूगड़* भी मौजदू थे। संगोष्ठी का संचालन *डॉ. तारा दूगड़* ने किया।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

4 मिले 64 खिले

 *ये चमत्कार हिंदी में ही हो सकता है …!!*


*चार मिले चौसठ खिले, बीस रहे कर जोड़!*

*प्रेमी-प्रेमी दो मिले, खिल गए सात करोड़!!*


मुझसे एक बुजुर्गवार ने इस कहावत का अर्थ पूछा। काफी सोच-विचार के बाद भी जब मैं बता नहीं पाया, तब मैंने कहा – बाबा आप ही बताइए, मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा।


तब एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ बाबा समझाने लगे – 


देखो भाग्यवान, यह बड़े रहस्य की बात है – *चार मिले –* मतलब जब भी कोई मिलता है, तो सबसे पहले आपस में दोनों की आंखें मिलती हैं। इसलिए कहा, चार मिले।


फिर कहा, *चौसठ खिले –* यानि बत्तीस-बत्तीस दांत – दोनों के मिलाकर चौसठ हो गए – इस तरह “चार मिले, चौसठ खिले” – हुआ!


*“बीस रहे कर जोड़”* – दोनों हाथों की दस उंगलियां – दोनों व्यक्तियों की 20 हुईं – बीसों मिलकर ही एक-दूसरे को प्रणाम की मुद्रा में हाथ बरबस उठ ही जाते हैं!


वैसे तो शरीर में रोम की गिनती करना असम्भव है, लेकिन मोटा-मोटा अर्थात् अनुमानतः साढ़े तीन करोड़ कहते हैं कहने वाले। तो कवि ने अंतिम रहस्य भी प्रकट कर दिया *– “प्रेमी प्रेमी दो मिले – खिल गए सात करोड़!”*


ऐसा अंतर्हृदय में बसा हुआ प्रिय व्यक्ति जब कोई मिलता है, तो रोम-रोम खिलना स्वाभाविक ही है भाई।


जैसे ही कोई ऐसा मिलता है, तो कवि ने अंतिम पंक्ति में पूरा रस निचोड़ दिया – *“खिल गए सात करोड़”* यानि हमारा रोम-रोम खिल जाता है!


भई वाह, आनंद आ गया। हमारी हिंदी कहावतों में कितना सार छुपा है। एक-एक शब्द चाशनी में डूबा हुआ। 👌😊

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

रानी दुर्गावती की जय हो

 52 में से 51 युद्धों की विजेता, गोंडवाना की महान वीरांगना रानी दुर्गावती जी की 496वीं जयंती पर कोटि-कोटि नमन


रानी दुर्गावती जी ने 3 बार मालवा के बाज बहादुर और 2 बार अकबर की फ़ौजों को परास्त किया था।


अकबर की फौज के खिलाफ हुए अंतिम युद्ध में एक तीर रानी की दाईं आंख में लगा जिसे उन्होंने निकाल फेंका पर एक नुकीला हिस्सा आंख में ही अटक गया। दूसरा तीर गर्दन पर लगा जिसे भी उन्होंने निकाल फेंका। जब बेहोशी छाने लगी तब रानी दुर्गावती जी को लगा कि मुगल उन्हें जीवित पकड़ना चाहते हैं, तो घायलावस्था में ही रानी दुर्गावती जी ने अपने सेनापति आधारसिंह से कहा कि मुझ पर कटारी मारो। आधारसिंह ने ऐसा करने से मना किया, तो रानी दुर्गावती जी ने आधारसिंह को कहा कि "धिक्कार है तुम्हारी वीरता पर जो तुमने मेरे लिए इस अपमान को चुना"


इतना कहकर रानी सा ने कटारी अपनी छाती में घोंपकर शत्रुओं के मंसूबों पर पानी फेर दिया।


पोस्ट लेखक :- तनवीर सिंह सारंगदेवोत


#gondwana #jabalpur #ranidurgawati #chandel

सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

बस्तर में बस्तर की कहानियाँ

 कहानियों  का द्वीप है बस्तर :  प्रो. द्विवेदी*


*नई दिल्ली, 5 अक्टूबर ।* ''बस्तर हमेशा कहानियों का द्वीप रहा है। यहां के लोक जीवन के किस्से पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं।'' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक *प्रो. संजय द्विवेदी* ने लेखक एवं आईटीबीपी के डिप्टी कमान्डेंट कमलेश कमल की बेस्टसेलर किताब *'ऑपरेशन बस्तर'* के दूसरे संस्करण के ऑनलाइन लोकार्पण समारोह में व्यक्त किए।  


कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष *श्री धरमलाल कौशिक* मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए। लेखक एवं पत्रकार *पंकज झा* ने मुख्य वक्ता के तौर पर अपने विचार व्यक्त किये।   


समारोह की अध्यक्षता करते हुए *प्रो. द्विवेदी* ने कहा कि भारत कथाओं का देश है और  कहानियां हमारे लोकजीवन का आईना हैं। उन्होंने कहा कि जिसका मन लोक में रमता है, वही लोकजीवन की कहानियां सुना सकता है। 'ऑपरेशन बस्तर' के लेखक कमलेश कमल ने बस्तर के दर्द को अपनी लेखनी के माध्यम से इस किताब में उकेरा है।   


प्रो. द्विवेदी ने कहा कि साहित्य हमारे समाज का दर्पण है। साहित्य सुविचारित और संवेदनाओं के साथ लिखा जाता है और संवेदनशील मनुष्य ही अच्छा साहित्यकार हो सकता है। उन्होंने कहा कि साहित्य ही किसी इंसान को मनुष्य बनाता है।


इस अवसर पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष *श्री धरमलाल कौशिक* ने कहा कि लेखक कमलेश कमल ने बस्तर में अपने सेवाकाल के दौरान अपने अनुभवों को किताब की शक्ल दी है, जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। विषम परिस्थतियों में रह कर लेखन को जीवन का हिस्सा बनाना एक कठिन कार्य है, लेकिन ये कार्य उन्होंने किया है। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता *पंकज झा* ने कहा कि मौन और मुखरता के बीच रचनाधर्मिता के लिये जुटना एक साहसिक कार्य है। जिस तरह लेखक कमलेश कमल ने बस्तर की सजीव कहानी को 'ऑपरेशन बस्तर' के माध्यम से प्रस्तुत किया है, वह विस्मित करता है। 


कार्यक्रम का संचालन युवा आलोचक *पीयूष द्विवेदी* ने किया। लेखक *कमलेश कमल* ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए पाठकों के प्रति विशेष आभार प्रकट किया, जिन्होंने इस किताब को बेस्टसेलर बनाया। कार्यक्रम के अंत में पुस्तक के प्रकाशक यश पब्लिकेशंस के निदेशक *जतिन भारद्वाज* ने आयोजन की सफलता पर सभी के प्रति आभार प्रकट किया।

रविवार, 4 अक्तूबर 2020

हे गाँधी माफ करो

 हे गांधी मुझको माफ करो, मै झूठ नहीं लिख पाउँगा।

राष्ट्रपिता कहने से पहले, अपनी नजरों में गिर जाऊँगा।।


माना आजादी के हवनकुंड में, तुमने भी था हव्य चढ़ाया।

लाठी खायी जेल गए थे, सत्याग्रह उपवास कराया।।


छलछंद खेल कर किसने, सुभाष का निष्कासन करवाया था?

