सोमवार, 28 दिसंबर 2020

आश्वासनों की पोखरी तलैया से / -सेवाराम त्रिपाठी

 आश्वासनों की पोखरी तलैया से / सेवाराम त्रिपाठी

  कुछ लोग देश का भला करने में जुटे हैं। चलिए अच्छा ही हुआ। अभी तक देश का बुरा हो रहा था। लगता है ऐसा लगता है कि स्वाधीनता आंदोलन जो अंग्रेजों एवं गुलामी के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई थी, शायद उसे नहीं होना चाहिए था। स्वतंत्रता कोई ठीक-ठाक चीज़ नहीं है। अब तो जो हो गया, सो हो गया। कुछ हैं जो लेफ्ट से इतने भुनभूनाएं हुए या जो नाराज़ हैं कि कहीं वे बेचारे अपने ऊपर ही न मुक्के मारने लगें। वे किसी भी तरह बीच का रास्ता तलाश रहे हैं जबकि पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश ने कहा था कि बीच का रास्ताय नहीं होता और कुछ लोगों को राइट में बड़ा आनंद मिलता है। जब से देश में राइट सजा है, वे बार-बार उछल रहे हैं। कनखियों से मुस्कुरा रहे हैं। कभी उनकी भक्ति ज़ोर मारती है और कभी उनके मन में लड्डू फूटने लगते हैं। पूरा देश मन में हिलगा हुआ है क्यों कि मन की गति बहुत तेज़ रफ़्तार में यात्रा करती है। मन से वेगवान कोई है ही नहीं इसलिए जहाँ देखो वहाँ रेडियों में, टीवी में, समाचार माध्यागमों में, इंटरनेट माध्या।मों में बार-बार मन की बात दहाड़तें हुए मिल जाती है।

कभी वे बहुसंख्यकता के बाड़े में पलंग बिछाकर और ऊपर से चादर तानकर देह में लपेट लेते हैं। लपेटा लपेटी इस दौर में बड़े पैमाने पर है। मन तो उनका बच्चा है जी। कहते हैं वह सच्चाे भी होता है। लोगों ने तो ऐसा मान ही लिया है। वह बहुसंख्यकता में ही रमता है। इसलिए वे संविधान से बाहर निकल कर बड़े आराम से टहल रहे हैं । वे कहते हैं बहुत हो गया इस संविधान में अपना गुजारा नहीं। इससे ससुरा ज़मीर बचाना मुश्किल हो जाता है और ऊपर से कुढ़न बढ़ जाती है ।हमारे एक परिचित हैं जिनका नाम हितुआ है। वे सबकी ख़बर रखता है। सबसे हितुआइश बनाए रखते हैं। अचानक वे बोले- वे कह रहे थे कि  बहुत दिन हो गए बीच में रहते हुए, कभी-कभी उसमें लेफ्ट भी घुस आता था। राइट को कभी कोई स्थान था ही नहीं। बड़े अरसे बाद बड़ी मुश्किल से राइट का समय और मामला उभरकर सामने आया है। राइट आया तो उसने आव देखा न ताव अच्छे दिनों की घोषणा और बरसात कर दी। उनकी नज़र में अभी तक बुरे से बुरे दिन चल रहे थे। लेकिन ज़ल्दी ही अच्छे दिन फिचूकर छोड़ने लगे। और हम सबसे ख़राब दिनों में पिट-पिटाकर नत्थी हो गए। जय हो महाकाल। अब और क्या-क्या देखना बदा है? इस समय राइट आश्वासन देने में सक्षम है इसलिए वह उसी में भिड़ा है। सयाने बताते हैं कि आश्वासन देना भी एक भयंकर बीमारी है। वह पोखरी तलैया से सर्वोच्च स्थान में बैठ गया है, बल्कि वहीं उसकी पसरा-पसरी चल रही है। कभी वह साष्टांीग हो जाता  है। कभी कालीन में उचकने लगता है। इसलिए एक से बढ़कर एक आश्वासन झर रहे हैं। जैसा पहले देवता समूचे काम-धाम छोड़कर स्वर्ग से फूल बरसाया करते थे, लगभग उसी तरह। अब तो मालाएं गर्दनों में टँग रही हैं और गर्व की गनगनाहट जगमगाने लगी है। देश में कई चीज़ें एकसाथ घट रही हैं। न घटेंगी तो घटा दी जाएंगी। यह तो घटने-घटाने की क्रिया है। कभी स्वच्छता अभियान का हाँका पड़ता है और उसमें गांधी जी का चश्माट फिट कर दिया जाता है। कभ- कभी हम स्मार्ट सिटी के अंदर गिर जाते हैं। कभी बुलेटप्रूफ ट्रेनों में फँस जाते हैं। कहीं बचपन में एक गानासुना था। ‘’धर दे पैसा चल कलकत्ता’। कलकत्ताभ बेचारा अब कोलकत्ता  हो गया है। अब अधिकांश शहरों के नाम बदले जा रहे हैं और राइट शक्तिाँ उसे अपनी शक्लोंस में ढालने लगी हैं। अभी तक जो देश में हुआ वह परम रद्दी था यानी बेहद गंदा। अब उसे ठीक करने की तेज़ी से मुहिम चल रही है।

विकास की गंगा बह रही है। विकास विकास से पूरा देश पटा है। विकास हमारे जीवन में पीछे पड़ा है । वह कभी नोटबंदी में दहाड़ता है कभी जी०एस०टी० में औंधा हो जाता है। कालाधन को विकास मजा चखाना चाहता है, तो सभ्यता और संस्कृति का ऐसा झापड़ पड़ गया, कि विकास कई रूपों में भर- भराकर गिर रहा है। कभी फ्लाई ओवर की शक्ल में, कभी पुल के ढह जाने के रूप में। कभी सड़कों के गढ्ढ़ा-गढ्ढ़ी में। कभी परम प्रतापी भ्रष्टाचार के साथ। सबको पता है कि भ्रष्टाचार की अनंत लीलाएं होती हैं। विकास जब तक सब कुछ को विनाश में न बदल दे, तब तक वह काहे का विकास। इसलिए वह सब धकापेल स्टाइल में विनाश के मूड में है। युवा पीढ़ी स्वाहा, रोज़गार गारंटी योजना स्वाहा, नागरिक स्वाहा और अन्नदाता किसान स्वाहा। जब से कोरोना के चरण भारत में पड़े, लोग पटापट हो रहे हैं। हाँ, आत्मनिर्भरता से देश लद गया। राष्ट्र के नाम संदेश रोज़-रोज़ झर रहे हैं। लोगों के मरने जीने से देश की आवोहवा में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मरना जीना तो परम प्रतापी प्रभु की लीला है। मंदिर बनने से सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा। युवाओं को रोज़गार मिलेगा, किसानों को उनके जिंस की सही-सही की़मत मिलेगी। बच्चों की ढंग से पढ़ाई-लिखाई होगी। सब कुछ ठीक हो कर ही रहेगा। बलात्कार नहीं होंगे। हमारी ज़िन्दगी खुशहाल हो जाएगी और अर्थ व्यवस्था को चार चांद लग जाएंगे। मॉबलिंचिंग की फैक्ट्री खुल जाएगी। यानी पूरी तरह से राम राज्य आ जाएगा। आश्वासनों में बड़ा दम होता है। क्योंकि आश्वासन पोखरी तलैया स्टाइल में हमारे देश में झर रहे हैं।

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