गुरुवार, 27 अक्तूबर 2016

जीवन में सेक्स टॉनिक समान होता है डा. अंजना संधीर




मेरे जीवन के कुछ और इडियट्स-6

केवल किताबी ज्ञान से बनी सेक्स की प्रकांड़ ज्ञाता

अनामी शरण बबल

तेरे साथ मैं हूं कदम कदम, मैं सुकूने दिल हूं, करार हूं
तेरी जिंदगी का चिराग हूं , तेरी जिंदगी की बहार हूं

अहमदाबाद से लेकर अमरीका तक कभी अपनी कविता गजल शेरो शायरी से कभी मुशायरे की जान बन जाने वाली तो अमरीका में जाकर हिन्दी सीखाने के लिए हिन्दी सिनेमा के गानों को अपना माध्यम बनाकर अमरीकी भारतीय समाज में सालों तक बेहद लोकप्रिय रही डा. अंजना संधीर एक मल्टी टैंलेंट विमेन का नाम है । गैर हिन्दी भाषी राज्य गुजरात से होने के कारण हिन्दी गजल शायरी से ये एक जिंदादिल रोचक मोहक और यादगार महिला की तरह समाज में काफी लोकप्रिय है। अलबत्ता शान शऔकत और शोहरत्त के बावजूद काफी सामान्य तथा खासकर मेरके साथ इनका घरेलू बहनापा सा नाता है। जिसके तलते मैं इनकी शोहरत की परवाह किए बिना एक अधिकार के साथ जोर जबरन तक अपनी बात मनवा लेता हूं। माफ करना अंजना दी मैं तुम्हारे नाम के आगे अब डा. नहीं लिख रहा हूं । 56 साल की अंजना संधीर के साथ मेरा नाता भी एकदम अजीब है। हमदोनों 1983 यानी 33 साल से एक दूसरो के जानकार होकर पारिवारिक परिचय के अटूट धागे में बंधे है। मेरे घर के सारे लोग इनको बहुत अच्छी तरह से जानते भी है।
हम भले ही केवल एक बारही मिले पर फोन और जरूरत पड़ने पर उनके ज्ञान और संपर्को से घर बैठे बहुत सारी जानकारी भी हासिल किए। यह मैं भी मानता हूं कि अंजना से मेरा संबंध हमेळा कई रास्तों को जोड़ने वाली पुल की तरह दिखता रहा है।
मेरी अंजना संधीर से पहली आखिरी या इकलौती मुलाकात दिल्ली क्नॉट प्लेस के पास बंगला साहिब रोड के फ्लैट एस- 91 में 1991 में हुई थी। यहां पर मैं दो सबसे घनिष्ठ दोस्त पार्थिव कुमार और परमानंद आर्या के साथ रहता था। इस मुलाकात के 25 साल हो जाने के बाद फिर दोबारा मिलना संभव नहीं हो पाया। अहमदाबाद जाने का मुझे कोई चार पांच मौके मिले , मगर उन दिनो वे अमरीका में शादी कर बाल बच्चों के साथ हिन्दी की मस्ती में मस्त थी। और जब वापस अहमदाबाद लौटी तो फिर मेरा जाना नहीं हो पा रहा है। यानी एक मुलाकात के बाद दोबारा कोई संयोग ही नहीं बना ।
यहां पर भी एक रोचक प्रसंग है कि मेरे दो छोटे भाई उनदिनों अहमदाबाद में ही रहता था। (एक भाई तो आज भी अहमदाबाद में ही है) मेरे और भी कई भाई और रिश्तेदार अभी गुजरात और अहमदाबाद में भी है। पर मेरा संयोग फिलहाल नहीं बन रहा है। मेरे भाई लोग किसी मुशायरा को सुनने गए, तो अंजना संधीर के नाम सुनते ही मेरे भाईयों ने जाकर अपना परिचय दिया। मेरे भाईयों का घरेलू नाम टीटू और संत को तो अंजना भी जानती थी। भरपूर स्वागत करती हुई अंजना ने माईक से पूरे जन समुदाय को बताया कि बिहार में मेरा एक दोस्त भाई है अनामी शरण बबल जिसे मैं कब मिली हूं यह याद भी अब नहीं पर आज अनामी के दो छोटे और मेरे प्यारे भाई यहां पर आए हैं जिनका स्वागत करती हुई मै इनसे गाना गाने का आग्रह भी करती हूं। ना नुकूर के बाद गायन में एक्सपर्ट मेरे भाईयों ने दो गाना सुनाकर महफिल की शोभा में दो एक चांद लगा दिया।
केवल मेरा नाम लेकर भी मेरे करीब पांच सात दोस्तों ने भी अंजना से मुलाकात की और सबके अपने रिश्ते चल भी रहे है। मैं इन बातों को इतना इसलिए घसीट रहा हूं ताकि 30-32 साल पुराने संबंधों की गरमी महसूस की जाए। मगर जब वो एक यौन विशेषज्ञ के रूप में मेरे सामने एक नये चेहरे नयी पहचान और नयी दादागिरी के साथ 1991 में मात्र 31 साल की उम्र में एक अविवाहित सेक्स स्पेशलिस्ट की तरह मिलने जा रही हों तब किसी भी पत्रकार के लिए शर्म हय्या संकोच का कोई मायने नहीं रह जाता। यौन एक्सपर्ट की नयी पहचान मेरे को थोड़ी खटक रही थी, यह एक संवेदनशील प्रसंग है जिस पर बातूनी जंग नही की जा सकती। मेरे मन में भी इस सवाल के साथ दर्जनों सवाल रेडीमेड माल की तरह तैयार थे। दोपहर के बाद अंजना संधीर जब बंग्ला साहिब गुरूद्वारा रोड वाले फ्लैट मे आई। उस समय मेरे दोनों दोस्त मौजूद थे, मगर बातचीत में कोई खलल ना हो इस कारण हमारे प्यारे दोनों दोस्त पास के रीगल या रिवोली सिनेमाघर में पिक्चर देखने निकल गए। ताकि बात में कोई बाधा न हो।
