बुधवार, 13 जनवरी 2021

2520 का चमत्कार

 गणित में कोई भी संख्या.. 1 से 10 तक के सभी अंकों से.. नहीं कट सकती, *लेकिन इस.. विचित्र संख्या को देखियेगा  ..!*

*संख्या 2520* अन्य संख्याओं की तरह.. वास्तव में एक सामान्य संख्या नही है, यह वो संख्या है जिसने विश्व के गणितज्ञों को.. अभी भी आश्चर्य में किया हुआ है  .. !!

यह विचित्र संख्या 1 से 10 तक प्रत्येक अंक से भाज्य है , चाहे वो अंक सम हो या विषम हो।

  ऐसी संख्या जिसे इकाई तक के किसी भी अंक से भाग देने के उपरांत शेष शून्य रहे, *बहुत ही असम्भव/ दुर्लभ* है- ऐसा प्रतीत होता है .. !!


*अब निम्न सत्य को देखें* : 


2520 ÷ 1 = 2520

2520 ÷ 2 = 1260

2520 ÷ 3 = 840

2520 ÷ 4 = 630

2520 ÷ 5 = 504

2520 ÷ 6 = 420

2520 ÷ 7 = 360

2520 ÷ 8 = 315

2520 ÷ 9 = 280

2520 ÷ 10 = 252


 महान गणितज्ञ अभी भी आश्चर्यचकित है  : *2520 वास्तव में एक गुणनफल है 《7 x 30 x 12》का* 


🤷‍♂️ उन्हे और भी आश्चर्य हुआ जब प्रमुख गणितज्ञ द्वारा यह संज्ञान में लाया गया कि संख्या 2520 *हिन्दू संवत्सर* के अनुसार.. *एकमात्र यही संख्या है, जो वास्तव में उचित* बैठ रही है: 

*जो इस गुणनफल* से प्राप्त है ::

*सप्ताह के दिन (7) x माह के दिन (30) x वर्ष के माह (12)*....= *2520*...🔥


 *यही है *भारतीय काल गणना की श्रेष्ठता!* 

 *सनातन धर्म की.. श्रेष्ठता* 

🚩🚩🚩🚩🚩

वॉट्सऐप्प का खुल्लम खुल्ला खेल

 *वॉट्सऐप बदल रहा है अपनी पॉलिसी* / सब कुछ दिखाऊं और बिकाऊ हैँ 


अगर आप ‘यूरोपीय क्षेत्र’ के बाहर या भारत में रहते हैं तो इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप वॉट्सऐप आपके लिए अपनी प्राइवेसी पॉलिसी और शर्तों में बदलाव कर रहा है.

अगर आप वॉट्सऐप इस्तेमाल करना जारी रखना चाहते हैं तो आपके लिए इन बदलावों को स्वीकार करना अनिवार्य होगा.


वॉट्सऐप प्राइवेसी पॉलिसी और टर्म्स में बदलाव की सूचना एंड्रॉइड और आईओएस यूज़र्स को एक नोटिफ़िकेशन के ज़रिए दे रहा है.

नोटिफ़िकेशन में साफ़ बताया गया है कि अगर आप नए अपडेट्स को आठ फ़रवरी, 2021 तक स्वीकार नहीं करते हैं तो आपका वॉट्सऐप अकाउंट डिलीट कर दिया जाएगा.

यानी प्राइवेसी के नए नियमों और नए शर्तों को मंज़ूरी दिए बिना आप आठ फ़रवरी के बाद वॉट्सऐप इस्तेमाल नहीं कर सकते.

ज़ाहिर है आपसे ‘फ़ोर्स्ड कन्सेन्ट’ यानी ‘जबरन सहमति’ ले रहा है क्योंकि यहाँ सहमति न देने का विकल्प आपके पास है ही नहीं.

साइबर क़ानून के जानकारों का मानना है कि अमूमन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स या ऐप्स इस तरह के कड़े क़दम नहीं उठाते हैं. आम तौर पर यूज़र्स को किसी अपडेट को ‘स्वीकार’ (Allow) या अस्वीकार (Deny) करने का विकल्प दिया जाता है.

