मंगलवार, 22 सितंबर 2020

ग्वालियर में फाँसीघर / कबीर

 ग्वालियर किला: -यहां इत्र में नहाती थीं रानियां, फांसी पर लटके थे बाग़ी /


ग्वालियर। मैं गढ़ गोपाचल हूं, आज लोग मुझे पूर्व के जिब्राल्टर और ग्वालियर किले के रूप में पहचानते हैं। दुनिया भर की धरोहरों को सहेजने के क्रम में मुझे यूनेस्को ने सम्मानित किया है। सम्मानों / सराहनाओं से अब मैं बहुत खुश नहीं होता। निर्विकार भाव से मैं पहले भी अपमान और सम्मान को पचा लेता था, अब भी वैसे ही आत्मसात करता हूं।

मुझे भारत या पूर्व का जिब्राल्टर कहा गया, क्योंकि जिस तरह भूमध्य सागर की छाती पर उग आई इस मजबूत चट्टान ने यूरोप को अफ्रीका के रास्ते अरब हमलों से महफूज रखा, उसी तरह मैंने भी हिंदुस्तान की उत्तरी सीमाओं से देश की दहलीज दिल्ली तक घुस आए आक्रमणकारियों

को बस वहीं तक रुके रहने को मजबूर कर दिया था। कोई भी सूरमा मुझे ललकार कर सीधे पराजित करते हुए इस रास्ते से देश के पश्चिमी और दक्षिणी प्रदेशों में नहीं घुस सका।

ऐसा नहीं है कि मैं कभी हारा नहीं...थका नहीं या परेशान नहीं हुआ, लेकिन जब-जब मैं हारा, वजह अपनों के दिए घाव ही रहे। अपनी ही संतानों के भितरघातों ने मुझे अपमान के वो दंश दिए कि अब किसी सम्मान का अमृत उस विष के असर को खत्म नहीं कर सकता। आज भी ढेरों टूरिस्ट आते हैं। मेरे कोने-कोने को कौतूहल से ताकते हैं और अलग-अलग व्याख्या करते हैं।

किसी को वो जगह आकर्षित करती है, जहां बंदियों को फांसी दी जाती थी, तो कोई उस जगह को देखकर मुग्ध होता है, जहां रनिवास था। जहां रानियां गुलाब जल और तरह-तरह के इत्र और फूलों की खुशबू से भरे पानी में स्नान करती थीं. तो कोई उस एकांत की छांव को पसंद करता है, जहां बुर्ज में बैठकर मेरा मुखिया अपनी प्रजा को दर्शन देता था.कोई गदगद हो जाता है तोप के मुहाने पर बैठकर...यहां शोर है बच्चों की मस्ती का, यहां नाद हैं सुरों का, यहां का मौन, सन्नाटा भी आवाज़ करता है..आइए ज़रूर एक बार मुझसे मिलने..मुझे क्यूं हर साल बेहतरी का सरकारी प्रमाण पत्र मिलता है, ये खुद आपके कान में बुदबुदा कर मैं ही बताऊंगा. मैं ग्वालियर का क़िला बोल रहा हूं...

( दैनिक भास्कर  से अनुसरण )

रवि अरोड़ा की नजर से....

 हाल चाल ठीक ठाक है/ रवि  अरोड़ा 


रवि अरोड़ा

मेरे कमरे से सड़क पर आता-जाता हर कोई दिखता है । आजकल काम-धाम कुछ है नहीं सो हर उस चीज़ पर भी निगाह जाती है जिसका कोई महत्व नहीं । यूँ भी आदमी जब फ़ुर्सत में हो तो अपना ही दूसरों का भी हिसाब लगाने लगता है । शायद यही वजह रही कि मैंने आज उन सब्ज़ी-फल वालों की गिनती की जो सुबह नौ से बारह बजे के बीच मेरे मोहल्ले में आये । देख कर हैरानी हुई कि ठेली, हाथ व ई रिक्शा पर सब्ज़ी व फल आदि बेचने बाईस लोग मेरे घर के सामने से गुज़रे । मुझे अच्छी तरह याद है की छः महीने पहले तक आधा किलो टमाटर भी लेने हों तो सेक्टर दस की मार्केट जाना पड़ता था । बच्चों की कोई खास फ़रमाइश हो तो दो-चार किलोमीटर की दौड़-धूप तय होती थी । हैरानी तो तब हुई जब देखा कि रेत का भुट्टा बेचने वाली एक ठेली भी घर के सामने से गुज़री । एक समय में सिहानी गेट और मनोहर टाकिज़ के अतिरिक्त ये कहीं नहीं मिलते थे । अब तो हापुड़ रोड पर कलेक्ट्रेट के सामने ही एक दर्जन ठेली वाले खड़े होते हैं । 