कंडोम को लेकर नागरिकों की प्रतिक्रिया पर डा. अंजना संधीर ने जब लिंटास कंपनी के लिए एड को जब अपनी रिपोर्ट दी। तो जैसा कि उन्होने बताया कि वैज्ञानिक और सामाजिक आधार यौन संबदऔक कंडोम की भूमिका जरूरतऔर सामाजिक चेतना पर इनकी रिपोर्ट से एड कंपनी वाले बहुत प्रभावित हुए और एक विशेष प्रशिक्षम के बाद इनको अपना सेक्स कंसलटेंट के तौर पर अपने साथ जोड़ लिया। सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार महिलाओं की रूचि लालसा जिज्ञासा पसंद नापसंद चाहत मांग इच्छा आदि नाना प्रकार की मानसिक दुविधाओं पर इनके काम को पसंद किया गया और इस शोध को बड़े फलक पर काफी प्रचारित करके मेडिकल शोध की स्वीकृति को वैधानिक मान्यता दी गयी। यानी यौन जीवन के बगैर ही यौन की मानसिकता पर पर डा. अंजना संधीर की ख्याति में इजाफा हुआ।
रसोई ज्ञान के रूप में केवल चाय कॉफी तक ही मैं ज्ञानी था। बातचीत की गरमी के बीच मैं चाय और अल्प खानपान के साथ अंजना जी के प्रवचन को लगातार कायम बनाए रखने के लिए एक ही साथ टू इन वन जैसा काम करता रहा। सेक्स को लेकर एक पुरूष, की उत्कंठा जिज्ञासा मनोभाव से लेकर मानसिक प्रतिबंध और शरम बेशर खुलेपन झिझक की सामाजिक धारणा पर भी मैं प्रहार करता रहा। वे निसंकोच एक बेहद बोल्ड लड़की ( उस समय अविवाहित अंजना जी की उम्र केवल 31 साल) की थी। मैने उनके ज्ञान पर बार बार संदेह जताया और बगैर किसी प्रैक्टिकल के सेक्स पर इतना सारा या यों कहे कि बहुत सारा साधिकार बोलना मुझे लगातार खटका। इसके बावजूद वे तमाम भारतीय यानी करोड़ो विवाहित महिलाओं की सेक्स जिज्ञासा अनाड़ीपन और झिझक शर्म पर भी निंदात्मक वार करती रही।
सेक्स विद्वान बनने की प्रक्रिया के अनुभव पर ड़ा. अंजना ने कहा कि यह एक बेहद अपमानजनक अनुभव सा रहा। बहुत सारी लड़की दोस्तों ने तो साथ छोड़ दी,तो कई लड़कियों के मां पिता ने तो अंजना को अपने घर से निकाल बाहर कर दिया। जिससे इनका मन और दृढ हुआ और लगा कि अब तो सेक्स पर एक गंभीर काम कर लेना ही इसका सर्वोत्तम जवाब होगा। अंजना ने कहा कि सेक्स को लेकर आज भी भारतीय महिलाओं से बात करना सरल नहीं है। भाग्य को मानकर अधिकांश महिलाएं सबकुछ शांति के साथ सहन कर लेती है। सेक्स को लेकर भारतीय महिलाएं शांत निराशावादी होती है जबकि भारतीय पुरूष शक्की आक्रामक और सेक्स में स्वार्थी होता है। सेक्स सर्वेक्षण के बारे में इनका कहना है कि लंबे विवाहित जीवन के बाद भी 60 फीसदी महिलाएं संभोग में संतुष्टि या चरम सुख के दौर से कम या कभी नहीं गुजरी है। ज्यादातर महिलाओं का सेक्स ज्ञान भी लगभग ना के समान ही होता है जबकि पुरूष केवल अपनी संतुष्टि के लिए ही इसमें लिप्त होता है।
सेक्स को जीवन और समाज में किस तरह देखा जाना चाहिए इसपर अंजना का मंतव्य है कि हमारे धर्म शास्त्रों में भी धर्म अर्थ काम मोक्ष में काम को स्थान दिया गया है। सामाजिक संरचना और वंशपरम्परा की वृद्धि में केवल सेक्स ही मूल आधार है। शादी विवाह की अवधारणा भी सेक्स से समाहित है। इसे सामान्य और स्वस्थ्य नजर से देखा जाना चाहिए । मगर सेक्स को लेकर आज भी समाज में हौव्वा है। बगैर सेक्स मानव जीवन रसहीन नीरस चिंताओं कुंठाओं और तनावों से भरा है। सेक्स को अंधेरे बंद कमरे से बाहर निकालकर चर्चा संगोष्ठी और सामाजिक बहस का मुद्दा बनाना होगा तभी सेक्स को लेकर भारतीय समाज का नजरिया बदलेगा। भारत में सेक्स शिक्षा की जरूरत पर भी जोर देती हुई अंजना संधीर का मानना है कि ज्ञान के अभाव में लड़कियों को सेक्स का कोई वैज्ञानिक आधार ही नहीं मालूम है। एक कन्या तन परिपक्व होने से पहले नाना प्रकार के दौर से गुजरती है ,मगर खासकर ग्रामीण भारत में तो माहवारी की सही अवधारणा तक का ज्ञान नहीं है। कंड़ोम की जानकारी पर हंसती हुई डा. अंजना कहती है कि ग्रामीण भारत के पुरूषों में भी सेक्स का मतलब केवल शरीर का मिलन माना जाता है। कंडोम के बारे में इनका कहना है कि गांव देहात में सरकारी वाहन से कभी परिवार नियोजन के प्रचार में लगे स्वास्थ्यकर्मी कंडोम के प्रयोग विधि की जानकारी देते हुए कंडोम को हाथ के अंगूली में लगाकर लगाने की विधि को दिखाकर इस्तेमाल करने की सलाह देते है, मगर मजे कि बात तो यह है कि ज्यादातर पुरूष कंडोम को अपने लिंग में लगाने की बजाय संभोग के दौरान भी कंडोंम को अपनी अंगूली में लगाकर ही अपने पार्टनर के साथ जुड़ते है। और यह मामला भी तब खुला जब कंडोम के उपयोग के बाद भी महिलाओं का गर्भ ठहर गया और पूछे जाने पर ग्रामीण भारत के अबोध लोग यह जानकारी देते। गरीब अशिक्षित ग्रामीण भारत के अबोधपन को यह शर्मसार करती है तो ज्ञान के अभाव को भी दर्शाती है।
