बुधवार, 13 जनवरी 2021

2520 का चमत्कार

 गणित में कोई भी संख्या.. 1 से 10 तक के सभी अंकों से.. नहीं कट सकती, *लेकिन इस.. विचित्र संख्या को देखियेगा  ..!*

*संख्या 2520* अन्य संख्याओं की तरह.. वास्तव में एक सामान्य संख्या नही है, यह वो संख्या है जिसने विश्व के गणितज्ञों को.. अभी भी आश्चर्य में किया हुआ है  .. !!

यह विचित्र संख्या 1 से 10 तक प्रत्येक अंक से भाज्य है , चाहे वो अंक सम हो या विषम हो।

  ऐसी संख्या जिसे इकाई तक के किसी भी अंक से भाग देने के उपरांत शेष शून्य रहे, *बहुत ही असम्भव/ दुर्लभ* है- ऐसा प्रतीत होता है .. !!


*अब निम्न सत्य को देखें* : 


2520 ÷ 1 = 2520

2520 ÷ 2 = 1260

2520 ÷ 3 = 840

2520 ÷ 4 = 630

2520 ÷ 5 = 504

2520 ÷ 6 = 420

2520 ÷ 7 = 360

2520 ÷ 8 = 315

2520 ÷ 9 = 280

2520 ÷ 10 = 252


 महान गणितज्ञ अभी भी आश्चर्यचकित है  : *2520 वास्तव में एक गुणनफल है 《7 x 30 x 12》का* 


🤷‍♂️ उन्हे और भी आश्चर्य हुआ जब प्रमुख गणितज्ञ द्वारा यह संज्ञान में लाया गया कि संख्या 2520 *हिन्दू संवत्सर* के अनुसार.. *एकमात्र यही संख्या है, जो वास्तव में उचित* बैठ रही है: 

*जो इस गुणनफल* से प्राप्त है ::

*सप्ताह के दिन (7) x माह के दिन (30) x वर्ष के माह (12)*....= *2520*...🔥


 *यही है *भारतीय काल गणना की श्रेष्ठता!* 

 *सनातन धर्म की.. श्रेष्ठता* 

🚩🚩🚩🚩🚩

वॉट्सऐप्प का खुल्लम खुल्ला खेल

 *वॉट्सऐप बदल रहा है अपनी पॉलिसी* / सब कुछ दिखाऊं और बिकाऊ हैँ 


अगर आप ‘यूरोपीय क्षेत्र’ के बाहर या भारत में रहते हैं तो इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप वॉट्सऐप आपके लिए अपनी प्राइवेसी पॉलिसी और शर्तों में बदलाव कर रहा है.

अगर आप वॉट्सऐप इस्तेमाल करना जारी रखना चाहते हैं तो आपके लिए इन बदलावों को स्वीकार करना अनिवार्य होगा.


वॉट्सऐप प्राइवेसी पॉलिसी और टर्म्स में बदलाव की सूचना एंड्रॉइड और आईओएस यूज़र्स को एक नोटिफ़िकेशन के ज़रिए दे रहा है.

नोटिफ़िकेशन में साफ़ बताया गया है कि अगर आप नए अपडेट्स को आठ फ़रवरी, 2021 तक स्वीकार नहीं करते हैं तो आपका वॉट्सऐप अकाउंट डिलीट कर दिया जाएगा.

यानी प्राइवेसी के नए नियमों और नए शर्तों को मंज़ूरी दिए बिना आप आठ फ़रवरी के बाद वॉट्सऐप इस्तेमाल नहीं कर सकते.

ज़ाहिर है आपसे ‘फ़ोर्स्ड कन्सेन्ट’ यानी ‘जबरन सहमति’ ले रहा है क्योंकि यहाँ सहमति न देने का विकल्प आपके पास है ही नहीं.

साइबर क़ानून के जानकारों का मानना है कि अमूमन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स या ऐप्स इस तरह के कड़े क़दम नहीं उठाते हैं. आम तौर पर यूज़र्स को किसी अपडेट को ‘स्वीकार’ (Allow) या अस्वीकार (Deny) करने का विकल्प दिया जाता है.

ऐसे में वॉट्सऐप के इस ताज़ा नोटिफ़िकेशन ने विशेषज्ञों की चिंताएँ बढ़ा दी हैं और उनका कहना है कि एक यूज़र के तौर पर आपको भी इससे चिंतित होना चाहिए.

वॉट्सऐप की पुरानी पॉलिसी में यूज़र्स की निजता पर ज़ोर दिया गया था

नई पॉलिसी में ‘प्राइवेसी’ पर ज़ोर ख़त्म.


अगर 20 जुलाई 2020 को आख़िरी बार अपडेट की गई वॉट्सऐप की पुरानी प्राइवेसी पॉलिसी में देखें तो इसकी शुरुआत कुछ इस तरह होती है:


''आपकी निजता का सम्मान करना हमारे डीएनए में है. हमने जबसे वॉट्सऐप बनाया है, हमारा लक्ष्य है कि हम निजता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ही अपनी सेवाओं का विस्तार करें...''


चार जनवरी, 2021 को अपडेट की गई नई प्राइवेसी पॉलिसी में ‘निजता के सम्मान’ पर ज़ोर देते ये शब्द ग़ायब हो गए हैं. नई पॉलिसी कुछ इस तरह है:


"हमारी प्राइवेसी पॉलिसी से हमें अपने डेटा प्रैक्टिस को समझाने में मदद मिलती है. अपनी प्राइवेसी पॉलिसी के तहत हम बताते हैं कि हम आपसे कौन सी जानकारियाँ इकट्ठा करते हैं और इससे आप पर क्या असर पड़ता है...


प्राइवेसी पॉलिसी में क्या बदलाव हुआ है?

फ़ेसबुक ने 2014 में 19 अरब डॉलर में वॉट्सऐप को ख़रीदा था और सितंबर, 2016 से ही वॉट्सऐप अपने यूज़र्स का डेटा फ़ेसबुक के साथ शेयर करता आ रहा है.

अब वॉट्सऐप ने नई प्राइवेसी पॉलिसी में फ़ेसबुक और इससे जुड़ी कंपनियों के साथ अपने यूज़र्स का डेटा शेयर करने की बात का साफ़ तौर पर ज़िक्र किया है:

वॉट्सऐप अपने यूज़र्स का इंटरनेट प्रोटोकॉल एड्रेस (आईपी एड्रेस) फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम या किसी अन्य थर्ड पार्टी को दे सकता है.

वॉट्सऐप अब आपकी डिवाइस से बैट्री लेवल, सिग्नल स्ट्रेंथ, ऐप वर्ज़न, ब्राइज़र से जुड़ी जानकारियाँ, भाषा, टाइम ज़ोन फ़ोन नंबर, मोबाइल और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कंपनी जैसी जानकारियाँ भी इकट्ठा करेगा. पुरानी प्राइवेसी पॉलिसी में इनका ज़िक्र नहीं था.


अगर आप अपने मोबाइल से सिर्फ़ वॉट्सऐप डिलीट करते हैं और ‘माई अकाउंट’ सेक्शन में जाकर ‘इन-ऐप डिलीट’ का विकल्प नहीं चुनते हैं तो आपका पूरा डेटा वॉट्सऐप के पास रह जाएगा. यानी फ़ोन से सिर्फ़ वॉट्सऐप डिलीट करना काफ़ी नहीं होगा.

नई प्राइवेसी पॉलिसी में वॉट्सऐप ने साफ़ कहा है कि चूँकि उसका मुख्यालय और डेटा सेंटर अमेरिका में है इसलिए ज़रूरत पड़ने पर यूज़र्स की निजी जानकारियों को वहाँ ट्रांसफ़र किया जा सकता है. सिर्फ़ अमेरिका ही नहीं बल्कि जिन भी देशों में वॉट्सऐप और फ़ेसबुक के दफ़्तर हैं, लोगों का डेटा वहाँ भेजा जा सकता है.

नई पॉलिसी के मुताबिक़ भले ही आप वॉट्सऐप का ‘लोकेशन’ फ़ीचर इस्तेमाल न करें, आपके आईपी एड्रेस, फ़ोन नंबर, देश और शहर जैसी जानकारियाँ वॉट्सऐप के पास होंगी.

अगर आप वॉट्सऐप का बिज़नेस एकाउंट इस्तेमाल करते हैं तो आपकी जानकारी फ़ेसबुक समेत उस बिज़नेस से जुड़े कई अन्य पक्षों तक पहुँच सकती है.

वॉट्सऐप ने भारत में पेमेंट सेवा शुरू कर दी है और ऐसे में अगर आप इसका पेमेंट फ़ीचर इस्तेमाल करते हैं तो वॉट्सऐप आपकी कुछ और निजी डेटा इकट्ठा करेगा. मसलन, आपका पेमेंट अकाउंट और ट्रांज़ैक्शन से जुड़ी जानकारियाँ.

वॉट्सऐप यह दावा कर रहा है कि प्राइवेसी पॉलिसी बदलने से आम यूज़र्स की ज़िंदगी पर कोई असर नही पड़ेगा लेकिन क्या आप जो मैसेज, वीडियो, ऑडियो और डॉक्युमेंट वॉट्सऐप के ज़रिए एक-दूसरे को भेजते हैं, उसे लेकर आपको सचेत हो जाना चाहिए?

‘आग के भवँर सी है वॉट्सऐप की नई पॉलिसी’

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और ‘वॉट्सऐप लॉ’ किताब के लेखक पवन दुग्गल का मानना है कि वॉट्सऐप की नई प्राइवेसी पॉलिसी यूज़र्स को ‘आग के भँवर’ में घसीटने जैसी है.

बातचीत में पवन दुग्गल ने कहा, “वॉट्सऐप की नई पॉलिसी न सिर्फ़ भारतीयों की निजता का संपूर्ण हनन है बल्कि भारत सरकार के क़ानूनों का उल्लंघन है.”

हालाँकि वो ये भी कहते हैं कि भारत के मौजूदा क़ानून वॉट्सऐप के नियमों पर रोक लगाने में पूरी तरह कारगर नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “वॉट्सऐप जानता है कि भारत उसके लिए कितना बड़ा बाज़ार है. साथ ही वॉट्सऐप ये भी जानता है कि भारत में साइबर सुरक्षा और निजता से जुड़े ठोस क़ानूनों का अभाव है.”

यही वजह है कि वो भारत में अपने पाँव तेज़ी से पसारना चाहता है क्योंकि भारतीयों का निजी डेटा इकट्ठा करने और उसे थर्ड पार्टी तक पहुँचाने

कंज़्यूमर्स डेटा का अध्यनन करने वाली जर्मन कंपनी स्टैटिस्टा के मुताबिक़ जुलाई 2019 तक भारत में वॉट्सऐप के 40 करोड़ यूज़र्स थे.

'भारतीय क़ानूनों का उल्लंघन है वॉट्सऐप की नई पॉलिसी'

पवन दुग्गल कहते हैं कि भारत में न ही साइबर सुरक्षा से जुड़ा कोई मज़बूत क़ानून है, न ही पर्सनल डेटा प्रोक्टेशन से जुड़ा और न ही प्राइवेसी से जुड़ा.


वो कहते हैं, “भारत में एकमात्र एक क़ानून है जो पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन और साइबर सुरक्षा पर कुछ हद तक नज़र रखता है. वो है- प्रोद्यौगिकी सूचना क़ानून (आईटी ऐक्ट), 2000. दुर्भाग्य से भारत का आईटी ऐक्ट (सेक्शन 79) भी वॉट्सऐप जैसे सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए काफ़ी लचीला है.”


पवन दुग्गल के अनुसार, वॉट्सऐप की नई प्राइवेसी पॉलिसी आईटी ऐक्ट का उल्लंघन है. ख़ासकर इसके दो प्रावधानों का:


1) इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नॉलजी इंटमिडिएरी गाइडलाइंस रूल्स, 2011

2) इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नॉलजी रीज़नेबल सिक्योरिटी पैक्टिसेज़ ऐंड प्रोसीज़र्स ऐंड सेंसिटिव पर्सनल डेटा ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन रूल्स, 2011

वॉट्सऐप एक अमेरिकी कंपनी है और इसका मुख्यालय अमेरिका के कैलीफ़ोर्निया में है. वॉट्सऐप कहता है कि यह कैलीफ़ोर्निया के क़ानूनों के अधीन है.

वहीं, भारत के आईटी ऐक्ट की धारा-1 और धारा-75 के अनुसार अगर कोई सर्विस प्रोवाइडर भारत के बाहर स्थित है लेकिन उसकी सेवाएँ भारत में कंप्यूटर या मोबाइल फ़ोन पर भी उपलब्ध हैं तो वो भारतीय आईटी ऐक्ट के अधीन भी हो जाएगा.

यानी वॉट्सऐप भारत के आईटी एक्ट के दायरे में आता है, इसमें कोई शक नहीं है. दूसरी बात, वॉट्सऐप भारतीय आईटी ऐक्ट के अनुसार ‘इंटरमीडिएरी’ की परिभाषा के दायरे में आता है.

आईटी एक्ट की धारा-2 में इंटरमीडिएरीज़ को मोटे-मोटे तौर पर परिभाषित किया गया है, जिसमें दूसरों का निजी डेटा एक्सेस करने वाले सर्विस प्रोवाइडर्स शामिल हैं.

आईटी ऐक्ट के सेक्शन-79 के अनुसार इंटरमीडिएरीज़ को यूज़र्स के डेटा का इस्तेमाल करते हुए पूरी सावधानी बरतनी होगी और डेटा सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी उसी की होगी.

पवन दुग्गल कहते हैं कि अगर वॉट्सऐप की नई प्राइवेसी पॉलिसी और शर्तों को देखें तो ये कहीं से भी आईटी एक्ट के प्रावधानों पर खरी नहीं उतरतीं.

आज़मगढ़ से आज़मियों की खोज

 हमें गर्व है कि हम आजमगढ़ियां और आज़मी हैं..! 

@अरविंद सिंह

०आजमगढ़ियों और आज़मियों को अपनी माटी से मिलाने का एक प्रयास... एक आंदोलन..! 