इत्तेफाकन शाम को गोविंद पुरम जाना हुआ । शास्त्री नगर चौक से कालोनी तक फल-सब्ज़ी की ठेलियाँ ही ठेलियाँ दिखाई पड़ीं । ख़ाली दिमाग़ को काम मिल गया और लगे हाथ ये ठेलियाँ ही गिन डालीं । पूरी 78 थीं । कई ग्रामीण भी अपनी भैंसा बुग्गी में सेब और मौसमी आदि बेचते मिले । इस इलाक़े में सेब तो दूर मौसमी भी नहीं उगती सो ज़ाहिर है कि मंडी से लाकर ही इसे बेच रहे होंगे । लगे हाथ दो चार फल विक्रेताओं से मिज़ाजपुर्सी भी कर डाली । सबसे मेरा एक ही सवाल था कि यह काम कब से कर रहे हो ? हैरानी हुई कि कोई भी इस धंधे में चार-छः महीने से पुराना नहीं था । मूलतः कोई पेंटर था तो कोई बढ़ई । कोई किसी फ़ैक्ट्री में पल्लेदार था तो कोई दिहाड़ी मज़दूर । लॉक़डाउन में काम छूटा तो पेट पालने को फल-सब्ज़ी बेचने लगे । ठेली भी किराये मिल जाती है और किसी दूसरे सब्ज़ी वाले की गारंटी दिला दो तो माल भी उधार मिल जाता है । परिवार चलाने को इससे बेहतर उन्हें कुछ और नहीं मिला तो लग गए लाइन में । 


उधर, पता चला है कि गोल मार्केट का एक व्यापारी बाज़ार के पैंतीस करोड़ रुपये मार कर परिवार सहित फ़रार हो गया है । कमेटी चलाने वाले भी कई लोग भूमिगत हैं । नौकरी और एजेंसी आदि दिलवाने के नाम लोगों को ठगने वालों की ख़बरें लगभग रोज अख़बारों में छपती है । सौ दो सौ रुपये के लिये भी लोग बाग़ एक दूसरे का सिर फाड़ रहे हैं । हत्याओं और आत्महत्याओं का भी अनवरत सिलसिला शुरू हो गया है । झपटमारी , लूट-खसोट और ठगी की वारदात आम हो चली हैं । सरकारी विभागों में रिश्वतों के दाम दोगुने हो गए हैं तो समाज में जिनकी ईमानदारी की क़समें खाई जाती थीं, वे भी थोड़ी-थोड़ी रक़मों के लिए बे-ईमान हो रहे हैं । अविश्वास की ऐसी बयार चली है कि कोई किसी पर विश्वास नहीं कर रहा । न कोई उधार रूपया अथवा माल दे रहा है और न किसी को मिल रहा है । पुरानी देनदारियों को चुकाने में लोगबाग़ हाथ खड़े कर रहे हैं । मकान और दुकान मालिकों को किराया नहीं मिल रहा । जो ज़्यादा दबाव बना रहे हैं उनकी प्रोपर्टी ख़ाली हो रही है । एक्सपोर्ट के ओर्डर लगभग पूरे हो गए हैं तो अब उद्योगों में पुनः छटनी शुरू हो गई है । 


चार दिन पहले घड़ी डिटर्जेंट वालों के एक सेल्समैन को सदरपुर के पास दिन दहाड़े क़ट्टा सिर पर लगा कर लूट लिया गया। मालिक भाजपा के नेता हैं फिर भी पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी । पुलिस सेल्समैन को हड़का रही है कि तूने शोर क्यों नहीं मचाया। मालिक का कहना है कि सिर पर तमंचा लगा हुआ हो तो भला कोई कैसे चिल्ला सकता है ? पुलिस का तर्क बेशक मूर्खतापूर्ण है मगर उसकी अपनी मुसीबत है । सारी रिपोर्ट लिख लें तो एक ही दिन में सबके बोरिया बिस्तर बँध जाएँगे । अब और क्या क्या बताऊँ ? जो हालत मेरे शहर की है , कमोवेश यही सूरते हाल पूरे मुल्क का है । कुल मिला कर हर कोई अच्छे दिनो के आनंद में है ।