तुम नेहरू से नेह कर रहे, हमने योद्धा वीर गंवाया था।।


भगत सिंह से क्रांतिपुत्र, क्यों तुमको बागी लगते थे?

झूल गये फांसी के फंदे, क्यों तुमको दागी लगते थे??


जलियांवाला बाग़ की ज्वाला, समझा तुमने फ़ाग था जी।

लगता है कि मन मंदिर में, बैठा जहरीला नाग था जी?


भारत माता के टुकड़े तुमने, नेहरू हेतु करा डाला।

और बहा घड़ियाली आँसू, सांपो को यहाँ बसा पाला।।


भगवा तुम्हे खटकता था, और हरा हो गया प्यारा जी।

बकरी बनी तुम्हारी माता, गाय विदेशी चारा जी।।


पय पान कराती गाय यहाँ, बूचड़खाने में कट जाती है।

गांधी तेरी अहिंसा आखिर, किस कोने में मर जाती है।।


है आ गया जन्म दिन दोबारा, झूठे ढोल ढपोल बजेंगे।

तकली से तलवार हराने के, कायर गीदड़ शोर मचेंगे।।


चतुर गीदड़ों की कायरता, अहिंसा का झूठा मंत्र बनी।

गीता के मंत्र पढ़े आधे, जनता वैचारिक परतंत्र बनी।।


याद करो केशव की गीता, जिसने सारा भेद बताया।

धर्मार्थ शत्रु का शीश कुचलना, सत्य धर्म सन्मार्ग सिखाया।।


सब लोग तुम्हें बापू बोलें, या राष्ट्रपिता स्वीकार करें।

अहिंसा जननी है पापों की, ये सत्य मेरा स्वीकार करें।।


हिंदी तुमको लगी काटने, हिंदुस्तानी नाम बनाया।

राम तुम्हारे बादशाह थे, सीता बेगम नाम सुझाया।।


काश्मीर की गलियों में भी, तुमने था विष वमन कराया।

और हैदराबाद पे आके, तर्क तुम्हारा पलटी खाया।।


भोली भाली बालाओं पर, थे करते ब्रह्मचर्य का साधन।

कभी ना सोचा पलट कर तुमने, कैसे काटा उनने जीवन।।


जो सर्वस्व लुटा दुष्टों को, किसी भांति दिल्ली पहुंचे।

जाने क्यों तुम्हारे दिल ने, उनके दर्द कभी ना समझे।।


माघ-पूस की ठिठुरन में, उनने अम्बर को था वस्त्र बनाया।

चढ़ उनकी की लाशों पर तुमने, तुष्टिकरण हथियार सजाया।।


सोमनाथ था तुम्हें खटकता, औ दरगाहें प्यारी जी।

राष्ट्रपिता कैसे लिख दूँ, तुम्हीं बता दो गांधी जी।।


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डिजिटल सत्याग्रह शुरू हो :संजय द्विवेदी

 अग्रसेन महाविद्यालय में  डिजिटल मीडिया पर वेबिनार*

 

शुरू कीजिए डिजिटल सत्याग्रह : प्रो. द्विवेदी


सोशल मीडिया में सुरक्षा आपके हाथ हीः विवेक अग्रवाल


*रायपुर, 4 अक्टूबर।* अगर आप इस डिजिटल युग में गांधीजी के रास्ते पर चलना चाहते हैं, तो आज से डिजिटल सत्याग्रह की शुरुआत कीजिए।'' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने अग्रसेन महाविद्यालय द्वारा आयोजित वेबिनार में व्यक्त किए। आयोजन में देश के प्रतिष्ठित अपराध मामलों के लेखक एवं पत्रकार विवेक अग्रवाल मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए। 

''डिजिटल समय में मीडिया'' विषय पर मुख्य अतिथि के तौर पर बालते हुए प्रो. द्विवेदी ने कहा कि आपने महात्मा गांधी के तीन बंदरों के बारे में ज़रूर सुना होगा। महात्मा गांधी ने इन बंदरों के ज़रिए बुरा ना देखने, बुरा ना बोलने और बुरा ना सुनने की शिक्षा दी थी। लेकिन आज के इस डिजिटल युग में मैं आपसे ये कहना चाहता हूं कि ''बुरा मत टाइप करो, बुरा मत लाइक करो और बुरा मत शेयर करो।'' 


प्रो. द्विवेदी ने कहा कि पत्रकारिता चाहे प्रिंट की हो या डिजिटल की, उसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां से किस रास्ते पर जाने को तैयार है। पत्रकार अगर पत्रकारिता का सुनहरा भविष्य चाहते हैं, तो उन्हें इसके लिए वर्तमान में स्वस्थ बीज बोने पड़ेंगे।


वेबिनार को संबोधित करते हुए अपराध मामलों के विशेषज्ञ व लेखक विवेक अग्रवाल ने कहा कि   सोशल मीडिया के युग में अपनी डिजिटल प्रॉपटिज की रक्षा कैसे करें यह आपके ही हाथ है।आपकी डिजिटल गतिविधि पर हर यूजर्स की नजर है लेकिन उन पर आपकी नजर कैसी हो। इसके लिये सुरक्षा टूल का भी उपयोग कर सकते है। वर्तमान परिदृश्य में जरूरी है कि हम जितना डिजिटल सुरक्षा की चिंता करेंगे उतना ही सुरक्षित रहेंगे। 


उन्होंने कहा कि हमें हर जानकारी को सोशल मीडिया पर साझा नहीं करना चाहिये। ऐसे बहुत सारे एप हैं, जिनके माध्यम से हम अपनी सुरक्षा की चिंता स्वयं ही कर सकते हैं। उन्होंने वर्तमान समय में कैसे हम सूचना का सम्प्रेषण किस तरह करना चाहिये इसके  बारे विस्तार जानकारी दी।


आभार  प्रकट करते हुए अग्रसेन महाविद्यालय के सदस्य अनुराग अग्रवाल ने कहा कि सूचना के अभाव में जीवन की प्रगति ही प्रभावित हो सकती है लेकिन, इन सबके बीच हम सुरक्षित सूचना माध्यमों का प्रयोग कैसे करें यह भी जरूरी है। उन्होंने डिजिटल सत्याग्रह अभियान को सब तक पंहुचाने का संकल्प लिया। सत्र संचालन हेमंत पाणिग्रही ने किया। वेबिनार में अग्रसेन महाविद्यालय के  निदेशक डॉ. व्ही. के. अग्रवाल, डॉ. युलेंद्र कुमार राजपूत, अमित कुमार अग्रवाल, अभिनव अग्रवाल सहित महाविद्यालय के छात्र, प्राध्यापक व समाज के गणमान्य सदस्य शामिल हुए।

शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

चित्र कथा

 Ashok Pande/ स्क्रिप्ट 


बैकग्राउंड में दिख रही पेंटिंग वाले कुत्ते को सभी ने देखा होगा. इसकी कहानी बताता हूँ. 


यह एक असल पालतू कुत्ते की एक पेंटिंग है. कुत्ते का नाम हुआ करता था निपर. 1884 में इंग्लैण्ड के ग्लोस्टर के ब्रिस्टल में जन्मे निपर को यह नाम इसलिए दिया गया था कि वह अपने घर आने वाले लोगों की टांगों के पीछे दांत लगा दिया करता था यानी उनकी टांगों को अंग्रेज़ी में ‘निप’ किया करता था. उसके स्वामी का नाम था मार्क बारॉड. 1887 में मार्क की मृत्यु हो गयी और निपर को मार्क का पेंटर भाई फ्रांसिस अपने साथ लंकाशायर के लिवरपूल ले गया.