ऐसे में वॉट्सऐप के इस ताज़ा नोटिफ़िकेशन ने विशेषज्ञों की चिंताएँ बढ़ा दी हैं और उनका कहना है कि एक यूज़र के तौर पर आपको भी इससे चिंतित होना चाहिए.

वॉट्सऐप की पुरानी पॉलिसी में यूज़र्स की निजता पर ज़ोर दिया गया था

नई पॉलिसी में ‘प्राइवेसी’ पर ज़ोर ख़त्म.


अगर 20 जुलाई 2020 को आख़िरी बार अपडेट की गई वॉट्सऐप की पुरानी प्राइवेसी पॉलिसी में देखें तो इसकी शुरुआत कुछ इस तरह होती है:


''आपकी निजता का सम्मान करना हमारे डीएनए में है. हमने जबसे वॉट्सऐप बनाया है, हमारा लक्ष्य है कि हम निजता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ही अपनी सेवाओं का विस्तार करें...''


चार जनवरी, 2021 को अपडेट की गई नई प्राइवेसी पॉलिसी में ‘निजता के सम्मान’ पर ज़ोर देते ये शब्द ग़ायब हो गए हैं. नई पॉलिसी कुछ इस तरह है:


"हमारी प्राइवेसी पॉलिसी से हमें अपने डेटा प्रैक्टिस को समझाने में मदद मिलती है. अपनी प्राइवेसी पॉलिसी के तहत हम बताते हैं कि हम आपसे कौन सी जानकारियाँ इकट्ठा करते हैं और इससे आप पर क्या असर पड़ता है...


प्राइवेसी पॉलिसी में क्या बदलाव हुआ है?

फ़ेसबुक ने 2014 में 19 अरब डॉलर में वॉट्सऐप को ख़रीदा था और सितंबर, 2016 से ही वॉट्सऐप अपने यूज़र्स का डेटा फ़ेसबुक के साथ शेयर करता आ रहा है.

अब वॉट्सऐप ने नई प्राइवेसी पॉलिसी में फ़ेसबुक और इससे जुड़ी कंपनियों के साथ अपने यूज़र्स का डेटा शेयर करने की बात का साफ़ तौर पर ज़िक्र किया है:

वॉट्सऐप अपने यूज़र्स का इंटरनेट प्रोटोकॉल एड्रेस (आईपी एड्रेस) फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम या किसी अन्य थर्ड पार्टी को दे सकता है.

वॉट्सऐप अब आपकी डिवाइस से बैट्री लेवल, सिग्नल स्ट्रेंथ, ऐप वर्ज़न, ब्राइज़र से जुड़ी जानकारियाँ, भाषा, टाइम ज़ोन फ़ोन नंबर, मोबाइल और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कंपनी जैसी जानकारियाँ भी इकट्ठा करेगा. पुरानी प्राइवेसी पॉलिसी में इनका ज़िक्र नहीं था.


अगर आप अपने मोबाइल से सिर्फ़ वॉट्सऐप डिलीट करते हैं और ‘माई अकाउंट’ सेक्शन में जाकर ‘इन-ऐप डिलीट’ का विकल्प नहीं चुनते हैं तो आपका पूरा डेटा वॉट्सऐप के पास रह जाएगा. यानी फ़ोन से सिर्फ़ वॉट्सऐप डिलीट करना काफ़ी नहीं होगा.

नई प्राइवेसी पॉलिसी में वॉट्सऐप ने साफ़ कहा है कि चूँकि उसका मुख्यालय और डेटा सेंटर अमेरिका में है इसलिए ज़रूरत पड़ने पर यूज़र्स की निजी जानकारियों को वहाँ ट्रांसफ़र किया जा सकता है. सिर्फ़ अमेरिका ही नहीं बल्कि जिन भी देशों में वॉट्सऐप और फ़ेसबुक के दफ़्तर हैं, लोगों का डेटा वहाँ भेजा जा सकता है.