पटौदी खानदान की दास्तान / विवेक शुक्ला

 क्यों पटौदी खानदान रहा त्यागराज मार्ग पर/ विवेक शुक्ला 

हालांकि राजधानी के त्यागराज मार्ग  में कोई पटौदी हाउस नहीं है, पर मंसूर अली खान पटौदी, उनकी पत्नी शर्मिला और इन दोनों के बच्चे यहां के एक शानदार सरकारी बंगले में लंबे समय तक रहे।


 मंसूर अली खान पटौदी की आज (  22 सितंबर)  पुण्यतिथि है। दरअसल इफ्तिखार अली खान पटौदी सीनियर की 1951 में एक पोलो मैच के दौरान दुर्घटना होने के कारण मौत हो गई थी।


 तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मंसूर अली खान पटौदी की मां श्रीमती साजिदा सुल्तान के नाम पर त्यागराज मार्ग  में एक बंगला आवंटित कर दिया। साजिदा सुल्तान को समाज सेविका के कोटे से बंगला मिला। इधर ही पटौदी लेकर आए शर्मिला को अपनी बहू बनाकर। साजिदा सुल्तान की साल 2003 में मृत्यु के बाद पटौदी परिवार को उस बंगले को खाली करना पड़ा।

 हालांकि कहने वाले तो कहते हैं कि पटौदी साहब ने हरचंद कोशिश की थी कि बंगला उनकी पत्नी शर्मिला के नाम पर आवंटित हो जाए। एक बात और। दिल्ली में Pataudi हाउस दरिया गंज और अशोक रोड के पीछे हैं ।


 कनॉट प्लेस और पटौदी हाउस का रिश्ता

हरियाणा में स्थित पटौदी हाउस और अपने कनॉट प्लेस का एक करीबी संबंध है। दरअसल दोनों को रोबर्ट टोर रसेल ने डिजाइन किया था। 


कहते हैं कि इफ्तिखार अली खान पटौदी क्नॉट प्लेस के डिजाइन से इस कद्र प्रभावित हुए थे कि उन्होंने निश्चय किया कि उनके महल का डिजाइन रसेल ही तैयार करेंगे। 


 रसेल ने पटौदी हाउस का डिजाइन बनाते हुए भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। महल के आगे बहुत से फव्वारे लगे है। फव्वारों क साथ ही गुलाब के फुलों की क्यारियां हैं, जिधर बेशुमार गुलाब के फुलों से सारा माहौल गुलजार रहता है। महल के भीतर भव्य ड्राइंग रूम के अलावा सात बेडरूम,ड्रेसिंग रूम और बिलियर्ड रूम भी है।


 सारे महल का डिजाइन बिल्कुल राजसी अंदाज में तैयार किया गय़ा। इसका डिजाइन तैयार करते वक्त रसेल को आस्ट्रेलिया के आर्किटेक्ट कार्ल मोल्ट हेंज का भी पर्याप्त सहयोग मिला। रसेल ने ही सफदरजंग एयरपोर्ट, वेस्टर्न कोर्ट और तीन मूर्ति को भी डिज़ाइन किया था।

 

जामिया में नवाब पटौदी कहाँ


मंसूर अली खान पटौदी अबजामिया मिलिया इस्लामिया  यूनिवर्सिटी में भी है। जामिया के जिस क्रिकेट स्टेडियम का पहले नाम भोपाल ग्राउंड था, वह अब मंसूर अली खान स्टेडियम कहलाता है। इसकी पवेलियन का नाम वीरेंदर सहवाग पर है । सहवाग जामिया से है । भोपाल की रियासत ने जमीन जामिया को दान में दी थी। 


इस बीच, नवाब साहब ने दिल्ली क्रिकेट को एक झटके में छोड़ दिया था। वे जब 1960 के आसपास दिल्ली के रणजी ट्रॉफी में कप्तान थे, तब उन्होंने हैदराबाद का रुख कर लिया था। फिर वे हैदराबाद कीटीम से अपने मित्र एम.एल.जयसिम्हा की अगुवाई में खेलते रहे।  कुछ साल पहले पटौदी

 साहब का फिरोजशाह कोटला में 'हालऑफफेम'  बनाया गया है। पर ये सवाल तो पूछा ही जाएगा कि उन्होने दिल्ली से खेलना क्यों छोड़ा था?   हालांकि वे यहां पर ही रहते थे।


