गुरुवार, 31 जनवरी 2013

हिंदी विश्‍वविद्यालय में हिंदी का महाकुंभ




मंगलवार, 29 जनवरी 2013


हिंदी विश्‍वविद्यालय में  हिंदी का महाकुंभ

1 से 5 फरवरी के दौरान ’हिंदी का दूसरा समय’ का भव्‍य आयोजन

वर्धा शहर में मौसम के साथ फिजा भी बदल रही है। कारण है हिंदी के दूसरे महाकुंभ का करीब आना। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में दि. 1 से 5 फरवरी के दौरान ‘हिंदी का दूसरा समय’ कार्यक्रम का भव्‍य आयोजन किया जा रहा है, जिसमें 150 से अधिक साहित्‍यकार,समाजशास्‍त्री, पत्रकार, नाटककार शिरकत करेंगे। समारोह का उदघाटन 1 फरवरी को प्रात: 10 बजे अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ के प्रांगण में बने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी सभागार में प्रो. नामवर सिंह करेंगे। समारोह की अध्‍यक्षता कुलपति विभूति नारायण राय करेंगे। इस अवसर पर विशिष्‍ट अतिथि के रूप में प्रो. निर्मला जैन उपस्थित रहेंगी। उदघाटन सत्र का संचालन संयोजक असिस्‍टेंट प्रोफेसर राकेश मिश्र करेंगे। पांच दिवसीय इस आयोजन में केदारनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, पूर्व कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन, रमणिका गुप्‍ता, राजीव भार्गव, प्रदीप भार्गव, मोहन आगाशे, वामन केंद्रे, पुण्‍य प्रसून वाजपेयी, नामदेव ढसाल, जे. वी. पवार, पुरूषोत्‍तम अग्रवाल, बद्रीनारायण, अखिलेश, संजीव, जयनंदन, आनंद हर्शुल, शिवमूर्ति, कुणाल सिंह, चंदन पाण्‍डेय, यशपाल शर्मा, अजित अंजुम, हरि प्रकाश उपाध्‍याय, जय प्रकाश कर्दम, हेमलता माहेश्‍वर, प्रकाश दुबे, शशि शेखर, संदीप पाण्‍डेय, बी.डी. शर्मा, प्रेमपाल शर्मा, रघु ठाकुर, प्रेम सिंह, चन्‍द्रप्रकाश द्विवेदी, कैलाश वनवासी, मनोज रूपड़ा, महुआ माजी, सृंजय, भारत भारद्वाजश्‍ एस.एन.विनोद तथा विकास मिश्र तथा  अन्‍य नामचीन हस्तियां उपस्थित रहेंगी।
      विदित हो कि चार वर्ष पूर्व महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय ने पांच दिवसीय ‘हिंदी समय’ का आयोजन किया था। ‘हिंदी का दूसरा समय’ के आयोजन के बारे में कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा है कि हिंदी समय के आयोजन के बाद के चार वर्षों में सभी क्षेत्रों में तेजी से बदलाव हुए हैं और सूचना-संचार की विराटता के इस युग में हिंदी का दखल बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है। दुनिया के तमाम देश भारत जैसे बड़े बाज़ार के निमित्‍त हिंदी को अपने भविष्‍य का रास्‍ता मान रहे हैं। स्‍वयं हमारे विश्‍वविद्यालय में विदेशी छात्रों की संख्‍या में दिनोंदिन होने वाली वृद्धि विश्‍व में हिंदी की बढ़ती जरूरत और इसकी अपरिहार्यता का प्रतीक है। इसकी बढ़ती पहुँच के साथ इसके विरूद्ध षडयंत्रों की भी शुरूआत हो चुकी है। विकिपीडिया के अनुसार कुछ वर्ष पहले विश्‍वभर में संख्‍या के लिहाज से सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में जहाँ हिंदुस्‍तानी का स्‍थान दूसरा था, अब हिंदी को चौथे पायदान पर लाया गया है और मजेदार बात तो यह है कि शीर्ष की सौ भाषाओं में मैथिली, भोजपुरी, अवधी, हरियाणवी, मगही जैसी हिंदी की बोलियों की गणना की गयी है। यह एक निर्विवाद तथ्‍य है कि इन्‍हीं बोलियों के सम्मिलित रूप को हिंदी कहा जाता है। इनसे प्राप्‍त जीवन शक्ति से हिंदी फूलती है। ठेठ हिंदी का ठाठ इन्‍हीं बोलियों के सौंदर्य से निर्मित होता है।
      हमारी इस बढ़ती स्‍वीकार्यता का एक दूसरा पहलू भी है। यदि हम गौर से देखें तो हमारा यह समय एक विराट विचारशून्‍यता का भी है। हिंदी साहित्‍य में किसी नये सिद्धांत की बात तो दूर पिछले कई दशक से हम एक सार्थक बहस चलाने में भी समर्थ नहीं हुए हैं। हमारी भाषा की अन्‍य अभिव्‍यक्तियाँ मसलन दलित विमर्श, स्‍त्री-विमर्श आदि भी अन्‍य भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में किये जा रहे कार्यों का एक अनुवादित संस्‍करण ही है। हिंदी सिनेमा जरूर किन्‍हीं हद तक अपने नये मुहावरे में बात करने की कोशिश कर रहा है परंतु वहाँ भी बाज़ार और सनसनी का एक ऐसा वातावरण पसरा है कि इस समय में श्‍याम बेनेगल, ऋत्विक घटक, मणि कौल जैसे फिल्‍मकारों को ढूँढ़ना निरर्थकता ही मानी जाएगी।
      कमोवेश ऐसी ही स्थिति हिंदी रंगमंच और इस भूभाग की कलाओं की भी है। पिछले कई दशकों से कोई महत्‍वपूर्ण नाटक हिंदी में लिखा या मंचित हुआ हो, याद नहीं आता। अन्‍य ललित कलाओं में भी कोई महत्‍वपूर्ण आंदोलन इन प्रदेशों में दिखाई नहीं देता।
      यह वक्‍त थोड़ा ठहर कर सोचने का है। ऐसा नहीं कि हमारी ऊर्जा चुक गई है अथवा हम ऐसी जड़ता से निकलने की कोई कोशिश नहीं कर रहे हैं। लेकिन उन कोशिशों को, जो इस विकल्‍पहीन होते समय में एक सार्थक विकल्‍प रचने की कोशिश कर रहे हैं, एक साथ समग्रता में समझने की जरूरत है, नहीं तो उत्‍तर–आधुनिक सोच हमें आश्‍वस्‍त करने में सफल हो जायेगी कि प्रत्‍येक विधा, प्रत्‍येक कला, प्रत्‍येक अभिव्‍यक्ति अपने आप में स्‍वायत्‍त है और उसका समाज से भी कोई सीधा संबंध नहीं है।
      आयोजन के बारे में उन्‍होंने बताया कि हम यह मानते है कि आप हमारे सरोकरों और चिंताओं से सहमत होंगे और पाँच दिनों तक 01 फरवरी से 05 फरवरी, 2013 तक चलने वाले इस कार्यक्रम हिंदी का दूसरा समय में उत्‍साह और तैयारी के साथ शिरकत करेंगे ताकि हिंदी की पहचान सिर्फ सबसे ज्‍यादा बोली जाने वाली भाषा या सबसे बड़े बाज़ार की ही नहो, बल्कि वह समर्थ बने तो अपने सरोकारों के कारण, अपनी अभिव्‍यक्ति की अपार संभावनाओं के कारण।
      संगोष्‍ठी के संयोजक राकेश मिश्र ने कहा कि हिंदी को विश्‍वभाषा बनाने की दिशा में विश्‍वविद्यालय का यह आयोजन सार्थक पहल के रूप में साबित होगा। उन्‍होंने कहा कि हिंदी को लेकर पूरे विश्‍व में चल रही बहस को यह आयोजन दिशादर्शक सिद्ध होगा। उन्‍होंने विश्‍वास जताया कि किसी विश्‍वविद्यालय स्‍तर पर इतने बड़े पैमाने पर किया गया यह आयोजन साहित्‍य और समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाएगा। इस आयोजन को सफल बनाने के लिए विभिन्‍न समितियों का गठन किया गया है।
      हिंदी का दूसरा समय का मुख्‍य समारोह अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ के प्रांगण में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी सभागार में सम्‍पन्‍न होगा वहीं समानांतर सत्र सआदत हसन मंटो  कक्ष(स्‍वामी सहजानंद सरस्‍वती संग्रहालय), महादेवी वर्मा कक्ष, रामचंद्र शुक्‍ल कक्ष (समता भवन), डी.डी. कौसांबी कक्ष( जनसंचार विभाग), स्‍वामी अछूतानंद सभागार (महापंडित राहुल सांकृत्‍यायन केंद्रीय पुस्‍तकालय) में सम्‍पन्‍न होंगे। इन सत्रों में हिंदी रचनाशीलता की पहुंच और उसका सामर्थ्‍य, नव राजनैतिक विमर्श में हिंदी की उपस्थिति, संचार-सूचना की विराटता की वास्‍तविकता और हिंदी,  सृजनात्‍मक अभिव्‍यक्ति के दृश्‍यमान आधार और हिंदी, हिंदी जातीयता का सवाल और ज्ञान का उत्‍पादन, हिंदी प्रदेश की राजनीति और प्रगति‍शीलता आदि मुख्‍य विषयों पर विमर्श होगा। कार्यक्रम का समापन 5 फरवरी को दोपहर 3.00 बजे हजारी प्रसाद द्विवेदी सभागार में होगा। इसमें वक्‍ता के रूप में डॉ. बी. डी. शर्मा, रघु ठाकुर, राजेंद्र राजन, प्रो. प्रेम सिंह और प्रेमकुमार मणि उ‍पस्थित रहेंगे। 
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बुधवार, 23 जनवरी 2013

पत्रकारिता पर ऑनलाईन पुस्तिका : महादेव देसाई

पत्रकारिता पर ऑनलाईन पुस्तिका : महादेव देसाई

१९३६ में गुजरात साहित्य परिषद के समक्ष परिषद के पत्रकारिता प्रभाग की रपट महादेव देसाई ने प्रस्तुत की थी । उक्त रपट के प्रमुख अनुदित हिस्से इस ब्लॉग पर मैंने दिए थे । नीचे की कड़ी ऑनलाईन पीडीएफ़ पुस्तिका के रूप में पेश है । मुझे उम्मीद है कि पीडीएफ़ फाइल में ऑनलाईन पेश की गई इस पुस्तिका का ब्लॉगरवृन्द स्वागत करेंगे और उन्हें इसका लाभ मिलेगा । महादेव देसाई गांधीजी के सचिव होने के साथ-साथ उनके अंग्रेजी पत्र हरिजन के सम्पादक भी थे । कई बार गांधीजी के भाषणों से सीधे टेलिग्राम के फार्म पर रपट बना कर भाषण खतम होते ही भेजने की भी नौबत आती थी । वे शॉर्ट हैण्ड नहीं जानते थे लेकिन शॉर्ट हैण्ड जानने वाले रिपोर्टर अपने छूटे हुए अंश उनके नोट्स से हासिल करते थे ।
पत्रकारिता : महादेव देसाई-पीडीएफ़
इस ब्लॉग पर पुस्तिका की पोस्ट-माला (लिंक सहित) नीचे दी हुई है :
पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य
पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

पत्रकारिता (४) : ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? ”

पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘

पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई

समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई

क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?

समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई

रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई

तिलक महाराज का ‘ केसरी ‘ और मैंचेस्टर गार्डियन : ले. महादेव देसाई

विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई

अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई

अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई

अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई

कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८) : महादेव देसाई

संचार माध्यम http://hi.wikipedia.org/s/d0l










मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
संचार माध्यम (Communication Medium) से आशय है संदेश के प्रवाह में प्रयुक्त किए जाने वाले माध्यम। संचार माध्यमों के विकास के पीछे मुख्य कारण मानव की जिज्ञासु प्रवृत्ति का होना है। वर्तमान समय में संचार माध्यम और समाज में गहरा संबन्ध एवं निकटता है। इसके द्वारा जन सामान्य की रूचि एवं हितों को स्पष्ट किया जाता है। संचार माध्यमों ने ही सूचना को सर्वसुलभ कराया है। तकनीकी विकास से संचार माध्यम भी विकसित हुए हैं तथा इससे संचार अब ग्लोबल फेनोमेनो बन गया है।
संचार माध्यम, अंग्रेजी के "मीडिया" (मिडियम का बहुवचन) से बना है, जिसका अभिप्राय होता है दो बिंदुओं को जोड़ने वाला। संचार माध्यम ही संप्रेषक और श्रोता को परस्पर जोड़ते हैं। हेराल्ड लॉसवेल के अनुसार, संचार माध्यम के मुख्य कार्य सूचना संग्रह एवं प्रसार, सूचना विश्लेषण, सामाजिक मूल्य एवं ज्ञान का संप्रेषण तथा लोगों का मनोरंजन करना है।
संचार माध्यम का प्रभाव समाज में अनादिकाल से ही रहा है। परंपरागत एवं आधुनिक संचार माध्यम समाज की विकास प्रक्रिया से ही जुड़े हुए हैं। संचार माध्यम का श्रोता अथवा लक्ष्य समूह बिखरा होता है। इसके संदेश भी अस्थिर स्वभाव वाले होते हैं। फिर संचार माध्यम ही संचार प्रक्रिया को अंजाम तक पहुँचाते हैं।

अनुक्रम

संचार

संचार शब्द अंग्रेजी के कम्युनिकेशन का हिन्दी रूपांतर है जो लैटिन शब्द कम्युनिस से बना है, जिसका अर्थ है सामान्य भागीदारी युक्त सूचना। चूंकि संचार समाज में ही घटित होता है, अत: हम समाज के परिप्रेक्ष्य से देखें तो पाते हैं कि सामाजिक संबन्धों को दिशा देने अथवा निरंतर प्रवाहमान बनाए रखने की प्रक्रिया ही संचार है। संचार समाज के आरंभ से लेकर अब तक के विकास से जुड़ा हुआ है।
परिभाषाएं-
प्रसिद्ध संचारवेत्ता डेनिस मैक्वेल के अनुसार, " एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक अर्थपूर्ण संदेशों का आदान प्रदान है।
डॉ. मरी के मत में, "संचार सामाजिक उपकरण का सामंजस्य है।"
लीगैन्स की शब्दों में, " निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया निरंतर अन्तक्रिया से चलती रहती है और इसमें अनुभवों की साझेदारी होती है।"
राजनीति शास्त्र विचारक लुकिव पाई के विचार में, " सामाजिक प्रक्रियाओं का विश्लेषण ही संचार है।"
इस प्रकार संचार के संबन्ध में कह सकते हैं कि इसमें समाज मुख्य केन्द्र होता है जहाँ संचार की प्रक्रिया घटित होती है। संचार की प्रक्रिया को किसी दायरे में बांधा नहीं जा सकता। फिर संचार का लक्ष्य ही होता है- सूचनात्मक, प्रेरणात्मक, शिक्षात्मक व मनोरंजनात्मक।

संचार माध्यमों की प्रकृति

भारत में प्राचीन काल से ही संचार माध्यमों का अस्तित्व रहा है। यह अलग बात है कि उनका रूप अलग-अलग होता था। भारत में संचार सिद्धान्त काव्य परपंरा से जुड़ा हुआ है। साधारीकरण और स्थायीभाव संचार सिद्धान्त से ही जुड़े हुए हैं। संचार मुख्य रूप से संदेश की प्रकृति पर निर्भर करता है। फिर जहाँ तक संचार माध्यमों की प्रकृति का सवाल है तो वह संचार के उपयोगकर्ता के साथ-साथ समाज से भी जुड़ा होता है। चूंकि हम यह भी पाते हैं कि संचार माध्यम समाज की भीतर की प्रक्रियाओं को ही उभारते हैं। निवर्तमान शताब्दी में भारत के संचार माध्यमों की प्रकृति व चरित्र में बदलाव भी हुए हैं लेकिन प्रेस के चरित्र में मुख्यत: तीन-चार गुणात्मक परिवर्तन दिखाई देते हैं-
पहला : शताब्दी के पूर्वाद्ध में इसका चरित्र मूलत: मिशनवादी रहा, वजह थी स्वतंत्रता आंदोलन व औपनिवेशिक शासन से मुक्ति। इसके चरित्र के निर्माण में तिलक, गांधी, माखनलाल चतुर्वेदी, विष्णु पराडकर, माधवराव सप्रे जैसे व्यक्तित्व ने योगदान किया था।
दूसरा : 15 अगस्त 1947 के बाद राष्ट्र के एजेंडे पर नई प्राथमिकताओं का उभरना। यहाँ से राष्ट्र निर्माण काल आरंभ हुआ, और प्रेस भी इसके संस्कारों से प्रभावित हुआ। यह दौर दो दशक तक चला।
तीसरा : सातवें दशक से विशुद्ध व्यावसायिकता की संस्कृति आरंभ हुई। वजह थी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का विस्फोट।
चौथा : अन्तिम दो दशकों में प्रेस का आधुनिकीकरण हुआ, क्षेत्रीय प्रेस का एक `शक्ति` के रूप में उभरना और पत्र-पत्रिकाओं से संवेदनशीलता एवं दृष्टि का विलुप्त होना।
इसके इतर आज तो संचार माध्यमों की प्रकृति अस्थायी है। इसके अपने वाजिब कारण भी हैं हालांकि इसके अलावा अन्य मकसद से भी संचार माध्यम बेतुकी ख़बरें व सूचनाएं सनसनीखेज तरीके से परोसने लगे हैं।

इन्हें भी देखें


न्यू मीडिया और सामाजिक सरोकार - / शिखा वार्ष्णेय






वास्तव में यह युग सूचना और संचार का युग है जिसमें समाचार पत्र, पत्रकारिता के आदर्शों से विमुख हो रहे हैं। आज के पत्रकारी युग का आदर्श खबरों को देना नहीं बल्कि ऐन-केन प्रकारेण खबरों को बेचना भर रह गया है। परन्तु आज इसके विपरीत तेजी से कदम बढ़ा रही है हिंदी वेब पत्रकारिता- एक ऐसा माध्यम जिसकी न कोई सीमाएँ है न कोई बंधन। निश्चित तौर पर इसके माध्यम से न हम खुद को अभिव्यक्त करते हैं बल्कि खुद को पूरी तरह से उड़ेल देते हैं, शायद इसलिए यह अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है क्यों कि जो यहाँ संभव है वह अन्य पारंपरिक माध्यमों में संभव नहीं है।

न्यू मीडिया, सोशल नेट्वोर्किंग, ब्लॉग, - आज के इलेक्ट्रोनिक मीडिया के सन्दर्भ में एक ऐसा माध्यम जो एक विस्फोट की तरह सामने आया है और अपने साथ हर एक को बहा ले गया है। आज की नेट उपयोगिता आज से १० वर्ष पूर्व हो रही नेट की उपयोगिता से एकदम भिन्न है। यह प्रति व्यक्ति संवाद की एक ऐसी प्रजनन भूमि तैयार करता है जो इससे पहले कभी संभव नही थी। यह हर एक व्यक्ति के लिए है और हर एक के बारे में है। यह मानवीय सामाजिक विकास की वृद्धि में एक क्रांतिकारी कदम है। मानव इतना सामाजिक कभी न रहा होगा जितना कि अब हो गया है।

न्यू मीडिया ने युवाओं को जिस तरह अपनी गिरफ्त में लिया है वह मात्र निजी विचारों के आदान प्रदान तक सिमित नहीं है बल्कि वह किसी भी तरह के अभियान को सफल करने में या उसे पलट कर रख देने में भी सक्षम है। जो लोग चार दिवारी में बंद अपनी दुनिया को ही सारी दुनिया समझा करते थे आज इस माध्यम से अपनी भावनाएँ अभिव्यक्त करते हैं । कितनी ही प्रतिभाएँ इस माध्यम से उजागर हुई हैं जिन्हें इससे पहले कोई स्थान या मौका तक नहीं मिला करता था और इसी कारण बहुत सी सामाजिक बुराइयों पर से पर्दा उठता है, बहुत सी नई बातें प्रकाश में आती हैं और उन तक पहुँचती हैं जिनका इनसे सरोकार होता है।

व्यक्तिगत पत्रकारिता के रूप में उदित होने वाले इस माध्यम की मौलिकता का अंत नहीं है। कोई भी सूचना उसके सही रूप में और तेजी से सबके सामने आती है। इन वेबसाइटों ने पत्रकारिता को भी जैसे नई दिशा दे दी है। इनका प्रयोग करने वाला हर सदस्य पत्रकार बन गया है। हर एक ने अपना एक अलग चैनल, अपनी एक अलग शैली बना ली है और अपने ही अंदाज में अपने ही सरोकार और दिलचस्पी से वह सूचनाओं का आदान प्रदान करता है। परम्परिक पत्रकारिता से हट कर नागरिक पत्रकारिता का एक सीधा रूप सामने आया है जो न किसी खेमे का न किसी सरकार का और न ही किसी विशेष विचारधारा का पक्षधर है। इन साइटों का सबसे मजबूत पहलू यह है कि यह हमेशा सक्रिय रहते हैं और हर व्यक्ति तक सीधी पहुँच रखने में सक्षम होते हैं । लोग जो एक दूसरे को जानते नहीं, पहचानते नहीं इनके माध्यम से एक दूसरे से सीधा और तुरंत संपर्क कर सकते हैं और अपने विचारों का आदान प्रदान कर सकते हैं।

मुझे अक्सर पूर्णिमा वर्मन जी का कथन याद आता है कि "हम इसलिए प्रभावी हैं क्योंकि हम दिन रात काम करते हैं।" यह इस बात की याद दिलाता है कि जब हम एक समूह के रूप में दुनिया के कोने कोने से जुड़ते हैं और एक कोने में दिन होता है और दूसरे में रात तब दोनो कोनों का मिलकर काम करना इसे चौबीस घंटे की निरंतरता प्रदान करता है। इस प्रकार की योजना अगर सामाजिक कार्यों के लिये बन जाय तो सामाजिक सुधार और सरोकार में इनका बड़ा योगदान जुड़ जाता है - जैसा अन्ना के अभियान से जुड़ कर इन साइटें उसे अखिलभारतीय अभियान बना दिया था। एक ऐसा अभियान जिससे पहली बार इतनी बड़ी संख्या में युवाओं को जुड़ते देखा गया। एक ऐसा अभियान जिसने विश्वभर में अपनी आवाज पहुँचाई।

दूसरी और इस प्रकार की साइटें दुर्भावना से युक्त हों तो लन्दन में दंगों का कारण भी बनती हैं। ब्लेक बेरी, फेस बुक और ट्विटर में टैग और सीधे सन्देश के माध्यम से पल पल की खबर यहाँ से वहाँ पहुँचाने की सुविधा ने लन्दन को ३ दिन तक दंगों की भीषण आग में सुलगाये रखा एक ऐसा नजारा जो इससे पहले नजदीकी दिनों में कभी देखा नहीं गया और जिसका अंदाजा तक लन्दन पुलिस तक को नहीं था। हालाँकि यह भी सच है कि इस तरह के दंगे या अभियान उस समय भी हुआ करते थे जब कि इन साइट्स का अस्तित्व नहीं था। लन्दन में हुए दंगे बेशक बढ़ती बेरोजगारी की वहज से हुए हों तब भी उसमें इजाफा करने का और इन्हें फैलाने का कार्य इन साइटों के माध्यम से अवश्य किया गया।

तुनेशिया या मिस्र की क्रांति भले ही लम्बे समय से चली आ रही तानाशाही और भ्रष्ट व्यवस्था का परिणाम हों परन्तु उस आग को भड़काने में इन न्यू मीडिया का पूरा पूरा सहयोग अवश्य था। लन्दन पुलिस के सहायक आयुक्त लिन ओवेन्स के ग्रह मंत्रालय को दिए गए वक्तत्व के मुताबिक इन्हीं साइट्स के कारण पुलिस ने ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट और ओलम्पिक साइट्स पर दंगे होने से रोका और दंगों के बाद इन्हीं साइटों के सहयोग से समूह बनाकर लोगों ने शहर की सफाई में भी अनुकरणीय योगदान किया।