भारतीय समाज में सेक्स को लेकर आज भी कुंठित नजरिया है। हस्तमैथुन को लेकर भी समाज में नाना प्रकाऱेण गलत धारणाएं है। डा. संधीर के अनुसार लगभग 100 प्रतिशत लड़के अपनी युवावस्था में किसी न किसी तरह इससे ग्रसित होते है। केवल पांच प्रतिशत लड़के इससे मना करते हैं और मेरी मान्यता है कि वे सारे झूठ बोलते है। एकदम एकखास उम्र में इससे युवा संलग्न होते ही है। और झूठ बोलना उनकी नैतिकता का तकाजा है। डा. संधीर के अनुसार लड़कियों के साथ भी यही हिसाब है और उनका व्यावहारिक समानते का समीकरण भी समान है।
पाश्चात्य देशो के बाबत पूछे जाने पर इनका मानना है कि वहां पर भी लोग अब सेक्स को लेकर अपनी धारणा भारतीयों की तरह संकीर्ण कर रहे है। सेक्स को लेकर खुलेपन और मल्टी रिलेशन को लेकर भी कोई खराबी नहीं माना जाता , मगर अब रोग और अपने आप को सेफ रखने के लिए ही सही वे सेक्स को लेकर अपने साथी पर साथ के अनुसार ही अब विचार करती हैं। संधीर का मत है कि सेक्स जीवन समाज और सामाजिक नैतिकता का सबसे सरस प्रसंग है। इसको दबाने का ही यह गलत परिणाम है कि तमम रिश्तों को सेक्स से जोड दिया गया है। आज के जमाने में ज्यादातर मर्द 45-50 की उम्र पार करते करते सेक्स की कई मानसिक बीमारी और भ्रांतियों से ग्रसित हो जाते है। अपनी इस उम्र के अनुसार होने वाली कमी का इलाज कराने की बजाय इसको छिपाते है। मानसिक तौर पर बीमार समाज की गंदी सोच और सड़क छाप अनपढ़ नीम हकीमों ने यौनरोग को इस तरह आक्रांत कर दिया है कि लोग इसका इलाज कराने की बजाय शक्ति वर्द्धक गोलियों से राहत की तलाश करते है। जिससे बना बनाया खेल और बिगड़ जाता है। पावर गोलियों की शरण में जाकर मरीज इसके जाल से मुक्त नहीं होता और पावरलेस होकर कुंठित हो जाता है। समाज को नीम हकीमी डाक्टरों से सेक्स रोग को मुक्त कराने की जरूरत है तभी सेक्स को लेकर नागरिक सहज सरल और निर्भय होकर अपनी बात सामूहिक चर्चा में करके एक बेहतर इलाज पर एकमत हो सकता है।
उन्मुक्त यौनाचार की नजर में सेक्स को देखे तो जीवन में चरित्र का कोई मायने रहता है ? इच्छा के खिलाफ यौन कर्म एक अपराध है। और जीवन में चरित्र कातो बड़ा महत्व है मगर यह सब पुरूष सत्ता को और प्रबल बनाने की साजिश का हिस्सा है। सेक्स तो मनुष्य को जोडता है। रंग भेद जाति की गहरी छाप समाज में है पर यौन संबंध के समय कोई धर्म कर्म जाति रंग नहीं होता। इसे स्वार्थपूर्ण लाभ का एक नजरिया भी कह सकते हैं, मगर सेक्स की कोई जाति रंग और भेद नहीं होता । यह इसका एक सार्थक पहलू है कि प्यार से समाज में समरसता बढ़ेगी ।
सेक्स पर अंकुश को आप किस तरह देखती है ?
यह भी पुरूष के स्वार्थी पन का उदाहरण है। अपने लिए तो चरित्र का अर्थ कुछ और है और महिलाओं के लिए इनके मायने अलग हो जाते है। यह दबाकर रखने की कुचेष्टा का अंजाम है।
श्लीलता और अश्लीलता को आप किसतरह परिभाषित करेंगी ?
सेक्स अश्लील नहीं होता. यह तो मानव सृजन का मूल आधार है। जीवन की एक सहज जरूरत है। इसे अश्लील कहा और बताया जाता है खजूराहों मंदिर के प्रेमपूर्ण कलाकृतियों को इसीलिए पावन माना जाता है।
प्रेम और संभोग तथा अपनी पत्नी तथा वेश्या के साथ के संबंधों में आप क्या अंतर स्पष्ट करेंगी ?
प्रेम की चरम अभिव्यक्ति का नाम संभोग है। अपने साथी के प्रति पूर्ण निष्ठा समर्पण और भावनात्मक लगाव की सबसे आत्मीय संवाद का ही नाम प्यार भरा संभोग है या आत्मीय समर्पण ही प्यार भरा संभोग होता है। जबकि वेश्या के साथ तो एक पुरूष केवल अपने तनाव को शिथिल करता है। पुरूष मूलत पोलीगेम्स (विविधता की चाहत) और महिलाएं मोनोगेम्स (एकनिष्ठ) होती है।
आज विवाहेतर संबंधों में बढ़ोतरी हो रही है? इसकी मानसिकता और यह कौन सी मोनोगेम्स गेम है ?
आज महिलाएं खुद को जानने लगी है और पुरूषों द्वारा जबरन लगाए गए वर्जनाओं से मुक्ति की चाहत से उबलने लगी है। पुरूषसता के खिलाफ महिलाएं खड़ी हो रही है ।
प्रतिशोध का यह कौन सा समर्पण तरीका है कि किसी और पुरूष की गोद में जाकर खो जाए ?
सेक्स के प्रति समाज में एक स्वस्थ्य और स्वाभाविक नजरिए के साथ सोचने और विचारने की जरूरत है ।