बेशक पटौदी जुझारू क्रिकेटर थे। भारत का कप्तान बनने से चंद माह पहले एक कार हादसे में उनकी दायीं आँख की रोशनी जाती रही थी। पर पटौदी ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक आँख से बल्लेबाजी करते हुए टेस्ट मैचों में 6 शतक और 16 अर्धशतक ठोके। 


 वे जब बल्लेबाजी करते थे तब उन्हंो दो गेंदें अपनी तरफ आती हुई दिखती थीं। इन दोनों के बीच कुछ इंचों की दूरी भी रहती थी। पर पटौदी ने हमेशा उस गेंद को खेला जिसे उन्हें खेलना चाहिए था।

ये लेख आज पब्लिश हुआ है ।

हिंदी पर कैसा यह ब्रेक? / मनोज कुमार

 ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी पर ब्रेक मनोज कुमार

ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी के चलन पर ब्रेक लग गया है. आप हिन्दी के हिमायती हों और हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिन्दी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिन्दी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न करें लेकिन सच है कि नकली अंग्रेजियत में डूबे हिन्दी समाचार चैनलों ने हिन्दी को हाशिये पर ला खड़ा किया है. हिन्दी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ने दर्शकों को भरमा कर रख दिया है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारिता की राह से गुजरते हुए समाचार चैनल मीडिया में बदल गए हैं. संचार या जनसंचार शब्द का उपयोग अनुचित प्रतीत होता है तो विकल्प के तौर पर अंग्रेजी का मीठा सा शब्द मीडिया तलाश लिया गया है. अब मीडिया का हिन्दी भाव क्या होता है, इस पर चर्चा कभी लेकिन जब परिचय अंग्रेजी के मीडिया शब्द से होगा तो हिन्दीकी पूछ-परख कौन करेगा. हालांकि पत्रकारिता को नेपथ्य में ले जाने में अखबार और पत्रिकाओं की भी भूमिका कमतर नहीं है. चैनलों की नकल करते हुए अखबारों ने खबरों और परिशिष्ट के शीर्षक भी अंग्रेजी शब्दों से भर दिए हैं. शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है. प्रधानमंत्री लिखने से अखबारों में जगह की कमी हो जाती है तो पीएम से काम चलाया जा रहा है. मुख्यमंत्री सीएम हो गए और आयुक्त कमिश्रर. जिलाधीश के स्थान पर कलेक्टर लिखना सुहाता है तो संपादक के स्थान पर एडीटर शब्द सहज हो गया है. यानि समाचार चैनल से लेकर अखबार के पन्नों में भी हिन्दी को दरकिनार किया जा रहा है. हालांकि इस दौर का मीडिया गर्व से इस बात को लिखता जरूर है कि हिन्दी का श्रेष्ठ चैनल या हिन्दी का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार लेकिन हिन्दी को कितना स्थान है, यह उन्हें भी नहीं मालूम.  

हम हर साल 14 सितम्बर को इस बात को लेकर शोर मचाते रहें कि हिन्दी माथे की बिंदी है. हिन्दी से हमारा स्वाभिमान है. हिन्दी हमारी पहचान है लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता से मीडिया में बदलते परिदृश्य में हिन्दी हाशिये पर है. हिन्दी के चैनलों के पास हिन्दी के शब्दों का टोटा है. उनके पास सुप्रभात कमतर शब्द लगता है और गुडमार्निंग उनके लिए ज्यादा प्रभावी है. दस बड़ी खबरों के स्थान पर टॉप टेन न्यूज की सूची पर्दे पर दिखाना उन्हें ज्यादा रूचिकर लगता है. हिन्दी के नाम पर कुमार विश्वास की कविता का पाठ कराने वाले चैनलों को कभी निराला या पंत की कविताओं को सुनाने या पढ़ाने में रूचि नहीं होती है. सच तो यह है कि हिन्दी की पीठ पर सवार होकर अंग्रेजी की टोपी पहने टेलीविजन न्यूज चैनलों ने जो हिन्दी को हाशिये पर लाने की कोशिश शुरू की है, वह हिन्दी के लिए अहितकर ही नहीं बल्कि दुर्भाग्यजनक है. हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने वालों का दिल इस बात से दुखता है कि जिनकी पहुंच करोड़ों दर्शक और पाठक के बीच है, वही संचार माध्यम हिन्दी से दूर हैं. इन संचार माध्यमों की आत्मा हिन्दी के प्रति जाग गई तो हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने में कोई बड़ी बाधा नहीं होगी लेकिन यह संभव होता नहीं दिखता है. हम तो हिन्दी के दिवस, सप्ताह और अधिक से अधिक हिन्दी मास तक ही स्वयं को समेट कर रखना चाहते हैं. हिन्दी की श्रीवृद्धि के नाम पर यह पाखंड हम दशकों से करते चले आ रहे हैं और शायद यह क्रम ना टूटे. इसे हिन्दी के प्रति पाखंड परम्परा का नाम भी दे सकते हैं. कुछेक को यह नागवार गुजरेगा लेकिन सच से कब तक मुंह चुराएंगे.