अभी लन्दन में कुछ उदाहरण देखने में आये कि किसी स्कूल का अध्यापक नकली परिचय बना कर इन्हीं सोशल साइट्स पर अश्लील और आपत्तिजनक तस्वीरें भेजा करता था इसी क्रम में एक तस्वीर भूलवश वह अपने एक छात्र को भी भेज बैठा और पकड़ा गया तथा स्कूल से उसे निष्कासित कर दिया गया और मासूम बच्चों का भविष्य बच गया। कुल मिलाकर यह कि किसी का भविष्य बनाना / बिगाड़ना हो या सरकार गिरानी हो अब सब कुछ वेब पत्रकारिता पर टिका है। पैसे देकर प्रसारित किये गए समाचार और विज्ञापन को ख़बरें बनाने वाले समाचारों से इतर - सबसे अहम बात यह है कि न्यू मीडिया की सूचनाएँ किसी दबाव में नहीं होतीं, दोस्ताना हो सकती हैं पर प्रायोजित नहीं होतीं और पाठकों पर थोपी तो कतई नहीं जा सकतीं। यहाँ का पाठक अपनी रुचि और समझ के अनुसार इनका चयन करता है और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया करता है।

हाँ ये जरुर है कि हर इंसान की तरह, अभिव्यक्ति और उसको प्रदर्शित करने के तरीके भी अलग अलग होते हैं। इस सब में हमें ध्यान रखना होगा कि वेब पत्रकारिता निजी तौर पर किसी को आहत करने वाली नहीं होनी चाहिए। इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता कि कुछ एक खबरिया साइटों पर अभिव्यक्ति के नाम पर न सिर्फ भड़ास निकाली जा रही है, बल्कि इसे दूसरो के मान-मर्दन के अस्त्र के रूप में भी इस्तेमाल किया जा रहा है अन्य माध्यमों की तरह इस माध्यम में भी कमियाँ हैं। हिंदी भाषा में भी कई पोर्टल्स मिल जाएँगे जो गंभीर मसलों पर सतही और सनसनीखेज प्रतिक्रियाओं से बाज नहीं आते, ऐसा करने के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि हिंदी भाषा में पोर्टल्स की संख्या दिनों दिन बहुत बढ़ती जा रही है, इस भीड़ में सबसे आगे निकल जाने का मीडिया का पुराना चरित्र भी जुड़ा है लेकिन इसको नियंत्रित करने के लिए कानून का इस्तेमाल करने के बजाय, आत्म संयम जरुरी है, परम्पराओं का निर्माण करना ज्यादा जरुरी है।

अंत में केवल इतना ही कि आज के आपाधापी युग में रफ़्तार का भी बहुत महत्व है, और वेब पत्रिकाएँ उस पैमाने पर खरी उतरती हैं। वो पाठकों तक हर जानकारी उस जगह और उस समय उपलब्ध कराती हैं जिस जगह और जिस समय वे चाहते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम के नारे को वेब पत्रकारिता ने चरितार्थ कर दिया है। पूरे ब्रह्माण्ड को एक क्लिक की आवाज पर सामने ला खड़ा कर देने वाली ये वेब पत्रकारिता मानवीय सोच को भी एक क्लिक तक ही सीमित कर देने की भी क्षमता रखती हैं। जहाँ इनसे बाहर कोई जिन्दगी अब नजर नहीं आती। तकनीकी क्षेत्र में जब जब भी बदलाव आया है अपने साथ सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पहलू लेकर आया है। वेब पत्रकारिता नाम के इस समुन्द्र मंथन से भी विष और अमृत दोनों ही निकले हैं। अब समस्या यह है कि इस युग में शिव कहाँ से आये जो सम्पूर्ण विष को अपने कंठ में उतार ले और समाज के लिए बचे सिर्फ अमृत और यह शिव हम सबको स्वयं बनना होगा।
२९ अक्तूबर २०१२

अभिव्यक्ति का नया माध्यम : ब्लॉग / --रविशंकर श्रीवास्तव



जन्म लेते ही मनुष्य रो कर विश्व को अपनी यह अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने का प्रयास करता है कि अब, आज से, जगत में उसका भी कोई अस्तित्व है, अभिव्यक्ति का यह प्रयास उसके महा प्रयाण तक जारी रहता है। इस बीच वह अपने पल-पल के विचारों, संवेदनाओं को विविध तरीक़े से लोगों के बीच पहुँचाने का कार्य करता है। इंटरनेट पर उपलब्ध तमाम तरह की तकनालॉजी के बीच ब्लॉग भी अपनी अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करने का एक नया सशक्त माध्यम है जो तेज़ी से लोकप्रियता के नए आयामों को तोड़ता प्रगति पथ पर अग्रसर है।
ब्लॉग क्या है?

'ब्लॉग' वेब-लॉग का संक्षिप्त रूप है, जो अमरीका में '1997' के दौरान इंटरनेट में प्रचलन में आया। प्रारंभ में कुछ ऑनलाइन जर्नल्स के लॉग प्रकाशित किए गए थे, जिसमें जालघर के भिन्न क्षेत्रों में प्रकाशित समाचार, जानकारी इत्यादि लिंक होते थे, तथा लॉग लिखने वालों की संक्षिप्त टिप्पणियाँ भी उनमें होती थीं। इन्हें ही ब्लॉग कहा जाने लगा। ब्लॉग लिखने वाले, ज़ाहिर है, ब्लॉगर कहलाने लगे। प्राय: एक ही विषय से संबंधित आँकड़ों और सूचनाओं का यह संकलन ब्लॉग तेज़ी से लोकप्रिय होता गया। ब्लॉग लिखने वालों के लिए प्रारंभिक दिनों में कंप्यूटर तकनॉलाजी के कुछ विषय मसलन एचटीएमएल भाषा का जानकार होना आवश्यक था। परंतु इसमें संभावनाओं को देखते हुए ब्लॉग लिखने और उसको प्रकाशित करने के लिए कुछ जालघरों ने मुफ़्त और अत्यंत आसान औज़ार उपलब्ध किए जिसमें ब्लॉग लिखने के लिए आपको कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाओं का ज्ञान आवश्यक नहीं होता है। इस कारण, देखते ही देखते '1997-98' के महज़ दर्जन भर ब्लॉग को बढ़कर दस लाख से अधिक का आँकड़ा पार करने में महज़ चार साल लगे। फिर ब्लॉग, विश्व की हर भाषा में, हर कल्पनीय विषय मैं लिखे जाने लगे। ब्लॉग को विश्व के आम लोगों में भारी लोकप्रियता तब मिली जब अफ़गानिस्तान पर अमरीकी हमले के दौरान एक अमरीकी सैनिक ने अपने नित्यप्रति के युद्ध अनुभव को ब्लॉग पर नियमित प्रकाशित किया। उसी दौरान एंड्रयू सुलिवान के ब्लॉग पृष्ठ पर आठ लाख से अधिक लोगों की उपस्थिति दर्ज की गई, जो संबंधित विषयों के कई तत्कालीन प्रतिष्ठित प्रकाशनों से कहीं ज़्यादा थी। एंड्रयू अपने ब्लॉग के मुख पृष्ठ पर लिखते भी हैं - क्रांति ब्लॉग में दर्ज होगी, अब तो कुछ ऐसे ब्लॉग भी है जो इतने ज़्यादा लोकप्रिय है कि इनका सिंडिकेशन किया जाता है।

ब्लॉग जालघर के साथ क्यों है?
ब्लॉग जैसी परिकल्पना जालघर में ही आकार ले सकती थी, चूँकि जालघर सूचनाओं का संसार है। ऊपर से ब्लॉग लिखने और उन्हें प्रकाशित करने के लिए किसी प्रकार के अलग से इन्फ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता नहीं थी। जो तकनॉलाजी मौजूद थी उसी का उपयोग कर ब्लॉग परिकल्पना को साकार किया गया। मगर बाद में इसकी अपार संभावना और लोकप्रियता को देखते हुए कई वेब सेवाओं ने नए और तरह-तरह के मुफ़्त औज़ार तथा वेब पृष्ठ उपलब्ध किए जिससे इसके फैलाव में मदद मिली। शीघ्र ही, सिर्फ़ ब्लॉग के लिए विशिष्ट जालघरों का निर्माण हो गया जिसमें ब्लॉगर, पिटास, मूवेबल टाइप तथा रेडियो यूज़र लैंड सहित तमाम अन्य जालघर भी है। यहाँ तक कि बहुत-सी मौजूदा जालघरों नें, जैसे कि न्यूयार्क टाइम्स और द गॉर्जियन जैसे प्रकाशनों ने भी अपने उपयोगकर्ताओं तथा स्तंभ लेखकों हेतु अपने जालघरों में ब्लॉग के लिए विशेष व्यवस्थाएँ की हैं।
ब्लॉग के फ़ायदे
राजेंद्र यादव ने हंस, 'जुलाई 2004' के संपादकीय में बड़े ही मज़ेदार तरीक़े से, चुटकियाँ लेते हुए, हिंदी साहित्य संसार के प्राय: सभी नए-पुराने समकालीन लेखकों/कवियों के बारे में टिप्पणियाँ की है कि किस प्रकार लोग अपनी छपास की पीड़ा को तमाम तरह के हथकंडों से कम करने की नाकाम कोशिशों में लगे रहते हैं। वे आगे कहते हैं कि दिल्ली जैसी जगह से ही हंस जैसी कम से कम '10 पत्रिकाएँ' निकलनी चाहिए। ज़ाहिर है, लेखकों-लेखिकाओं की लंबी कतारें हैं और उन्हें अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का कोई माध्यम ही नहीं मिल रहा है। ऐसे में जालघर के व्यक्तिगत वेब पृष्ठ और ब्लॉग के अलावा दूसरा बढ़िया रास्ता और कोई नहीं हैं। ब्लॉग के फ़ायदों की सूची यों तो लंबी है, पर कुछ मुख्य बातें ये हैं -
- ब्लॉग प्राय: व्यक्तिगत उपयोग हेतु हर एक को मुफ़्त में उपलब्ध है।
- ब्लॉग के द्वारा आप किसी भी विषय में, विश्व की किसी भी (समर्थित) भाषा में अपने विचार प्रकट कर सकते हैं, जो जालघर में लोगों के पढ़ने हेतु हमेशा उपलब्ध रहेगा। उदाहरण के लिए, यदि आप कहानियाँ लिखते हैं, तो एक ब्लॉग कहानियों का प्रारंभ करिए, उसमें अपनी कहानियाँ नियमित प्रकाशित करिए, बिना किसी झंझट के, बिना किसी संपादकीय सहमति या उसकी कैंची के और अगर लोगों को आपकी कहानियों में कुछ तत्व और पठनीयता नज़र आएगी, तो वे आपकी ब्लॉग साइट के मुरीद हो जाएँगे और हो सकता है कि आपके ब्लॉग को एंड्रयू सुलिवान के ब्लॉग से भी ज़्यादा पाठक मिल जाएँ।
- आपके ब्लॉग पर पाठकों की त्वरित टिप्पणियाँ भी मिलती है जो आपके ब्लॉग की धार को और भी पैना करने में सहायक हो सकती है।
- ब्लॉग का उपयोग कंपनियाँ अपनी उत्पादकता बढ़ाने, नए विचारों तथा नए आइड़ियाज़ प्राप्त करने में भी कर रही हैं, जहाँ कर्मचारी अपने विचारों का आदान-प्रदान बिना किसी झिझक के साथ कर सकते हैं।