आजमगढ़। हमने बहुत पहले एक छोटी सी कहानी सुनी थी। कितनी हकीकत है और कितना फसाना इस पर मत जाइएगा।लेकिन कहानी का लक्ष्य जरूर पकडिएगा।

दक्षिण अफ्रीका में एक छोटा सा द्वीप है। कबिलाई और आदिवासी प्रकृति के लोग रहते हैं। उनके यहाँ एक मिथक है कि-‘जब ये कबिलाई लोग नृत्य करते हैं तो पानी बरसता है।’ यह मिथक आज तकनीकि और विज्ञान के दौर में भी जारी है। दुनिया भर की एजेंसियां,रिसर्चर और वैज्ञानिक इस सत्य से सामना किये लेकिन इनके नाचने से पानी बरसने के अबूझ पहेली को हल नहीं कर सके। हार मान कर सभी वैज्ञानिक और रिसर्चर इस कबिले के सरदार से मिले और पूछे कि-“आखिर ऐसा क्या है कि आप के समुदाय के लोग जब नृत्य करते हैं तो पानी बरसने लगता है?” पहले तो सरदार दुनिया के इन महान वैज्ञानिकों और रिसर्चरों की सोच और उपलब्धि पर हँसा.. अटट्हास किया और फिर जवाब दिया,

“देखों दुनिया वालों! यह कोई मिथक नहीं है बल्कि हमारा अगाध और अटूट विश्वास है। हम तब तक नाचते हैं…हम तब तक नाचते हैं .. हम तब तक नाचते हैं,जब तक कि पानी न बरस जा। “अर्थात् पानी बरसने तक हम निर्ब़ाध.. बिना थके.. बिना रूके नाचते हैं.. और एक दिन पानी बरस ही जाता है।

दरअसल आजमगढ़ इस कहानी को अब जीने लगा है और उसे अब एहसास हो चुका है कि हमें भी पानी बरसने तक नाचना है। और हमसे कोई भी,चाहे मगरूर सत्ता ही क्यों न हो, यह विश्वास नहीं छिन सकती है। यह विश्वास ही हमारी ताक़त है और विश्वास ही हमार संघर्षपथ। अब यह पथ, चाहे अग्निपथ बने या लोकपथ, हमें हमारे लक्ष्य को पाने से अब कोई रोक नहीं सकता है। तमसा के पानी में आज भी वही रवानी है जो आजादी के समय था। हमने एक बार नहीं बल्कि तीन तीन बार अपने को आजाद घोषित किया है। ब्रितानी जेलों के सींखचें हमारी फौलादी जज्ब़े को रोक नहीं सके और हमने जेल के फाटक को तोड़, अपनों को आजाद कराया है। तमसा के पानी ने बूढ़े कुँवर सिंह में जवानी ला दी थी। हमने भूख का भूगोल जीया है लेकित बगा़वत का इतिहास कभी नहीं छोड़ा है। हम कहने को तो एक जनपदीय लोग हैं लेकिन हमारी विचार और सोच की भूमि केन्द्रीय है। हम जितना उत्तर को सोचते हैं उतना दक्षिण को महसूस करते हैं। पूरब हमारे सोच में है तो पश्चिम हमारी पहुँच में। यह ऋषियों और दरवेशों की भूमि है। क़लम और कौपिन की धरती है। यह सर्जना और रचना की भूमि है। खडी़ बोली का प्रथम महाकाव्य ‘प्रियप्रवास’ इसी धरती पर रचा गया है। यहाँ आज से लगभग ढा़ई सौ साल पहले विरह के गीत गाये गये हैं। यानि पलायन और पीडा़ हमारी नसों में रक्तप्रवाह बनकर सदियों से दौड़ रही है। हमने सामाजिक न्याय की लड़ाई को लड़ा है। हमने अन्याय के विरूद्ध आवाज मुखर की है। हमने देश ही नहीं दुनिया को रौशनी दी है। हमने वोल्गा से गंगा को जोडा़ है। तो वितस्ता की लहरों को भी महसूस किया है। गंगा जमुनी रवायत हमारी पहचान है तो विभिन्न विचारधाराओं को आत्मसात् कर चलने का हुनर हमें पूर्वजों ने सिखाया है।

ऐसी समृद्ध अतीत वाली धरती का वर्तमान इतना नि:सहाय नहीं हो सकता है। हमें लड़ना तो विरासत में सिखाया गया है। कभी गरीबी के खिलाफ तो कभी अन्याय के खिलाफ। यह लड़ाई आज असमानता और भेदभाव के खिलाफ है। आजमगढ़ तो बदलकर ही रहेगा, चाहे तमसा के पानी को एक बार फिर गर्म ही क्यों ना होना पड़े। हमें विश्वास है कि तमसा एक बार फिर अपनी रवानी दिखायेगी। क़लम की धरती क़लम के लिए आवाज़ उठायेगी.. जिसे मिलाना है वो हमारी आवाज़ में आवाज़ मिला दे। यह आवाज़ एक दिन दुनिया की आवाज जरूर बनेगी । भूख का भूगोल एक दिन अपनी नई पहचान के साथ आगे बढ़ेगी.. और काल के कपाल पर सृजन के गीत लिख देगी. क्योंकि हम उस माटी के लाल हैं जिसने देश और दुनिया में आजमगढ़ के इल्म और प्रतिभा की रौशनी को फैलाया है.. हमें गर्व है कि हम आजमगढ़ियां.. आज़मी है.

सुहेल साहब के शब्दों में-

“इस खित्ता-ए-आजमगढ़ पे फै़जान-ए-तजल्ली है यक्सर/जो ज़र्रा यहाँ से उठता है वो नैय्यर-ए-आजम होता है।”

पलामू डायरी -/

 पलामू डायरी - 99


यह इमारत कोई पुराना दफ्तर है।

कभी रेहला (गढ़वा रोड) में केंदू (बीड़ी) पत्ता की बड़ी- बड़ी आढ़तें हुआ करती थीं। सबसे बड़ी आढ़तिया थी जे० बी० कंपनी जिसके बीड़ी-पत्ते के विशाल गोदामों के कुछ अवशेष आज भी मौजूद हैं,एक में बच्चों के लिए एक नीजी स्कूल चल रहा है।इस कंपनी के मालिक थे गुजरात के झवेर भाई भूल जी भाई पटेल जिन्होंने इस अरण्यक्षेत्र में पलामू के जनहित के कई कार्य किए।

आज जब धनाढ्य धनकुबेर प्रभू वर्ग जनहित के नकाब पहने मंहगे शिक्षा-तकनीकी संस्थान या मल्टी-सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल स्थापित कर जनहित के प्रहसन रचते हुए जन की जेबें काटते-कुतरते लाभ लूट रहे हैं,जे०बी० कंपनी ने रेहला में एक विद्यालय की स्थापना की थी जो आज भी पलामू के एक मानक शिक्षा संस्थान के रूप में ख्यात है।

(विद्यालय के मुख्य भवन की तस्वीर विद्यालय के शिक्षक बंधु राजेश जी के सौजन्य से)

कवि की कथाएं

 #कवियों_की_कथा-57

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   इलाहाबाद(प्रयागराज) के श्रीरंग एक सुपरिचित कवि और आलोचक हैं! तीन कविता संग्रह सहित उनकी  दर्ज़न भर पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।वे पेशे से वकील हैं और जनता के पक्ष में वकालत करते हैं ।यही जनपक्षधरता उनकी लेखनी  की प्रबलता है।आज भूमंडलीकरण से उत्पन्न संकटों में से एक प्रमुख संकट है-पहचान का संकट! उनकी कविताओं में पहचान के संकट से जूझ रहे  आम जन के संघर्षों को स्वर मिला है,,!

  आज इस काॅलम की सत्तावनवीं कड़ी श्री श्रीरंग की कविताओं में आम जन के पक्ष में की गई वकालत को देखें ,,!


         कवि की कथा=कवि की कलम से 

                 #कवि_कथा


      लिखना पढ़ना बचपन से ही मेरे खून में रहा है । उसे एक शक्ल देने का काम मेरे जीवन की परिस्थितियो ने किया । मेरे गुरुओ और मित्रों ने किया ।  मेरा जन्म एक पारम्परिक कर्मकाण्डी पुरोहित ब्राहमण परिवार में हुआ जिसमे लिखना पढ़ना भी एक तरह से जीविका का साधन ही था । पिता भजन लिखते थे । उनके पिता भी भजन लिखते थे यानी मेरे बाबा भी लिखते थे स्वतंत्रता संग्राम के दौर में देश भक्ति के गीत भी लिखते थे । उसे ही गाते थे । पूजा पाठ भजन कीर्तन कथा ही हमारे परिवार की जीविका का साधन था । तो उसी संस्कार और परम्परा में मैने भी बचपन में भजन कीर्तन लिखता था । गाता था । लेकिन कुछ बडा हुआ और बडी कक्षा में गया तो पता चला कि साहित्य में तरह तरह के कवि हुए हैं और आधुनिक कवि अलग तरह का कविताएं लिखते है । ये भी पता चला कि हमारी मलिन बस्ती के जिस मंदिर में हम रहते थे वहाँ आने वालों में पद्मकांत मालवीय भी कवि हैं । जो पास के एक बडे बंगले में रहते है । थोड़ी ही दूर अशोक नगर में रहने वालीं जिनके यहाँ जजमानी लेने मेरी दादी जाती थी वे भी बहुत बड़ी कवयित्री हैं । वे महादेवी वर्मा थीं । एक बार हमारे स्कूल में मुख्य अतिथि बनकर आयीं, रामजी पाण्डे जी के साथ उस कार्यक्रम मैने भी एक कविता सुनाई जो पहली उन्हीं लोगों की तरह की नयी किसम की कविता थी । उन्हें वह कविता अच्छी लगी और मैं पुरस्कृत हुआ । उनके प्रति मेरा सम्मान और आदर भाव तभी से बना फिर हमेशा रहा । बाद में रामजी पाण्डे के पुग बृजेश से मेरी दोस्ती हो गयी और वहाँ साना जाना हमेशा जारी रहा । बाद में गीतकार यश मालवीय से परिचय हुआ जो रामजी पाण्डे जी के दामाद हैं । उनके साथ एजी अड्डे की बैठक शुरू हुई और मैं नवगीत लिखने लगा । वही एहतराम इस्लाम की सोहबत मिली तब कुछ गजलें भी लिखी । कर्मचारी नेता कामरेड सुरेश कुमार शेष का साथ मिला और मार्क्सवाद को कुछ जाना । यही एजी अड्डे पर ही लक्ष्मी कांत वर्मा दूधनाथ सिंह खीन्द्र कालिया ममता कालिया शेखर जोशी मार्कण्डेय नीलाभ  अनिता गोपेश अजामिल , श्रीप्रकाश मिश्र हरीशचंद्र पाण्डे ' जगदीश गुप्त ' अजीत पुष्कल  सुभाष चंद्र गांगुली ' शिवकुटी लाल वर्मा आदि के बारे मे जाना, जिनसे मुलाकात की । कई तो यहीं पर मिलते ही थे । लक्ष्मी कांत वर्मा जी से बैठकी का लम्बा दौर चला और मै समकालीन कविता लिखने लगा । मेरे पहले संग्रह यह कैसा समय को लम्बी भूमिका उन्होंने लिखी राजेश जोशी ने उसका फ्लैप लिखा । मुझमे कुछ प्रतिभा देखकर दूधनाथ सिंह जी ने मुझे अपने घर बुलाया और मुझे जनवादी लेखक संघ का सदस्य बना लिया । मैं उनका विद्यार्थी नहीं था किन्तु उनका शिष्य बन गया । उन्होने मेरी कविताओ पर अपनी राय दी और मेरा कविता पाठ रखवाया । इसमें मेरे ही जैसे कवि रतीनाथ योगेश्वर हीरा लाल आदि भी रखे गए । हम जनवादी हो गए । बाद में मैं सी पी एम का विधिवत सदस्य बन गया । तब से लिखना पढ़ना जारी है अब तक तीन कविता संग्रह चार कविता पर आलोचना की किताबे और तीन चार किताबे सामाजिक राजनैतिक श्रेणी की प्रकाशित हो चुकी है । हाल में असुर जनजाति पर मेरी किताब लोक भारती राजकमल प्रकाशन समूह से आयी है । लिखना पढ़ना आज भी जारी है । आज मैं पेशे से वकील हूँ और साहित्य में जनता के पक्ष से जिरह करता हूँ ऐसा वरिष्ठ कवि आलोचक प्रो0 राजेन्द्र कुमार जी ने मेरे बारे में आशीर्वाद स्वरूप कहा है । भाई शिरोमणि महतो का आभार जिनके आग्रह पर मुझे आप सबके सामने यह सब बताने का सौभागय मिला ।


#कविताएँ=


01-पिता, रोटी और बच्चे 

   

दिन भर हाथ पैर मारते पिता

बोलते झूठ सच

किसी तरह

करते

पेट का प्रबन्ध ...

घर लौटने पर/माँ

नोचने लगती मुँह

वरक्कत नहीं कमाई में

परई भर रहती

दिन की

परई पर

रात की

अपने करम पर

रोती भर भर आंसू माँ

पर रो नहीं पाते पिता

सारा गुस्सा

उतारते माँ पर पिता

माँ खीजती बच्चों पर ...

खटते पिता

खटती माँ

बनता जो मिलता सीधा-पिसान

डरे सहमे चुपपचाप खा लेते जो मिलता बच्चे

खाली आतों में पानी भर कर सो जाती माँ

बच्चे रोज देखते माँ को

रोज देखते पिता को

रोज देखते तकदीर को

जो बदल ही नही रही थी पीढ़ियों से ...।


02-पहचान का संकट 


एक दिन

मुझे

न जाने क्या सूझा कि

मैं खुद को घर पर छोड़कर

निकल पड़ा बाजार घूमने

मैं

सबको पहचानता

पर न पहचानता मुझे कोई

आते जाते परिचितों को मैं

दुआ सलाम करता पर

कोई जबाव न देता

या हिलाता सिर भी तो

कुछ इस तरह से कि

कौन है सिरफिरा

जो कर रहा है अन्जानों को सलाम ...

गलती किसी की नहीं

सिर्फ और सिर्फ मेरी थी जो

मैं

अपनी पहचान घर छोड़ आया था

और

खाक छान रहा था सड़कों की

उस दिन मुझे लगा

कितना अप्रीतकर होता है

अपनी पहचान का साथ न होना

मै देर रात जब

लौटा घर

पहचान खँूटी पर टँगी थी

देर तक बतियाता रहा

बतायी बाजार वाली बात

वह खूब हँसी, ठहाके लगाये

मैं डूबता चला गया

अपनी पहचान की हँसी में ...।


।। 

03- कुछ छोटी कुछ बड़ी बात 

                       (पाब्लो नेरूदा के प्रति)

बड़ा कवि

अपने पाठक में भी

कविता के बीज रोपता चलता है

बड़ी कविता

अपने भीतर

अनेक छोटी कविता के बीज रोपती है

बड़ा आदमी

छोटेपन से ऊपर उठ कर ही बनता है बड़ा,

साहित्य में

अपने समय का समूचा झूठ भी

उपस्थित होना चाहिए सच की तरह

कोई जीवन आदर्श नहीं

जीवन के अपने आदर्श होते हैं

पाब्लो तुम्हारे जीवन के आदर्श

हमारे जीवन के आदर्श बने

इसी कवायद के साथ कविता लिखता हूँ

जो संभव है कविता ही न हो ....।

।। 


04- नुक्कड़ से नोमपेन्ह 

(कम्बोडिया में युद्धरत आम आदमी के पक्ष में)


वे जो

बहुत सुबह नहीं निकलते घर से बाहर

या फिर नहीं करते

किसी लाल गोले की पूजा

देर रात गए

जब महानगर की बसें चलनी बंद हो जाती हैं

कमरों में सिटकनी लगाकर

चित्त हो जाता है महानगर

लौटते हैं घर

और बची-खुची रात

उड़ेल देते हैं औरतों के संसार में ......