हिन्दी की यह दुर्दशा अंग्रेजी से प्रभावित हिन्दी समाचार चैनलों के आने के पहले से हो रही है. मेरी तरह आपने भी कभी महाविद्यालय की परीक्षा दी होगी. परीक्षा में प्रश्र पत्र आपके सामने शिक्षक ने रखे होंगे और उसमें प्रश्र पहले हिन्दी में और इसी हिन्दी का रूपांतरण अंग्रेजी में दिया होता है. अब असल बात यह है कि प्रश्र पत्र के निर्देश को पढ़ें जिसमें साफ साफ लिखा होता है कि हिन्दी में कोई त्रुटि हो तो अंग्रेजी के सवाल ही मान्य है. अर्थात हमें पहले समझा दिया गया है कि हिन्दी के चक्कर में मत पड़ो, अंग्रेजी ही सर्वमान्य है. हिन्दी पत्रकारिता में शिक्षा लेकर हाथों में डिग्री लेकर भटकते प्रतिभावान विद्यार्थियों को उचित स्थान क्यों नहीं मिल पाता है तो इसका जवाब है कि उन्हें अंग्रेजी नहीं पढ़ाया गया. बताया गया कि हिन्दी माध्यम में भी अवसर हैं. यदि ऐसा है तो प्रावीण्य सूची में आने वाले विद्यार्थियोंं का भविष्य अंधेरे में क्यों है? टेलीविजन चैनलों में उनका चयन इसलिए नहीं हो पाता है कि वे अंग्रेजी नहीं जानते हैं या उस तरह की अंग्रेजी नहीं जानते हैं जिसके बूते पर वे एलिट क्लास को ट्रीटमेंट दे सकें. ऐसे में हिन्दी के प्रति विमोह और अंग्रेजी के प्रति मोह स्वाभाविक हो जाता है. हालांकि हिन्दी के प्रति समर्पित लोगों को ‘एक दिन हमारा भी टाइम आएगा’ जैसे भाव से भरे लोग उम्मीद से हैं. हिन्दी के हितैषी भी इस बात का सुख का अनुभव करते हैं कि वे वर्ष में एक बार हिन्दी को लेकर बोलते हैं, लिखते हैं और हिन्दी की श्रीवृद्धि के लिए लिए विमर्श करते हैं. एक दिन, एक सप्ताह और एक माह के बाद हिन्दी आले में टांग दी जाती है. कुछ लोग हैं जो वर्ष भर क्या लगातार हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए प्राण-प्रण से जुटे हुए हैं. इन लोगों की गिनती अंगुली भर की है लेकिन हिन्दी को हाशिये पर डालने वालों की संख्या असंख्य है. 

इस पर सबसे पहले मीडिया कटघरे में आता है. यूरोप की नकल करते हुए हम भूल जाते हैं कि हिन्दीभाषी जनता ही इनके चैनल को टीआरपी दिलाती है. उनके होने से ही मीडिया का अस्तित्व है लेकिन करोड़ों लोगों की बोली-भाषा को दरकिनार कर उस अंग्रेजी को सिर पर कलगी की तरह बांधे फिरते हैं, जो उन्हें अपना अर्दली समझती है. यह भी सच है कि टेलीविजन चैनलों में काम करने वाले साथियों में अधिसंख्य मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि में शायद ही अंग्रेजियत हो लेकिन उन्हें टेलीविजन प्रबंधन भी लार्ड मैकाले की तरह अंग्रेजी बोलने और लिखने पर मजबूर करता है. मैकाले की समझ में यह बात आ गई थी कि भारत को बर्बाद करना है तो उसकी शिक्षा पद्धति को नष्ट करो और उनमें कुंठा भर दो. मैकाले यह करने में कामयाब रहा और मैकाले के रूप में आज लाखों मीडिया मैनेजर यही कर रहे हैं. जिस किसी को अंग्रेजी नहीं आती, वे हीनता के भाव से भरे हैं. अंग्रेजी उन पर लाद दिया गया है क्योंकि अंग्रेजी के बिना जीवन शून्य है. 

मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि आज से कोई 35 वर्ष पूर्व जब पत्रकारिता का सबक लेने गया वहां भी अंग्रेजी जानने वाले को हमसे ज्यादा सम्मान तब भी मिलता था और आज भी हम. हम हिन्दीपट्टी के लोग दरकिनार कर दिया करते थे. तब मीडिया उत्पन्न नहीं हुआ था. अखबार था तो पत्रकारिता थी. आज की तरह पेडन्यूज नहीं हुआ करता था बल्कि पीत पत्रकारिता की यदा-कदा चर्चा हुआ करती थी. लेकिन हमारे गुरु तो हिन्दुस्तानी भाषा में पगे-बढ़े थे और वे हमें आकर्षित करते थे. हमें लगता था कि जिस भाषा को समाज समझ सके, वही पत्रकारिता है. शायद आज भी हम पिछली पंक्ति में खड़े हैं तो हिन्दी के प्रति मोह के कारण है या कह सकते हैं कि अंग्रेजी को अंगीकार नहीं किया, इसलिए भी पीछे धकेल दिए गए. हालांकि सच यह भी है कि हम जो कर रहे हैं, वह आत्मसंतोष है. किसी एक अघढ़ समाजी का फोन आता है कि आप का फलां लेख पढऩे के बाद मैं आपको फोन करने से रोक नहीं पाया तो लगता है कि मैंने यहां आकर अंग्रेजी को परास्त कर दिया है. क्योंकि फोन करने वाला कोई टाई-सूट पहने नकली किस्म का बुद्धिजीवी नहीं बल्कि ठेठ भारतीय समाज का वह पुराने किस्म का कोई आदमी है जिसके पास दिमाग से अधिक दिल है. हिन्दी की श्रेष्ठता के लिए, हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने लिए दिमाग नहीं दिल चाहिए. दिल वाले आज भी पत्रकारिता कर रहे हैं और दिमाग वालों की जगह मीडिया में है. हिन्दी को श्रेष्ठ स्थान दिलाना चाहते हैं तो दिल से हिन्दी को गले लगाइए. हिन्दी दिवस और सप्ताह, मास तो औपचारिकता है. एक बार प्रण लीजिए कि हर सप्ताह हिन्दी में एक लेख लिखेंगे, हिन्दी में संवाद करेंगे. हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा. मीडिया का क्या है, वह तो बदल ही जाएगा.

सोमवार, 21 सितंबर 2020

मीना कुमारी औऱ हलाला

 मीना कुमारी का हलाला कभी नहीं हुआ- ताजदार अमरोही


ताजदार झूठ बोल रहे हैं। अगर नहीं, तो मीना कुमारी ज़ीनत अमन के पिता लेखक अमानुल्लाह खान की एक रात की बेगम क्यों बनीं? फिर इद्दत यानी मासिक आने के बाद उन्होंने तलाक लेकर फिर से कमाल के पास आने की सोची, उसके बाद उन्होंने जब कहा कि अगर इस रस्म को निभाना है, तो मुझमें और एक वेश्या में क्या फर्क रह गया? मीना फिर कमाल अमरोही के पास नहीं गईं। 

अगर ताजदार को गलत लगता है तो कंगना क्यों? पहले उन तमाम किताबों, सोशल मीडिया पर केस करें, जहां यह किस्से बहुतायत पढ़ने को मिलते हैं। लोग सुनाते हैं।

सच कितना भी छिपाओ ताजदार साहब, सच यही है कि बाकर अली से थप्पड़ खाने के बाद मीना कुमारी ने कमाल से ही नहीं, अपनी ज़िंदगी से रिश्ता तोड़ लिया था।

मीना से उसके बाद लोग खिलौने की मानिंद खेलते रहे, उनकी धज्जी धज्जी रात हुई, तन्हा तन्हा दिन बिता, तो उसके कारण कमाल अमरोही थे। आप कुछ भी कहिये, पर सच यही है...