हिंदी के ख़ास ब्लॉग
हिंदी भाषा में ब्लॉग की संभावना तब तक क्षीण थी, जब तक कि यूनिकोड फ़ॉन्ट आधारित कोई ब्लॉग साइट उपलब्ध न हो जाती। दरअसल, यूनिकोड के अलावा हिंदी के किसी भी अन्य फ़ॉन्ट में किए गए कार्य एक प्रकार से अंग्रेज़ी फ़ॉन्ट के विस्तार मात्र होते हैं, अत: वेब पर, जहाँ कि इंडेक्सिंग और सॉर्टिंग (अनुक्रम और छँटाई) के बग़ैर काम ही नहीं चलता, हिंदी के अन्य फ़ॉन्ट्स में बनाए गए ब्लॉग्स का दायरा सीमित ही होता। उदाहरण के लिए, गूगल खोज साइट पर जालघर में यूनिकोड हिंदी में ढूँढ़ना अत्यंत आसान है, परंतु हिंदी के अन्य फ़ॉन्ट्स पर आप कुछ ख़ास ढूँढ़ पाने में असमर्थ होते हैं, क्योंकि आपको अक्सर यह भान नहीं होता कि वे हिंदी के किस फ़ॉन्ट का उपयोग कर लिखे गए हैं। हालाँकि, शुषा जैसे फ़ॉन्ट्स के उपयोग हिंदी साहित्य भारत की अन्य भाषाओं में यदा कदा कुछ ब्लॉग साइटें मिल जाएँगी, परंतु वे भी गिनती के हैं। ऊपर से, हिंदी यूनिकोड समर्थन सिर्फ़ नए ऑपरेटिंग सिस्टम यथा 'विंड़ोज़ 2000/एक्सपी' तथा उसके बाद के संस्करणों में तथा लिनक्स के 'सन 2003' के बाद के संस्करणों में ही उपलब्ध हो पाया है, अत: हिंदी ब्लॉग अभी भी शैशवावस्था में ही है, फिर भी, इस माध्यम की संभावनाओं को देखते हुए यह माना जा सकता है कि हिंदी ब्लॉग भी अपने अंग्रेज़ी अवतरण की तरह तेज़ी से लोकप्रिय होगा।
हिंदी के प्रथम ब्लॉग साइट का श्रेय बैंगलोर निवासी के ब्लॉग नौ दो ग्यारह (वे अपने ब्लॉग को चिठ्ठा कहते हैं) को है, जिसमें वे पिछले कुछ वर्षों से अपने कंप्यूटर जगत के तकनीकी तथा अन्य व्यक्तिगत अनुभवों को नियमित लिखते हैं। इंदौर के देबाशीश के ब्लॉग नुक्ता चीनी भी मिश्रित ब्लॉग है जिसमें फ़िल्मी पैरोड़ी से लेकर तकनीकी ज्ञान का समावेश है। रवि रतलामी का हिंदी ब्लॉग इसी नाम से है जिसमें वे सामयिक समस्याओं पर उँगली उठाते हुए अपनी ग़ज़लों को भी प्रकाशित करते हैं। हिंदी के प्रमुख ब्लॉग और उनकी ताज़ा पोस्टिंग के बारे में देबाशीश ने माइजावासर्वर पर हिंदी का पृष्ठ चिठ्ठा विश्व बनाया है, जहाँ हिंदी ब्लॉगर्स के परिचयों के साथ ही ताज़ा ब्लॉग्स के सारांश (पूरे ब्लॉग के लिंक सहित) पढ़ने को मिलते हैं। इसी प्रकार वेबरिंग पर भी हिंदी चिठ्ठाकारों की जालमुद्रिका है। वेबरिंग जालघर पर ऐसा प्रकल्प है जहाँ एक ही प्रकार के ब्लॉग्स आपस में लिंक किए हुए होते हैं, जिससे जालघर के महा जाल में एक जैसी चीज़ों को आसानी से ढूँढ़ने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, इसमें जहाँ आप इंडियन ब्लॉगर्स का वेबरिंग भी पाएँगे, तो आने वाले समय में हो सकता है कि आपको सिर्फ़ हिंदी गीतकारों का वेबरिंग भी मिल जाए।
हिंदी में ब्लॉग कैसे लिखें?
अब ब्लॉग लिखना उतना ही सरल है जितना किसी वेब आधारित ई-मेल के द्वारा लिखना और उसे भेजना। यहाँ फ़र्क सिर्फ़ यह होता है कि आप अपने ब्लॉग को किसी ई-मेल पते पर भेजने के बजाय प्रकाशित करते हैं। समस्या सिर्फ़ हिंदी यूनिकोड फ़ॉन्ट और हिंदी कुंजीपटल को लेकर आती हैं। हिंदी में ब्लॉग लिखने के लिए आपको किसी ऐसे जालघर पर पंजीकृत होना होगा जो यूनिकोड ब्लॉग स्वीकारते हैं, उदाहरण के लिए, ब्लॉगर.कॉम जो कि ब्लॉग के लिए लोकप्रिय साइटों में से एक है, में पूर्ण हिंदी समर्थन उपलब्ध है। यही नहीं, इसके द्वारा आप ई-मेल के ज़रिए भी अपने ब्लॉग्स प्रकाशित कर सकते हैं। जैसे आप याहू ईमेल हेतु पंजीकृत होते हैं उसी प्रकार ब्लॉगर.कॉम में भी अपने बारे में कुछ विवरणों को दर्ज़ कर पंजीकृत होना होगा। आपको एक उपयोगकर्ता नाम तथा पासवर्ड दिया जाएगा जिसकी सहायता से इस साइट पर आप लॉगइन होकर अपने लॉग का संपादन प्रकाशन कर सकेंगे। यह साइट आपको पूर्वनिर्धारित टैम्लेट्स के उपयोग की अनुमति तो देता ही है, अगर आप उन्नत उपयोगकर्ता है, तो अपने खुद के डिज़ाइन किए पृष्ठ पर भी ब्लॉग प्रकाशित कर सकते हैं। जहाँ ब्लॉग लिख कर उसे प्रकाशित के लिए कुछ औज़ार भी उपलब्ध है जैसे कि ब्लॉगएक्स्प्रेस और ब्लॉगविज़ार्ड तो ब्लॉग पढ़ने के लिए भी कुछ औज़ार है जैसे कि ब्लॉगरीडर। हालाँकि सामान्य ब्लॉग उपयोग में इनकी आवश्यकता नहीं ही पड़ती है।
हिंदी में ब्लॉग लिखने के लिए, अगर आप पहले से ही यूनिकोड हिंदी उपयोग करते हैं, तब तो कोई समस्या ही नहीं है। परंतु अगर आपके कंप्यूटर पर यूनिकोड पढ़ने लिखने का समर्थन उपलब्ध नहीं है जिसे कि विंड़ोज़ 98/ लिनक्स 2003 तथा इसके पूर्व के संस्करणों में, तब यह समस्या हल करने में थोड़ीसी मुश्किलें आएँगी। अच्छा यह होगा कि आप विंडोज़ एक्सपी का नया संस्करण या लिनक्स में गनोम 2.6 या केडीई 3.2 का प्रयोग करें जिसमें हिंदी यूनिकोड उपयोग करने की अंतनिर्मित सुविधा है। अगर आप पहले से ही हिंदी भाषा का कोई अन्य कुंजीपटल उपयोग कर रहे हैं, तो भी आपको कोई समस्या नहीं है। माइक्रोसोफ्ट का हिंदी ऑफ़िस आपको आपके अपने ही हिंदी कुंजीपटल चाहे कृति देव हो, शुषा हो, फ़ोनेटिक हो या हिंदी पारंपारिक, किसी भी कुंजीपटल के उपयोग से यूनिकोड हिंदी में लिखने की सुविधा प्रदान करता है। अब आप अपने हिंदी में लिखे हुए पाठ को काटिए या प्रतिलिपि करिए तथा ब्लॉग साइट पर चिपका कर उसे प्रकाशित कर दीजिए। बस! और फिर इंतज़ार कीजिए आपकी प्रकाशित अभिव्यक्ति पर जालघर के पाठकों की प्रतिक्रियाओं का। आपकी जानकारी के लिए आपको यह भी बता दें कि अब अच्छे ब्लॉग्स के लिए पुरस्कार भी प्रदान किए जाते हैं। पिछले दिनों चेन्नई में भारतीय ब्लॉगर्स की भेंट आयोजित की गई जिसमें कुछ अच्छे ब्लॉग्स को पुरस्कृत किया गया। जाल पर भी ब्लॉग को उसकी प्रसिद्धि और पठन के हिसाब से रैंकिंग दिए जाने लगे हैं।
हिंदी ब्लॉग से संबंधित आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार तो रहेगा ही, इससे ज़्यादा इस बात की अपेक्षा रहेगी कि आप भी यथा शीघ्र अपना ब्लॉग हिंदी में प्रारंभ करें जिससे यह माध्यम भी हिंदी-संपन्न बन सके। आपको ढेऱों ब्लॉग शुभकामनाएँ!

‘भावनाओं को ठेस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं’


 शनिवार, 22 सितंबर, 2012 को 17:53 IST तक के समाचार

फ़िल्म का विश्व भर में विरोध हो रहा है.
फिल्म का मामला हो या फिर कार्टून का, इन्हें बनाने वालों का तर्क है ये अभिव्यक्ति का आज़ादी का मामला है और विरोधी कहते हैं कि ये भावनाओं के साथ खिलवाड़ है. इस मुद्दे पर बीबीसी पाठकों ने खुलकर राय रखी है.
हाल ही में इस्लाम पर बनी एक फ़िल्म जिसमें कथित तौर पर मुसलमानों के पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ़ अपमानित भाषा का इस्तेमाल किया गया है, सारी दुनियां में हंगामा मचा हआ है.
'इनोसेंस ऑफ़ मुस्लिम्स' नाम की इस फ़िल्म को लेकर कई देशों में हुए हिंसात्मक प्रदर्शनों के दौरान कुछ लोगों को अपनी जानें भी गंवानी पड़ीं.
इस तरह की फिल्मों या वैसे कार्टून जिन्हें कुछ लोगों ने भड़काऊ कहा, के समर्थकों का तर्क है ये अभिव्यक्ति का आजा़दी का मामला है और हर किसी को अपनी बात रखने का पूरा पूरा हक़ है.
विरोधी कहते हैं कि ये भावनाओं के साथ खिलवाड़ है और ये इस्लाम के खिलाफ पश्चिमी देशों की साजिश है.

बीबीसी पाठकों की राय

बीबीसी पाठकों ने इस मुद्दे पर फ़ेसबुक पर खुलकर राय रखी है.
जावेद आलम कहते हैं ,"हमारी आज़ादी वहीं पर खत्म होती है जहां पर दूसरे की नाक शुरु होती है."
अभिषेक बंसल कहते हैं, "मेरी आज़ादी मैं तय करुंगा ना कि कोई धर्म हालांकि हमें सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए."
संजय नागोंडे कहते हैं," मैं किसी धर्म विशेष में विश्वास नहीं रखता, मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है.किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं हो सकती.फ़िल्म में ऐसे नहीं दिखाना चाहिए."
संजय चौधरी कहते हैं कि अभिव्यक्ति का मतलब ये नहीं कि किसी भी धर्म के बारे में कुछ भी विचार फ़िल्म में शामिल कर लिए जाएं. वैसे मैं इस बारे में ज्यादा नहीं जानता हूं बीबीसी से ही मालूम हुआ है.
सलीम खान समेजा कहते हैं, "किसी का भी हो उसका अपमान करना गलत है ,मेरा मानना है जो देश इस्लाम की बुराई या अपमान करते है उनका अन्त करीब आ गया है अल्लाह सबसे बड़ा है हमे अल्लाह पर विश्वास है वो ज़रुर मुसलमान की दुखी आत्मा की सुनेगा."
अंशु कबीर कहते हैं, "अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नही कि आपका जो मन करे वही करे.विरोध करना आप का हक है पर सवाल ये बनता है विरोध का तरीका क्या हो ?क्या हम किसी को मारकर या गाली दे कर इसे सही साबित कर सकते है ? आतकंवाद के नाम पर पहले इस्लाम को बदनाम किया फिर आगे भी वही काम कर रहे है .पर तथाकथित इस्लामी चरमपंथी भी इसे बे मतलब का हवा देते है जैसे किसी को मारने की धमकी या इस्लाम पर हमला कहते है."
विवेक सरोज कहते हैं, "इस्लाम को छोड अन्य धर्मो के खिलाफ भी टिप्पणी या विवाद सामने आते है पर उसका उचित जवाब या उसके खिलाफ प्रदर्शन किया जाता है.लेकिन इस्लाम के नाम पर अन्य समुदाय को प्रताडित करना उचित नही.यह हिंसक प्रदर्शन इस्लाम के प्रति लोगो का नजरिया बदल रहा है,यह मत अभिव्यक्ति का दुरूपयोग है."
मुकेश कुमार कहते हैं, "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ -साथ कुछ दायित्व भी होते है.लोगों को दूसरों की भावना का सम्मान करना सीखना चाहए.अपनी अभिव्यक्ति को लोग धार्मिक मामलो से ही क्यों उजागर करते है ? क्या हक है कि लोग दूसरे की आस्था को ठेस पहुंचाए. अगर ईसा मसीह पर ऐसी फिल्म कोई मुसलमान बनाये तो क्या उनकी आस्था को ठेस नहीं पहुंचेगी.अगर ऐसा था तो दी विंची कोड पर बबाल क्यों मचाया था.यह साजिश है मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को भड़काओ और उसको साबित करो कि यह कट्टर कौम है जो अमन चैन से नहीं रह सकती है"

