मंगलवार, 31 जुलाई 2012

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सत्रारंभ समारोह




माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सत्रारंभ समारोह का समापन 31 जुलाई,2012 ,मंगलवार को सायं 5.00 बजे भोपाल स्थित रवींद्र भवन में आयोजित किया गया है। कार्यक्रम का विषय हैः नैतिक मूल्य और मीडिया। आयोजन के मुख्यअतिथि स्वामी जितात्मानंद जी महाराज(कोलकाता) होंगें तथा अध्यक्षता श्री लक्ष्मीकांत शर्मा, उच्चशिक्षा एवं जनसंपर्क मंत्रीःमप्र सरकार करेंगें। रामकृष्ण मिशन से जुड़े स्वामी जितात्मानंद मिशन के अनेक प्रकल्पों के प्रमुख रहे हैं तथा दुनिया भर में स्वामी जी के विचारों के प्रसार में लगे हैं।
विश्वविद्यालय के सत्रारंभ कार्यक्रम का आरंभ दिनांक 23 जुलाई को हुआ जिसमें विविध विषयों पर विद्यार्थियों के साथ संवाद हुआ। इसमें विवि के प्राध्यापकों सहित कुलपति प्रो.बृजकिशोर कुठियाला, विवि के पूर्व महानिदेशक राधेश्याम शर्मा, काशी विद्यापीठ के प्रोफेसर डा. राममोहन पाठक, स्वेदश के संपादक राजेंद्र शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय, शिवअनुराग पटैरया, जगदीश उपासने, विजय अग्रवाल, राकेश दुबे ने विविध विषयों पर छात्रों का मार्गदर्शन किया। इस आयोजन के तहत नए और पुराने विद्यार्थियों का उन्मुखीकरण हुआ।

संचार


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सोमवार, 30 जुलाई 2012

पत्रकारिता पर ऑनलाईन पुस्तिका : महादेव देसाई



१९३६ में गुजरात साहित्य परिषद के समक्ष परिषद के पत्रकारिता प्रभाग की रपट महादेव देसाई ने प्रस्तुत की थी । उक्त रपट के प्रमुख अनुदित हिस्से इस ब्लॉग पर मैंने दिए थे । नीचे की कड़ी ऑनलाईन पीडीएफ़ पुस्तिका के रूप में पेश है । मुझे उम्मीद है कि पीडीएफ़ फाइल में ऑनलाईन पेश की गई इस पुस्तिका का ब्लॉगरवृन्द स्वागत करेंगे और उन्हें इसका लाभ मिलेगा । महादेव देसाई गांधीजी के सचिव होने के साथ-साथ उनके अंग्रेजी पत्र हरिजन के सम्पादक भी थे । कई बार गांधीजी के भाषणों से सीधे टेलिग्राम के फार्म पर रपट बना कर भाषण खतम होते ही भेजने की भी नौबत आती थी । वे शॉर्ट हैण्ड नहीं जानते थे लेकिन शॉर्ट हैण्ड जानने वाले रिपोर्टर अपने छूटे हुए अंश उनके नोट्स से हासिल करते थे ।
पत्रकारिता : महादेव देसाई-पीडीएफ़
इस ब्लॉग पर पुस्तिका की पोस्ट-माला (लिंक सहित) नीचे दी हुई है :
पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य
पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

पत्रकारिता (४) : ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? ”

पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘

पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई

समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई

क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?

समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई

रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई

तिलक महाराज का ‘ केसरी ‘ और मैंचेस्टर गार्डियन : ले. महादेव देसाई

विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई

अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई

अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई

अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई

कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८) : महादेव देसाई

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पत्रकारिता


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पत्रकारिता (journalism) आधुनिक सभ्यता का एक प्रमुख व्यवसाय है जिसमें समाचारों का एकत्रीकरण, लिखना, रिपोर्ट करना, सम्पादित करना और सम्यक प्रस्तुतीकरण आदि सम्मिलित हैं। आज के युग में पत्रकारिता के भी अनेक माध्यम हो गये हैं; जैसे - अखबार, पत्रिकायें, रेडियो, दूरदर्शन, वेब-पत्रकारिता आदि।