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

कँगना VS सन्नी लियोन / संजीव आचार्य

 सनी_लियॉन_को_कंगना_के_खिलाफलोग_समर्थन_दे_रहे


 #कंगना रनौत एक अच्छी अदाकार हैं। अपनी मेहनत और कला से फ़िल्म इंडस्ट्री में एक मुकाम हासिल किया। एकाएक पिछले कुछ वर्षों में उसने विवादों को गले लगाने का ऐसा सिलसिला शुरू किया जिससे उनकी उपलब्धियों पर पानी फिरना शुरू हो गया। मैं यह नहीं कहता कि अगर वो आरोप लगाती है कि उसका और हर उसके जैसी बगैर स्थापित खानदान के आने वाली लड़की को बिस्तर गर्म करना पड़ता है, तो वह गलत आरोप लगा रही है। आपत्ति यह है कि एक्टर या निर्माता निर्देशक के खिलाफ नामजद रिपोर्ट कराये। जैसा मी टू केम्पेन में हुआ। 

ताजा विवाद में उसने खुद का खुद ही पर्दाफाश कर लिया कि वो केंद्र सरकार और भाजपा के हाथों में कठपुतली बनकर महाराष्ट्र सरकार और शिवसेना के खिलाफ टुच्ची बातें कर रही है। जया बच्चन के खिलाफ कंगना ने जिस अभद्र भाषा का उपयोग किया, उससे उसका हल्कापन नँगा हो गया। उर्मिला मातोंडकर को मैंने एनडीटीवी पर सुना। शाबाश उर्मिला, साफ और सीधे शब्दों में कंगना को धो कर रख दिया। बिल्कुल सही कहा कि जब कंगना पैदा भी नहीं हुई थी, जया जी गुड्डी, अभिमान और मिली जैसी फिल्मों में शानदार अभिनय से शोहरत हासिल कर चुकी थी। एक संजीदा अभिनेत्री के अलावा एक सांसद के तौर पर भी उन्होंने समय समय पर संसद में फ़िल्म इंडस्ट्री और महिलाओं के उत्पीड़न के मुद्दों पर अपनी बात जोरदार तरीके से रखी। उनके बारे में कंगना को टिप्पणी करने से पहले आईने में अपना अक्स जरूर देख लेना चाहिए था। 

फ़िल्म इंडस्ट्री अकेली नहीं है जहां ड्रग्स के शिकंजे में लोग फंसे हुए हैं। इस विकराल धंधे की जद में देश के कई क्षेत्र हैं। प्रमोद महाजन के पुत्र राहुल के बंगले पर जो घटना हुई थी वो प्रधानमंत्री निवास से कुछ सौ मीटर दूर था। हत्या हो गई। सब दब गया। सुशांत सिंह मामले में भी जांच शुरू हुई उसकी हत्या की आशंका से। परिजनों ने आरोप लगाए। जांच का रुख नशे की ओर मुड़ गया। सुशांत की छवि एक नशेड़ी की उघड़ कर आई। उसकी गर्लफ्रैंड को गिरफ्तार कर लिया। तमाशा बना। फिर अचानक कंगना पैराशूट से कूदी। गिरी विवादों के दलदल में और तब से कीचड़ उछाल रही है। केंद्र सरकार ने उसको वाई केटेग़री सुरक्षा दे दी!? आज तक तमाम महिला बलात्कार पीड़ितों ने जान का खतरा बताकर सुरक्षा मांगी, उनको मरने दिया गया। ये कांग्रेसी कार्यकर्ता माँ की बेटी को सिर्फ इसलिए वीवीआइपी श्रेणी की सुरक्षा मिल गयी क्योंकि वो मोदी की सार्वजनिक फैन है। खुलकर तारीफ करती है। ठाकरे परिवार के खिलाफ बोल रही है। माँ ने काँग्रेस छोड़कर भाजपा की सदस्यता ले ली। अब वो भी टीवी पर राग भाजपा गा रही हैं। 

ये विवाद अब सनी लियोन तक आ पहुंचा है। कंगना ने कहा था कि उर्मिला मातोंडकर तो सॉफ्ट पोर्न स्टार है। सनी लियोन का भी हवाला दिया। अब सनी लियोन ने कहा कि जो लोग किसी के बारे में कुछ नहीं जानते वो सबसे ज्यादा बोलते हैं। यह अजीब है। 4 लाख लोगों ने उसके बयान को समर्थन दे कर यह साबित किया है कि वो कंगना से बेहतर सनी को मानते हैं।

मद्रास होटल की यादें / विवेक शुक्ला

एक था मद्रास होटल

85 साल के प्रियवदन राव अब कनॉट प्लेस के आसपास आने से बचते हैं। इसी कनॉट प्लेस में उनके पिता के.सुब्बा राव ने मद्रास होटल खोला था। ये बातें 1935 की हैं। तब कनॉट प्लेस नया-नया बना था।