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता



किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोकटोक के अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रताअभिव्यक्ति की स्व तंत्रता (freedom of expression) कहलाती है। व्यवहार में यह स्वतंत्रता कभी भी, किसी भी देश में, निरपेक्ष (absolute) स्वतंत्रता के रूप में नहीं प्रदान की जा सकती । अत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हमेशा कुछ न कुछ सीमा अवश्य होती है।
जय महारा
अभिव्‍यक्‍ित की स्‍वतंत्रता अपने भावों और विचारों को व्‍यक्‍त करने का एक राजनीतिक अधिकार है। इसके तहत कोई भी व्‍यक्ति न सिर्फ विचारों का प्रचार-प्रसार कर सकता है, बल्कि किसी भी तरह की सूचना का आदान-प्रदान करने का अधिकार रखता है। हालांकि, यह अधिकार सार्वभौमिक नहीं है और इस पर समय-समय पर युक्‍ितयुक्‍त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं। राष्‍ट्र-राज्‍य के पास यह अधिकार सुरक्षित होता है कि वह संविधान और कानूनों के तहत अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता को किस हद तक जाकर बाधित करने का अधिकार रखता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में, जैसे- वाह्य या आंतरिक आपातकाल या राष्‍ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर अभिव्‍यक्‍ित की स्‍वंतत्रता सीमित हो जाती है। संयुक्‍त राष्‍ट्र की सार्वभौमिक मानवाधिकारों के घोषणा पत्र में मानवाधिकारों को परिभाषित किया गया है। इसके अनुच्‍छेद 19 में कहा गया है कि किसी भी व्‍यक्ति के पास अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का अधिकार होगा जिसके तहत वह किसी भी तरह के विचारों और सूचनाओं के आदान-प्रदान को स्‍वतंत्र होगा। हालांकि, इस अधिकार के साथ नागरिकों को विशेष दायित्‍व भी सौंपे गए हैं। एक मशहूर कहावत है कि आपकी स्‍वतंत्रता वहीं पर खत्‍म हो जाती है, जहां से दूसरे की नाक शुरू होती है। यानि इस अधिकार के तहत आप किसी को मानसिक, आर्थिक या दैहिक- किसी भी नुकसान नहीं पहुंचा सकते।


बाहरी कड़ियाँ

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता






सोमवार, 19 नवम्बर 2012 10:21

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

बहुत से लोगों का मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वर्तमान शताब्दी की आवश्यकताओं में से है और जिस समाज में अभिव्यक्ति और संचार माध्यमों की स्वतंत्रता न हो वह तानाशाही समाज होता है। यह बात स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ, अपमान, उपहास और अराजकता नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सदैव अपने तार्किक व यथार्थवाद व्यवहार से हटकर सामने आता है। प्रश्न यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में विश्व जनमत को किन साक्ष्यों पर भरोसा करना चाहिए? क्या आज की दुनिया में प्रचलित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उन व्यवहारों से विरोधाभास नहीं रखती जो कुछ पश्चिमी देशों की ओर से थोपे जा रहे हैं?
ईश्वरीय दूतों विशेषकर पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों का अपमान, राष्ट्रों और उनकी संस्कृति व सभ्यता का अनादर, घृणा व जातीवाद का प्रचार, उन कार्यवाहियों में है जो पश्चिमी संचार माध्यमों की ओर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर खुलकर की जा रही हैं और विश्व, थोड़े थोड़े समय पर इस प्रकार की अनैतिक व घृणित कार्यवाही का साक्षी रहा है। इस आधार पर पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि इस प्रकार के प्रोपेगैंडे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बजाए अधिकतर घृणा के प्रचार और स्वतंत्रता के अपमान से समन्वित हैं। हाडवर्ड विश्व विद्यालय के शोधकर्ता और उत्तरी कैलीफ़ोर्निया विश्व विद्यालय में धार्मिक शोध के ईरानी प्रोफ़ेसर उम्मीद सफ़ी का भी मानना है कि अपमान जनक फ़िल्मों और कार्टूनों को बनाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का औचित्य पेश नहीं किया जा सकता और इस प्रकार के फ़िल्म निर्माता व कार्टूनिस्ट खुलकर घृणा को हवा दे रहे हैं।
अमरीका में अपमान जनक और इस्लाम विरोधी फ़िल्म इनोसेन्स आफ़ मुस्लिम के निर्माण और यू ट्यूब पर इसके कुछ भाग के अपलोड किए जाने के बाद इस फ़िल्म का विरोध मुस्लिम समाज के अतिरिक्त स्वतंत्र विचार वाले ग़ैर मुस्लिम लोगों ने भी किया। खेद की बात यह है कि उस समय पश्चिमी संचार माध्यमों और अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसी हस्तियों ने इन विरोधों की निंदा की और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने इस प्रकार के फ़िल्म निर्माताओं का खुलकर समर्थन किया। इस घटना के कुछ ही समय के बाद यूरोपीय संघ ने प्रतिबंधों के बहाने ईरान के कुछ टीवी चैनलों के प्रसारण को यू टेल और एनटेल उपग्रह से बंद कर दिया और अपनी तुच्छ समझ में विश्व के बहुत अधिक संबोधकों को आकर्षित करने वाली स्वतंत्रता प्रेमी आवाज़ को दबाने की चेष्टा की किन्तु यह हथकंडे इन सरकारों और इनके प्रोपेगैंडों के हित में लाभदायक सिद्ध न हो सके। यह कार्यवाहियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में पश्चिमी देशों के दावों की पोल खोलने के अतिरिक्त विश्व के लोगों पर ईरानी टीवी चैनलों और स्वतंत्र चैलनों की वास्तविकता स्पष्ट होने के साथ साथ ईरानी राष्ट्र की सत्यप्रेमी आवाज़ के अन्य लोगों तक पहुंचने का भी कारण बनी है।
वर्तमान समय में जब यह प्रयास किया जा रहा है कि लोगों को ईरानी चैनलों से दूर कर दिया जाए, हम इस बात के साक्षी है कि स्वयं अमरीका और यूरोपीय देशों के बहुत से खुले विचार वाले लोग संचार माध्यमों के इस एकाधिकार और वर्चस्व को एकपक्षीय समझते हैं और इसकी कड़े शब्दों में निंदा करते हैं।
ब्रिटिश रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के सदस्य अब्दुल्लाह हमूदा ने कहा कि सैटेलाइट से ईरानी टीवी चैनलों के प्रसारण को बंद करने का मुख्य कारण विश्व के राष्ट्रों के मध्य ईरान की दिन प्रतिदिन बढ़ती लोकप्रियता को रोकना है। उनका कहना था कि यह कार्यवाही ईरान के साथ एकपक्षीय रूप से मामले को तोड़ लेने के लिए यूरोपीय संघ का एक साधारण निर्णय नहीं है बल्कि यह कार्यवाही ईरान पर नये प्रतिबंध थोपने के साथ की गयी एक पूर्वनियोजित कार्यवाही है।
इसी प्रकार ईटली, स्वीट्ज़रलैंड, अमरीका, आस्ट्रिया जैसे देशों के स्वतंत्र पत्रकारों और संचार माध्यमों ने ईरानी टीवी चैनलों के प्रसारण को सैटेलाइट से बंद करने को राजनीति से प्रेरित बताया और इस कार्यवाही की कड़ाई से निंदा की। राष्ट्रीय इतालवी प्रेस एसोसिएशन के सदस्य ने कहा कि संचार माध्यमों का सेन्सर और उनके लिए दायित्व निर्धारण करना सही कार्य नही है और इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस घटना के पीछे राजनैतिक उद्देश्य हैं। इस पत्रकार का मानना है कि ईटली के संचार माध्यमों द्वारा इस समाचार को कवरेज न देने का मुख्य कारण यह है कि मूल रूप से वह अंतर्राष्ट्रीय समाचारों पर सतही नज़र डालते हैं। लोपीओनियन समाचार पत्र के प्रबंधक आर्थर डियाकोनाला ने भी इस निर्णय को राजनीति से प्रेरित बताया और कहा कि इसका मुख्य कारण ईरान, अमरीका और यूरोपीय संघ के दृष्टिकोणों में मतभेद का पाया जाना है किन्तु मुख्य रूप से यह निर्णय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध है।
इसी परिप्रेक्ष्य में मानवाधिकार कार्यकर्ता एन्डी शार्ट का कहना है कि जब भी अमरीका में इस्लाम के विरुद्ध अपमानजनक फ़िल्म या दूसरी अनैतिक चीज़ें इन्टरनेट पर प्रकाशित होती हैं तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नाम दिया जाता है किन्तु जब ईरानी टीवी चैनल सही और सच्चे समाचारों को प्रकाशित करते हैं जो विश्व के विभिन्न दृष्टिकोणों को बयान करने वाले होते हैं तो पश्चिम त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसके प्रसारण पर रोक लगा देता है।
अभी कुछ ही दिन पूर्व ईरानी फ़िल्म निर्माता व निर्देशक मजीद मजीदी ने तुर्की के इस्तांबोल नगर में समानता और न्याय शीर्षक के अंतर्गत आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में सिनेमा जगत में न्याय के विषय पर भाषण दिया। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर खेद प्रकट करते हुए कि अत्याचारी और अपराधी लोग विदित रूप से लोगों को धोखा देकर मोक्षदाताओं, पवित्र लोगों और ईश्वरीय दूतों की छवियों को तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं, कहा कि अतिग्रहण और अतिक्रमण को स्वतंत्रता का नाम देते हैं और हत्या और हिंसा को मुक्ति व सफलता के रूप में पेश करते हैं और प्रतिबंध और दबाव का अर्थ न्याय बना दिया गया है और यह सब कार्य वर्तमान संचार माध्यमों की अद्वीतीय शक्ति और कला की सहायता और समन्वय से संभव हुआ है। यह संचार माध्यम ही हैं जो बुराई को बहुत सुन्दर रूप में पेश करते हैं और अपराध को न्याय बताते हैं।
मजीद मजीदी उन वर्तमान फ़िल्म निर्माताओं, निर्देशकों और कलाकारों में से हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों के दुखों और दर्दों को बयान करने में बिताया और उनकी फ़िल्में मनुष्य के जीवन में अध्यात्म की आवश्यकता पर बल देती हैं और इसी को वर्तमान कष्टों से स्वतंत्रता का एक मात्र मार्ग बताती हैं। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि कला और संचार माध्यमों के क्षेत्र में दो विशेषताएं कष्टदायक बन गयी हैं, एक झूठ है और दूसरा अन्याय व भेदभाव। वर्तमान समय में संचार माध्यम और कलाकार झूठ के सहारे राजनेताओं के आने अपराधों की भूमिका प्रशस्त करते हैं। हम यह जानते हैं कि नाज़ी जर्मन और रक्त पिपासू हिटलर के शासन को वर्षों बीत चुके हैं किन्तु अभी तक हिटलर के प्रचार मंत्री गोब्लज़ की शैली जारी है और उसकी प्रचार शैली विश्व के सभी स्थानों पर क्रियान्वित हो रही है। उन्होंने एक स्थान पर बहुत ही बुरे किन्तु बहुत ही प्रभावी हथकंडे की ओर संकेत किया कि आज के संचार माध्यमों में जिसके बहुत अधिक समर्थक हैं, वह यह है कि छोटी सी बात को बहुत बड़े झूठ के साथ मिलाकर लोगों के सामने पेश करो। आज इस हथकंडे को संचार माध्यमों में प्रयोग किया जा रहा है और इसके उदाहरण भी बहुत अधिक हैं। तालेबान और अलक़ायदा को किसने बनाया और उन्हें किसने अस्तित्व प्रदान किया और उनका किस ने समर्थन किया? किन पश्चिमी सरकारों और क्षेत्र की उनकी मित्र सरकारों ने उनकी वित्तीय सहायताएं कीं और उनको हथियार दिए और किन लोगों ने लाखों अफ़ग़ान जनता की जान व माल पर उनको थोपा?
श्री मजीद मजीदी ने कहा कि भेदभाव और दोहरी नीतियां वह दो विशेषताएं हैं जिसने संचार माध्यमों के न्याय को बहुत अधिक हानि पहुंचाई है। उनका कहना था कि यदि अत्याचार बुरा है तो इसे पूरे विश्व में अत्याचार समझा जाना चाहिए यदि निर्दोष लोगों को जेल में डालना बुरा है जो पूरी दुनिया में इसकी निंदा की जानी चाहिए। शांतिपूर्ण लक्ष्यों के लिए परमाणु तकनीक की प्राप्ति के ईरान के मूल अधिकार का विरोध किया जाता है और ज़ायोनी शासन तीन सौ से अधिक परमाणु वारहेड्स अपने शस्त्रागारों में छिपाए हुए है और वह किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को किसी भी प्रकार के निरिक्षण की अनुमति नहीं देता? ऐसा क्यो है? अफ़ग़ानिस्तान के बामियान क्षेत्र में गौतम बुद्ध की मूर्तियों को तोड़े जाने से पूरे विश्व में हंगामा मचाया जाता है और इराक़ के सामर्रा में धार्मिक और ऐतिहासिक रौज़े को ध्वस्त किए जाने पर किसी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, ऐसा क्यों है।
पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के पवित्र जीवन और उनके जीवन की अंतिम घटनाओं के बारे में फ़िल्म बनाने वाले मजीद मजीदी का कहना था कि आज के संसार में यदि नास्तिकों की आस्थाओं और समलैंगिकों का सम्मान आवश्यक है, तो किस प्रकार अंतिम ईश्वरीय दूत हज़रत मुहम्मद सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के अपमान जैसी महत्त्वपूर्ण बात की अनदेखी की जाती है जिनके करोड़ों अनुयाई हैं और विश्व जनमत को एक दिशा की ओर मोड़ा जा रहा है। आज की दुनिया में न्याय की केवल बात ही होती है इसे व्यवहारिक नहीं बनाया जाता है।
उन्होंने अंत में इस बात पर बल देते हुए कहा कि जिस काल में लोगों के मार्ग दर्शन और उनको भलाई और न्याय की ओर निमंत्रण देने के लिए ईश्वरीय दूत न हों तो कलाकारों और संचार माध्यमों के स्वामियों को न्याय और भलाई का संदेश वाहक होना चाहिए इस शर्त के साथ कि झूठ, भेदभाव और बुराई से बचें।
प्रत्येक दशा में हम यह देखते हैं कि पश्चिम और उसके समर्थक संचार माध्यम न केवल यह कि विश्व के स्वतंत्रता प्रेमियों, धर्मों और राष्ट्रों में अपने विषैले प्रचारों को फैलाने और झूठ गढ़ने में व्यस्त हैं बल्कि अपने विरोधियों की आवाज़ को दबाने का भरसक प्रयास भी कर रहे हैं। इन सारे झूठ, भेदभाव और अन्याय के बावजूद विश्व में जो कुछ हो रहा है क्या उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दिया जा सकता है और क्या संचार माध्यमों की शब्दावली में मानवाधिकार को एक भूला बिसरा सिद्धांत न कहा जाए? इसका निर्णय आप स्वयं ही कीजिए।