ओह चलिए आप भारतीय सेक्स नीति रीति दर्शन और पाश्चात्य सेक्स में क्या मूल अंतर पाती है ?
हमारे यहां सेक्स एक बंद कमरे का सबसे गोपनीय कामकला शास्त्र की तरह देखा और माना जाता है। वेस्ट में सेक्स मौज और आनंद का साधन है। आम भारतीयों में सेक्स को लेकर तनाव रहता है सेक्स से मन घबराता भी है। वेस्ट में सेक्स को लेकर कोई वर्जना नहीं है वे इसको खुलेपन से स्वीकारते हैं मगर भारत में तो इसको सहज से लिया तक नहीं जाता । जीवन में इसकी अनिवार्यता को भी लोग खुलकर लोग नहीं मानते।
क्या यह नहीं लगता कि पाश्चात्य समाज में औरत की भूमिका एक अति कामुक सेक्सी गुड़िया सी है ?
नर नारी की यौन लालसा और संतुष्टि के निजी आजादी को यौन कामुकता का नाम नहीं दे सकते।
हमारे यहां यौन शिक्षा की जरूरत पर बारबार जोर दिया जाता है भारत में इसका क्या प्रारूप होना चाहिए ?
अश्लील विज्ञापनवों की तरह ही हमा
रे यहां यौन की गंदी विकृत और सतही जानकारी ही समाज में फैला है। सेक्स की पूरी जानकारी को परिवार के साथ जोड़ा जाना चाहे तथा विवाह से पूर्व कोई जानकारी भरे आलेख की जरूरत पर विचार होना चाहिए ताकि एकलस्तर पर भी पढकर लोग अपने बुजुर्गो से इस बाबत विमर्श कर सके। बच्चों की जिज्ञासा शांत हो इसके लिए मां पिता की भूमिका जरूरी है। सेक्स की सही सूचना भर से भी यौन अपराध कुंठा हिंसा और गलत धारणाओं से बचाव संभव है।
क्या केवल अक्षर ज्ञान वाली शिक्षा में यौन शिक्षा को जोडने से समाज में और खासकर बड़े हो रहे बच्चों में निरंकुश आचरण का शैक्षणिक लाईसेंस नहीं मिल जाएगा ?
सेक्स एक बेहद संवेदनशील विषय है और जाहिर है कि इससे कई तरह की आशंकाए भी है । इसको वैज्ञानिक तरीके से लागू करना ही सार्थक और स्वस्थ्य समाज की अवधारणा को बल देगा. तभी कोई सकारात्मक परिणाम मिलेगा
और मान लीजिए कि यदि सेक्स शिक्षा को पढ़ाई में ना जोडा जाए तो क्या समाज में किस तरह का भूचाल आ जाएगा ?
(हंसकर) तुम अब इस सवाल पर मजाक करने पर आ गए हो।
कमाल है अंजना जी सदियों से अनपढ़ निरक्षर हमारे पूर्वजों ने बगैर शिक्षा ग्रहण किए ही इसकी तमाम संवेदनाओं को समझा जाना और माना , तो अब 21 वी सदी से ठीक पहले इसे कोर्स में शामिल कराना कहीं बाजार का तो प्रेशर नहीं है लगता कि सेक्स और कामकला को ही सेल किया जाए। ?
नहीं बाजार के प्रेशर से पहले इसको सेहत के साथ जोडकर देखना होगा कि इससे कितना नुकसान होगा।.
मैं भी तो यहीं तो कह रहा हूं कि बाजार में दवा और औषधि भी आता है. एक भय और हौव्वा को प्रचारित करके अरबों खरबों की दुकानदारी तय की जा रही है और आप इसकी सैद्धांतिक व्याख्या कर रही है ?
नहीं आप काम सेक्स यौन संबंधों को एकदम बाजार की नजर से देख रहे हैं जबकि यह बाजारू नहीं होता।
कमाल है अंजना जी एक तरफ आपका तर्क कुछ और कहता है और दूसरी तरफ आप बाजार विरोधी बातें करने लगती है ?
नहीं तुम इसके मर्म को नहीं समझ रहे हो।
कमाल है अंजना जी मैं तो केवल इसके मर्म और धर्म की बात कर रहा हूं केवल आप ही तो हिमायती बनकर संसार से तुलना करके भारतीय महिलाओं की अज्ञानता पर चिंतित हो रही है। पर चलिए बहुत सारी बाते या यों कहे कि बकवास कर ली आपको बहुत सारी जानकारी देने के लिए शुक्रिया । और इस तरह 1991 में की गयी यह बात उस जमाने की थी संसार में मेल नेट और गूगल अंकल पैदा नहीं हुए थे। टेलीफोन रखना स्टेटस सिंबल होता था और केवल तीन सेकेण्ड बात करने पर एक रूपया 31 पैसे सरकारी खजाने में लूटाने पड़ते थे। यानी यह इंटरव्यू भी बाबा आदम के जमाने की है जहां पर किसी लड़की को सेक्सी कह देने पर अस्पताल जाने की सौ फीसदी संभावना होती थी। यह अलग बात है कि इन 25 साल में अब इतना बदलाव आ गया है कि जब तक किसी लड़की को कोई लड़का सेक्सी ना कहे तबतक लड़की को भी लगता है कि उसके रंग रूप पर कोई सही कमेंट्स ही नहीं की गयी है ।
तेरे साथ मैं हूं कदम कदम, मैं सुकूने दिल हूं, करार हूं
तेरी जिंदगी का चिराग हूं , तेरी जिंदगी की बहार हूं
यदि इस गजल को सेक्स की जरूरत पर भी जोड़ दें तो इसकी खासियत पर कोई असर नहीं पडेगा ।
नोट अपन देश में बढ़ते पोर्न को देखते हुए ही मुझे लगा कि डा, अंजना संधीर के मनभावन प्रवचनों से और लोगों को बताया जाए। हालांकि मैने इस बातचीत को दर्जनों जगह इस्तेमाल कर चुका हूं पर पिछले 15- 16 साल से यह बातचीत अंधेरे में कहीं धूल खा रही थी लिहाजा इसका पाठन सुख ले।
अनामी
27 अक्टूबर 2016