वे जो

नुक्कड़ पर सारा दिन

दुनिया के सर्वोत्तम महामहिमों के

पाजामें का नाड़ा खोलने में

बिताते हैं/खाते हैं लाई चना

या फिर दबा लेते हैं होंठों के नीचे सुर्ती

अनगिनत चाय की प्यालियाँ

झोंकते रहते हैं पेट की भट्टी में ........

वे जो

बहुत गंभीर होने पर

जोरदार ठहाका लगाते हैं/पीटने लगते हैं मेज

बातों-ही-बातों में

समुद्र के अथाह अपार जल को

हजारों फिट ऊपर उछालने में

तनिक विचलित नहीं होते

आम-आदमी के पक्षधर

वे जो

दाढ़ी को उल्टे ताज की तरह धारण करते हैं

जिनकी दाढ़ी के एक बाल से

लेखपाल कर सकता है

हजार बार धरती की पैमाइश ...........

वे जो केवल

आग की तरह गर्म

हवा की तरह आकारहीन या

पानी की तरह पतले नहीं होते

उनके ही शब्दों की पीठ पर

यात्रा करते हैं विचार

नुक्कड़ से नोमपेन्ह तक ......।


                                         

05-नई सहस्राब्दी का सच


इस नयी सभ्यता में

जो कि है सूचना क्रान्ति का युग

सच बोलने की मनाही तो नहीं है कहीं

पर झूठ को ज्यादा दी जाती है तरजीह

अब ज्यादा फायदेमंद नजर आता है झूठ

सच की बनिस्बत


लोग 

झूठ बोलते-बोलते

झूठ सुनते-सुनते

झूठी हँसी, झूठी दिल्लगी

और झूठी जिन्दगी के इतने आदी हो चुके

हैं कि

यह सब झूठ ही सच लगता है


लेकिन 

कुछ माहिर हैं

जो निकाल लेेते हैं झूठ के बीच से

छाँटकर सच

और झेंप मिटाते हुए

बड़े-बड़े लोग

झूठी हँसी हँसने लग जाते हैं

पीठ थपथपाते हुए

चलो कोई तो है सच और झूठ की पहचान

करने वाला


वैसे इस नये समय में

सच की न तो किसी को जरूरत है

न किसी की मजबूरी

खाने को तो अभी भी लोग

खाते हैं

सच बोलने की ही सौगन्ध

लेकिन झूठ बोलने के सिवा कुछ नहीं

बोलते 


और यह झूठ ही

नई सहस्राब्दी का 

सबसे बड़ा सच है...।

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06-सौन्दर्य 


पहाड़

 ढँक जाता है

बर्फ  से इतना

 कि दिखता ही नहीं पहाड़

  पहाड़  के सिर पर लद जाता  है वर्फ का  पहाड़

वर्फ को  कभी बोझ नहीं मानता पहाड़


पृथ्वी 

लादे रहती  है  सिर  से पैर तक 

 नदी , जंगल , समुद्र,पहाड़

घरती की  पीठ पर होते है  कई -कई पहाड़

 पृथ्वी  दुनिया  के  बोझ से रहती है झुकी- झुकी

इसी से

 पृथ्वी कही जाती   है  धरती  

घरती के लिए  कभी भी

बोझ नहीं होता पहाड़


दूसरों का बोझ उठाने से ही     

दुनियाँ  बनती है सुन्दर  

भले ही  ज़िन्दगी में हों

दुख के लाखों  पहाड़  

पहाड़ का बोझ नहीं होती  बर्फ 

धरती  का बोझ नहीं

 होता    पहाड़ ।


07-अन्दाज-बे-अंदाज


जिन्दगी का अपना  होता है

 एक खास अन्दाज---

वाहन-चालक

पहिया नहीं ; गङ्ढा देखता है

और बचा लेता है

पहिए को गड्ढे में जाने से ,

अपने अन्दाज से

 चलती है गाड़ी---

सितार वादक

तार नहीं  , तार का व्यवहार देखता है

आँख मूँदकर बजाता है सितार 

बेसुरे समय में रचता है

सुरों का संसार

अपने खास अन्दाज से ---

आदमी 

मुँह नहीं देखता 

 कौर   मुँह में ही डालता  है

लेता है जीवन में  जीवन के स्वाद , 

अपने अन्दाज से---

 करने से होता है काम 

मेहनत और लगन से

 हो रियाज  

तो  पैदा हो ही जाता  है     एक अन्दाज 

अन्दाज जरूरी है जिन्दगी के लिए

जैसे गृहणी के लिए -दाल में नमक का अन्दाज ---

 अन्दाज से ही  बदलता है

 जीने का अन्दाज 

अन्दाज और तजुरबे  से ही 

ऑख मूँद कर भी 

होता जाता है सटीक काम

हर काम का होता है अपना अन्दाज ---

देखा-देखी 

करते हैं -नौसिखिए,- -सीखते-  सीखते 

एक दिन वे भी सीख ही जाते  हैं अन्दाज ---

लेकिन;

देखकर भी 

कुछ नहीं 

सीखते 

केवल --  --       बेअन्दाज---

बे-अन्दाजगी कितनी बढ़  चुकी है 

 हमारे समय में

किसी को नही है अभी 

इस बेअन्दाजगी  का अन्दाज ---।

--------

                                  

#परिचय=


            श्रीरंग


जन्म =सन् 1964


संप्रति =अधिवक्ता, इलाहाबाद हाईकोर्ट 


 पुस्तकें = तीन कविता संग्रह, चार आलोचना की किताबें, 

               चार अन्य किताबें ।

                                        

सम्मान = हिन्दी सेवा सम्मान 

               सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सम्मान 

                वसु मालवीय कविता  सम्मान

                डा0 सीताराम दीन स्मृति सम्मान

रविवार, 10 जनवरी 2021

मुंबई क् मुसलमान/ विवेक शुक्ला

 मुसलमान मुंबई के

साउथ मुंबई में ताज होटल के पीछे कोलाबा को देखते हैं। एक से बड़े एक शो-रूम,रेस्तरां, कॉफी शॉप और बड़ी कंपनियों के दफ्तर। किसी यूरोप के देश का हिस्सा लगता है कोलाबा। यूरोपीय अंदाज की इमारतों की भरमार है यहां। पारसी खूब रहते हैं।

इधर ज्यूलरी और दूसरे अनेकल शो-रूम मुसलमानों के हैं। ये इनके ऊपर लगे बोर्डों को पढ़कर समझ आ जाता है। ये जगह गेटवे ऑफ इंडिया से बिल्कुल करीब में है।

अब जुहू चलें। जुहू बीच पर हिजाब पहने मुसलमान लड़कियों का वॉलीबाल खेलना सामान्य बात है। दिल्ली से मुंबई गए किसी शख्स को ये छवियां अपनी तरफ खींचती हैं।

 क्या आपने दिल्ली में कनॉट प्लेस, साउथ एक्सटेंशन, राजौरी गॉर्डन या करोल बाग में किसी मुसलमान का बड़ा सा ज्वैलरी शो-रूम देखा है? अगर किसी ने देखा हो तो बताइये। मैंने तो नहीं देखा।  

मुंबई में जुहू,कोलाबा,बांद्रा से लेकर कलीना और कुर्ला के फीनिक्स मार्किट सिटी मॉल में मुसलमानों की दर्जनों दुकानें और शो-रूम देखे। 


साफ समझ आ गया कि दिल्ली का मुसलमान, जिसमें यूपी और बिहारी मुसलमान शामिल हैं, बहुत अलग हैं मुंबई वालों से। दिल्ली की बाबू मानसिकता सबको नौकरी करने के लिए प्रेरित करती है। मुंबई का मिजाज बिजनेस का है। उसका असर सारे मुंबईकरों पर होता है।


टाइम्स आफ इंडिया के सीनियर एडिटर और मित्र  Mohammed Wajihuddin जी बिहार से हैं। गुजरे 20-25 वर्षों से मुंबई में हैं। वे बता रहे थे कि मुंबई में खोजा, मेमन और बोहरा मुसलमान के खून में बिजनेस करना है। ये नौकरी के बजाय बिजनेस करना पसंद करते हैं। ये सब मोटा बिजनेस करते हैं।

मुंबई में ही है सिप्ला फार्मा कंपनी। ख्वाजा अब्दुल हामिद ने 1935 में अंधेरी में अपनी सिप्ला की पहली फैक्ट्री लगाई थी। उसमें 4 जुलाई,1939 को महात्मा गांधी खुद आए थे। गांधी जी ने हामिद से कहा था कि वे जीवन रक्षक दवाओं पर लगातार शोध करें। सिप्ला अब देश की चोटी की फार्मा कंपनी है। अरबों रुपये का सालाना कारोबार है। सिप्ला के मौजूदा चेयरमेन वाई.के.हामिद कॉरपोरेट इंडिया का बेहद खास नाम है।


 इसी मुंबई में ही 1960 में स्थापित हो गई Wockhardt pharmaceutical भी । इसकी मैन्यूफैक्टकिंग यूनिट भारत से बाहर ब्रिटेन,आयरलैंड, फ्रांस, अमेरिका में भी है। इसके चेयरमेन हबील खुराकीवाला फिक्की के भी चेयरमेन रहे हैं।


मुंबई ने यूपी वाले अबू आजमी को भी इतने मौके दिए कि वे भी कम से कम एक हजार करोड़ रुपए के साम्राज्य के तो मालिक हैं। उनकी बड़ी सी बिल्डिंग कोलाबा में है।

मुंबई के मुसलमान गुजराती, कोंकणी और मराठी भी बोल रहे हैं। आप मरीन ड्राइव पर शाम को बोहरा मुसलमानों को टहलते हुए गुजराती में बात करते हुए देख सकते हैं। ये टोपी भी अलग- अलग तरह की पहनते हैं। बोहरा मुसलमानों की टोपी ऊंची होती है। हाजी अली दरगाह में उर्दू सुनाई देती है। इधर लगे बोर्डो में गुजराती और हिन्दी भी पढ़ी जा सकती है।

मुंबई में हिजाब पहनकर महिलाएँ लक्जरी कारें  चला रही हैं। इनकी पहचान का हिस्सा है बुर्का और हिजाब। इन्हें आप जुहू के वेज रेस्तरां जैसे शिव सागर में डोसा या वड़ा पाव के साथ इंसाफ करते हुए भी देख सकते हैं।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

आज़ादी की क़ीमत / नीरा आर्या की कहानी

 आजादी की एक झलक😭😭😭😭😭

इतनी यातनाएं दी गईं और नेहरू कहता है चरखा से आजादी मिली? नीरा आर्य की कहानी। जेल में जब मेरे स्तन काटे गए ! स्वाधीनता संग्राम की मार्मिक गाथा। एक बार अवश्य पढ़े, नीरा आर्य (१९०२ - १९९८) की संघर्ष पूर्ण जीवनी:


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नीरा आर्य का विवाह ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था | नीरा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बचाने के लिए अंग्रेजी सेना में अपने अफसर पति श्रीकांत जयरंजन दास की हत्या कर दी थी | 


नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है | इस आत्म कथा का एक ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है -


5 मार्च 1902 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के खेकड़ा नगर में एक प्रतिष्ठित व्यापारी सेठ छज्जूमल के घर जन्मी नीरा आर्य आजाद हिन्द फौज में रानी झांसी रेजिमेंट की सिपाही थीं, जिन पर अंग्रेजी सरकार ने गुप्तचर होने का आरोप भी लगाया था। 


इन्हें नीरा ​नागिनी के नाम से भी जाना जाता है। इनके भाई बसंत कुमार भी आजाद हिन्द फौज में थे। इनके पिता सेठ छज्जूमल अपने समय के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे, जिनका व्यापार देशभर में फैला हुआ था। खासकर कलकत्ता में इनके पिताजी के व्यापार का मुख्य केंद्र था, इसलिए इनकी शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता में ही हुई। 


नीरा नागिन और इनके भाई बसंत कुमार के जीवन पर कई लोक गायकों ने काव्य संग्रह एवं भजन भी लिखे | 1998 में इनका निधन हैदराबाद में हुआ।


नीरा आर्य का विवाह ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था | 


नीरा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बचाने के लिए अंग्रेजी सेना में अपने अफसर पति श्रीकांत जयरंजन दास की हत्या कर दी थी।


आजाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद जब लाल किले में मुकदमा चला तो सभी बंदी सैनिकों को छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हें पति की हत्या के आरोप में काले पानी की सजा हुई थी, जहां इन्हें घोर यातनाएं दी गई। 


आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।


नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है | इस आत्म कथा का एक ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है - 

‘‘मैं जब कोलकाता जेल से अंडमान पहुंची, तो हमारे रहने का स्थान वे ही कोठरियाँ थीं, जिनमें अन्य महिला राजनैतिक अपराधी रही थी अथवा रहती थी।


 हमें रात के 10 बजे कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कंबल आदि का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी कि इस गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में रहते स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, जहाँ अभी तो ओढ़ने बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी है?


 जैसे-तैसे जमीन पर ही लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो कम्बल लेकर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेंककर चला गया। कंबलों का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा, परंतु कंबलों को पाकर संतोष भी आ ही गया। 


अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था।


‘‘सूर्य निकलते ही मुझको खिचड़ी मिली और लुहार भी आ गया। हाथ की सांकल काटते समय थोड़ा-सा चमड़ा भी काटा, परंतु पैरों में से आड़ी बेड़ी काटते समय, केवल दो-तीन बार हथौड़ी से पैरों की हड्डी को जाँचा कि कितनी पुष्ट है। 


मैंने एक बार दुःखी होकर कहा, ‘‘क्याअंधा है, जो पैर में मारता है?’’‘‘पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी?’’ 


उसने मुझे कहा था।‘‘बंधन में हूँ तुम्हारे कर भी क्या सकती हूँ...’’ फिर मैंने उनके ऊपर थूक दिया था, ‘‘औरतों की इज्जत करना सीखो?’’


जेलर भी साथ थे, तो उसने कड़क आवाज में कहा, ‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा,यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं?’’