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

अभिव्यक्ति और माध्यम




जनसंचार माध्यम और लेखन

जनसंचार माध्यम

.संचार:
 सूचनाओं, विचारों और भावनाओं का लिखित, मौखिक या दृश्य-श्रव्य माध्यमों के जरिये सफ़लता पूर्वक आदान-प्रदान करना या एक जगह से दूसरी जगह पहुँचना संचार है। इस प्रक्रिया को संपन्न करने में सहयोगी तरीके तथा उपकरण संचार के माध्यम कहलाते हैं।
.जनसंचार:
 प्रत्यक्ष संवाद के बजाय किसी तकनीकी या यान्त्रिक माध्यम के द्वारा समाज के एक विशाल वर्ग से संवाद कायम करना जनसंचार कहलाता है।
. जनसंचार के माध्यम:   अखबार, रेडियो, टीवी, इंटरनेट, सिनेमा आदि.
. जनसंचार की विशेषताएँ:
·       इसमें फ़ीडबैक तुरंत प्राप्त नहीं होता।
·       इसके संदेशों की प्रकृति सार्वजनिक होती है।
·       संचारक और प्राप्तकर्त्ता के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता।
·       जनसंचार के लिये एक औपाचारिक संगठन की आवश्यकता होती है।
·       इसमें ढ़ेर सारे द्वारपाल काम करते हैं।  
. जनसंचार के प्रमुख कार्य:
·       सूचना देना
·       शिक्षित करना
·       मनोरंजन करना
·       निगरानी करना
·       एजेंडा तय करना
·       विचार-विमर्श के लिये मंच उपलब्ध कराना
 प्रश्न-अभ्यास-
१. संचार किसे कहते हैं ?
२. संचार के भेद लिखिए ।
३. जनसंचार से क्या अभिप्राय है ?
४. संचार तथा जनसंचार में क्या अंतर है?
५.जनसंचार के प्रमुख माध्यमों के नाम लिखिए ।
६. जनसंचार की कौन-कौन सी विशेषताएँ हैं?
७. जनसंचार के प्रमुख कार्यों को लिखिए ।


पत्रकारिता के विविध आयाम

. पत्रकारिता:
 ऐसी सूचनाओं का संकलन एवं संपादन कर आम पाठकों तक पहुँचना, जिनमें अधिक से अधिक लोगों की रुचि हो तथा जो अधिक से अधिक लोगों को प्रभावित करती होंपत्रकारिता कहलाता है।
. समाचार: समाचार किसी भी ऐसी ताजा घटना, विचार या समस्या की रिपोर्ट है,जिसमें अधिक से अधिक लोगों की  रुचि हो और जिसका अधिक से अधिक लोगों पर प्रभाव पड़ता हो ।
. समाचार के तत्त्वपत्रकारिता की दृष्टि से किसी भी घटना, समस्या व विचार को समाचार का रूप धारण करने के लिए उसमें  निम्न तत्त्वों में से अधिकांश या सभी का होना आवश्यक होता है:   नवीनता, निकटता, प्रभाव, जनरुचि, संघर्ष, महत्त्वपूर्ण लोग, उपयोगी जानकारियाँ, अनोखापन आदि ।
 डेडलाइन- समाचार माध्यमों के लिए समाचारों को कवर करने के लिये निर्धारित समय-सीमा को डेडलाइन कहते हैं।
 . संपादन : प्रकाशन के लिए प्राप्त समाचार सामग्री से उसकी अशुद्धियों को दूर करके पठनीय  तथा प्रकाशन योग्य बनाना संपादन कहलाता  है।
१०. संपादकीय:संपादक द्वारा किसी प्रमुख घटना या समस्या पर लिखे गए विचारत्मक लेख को, जिसे संबंधित समाचारपत्र की राय भी कहा जाता है, संपादकीय कहते हैं।संपादकीय किसी एक व्यक्ति का विचार या राय न होकर समग्र पत्र-समूह की राय होता है, इसलिए संपादकीय में संपादक अथवा लेखक का नाम नहीं लिखा जाता ।
११: पत्रकारिता के प्रमुख प्रकार:
    () खोजी पत्रकारिता- जिसमें आम तौर पर सार्वजनिक महत्त्व के मामलों जैसे, भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और गड़बड़ियों की गहराई से छानबीन कर सामने लाने की कोशिश की जाती है। स्टिंग ऑपरेशन खोजी पत्रकारिता का ही एक नया रूप है।
    () वाचडाग पत्रकारिता- लोकतंत्र में पत्रकारिता और समाचार मीडिया का मुख्य उत्तरदायित्व सरकार के कामकाज पर निगाह रखना है और कोई गड़बड़ी होने पर उसका परदाफ़ाश करना होता है, परंपरागत रूप से इसे वाचडाग पत्रकारिता कहते हैं।
    () एडवोकेसी पत्रकारिता- इसे पक्षधर पत्रकारिता भी कहते हैं। किसी खास मुद्दे या विचारधारा के पक्ष में जनमत बनाने के लिए लगातार अभियान चलाने वाली पत्रकारिता को एडवोकेसी पत्रकारिता कहते हैं।
  ()  पीतपत्रकारिता-पाठकों को लुभाने के लिये झूठी अफ़वाहों, आरोपों-प्रत्यारोपों, प्रेमसंबंधों आदि से संबंधि सनसनीखेज  समाचारों से संबंधित पत्रकारिता को पीतपत्रकारिता कहते हैं।
  ()   पेज थ्री पत्रकारिता- एसी पत्रकारिता जिसमें फ़ैशन, अमीरों की पार्टियों , महफ़िलों और जानेमाने लोगों के निजी जीवन  के बारे में बताया जाता है।
प्रश्न-अभ्यास:
. पत्रकारिता क्या है?
.पत्रकारिता के विकास में कौन-सा मूल भाव सक्रिय रहता है?
     संकेत: जिज्ञासा का
. समाचार किसे कहते हैं?
. कोई घटना समाचार कैसे बनती है?
. समाचार के तत्त्व लिखिए ।
. डेड लाइन किसे कहते हैं?
. संपादकीय क्या है?
. संपादकीय पृष्ठ से आप क्या समझते हैं?
. पत्रकारिता के किन्हीं दो भेदों के नाम लिखिए।
१०. वॉचडॉग पत्रकारिता क्या है?
११. पीतपत्रकारिता से आप क्या समझते हैं?
१२. पेज-थ्री पत्रकारिता किसे कहते हैं?