नई पॉलिसी के मुताबिक़ भले ही आप वॉट्सऐप का ‘लोकेशन’ फ़ीचर इस्तेमाल न करें, आपके आईपी एड्रेस, फ़ोन नंबर, देश और शहर जैसी जानकारियाँ वॉट्सऐप के पास होंगी.

अगर आप वॉट्सऐप का बिज़नेस एकाउंट इस्तेमाल करते हैं तो आपकी जानकारी फ़ेसबुक समेत उस बिज़नेस से जुड़े कई अन्य पक्षों तक पहुँच सकती है.

वॉट्सऐप ने भारत में पेमेंट सेवा शुरू कर दी है और ऐसे में अगर आप इसका पेमेंट फ़ीचर इस्तेमाल करते हैं तो वॉट्सऐप आपकी कुछ और निजी डेटा इकट्ठा करेगा. मसलन, आपका पेमेंट अकाउंट और ट्रांज़ैक्शन से जुड़ी जानकारियाँ.

वॉट्सऐप यह दावा कर रहा है कि प्राइवेसी पॉलिसी बदलने से आम यूज़र्स की ज़िंदगी पर कोई असर नही पड़ेगा लेकिन क्या आप जो मैसेज, वीडियो, ऑडियो और डॉक्युमेंट वॉट्सऐप के ज़रिए एक-दूसरे को भेजते हैं, उसे लेकर आपको सचेत हो जाना चाहिए?

‘आग के भवँर सी है वॉट्सऐप की नई पॉलिसी’

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और ‘वॉट्सऐप लॉ’ किताब के लेखक पवन दुग्गल का मानना है कि वॉट्सऐप की नई प्राइवेसी पॉलिसी यूज़र्स को ‘आग के भँवर’ में घसीटने जैसी है.

बातचीत में पवन दुग्गल ने कहा, “वॉट्सऐप की नई पॉलिसी न सिर्फ़ भारतीयों की निजता का संपूर्ण हनन है बल्कि भारत सरकार के क़ानूनों का उल्लंघन है.”

हालाँकि वो ये भी कहते हैं कि भारत के मौजूदा क़ानून वॉट्सऐप के नियमों पर रोक लगाने में पूरी तरह कारगर नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “वॉट्सऐप जानता है कि भारत उसके लिए कितना बड़ा बाज़ार है. साथ ही वॉट्सऐप ये भी जानता है कि भारत में साइबर सुरक्षा और निजता से जुड़े ठोस क़ानूनों का अभाव है.”

यही वजह है कि वो भारत में अपने पाँव तेज़ी से पसारना चाहता है क्योंकि भारतीयों का निजी डेटा इकट्ठा करने और उसे थर्ड पार्टी तक पहुँचाने

कंज़्यूमर्स डेटा का अध्यनन करने वाली जर्मन कंपनी स्टैटिस्टा के मुताबिक़ जुलाई 2019 तक भारत में वॉट्सऐप के 40 करोड़ यूज़र्स थे.

'भारतीय क़ानूनों का उल्लंघन है वॉट्सऐप की नई पॉलिसी'

पवन दुग्गल कहते हैं कि भारत में न ही साइबर सुरक्षा से जुड़ा कोई मज़बूत क़ानून है, न ही पर्सनल डेटा प्रोक्टेशन से जुड़ा और न ही प्राइवेसी से जुड़ा.


वो कहते हैं, “भारत में एकमात्र एक क़ानून है जो पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन और साइबर सुरक्षा पर कुछ हद तक नज़र रखता है. वो है- प्रोद्यौगिकी सूचना क़ानून (आईटी ऐक्ट), 2000. दुर्भाग्य से भारत का आईटी ऐक्ट (सेक्शन 79) भी वॉट्सऐप जैसे सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए काफ़ी लचीला है.”