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2016

मल्टी एडिशन युग के खतरे / अनामी शरण बबल









  अनामी शरण बबल




पिछले कई सालों से खबरिया और मनोरंजन चैनलों के अलावा धार्मिक चैनलों और क्षेत्रीय या लोकल खबरिया चैनलों का बढ़ता जलवा फिलहाल थमता-सा दिख रहा है। हालांकि अगले छह महीने के दौरान कमसे कम एक दर्जन चैनलों की योजना प्रस्तावित है। इन खबरिया चैनलों की वजह से हिन्दी के अखबारों के मल्टी एडिशन का खुमार भी थोड़ा खामोश सा दिखने लगा था।

खासकर एक दूसरे से आगे निकलने के अंधी प्रतियोगिता में लगे दैनिक भास्कर, अमर उजाला और दैनिक जागरण का मल्टी एडिशन कंपिटीशन फिलहाल रूका हुआ है। अलबता, दैनिक हिन्दुस्तान का मल्टी एडिशन कल्चर इस समय परवान पर है। इस समय थोड़ा अनजाना नाम होने के बावजूद बीपीएन टाइम्स और स्वाभिमान टाइम्स का एक ही साथ दो तीन माह के भीतर एक दर्जन से भी ज्यादा शहरों से प्रकाशन की योजना हैरानी के बावजूद स्वागत योग्य है। इनकी  भारी-भारी भरकम योजना निःसंदेह पत्रकारों और प्रिंट मीडिया के लिए काफी सुखद है। उतर भारत के खासकर हरियाणा, पंजाब इलाके में पिछले दो साल के दौरान आज समाज ने भी आठ दस एडिशन चालू करके हिन्दी प्रिंट मीडिया को नया बल प्रदान किया है।

हिन्दी में मल्टी एडिशन का दौर 1980 के आस-पास शुरू हुआ था, जब नवभारत टाइम्स के मालिकों ने पटना, लखनऊ, जयपुर आदि कई राजधानी से एनबीटी को आरंभ करके प्रिंट मीडिया में मल्टी कल्चर शुरू किया। मात्र पांच साल के भीतर ही एनबीटी के मल्टी कल्चर का जादू पूरी तरह उतर गया और धूम-धड़ाके से चालू एनबीटी के खात्मे से पूरा हिन्दी वर्ग सालों तक आहत भी रहा। हालांकि दैनिक जागरण और अमर उजाला से पहले दैनिक आज के दर्जन भर संस्करणों का गरमागरम बाजार खासकर उतरप्रदेश और बिहार में काफी धमाल मचा रखा था। सही मायने में 1989 और 1992 के दौरान दैनिक जागरण के बाद राष्ट्रीय सहारा का राजधानी दिल्ली से प्रकाशन आरंभ हुआ, और आज दोनों के बगैर मुख्यधारा की पत्रकारिता अधूरी है। हालांकि इसी दौरान हंगामे के साथ कुबेर टाइम्स और जेवीजी टाइम्स का भी प्रकाशन तो हुआ, मगर देखते ही देखते ये कब काल कलवित हो गए, इसका ज्यादातरों को पता ही नहीं चला।

1990 के बाद हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णकाल का दौर शुरू हुआ, जब दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दिव्य हिमाचल, हरिभूमि,  राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर, नवभारत आदि कई अखबार एक साथ अलग-अलग इलाकों से प्रकाशन आरंभ करके हिन्दी प्रिंट मीडिया को सबसे ताकतवर बनाया। खासकर बिना शोर हंगामा के मुख्यधारा में शामिल होने या रहने की ललक दिखआए बगैर ही लोकमत और प्रभात कबर ने तो मध्य भारत छोड़कर पूर्वी भारत मैं अपनी बादशाहत अर्जित कर ली। वेस्ट बंगाल तकमें घुसकर प्रभात खबर ने अपनी जड़े इतनी मजबूत कर ली है कि पेपर वार में शायद इसके सामने टिकना हिसी भी बड़े पेपर के लिए सरल नहीं होगा। अपनी गुणवत्ता और भारी भरकम रोचक ज्ञानप्रद सामग्री से लबरेज प्रभात खबर किसी भी पेपर की सुबह की चाय खराब कर सकती है।
प्रभातखबर का मुख्यधारा से अलग उदय एक सुखदसंकेत है, तो नागपुर से निकला लोकमत भी गैरहिन्दी भाषी क्षेत्र से होने के बाद भी हिन्दी के किसी भी बेहतरीन अखबार से किसी भी मामले में 19 नहीं है। लगभग यही हाल दैनिक भास्कर की है। गैरभाषी गुजरात में जाकर हंगामा करने वाले इस भास्कर की गूंज भले ही राजधानी दिव्वी में नहीं है, मगर राजस्थान में शोर बरपाने के बाद बिहार झारखंड में भी इनका सफर हिन्दी पत्रकारिता को ही बल दे रहा है।

नयी सदी में खबरिया चैनलों के तूफानी दौर के सामने  सब कुछ  फीका सा दिखले लगा था। रोजाना एक नये चैनल की शुरुआत, मगर आम दर्शकों की नजर से ओझल इन चैनलों का संस्पेंस आज भी एक पहेली है। नए चैनल को चालू करने से ज्यादा उसको घरों में लगे इडियट बाक्स तक पहुंचाना आज भी एक बड़ा गोरखधंधा है। इसके बावजूद अभी तक खबरिया चैनलों के ग्लैमर को कम नहीं किया जा सका है। अलबता, धन और पगार के मामले में इनका जादू पूरी तरह खत्म-सा हो गया है मगर, फाइव सी के बूते इन चैनलों के बुखार को जनता ने थाम लिया है। व्यस्क होने की बजाय 16-17 साल में भी खबरिया चैनलों के अंदाज में अनाड़ीपन ही है। फिलहाल  जनता की पंसद क्रोसीन दवा बनकर अब इन भोकाल टीवी के लिए खतरे की घंटी नबनती जा रही है।