विभिन्न माध्यमों के लिए लेखन
  
 . प्रमुख जनसंचार माध्यम- प्रिंट, टी०वी०, रेडियो और इंटरनेट
     () प्रिंट माध्यम (मुद्रित माध्यम)-
·        जनसंचार के आधुनिक माध्यमों में सबसे पुराना माध्यम है ।
·        आधुनिक  छापाखाने का आविष्कार जर्मनी के गुटेनबर्ग ने किया।
·        भारत में पहला छापाखाना सन १५५६ में गोवा में खुला, इसे ईसाई मिशनरियों ने धर्म-प्रचार की पुस्तकें छापने के लिए खोला था
·        मुद्रित माध्यमों के अन्तर्गत अखबार, पत्रिकाएँ, पुस्तकें आदि आती हैं ।
   मुद्रित माध्यम की विशेषताएँ:
·         छपे हुए शब्दों में स्थायित्व होता है, इन्हें सुविधा अनुसार किसी भी प्रकार से पढा़ जा सकता है।
·         यह  माध्यम लिखित भाषा का विस्तार है।
·         यह चिंतन, विचार- विश्लेषण का माध्यम है।
    मुद्रित माध्यम की सीमाएँ 
·        निरक्षरों के लिए मुद्रित माध्यम किसी काम के नहीं होते।
·        ये तुरंत घटी घटनाओं को संचालित नहीं कर सकते।
·        इसमें स्पेस तथा शब्द सीमा का ध्यान रखना पड़ता है।
·        इसमें एक बार समाचार छप जाने के बाद अशुद्धि-सुधार नहीं किया जा सकता।
    मुद्रित माध्यमों में लेखन के लिए ध्यान रखने योग्य बातें:
·        भाषागत शुद्धता का ध्यान रखा जाना चाहिए।
·        प्रचलित भाषा का प्रयोग किया जाए।
·        समय, शब्द व स्थान की सीमा का ध्यान रखा जाना चाहिए।
·        लेखन में तारतम्यता एवं सहज प्रवाह होना चाहिए।
. रेडियो (आकाशवाणी) :
   रेडियो एक श्रव्य माध्यम है । इसमें शब्द एवं आवाज का मह्त्व होता है। रेडियो एक रेखीय माध्यम है। रेडियो समाचर की संरचना उल्टापिरामिड शैली पर आधारित होती है। उल्टापिरामिड शैली में समाचर को तीन भागों बाँटा जाता है-इंट्रो, बाँडी और समापन। इसमें तथ्यों को महत्त्व के  क्रम से  प्रस्तुत किया जाता है, सर्वप्रथम सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण तथ्य को तथा उसके उपरांत महत्त्व की दृष्टि से घटते  क्रम में तथ्यों  को रखा जाता   है। 
रेडियो समाचार-लेखन के लिए बुनियादी बातें :
·        समाचार वाचन के लियेर तैयार की गई कापी साफ़-सुथरी ओ टाइप्ड कॉपी  हो ।
·         कापी को ट्रिपल स्पेस में टाइप किया जाना चाहिए।
·         पर्याप्त हाशिया छोडा़ जाना चाहिए।
·         अंकों को लिखने में सावधानी रखनी चाहिए।
·         संक्षिप्ताक्षरों के प्रयोग से बचा जाना चाहिए।
. टेलीविजन(दूरदर्शन) : जनसंचार का सबसे लोकप्रिय  व सशक्त माध्यम है। इसमें ध्वनियों के साथ-साथ दृश्यों का भी  समावेश होता है। इसके लिए  समाचार  लिखते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि शब्द व पर्दे पर दिखने वाले दृश्य में समानता हो।
   टी०वी० खबरों के विभिन्न चरण :
   दूरदर्शन मे कोई भी सूचना निम्न चरणों या सोपानों को पार कर दर्शकों तक पहुँचती है -
    () फ़्लैश या ब्रेकिंग न्यूज () ड्राई एंकर () फ़ोन इन () एंकर-विजुअल () एंकर-बाइट () लाइव () एंकर-पैकेज
. इंटरनेट : संसार का सबसे नवीन व लोकप्रिय माध्यम है। इसमें जनसंचार के सभी माध्यमों के गुण समाहित हैं। यह जहाँ सूचना, मनोरंजन, ज्ञान और व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक सवादों के आदान-प्रदान के लिए  श्रेष्ठ माध्यम है, वहीं अश्लीलता, दुष्प्रचार  व गंदगी फ़ैलाने का भी जरिया है ।
   इंटरनेट पत्रकारिता : इंटरनेट पर समाचारों का प्रकाशन या आदान-प्रदान इंटरनेट पत्रकारिता कहलाता है। इंटरनेट पत्रकारिता दो रूपों में होती है। प्रथम- समाचार संप्रेषण के लिए नेट का प्रयोग करना । दूसरा- रिपोर्टर अपने समाचार को ई-मेल  द्वारा अन्यत्र भेजने  व  समाचार को संकलित करने  तथा  उसकी सत्यता, विश्वसनीयता सिद्ध करने तथा उसकी सत्यता, विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए करता है।
   इंटरनेट पत्रकारिता का इतिहास:
   विश्व-स्तर पर इंटरनेट पत्रकारिता का विकास निम्नलिखित चरणों में हुआ-
    () प्रथम चरण------- १९८२ से १९९२
    () द्वितीय चरण------- १९९३ से २००१
    () तृतीय चरण------- २००२ से अब तक
 भारत में इंटरनेट पत्रकारिता का पहला चरण १९९३ से तथा दूसरा चरण  २००३ से शुरू माना जाता है। भारत में सच्चे अर्थों में वेब पत्रकारिता करने वाली साइटें रीडिफ़ डॉट कॉम, इंडिया इफ़ोलाइन सीफ़ी हैं । रीडिफ़ को भारत की पहली साइट कहा जाता है ।  वेब साइट पर विशुद्ध पत्रकारिता  शुरू करने का श्रेय  तहलका डॉट्कॉम को जाता है।
हिंदी में नेट पत्रकारिता वेब दुनिया के साथ शुरू हुई। यह हिन्दी का संपूर्ण पोर्टल है।  प्रभा साक्षी  नाम का अखबार  प्रिंट रूप में न होकर सिर्फ़ नेट पर ही उपलब्ध है। आज पत्रकारिता के लिहाज से हिन्दी की सर्व श्रेष्ठ साइट बीबीसी की है, जो इंटरनेट के मानदंडों के अनुसार चल रही है। हिन्दी वेब जगत में अनुभूति, अभिव्यक्ति, हिन्दी नेस्ट, सराय आदि साहित्यिक पत्रिकाएँ भी अच्छा काम कर रही हैं।  अभी हिन्दी वेब जगत की सबसे बडी़ समस्या मानक की बोर्ड तथा फ़ोंट  की है ।  डायनमिक फ़ौंट  के अभाव के कारण हिन्दी की ज्यादातर साइटें खुलती ही नहीं हैं ।

प्रश्न-अभ्यास:
.   जनसंचार किसे कहते हैं?
. जनसंचार के प्रमुख माध्यमों का उल्लेख कीजिए ।         
. जनसंचार का सबसे पुराना माध्यम कौन-सा है?
. मुद्रण का प्रारंभ सबसे पहले किस देश में हुआ ?
. आधुनिक छापाखाने का आविष्कार कहाँ, कब और किसने किया?
 . भारत मे पहला छापाखाना कब, कहाँ, किसने और किस उद्देश्य से खोला था?
. डेड लाइन क्या होती है?
. रेडियो किस प्रकार का माध्यम है?
. रेडियो के समाचार किस शैली में लिखे जाते हैं?
१०. समाचार-लेखन की सर्वाधिक लोकप्रिय शैली कौन-सी है?
१२. इंट्रो किसे कहते हैं?
१३. टेलीविजन, प्रिंट तथा रेडियो से किस प्रकार भिन्न है ?
१४. नेट साउण्ड किसे कहते हैं?
१५. इंटरनेट प्रयोक्ताओं की लगातार वृद्धि के क्या कारण हैं?
१५. इंटरनेट पत्रकारिता से आप क्या समझते हैं?
१६. इंटरनेट पत्रकारिता के विकासक्रम को लिखिए ।
१७. भारत में इंटरनेट पत्रकारिता का प्रारंभ कब से माना जाता है।
१८. भारत में सच्चे अर्थों में वेब पत्रकारिता करने वाली साइटों के नाम लिखिए ।
१९. इंटरनेट पर पत्रकारिता करने वाली भारत की पहली साइट कौ-सी है?
२०.  भारत में वेबसाइट पर विशुद्ध पत्रकारिता करने का श्रेय किस साइट को जाता है?
२१. उस अखबार का नाम लिखिए जो केवल नेट पर ही  उपलब्ध है?
२२. हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ साइट कौन-सी है?
२३.  नेट पर हिन्दी की कौन-कौन सी साहित्यिक पत्रिकाएँ उपलब्ध हैं?
२४. हिन्दी वेब पत्रकारिता की समस्याओं को लिखिए

पत्रकारीय लेखन के विभिन्न रूप और लेखन प्रक्रिया

पत्रकारीय लेखन- समाचार माध्यमों मे काम करने वाले  पत्रकार अपने पाठकों  तथा श्रोताओं तक सूचनाएँ पहुँचाने के लिए लेखन के  विभिन्न रूपों का इस्तेमाल करते हैं, इसे ही पत्रकारीय लेखन कहते हैं। पत्रकरिता या पत्रकारीय लेखन के अन्तर्गत  सम्पादकीय, समाचार , आलेख, रिपोर्ट, फ़ीचर, स्तम्भ तथा कार्टून आदि आते हैं। पत्रकारीय लेखन का प्रमुख उद्देश्य है- सूचना देना, शिक्षित करना तथा मनोरंजन आदि करना। इसके कई प्रकार हैं यथा- खोज परक पत्रकारिता, वॉचडॉग पत्रकारिता और एड्वोकैसी पत्रकारिता आदि। पत्रकारीय लेखन का संबंध समसामयिक विषयों, विचारों व घटनाओं से है। पत्रकार को लिखते समय यह ध्यान रखना चाहिए वह सामान्य जनता के लिए लिख रहा है, इसलिए उसकी  भाषा सरल व रोचक होनी चाहिए। वाक्य छोटे व सहज हों। कठिन भाषा का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। भाषा को प्रभावी बनाने के लिए  अनावश्यक विशेषणों, जार्गन्स(अरचलित शब्दावली) और क्लीशे (पिष्टोक्ति, दोहराव) का प्रयोग नहीं होना चहिए।
पत्रकार के प्रकार--- पत्रकार तीन प्रकार के होते हैं ।१.  पूर्ण कालिक २. अंशकालिक (स्ट्रिंगर) ३.  फ़्रीलांसर या स्वतंत्र पत्रकार
 समाचर लेखन-- समाचार उलटा पिरामिड शैली में लिखे जाते हैं, यह समाचार लेखन की सबसे उपयोगी और लोकप्रिय शैली है। इस शैली का विकास अमेरिका में गृह यद्ध के दौरान हुआ। इसमें महत्त्वपूर्ण घटना  का वर्णन पहले प्रस्तुत किया जाता है, उसके बाद महत्त्व की दृष्टि से घटते क्रम में घटनाओं को प्रस्तुत कर समाचार का अंत किया जाता है। समाचार में इंट्रो, बॉडी और समापन के क्रम में घटनाएँ  प्रस्तुत की जाती हैं ।
 समाचार के छ: ककार- समाचार लिखते समय मुख्य रूप से छ: प्रश्नों- क्या, कौन, कहाँ, कब , क्यों और कैसे का उत्तर देने की कोशिश की जाती है। इन्हें समाचार के छ: ककार कहा जाता है। प्रथम चार प्रश्नों के उत्तर इंट्रो में तथा अन्य दो के उत्तर समापन से पूर्व बॉडी वाले भाग में दिए जाते हैं ।
फ़ीचरफ़ीचर एक सुव्यवस्थित, सृजनात्मक और आत्मनिष्ठ लेखन है ।
फ़ीचर लेखन का उद्देश्य: फ़ीचर का उद्देश्य मुख्य रूप से पाठकों को सूचना देना, शिक्षित करना तथा उनका मनोरंजन करना होता है।
फ़ीचर और समचार में अंतर:  समाचार में रिपोर्टर को अपने विचरों को डालने की स्वतंत्रता नहीं होती, जबकि फ़ीचर में लेखक को अपनी राय , दृष्टिकोण और भवनाओं को जाहिर करने का अवसर होता  है । समाचार उल्टा पिरामिड शैली में में लिखे जाते हैं, जबकि फ़ीचर लेखन की कोई सुनिश्चित शैली नहीं होती । फ़ीचर में समाचारों की तरह शब्दों की सीमा नहीं होती। आमतौर पर फ़ीचर, समाचार रिपोर्ट से बडे़ होते हैं । पत्र-पत्रिकाओं में प्राय: २५० से २००० शब्दों तक के फ़ीचर छपते हैं ।
विशेष रिपोर्ट: सामान्य समाचारों से अलग वे विशेष समाचार जो गहरी छान-बीन, विश्लेषण और व्याख्या के आधार पर प्रकाशित किये जाते हैं, विशेष रिपोर्ट कहलाते हैं ।
 विशेष रिपोर्ट के प्रकार:
(१) खोजी रिपोर्ट : इसमें अनुपल्ब्ध तथ्यों को गहरी छान-बीन  कर सार्वजनिक किया जाता है।
(२) इन्डेप्थ रिपोर्ट:  सार्वजानिक रूप से प्राप्त तथ्यों की गहरी छान-बीन कर उसके महत्त्वपूर्ण पक्षों को पाठकों के सामने लाया जाता है ।
(३) विश्लेषणात्मक रिपोर्ट : इसमें किसी घटना या समस्या का विवरण सूक्ष्मता के साथ विस्तार से दिया जाता है । रिपोर्ट अधिक विस्तृत होने पर कई दिनों तक किस्तों में प्रकाशित की जाती है ।
(४) विवरणात्मक रिपोर्ट : इसमें किसी घटना या समस्या को  विस्तार एवं बारीकी के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
 विचारपरक लेखन : समाचार-पत्रों में समाचार एवं फ़ीचर के अतिरिक्त संपादकीय, लेख, पत्र, टिप्पणी, वरिष्ठ पत्रकारों व विशेषज्ञों के स्तम्भ छपते हैं । ये सभी विचारपरक लेखन के अन्तर्गत आते हैं ।
 संपादकीय : संपादक द्वारा किसी प्रमुख घटना या समस्या पर लिखे गए विचारत्मक लेख को, जिसे संबंधित समाचारपत्र की राय भी कहा जाता है, संपादकीय कहते हैं ।  संपादकीय किसी एक व्यक्ति का विचार या राय न होकर समग्र पत्र-समूह की राय होता है, इसलिए संपादकीय में संपादक अथवा लेखक का नाम नहीं लिखा जाता ।
स्तम्भ  लेखनएक प्रकार का विचारत्मक लेखन है । कुछ महत्त्वपूर्ण लेखक अपने खास वैचारिक रुझान एवं लेखन शैली   के लिए जाने जाते हैं । ऐसे लेखकों की लोकप्रियता को देखकर समाचरपत्र उन्हें अपने पत्र में नियमित स्तम्भ - लेखन की जिम्मेदारी प्रदान करते हैं । इस प्रकार किसी समाचार-पत्र  में किसी ऐसे लेखक द्वारा किया गया विशिष्ट एवम नियमित लेखन जो अपनी विशिष्ट शैली एवम वैचारिक रुझान के कारण समाज में ख्याति प्राप्त हो, स्तम्भ लेखन कहा जाता है । 
संपादक के नाम पत्र : समाचार पत्रों में  संपादकीय पृष्ठ पर तथा पत्रिकाओं की शुरुआत में संपादक के नाम आए पत्र प्रकाशित किए जाते हैं । यह प्रत्येक समाचारपत्र का नियमित स्तम्भ होता है । इसके माध्यम से समाचार-पत्र अपने पाठकों को जनसमस्याओं तथा मुद्दों पर अपने विचार एवम  राय व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है ।
साक्षात्कार/इंटरव्यू:  किसी पत्रकार के द्वारा अपने समाचारपत्र में प्रकाशित करने के लिए, किसी व्यक्ति विशेष से उसके विषय में अथवा किसी विषय या मुद्दे पर किया गया प्रश्नोत्तरात्मक संवाद  साक्षात्कार कहलाता है ।
प्रश्न-अभ्यास:
१. पत्रकारीय लेखन किसे कहते हैं?
२. पत्रकारीय लेखन के उद्देश्य लिखिए।
३. पत्रकार कितने प्रकार के होते हैं?
४. उल्टा पिरामिड शैली का विकास कब और क्यों हुआ?
५. समाचार के छ: ककार लिखिए ।
७. इंट्रो क्या है?
८. फ़ीचर किसे कहते हैं?
९. फ़ीचर किस शैली में लिखा जाता है?
१०. फ़ीचर व समाचार में क्या अंतर है?
११. विशेष रिपोर्ट से आप क्या समझते हैं?
१२. विशेष रिपोर्ट के भेद लिखिए।
१३. इन्डेप्थ रिपोर्ट किसे कहते हैं?
१४. विचारपरक लेखन क्या है ? तथा उसके अन्तर्गत किस प्रकार के लेख आते हैं?
१५.संपादकीय में लेखक का नाम क्यों नहीं लिखा जाता ?
१६. स्तम्भ लेखन क्या है ?
१७. साक्षात्कार से क्या अभिप्राय है?