पवन दुग्गल के अनुसार, वॉट्सऐप की नई प्राइवेसी पॉलिसी आईटी ऐक्ट का उल्लंघन है. ख़ासकर इसके दो प्रावधानों का:


1) इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नॉलजी इंटमिडिएरी गाइडलाइंस रूल्स, 2011

2) इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नॉलजी रीज़नेबल सिक्योरिटी पैक्टिसेज़ ऐंड प्रोसीज़र्स ऐंड सेंसिटिव पर्सनल डेटा ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन रूल्स, 2011

वॉट्सऐप एक अमेरिकी कंपनी है और इसका मुख्यालय अमेरिका के कैलीफ़ोर्निया में है. वॉट्सऐप कहता है कि यह कैलीफ़ोर्निया के क़ानूनों के अधीन है.

वहीं, भारत के आईटी ऐक्ट की धारा-1 और धारा-75 के अनुसार अगर कोई सर्विस प्रोवाइडर भारत के बाहर स्थित है लेकिन उसकी सेवाएँ भारत में कंप्यूटर या मोबाइल फ़ोन पर भी उपलब्ध हैं तो वो भारतीय आईटी ऐक्ट के अधीन भी हो जाएगा.

यानी वॉट्सऐप भारत के आईटी एक्ट के दायरे में आता है, इसमें कोई शक नहीं है. दूसरी बात, वॉट्सऐप भारतीय आईटी ऐक्ट के अनुसार ‘इंटरमीडिएरी’ की परिभाषा के दायरे में आता है.

आईटी एक्ट की धारा-2 में इंटरमीडिएरीज़ को मोटे-मोटे तौर पर परिभाषित किया गया है, जिसमें दूसरों का निजी डेटा एक्सेस करने वाले सर्विस प्रोवाइडर्स शामिल हैं.

आईटी ऐक्ट के सेक्शन-79 के अनुसार इंटरमीडिएरीज़ को यूज़र्स के डेटा का इस्तेमाल करते हुए पूरी सावधानी बरतनी होगी और डेटा सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी उसी की होगी.

पवन दुग्गल कहते हैं कि अगर वॉट्सऐप की नई प्राइवेसी पॉलिसी और शर्तों को देखें तो ये कहीं से भी आईटी एक्ट के प्रावधानों पर खरी नहीं उतरतीं.

आज़मगढ़ से आज़मियों की खोज

 हमें गर्व है कि हम आजमगढ़ियां और आज़मी हैं..! 

@अरविंद सिंह

०आजमगढ़ियों और आज़मियों को अपनी माटी से मिलाने का एक प्रयास... एक आंदोलन..! 

आजमगढ़। हमने बहुत पहले एक छोटी सी कहानी सुनी थी। कितनी हकीकत है और कितना फसाना इस पर मत जाइएगा।लेकिन कहानी का लक्ष्य जरूर पकडिएगा।

दक्षिण अफ्रीका में एक छोटा सा द्वीप है। कबिलाई और आदिवासी प्रकृति के लोग रहते हैं। उनके यहाँ एक मिथक है कि-‘जब ये कबिलाई लोग नृत्य करते हैं तो पानी बरसता है।’ यह मिथक आज तकनीकि और विज्ञान के दौर में भी जारी है। दुनिया भर की एजेंसियां,रिसर्चर और वैज्ञानिक इस सत्य से सामना किये लेकिन इनके नाचने से पानी बरसने के अबूझ पहेली को हल नहीं कर सके। हार मान कर सभी वैज्ञानिक और रिसर्चर इस कबिले के सरदार से मिले और पूछे कि-“आखिर ऐसा क्या है कि आप के समुदाय के लोग जब नृत्य करते हैं तो पानी बरसने लगता है?” पहले तो सरदार दुनिया के इन महान वैज्ञानिकों और रिसर्चरों की सोच और उपलब्धि पर हँसा.. अटट्हास किया और फिर जवाब दिया,