ठंडा-सा पड़ा प्रिंट मीडिया पिछले साल से एकाएक परवान पर है। हालांकि अमर उजाला से अलग होकर अग्रवाल बंधुओं के एक भाई ने अपने पिता डोरीलाल अग्रवाल के नाम पर ही मिड डे न्यूज पेपर डीएलए के लगभग एक दर्जन संस्करण चालू करके धमाल तो मचाया, मगर साल के भीतर ही आधा दर्जन संस्करणों पर ताला लग गया। हिन्दी प्रिंट मीडिया के साथ बंद होने और फिर से चालू होने का यह लूडो गेम  लगा रहता है।मगर डीएलए को भूल जाए तो जनसंदेश समेत आधा दर्जन अखबार हिन्दी की शोभा है. पंजाब केसरी समूहद्वारा नवोदय टाईम्स को दिल्ली से लाना और धूम धड़ाके से जमा देना यह साबित करता है कि हिन्दी के पाठक अंग्रेजी की चमक दमक ते बाद भी व्यग्र है। यही हिन्दी की ताकत है कि 54 साल पुराने अखबार रांची एक्सप्रेस को पुर्नजीवित करने के लिए एक पत्रकार सुधांशु सुमन ने अपनी पुश्तैनी संपति को इसमें झोक दिया। केवल अपने पाठकों पर यकीन करके सुधांशु सुमन रांची एक्सप्रेस को फिर से प्रतिष्ठित करने मे लगे है। हिन्दी का यही बल है कि फैजाबाद के शीतला सिंह पिछले 50 साल से जनमोर्चा अखबार को ऑक्सीजन दे रहे है. लगभग इसी हाल में बिहार के औरंगाबाद से कमल किशोर पिछले 27 साल से नव बिहार टाईम्स को चला रहे हैं तो इसी शहर से उदय हुए सोन वर्षा टाईम्स दैनिक अखबार भी हिन्दी की गरिमा को जीवित करने में जुटा है। तो केवल झारखंड में ही पिछले पांच साल के दौरान कमसे कम एक दर्जन अखबार उदित हुए । पलामू में राष्ट्रीय नवीन मेल भी हिन्दी के पताके को लहराने में लगा है।

यह भी हैरान करता है कि भले ही अंग्रेजी अखबारों का चलन . व्यापार और प्रभाव के साथ प्रसार भी बढ़ रहा हो मगर पिछले एक दशक में यदि 30 नए हिन्दी अखबार पैदा हुए तो अंग्रेजी में एक दर्जन अखबार भी पाठकों को नहीं मिले । फिर यह मल्टी एडिशन की क्रांति तो केवल हिन्दी में ही है। जिसका जादू उतरने वाला नहीं दिख रहा. अलबता लोकल से भी लोकलाईज हो गए इन पेपरों के कारण राष्ट्रीय अखबार की परिभाषा ही बदल गयी। सारे पेपर एक शहर तक सिमट कर रह गए। खबरों का बाजार बढ़ गया मगर हिन्दी में खबरों का संसार सिकुड़ गया। यही हिन्दी की सबसे कमजोर कड़ी है जिस पर ध्यान दिए बगैर सबसे ज्यादा सबसे अधिक और सबसे आगे रहने के दावे के सामने हिन्दी खुद से ही पिछड़ रही है। अपना आत्म मंथन करना इसको गवारा नही यही हिन्दी की कमी है जिस पर गौर किए बिना ही हिन्दी का अंधा रेस जारी है।  

बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

चौपाल से लेकर संसद तक / अनामी शरण बबल


 

 

रांची एक्सप्रेस के लिए पहला विशेष संपादकीय /

 15अक्टूबर 2016


 

 


जमाना बदल रहा है। जमाने के साथ साथ समाज की रीति नीति, पारिवारिक रस्म रिवाज संस्कार और धार्मिक पारिवारिक सामाजिक मान्यताओं के अर्थ भी बदल रहे है। गांव देहात कस्बों से लेकर शहरों नगरो बड़े शहरों और महानगरों का रूप रंग आकार चेहरा जरूरत समस्याओं और सुविधाओं के मायने भी बदल रहे है। 21वी सदी के पहले ही चरण में संचार क्रांति के विस्फोट ने घर परिवार समय समाज और संबंधों के सारे समीकरण बदल डाले है। वर्तमान समय और समाज के साथ आज कदमताल करके रहना और चलना भी जरूरी है। मगर, बदलाव की इस आंधी के बीच एक नया रास्ता बनाना और उसको लक्ष्य मानकर अपनाना आज ज्यादा जरूरी होकर भी खतरनाक सा लगता है।

यह कैसा बदलाव है कि चौपाल से लेकर संसद तक की गरिमा रंगरूप और महत्व पर भी इसका असर दिखने है। संसद और चौपाल जनता के अधिकारों का आईना सा नहीं रह गया प्रतीत होता है। आईना कभी झूठ नहीं बोलता, मगर संसद से लेकर चौपाल यानी जनता के हर वैधानिक अदालत में जनता ही लगातार सबसे पीछे छूटती जा रही है। यों कहें कि चर्चाओं में अब समाज के आखिरी कतार में खड़े लोग की आवाज अब संसद और विधानसभा की गूंज से बाहर हो गए है।  ।

 महान भारत देश को कई नामों से जाना जाता है, मगर हिन्दुस्तान और इंडिया से तुलना करे तो भारत पर इंडिया का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है। इंडिया यानी मॉल मेट्रो मोबाइल म्यूजिक मल्टीप्लेक्स और मैकड़ी (मैकडोनॉल्ड) वाले इंडिया में चमक दमक के साथ मोटर मनी, मल्टी नेशनल कंपनियों, मल्टी स्टोरी अपार्टमेंट, मल्टी जॉब, मल्टी रिलेशन और मल्टी इंकम सोर्स का जलवा ही जलवा है। समाज के ज्यादातर नवधनिको कुबेरों और उधोगपतियों के इंडिया में ही विकास और नौकरियों की सारी संभावनाएं निहित है। यही वह वर्ग है जो सत्ता को कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं अप्रत्यक्ष तौर पर संचालित और संबोधित कर रहा है। इंडिया के दमदार लोगों की वजह से ही आज भारत रंगीन चमक दमक के साथ  महक रहा है। हम दुनियां के सबसे संभावनाशील देशों की कतार में आगे है।  125 करोड़ की आबादी और दुनिया के सबसे यंग देश को लेकर पूरे संसार की आंखे इंडिया पर लगी है और वे यहां कारोबार की अपार संभावनाओं को देखकर भारत में ही पूंजी निवेश करने को उतावला या एकदम व्यग्र भी कह सकते है