रेकॉर्ड प्लेयर यानी फोनोग्राफ को निपर ने सबसे पहले लिवरपूल में ही देखा. जब भी फ्रांसिस कोई रेकॉर्ड बजाते निपर हैरत में उस मशीन को देखने लगता कि आवाज़ आ कहाँ से रही है. यह छवि फ्रांसिस के मन में अवश्य ही बहुत गहरे दर्ज हो गयी होगी क्योंकि निपर की मरने के तीन साल बाद उन्होंने निपर का वह चित्र बनाया जिसने आगे चलकर दुनिया भर में इस कदर विख्यात होना था. निपर सितम्बर 1895 में अल्लाह का प्यारा हुआ था. निपर विशुद्ध नस्ल का तो नहीं था पर उसके भीतर बुल टेरियर प्रजाति के पर्याप्त जींस थे. चूहों और मुर्गियों के पीछे भागने का शौकीन निपर दूसरे कुत्तों से लड़ने में भी खासा आगे रहता था. 1898 में फ्रांसिस ने उसकी पेंटिंग तैयार की और अगले साल 11 फरवरी को उसे ‘डॉग लुकिंग एट एंड लिसनिंग टू अ फ़ोनोग्राफ़’ के नाम से पंजीकृत कराया.


फ्रांसिस ने बाद में पेंटिंग का नाम ‘हिज़ मास्टर्स वॉइस’ कर दिया और उसे रॉयल एकेडमी में प्रदर्शित करने की कोशिश कीं पर उसके प्रस्ताव को माना नहीं गया. बाद में उसने उसे पत्रिकाओं को बेचने का प्रस्ताव दिया. पत्रिकाओं में इस चित्र को टाइटल मिला - ‘नो वन नोज़ व्हाट द डॉग वॉज़ डूइंग’.


इसके बाद फ्रांसिस ने सिलिंडर फोनोग्राफ बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी यानी द एडीसन बेल कंपनी को इस पेंटिंग को बेचने की कोशिश की पर कामयाबी न मिली. कम्पनी का जवाब था – “कुत्ते फोनोग्राफ नहीं सुनते.”


फ्रांसिस को सलाह दी गयी कि वह फोनोग्राफ के हॉर्न के रंग को काले से सुनहरा बना दे ताकि उसे बेचना आसान हो सके. इस बात को ध्यान में रख वह इस पेंटिंग का एक फोटो लेकर 1899 की गर्मियों में एक नई ग्रामोफोन कंपनी के पास गया.


उसके बाद जो कुछ हुआ वह इतिहास है.

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

कला जीने की

 प्रस्तुति -कृष्ण मेहता: *

💐💐जीने की कला💐💐*


एक शाम माँ ने दिनभर की लम्बी थकान एवं काम के बाद जब डीनर बनाया तो उन्होंने पापा के सामने एक प्लेट सब्जी और एक जली हुई रोटी परोसी। मुझे लग रहा था कि इस जली हुई रोटी पर कोई कुछ कहेगा। परन्तु पापा ने उस रोटी को आराम से खा लिया परन्तु मैंने माँ को पापा से उस जली रोटी के लिए "साॅरी" बोलते हुए जरूर सुना था। और मैं ये कभी नहीं भूल सकता जो पापा ने कहा "प्रिये, मुझे जली हुई कड़क रोटी बेहद पसंद है।"

देर रात को मैने पापा से पूछा, क्या उन्हें सचमुच जली रोटी पसंद है?

उन्होंने मुझे अपनी बाहों में लेते हुए कहा - तुम्हारी माँ ने आज दिनभर ढ़ेर सारा काम किया, और वो सचमुच बहुत थकी हुई थी। और...वैसे भी...एक जली रोटी किसी को ठेस नहीं पहुंचाती परन्तु कठोर-कटू शब्द जरूर पहुंचाते हैं।

तुम्हें पता है बेटा - जिंदगी भरी पड़ी है अपूर्ण चीजों से...अपूर्ण लोगों से... कमियों से...दोषों से...मैं स्वयं सर्वश्रेष्ठ नहीं, साधारण हूँ और शायद ही किसी काम में ठीक हूँ। 

मैंने इतने सालों में सीखा है कि-

"एक दूसरे की गलतियों को स्वीकार करों...अनदेखी करों... और चूनो... पसंद करो...आपसी संबंधों को सेलिब्रेट करना।"



     मित्रों, जिदंगी बहुत छोटी है...उसे हर सुबह दु:ख...पछतावे...खेद के साथ जागते हुए बर्बाद न करें। जो लोग तुमसे अच्छा व्यवहार करते हैं, उन्हें प्यार करों ओर जो नहीं करते उनके लिए दया सहानुभूति रखो।


किसी ने क्या खूब कहा है-

  "मेरे पास वक्त नहीं उन लोगों से नफरत करने का जो मुझे पसंद नहीं करते,

क्योंकि मैं व्यस्त हूँ उन लोगों को प्यार करने में जो मुझे पसंद करते हैं।"


  तो मित्रों, जिदंगी का आनंद लीजिये...उसका लुत्फ़ उठाइए...उसकी समाप्ति... उसका अंत तो निश्चित है......। अतः आप सब स्वस्थ रहें, सुखी रहें एवं समृद्ध रहें, साथ ही अपने काम में व्यस्त रहें एवं मस्त रहें।

[10/1, 18:21] Morni कृष्ण मेहता: *नवग्रहों के सामान्य उपाय*

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

*1️⃣सूरज को रखना है ठीक तो सूरज को जल चढ़ा।*


*2️⃣चंद्र को रखना है ठीक तो माँ के पावों हाथ लगायें।*


*3️⃣मंगल को रखना है ठीक तो भाइयो से बना के रखें।*


*4️⃣बुध को रखना है ठीक तो पक्षियों को साबुत मूंग खिलायें।*


*5️⃣गुरु को रखना है ठीक तो पिता के पावों को हाथ लगायें।*


*6️⃣शुक्र को रखना है ठीक तो गऊओं को चारा खिलायें।*


*7️⃣शनि को रखना है ठीक तो मजदूरों को कुछ खिलायें।*


*8️⃣राहु को रखना है ठीक तो मजदूरों को चाय पिलायें।*


*9️⃣केतु को रखना है ठीक तो चितकबरा कम्बल मंदिर में चढ़ायें।*


*🔟यदि खुद को रखना चाहते है ठीक तो ईश्वर से लगन लगायें।*

अदरख काली मिर्च औऱ नींबू का घोल, कोरोना हारेगा बेमोल

 *बहुत ही महत्वपूर्ण*/ कोरोना हारेगा बेमोल 

      *कृपया सभी को साझा करें ..*

*कोयंबटूर ई एस आई अस्पताल*

 *141/141 इससे ठीक हो गए और घर लौट आए।*


● *पानी में थोड़ी काली मिर्च पाउडर, नींबू का रस और अदरक का एक टुकड़ा मिलाएं और पानी को उबालकर पिएं।*