“देखों दुनिया वालों! यह कोई मिथक नहीं है बल्कि हमारा अगाध और अटूट विश्वास है। हम तब तक नाचते हैं…हम तब तक नाचते हैं .. हम तब तक नाचते हैं,जब तक कि पानी न बरस जा। “अर्थात् पानी बरसने तक हम निर्ब़ाध.. बिना थके.. बिना रूके नाचते हैं.. और एक दिन पानी बरस ही जाता है।

दरअसल आजमगढ़ इस कहानी को अब जीने लगा है और उसे अब एहसास हो चुका है कि हमें भी पानी बरसने तक नाचना है। और हमसे कोई भी,चाहे मगरूर सत्ता ही क्यों न हो, यह विश्वास नहीं छिन सकती है। यह विश्वास ही हमारी ताक़त है और विश्वास ही हमार संघर्षपथ। अब यह पथ, चाहे अग्निपथ बने या लोकपथ, हमें हमारे लक्ष्य को पाने से अब कोई रोक नहीं सकता है। तमसा के पानी में आज भी वही रवानी है जो आजादी के समय था। हमने एक बार नहीं बल्कि तीन तीन बार अपने को आजाद घोषित किया है। ब्रितानी जेलों के सींखचें हमारी फौलादी जज्ब़े को रोक नहीं सके और हमने जेल के फाटक को तोड़, अपनों को आजाद कराया है। तमसा के पानी ने बूढ़े कुँवर सिंह में जवानी ला दी थी। हमने भूख का भूगोल जीया है लेकित बगा़वत का इतिहास कभी नहीं छोड़ा है। हम कहने को तो एक जनपदीय लोग हैं लेकिन हमारी विचार और सोच की भूमि केन्द्रीय है। हम जितना उत्तर को सोचते हैं उतना दक्षिण को महसूस करते हैं। पूरब हमारे सोच में है तो पश्चिम हमारी पहुँच में। यह ऋषियों और दरवेशों की भूमि है। क़लम और कौपिन की धरती है। यह सर्जना और रचना की भूमि है। खडी़ बोली का प्रथम महाकाव्य ‘प्रियप्रवास’ इसी धरती पर रचा गया है। यहाँ आज से लगभग ढा़ई सौ साल पहले विरह के गीत गाये गये हैं। यानि पलायन और पीडा़ हमारी नसों में रक्तप्रवाह बनकर सदियों से दौड़ रही है। हमने सामाजिक न्याय की लड़ाई को लड़ा है। हमने अन्याय के विरूद्ध आवाज मुखर की है। हमने देश ही नहीं दुनिया को रौशनी दी है। हमने वोल्गा से गंगा को जोडा़ है। तो वितस्ता की लहरों को भी महसूस किया है। गंगा जमुनी रवायत हमारी पहचान है तो विभिन्न विचारधाराओं को आत्मसात् कर चलने का हुनर हमें पूर्वजों ने सिखाया है।

ऐसी समृद्ध अतीत वाली धरती का वर्तमान इतना नि:सहाय नहीं हो सकता है। हमें लड़ना तो विरासत में सिखाया गया है। कभी गरीबी के खिलाफ तो कभी अन्याय के खिलाफ। यह लड़ाई आज असमानता और भेदभाव के खिलाफ है। आजमगढ़ तो बदलकर ही रहेगा, चाहे तमसा के पानी को एक बार फिर गर्म ही क्यों ना होना पड़े। हमें विश्वास है कि तमसा एक बार फिर अपनी रवानी दिखायेगी। क़लम की धरती क़लम के लिए आवाज़ उठायेगी.. जिसे मिलाना है वो हमारी आवाज़ में आवाज़ मिला दे। यह आवाज़ एक दिन दुनिया की आवाज जरूर बनेगी । भूख का भूगोल एक दिन अपनी नई पहचान के साथ आगे बढ़ेगी.. और काल के कपाल पर सृजन के गीत लिख देगी. क्योंकि हम उस माटी के लाल हैं जिसने देश और दुनिया में आजमगढ़ के इल्म और प्रतिभा की रौशनी को फैलाया है.. हमें गर्व है कि हम आजमगढ़ियां.. आज़मी है.