‘‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे,’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘सारी दुनिया जानती है।’’


‘‘नेताजी जिंदा हैं....झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए?’’ जेलर ने कहा। 

‘‘हाँ नेताजी जिंदा हैं।’’


‘‘तो कहाँ हैं...।’’


‘‘मेरे दिल में जिंदा हैं वे।’’ 


जैसे ही मैंने कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोले, ‘‘तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।’’ और फिर उन्होंने मेरे आँचल पर ही हाथ डाल दिया और मेरी आँगी को फाड़ते हुए फिर लुहार की ओर संकेत किया...लुहार ने एक बड़ा सा जंबूड़ औजार जैसा फुलवारी में इधर-उधर बढ़ी हुई पत्तियाँ काटने के काम आता है, उस ब्रेस्ट रिपर को उठा लिया और मेरे दाएँ स्तन को उसमें दबाकर काटने चला था...लेकिन उसमें धार नहीं थी, ठूँठा था और उरोजों (स्तनों) को दबाकर असहनीय पीड़ा देते हुए दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, ‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये दोनों गुब्बारे छाती से अलग कर दिए जाएँगे...’’ 


उसने फिर चिमटानुमा हथियार मेरी नाक पर मारते हुए कहा, ‘‘शुक्र मानो महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग से नहीं तपाया, आग से तपाया होता तो तुम्हारे दोनों स्तन पूरी तरह उखड़ जाते।’’ सलाम हैं ऐसे देश भक्त को। आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।


जय हिन्द, जय माँ भारती, वन्देमातरम !!!


पढ़ने के बाद ही रूह कांप जाती है जिन पर बीती होगी उसका दर्द वही जानते होंगे नमन हैं ऐसे क्रांतिवीरों को!

महाराणा प्रताप का जीवन क्रमांक

 नाम - कुँवर प्रताप जी (श्री महाराणा प्रताप सिंह जी)

जन्म - 9 मई, 1540 ई.

जन्म भूमि - कुम्भलगढ़, राजस्थान

पुण्य तिथि - 29 जनवरी, 1597 ई.

पिता - श्री महाराणा उदयसिंह जी

माता - राणी जीवत कँवर जी

राज्य - मेवाड़

शासन काल - 1568–1597ई.

शासन अवधि - 29 वर्ष

 राजवंश - सिसोदिया

राजघराना - राजपूताना

धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म

युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध

राजधानी - उदयपुर

पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह

उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह


अन्य जानकारी -

महाराणा प्रताप सिंह जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था,

जिसका नाम 'चेतक'🐎 था।


राजपूत शिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह उदयपुर,

मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे।


वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर मेवाड़-मुकुटमणि

राणा प्रताप का जन्म हुआ।


महाराणा का नाम

इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिये अमर है।


महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर

के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती

है।


महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी:-


1... महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत🏇 दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।


2.... जब इब्राहिम लिंकन💂🏻 भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने

अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर

आए| तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि

हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल🌪 लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान👑 के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ” लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़

प्रेसिडेंट यु एस ए ‘किताब 📘में आप यह बात पढ़ सकते हैं |


3.... महाराणा प्रताप के भाले🏑 का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था|


कवच, 👤भाला,🏑 ढाल,🏵 और हाथ में तलवार🗡 का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।


4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान

उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |


5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी|

लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |


6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और

अकबर की ओर से 85,000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |


7.... महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक 🐎का मंदिर भी बना हुआ है जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |


8.... महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं| 🗡🗡🗡🗡

इसी

समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार⛩ कहा जाता है|

मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को |


9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई।

आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था |


10..... महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60,000 मुगलो से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे

जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |


11.... महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |


12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में

अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे|

आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं तो दूसरी तरफ भील |


13..... महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक🐎 महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |


14..... राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके

मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी

की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे|


15..... मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया

हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और

महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे |


16.... महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।


महाराणा प्रताप के हाथी🐘

की कहानी:


मित्रो आप सब ने महाराणा

प्रताप के घोड़े चेतक के बारे

में तो सुना ही होगा,

लेकिन उनका एक हाथी

भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ।


रामप्रसाद हाथी का उल्लेख

अल- बदायुनी, जो मुगलों

की ओर से हल्दीघाटी के

युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है।


वो लिखता है की जब महाराणा

प्रताप पर अकबर ने चढाई की

थी तब उसने दो चीजो को

ही बंदी बनाने की मांग की

थी एक तो खुद महाराणा

और दूसरा उनका हाथी

रामप्रसाद।


आगे अल बदायुनी लिखता है

की वो हाथी इतना समझदार

व ताकतवर था की उसने

हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही

अकबर के 13 हाथियों को मार

गिराया था


वो आगे लिखता है कि

उस हाथी को पकड़ने के लिए

हमने 7 बड़े हाथियों का एक

चक्रव्यूह बनाया और उन पर

14 महावतो को बिठाया तब

कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।


अब सुनिए एक भारतीय

जानवर की स्वामी भक्ति।


उस हाथी को अकबर के समक्ष

पेश किया गया जहा अकबर ने

उसका नाम पीरप्रसाद रखा।

रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने

और पानी दिया।

पर उस स्वामिभक्त हाथी ने

18 दिन तक मुगलों का न

तो दाना खाया और न ही

पानी पिया और वो शहीद

हो गया।


तब अकबर ने कहा था कि

🔹जिसके हाथी को मैं अपने सामने

नहीं झुका पाया उस महाराणा

प्रताप को क्या झुका पाउँगा।🔹

ऐसे ऐसे देशभक्त चेतक व रामप्रसाद जैसे तो यहाँ

जानवर थे।


इसलिए मित्रो हमेशा अपने

भारतीय होने पे गर्व करो। इसे

पढ़कर सीना अवश्य चौड़ा हुआ होगा।🙏🏻

यूपी नंबर एक

 *शोध के क्षेत्र में यूपी के विश्‍वविद्यालयों ने रचा इतिहास, देश में तीसरे नम्‍बर पर पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय*


*एमएचआरडी व यूजीसी की शोध गंगा एप पर यूपी के दो विश्‍वविद्यालय टॉप टेन में* 


*मुख्‍यमंत्री ने बदली प्रदेश में उच्‍च शिक्षा की सूरत, शोध में हुआ इजाफा*


*6 महीने पहले 5 वें स्‍थान से छलांग मार तीसरे नम्‍बर पर पहुंचा पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय* 


*लखनऊ,8 जनवरी* 


प्रदेश की बेसिक शिक्षा को नए आयाम देने के साथ मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ उच्‍च शिक्षा को भी नई ऊंचाईयों तक पहुंचा रहे हैं। पूर्वांचल के विकास के साथ यहां उच्‍च शिक्षा के क्षेत्र में किए प्रयासों के परिणाम आना शुरू हो गए हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय व यूजीसी के सहयोग से शोध को बढ़ाने के बनाए गए शोध गंगा पोर्टल पर 6 महीने पहले देश में पांचवा स्‍थान रखने वाला वीबीएस पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय अब देश में तीसरे और प्रदेश में अव्‍वल नम्‍बर पर आ गया है। विश्‍वविद्यालय की ओर से शोध गंगा पोर्टल पर अब तक 8211 थिसिस अपलोड की गई है। इसके अलावा कानपुर का छत्रपति साहू जी महाराज विश्‍वविद्यालय भी टॉप टेन में अपनी जगह बनाए हुए है। 


देश भर में शोध की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय व विवि अनुदान आयोग यूजीसी के सहयोग से शोध गंगा पोर्टल तैयार किया गया। यूजीसी की ओर से सभी विश्वविद्यालय को इस पोर्टल पर अपनी थीसिस अपलोड करने के निर्देश भी दिए हैं। इसे थीसिस कंटेंट चोरी पर लगाम लगी है। इसके अलावा एक शोधार्थी के किए गए शोध कार्य दुनिया के दूसरे कोने में बैठे अन्य शोधार्थी देख सकते हैं और उसका फायदा भी उठा सकते हैं। 


*ये हैं टॉप तीन विश्वविद्यालय* 


प्रदेश में 17 राज्य विश्वविद्यालय हैं। इसमें, 8211 थीसिस के साथ वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विवि जौनपुर देश भर में तीसरे नम्‍बर पर है। कानपुर का छत्रपति साहू जी महाराज विश्‍वविद्यालय देश भर के विश्‍वविद्यालयों में 6वें स्‍थान पर है। इसके अलावा 4598 थीसिस के साथ  डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विवि अयोध्या भी टॉप विश्‍वविद्यालयों में अपनी जगह बनाए हुए हैं। यहां पिछले छह महीने में काफी तेजी से काम हुआ है। चौधरी चरण सिंह विवि मेरठ से 2122 थीसिस अपलोड की गई। 


*यूपी के विश्‍वविद्यालय शोध में आगे* 


आचार्य नरेन्‍द्र देव कृषि विश्‍वविद्यालय 186, लखनऊ विश्‍वविद्यालय 1047, इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय 1356, चौधरी चरण सिं‍ह विश्‍वविद्यालय की ओर से 2122 थिसिस (शोध कार्य) गंगा पर अपलोड किए गए हैं। इसके अलावा सरकार के सहयोग से प्रदेश के निजी विश्विद्यालय भी शोध के क्षेत्र में उत्‍कृ‍ष्‍ट कार्य कर रहे हैं। 


*क्या है शोध गंगा एप*


जानकारों के मुताबिक कुछ साल पहले तक शोधार्थियों द्वारा कॉपी-पेस्ट करके शोध प्रस्तुत कर काम किया जा रहा था। इससे शोध की गुणवत्‍ता पर काफी असर पड़ता था। एमएचआरडी ने शोध की गुणवत्‍ता बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने नए सॉफ्टवेयर शोध गंगा एप की शुरूआत की। इसमें विश्‍वविद्यालयों को अपने यहां हुए शोध की सीडी पोर्टल पर  अपलोड करना होती है। अब तक पूरे देश के 476 विश्‍वविद्यालयों द्वारा 2,91,848 थिसिस पोर्टल पर अपलोड कर चुके हैं।  


यूजीसी की ओर से तैयार किए गए शोध गंगा एप से शोध क्षेत्र में गुणवत्‍ता बढ़ी है। खासकर यूपी के विश्‍वविद्यालयों में शोध पर काफी तेजी से काम हो रहा है। यूपी में उच्‍च शिक्षा को ऊंचाइयों तक ले जाने का पूरा श्रेय मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को जाता है। जिनके प्रयासों से प्रदेश में उच्‍च शिक्षा की नई तस्‍वीर सामने आ रही है।

डॉ मौलिन्‍दु मिश्र, पूर्व अध्‍यक्ष लुआक्‍टा

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

हनुमान मंदिर और इंद्र कुमार गुजराल / विवेक शुक्ला

हनुमान मंदिर के पीछे


कनॉट प्लेस के हनुमान रोड का जिक्र आने पर पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल कुछ भावुक होकर बताने लगते थे कि ‘हनुमान रोड तक मेरे साथ ही रह्ता था सतीश (गुजराल)। ’ वहां पर रहते हुए सतीश गुजराल ने लाजपत नगर के अपने घर में शिफ्ट कर लिया था। मतलब 33 हनुमान रोड  में दोनों भाई एक छत के नीचे  ही रहते थे। ये 1960 के दशक की बातें हैं।

हनुमान मंदिर के ठीक पीछे है हनुमान रोड। यहां एक सामानांतर दुनिया बसती है। एक बेहद कुलीन एरिया के रूप में हनुमान रोड की पहचान गुजरे दशकों से बनी हुई है। 

 इसे नई दिल्ली की सबसे पहली बनी अति सभ्रांत कॉलोनियों में से एक माना जा सकता है। गोल्फ लिंक, जोर बाग, सुंदर नगर 1952 के बाद बने थे। नई दिल्ली के बड़े बिल्डर सरदार सोबा सिंह ने हनुमान रोड में 1940 में प्लाट काट कर बेचे थे। यानी एक बार नई दिल्ली का 1931 में निर्माण पूरा होने के बाद हनुमान रोड कॉलोनी बनी और बसी। यहाँ शुरुआती दौर में दिल्ली के  असरदार लोगों ने अपने आशियाने बनाए थे।


हनुमान रोड से पहले बंगाली मार्किट बन और बस चुकी थी। पर उसमें अधिकतर पुरानी दिल्ली के परिवार ही आए थे। इस लिहाज से हनुमान रोड अधिक समावेशी रहा।

हनुमान रोड में लंबे समय तक कोका कोला कंपनी के भारत में मालिक सरदार मोहन सिंह, जिनके नाम पर मोहन सिंह प्लेस है और जिनके पुत्र चरणजीत सिंह ने मेरिडियन होटल बनाया था, मशहूर बिल्डर उत्तम सिंह सेठी, चेम्सफोर्ड क्लब के अध्यक्ष रहे मेहरबान सिंह धूपिया और स्वाधीनता सेनानी और कारोबारी बांके लाल भार्गव भी रहे।

 मेदांता अस्पताल के चेयरमेन डा.नरेश त्रिहेन, सांसद नरेश गुजराल और मशहूर फोटोग्राफर अविनाश पसरीचा का बचपन भी इधर गुजरा। अविनाश पसरीचा अब भी हनुमान रोड में ही रहते हैं। इधर कुछ प्लाट दिल्ली में बसे गुजराती और बंगाली परिवारों ने भी लिए थे।

 रीगल सिनेमा से सटी मशहूर गांगुली वाचेज शो-रूम के मालिक की भी यहां कोठी थी। अब तो इस शो-रूम का स्वामित्व भी हस्तांरित हो चुका है।

हां, देश की आजादी के बाद हनुमान रोड का चरित्र बदला। इधर कुछ प्रमुख रिफ्यूजी परिवारों ने रेंट पर ही घर ले लिए, कुछ मुसलमान अपने घरों को बेचकर पाकिस्तान चले गए।

हनुमान रोड में सड़क के दोनों तरफ 56 प्लाट हैं। ये 500 गज से 2400 गज के हैं। पर इधर की कुछ कोठियों की दशा को देखकर निराशा होती है। इनमें सफेदी हुए भी लगता है कि काफी समय बीत गया है।  कभी इन बड़े-विशाल घरों ने बेहतर दिन होंगे।

 हनुमान रोड की बात होगी तो यहां के आर्य समाज मंदिर की अवश्य चर्चा होगी। इधर हजारों लोगों की सादगी से शादी हो चुकी है। यहां का लैंडमार्क है आर्य समाज मंदिर।

हनुमान रोड में रहने वालों में गजब की सामाजिकता रही है। यहाँ के सब लोगों में प्रेम और भाईचारे वाले सम्बंध सदैव बने रहे। हनुमान रोड की होली - दिवाली के क्या कहने । सब मिलकर इन पर्वों को मनाते रहे। 


अब भी हनुमान रोड में कई परिवार 1940 से ही रह रहे हैं। हां, कुछ परिवार चले भी गए हैं। कारण यह है कि अब हनुमान रोड में हलचल काफी रहती है। 48 हनुमान रोड पर स्पेन कल्चरल  सेंटर चालू हो गया है। इस कारण यहां की जिंदगी पहले जैसी सुकून भरी तो नहीं रही है। फिर इधर बंदरों का आतंक भी लगातार बढ़ रहा है। बहरहाल,जो कभी यहां रह लिया उसके दिलों में बसता है हनुमान रोड।