इंडिया के प्रभामंडल से भारतीय मीडिया भी लगभग नतमस्तक सा हो गया है। खासकर खबरिया चैनलों जिसे लोगों ने अब भोकाली मीडिया भी कहना चालू कर दिया है। खबरों को लेकर इनके समाजशास्त्रीय समीकरण में खबरों की क्लास और सामाजिक अर्थशास्त्र पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है। सही मायने में तो इन न्यूज चैनलो के पास आज न्यूज का गंभीर अकाल है। खासकर खबरों के चौखटे में सी 5 का प्रभाव जगजाहिर है। सी यानी कॉमेडी क्रिकेट क्राइम सिनेमा और सेलेब्रेटी के चमक दमक के बाद ही खबरों का नंबर आता है। मगर सी के कैदखाने से जकड़े तमाम न्यूज चैनलों में न्यूज की बजाय सी का तिलिस्म ही अपने अलग रंग ढंग में दिखता है। सी के फैलते दायरे में कोर्ट सोशल इकॉनामिक्स क्लास कॉरपोरेट कंपनियों कैरेक्टर और करप्शन की  यानी सी की ही धमक तेज हुई है।

 खासकर भोकाली चैनलों में किसी को कैरेक्टलेस या करप्ट बता देना सबसे आसान हो गया है।  खबरो को लेकर भी सी यानी क्लास देखा जाता है। यदि किसी मलीन बस्ती की किसी गरीब मासूम के साथ रेप करने के बाद भी बंदा बहादुर छुट्टा घूम रहा हो तो भी यह खबरिया चैनलों के क्लास के अनुसार खबर  नहीं है। मगर यही घटना किसी सभ्रांत इलाके के किसी अमीरजादी के संग हो जाए तो खबर देने से लेकर पुलिस प्रशासन पर भोकाली रिपोर्टरों का गुस्सा देखने  लायक होता है।

मीडिया के लिए खबरों के साथ यह रंगभेद नीति आज फैशन सा हो गया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में दिमागी बुखार से करीब 400 लोगों की मौत भी फटाफट चैनलों की नजर में कोई खबर नहीं होती है, मगर किसी अभिनेत्री के नाक टूटने की खबर इन चैनलो के लिए ब्रेकिंग न्यूज से लेकर आधे आधे घंटे की स्पेशल स्टोरी बन जाती है। न्यूज चैनलों में भारत की छवि एक हंसते खेलते मस्त देश की है, जहां पर समस्याओं का होना अजूबा सा है।  इसका खामियाजा भी इनको ही भुगतना पड़ा है। चैनलो ने आम आदमी और उनके सुख दुख की खबरों को क्या काटा कि हिन्दुस्तान में रहने वाले गरीब भारत के करोड़ो लोगो ने अपनी पसंद के जीआरपी से इन चैनलों को ही काट डाला। जिसके तमाम चैनलों के सामने टीआरपी राक्षस भयानक संकट बनकर प्रकट हुआ है।  जितने चैनल चालू हुए उससे कहीं अधिक बंद हो गए और जो चल भी रहे हैं तो उनमें भी ज्यादातर की सांसे उखड़ रही है।

अपने रिपोर्टरों को मौके पर भेजकर समाचार की प्रस्तुति का जमाना भी लद चुका है। अघोषित सरकारी मदद से यह और बात है कि प्रधानमंत्री के पहले अमरीका दौरे की खबर देने के लिए सभी चैनलों के रिपोर्टर एक सप्ताह पहले ही अमरीका में घूम घूमकर माहौल बनाने लगे, और इसका फायदा भी हुआ कि प्रधानमंत्री की पहली अमरीका यात्रा के ग्लोबल और ग्लैमरस न्यूज से अमरीका भी चकाचौंध रह गया। यही हाल नेपाल में आए भीषण भूकंप में भी देखने को मिला। देश के तमाम बड़े चैनलों के रिपोर्टर नेपाल में घूम घूमकर खबरदेने लगे। पांच दिन के बाद भी मलवे में दबे रहकर भी किसी बच्चे के जीवित होने की खबर भी पाठकों तक पहुंची, मगर भूकंप से भारत में मरे 400 लोगों और प्रभावित 250 से ज्यादा शहरों की तबाही को जानने के लिए न किसी चैनलों के पास समय था न संवेदना कि अपने घर आंगन में पसरे मातम पर भी खबरों के दो बूंद आंसू बहा दे ।

 अब इन चैनलों में खबर देने का पूरा अंदाज ही बदल गया है। गिनती पहाड़ा गुना और भाग अंदाज में खबरे दी जाने लगी। पांच मिनट में 50 न्यूज 10 मिनट में 100 और 20 मिनट 200 न्यूज । और वो भी इस गूमान भरे दावे के साथ बिना ब्रेक 200 खबरों देने वाला दुनिया का सबसे तेज बुलेटिन है। फटाफट स्पीड खबरों का नुकसान यह हुआ कि समाज में खबरों का असर ही समाप्त हो गया। चैनल में एकंर चिल्लाता रहे और दूसरी तरफ तमाम नौकरशाहों पर अब कोई असर नहीं पड़ता। चैनलों ने खबरों को ही आत्मदाह सा कर दिया।

खबरों के इस मछली बाजारी भागमभाग के बीच खबरों और आखिरी आदमी तक की खबर तक अपनी पहुंच बनाने पर खास ध्यान दिया जाएगा। दुनिया के सबसे यंग देश भारत के इस राज्य के नागरिकों और नौजवानो को यह भरोसा भी दिलाना चाहेंगे कि समसामयिक जरूरतों के साथ साथ आने वाले कल आज और कल पर भी हमारा ध्यान रहेगा। प्राकृतिक भौगोलिक तौर पर असहज आबाद इस राज्य में हर जगह पहुंचना आज भी एक बड़ी चुनौती है, मगर प्राकृतिक संपदा इस राज्य की सबसे बड़ी निधि  भी है। आर्थिक सामाजिक तौर पर सबसे कमजोर लोग हमारे लिए हमेशा सबसे बड़ी खबर की तरह रहेंगे। संसद की खबरें तो सभी मीडिया छापती है  मगर तमाम सामयिक खबरों के साथ कदमताल करते हुए रांची एक्सप्रेस की नजर में हाशिए पर रह गए लोग भी रहेंगे। खासकर गांव देहात चौपाल से संचालित स्थानीय स्तर की सबसे नीचली प्रशासनिक व्यवस्था ग्राम पंचायत की चौपाली खबरों से लेकर संसद तक की खबरे इसकी निरंतर शोभा बनेंगी।   