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महादेव देसाईं


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महादेव देसाईं
Mahadev Desai and Gandhi 2 1939.jpg
महादेव देसाईं का चित्र बापू के साथ
जन्म १ जनवरी १८९२ (आयु १२०)
सूरत, गुजरात, भारत
मृत्यु १५ अगस्त १९४२ (५० वर्ष की आयु में)
राष्ट्रीयता भारतीय
शिक्षा एल एल बी कानून
शिक्षा प्राप्त की गुजरात
प्रसिद्धि कारण स्वतंत्रता सेनानी
महात्मा गाँधी के सहयोगी व निजी सचिव
महादेव देसाईं (गुजराती: મહાદેવ દેસાઈ) (१ जनवरी, १८९२ - १५ अगस्त, १९४२) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी एवं राष्ट्रवादी लेखक थे। किन्तु उनकी प्रसिद्धि इस कारण से ज्यादा है कि वे लम्बे समय (लगभग २५ वर्ष) तक गांधीजी के निज सचिव रहे।

अनुक्रम

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[संपादित करें] जीवन परिचय

महादेव देसाईं का जन्म सूरत के एक छोटे से गाँव "सरस" में १ जनवरी १८९२ को हुआ। महात्मा गाँधी से इनकी भेंट सर्वप्रथम ३ नवम्बर १९१७ को गोधरा में हुई। यही से महादेव देसाईं बापू और उनके आन्दोलनों से जुड़ गये और जीवन पर्यन्त राष्ट्र सेवा करते हुए १५ अगस्त सन १९४२ को आगा खान पैलस (ब्रिटिश राज द्वारा यह पैलेस जेल के रूप में प्रयुक्त होता था) में जीवन की अन्तिम श्वास ली। महादेव देसाईं ने बापू के निजी सचिव के तौर पर कार्य करते हुए अपनी डायरी में भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन का जो जीवन्त वर्णन किया है, वह अदभुत हैं। वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण सैनिक थे।
"महादेव देसाईं का एक सुन्दर वर्णन ‘ हसीदे एदीब ‘ की ‘ इनसाइड इण्डिया’ ( भारत में ) नामक पुस्तक में ‘ रघुवर तुमको मेरी लाज ‘ नाम के चौथे अध्याय में मिलता है । जब वे महात्माजी से बातें कर रहीं थीं , महादेव देसाईं नोट ले रहे थे । उन्हीं के शब्दों में – ” वे निरंतर नोट लेते रहते हैं । मेरी महात्माजी से जो बातें हुईं , वे तो मैं आगे दूँगी ही । मगर यह उनका सेक्रेटरी ऐसा है कि वह किसी का भी ध्यान आकर्षित किए बिना नहीं रह सकता । यद्यपि वह अत्यन्त नम्र और अपने -आपको कुछ नहीं माननेवाला है । महादेव का गांधीजी के आंदोलन से अपर कोई अस्तित्व नहीं है । महादेव देसाई ऊँचे , इकहरे तीस – पैंतीस बरस के हैं । उनके चेहरे के नक्श दुरुस्त हैं , और होठ पतले हैं ; आँखें ऐसी हैं कि वे किसी रहस्यमयी दीप्ति से चमकती रहती हैं । यह रहस्यभरी झलक ( जो कि बहुत गहरी है ) होते हुए भी , वह अत्यन्त व्यवस्थित काम करनेवाले व्यक्ति हैं । अगर वे व्यवस्थित न हों तो इतना सब काम कर ही नहीं सकते । यद्यपि उनका स्वभाव तेज , भावकतापूर्ण है ; फिर भी उनका अपनी वासनाओं पर संयम है । महात्माजी के प्रति जो श्रद्धा -भक्ति उन्हें है , वह धार्मिक है ; सोलह वर्षों से वे गांधी के साथ रहे हैं , उनसे एकात्म होकर । बचपन से बहुत तंग गलियों से गुजरता हुआ यह जवान आदमी आज वैराग्य की कठिनतम सीढ़ी पर चढ़ आया है । वह ‘ हरिजन ‘ का संपादन करता है । साथ ही सेक्रेटरी का सब काम करता है , जिसमें सफाई , बर्तन- धोना वगैरह सब आ जाता है । निरंतर योरोप , सुदूरपूर्व , अमरीका सभी ओर से गांधीजी प्रश्नों की झड़ी लग रही है , और उसमें भी अपने मन की समतोलता को बनाये रखना असाधारण बुद्धिमत्ता का काम है। महादेव देसाईं ब्रिटिश राज एंव देशी रियासतों के मसलों को भी देखते थे। एक बार वह ग्वालियर-राज्य सार्वजनिक सभा के अध्यक्ष बनकर ‘मुरार’ गये।"
बापू के साथ भारत भ्रमण व जेल यात्राओं के अतिरिक्त ग्रेट ब्रिटेन के महाराजा के बुलावे पर महात्मा गाँधी के साथ महादेव देसाईं बंकिंमघम पैलेस इंग्लेंड भी गये, बापू महादेव सरदेसाई को पुत्रवत मानते थे।