30 दिसंबर 2020

Vivek Shukla

बुधवार, 6 जनवरी 2021

मुंबई में मिनी रावलपिंडी / विवेक शुक्ला

 रावलपिंडी का एक कोना मुंबई में

मुंबई का पाकिस्तान के शहर रावलपिंडी से रिश्ता है। ये सुन-पढ़कर हैरानी हो सकती है। पर संबंध तो है। इस रिश्ते को अटूट बनाता है एक गुरुद्वारा । इसका नाम है गुरुद्वारा धन पोठवार । ये सांताक्रूज वेस्ट में है।


धन पोठवार रावलपिंडी शहर से लगा एक गांव है। वहां सिखों की आबादी खासी थी।  देश का बंटवारा हुआ तो उस धन पोठवार गांव के सिख और हिन्दू भारत आ गए। कुछ ने मार्च, 1947 के बाद से ही भारत के हिस्से के पंजाब में आना चालू शुरू कर दिया था। तब वहां पर भीषण कत्लेआम हुआ था। उसके जवाब में जालंधर में खूब इंसानियत शर्मसार हुई थी।


स्वीडन में बस गए पाकिस्तानी चिंतक और इतिहासकार प्रो. इश्तिआक अहमद ने अपनी किताब The Punjab Bloodied, Partitioned and Cleansed में लिखा है कि पंजाब में सबसे पहले दंगे रावलपिंडी शहर और उसके आसपास के गांवों में ही भड़के थे।


खैर, धनपोठवार के बहुत से लोग आगे चलकर मुंबई में भी बसे। उनके मुंबई में पैर जमने लगे तो उन्होंने स्थापित किया अपने गांव के नाम पर गुरुद्वारा धन पोठवार । धनपोठवार के ही रहने वाले थे रैनबैक्सी फार्मा के फाउंडर चेयरमेन भाई मोहन सिंह।


अपने हाल के मुंबई प्रवास के दौरान एक सिख मित्र से बात की।  उन्होंने बताया कि इसे धन पोठवार से आए परिवारों ने ही स्थापित किया था। मुंबई के महत्वपूर्ण गुरुद्वारों में से एक है। बाबा नानक के जन्म दिन पर विशाल नगर कीर्तन यहां से शुरू होता है। लंगर तो चलता ही है।


कोविड काल के कारण इस गुरुद्वारे के बाहर से ही दर्शन किए। अगली मुंबई यात्रा में इसके अंदर जाकर मत्था टेकने की इच्छा है।


गुरुद्वारे के बाहर कुछ सिख आपस में हिन्दी में बातचीत कर रहे थे। सब 45 की उम्र से कम के थे। उनकी हिन्दी में मराठी की महक आ रही थी। उनकी बातचीत को सुनकर ख्याल आया कि अब नौजवान पीढ़ी को रावलपिंडी की पोठवारी पंजाबी तो नहीं आती होगी। आखिर भाषा धरती की होती है। भाषा का संबंध धर्म से नहीं होता।


 आखिर में एक बात और। दिल्ली में रावलपिंडी से आए हिन्दुओं और सिखों ने न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी बनाई थी।


विवेक  शुक्ला / NBT  

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

ब्रेन-हेमरेज, ब्रेन-स्ट्रोक का उपचार

ब्रेन-हेमरेज, ब्रेन-स्ट्रोक (मस्तिष्क आघात) अर्थात दिमाग़ की नस का फटना।*


*मस्तिष्क आघात के मरीज़ को कैसे पहचानें?*


एक पार्टी चल रही थी, एक महिला को थोड़ी ठोकर सी लगी और वह गिरते गिरते संभल गई, मगर उसने अपने आसपास के लोगों को यह कह कर आश्वस्त कर दिया कि -"सब कुछ ठीक है, बस नये बूट की वजह से एक ईंट से थोड़ी ठोकर लग गई थी" । 

(यद्यपि आसपास के लोगों ने ऐम्बुलैंस बुलाने की पेशकश भी की...)

साथ में खड़े मित्रों ने उन्हें साफ़ होने में मदद की और एक नई प्लेट भी आ गई! ऐसा लग रहा था कि महिला थोड़ा अपने आप में सहज नहीं है! उस समय तो वह पूरी शाम पार्टी एन्जॉय करती रहीं, पर बाद में उसके पति का लोगों के पास फोन आया कि उसे अस्पताल में ले जाया गया जहाँ उसने उसी शाम दम तोड़ दिया!!

दरअसल उस पार्टी के दौरान महिला को ब्रेन-हैमरेज हुआ था! 

अगर वहाँ पर मौजूद लोगों में से कोई इस अवस्था की पहचान कर पाता तो आज वो महिला हमारे बीच जीवित होती..!!

माना कि ब्रेन-हैमरेज से कुछ लोग मरते नहीं है, लेकिन वे सारी उम्र के लिये अपाहिज़ और बेबसी वाला जीवन जीने पर मजबूर तो हो ही जाते हैं!!

स्ट्रोक की पहचान-

बामुश्किल एक मिनट का समय लगेगा, आईए जानते हैं-

न्यूरोलॉजिस्ट कहते हैं- 

अगर कोई व्यक्ति ब्रेन में स्ट्रोक लगने के, तीन घंटे के अंदर, अगर उनके पास पहुँच जाए तो स्ट्रोक के प्रभाव को पूरी तरह से समाप्त (reverse) किया जा सकता है। 

उनका मानना है कि सारी की सारी ट्रिक बस यही है कि कैसे भी स्ट्रोक के लक्षणों की तुरंत पहचान होकर, मरीज़ को जल्द से जल्द (यानि तीन घंटे के अंदर-अंदर) डाक्टरी चिकित्सा मुहैया हो सके, और बस दुःख इस बात का ही है कि अज्ञानतावश यह सब ही execute नहीं हो पाता है!!!

मस्तिष्क के चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार स्ट्रोक के मरीज़ की पहचान के लिए तीन अतिमहत्वपूर्ण बातें जिन्हें वे STR कहते हैं, सदैव ध्यान में रखनी चाहिए। *अगर STR नामक ये तीन बातें हमें मालूम हों तो मरीज़ के बहुमूल्य जीवन को बचाया जा सकता है।*


ये 3 बातें इस प्रकार हैं


*(1) S = Smile अर्थात उस व्यक्ति को मुस्कुराने के लिये कहिए।*

*(2) T = Talk यानि उस व्यक्ति को कोई भी सीधा सा एक वाक्य बोलने के लिये कहें, जैसे- 'आज मौसम बहुत अच्छा है' आदि।*

और तीसरा...

*(3) R = Raise अर्थात उस व्यक्ति को उसके दोनों बाजू ऊपर उठाने के लिए कहें।*


अगर उस व्यक्ति को उपरोक्त तीन कामों में से एक भी काम करने में दिक्कत है, तो तुरंत ऐम्बुलैंस बुलाकर उसे न्यूरो-चिकित्सक के अस्पताल में शिफ्ट करें और जो आदमी साथ जा रहा है उसे इन लक्षणों के बारे में बता दें ताकि वह पहले से ही डाक्टर को इस बाबत खुलासा कर सके।

इनके अलावा स्ट्रोक का एक लक्षण यह भी है।

उस आदमी को अपनी जीभ बाहर निकालने को कहें। अगर उसकी जीभ सीधी बाहर नहीं आकर, एक तरफ़ मुड़ सी रही है, तो यह भी ब्रेन-स्ट्रोक का एक प्रमुख लक्षण है।

एक सुप्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि अगर इस मैसेज़ को पढ़ने वाला, इसे ज्यादा नही तो आगे, कम से कम अगर दस लोगों को भी भेजे, तो निश्चित तौर पर, कुछ न कुछ बेशकीमती "जानें" तो बचाई ही जा सकती हैं!!!

आवश्यक है कि इस जानकारी को अधिकतम शेयर करें।

जी हाँ मित्रों,

समय गूंगा नहीं, बस मौन है!!

ये तो वक्त ही बताता है, कि किसका कौन है??

🙏🌹🤝🌹यह आपके लिए नहीं हे . पर इस की जानकारी से किस्सी जान बच। जाये तो यह जनहित हे भेज रहा हूँ।

रतन वर्मा का लेखन संसार / विजय केसरी

 (6 जनवरी, कथाकार रतन वर्मा के 71 वें जन्मदिन पर विशेष)

'सामाजिकता की सीख देती रतन वर्मा की सहृदयता'शीर्षक से यह आलेख हिंदी दैनिक 'आवाज' के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित है।

भाई रतन वर्मा जी 71 वें वर्ष में प्रवेश कर गए हैं। जन्मदिन पर मेरी ओर से ढेर सारी बधाइयां।

 आपके घर में हमेशा सुख, समृद्धि और शांति बनी रहे। यही मैं परम पिता परमेश्वर से कामना करता हूं।


झारखंड के जाने-माने साहित्यकार, कथाकार, कवि रतन वर्मा 71 वें वर्ष में प्रवेश कर गए हैं। वे बीते चार दशकों से  लगातार हिंदी की सेवा करते चले आ रहे हैं। अब तक उनकी दो सौ अधिक कहानियां, छः से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। राष्ट्रीय दूरदर्शन पर धारावाहिक भी टेलीकास्ट हो चुके हैं। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर दर्जनों पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। उनकी एक लोकप्रिय कहानी 'नेटुआ'  राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूम मचा चुकी है। 'नेटुआ' कहानी से 'नेटुआ कर्म बड़ा दुखदाई' उपन्यास के रूप में रूपांतरण, उसकी बढ़ती लोकप्रियता ही है। अब तक नेटुआ कहानी पर सौ से अधिक  नाट्य मंचन हो चुके हैैं। ओलंपियाड में भी नेटुआ का सफल मंचन हो चुका है। आए दिन नेटुआ पर कहीं न कहीं नाट्य मंचन होता ही रहता है। इन तमाम उपलब्धियों के बाद भी रतन वर्मा की सहृदयता उसी रूप में बनी रहती है। यह अपने आप में बड़ी बात है।

 रतन वर्मा जी को से मेरा परिचय तीस वर्ष पुराना है। मैं जैसे-जैसे उनके नजदीक पहुंचा, उनकी सहृदयता और सक्रियता देखकर बहुत कुछ सीखा। लोग साठवें वर्ष में पहुंचते ही स्वयं को रिटायर्ड समझने लगते हैं। लेकिन रतन वर्मा के साथ यह बात लागू नहीं होती है। जब वे चालीस साल के रहे तब मैंने जो सक्रियता उनमें देखी, आज भी   वही सक्रियता देख रहा हूं। वे  निरंतर साहित्य के लिए कुछ ना कुछ करते रहते हैं। वे हमेशा  साहित्यानुरागियों, लेखकों, कवियों और आलोचकों से दूरभाष पर बातें करते रहते हैं। वे हमेशा अपने स्वजनों से हाल चाल लेते रहते हैं। मैंने देखा है कि रतन वर्मा अपने मिलने जुलने वालों के सुख दुख में हमेशा साथ खड़े रहते हैं। अगर कोई थोड़ी भी परेशानी में हो तो वे एक संबल के रूप में पीछे  खड़े नजर आते हैं।

  हाल  ही में उनकी एक पुस्तक (कहानी संग्रह) 'भूख भूख और भूख' प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक प्रकाशन के साथ ही धूम मचा दी है। इस  पुस्तक की  एक कहानी 'गुलबिया'शीर्षक से दर्ज है। यह कहानी एक औरत के दर्द और संघर्ष को लेकर आगे बढ़ती है। वहीं दूसरी कहानी 'दस्तक' मनुष्य के शारीरिक भूख की मनोदशा को उसी रूप में प्रस्तुत करती नजर आती है। रतन वर्मा की कहानियां हमेशा समय से संवाद करती नजर आती है। रतन वर्मा जी की कहानियां हर उम्र के लोगों के लिहाज से लिखी गई हो, ऐसा जान पड़ता है। । उन्होंने बच्चों के लिए भी काफी कहानियां लिखी है। उनकी एक कहानी 'आइसक्रीम' जो बाल मनोविज्ञान पर आधारित है। इस कहानी में एक आइसक्रीम  बेचने वाले का बेटा कई दिनों से पैसे जमा कर आइसक्रीम खरीदने के लिए अपने पिता को  पैसे बढ़ाता है। यह देख उनके पिता हतप्रभ रह जाते हैं। उनकी आंखों से आंसू छलक ने पड़ते हैं। फिर अपने बेटे को आइसक्रीम देकर गले से लगा लेता है। 'गफूर का बगीचा" भी एक दर्द भरी कहानी है, जिसमें पति के देहावसान के बाद उस विधवा औरत को यह अमरूद का बगीचा आर्थिक रूप से बहुत साथ देता है। देता है। उनकी हालिया पुस्तक "नेटुआ कर्म बड़ा दुखदाई" नेटुआ नृत्य पर आधारित है। अब नेटुआ नृत्य  समाप्ति की ओर है। इस नृत्य में एक लड़का , स्त्री का रूप धारण कर शादी विवाहह व अन्य खुशी के अवसरों पर अपने नृत्य के माध्यम से लोगों का मनोरंजन  करता  है। विलुप्त होती नेटुआ नृत्य परंपरा और उसकी पीड़ा को रतन वर्मा जी ने बखूबी  प्रस्तुत कर श्रेष्ठ कार्य किया है। आज नेटुआ नृत्य प्रथा समाप्ति की ओर है। इसे ध्यान में रखकर ही वर्मा जी ने कहानी से  उपन्यास के रूप में विस्तार दिया है। फलस्वरूप आज राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेटुआ नाटक का मंचन हो रहा है। लोग नृत्य देखकर  इस पुरानी प्रथा से परिचित हो रहे हैैं।

   मैं जब भी उनसे मिला, साहित्य में क्या कुछ लिखा जा रहा है ? मैं क्या लिख रहा हूं?  अन्य साहित्यिक  मित्रगण क्या लिख रहे हैं ? जैसी  बातों पर उनसे खुलकर बातचीत होती रहती है। उन्हें हमेशा साहित्य की साधना में लीन पाता हूं। 

   आज जबकि फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे सोशल साइट्स बहुत लोकप्रिय के हो गए हैं। वे फेसबुक पर भी सक्रिय देखे जाते हैं । वे फेसबुक पर अपनी बातों के साथ गीत, गजल और कविताओं के साथ भी नजर आते हैं। बतौर एक लेखक के रूप में वे जिन मूल्यों, सिद्धांतों और आदर्शों को स्थापित करते हैं, उनका व्यवहारिक पक्ष भी इन्हीं आदर्शों पर चलता नजर आता है । उनकी सामाजिक सक्रियता देखते बनती है । उन्होंने अब तक हिंदी साहित्य के क्षेत्र में बहुत कुछ गढ़ा है । इन सबके बावजूद उनकी सामाजिक सक्रियता भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ती चली जा रही है। वे हजारीबाग और बाहर होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों में भी अपनी बातों को रखते हुए नजर आते हैं।  देश में आई विपदा पर वे लोगों से धन इकट्ठा करते नजर आते हैं। वे अध्यात्मिक क्षेत्र में हो रहे अनुष्ठानों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं। वे सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ आंदोलन करते भी नजर आते हैं । इन तमाम खुबियों के साथ रतन वर्मा की सहृदयता सबको भाती है। उनकी सहृदय व सहजता सामाजिकता की सीख देती है।