         










बुधवार, 7 सितंबर 2016

अचूक टोटके में चूकने लायक त्रुटियां


अचूक टोटके, बिना पैसे खर्च किए दूर होगी आपकी हर समस्या

अचूक टोटके, बिना पैसे खर्च किए दूर होगी आपकी हर समस्या




मनुष्य की हर समस्या को सुलझा सकते हैं टोने-टोटके

कई बार जीवन में ऎसी समस्याएं आती हैं जो आसानी से दूर नहीं होती लेकिन एक मामूली टोटके से तुरंत ही आराम मिल जाता है। तांत्रिकों के अनुसार मनुष्य की प्रत्येक समस्या इन टोने- टोटकों से दूर हो सकती है बशर्ते सही ढंग से और सही समय पर किया जाए। आपके लिए यहां प्रस्तुत हैं कुछ ऎसे ही टोटके जिनसे आप न केवल धनी और सफल बन सकते हैं वरन अपने प्रेमी, पति-पत्नी को भी वश में कर सकते हैं



यदि कोई काम रुका हुआ हो

यदि आपका कोई काम रूका हुआ हो और हरसंभव प्रयास के बाद भी पूरा न हो रहा हो तो बुधवार को एक कटोरी बासमती चावल दान में देने से रूका हुआ पैसा आने लगता है। यदि घर में आर्थिक तंगी रहती हो, बहुत ज्यादा कर्जा हो या व्यापार नहीं चल रहा हो तो एक चमकीला लाल कपड़ा लें, उसे बिछा कर उस पर लाल चंदन का टुकड़ा, लाल गुलाब के फूल, रोली तथा 58 पैसे रखें। फिर इस कपड़े में सारे सामान को बांध कर पोटलीनुमा बनाकर अपने घर की तिजोरी या गल्ले में रखें। इससे सभी कार्य सम्पन्न होने लगेंगे और साक्षात लक्ष्मी आपके घर विराजमान होगी। इस प्रयोग को प्रत्येक नवरात्रि पर दोहराने से आप धनवान होते चले जाएंगे।

व्यापार में सफलता पाने के लिएअगर दुकान या व्यवसाय में ग्राहक कम आ रहे हैं तो रविवार की दोपहर को पांच कागजी पीले नींबू काटकर व्यवसाय स्थल पर एक मुट्ठी काली मिर्च, एक मुट्ठी पीली सरसों के साथ रख दें। अगले दिन ऑफिस, दुकान खोलने के बाद इन सभी सामान को किसी सुनसान जगह पर कच्ची धरती में गाड़ दें। तुरंत ही आराम मिलेगा।


ऐसे दूर करें पति-पत्नी के झगड़ेंरात में सोते समय पत्नी के पलंग पर देसी कपूर तथा पति के पलंग पर कामिया सिंदूर रखना चाहिए। अगले दिन सुबह सूर्योदय के समय पति को देसी कपूर जला देना चाहिए तथा पत्नी को सिंदूर को घर में फैला देना चाहिए। यह एक तीव्र तांत्रिक उपाय है, इससे कुछ ही दिनों में पति-पत्नी का आपसी झगड़ा पूरी तरह खत्म हो जाता है।

यदि पति-पत्नी के संबंध तलाक तक पहुंच गए हों

बरगद का हरा पत्ता लेकर उस पर लाल चंदन को गंगा जल में घिसकर संबंधित व्यक्ति का नाम लिखें। इसके बाद पत्ते पर लाल गुलाब की पत्तियां रख दें और इन सबको बारीक पीस लें। जिस व्यक्ति का नाम लिखा है, उसके नाम में जितने अक्षर हैं, इस बारीक बुरादे की उतनी ही गोलियां बना लें। रोजाना एक गोली नियम से उस व्यक्ति/ महिला के घर के मेन गेट पर फेंक दें। जल्दी ही दोनों के बीच विछोह दूर होकर आपसी संबंध अनुकूल होंगे तथा वापिस मिलन होगा।


अगर बॉस या व्यापारिक दुश्मन परेशान करता है

एक सफेद रंग का आधा मीटर कपड़ा लें। उस पर काजल से उस व्यक्ति का नाम केवल तर्जनी उंगली से ही लिखें। इसके बाद उस व्यक्ति के नाम में जितने अक्षर हों, उस पर उतनी ही बार थूकने से तुरंत आराम आ जाएगा।



धन की मनोकामना पूरी करने के लिए

मंगलवार के दिन 22 पीपल के पत्ते लें। उन्हें धोकर रखें। इसके बाद पूर्व दिशा में मुंह करके हर पत्ते पर "राम" लिखें तथा इन्हें उसी दिन हनुमानजी पर चढ़ा आए। आपको तुरंत ही धन लाभ होना शुरू हो जाएगा। ध्यान रखें यह प्रयोग केवल मंगलवार के दिन ही आरंभ होना चाहिए।

ऋण मुक्ति के लिएशुक्ल पक्ष (अमावस्या से पूर्णिमा के बीच का समय) में मंगलवार को आटे में गुड़ मिलाकर पुए बनाकर हनुमानजी के मंदिर में चढ़ाएं और गरीबों को खिलाएं। इससे सभी कर्जे दूर हो जाएंगे।



घर में झगड़ा बंद करवाने के लिए

यदि किसी के घर में बहुत ज्यादा क्लेश या झगड़ा रहता है तो वह इस उपाय को कर सकता है। जब भी घर में आटा पिसवाना हो तो केवल सोमवार को ही पिसवाएं। पिसवाने से पहले उसमें थोड़े से काले चने डाल दें। इस मिश्रित आटे को ज्यों-ज्यों घर के सभी लोग खाएंगे, घर के सभी झगड़े दूर हो जाएंगे।

अजब गजब खबरों का तिलिस्मी संसार









प्रस्तुति- कृति शरण सृष्टि शरण अम्मी शरण मेहर शऱण



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