[संपादित करें] सेवाग्राम

महादेव देसाईं ‘सेवाग्राम’ में निवास करते थे, आज भी यह कुटी जिज्ञासुओं के अवलोकनार्थ व्यवस्थित है ।

[संपादित करें] पत्रकारिता एंव लेखन

[संपादित करें] द इंडिपेंडेंट

महादेव देसाईं 1921 में अखबार द इंडिपेंडेंट से जुड़े, जो इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ करता था। मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरु के जेल जाने पर इस अखबार के संपादक के तौर पर महादेव देसाईं ने कार्य किया। ब्रिटिश सरकार द्वारा इस अखबार पर रोक लगा दी तब महादेव देसाईं "द इंडिपेंडेंट" को एक वर्ष तक साइकिलोस्टाइल पर निकाला। महादेव देसाईं की गिरफ्तारी होने पर महात्मा गांधी के पुत्र देवदास गांधी ने इस अखबार को निकाला और देसाईं की पत्नी दुर्गाबेन ने सक्रिय सहयोग दिया।

[संपादित करें] हरिजन


हरिजन पत्र
महादेव देसाईं हरिजन पत्र के संपादक थे।

[संपादित करें] नवजीवन

महादेव देसाईं 1924 में नवजीवन के संपादक रहे।

[संपादित करें] लेखन

  • अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान पर पुस्तक
  • नवजीवन के लिए लेखन डायरी लेखन
  • लार्ड मोर्ले की रचना का गुजराती में अनुवाद
  • २० खण्डों में प्रकाशित महादेव देसाईं की डायरी
  • महात्मा गांधी की गुजराती में लिखी आत्मकथा सत्य के साथ प्रयोग का अंग्रेजी में अनुवाद
  • जवाहरलाल नेहरू की अत्मकथा "एन ऑटोबायोग्राफ़ी" का गुजराती में अनुवाद

[संपादित करें] ध्वस्त स्मारक

बडवानी से लगभग पांच किलोमीटर दूर नर्मदा नदी के किनारे बापू कस्तूरबा के साथ उनके साथी महादेव देसाई की समाधियां स्थित हैं। इस स्थान को राजघाट के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में महात्मा गांधी के साथ कस्तूरबा और महादेव देसाईं के भस्मी कलश स्मारक जर्जर हो गये हैं।

[संपादित करें] मृत्यु

आठ अगस्त १९४२ को मुम्बई के ग्वालिया टैक के मैदान में अपने ऐतिहासिक भाषण में महात्मा गाँधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो - करो या मरो’ का नारा दिया । ९ अगस्त की भोर में महात्मा गाँधी , श्रीमती सरोजनी नायडू और महादेव देसाईं को गिरफ़्तार कर पुणे के आगा खाँ महल में बन्द कर दिया गया। १५ अगस्त , १९४२ को महादेव देसाईं की इस जेल में ही मृत्यु हुई।

[संपादित करें] महादेव देसाईं की समाधि


आगा खान महल में कस्तूरबा और महादेव देसाईं की समाधियां
महादेव देसाईं को नौ अगस्त १९४२ में गिरफ्तार कर आगा खान महल में रखा गया। १४-१५ अगस्त की मध्य रात्रि को देसाई का निधन हुआ। उनके निधन के उपरान्त महात्मा गांधी की इच्छा के अनुसार आगा खान के महल में उनकी समाधि बनवाई गई। इस समाधि पर ओम एंव क्रास के चिन्ह अंकित किए गये। महादेव देसाईं के मृत्यु के एक वर्ष पश्चात कस्तूरबा का स्वर्गवास हुआ, कस्तूरबा की समाधि महादेव देसाईं की समाधि के निकट निर्मित की गयी।

[संपादित करें] संदर्भ

[संपादित करें] अन्य कड़ियां

मुंशी प्रेमचन्द की रचनाएँ


Updates to the Site
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1. बेटी का धन
2. मन्दिर
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4. खून सफेद
5. देवी - एक लघु कथा
6. देवी
7. दो भाई
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9. कुसुम
10. English Translation of एक विषम समस्या





Dear fellow readers of Munshi Premchand,


It is a privilege for me to make the timeless stories of Munshi Premchand available to readers online. From the stories like "Idgah" that I read as a school child to novels like "Nirmala" that I read in adulthood, Munshi Premchand has left an impression on me and that will last a lifetime.