    आज की बदली परिस्थिति में लोग एक दूसरे से दूर होते चले जा रहे हैं। वे लोगों के करीब जा रहे हैं।  लोग उनके करीब पहुंच रहे हैं।  वे अपने आलोचकों से भी उसी  सहजता और प्रेम से मिलते हैं। वे अपने आलोचकों को भी ऊंचा पीढ़ा देते हैं ।  मैंने उनमें कभी भी बड़े छोटे का कोई भेद नहीं देखा । वे अपने से छोटे से भी प्रेम करते नजर आते हैं। एक बार की बात है, उनके यहां का एक रंग मिस्त्री घर में रंगाई का काम कर रहा था। मिस्त्री ने  रंग जरूर दिया था , लेकिन रंगाई अच्छा नहीं हुआ था। इसके बावजूद  रतन वर्मा ने उस मिस्त्री को खाना खिलाया ।चाय पिलाई। काम समाप्ति के बाद मजदूरी के अलावा बीस अधिक दिए।  जब मैंने उनसे कहा कि रंग मिस्त्री ने  काम अच्छा नहीं किया है। तब उन्होंने कहा कि मिस्त्री जितना जानता था, पूरी ईमानदारी से का काम किया। उनकी बात सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया था। रतन वर्मा की जगह अगर कोई दूसरा आदमी होता तो शायद उसकी मजदूरी काट लेता।  ऐसा नहीं कर उन्होंने अपनी सहृदयता का परिचय दिया था। उन्हें  एक पत्रकार साथी मिथिलेश सिंह जी की बीमार पड़ने की खबर आई थी। सुबह-सुबह जब मैं  उनसे मिलने पहुंचा तब  उन्होंने मिथिलेश जी की तबीयत खराब होने बात बताई। वे तुरंत मिथिलेश जी को देखना चाहते थे। हम दोनों मिथिलेश जी को देखने कुणाल नर्सिंग होम चले गए।मैं थोड़ी देर रहकर वहां से वापस आ गया था। रतन वर्मा जी  वहीं रुके रह गए। मिथिलेश जी के होश में आने के बाद ही वे वहां से गए थे। एक वाकिया का जिक्र करना और जरूरी समझता हूं ।  प्रख्यात साहित्यकार भारत यायावर के हजारीबाग के सदर अस्पताल में भर्ती होने की सूचना आई थी। यह खबर सुनकर रतन वर्मा जी ने मुझे दूरभाष पर इसकी सूचना दी थी। हम दोनों बिना समय गवाएं भारत यायावर जी से मिलने के लिए सदर अस्पताल चले गए। यायावर जी से मिलकर और बेहतर इलाज के लिए हम दोनों ने उन्हें  क्षितिज हॉस्पिटल में भर्ती करवाया। एक सप्ताह के बाद भारत जी पूरी तरह ठीक हो गए। भारत जी के ठीक होने की खबर सुनकर रतन वर्मा जी की चेहरे की खुशी देखते बनती थी। इस तरह एक नहीं अनेक ऐसी घटनाएं हैं, जहां रतन वर्मा सबसे पहले पहुंचने वाले व्यक्ति होते हैं। उनकी सहृदयता सामाजिकता की सीख देती है। आज लोग मतलब के लिए मित्र बनाते हैं। मतलब के लिए प्रेम दिखाते हैं। अगर फायदा ना मिला तो मिलना जुलना तक बंद कर देते हैं। इन तमाम गिरावटों के बावजूद रतन वर्मा  की सहजता व सहृदयता सामाजिकता की सीख देती है।

दिनेश श्रीवास्तव की कविताएँ

दिनेश श्रीवास्तव की कुण्डलिया 

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कायथ कुल जन्मे मगर, कठिनाई विकराल।

बाल्य-काल थी साधना, थे 'गुदड़ी के लाल'।।-१

              

गांधी जी के साथ ही, प्रगट हुए थे  'लाल'।

दोनो ने ही इस देश मे,अद्भुत किये कमाल।।- २


'शास्त्री जी' के नाम से,जाने जाते 'लाल'।

लालबहादुर ने किया,ऊँचा भारत- भाल।।- ३


लालबहादुर नाम था,काम किए ज्यों संत।

सच्चे सीधे थे सरल,लोभ-लालसा अंत।।- ४


सच्चे सीधे थे मगर, 'लाल'बने थे काल।

युद्ध हुआ जब 'पाक' से, पूछो उससे हाल।।-५


त्राहि-त्राहि करके भगा, कहाँ 'पाक'को ठौर?

'ताशकंद' का राह था,नहि उपाय था और।।-६


'जय-जवान' नारा  लगा,'जय- किसान' का घोष।

अमर कथन इस 'लाल'का,अब भी देता तोष।।-७


कृश-काया थी 'लाल'की,उन्नत उनका भाल।

लघु शरीर होते हुए,पाए हृदय विशाल।।-८


ताशकंद में ही हुआ,इस सपूत का अंत।

बार-बार मिलता नहीं,ऐसा कोई संत।।-९


सदा बढ़ाए देश का, लालबहादुर शान।

'भारत रत्न' प्रदान कर,दिया देश ने मान।।-१०


यदि उनके आदर्श को,धारण करो 'दिनेश'।

प्राणवान भारत बने,विश्व गुरू हो देश।।-११


              

                   दिनेश श्रीवास्तव

                    ग़ाज़ियाबाद

 दिनेश श्रीवास्तव: वीर छंद आधारित गीत


                 *गांधी*


पावन परम पुजारी थे वे,सत्य अहिंसा से था प्यार।

धन्य धरा भारत की अपनी, जहाँ लिए गांधी अवतार।।


राम-नाम का धुन थे गाते, और नहीं था मन में द्वेष।

पीर-पराई देख हृदय में,जिनके होता अतिशय क्लेश।

आत्मसंयमी वीर बहुत थे,लिए लकुटिया कर में धार।

धन्य धरा भारत की अपनी, जहाँ लिए गांधी अवतार।।


अंग्रेजी शासन का देखो,कमर दिया था जिसने तोड़।

सात समंदर पार भगे वे,डरकर भारत को वे छोड़।।

नहीं ढाल या तलवारें थी,गए अहिंसा से वे हार।

धन्य धरा भारत की अपनी,जहाँ लिए गांधी अवतार।।


भारत की यह भूमि वही है,दिखे अहिंसा अब चहुँओर।

लूट-मार व्यभिचार बहुत है,मचा रहा हिंसा है शोर।।

नहीं बेटियाँ यहाँ सुरक्षित,मचा हुआ है हाहाकार।

धन्य धरा भारत की अपनी,जहाँ लिए गांधी अवतार।।


घूम-घूम यह देश जहाँ पर,गांधी ने बाँटा था प्यार।

नारी का सम्मान बढ़ाया,मगर आज सुनिए चित्कार।

हिंसा-प्रतिहिंसा का सागर,जहाँ हिलोरें पारावार।

धन्य धरा भारत की अपनी,जहाँ लिए गांधी अवतार।।


दुखिया दीन 'दिनेश' पड़ा है,मन में लिए निराशा घोर।

चारो ओर अँधेरा छाया,होगा फिर से कब तक भोर।।

गांधी के पथ पर चलने को, होना होगा अब तैयार।

धन्य धरा भारत की अपनी, जहाँ लिए गांधी अवतार।।


                दिनेश श्रीवास्तव

                ग़ाज़ियाबाद


DS दिनेश श्रीवास्तव: दोहे-


                   *शक्ति*


दुर्गा दुर्गविनाशिनी,शक्तिपुंज अवतार।

मातु! शरण में लीजिए,विनती बारंबार।।-१


शैलपुत्रिका मातु तुम,सिंह वाहिनी रूप।

सर्व- पूजिता अम्बिका, रंक रहे या भूप।।-२


बना निशाचर वायरस,करता है संहार।

मातु! पधारो आज तुम,जन-जन करे पुकार।।-३


शक्तिरूपिणी मातु!मैं,करता तुम्हें प्रणाम।

कष्ट निवारण के लिए,आओ मेरे धाम।।-४


सर्वभूत में आप ही,धारित करतीं प्राण।

शक्ति रूप में आप ही,देती सबको त्राण।।-५


असुरमर्दिनी,तारिणी,बनकर तारणहार।

नवदेवी नवरात्रिका,मातु!करो उद्धार।।-६


कालरात्रि,कात्यायनी,महिषविमर्दिनि आप।

करता विनय दिनेश है,मातु!हरो त्रय-ताप।।-७


                 शारदीय नवरात्रि की अनंत शुभकामनाएँ।🙏


                   दिनेश श्रीवास्तव

                    ग़ाज़ियाबाद


DS दिनेश श्रीवास्तव: दिनेश-दोहावली


              *ब्रह्मांड*


यहाँ सकल ब्रम्हांड का,निर्माता है कौन?

तर्कशास्त्र ज्ञाता सभी, हो जाते हैं मौन।।-१


वेदशास्त्र गीता सभी,अलग-अलग सब ग्रंथ।

परिभाषा ब्रह्मांड की,देते हैं सब पंथ।।-२


सकल समाहित है जहाँ,पृथ्वी,गगन समीर।

वही यहाँ ब्रह्मांड है,बतलाते मति-धीर।।-३


परमब्रह्म को जानिए, निर्माता ब्रह्मांड।

बतलाते हमको यही,पंडित परम प्रकांड।।-४


पंचभूत निर्मित यथा,काया सुघर शरीर।

काया ही ब्रह्मांड है,जो समझे वह धीर ।।-५


पंचभूत विचलित जहाँ, पाता कष्ट शरीर।

इसी भाँति ब्रह्मांड भी,पाता रहता पीर।।-६


ग्रह तारे गैलेक्सियाँ, सभी खगोली तत्त्व।

अंतरिक्ष ब्रह्मांड का, होता परम महत्व।।-७


गूँजे जब ब्रह्मांड में,'ओम' शब्द का नाद।

सभी चराचर जीव के,मिट जाते अवसाद।।-८


नष्ट न हो पर्यावरण,करें संवरण लोभ।

होगा फिर ब्रह्मांड में,कभी नहीं विक्षोभ।।-९


देवत्रयी ब्रह्मांड के,ब्रह्मा,विष्णु महेश।

ब्रह्मशक्ति की साधना,करता सदा 'दिनेश'।।-१०


                 दिनेश श्रीवास्तव

                 

 दिनेश श्रीवास्तव: कुंडलिया


                      *करवा-चौथ*


                      (१)


पावन है दिन चौथ का,निर्जल व्रत हूँ आज।

प्रियतम मंगल कामना,अन्य न कोई काज।।

अन्य न कोई  काज,यहाँ पर आज करूँगी।

उनका लेकर नाम,आज व्रत घोर धरूँगी।।

प्रियतम मेरे देव, सदा मेरे मनभावन।

पूजन विधिवत आज, करूँ मैं  'करवा' पावन।।


                   (२)


देना करवा मातु तुम,ऐसा शुभ आशीष।

रहें सुहागन नारियाँ,बिंदी चमके शीश।।

बिंदी चमके शीश,सजा हो माथ हमेशा।

हो अखंड सौभाग्य,कंत का साथ हमेशा।।

करता विनय 'दिनेश', व्याधि सबकी हर लेना।

करवा-देवी आज,सुहागन को वर देना।।


                      (३)


कैसे पूजन मैं करूँ, प्रियतम गए विदेश।

निर्मोही आए नहीं,हृदय वेदना क्लेश।।

हृदय वेदना क्लेश,विरह की मैं हूँ मारी।

लगी न उनको लाज,खोज करती मैं हारी।।

लगता मुझको 'चंद्र',बना वैरी हो जैसे।

पूजन करवा-चौथ,करूँ विरहन मैं कैसे?


                 दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव

                   ग़ाज़ियाबाद

दिनेश श्रीवास्तव: दोहा-छंद

                  *नन्हा दीपक*


नन्हें दीपक ने दिया, चीर तमस को आज।

तम विशाल लघु हो गया,मिला तिमिर को लाज।।-१


मानव! तुम दीपक बनो, भरो जगत संकाश।

ज्योति तुम्हारी विखर कर,वितरित करे प्रकाश।।-२


दीपक सा तुम भी जलो,मचे न कोई शोर।

निशा अंत होगी यहाँ, निश्चित होगी भोर।।-३


दीया-बाती का जहाँ, होता स्नेह मिलाप।

दिख सकता कैसे वहाँ, अँधियारा पद-चाप।।-४


दीप जले मन-द्वार पर,अंतस करे प्रकाश।

यही मर्म इस पर्व का,हृदय-तमस हो नाश।।-५


प्रेम जगत का सार है,दीपक का संदेश।

स्नेह-डोर को थामकर,रखिए सदा 'दिनेश'।।-६


यथा दीप निःस्वार्थ से,वितरित करे प्रभास।

दिशा चतुर्दिक आप भी, बाँटे सुखद उजास।।-7


प्रेम और सौहार्द का,जलता रहे चिराग।

कभी प्रज्ज्वलित हो नहीं,यहाँ नफ़रती आग।।-८


बिन मोती शोभित नहीं,जैसे कोई सीप।

स्नेह और बाती बिना,व्यर्थ जलाना दीप।।-९


समरसता समभाव का, दीपक दे संदेश।

यही भाव-अनुभाव हो, सब में आज 'दिनेश'।।-१०


                दिनेश श्रीवास्तव

                ग़ाज़ियाबाद

अक्षरधाम मन्दिर को डिज़ाइनर विक्रम लाल नहीं रहे

38 साल की उम्र में किया था अक्षरधाम मन्दिर को डिज़ाइन , नहीं रहे विक्रम लाल

नई दिल्ली। राजधानी में पिछ्ले बीसेक वर्षो मेें जो खास लैंडमार्क सामने आये उनमें अक्षरधाम मंदिर भी है । इसका परिसर भारत के किसी भी हिंदू मंदिर से बड़ा माना जाता है ।  इसके डिज़ाइनर विक्रम लाल का ब्रुसेल्स में विगत 27 दिसंबर को निधन हो गया। वे 58 साल के थे।  


अक्षर धाम मन्दिर का श्री गणेश 2005 में हो गया था। इसे बनने मेँ करीब 5 साल लगे थे। तो सिर्फ 38 साल की उम्र मेँ ही विक्रम लाल ने इतने विशिष्ट प्रोजेक्ट को सम्भाल लिया था।