● *यदि हम दिन में 2 या 3 बार इसको पीते हैं, तो हम वायरल या बैक्टीरियल संक्रमणों से प्रभावित नहीं होंगे।*


● *एक विशेष रासायनिक प्रतिक्रिया तब बनती है :-*

*जब अदरक, काली मिर्च और नींबू के रस को पानी में मिलाकर उबाला जाता है।*


● *यह नया रासायनिक परिवर्तन किसी भी बुरे वायरस और बैक्टीरिया को मार देगा। कोरोना नामक इस भ्रम के बारे में कैसे पता चलता है जो दिन-प्रतिदिन अपने आणविक आकार को बदलता है? चिकित्सा जगत खालीपन से घूर रहा है।*

● *अदरक, काली मिर्च और नींबू त्रिमूर्ति हैं जो भविष्य में सभी जादू वाइरस राक्षसों को नष्ट कर देंगे, चाहे इस कोरोना जादू की तरह कितने नए जादूगर हों।*


● *कर्नाटक में कोरोना रोग को नियंत्रित करने के लिए*

*"अदरक, काली मिर्च और नींबू के रस*

*का उपयोग किया जा रहा हैं*


 *कूर्ग और मदिकेरी जैसे शहर,जो उच्च गुणवत्ता की काली मिर्च पैदा करते हैं, सभी कर्नाटक में हैं।  कर्नाटक में भी यही प्रयोग से कोरोना मुक्ति पा रहे है।*


*आप इस पोस्ट को किसी भी फेसबुक, व्हाट्सएप ग्रुप पर पोस्ट कर सकते हैं ..।*


      *अदरक, नींबू, काली मिर्च  हर जगह उपलब्ध हैं। अगर यह अद्भुत, सरल चिकित्सा  दुनिया के सभी देशों में जाता है तो हम सभी कोरोना ग्रस्त पीड़ित को हराने में सहयोग कर  सकतें हैं ....*🙏🏼🙏🏼


*अगर हर एक व्यक्ति,इस मैसेज की पालना करता है,, तो निश्चित कोरोना पर विजय प्राप्त कर सकते है।*


   🙏🏻 *जनहित में होकर उपयोगी भी है* 🙏🏻

रवि अरोड़ा की नजर से

 हत्या की परतें / रवि अरोड़ा

स्कल-कालेज के दिनो में गाँव-देहात के सहपाठी जातीय वैमनस्य के अनेक मुहावरे, लोकोक्तियाँ और कवित्त सुनाते थे । उनमे से कई इतने घातक थे कि आज तक स्मृतियों में जगह घेरे बैठे हैं । उन्ही में से एक लोकोक्ति थी कि बकरी का दूध और दलित महिला की अस्मत का क्या है, जब चाहे लूट लो । मुआफ़ कीजिएगा इस लोकोक्ति के शब्द मैंने शालीन कर दिये हैं क्योंकि उसके असली शब्द तो दोहराये ही नहीं जा सकते । हालाँकि इससे मिलते-जुलते मुहावरे आज भी सुनने को मिल जाते हैं । भाव उनका भी वही होता है कि दलित की हर शय पर आपका हक़ है , चाहे वह उसकी अस्मत ही क्यों न हो । अपने खेत से चारा अथवा साग लेने आई दलित महिला पर ऊँची जाति का दबंग काश्तकार आज भी अपना हक़ समझता है । हाथरस की दलित किशोरी भी ऊँची जाति के काश्तकार के खेत में चारा लेने गई थी, जब उसके साथ दरिंदगी हुई । यक़ीन मानिये केवल बलात्कार ही हुआ होता तो शायद यह मामला कभी प्रकाश में ही नहीं आता । हमारे गाँव-देहातों की यही असलियत है । किसी भी ख़ास जाति के गाँव में रिआया के तौर पर बसाये गये कामगार और दलित ही वहाँ असली अल्पसंख्यक होते हैं और उनकी कोई आवाज़ ही नहीं होती । अपने इस दुर्भाग्य को दलितों और कामगारों ने स्वीकार भी कर लिया है और शायद यही वजह है कि अनहोनी के डर से वे सवर्णों के मुक़ाबले अपनी बच्चियों की शादी जल्द कर देते हैं । किसी भी आशंका को टालने को इनकी बेटियाँ आमतौर पर स्कूल भी नहीं भेजी जातीं मगर क्या करें , पेट पालने को कभी तो घर से निकलना ही पड़ता है और बाहर निकलो तो दरिंदे ताक में रहते ही हैं । 


किताबी और ढकोसले भरी बातों से इतर वास्तविकता देखें तो साफ़ है कि शासन-प्रशासन व थाना-कचहरी सब जगह कथित छोटी जातियों के लोग ही बेआवाज़ हैं । शायद यही वजह है कि हाथरस कांड मे पुलिस आराम से धीरे धीरे किश्तों में रिपोर्ट लिखती है और किश्तों में ही गिरफ्तरियाँ की जाती हैं । पीड़ित वाल्मीकि परिवार का कोई वली-वारिस नहीं था शायद यही वजह रही होगी कि परिजनों के विरोध के बावजूद पुलिस-प्रशासन रात के अंधेरे में ज़बरन किशोरी का अंतिम संस्कार कराने की हिम्मत कर सका । गाँव के एक बुज़ुर्ग की छाती में लात डीएम नहीं जातीय अहंकार ने ही मारी थी । आसपास के जिन बारह गाँवों के सवर्ण आरोपियों के पक्ष में जो पंचायत कर रहे हैं वह न्याय के लिये नहीं वरन अपने जातीय वर्चस्व के लिये ही है । भाजपा का पूर्व विधायक राजवीर सिंह पहलवान यदि बलात्कारियों के समर्थन में ख़म ठोक रहा है तो उसकी वजह भी यही है कि वह जानता है पीड़ित परिवार की कोई हैसियत नहीं है और उसे चुनाव ये ऊँची जाति वाले ही लड़ायेंगे । चंदपा क्षेत्र के इस गाँव की नाकेबंदी और मीडिया व विपक्षी नेताओं की आवाजाही पर रोक यूँ तो डैमेज कंट्रोल की गरज से लगाई गई लगती है मगर यह संभव भी इसी वजह से हो सका है कि सचमुच पीड़ित परिवार का कोई वजूद नहीं है । न राजनीतिक, न आर्थिक और न ही सामाजिक । 


कई बार लगता है कि नीची कही जाने वाली जातियों ने भी शायद अपने शोषण को हरि इच्छा के रूप में स्वीकार कर लिया है । कम से कम गाँवों में तो ऐसा ही दिखाई पड़ रहा है । मुल्क की हवाओं में ही ऐसा जहर है कि एहसास ए कमतरी के शिकार ये लोग गाँवों में ऊँची जाति वाले के साथ एक चारपाई पर बैठने से कतराते हैं तो शहरों में भी एक ही थाली में खाने में हिचकते हैं । पढ़े-लिखे लोगों के घरों में भी बाथरूम साफ़ करने वालों के चाय-पानी के बर्तन रसोई में नहीं वरन आँगन में दिखाई पड़ते हैं । यक़ीनन हाथरस कांड का पाप योगी सरकार के मत्थे है । उसे इस ख़ौफ़नाक अपराध से क़तई बरी नहीं किया जा सकता। ग़लती हमारी भी है जो हम लोग वैरागियों से आस-औलाद वालों जैसी संवेदनशीलता की उम्मीद कर रहे हैं। मगर एक सच यह भी है कि इस जघन्य अपराध से बरी मैं और आप भी नहीं हैं । सही मायनों में हममें से हर वह व्यक्ति इस किशोरी की निर्मम हत्या का दोषी है जो इस नारकीय जातिगत व्यवस्था का किसी भी रूप में हिमायती है ।