In order to make this blog a little better and in order to make the reach of Munshi Premchand wider, I plan to make the following changes to the site in the coming days and weeks:


1. The blog will have its own domain name: premchand.kahaani.org. The site will still be accessible to readers via the old domain name munshi-premchand.blogspot.com, but I suggest you to update your bookmarks to the newer shorter URL. The site will continue to be hosted at blogspot.com and I believe any feeds will be automatically updated. (already implemented)


2. The long URLs of individual posts (stories) will be made more "logical". For example, http://munshi-premchand.blogspot.com/2006/03/blog-post_114178485327170195.html may become something like http://munshi-premchand.blogspot.com/2006/03/andher.html and premchand.kahaani.org/2010/12/andher.html. For this purpose, I will have to republish stories one-by-one. Sorry for the inconvenience to feed subscribers who may see in their feed stories that they have already read. (partially implemented)


3. To encourage conversation about the stories, I will open up comments on the blog. I encourage readers to discuss their impressions of the stories they read, of the characters and events, of their relevance to present times. They may also ask about anything they don't understand about the stories. (already implemented)


4. For people who do not understand Hindi, I have started the job to translating the stories to English one by one. You will soon see English translations of some stories. Any learners of Hindi will also find the translations useful.


5. I will try to add more stories to the collection, as I type them.


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मुंशी प्रेमचन्द के साहित्य के सह-पाठको,


प्रेमचन्द जी के शाश्वत साहित्य को अन्तर्जाल पर पाठकों को उपलब्ध कराना मेरे लिए आदर की बात है। बचपन में पढ़ी ईदगाह जैसी कहानियों ने और यौवन में पढ़ी निर्मला जैसे उपन्यासों ने मन में एक अमिट छाप छोड़ रखी है।


इस आनलाइन कहानी संग्रह को बेहतर बनाने के लिए, और मुंशी प्रेमचन्द को अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए मैं इस साइट में आने वाले दिनों में निम्नलिखित परिवर्तन करने वाला हूँ


1. इस ब्लॉग का अब अपना डोमेन होगा premchand.kahaani.org. इस साइट को पुराने डोमेन munshi-premchand.blogspot.com के द्वारा भी पढ़ा जा सकेगा, पर सुझाव है कि पाठक अपने पुस्तकचिह्नों को बदल लें। साइट blogspot.com पर ही रहेगी और आशा है कि फीड स्वतः अपडेट हो जाएँगे। (यह कार्य संपूर्ण है)


2. विभिन्न कहानियों या पृष्ठों के पते सरल बनाए जाएँगे। उदाहरण के लिए http://munshi-premchand.blogspot.com/2006/03/blog-post_114178485327170195.html बदल कर कुछ http://munshi-premchand.blogspot.com/2006/03/andher.html जैसा, या premchand.kahaani.org/2010/12/andher.html जैसा हो जाएगा। इसके लिए मुझे कुछ कहानियों को एक एक कर के पुनर्प्रकाशित करना पड़ेगा। यदि इस कारण कुछ पहले से पढ़ी हुई कहानियाँ आप की फीड में दोबारा आती हैं को उससे होने वाली असुविधा के लिए खेद है। (अंशतः संपूर्ण)


3. कहानियों के विषय में वार्तालाप हो, इस आशय से मैं इस चिट्ठे पर टिप्पणियाँ लागू कर रहा हूँ। पाठकों से निवेदन है कि कहानियों के विषय में अपने विचार दें, पात्रों और घटनाओं के विषय में लिखें, उनकी आजकल की घटनाओं के साथ कैसी प्रासंगिकता है, इस बारे में टिप्पणी दें। कुछ समझने में कठिनाई हो तो वह पूछें। (संपूर्ण)


4. जो लोग हिन्दी नहीं समझते पर हिन्दी साहित्य में रुचि रखते हैं, उनके लिए मैंने कहानियों को अँग्रेजी में अनूदित करना शुरू कर दिया है। शीघ्र ही कुछ कहानियाँ अंग्रेजी में उपलब्ध होंगी। हिन्दी के छात्रों के लिए भी यह लाभकर होगा, ऐसी आशा है।


5. आशा है कि नई कहानियाँ भी संकलन में जुड़ जाएँगी, जैसे जैसे मैं उन्हें टाइप करता जाऊँगा।


आप के रुचिपूर्ण पठन के लिए धन्यवाद।




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