विक्रम लाल ने ही पटना के बुद्ध स्मृति पार्क को भी डिज़ाइन किया था। वे मूल रूप से पटना के रहने वाले थे। वे दिल्ली के  स्कूल ऑफ़ प्लानिंग ऐण्ड आर्किटेक्चर ( एस पी ए) में विज़िटिंग प्रोफेसर भी थे।  वे एसपीए के अलावा भी दुनिया भर के प्रमुख के कॉलेजो में लगातार क्लास लिया करते थे। उनका हिन्दू और बुद्ध architecture पर गहरा अधिकार था।


 अगर अक्षर धाम मन्दिर के वास्तु शिल्प की बात करें तो  विक्रम लाल ने  इसमें भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता  को खूब सूरती से दर्शाया है।  यह करीब 100 एकड़ की भूमि पर फैला हुआ है। वे इसके निर्माण के समय लगातार हजारों कारीगरों और स्वयंसेवकों के साथ काम कर रहे थे। उनकी देख रेख में ही इस मंदिर में देवी- देवताओं, ऋषियों, साधुओ आदि की मूर्तियां लगी थीं। आपको विक्रम लाल जैसे मनीषी कम ही मिलेंगे। वे अक्षर धाम मन्दिर के  डिज़ाइन को बनाने में अनेक विद्वानों को भी क्रेडिट देते थे।


विक्रम लाल को चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ़  architecture (सीसीए) के  सबसे योग्य पूर्व छात्रों में से माना जाता था। वे सीसीए के बाद कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी भी गये थे। सीसीए के फाऊंडर प्रिंसिपल डॉक्टर एसएस भट्टी ने बताया कि विक्रम लाल सिर्फ वास्तुकार  ही नहीं थे। वे शिक्षक, लेखक और चिंतक भी थे। उनकी चित्र कारी और भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी गहरी दिल चस्पी थी। वे इन सब विषयों का गहराई से अध्ययन करते थे।


विक्रम लाल राजधानी में गुजरे 1987 से ही अपनी architect फ़र्म भी चला रहे थे। पर उनका लक्षय अधिक से अधिक प्रोजेक्ट लेना या पैसा कमाना नहीं होता था। वे अपने मन के प्रोजेक्ट लेते थे और फिर उन पर अपनी शर्तो पर काम करते थे। लेकिन वे नए और बेहतर विचारों का हमेशा सम्मान करते थे। उनका हरेक प्रोजेक्ट मिसाल बनता था। वे किसी प्रोजेक्ट को पाने की कोशिश भी नहीं करते थे। उनके पास स्तरीय काम अपने आप आते थे।


विक्रम लाल ने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक “ दी गोल्डन लैंडस में  बुद्ध मन्दिरों , विहारों और बुद्ध धर्म से जुडे प्राचीन स्मारकों पर गहन चर्चा की है । इस किताब का भारत में विमोचन दलाई लामा ने किया था। इसका लंदन, ब्रुसेल्स और सिंगापुर में भी विमोचन हुआ था। वे भारत में बुद्ध वास्तु कला से प्रभावित इमारतों पर भी एक किताब करना चाहते थे।


 बहरहाल एडवर्ड लुटियन ( राष्ट्रपति भवन और संसद भवन) , हर बर्ट बेकर ( साउथ और नार्थ ब्लॉक ), जे.सी .चौधरी (आईआईटी), सी के कुक रेजा ( जे एन यू) जैसे वास्तुकारों की तरह विक्रम लाल भी अक्षर धाम का डिज़ाइन बनाकर दिल्ली के इतिहास में अमर हो गये हैं ।

30 दिसंबर 2020

Vivek Shukla

*मुरादनगर की घटना / दिनेश श्रीवास्तव *

 कुण्डलिया- *मुरादनगर की घटना*/ दिनेश  श्रीवास्तव 


                  *सरकारी तंत्र*

                       (१)

*भ्रष्टाचारी तंत्र का,एक अनूठा खेल*।

*लिंटर गिरा धड़ाम से,सामग्री बेमेल* ।।

*सामग्री बेमेल,हुआ रिश्वत का खेला*।

*मरे लोग चौबीस,उठा है आज झमेला*।।

*कहता सत्य दिनेश,तंत्र सारा सरकारी*।

*घुसखोरी में लिप्त,बना है भ्रष्टाचारी*।।

                     

                       (२)


*ठेकेदारी का हुआ,जब सत्ता से मेल*।

*सामग्री निर्माण में,तब तब होता खेल*।।

*तब तब होता खेल,मिलावट भारी होती*।

*मरते हैं फिर लोग,और जनता तब रोती*।।

*करता विनय दिनेश,तंत्र सुधरे सरकारी*।

*बंद करो उत्कोच,जहाँ हो ठेकेदारी*।।


                      (३)


*योगी- मोदी देखिए,कैसा है यह तंत्र*।

*इनको भी कुछ दीजिये,ऐसा कोई मंत्र*।।

*ऐसा कोई मंत्र,तंत्र सुधरे सरकारी*।

*हो उत्कोचन बंद,सँभल जाएँ अधिकारी*।।

*पूछे आज दिनेश,व्यवस्था कब तक होगी*।

*सुधरेगा कब तंत्र,बताओ मुझको योगी*।।

                        (4)


*बोलो मोदी कुछ यहाँ, अपने मन की बात*।

*गई जान चौबीस की,कौन लगाया घात*।।

*कौन लगाया घात, मौन को तोड़ो अपने*।

*कर दो अब तो बंद,दिखाना दिन में सपने*।।

*सत्ता-भ्रष्टाचार,गाँठ को अब तो खोलो*।

*करता विनय दिनेश,आज तुम मन की बोलो*।।


                  *दिनेश श्रीवास्तव*

                     *ग़ाज़ियाबाद*

सोमवार, 4 जनवरी 2021

अजब गज़ब गॉव

 भारत के ये 11 अजब गज़ब गाँव

   

1. एक गाँव जहां दूध दही मुफ्त मिलता है 


यहां के लोग कभी दूध या उससे बनने वाली चीज़ो को बेचते नही हैं बल्कि उन लोगों को मुफ्त में दे देते हैं जिनके पास गएँ ये भैंसे नहीं हैं धोकड़ा गुजरात के कक्ष में बसा ऐसा ही अनोखा गाँव है। श्वेत क्रांति के लिए प्रसिद्ध ये गाँव दूध दही ऐसे ही बाँट देता है।


2. इस गाँव में आज भी राम राज्य है👇🏻


महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के नेवासा तालुके में शनि शिन्ग्नापुर भारत का एक ऐसा गाँव है जहाँ लोगों के घर में एक भी दरवाजा नही है यहाँ तक की लोगों की दुकानों में भी दरवाजे नही हैं, यहाँ पर कोई भी अपनी बहुमूल्य चीजों को ताले – चाबी में बंद करके नहीं रखता फिर भी गाँव में आज – तक कभी कोई चोरी नही हुई |


3. एक अनोखा गाँव जहाँ हर कोई संस्कृत बोलता हैं👇🏻


 कर्नाटक के शिमोगा शहर के कुछ ही दूरी पर एक गाँव ऐसा बसा हैं जहाँ ग्रामवासी केवल संस्कृत में ही बात करते हैं। शिमोगा शहर से लगभग दस किलोमीटर दूर मुत्तुरु अपनी विशिष्ठ पहचान को लेकर चर्चा में हैं। तुंग नदी के किनारे बसे इस गांव में संस्कृत प्राचीन काल से ही बोली जाती है।


करीब पांच सौ परिवारों वाले इस गांव में प्रवेश करते ही “भवत: नाम किम्?” (आपका नाम क्या है?) पूछा जाता है “हैलो” के स्थान पर “हरि ओम्” और “कैसे हो” के स्थान पर “कथा अस्ति?” आदि के द्वारा ही वार्तालाप होता हैं। बच्चे, बूढ़े, युवा और महिलाएं- सभी बहुत ही सहज रूप से संस्कृत में बात करते हैं। भाषा पर किसी धर्म और समाज का अधिकार नहीं होता तभी तो गांव में रहने वाले मुस्लिम परिवार के लोग भी संस्कृत सहजता से बोलते हैं ।


4. एक गांव जो हर साल कमाता है 1 अरब रुपए👇🏻


यूपी का एक गांव अपनी एक खासियत की वजह से पूरे देश में पहचाना जाता है। आप शायद अभी तक इस गांव की पहचान से दूर रहे हों, लेकिन देश के कोने-कोने में इस गांव ने अपने झंडे गाड़ दिए हैं।


अमरोहा जनपद के जोया विकास खंड क्षेत्र का ये छोटा सा गांव है सलारपुर खालसा। 3500 की आबादी वाले इस गांव का नाम पूरे देश में छाया है और इसका कारण है टमाटर। गांव में टमाटर की खेती बड़े पैमाने पर होती है और 17 साल में टमाटर आसपास के गांवों जमापुर, सूदनपुर, अंबेडकरनगर में भी छा गया है।कारोबार की बात करें, तो पांच माह में यहां 60 करोड़ का कारोबार होता है।


5. ये है जुड़वों का गाँव, रहते है 350 से ज्यादा जुड़वाँ


केरल के मलप्पुरम जिले में स्तिथ कोडिन्ही गाँव (Kodihni Village)  को जुड़वों के गाँव (Twins Village) के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर वर्तमान में करीब 350 जुड़वा जोड़े रहते है जिनमे नवजात शिशु से लेकर 65 साल के बुजुर्ग तक शामिल है। विश्व स्तर पर हर 1000 बच्चो पर 4 जुड़वाँ पैदा होते है, एशिया में तो यह औसत 4  से भी कम है। लेकिन कोडिन्ही में हर 1000 बच्चों पर 45 बच्चे जुड़वा पैदा होते है। हालांकि यह औसत पुरे विश्व में दूसरे नंबर पर, लेकिन एशिया में पहले नंबर पर आता है। विश्व में पहला नंबर नाइज़ीरिआ के इग्बो-ओरा को प्राप्त है जहाँ यह औसत 145 है। कोडिन्ही गाँव एक मुस्लिम बहुल गाँव है जिसकी आबादी करीब 2000 है। इस गाँव में घर, स्कूल, बाज़ार हर जगह हमशक्ल नज़र आते है।


6. एक गाँव जिसे कहते है भगवान का अपना बगीचा👇🏻


जहाँ एक और सफाई के मामले में हमारे अधिकांश गाँवो, कस्बों और शहरों की हालत बहुत खराब है वही यह एक सुखद आश्चर्य की बात है की एशिया का सबसे साफ़ सुथरा गाँव भी हमारे देश भारत है। यह है मेघालय का मावल्यान्नॉंग गांव जिसे की भगवान का अपना बगीचा (God’s Own Garden) के नाम से भी जाना जाता है। सफाई के साथ साथ यह गाँव शिक्षा में भी अवल्ल है।  यहाँ की साक्षरता दर 100 फीसदी है, यानी यहां के सभी लोग पढ़े-लिखे हैं। खासी हिल्स डिस्ट्रिक्ट का यह गांव मेघालय के शिलॉंन्ग और भारत-बांग्लादेश बॉर्डर से 90 किलोमीटर दूर है। साल 2014 की गणना के अनुसार, यहां 95 परिवार रहते हैं। यहां सुपारी की खेती आजीविका का मुख्य साधन है। 


7. एक श्राप के कारण 170 सालों से हैं वीरान – रात को रहता है भूत प्रेतों का डेरा👇🏻


हमारे देश भारत के कई शहर अपने दामन में कई रहस्यमयी घटनाओ को समेटे हुए है ऐसी ही एक घटना हैं राजस्थान के जैसलमेर जिले के कुलधरा गाँव कि, यह गांव पिछले 170 सालों से वीरान पड़ा हैं।कुलधरा गाँव के हज़ारों लोग एक ही रात मे इस गांव को खाली कर के चले गए थे  और जाते जाते श्राप दे गए थे कि यहाँ फिर कभी कोई नहीं बस पायेगा। तब से गाँव वीरान पड़ा हैं।


8. इस गांव में कुछ भी छुआ तो लगता है 1000 रुपए का जुर्माना


हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के अति दुर्गम इलाके में स्तिथ है मलाणा गाँव। इसे आप भारत का सबसे रहस्यमयी गाँव कह सकते है। यहाँ के निवासी खुद को सिकंदर के सैनिकों का वंशज मानते है। यहाँ की अपनी संसद है जो सारे फैसले करती है। मलाणा भारत का इकलौता गांव है जहाँ मुग़ल सम्राट अकबर की पूजा की जाती है।

हिमाचल के मलाणा गांव में लगे नोटिस बोर्ड।

कुल्लू के मलाणा गांव में यदि किसी बाहरी व्यक्ति ने किसी चीज़ को छुआ तो जुर्माना देना पड़ता है। जुर्माने की रकम 1000 रुपए से 2500 रुपए तक कुछ भी हो सकती है।

अपनी विचित्र परंपराओं लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण पहचाने जाने वाले इस गांव में हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। इनके रुकने की व्यवस्था इस गांव में नहीं है। पर्यटक गांव के बाहर टेंट में रहते हैं। अगर इस गांव में किसी ने मकान-दुकान या यहां के किसी निवासी को छू (टच) लिया तो यहां के लोग उस व्यक्ति से एक हजार रुपए वसूलते हैं।


ऐसा नहीं हैं कि यहां के निवासी यहां आने वाले लोगों से जबरिया वसूली करते हों। मलाणा के लोगों ने यहां हर जगह नोटिस बोर्ड लगा रखे हैं। इन नोटिस बोर्ड पर साफ-साफ चेतावनी लिखी गई है। गांव के लोग बाहरी लोगों पर हर पल निगाह रखते हैं, जरा सी लापरवाही भी यहां आने वालों पर भारी पड़ जाती है।


मलाणा गांव में कुछ दुकानें भी हैं। इन पर गांव के लोग तो आसानी से सामान खरीद सकते हैं, पर बाहरी लोग दुकान में न जा सकते हैं न दुकान छू सकते हैं। बाहरी ग्राहकों के दुकान के बाहर से ही खड़े होकर सामान मांगना पड़ता है। दुकानदार पहले सामान की कीमत बताते हैं। रुपए दुकान के बाहर रखवाने के बाद सामन भी बाहर रख देते हैं।


9. यह गाँव कहलाता है ‘मिनी लंदन’👇🏻


झारखंड की राजधानी रांची से उत्तर-पश्चिम में करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बा गांव है मैक्लुस्कीगंज। एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए बसाई गई दुनिया की इस बस्ती को मिनी लंदन भी कहा जाता है।