हे राम औऱ जय जवान

 *गुदड़ी के लाल-लाल बहादुर 'शास्त्री'*/ दिनेश  श्रीवास्तव 

                          ----------------------



कायथ कुल जन्मे मगर, कठिनाई विकराल।

बाल्य-काल थी साधना, थे 'गुदड़ी के लाल'।।-१

              

गांधी जी के साथ ही, प्रगट हुए थे  'लाल'।

दोनो ने ही इस देश मे,अद्भुत किये कमाल।।- २


'शास्त्री जी' के नाम से,जाने जाते 'लाल'।

लालबहादुर ने किया,ऊँचा भारत- भाल।।- ३


लालबहादुर नाम था,काम किए ज्यों संत।

सच्चे सीधे थे सरल,लोभ-लालसा अंत।।- ४


सच्चे सीधे थे मगर, 'लाल'बने थे काल।

युद्ध हुआ जब 'पाक' से, पूछो उससे हाल।।-५


त्राहि-त्राहि करके भगा, कहाँ 'पाक'को ठौर?

'ताशकंद' का राह था,नहि उपाय था और।।-६


'जय-जवान' नारा  लगा,'जय- किसान' का घोष।

अमर कथन इस 'लाल'का,अब भी देता तोष।।-७


कृश-काया थी 'लाल'की,उन्नत उनका भाल।

लघु शरीर होते हुए,पाए हृदय विशाल।।-८


ताशकंद में ही हुआ,इस सपूत का अंत।

बार-बार मिलता नहीं,ऐसा कोई संत।।-९


सदा बढ़ाए देश का, लालबहादुर शान।

'भारत रत्न' प्रदान कर,दिया देश ने मान।।-१०


यदि उनके आदर्श को,धारण करो 'दिनेश'।

प्राणवान भारत बने,विश्व गुरू हो देश।।-११


              

                   दिनेश श्रीवास्तव

                    ग़ाज़ियाबाद

[10/2, 11:04] DS दिनेश श्रीवास्तव: वीर छंद आधारित गीत


                 *गांधी*


पावन परम पुजारी थे वे,सत्य अहिंसा से था प्यार।

धन्य धरा भारत की अपनी, जहाँ लिए गांधी अवतार।।


राम-नाम का धुन थे गाते, और नहीं था मन में द्वेष।

पीर-पराई देख हृदय में,जिनके होता अतिशय क्लेश।

आत्मसंयमी वीर बहुत थे,लिए लकुटिया कर में धार।

धन्य धरा भारत की अपनी, जहाँ लिए गांधी अवतार।।


अंग्रेजी शासन का देखो,कमर दिया था जिसने तोड़।

सात समंदर पार भगे वे,डरकर भारत को वे छोड़।।

नहीं ढाल या तलवारें थी,गए अहिंसा से वे हार।

धन्य धरा भारत की अपनी,जहाँ लिए गांधी अवतार।।


भारत की यह भूमि वही है,दिखे अहिंसा अब चहुँओर।

लूट-मार व्यभिचार बहुत है,मचा रहा हिंसा है शोर।।

नहीं बेटियाँ यहाँ सुरक्षित,मचा हुआ है हाहाकार।

धन्य धरा भारत की अपनी,जहाँ लिए गांधी अवतार।।


घूम-घूम यह देश जहाँ पर,गांधी ने बाँटा था प्यार।

नारी का सम्मान बढ़ाया,मगर आज सुनिए चित्कार।

हिंसा-प्रतिहिंसा का सागर,जहाँ हिलोरें पारावार।

धन्य धरा भारत की अपनी,जहाँ लिए गांधी अवतार।।


दुखिया दीन 'दिनेश' पड़ा है,मन में लिए निराशा घोर।

चारो ओर अँधेरा छाया,होगा फिर से कब तक भोर।।

गांधी के पथ पर चलने को, होना होगा अब तैयार।

धन्य धरा भारत की अपनी, जहाँ लिए गांधी अवतार।।


                दिनेश श्रीवास्तव

                ग़ाज़ियाबाद


गुरुवार, 1 अक्तूबर 2020

बापू का प्रताप / मनोज कुमार

 गांधी का प्रताप और एक अनुभव  / मनोज  कुमार 


आप जीवन भर बहुत अच्छा लिखते हैं। बोलते भी प्रभावी हैं लेकिन यह सब कुछ किसी की जिन्दगी में परिवर्तन ना ला सके तो सब बेकार। आपकी यही कोशिश किसी एक का भी मन बदल दे तो लिखना बोलना ही नहीं, स्वयं की सार्थकता साबित होती है।

आज गांधी के पुण्य से मुझे यह अवसर मिला जब हज़ारों किलोमीटर दूर रहने वाले मेरे प्रिय विवेक मणि त्रिपाठी  ने बताया कि मुझसे मिलने से पहले वे गांधी से सहमत नहीं थे लेकिन मेरी संगत में आते ही ना केवल गांधी विचार को पढ़ना शुरु किया बल्कि आज वे गांधी के अनुयायी बन गए हैं । उन्हें गांधी के प्रति आसक्ति मेरे संपादन में प्रकाशित शोध पत्रिका "समागम" से जुड़ने और पढ़ने के बाद हुई। समागम का अनुराग हमेशा से गांधी विचारों के प्रति रहा है और अनुज के विचार जान कर सन्तोष हुआ कि मेरे प्रयासों से एक युवा की सोच में ही नहीं, बल्कि उनके साथ एक पीढ़ी की सोच में परिवर्तन आया। उन्हीं के शब्दों में गांधी सच में महमानव हैं जिन्हें पढ़कर मेरे जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव आया है ।

बापू, तुमने मेरे प्रयासों को सार्थक किया। आभारी हुँ और कृतज्ञ भी।

टीम समागम की ओर से गांधी जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं

जीवन का दुख

 *"जन्म दुःखं जरा दुःखं जाया दुःखं पुनः पुनः ।*

*अन्तकालं महादुःखं तस्मात् जागृहि जागृहि ।।"*

--> जन्म दुःख है , वृद्धावस्था दुःखमय है , स्त्री , पुत्रादि कुटुम्बजन दुःखरुप है , और अन्तकाल भी बडा दुःखद है , इसलिए जागो - जागो । इस अंतकाल को रोज याद करो ।

,.... नित्य विचार करेँ  कि यदि आज यमदूत मुझे पकडने आयेँ तो मैँ कहाँ जाऊँगा - नरक मे , स्वर्ग मेँ , बैकुण्ठ मेँ , मृत्यु का निवारण शक्य नही है , तो फिर पाप क्यो ? कई लोग बहुत समझदार बनते है । जब बाजार मे कुछ लेने जाते है तो बडी देर तक सोच विचार करते है कि किस वस्तु को लिया जाय । किन्तु जिसका विचार करने की आवश्यकता है उस पर विचार ही नहीँ करते । मृत्यु को रोज याद करेँ , मृत्यु का भय रहेगा तो पाप दूर होगा और जिस दिन पाप दूर हो जायेगा । उसी दिन मनुष्य संत बन जायेगा ।

......., पाप - पुण्य के अनेक साक्षी है - सूर्य , चन्द्रमा , धरती , वायुदेव , दोनो संध्याएँ , दिन - रात , आकाश , अग्नि , अपनी आत्मा , आदि । 

ये सभी भगवान के सेवक है जहाँ हम जायेगेँ साथ रहेगेँ ।  हम यह मानते है कि जो पाप हम करते है उसे कोई देखता नही ।

 एकान्त कैसा भी हो किन्तु वहाँ वायु और अपनी अन्तरात्मा मेँ विद्यमान परमात्मा विराजमान  रहता है ।

 *" यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् "*

आखिर तो मनुष्य इस लोक मेँ मरण की शरण मेँ ही जाता है फिर भी वह पापाचरण छोडता नहीँ । शंकराचार्य स्वामी कहते है कि - मनुष्य यह जानता है कि एक दिन मरना है , यह सब छोडकर एक दिन जाना है , ऐसा होने पर भी वह पाप क्यो करता है ? 