विशेष लेखन: स्वरूप और प्रकार

विशेष लेखन किसी खास विषय पर  सामान्य लेखन से हट कर किया गया लेखन है । जिसमें  राजनीतिक, आर्थिक, अपराध, खेल, फ़िल्म,कृषि, कानून विज्ञान और अन्य किसी भी मत्त्वपूर्ण विषय से संबंधित विस्तृत सूचनाएँ प्रदान की जाती हैं ।
डेस्क : समाचारपत्र, पत्रिकाओं , टीवी और रेडियो चैनलों में अलग-अलग विषयों पर विशेष लेखन के लिए निर्धारित  स्थल को डेस्क कहते हैं। और उस विशेष डेस्क पर काम करने वाले पत्रकारों का भी अलग समूह होता है । यथा, व्यापार तथा  कारोबार के लिए अलग तथा खेल की  खबरों के लिए अलग डेस्क निर्धारित होता है ।
बीट : विभिन्न विषयों से जुडे़ समाचारों के लिए संवाददाताओं के बीच काम का विभाजन आम तौर पर उनकी दिलचस्पी और ज्ञान को ध्यान में रख कर किया जाता है। मीडिया की भाषा में इसे बीट कहते हैं ।
बीट रिपोर्टिंग तथा विशेषीकृत रिपोर्टिंग में अन्तर: बीट रिपोर्टिंग के लिए  संवाददाता में उस क्षेत्र के बारे में  जानकारी व दिलचस्पी का होना पर्याप्त है, साथ ही उसे  आम तौर पर अपनी बीट से जुडी़ सामान्य खबरें ही लिखनी होती हैं । किन्तु विशेषीकृत रिपोर्टिंग  में सामान्य समाचारों से आगे बढ़कर संबंधित विशेष क्षेत्र या विषय से जुडी़ घटनाओं, समस्याओं और मुद्दों  का बारीकी से विश्लेषण कर प्रस्तुतीकरण किया जाता है । बीट कवर करने वाले रिपोर्टर को संवाददाता तथा  विशेषीकृत रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर को विशेष संवाददाता कहा जाता है।
विशेष लेखन की भाषा-शैली: विशेष लेखन की भाषा-शैली सामान्य लेखन से अलग होती है। इसमें संवाददाता को संबंधित विषय की तकनीकी शब्दावली का ज्ञान होना आवश्यक होता है, साथ ही यह भी आवश्यक होता है कि वह पाठकों को उस शब्दावली से परिचित कराए जिससे पाठक रिपोर्ट को समझ सकें। विशेष लेखन की कोई निश्चित शैली नहीं होती ।
विशेष लेखन के क्षेत्र : विशेष लेखन के अनेक क्षेत्र होते हैं, यथा- अर्थ-व्यापार, खेल, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, कृषि, विदेश, रक्षा, पर्यावरण शिक्षा, स्वास्थ्य, फ़िल्म-मनोरंजन, अपराध, कानून व सामाजिक मुद्दे आदि ।
प्रश्न-अभ्यास:
१. विशेष लेखन क्या है?
२. विशेष लेखन के क्षेत्र लिखिए।
४. डेस्क किसे कहते हैं?
५. बीट से आप क्या समझते हैं?
६.  बीट रिपोर्टिंग क्या है?
७. बीट रिपोर्टिंग तथा विशेषीकृत रिपोर्टिंग में क्या अंतर है?
८. विशेष संवाददाता किसे कहते हैं?
जन संचार मध्यम और  लेखन : मह्त्त्वपूर्ण पृष्टव्य अभ्यास प्रश्न:
१.विज्ञापन किसे कहते हैं ?
२. भारत में नियमित अपडेट साइटों के नाम बताइए।
३. दूरदर्शन पर प्रसारित समाचार किन-किन चरणों से होकर दर्शकों तक पहुँचते हैं?
४. मुद्रित माध्यम की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
५. कम्प्यूटर के लोकप्रिय होने का प्रमुख कारण बताइए।
६. इलेक्ट्रोनिक मीडिया क्या है?
७. पत्रकारिता के विकास में कौन-सा मूल्भाव सक्रिय रह्ता है?
८. समाचारपत्र में संपादक की भूमिका क्या होती है?
९. फ़ीचर में न्यूनतम व अधिकतम शब्दों की सीमा कितनी होनी चाहिए?
१०. फ़ीचर किस शैली में लिखा जाता है?
११. संपादन के किन्हीं दो सिद्धांतों को लिखिए।
१२. आडिएंस से आप क्या समझते हैं?
१३. कार्टून कोना क्या है?
१४. स्टिंग आपरेशन क्या है?
१५. ड्राई एंकर से क्या अभिप्राय है?
१६. ऑप-एड पृष्ठ किसे कहते हैं
१७. न्यूजपेग क्या है ?
१८. एफ़०एम० क्या है?
१९. अपडेटिंग से क्या अभिप्राय है?
२०. सीधा प्रसारण किसे कहते हैं?
आलेख/फ़ीचर/रिपोर्ट संबंधी प्रश्न-अभ्यास
१. निम्नलिखित विषयों पर आलेख लिखिए-
·       बढ़ती आबादी देश की बरबादी
·       सांप्रदायिक सद्भावना
·       कर्ज में डूबा किसान
·       आतंकवाद की समस्या
·       डॉक्टर हड़ताल पर मरीज परेशान
·       वर्तमान परीक्षा प्रणाली
२. निम्नलिखित विषयों पर फ़ीचर लिखिए:
·       चुनावी वायदे
·       महँगाई के बोझतले मजदूर
·       वाहनों की बढ़ती संख्या
·       वरिष्ठ नागरिकों के प्रति हमारा नजरिया
·       किसान का एक दिन
३. निम्नलिखित विषयों पर रिपोर्ट तैयार कीजिए-
·       पूजा-स्थलों पर दर्शनार्थियों की अनियंत्रित भीड़
·       देश की महँगी होती व्यावसायिक शिक्षा
·       मतदान केन्द्र का दृश्य
·       आए दिन होती सड़क दुर्घटनाएँ
·       आकस्मिक बाढ़ से हुई जनधन की क्षति
निबंध-लेखन
निबंध-लेखन एक कला है,। इससे लेखक के ज्ञान की परख होती है। इसे लेखक के ज्ञान की कसौटी कह सकते हैं। निबंध एक प्रकार की बंधनहीन स्वच्छंद रचना होती है, किंतु उसकी भाषा, विचार एवम अभिव्यक्ति में कसावट की अपेक्षा रखी जाती है। इसके लिए शब्दों तथा समय की कोई सीमा नहीं होती किंतु परीक्षा में समय एवं शब्द-सीमा दोनों का ही ध्यान रखना आवश्यक होता है। सामान्यत: ५ अंक का निबंध लगभग २५० शब्दों में तथा १० अंक का निबंध लगभग ३५० शब्दों में लिखा जाना चाहिए। दिए गए विषयों में से अपनी रुचि तथा विशेषज्ञता के आधार पर विषय का चुनाव करें।
निबंध लिखते समय ध्यान देने योग्य सामान्य बातें-
·       निबंध प्रस्तावना, विषय-विस्तार एवम उपसंहार के क्रम में लिखें।
·       विषय का क्रमबद्ध ब्यौर प्रस्तुत करें।
·       निबंध दिए गए विषय के अनुरूप होना चहिए।
·       निबंध का प्रारंभ किसी काव्यांश, सूक्ति अथवा उद्धरण से करने पर निबंध की रोचकता बढ़ जाती है
·       शुद्ध तथा रोचक विषयानुरूप भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए।
·       लेख साफ़-सुथरा, सुपाठ्य तथा सुन्दर हो।
 अभ्यास हेतु निबंध-
१. महानगरीय जीवन: अभिशाप या वरदान
२. आधुनिक शिक्षा पद्धति: गुण व दोष
३. विज्ञान-कला
४. बदलते जीवन मूल्य
५. नई शदी नया समाज
६. कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ
७.राष्ट्र निर्माण में युवा पीढ़ी का योगदान
८. इंटरनेट की दुनियाँ
९. पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं
१०. लोक्ततंत्र में मीडिया की भूमिका
पत्र-लेखन
विचारों, भावों, संदेशों एवं सूचनाओं के संप्रेषण के लिए पत्र सहज, सरल तथा पारंपरिक माध्यम है। पत्र अनेक प्रकार के हो सकते हैं, पर प्राय: परीक्षाओं में शिकायती-पत्र, आवेदन-पत्र तथा संपादक के नाम पत्र पूछे जाते हैं। इन पत्रों को लिखते समय निम्न बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए:
·    पत्र के स्वरूप (फ़ॉर्मेट) का ध्यान रखें ।
·    पत्र-  प्रेषक, दिनांक, प्रेषती, विषय, संबोधन, विषय-सामग्री, समापन, स्व-निर्देश व हस्ताक्षर के क्रम में लिखा जाना चाहिए।
·    भाषा शुद्ध, सरल, स्पष्ट, विषयानुरूप तथा प्रभावकारी होनी चाहिए।
अभ्यासार्थ प्रश्न:-
१.किसी दैनिक समाचार-पत्र के सम्पादक के नाम पत्र लिखिए जिसमें वृक्षों की कटाई रोकने के लिए सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया हो।
२. हिंसा-प्रधान फ़िल्मों को देख कर बालवर्ग पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव का वर्णन करते हुए किसी दैनिक पत्र के संपादक के नाम पत्र लिखिए।
३. अनियमित डाक वितरण की शिकायत करते हुए पोस्टमास्टर को पत्र लिखिए।
४. लिपिक पद हेतु विद्यिलय के प्राचार्य को आवेदन-पत्र लिखिए।
५. अपने क्षेत्र में बिजली संकट से उत्पन्न कठिनाइयों का वर्णन करते हुए अधिशासी अभियन्ता विद्युत बोर्ड को पत्र लिखिए।