 मद्रास होटल नाम इसलिए रखा गया था क्योंकि तब तक दिल्ली के लिए दक्षिण भारत का मतलब मद्रास ही होता था। सुब्बा राव तो मौजूदा कर्नाटक के उड़पी से थे।


 मद्रास होटल में डोसा,इडली,वड़ा खाने के लिए लोग आने लगे। दिल्ली पहली बार दक्षिण भारतीय डिशेज का स्वाद चख रही थी। इससे पहले दिल्ली में निश्चित रूप से इस तरह का कोई रेस्तरां नहीं था।


पर सुब्बा राव की 1955 में अकाल मृत्यु के बाद मद्रास होटल को संभालने की जिम्मेदारी उनके पुत्र प्रियवदन राव पर आ गई। उन्होंने पहला फैसला ये लिया कि डोसे के एक-दो बार आलू की अतिरिक्त मांग करने वालों तथा बार-बार सांभर मांगने वालों को मना नहीं किया जाएगा। उनसे अतिरिक्त पैसा भी नहीं लिया जाएगा।


 यकीन मानिए कि इस पहल से दिल्ली मद्रास होटल पर जान निसार करने लगी। ये मद्रास होटल की यूएसपी बन गई। आपको अब भी दर्जनों दिल्ली वाले मिल जाएंगे जिन्होंने यहां आकर दो –तीन बार आलू और पांच-छह बार तक सांभर लिया। मद्रास होटल का गर्मागर्म सांभर पीकर आत्मा भी तृप्त हो जाया करती थी।  


सत्तर के दशक के आते-आते मद्रास होटल का जादू सिर चढ़कर बोलने। इधर रोज हजारों स्वाद के शैदाई आने लगे। मद्रास होटल की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1967 में शिवाजी स्टेडियम से सटे बस टर्मिनल का नाम ही मद्रास होटल हो गया। हालांकि उसे 1982 में बदला गया।


कनॉट प्लेस आने वालों के लिए मद्रास होटल में लजीज डिशेज का भोग लगाना अनिवार्य हो गया। गुस्ताफी माफ, जिन्होंने मद्रास होटल के जायके नहीं चखे उन्हें इस बात का सही से अंदाजा कभी नहीं होगा कि वहां क्यों टूटती थी दिल्ली।


 खस्ता- करारा डोसा, वड़ा और इडली तो दिव्य होता था। उसके साथ मिलने वाली नारियल की चटनी का स्वाद भी अतुल्नीय रहता था।


 दिल्ली रोज हजारों डोसे, इडली, वड़ा वगैरह चट करके भी अतृप्त ही रहती। कौन भूल सकता है मद्रास होटल की लाजवाब थाली को। उसमें गीली सब्जी, सूखी सब्जी, रस्म, दही पापड़, अचार, मिष्ठान आदि रहता था। 


लंच 12-3 बजे तक चलता था। इस दौरान सैकड़ों भूखे सुस्वादु थाली के साथ कायदे से न्याय करते थे।


मद्रास होटल के शेफ के काम तय होते थे। कुछ शेफ सिर्फ डोसा ही बनाते थे, तो कुछ इडली और वड़ा। सभी शेफ उड़पी के होते थे। 

मद्रास होटल में कभी नान-वेज डिशेज नहीं परोसे गए। राव साहब इस मसले पर किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हुए। 


वे खुद सुबह-शाम  होटल परिसर में ही घूमते थे। वे बीच-बीच में मद्रास होटल में आने वालों से पूछ लेते थे कि “क्या स्वाद और सर्विस में कोई कमी तो नहीं रह गई है?” अब अपने ग्राहकों को कौन देता है इतना मान-सम्मान।


पर साल 2005 मद्रास होटल के लिए मनहूस रहा। उसे अपना किराये का स्पेस खाली करना पड़ा क्योंकि जिनका स्पेस था उन्होंने उसे अपने उपयोग के लिए उसे लेना था।


 इस तरह दिल्ली के सबसे महत्वपूर्ण लैंडमार्क कनॉट प्लेस का हमेशा आबाद रहने वाला हिस्सा उजाड़ हो गया। आखिरी बार राव साहब मद्रास होटल से निकले तो  बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोए थे। समाप्त।


लेख  17 सितम्बर 2020 को पब्लिश हुआ।