  मुझे इसका आश्चर्य होता है ।💓

बापू का अंतिम जन्मदिवस

 बापू का अंतिम जन्म दिन/ विवेक  शुक्ला 

उस दिन भोर छंटने के साथ ही 5, अलबुर्कर रोड ( अब तीस जनवरी मार्ग) पर महात्मा गांधी से मिलने के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू, गृहमंत्री सरदार पटेल, बाकी गणमान्य हस्तियां और दिल्ली आने लगी थी।


  ये सब बापू को उनके 78 वें जन्म दिन पर बधाई देने के लिए आ रहे थे।  तब दिल्ली  में सांप्रदायिक दंगे भड़के हुए थे। इन्सानियत मर रही थी। शऱणार्थियों के पुनर्वास का मसला भी गहरा रहा था। इन सब कारणों के चलते बापू निराशा में डूबे हुए थे। पर बिड़ला हाउस में उत्साह का माहौल था।


बापू ने तय कर लिया था कि वे  अपने जन्मदिन पर उपवास, प्रार्थना और चरखा कातेंगे। बापू के चौथे पुत्र देवदास गांधी,जो कनॉट प्लेस में ही रहते थे, वे भी सपरिवार बिड़ला हाउस में थे। बापू ने उन्हें कुछ देर के बाद वहां से विदा कर दिया था। 


बापू के कमरे को मीराबेन ने सजा दिया था। उन्होंने कमरे में ‘हे राम’  ‘ॐ’ और क्रास के पोस्टर टांग दिये थे। मीरा बेन एक ब्रिटिश महिला थीं। इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में  बापू के सिद्धांतों से प्रभावित होकर खादी का प्रचार किया था। उसके बाद वहां पर गांधी जी का प्रिय भजन  “वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे रे...” बजने लगा था।


उधर, चिराग दिल्ली में मास्टर रोशन लाल गौड़, चौधरी दिल्ली सिंह बादल और शाहपुर जट में चौधरी दिलीप सिंह,जो बाद में बाहरी दिल्ली से कांग्रेस के सांसद भी रहे, वगैरह  अपने-अपने क्षेत्रों में कांग्रेसियों के साथ बापू का जन्म दिन चरखा कात कर मना रहे थे। 


इनके कार्यक्रमों में जनभागेधारी खासी थीं। दिल्ली के गांवों वाले बापू को पूज्नीय मानते रहे हैं। अब भी आपको अनेक घरों  में बापू के चित्र लगे मिल जाएंगे। उनकी मृत्यु पर हजारों गांव वाले देसी घी लेकर  राजघाट पहुंच गए थे अंत्येष्टि के लिए। सैकड़ों ने सिर मुंडवा लिए थे।


लेडी माउंटबेटन भी बापू को बधाई देकर निकल गईं।  वहां बापू की निजी चिकित्सक डा. सुशीला नैयर उनके स्वास्थ्य पर भी नजर रख रही थीं। बापू की तबीयत कतई सही नहीं चल रही थी। वे अंदर से टूटे हुए थे।


 सरदार पटेल से बातचीत के दौरान तो उनका सारा दर्द सामने आ गया था। उन्होंने कहा था- “ मैंने आखिर मैंने कौन सा अपराध कर दिया कि मुझे ये दिन देखना पड़ा रहा है ?” 


सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन ने अपनी डायरी में लिखा था कि वे तो बापू से बड़े उत्साह के साथ मिलने गए थे पर लौटे भारी मन के साथ। यानी बापू  अपना जन्म दिन घोर निराशा और अवसाद के वातावरण में मना रहे थे। बापू ने अपनी प्रार्थना सभा में भी कहा “मेरे लिए तो आज  मातम मनाने का दिन है। मैं आज तक जिंदा पड़ा हूं, इस पर मुझे खुद आश्चर्य होता है, शर्म लगती है। मैं वही शख्स हूं कि जिसकी जबान से एक चीज निकलती थी कि ऐसा करो तो करोड़ों उसे मानते थे। आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है। “


बिड़ला हाउस की गतिविधियों से दूर चांदनी चौक में ब्रज कृष्ण चांदीवाला, मीर मुश्ताक अहमद,लाला रूपनारायण और युद्धवीर सिंह ( दिल्ली की पहली कैबिनेट में थे) जैसे कांग्रेसी उनके जन्म दिन पर  सांप्रदायिक सौहार्द के लिए प्रभात फेरियां निकाल रहे थे। कोतवाली और दरियागंज में चरखा कताई के कार्यक्रम भी चल रहे थे। सिंह के नाम पर आई एस बी टी के पास एक सड़क भी है । मीर साहब आगे चलकर  दिल्ली के  मुख्य कार्यकारी पार्षद भी रहे।


खैर ,शाम होते-होते हजारों लोग बापू से मिलने आ चुके थे। उन्हें असंख्य जन्म दिन की शुभकमानाएं देने वाले टेलीग्राम भी मिले थे। आकाशवाणी ने उन पर एक कार्यक्रम तैयार किया था।


 पर बापू को तो विपरित स्थितियों ने निराश किया हुआ था। वे उस कार्यक्रम को बिना सुने ही जल्दी सो गए। 


1 अक्टूबर 2020

अद्भुत जीनियस

 *अद्भुत, अकल्पनीय, अविश्वसनीय किन्तु सत्य*


आपसे कोई पूछे भारत के सबसे अधिक शिक्षित एवं विद्वान व्यक्ति का नाम b बताइए,


 जो,

 

⭕ डॉक्टर भी रहा हो,

⭕ बैरिस्टर भी रहा हो,

⭕ IPS अधिकारी भी  रहा हो,

⭕ IAS अधिकारी भी रहा हो,

⭕ विधायक, मंत्री,  सांसद भी रहा हो,

⭕ चित्रकार, फोटोग्राफर भी रहा हो, 

⭕ मोटिवेशनल स्पीकर भी रहा हो,

⭕ पत्रकार भी रहा हो,

⭕ कुलपति भी रहा हो, 

⭕ संस्कृत, गणित का विद्वान भी रहा हो,

⭕ इतिहासकार भी रहा हो,

⭕ समाजशास्त्र,  अर्थशास्त्र का भी ज्ञान रखता हो,

⭕ जिसने काव्य रचना भी की हो !