घनघोर जंगलों और आदिवासी गांवों के बीच सन् 1933 में कोलोनाइजेशन सोसायटी ऑफ इंडिया ने मैकलुस्कीगंज को बसाया था। 1930 के दशक में रातू महाराज से ली गई लीज की 10 हजार एकड़ जमीन पर अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की नामक एक एंग्लो इंडियन व्यवसायी ने इसकी नींव रखी थी। चामा, रामदागादो, केदल, दुली, कोनका, मायापुर, महुलिया, हेसाल और लपरा जैसे गांवों वाला यह इलाका 365 बंगलों के साथ पहचान पाता है जिसमें कभी एंग्लो-इंडियन लोग आबाद थे। पश्चिमी संस्कृति के रंग-ढंग और गोरे लोगों की उपस्थिति इसे लंदन का सा रूप देती तो इसे लोग मिनी लंदन कहने लगे।


10. एक गाँव जहाँ छत पर रखी पानी की टंकियों से होती है घरो की पहचान👇🏻


यह कहानी है पंजाब के जालंधर शहर के एक गांव उप्पलां की। इस गाँव में अब लोगों की पहचान उनके घरों पर बनी पानी की टंकियों से होती है। अब आप सोच रहे होंगे की पानी की टंकियों में ऐसी क्या विशेषता है तो हम आपको बता दे की यहाँ के मकानो की छतो पर आम वाटर टैंक नहीं है, बल्कि यहाँ पर शिप, हवाईजहाज़, घोडा, गुलाब, कार, बस आदि अनेकों आकर की टंकिया है।


इस गांव के अधिकतर लोग पैसा कमाने लिए विदेशों में रहते है। गांव में खास तौर पर एनआरआईज की कोठियां में छत पर इस तरह की टंकिया रखी है। अब कोठी पर रखी जाने वाली टंकियो से उसकी पहचानी जा रही हैं। नामी परिवार अपने घरों पर तरह तरह की टंकियां बनवा रहे हैं।


11. इसे कहते है मंदिरों का गाँव और गुप्त काशी👇🏻


झारखंड के दुमका जिले में शिकारीपाड़ा के पास बसे एक छोटे से गांव ” मलूटी” में आप जिधर नज़र दौड़ाएंगे आपको प्राचीन मंदिर नज़र आएंगे। मंदिरों की बड़ी संख्या होने के कारण इस क्षेत्र को गुप्त काशी और मंदिरों का गाँव भी कहा जाता है। इस गांव का राजा कभी एक किसान हुआ करते था। उसके वंशजों ने यहां 108 भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया।


ये मंदिर बाज बसंत राजवंशों के काल में बनाए गए थे।  शुरूआत में कुल 108 मंदिर थे, लेकिन संरक्षण के आभाव में अब सिर्फ 72 मंदिर ही रह गए हैं। इन मंदिरों का निर्माण 1720 से लेकर 1840 के मध्य हुआ था। इन मंदिरों का निर्माण सुप्रसिद्व चाला रीति से की गयी है। ये छोटे-छोटे लाल सुर्ख ईटों से निर्मित हैं और इनकी ऊंचाई 15 फीट से लेकर 60 फीट तक हैं। इन मंदिरों की दीवारों पर रामायण-महाभारत के दृश्यों का चित्रण भी बेहद खूबसूरती से किया गया है।


साभार...

छोटे से भूटान की बड़ी कहानी / श्याम सुंदर भाटिया

 छोटे से भूटान की बड़ी कहानी

पर्यटन की स्वर्ण जयंती वर्ष पर विशेष

1970-2020


श्याम सुंदर भाटिया 

मैं तो भूटान की संस्कृति और प्रकृति प्रेम का कायल हूँ। छोटे से इस हिमालय देश की बड़ी-बड़ी कहानियां अचंभित करती हैं। भूटान ने अपनी कल्चर के संरक्षण को सदियों तक वैश्विक दूरियां बनाए रखी हैं। पश्चिमों देशों की मानिंद आधुनिकता की दौड़ में कभी शुमार नहीं रहा है। आप जानकर हैरत में होंगे, करीब आठ लाख की आबादी वाले देश में इंटरनेट और टेलीविजन की एंट्री 20वीं सदी से बिल्कुल आखिरी में हुई। 1970 में पहली बार किसी विदेशी पर्यटक ने भूटान की धरती पर अपने चरण रखे। यहाँ पर्यटन के द्वार खुले 50 बरस हो गए हैं। इस स्वर्ण जयंती काल के दौरान कहीं आमूल-चूल बदलाव हुए हैं तो कहीं-कहीं कड़ाई की इंतहा भी देखने.सुनने को मिलती है। प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग 1999 से ही प्रतिबंधित है। तम्बाकू का उपयोग भी लगभग पूरी तरह से गैर कानूनी है। कमाल के प्राकृतिक दृश्यों और शानदार संस्कृति के बावजूद भूटान अब भी अपने को पर्यटन से बचा रहा है। भूटान में खुशी से खिलखिलाते हुए चेहरे दुनिया के लिए मिसाल हैं…बेमिसाल हैं…। आपका सवाल एकदम मौजूं हो सकता है, कैसे? सारी दुनिया जहाँ अपनी जीडीपी को आगे ले जाने की होड़ में शामिल है, वहीं भूटान जीएनएच यानी ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस की राह पर है। भूटान की इस सूरत और सीरत के लिए अवाम के संग-संग वहां की सरकार को भी श्रेय जाता है। बाजारीकरण के माहौल में वहां की सरकारों ने हमेशा पर्यावरण को वरीयता दी है। नई सरकार का गठन हुआ तो वहां के अवाम की नजरें उसकी नीतियों पर थीं, लेकिन सरकार ने भूटान की सुंदरता से कोई समझौता नहीं किया। सरकार ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके अनुसार किसी भी कीमत पर वन क्षेत्र 60 प्रतिशत से कम नहीं करने का संकल्प दोहराया गया। 

       


इस छोटे से हिमालयी देश के बारे में विदेशी बहुत कम जानते हैं। अब भूटान में चीजें तेजी से बदल रही हैं। राजधानी थिम्पू में अब स्मार्टफोन और बार आम हो गए हैं। युवा यहां आबादी में बहुतायत में हैं। उन्होंने सोशल मीडिया को आसानी से स्वीकार कर लिया है।  स्ट्रीट फैशन में बदलाव है। राजनीति में ज्यादा खुलकर चर्चा हो रही है। पर्यावरण क्षेत्र में उल्लेखनीय भूटान अंतर्राष्ट्रीय ट्रेंड्स में भी अग्रणी रहा है। बावजूद इसके सरकार पर्यटकों की संख्या को सीमित रखती है। दक्षिण एशिया के बाहर से आने वालों से 250 डॉलर प्रतिदिन के हिसाब से धनराशि वसूलती है। पर्यटन आय का यह एक महत्वपूर्ण स्रोत है। तर्क यह है, पर्यटन का पर्यावरण और संस्कृति पर प्रभाव कम से कम पड़े। आर्थिक पैमाने परंपरागत नहीं हैं। भूटान जीवन के स्तर को सकल राष्ट्रीय ख़ुशी -जीएनएच से नापता है न कि सकल घरेलू उत्पाद-जीडीपी से। सरकार का मानना है, इससे भौतिक और मानसिक रूप से ठीक होने के बीच संतुलन कायम किया जाता है। इसकी रेटिंग को सकल राष्ट्रीय ख़ुशी के जरिए देखता है। हालांकि करीब 70% युवा बेरोजगार हैं। जीडीपी के संदर्भ में यह दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक है। भूटान का मुख्य निर्यात बिजली है। वह भारत को पनबिजली बेचता है। इसके अलावा लकड़ी, सीमेंट, कृषि उत्पाद और हस्तशिल्प का भी निर्यात करता है। भूटान के पास सेना तो है लेकिन चारों ओर जंगलो से घिरा होने की वजह से नौसेना नहीं है।  इसके पास वायुसेना भी नहीं है लेकिन इस क्षेत्र में भारत उनका ख़्याल रखता है। भारत, अमेरिका और ब्रिटेन में स्टडी कर चुके राजा जिग्मे खेसार नामग्येल वांगचुक की अब भी पूजा की जाती है। भूटान के लोग अपने राजा को बेपनाह मुहब्बत करते हैं। रानी जेटसुन पेमा भी बेहद लोकप्रिय हैं। भूटान के लोगों को सचमुच में पेड़ लगाना पसंद है। हजारों लोगों ने अपने राजा-रानी के पहले बच्चे-राजकुमार ग्यालसे के जन्मदिन का जश्न 1,08,000 पौधे लगाकर मनाया। भूटान में पेड़ लगाना बेहद लोकप्रिय है, क्योंकि  यहां पेड़ लंबे जीवन , सुंदरता और सहानुभूति के प्रतीक हैं। 2015 में भूटान ने मात्र एक घंटे में 50,000 पेड़ लगाने का गिनीज विश्व रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कर चुका है। 



भूटान अपनी प्राकृतिक ख़ूबसूरती , शांत वातावरण और सस्ता देश होने के कारण पर्यटकों की पसंदीदा जगह है। यहां पर पूरे बरस पूरी दुनिया से लाखों की संख्या में पर्यटक आते हैं, जिनमें सर्वाधिक भारत से होते हैं। भारत और भूटान के बीच खुली सीमा है लेकिन अब तक दोनों देशों के बीच आने-जाने पर कोई प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता था लेकिन अब भूटान ने नियमों में बदलाव किया है। नए नियमों के मुताबिक जुलाई, 2020 से भारतीय पर्यटकों को भूटान जाने के लिए हर रोज के हिसाब से 1200 रुपए प्रवेश शुल्क देना होता है। भारत के अलावा बांग्लादेश और मालदीव के पर्यटक भी यह शुल्क अदा करते हैं। इसे सस्टेनेबल डवलपमेंट फीस का नाम दिया गया है। भूटान की संसद ने इस शुल्क को लगाने के लिए टूरिज्म लेवी एंड एग्जम्पशन बिल ऑफ भूटान, 2020 बिल को मंजूरी दी है। इस बिल के मुताबिक 18 साल से अधिक उम्र के व्यक्ति के लिए 1200 रुपए प्रतिदिन जबकि छह से 12 साल के बच्चों के लिए 600 रुपये प्रतिदिन की फीस तय की गई है। भूटान सरकार का मानना है, देश के ऊपर पर्यटकों के बोझ को नियंत्रित करने के लिए फीस वसूलने का फैसला लिया गया है। हालांकि, अन्य देशों के लिए ये शुल्क अलग है। उन्हें भूटान यात्रा के लिए क़रीब 65 डॉलर यानी लगभग 4627 रुपये सस्टेनेबल डवलपमेंट फीस देनी है। साथ ही 250 डॉलर - लगभग 17,798 रुपए फ्लैट कवर चार्ज भी देना होगा। भारतीय नागरिकों के भूटान जाने के लिए वीजा की जरुरत नहीं होती है। वे दो वैध दस्तावेज लेकर जा सकते हैं। इनमें भारतीय पासपोर्ट ले जा सकते हैं, जो कम से कम 6 महीने के लिए वैध हो। वोटर आईडी कार्ड भी मान्य है। साल 2018 के आंकड़ों के मुताबिक़ भूटान में 2,74,097 पर्यटक आए थे, जबकि सितम्बर 2019 तक पर्यटकों में 13 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। 2020 की दुनिया सबके सामने है। कोविड-19 को लेकर चौतरफा हाहाकार है। 2018 में 2017 के मुक़ाबले 7.61 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। कुल पर्यटकों में भारत से आने वाले पर्यटकों की संख्या सबसे ज्यादा थी। भारत से 1,91,896 पर्यटक भूटान गए थे। इसके बाद अमेरिका से 10,561 और फिर बांग्लादेश से 10,450 पर्यटक भूटान गए। भारत और भूटान के बेहद नजदीकी रिश्ते जगजाहिर हैं। 

 

2016 में भारत, नेपाल और बांग्लादेश ने बीबीआईएम समझौते पर हस्ताक्षर किए, लेकिन भूटान इस समझौते में शामिल नहीं हुआ। इस समझौते के तहत इसमें शामिल देश ट्रकों और अन्य कमर्शियल वाहनों को एक-दूसरे के राजमार्गों पर चलने की इजाजत देते हैं। बीबीआईएम समझौते से भूटान के पीछे हटने का कारण पर्यावरण को लेकर उसकी चिंता ही थी। वह अपने यहां वाहनों की आवाजाही को नहीं बढ़ाना चाहता था। इसी कड़ी में ही प्रवेश शुल्क भी लगाया गया है क्योंकि बहुत से पर्यटक वहां कूड़ा-कचरा फैलाते हैं। इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता हैं। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के एडमिशन निदेशक श्री एसपी जैन भूटान की आच्छादित हरियाली, प्रकृति प्रेम, पर्यावरण के प्रति सजगता, लोगों के मधुर व्यवहार से गदगद हैं। वह अब तक भूटान समेत दुनिया के 25 देशों का दौरा कर चुके हैं। 2017 में भूटान सरकार की ओर से आयोजित एजुकेशन फेयर में निदेशक श्री जैन ने शिरकत की थी। उल्लेखनीय है, विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए स्टुडेंटस का खर्च भूटान की सरकार स्वयं वहन करती है। टीएमयू में अब तक भूटान के सैकड़ो छात्र स्टडी कर चुके हैं।

 

हरित होने के अलावा भूटान की दूसरी बड़ी खूबी यह है कि सालों से वहां प्लास्टिक के कई सारे प्रोडक्ट बैन हैं। वहां आपको प्लास्टिक के बैग और बोतल जैसा कुछ भी नहीं मिलेगा। भूटान ने इन पर बैन कर रखा है। इसके अलावा प्रदूषण रहित होने के लिए भूटान ने अपने यहां सिगरेट और धूम्रपान पर भी पाबंदी लगा रखी है। कहते हैं वर्तमान में भूटान ने खुद को पूरी तरह स्मोक फ्री बना लिया है! अगर कोई इंसान वहां पब्लिक प्लेस, ऑफिस या फिर पब और बार में भी सिगरेट पीता है तो वह गुनाह कर रहा है। उसे कानूनन सजा हो सकती है। जीवाश्म ईंधन की बढ़ती मांग वहां की बड़ी समस्या बन रही है। इससे निपटने के लिए भूटान सरकार ने इसके वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा दिया है। इलेक्ट्रिक कारें चलन में आ सकें, इसके लिए लोगों के बीच जागरुकता अभियान चलाया जाए। वह यहीं नहीं रुकी है । उसने एलईडी लाइट्स और इलेक्ट्रिकल पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन की दरों में सब्सिडी का इंतजाम किया। साथ ही वह ग्रामीण परिवारों को मुफ्त बिजली देने के लिए कदम उठा रही है , ताकि वहां के लोगों को खाना बनाने के लिए लकड़ी जलाने की जरुरत न पड़े। खबर है कि वहां की सरकार पेपरलेस होने की दिशा में भी बढ़ रही है।


( लेखक सीनियर जर्नलिस्ट और रिसर्च स्कॉलर हैं। )