अधिकांश लोग यही कहेंगे -

"क्या ऐसा संभव है ?आप एक व्यक्ति की बात कर रहे हैं या किसी संस्थान की ?"


पर भारतवर्ष में ऐसा एक व्यक्ति मात्र 49 वर्ष की अल्पायु में भयंकर सड़क हादसे का शिकार हो कर  इस संसार से विदा भी ले चुका है !


उस व्यक्ति का नाम है- 


 *डॉ. श्रीकांत जिचकर !* 


श्रीकांत जिचकर का जन्म 1954 में एक संपन्न मराठा कृषक परिवार में हुआ था ! 


वह भारत के सर्वाधिक पढ़े-लिखे व्यक्ति थे, जो गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है !


डॉ. श्रीकांत ने 20 से अधिक डिग्री हासिल की थीं !

 

कुछ रेगुलर व कुछ पत्राचार के माध्यम से ! 


वह भी फर्स्ट क्लास,  गोल्डमेडलिस्ट, कुछ डिग्रियां तो उच्च शिक्षा में नियम ना होने के कारण उन्हें नहीं मिल पाई, जबकि इम्तिहान उन्होंने दे दिया था !


 *उनकी डिग्रियां/ शैक्षणिक योग्यता इस प्रकार थीं...*


✔️MBBS, MD gold medalist, 

✔️LLB, LLM, 

✔️MBA, 

✔️Bachelor in  journalism ,

✔️संस्कृत में डी. लिट.  की उपाधि, यूनिवर्सिटी टॉपर ,

✔️M. A इंग्लिश,

✔️M.A हिंदी,

✔️M.A हिस्ट्री,

 ✔️M.A  साइकोलॉजी,

✔️M.A  सोशियोलॉजी,

✔️M.A पॉलिटिकल साइंस,

✔️M.A  आर्कियोलॉजी,

 ✔️M.A एंथ्रोपोलॉजी,

✔️श्रीकान्तजी 1978 बैच के आईपीएस व 1980 बैच के आईएएस अधिकारी भी रहे !

✔️1981 में महाराष्ट्र में  विधायक बने,

✔️1992 से लेकर 1998 तक राज्यसभा सांसद रहे !


❗श्रीकांत जिचकर ने वर्ष 1973 से लेकर 1990 तक का समय यूनिवर्सिटी के इम्तिहान देने में गुजारा !


❗1980 में आईएएस की केवल 4 महीने की नौकरी कर इस्तीफा दे दिया !

                

❗26 वर्ष की उम्र में देश के सबसे कम उम्र के विधायक बने, महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी बने,


❗14 पोर्टफोलियो हासिल कर सबसे प्रभावशाली मंत्री रहे !


❗महाराष्ट्र में पुलिस सुधार किये !


❗1992 से लेकर 1998 तक बतौर राज्यसभा सांसद संसद की बहुत सी समितियों के सदस्य रहे, वहाँ भी महत्वपूर्ण कार्य किये !


❗1999 में कैंसर लास्ट स्टेज का डायग्नोज हुआ, डॉक्टर ने कहा आपके पास केवल एक महीना है ! 


*अस्पताल पर मृत्यु शैया पर पड़े हुए थे...*

*लेकिन आध्यात्मिक विचारों के धनी श्रीकांत जिचकर ने आस नहीं छोड़ी ।*


*उसी दौरान कोई सन्यासी अस्पताल में आया। उसने उन्हें ढांढस बंधाया ।*

 

*संस्कृत भाषा, शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया । कहा- "तुम अभी नहीं मर सकते...अभी तुम्हें बहुत काम करना है...!"*


चमत्कारिक तौर से श्रीकांत जिचकर पूर्ण स्वस्थ हो गए...!


👍 स्वस्थ होते ही राजनीति से सन्यास लेकर...संस्कृत में डी.लिट. की उपाधि अर्जित की !


वे कहा करते थे - "संस्कृत भाषा के अध्ययन के बाद मेरा जीवन ही परिवर्तित हो गया है ! मेरी ज्ञान पिपासा अब पूर्ण हुई है !"


👍पुणे में संदीपनी स्कूल की स्थापना की, 


👍नागपुर में कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की, जिसके पहले कुलपति भी वे बने !


उनका पुस्तकालय किसी व्यक्ति का निजी सबसे बड़ा पुस्तकालय था, जिसमें 52000 के लगभग पुस्तकें थीं !


उनका एक ही सपना बन गया था, भारत के प्रत्येक घर में कम से कम एक  संस्कृत भाषा का विद्वान हो तथा कोई भी परिवार मधुमेह जैसी  जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का शिकार ना हो !

 

यूट्यूब पर उनके केवल 3 ही मोटिवेशनल हेल्थ फिटनेस संबंधित वीडियो उपलब्ध हैं !


ऐसे असाधारण प्रतिभा के लोग, आयु के मामले में निर्धन ही देखे गए हैं ।


अति मेधावी, अति प्रतिभाशाली व्यक्तियों का जीवन ज्यादा लंबा नहीं होता ।

शंकराचार्य, महर्षि दयानंद सरस्वती, विवेकानंद  भी अधिक उम्र नहीं जी पाए थे !


2 जून 2004 को नागपुर से 60 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र में ही भयंकर सड़क हादसे में श्रीकांत जिचकर का निधन हो गया !


संस्कृत भाषा के प्रचार प्रसार व  Holistic health को लेकर उनका कार्य अधूरा ही रह गया !


*2 जून को डॉ. श्रीकांत की 16 वीं पुण्य तिथि थी। विभिन्न व्यक्तियों के जन्म दिवस को उत्सव की तरह मनाने वाले हमारे देश में ऐसे गुणी व्यक्ति को कोई जानता भी नहीं है, जिसके जीवन से कितने ही युवाओं को प्रेरणा मिल सकती है।*


ऐसे शिक्षक,  ज्ञानी, उत्साही व्यक्तित्व,  चिकित्सक, विधि  विशेषज्ञ, प्रशासक व राजनेता के मिश्रित व्यक्तित्व को शत शत नमन 🙏


https://en.m.wikipedia.org/wiki/Shrikant_Jichkar

डॉ. कलाम औऱ राष्ट्रपति पद का ऑफर

 *डा.ए.पी.जे अब्दुल कलाम अपनी किताब '"""दि टर्निग प्वाइंट""' में एक महत्वपूर्ण प्रसंग का जिक्र करते हुए लिखते हैं*

   

*मैं उस दिन अन्ना यनिवर्सिटी मे क्लास लेने के बाद कैन्टीन में अपने साथी प्रोफेसरों के चाय पी रहा था*, 

 *तभी किसी ने कहा कि आपका एक जरूरी फोन आया है..*

*मैने फोन अटेंड किया तो दूसरी तरफ से आवाज आई कि डा.कलाम मै PMO से बोल रहा हूँ ।*

*प्रधानमंत्री आपसे बात करना चाह रहे हैं ।*

  *10 मिनट बाद आपको फिर फोन आएगा। कृपया अटेंड कीजियेगा ।*

 *डा.कलाम आगे लिखते हैं  कि "वो 10 मिनट बडी मुश्किल से बीते ।*

 *पता नही PM साहब क्या बात  मुझसे करना चाहते हैं ।*

 *तभी फोन आ गया कि डा.कलाम आप लाइन पर रहें।*PM साहब आपसे बात करेंगे*

 *और उसके बाद एक भारी आवाज सुनाई पडी*.... ' *डा.कलाम मै अटल बिहारी वाजपेयी बोल रहा हूँ..*

*कैसे हैं आप !*

' *मैने नमस्कार करते हुए कहा कि सर मै ठीक हूँ ।*

 *उन्होंने कहा कि डा.कलाम आपने देश की बहुत सेवा की है।*

 *लेकिन मैं आपको और बडी जिम्मेदारी देना चाहता हूँ ।*

 *मना मत कीजिएगा।*

 *हम चाहते हैं कि आप देश के अगले राष्ट्रपति बनें ।"*

 *सुनकर मै नर्वस हो गया और कहा कि सर मुझसे नही हो पाएगा ।*

 *PM ने कहा कि आप समय ले लीजिए ।*

 *अपने दोस्तों से बात कीजिए।*

 *मै आधे घंटे बाद आपको फिर काॅल करूंगा और आपका उत्तर हाँ होना चाहिए।*

 ' *कलाम साहब लिखते हैं कि '* *यह सुनकर मैं बहुत बडी दुविथा में पड गया ।*

 *क्या जवाब दूं ।*

 *मै अपने मित्रों से बात करने कैन्टीन गया और सारी बात बताई ।*

 *दोस्तों ने सुनते ही कहा कि इसमे ज्यादा सोचने की कौन सी बात है । तुम तुरंत हाँ कहो।*

*खैर ठीक आधे घंटे के बाद फिर फोन आया ।*

 *PM साहब ने कहा कि" तो डा.कलाम क्या सोचा है आपने?"*

 *मैने कहा कि सर मुझे पढाना बहुत अच्छा लगता है। मै इसे छोड नही सकता ।*

 *उन्होंने कहा कि पढाना आपका शौक है तो पढाइए न।*

   *कौन रोक रहा है आपको ।* 

   *राष्ट्रपति रहकर भी आप पढा सकते हैं ।*

 *तब मैंने हामी भरी और उसके आधे घंटे बाद एस पी जी के अधिकारियो ने पूरे कैंपस को चारों ओर से घेर लिया।*

 *मैं आम से खास हो गया*

*आधे घंटे के बाद मै विशेष विमान से दिल्ली के लिए रवाना हो गया ।"*

     *ये थे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी  साहब*

 *उन्होंने   देश को डा.कलाम जैसा  बेहतरीन 'जनता का राष्ट्रपति' दिया*

                  🙏

बुधवार, 30 सितंबर 2020

महात्मा गाँधी पर दो ग़ज़लें / डॉ. वेद मित्र शुक्ला

 *महात्मा गाँधी पर केंद्रित दो ग़ज़लें* 

- डा. वेद मित्र शुक्ल 

सहायक प्रोफ़ेसर, अंग्रेजी विभाग

राजधानी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय

राजा गार्डेन, नई दिल्ली – 110015

मोब.: 9599798727 

(1)

खुद को ही जिसने होम किया उसका तो जीवन यज्ञ रहा,

अंतिम जन को जो जान गया सच में वह इक सर्वज्ञ रहा।


अपने तो अपने ही थे पर दूजों की भी परवाह रही,

दुश्मन के अच्छे भावों को जो समझ सका मर्मज्ञ रहा।


जिसने जीवन में सत्य, अहिंसा और प्रेम को सीख लिया,

फिर कौन ज्ञान जो नहीं रहा, वह इस जग में तत्वज्ञ रहा।


जो कुछ भी है उस मालिक का फिर लेन-देन को क्यों झगड़े,

दुनियावी लाभ-हानि की चिंता को कब वह गणितज्ञ रहा।


जन-जन की सेवा को जिसने हरि की सेवा था मान लिया,

उसको जग भुला सके कैसे, युग बीते किन्तु कृतज्ञ रहा।


(2)

गाँधी जैसा बनते-बनते जिन्ना और जवाहर बनते,

बिरले ही होते हैं जो कुछ सत्ता से हो बाहर बनते।


बातें करना राजा से यों आँख दिखाकर कहाँ सरल पर,

बातें करते आँख मिला जो घोर निशा में दिनकर बनते।


दुनियादारी छोड़ विरागी और संत बनना आसां है,

पर, गाँधी सा होंगे कितने जो जग में ही रहकर बनते।


बुद्ध हुए थे या फिर गाँधी जिनकी दुनिया में तो साहिब,

लोग जरायम छोड़ा करते और अहिंसक नाहर बनते।


सोचो कुछ करने को जब भी सच्चाई इक पैमाना हो,

कहते सच तो शिव होता है औ शिव से सब सुंदर बनते।


अपने अंतरतम की सुनकर धीरे ही पर चलते कुछ तो,

क्यों लोगो के हाथों में हम बस इक बेबस मोहर बनते।

तरीका मदद का

 मैं पैदल घर आ रहा था । रास्ते में एक बिजली के खंभे पर एक कागज लगा हुआ था । पास जाकर देखा, लिखा था:   


प्रस्तुति -कृष्ण  मेहता 


"इस रास्ते पर मैंने कल एक 50 का नोट गंवा दिया है । मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता । जिसे भी मिले कृपया इस पते पर दे सकते हैं ।" ...


यह पढ़कर पता नहीं क्यों उस पते पर जाने की इच्छा हुई । पता याद रखा । यह उस गली के आखिरी में एक घऱ था । वहाँ जाकर आवाज लगाया तो एक वृद्धा लाठी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आई । मुझे मालूम हुआ कि वह अकेली रहती है । उसे ठीक से दिखाई नहीं देता ।


"माँ जी", मैंने कहा - "आपका खोया हुआ 50 मुझे मिला है उसे देने आया हूँ ।"


यह सुन वह वृद्धा रोने लगी ।


"बेटा, अभी तक करीब 50-60 व्यक्ति मुझे 50-50 दे चुके हैं । मै पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, । ठीक से दिखाई नहीं देता । पता नहीं कौन मेरी इस हालत को देख मेरी मदद करने के उद्देश्य से लिख गया है ।"


बहुत ही कहने पर माँ जी ने पैसे तो रख लिए । पर एक विनती की - ' बेटा, वह मैंने नहीं लिखा है । किसी ने मुझ पर तरस खाकर लिखा होगा । जाते-जाते उसे फाड़कर फेंक देना बेटा ।'मैनें हाँ कहकर टाल तो दिया पर मेरी अंतरात्मा ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन 50-60 लोगों से भी "माँ" ने यही कहा होगा । किसी ने भी नहीं फाड़ा ।जिंदगी मे हम कितने सही और कितने गलत है, ये सिर्फ दो ही शक्स जानते है..

परमात्मा और अपनी अंतरआत्मा..!! मेरा हृदय उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता से भर गया । जिसने इस वृद्धा की सेवा का उपाय ढूँढा । सहायता के तो बहुत से मार्ग हैं , पर इस तरह की सेवा मेरे हृदय को छू गई । और मैंने भी उस कागज को फाड़ा नहीं ।मदद के तरीके कई हैं सिर्फ कर्म करने की तीव्र इच्छा मन मॆ होनी चाहिए

🌿

                 *कुछ नेकियाँ*

                    *और*


                *कुछ अच्छाइयां..*


  *अपने जीवन में ऐसी भी करनी चाहिए,* 


          *जिनका ईश्वर के सिवाय..* 


          *कोई और गवाह् ना हो...!!*