सुहेल साहब के शब्दों में-

“इस खित्ता-ए-आजमगढ़ पे फै़जान-ए-तजल्ली है यक्सर/जो ज़र्रा यहाँ से उठता है वो नैय्यर-ए-आजम होता है।”

पलामू डायरी -/

 पलामू डायरी - 99


यह इमारत कोई पुराना दफ्तर है।

कभी रेहला (गढ़वा रोड) में केंदू (बीड़ी) पत्ता की बड़ी- बड़ी आढ़तें हुआ करती थीं। सबसे बड़ी आढ़तिया थी जे० बी० कंपनी जिसके बीड़ी-पत्ते के विशाल गोदामों के कुछ अवशेष आज भी मौजूद हैं,एक में बच्चों के लिए एक नीजी स्कूल चल रहा है।इस कंपनी के मालिक थे गुजरात के झवेर भाई भूल जी भाई पटेल जिन्होंने इस अरण्यक्षेत्र में पलामू के जनहित के कई कार्य किए।

आज जब धनाढ्य धनकुबेर प्रभू वर्ग जनहित के नकाब पहने मंहगे शिक्षा-तकनीकी संस्थान या मल्टी-सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल स्थापित कर जनहित के प्रहसन रचते हुए जन की जेबें काटते-कुतरते लाभ लूट रहे हैं,जे०बी० कंपनी ने रेहला में एक विद्यालय की स्थापना की थी जो आज भी पलामू के एक मानक शिक्षा संस्थान के रूप में ख्यात है।

(विद्यालय के मुख्य भवन की तस्वीर विद्यालय के शिक्षक बंधु राजेश जी के सौजन्य से)

कवि की कथाएं

 #कवियों_की_कथा-57

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   इलाहाबाद(प्रयागराज) के श्रीरंग एक सुपरिचित कवि और आलोचक हैं! तीन कविता संग्रह सहित उनकी  दर्ज़न भर पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।वे पेशे से वकील हैं और जनता के पक्ष में वकालत करते हैं ।यही जनपक्षधरता उनकी लेखनी  की प्रबलता है।आज भूमंडलीकरण से उत्पन्न संकटों में से एक प्रमुख संकट है-पहचान का संकट! उनकी कविताओं में पहचान के संकट से जूझ रहे  आम जन के संघर्षों को स्वर मिला है,,!

  आज इस काॅलम की सत्तावनवीं कड़ी श्री श्रीरंग की कविताओं में आम जन के पक्ष में की गई वकालत को देखें ,,!


         कवि की कथा=कवि की कलम से 

                 #कवि_कथा


      लिखना पढ़ना बचपन से ही मेरे खून में रहा है । उसे एक शक्ल देने का काम मेरे जीवन की परिस्थितियो ने किया । मेरे गुरुओ और मित्रों ने किया ।  मेरा जन्म एक पारम्परिक कर्मकाण्डी पुरोहित ब्राहमण परिवार में हुआ जिसमे लिखना पढ़ना भी एक तरह से जीविका का साधन ही था । पिता भजन लिखते थे । उनके पिता भी भजन लिखते थे यानी मेरे बाबा भी लिखते थे स्वतंत्रता संग्राम के दौर में देश भक्ति के गीत भी लिखते थे । उसे ही गाते थे । पूजा पाठ भजन कीर्तन कथा ही हमारे परिवार की जीविका का साधन था । तो उसी संस्कार और परम्परा में मैने भी बचपन में भजन कीर्तन लिखता था । गाता था । लेकिन कुछ बडा हुआ और बडी कक्षा में गया तो पता चला कि साहित्य में तरह तरह के कवि हुए हैं और आधुनिक कवि अलग तरह का कविताएं लिखते है । ये भी पता चला कि हमारी मलिन बस्ती के जिस मंदिर में हम रहते थे वहाँ आने वालों में पद्मकांत मालवीय भी कवि हैं । जो पास के एक बडे बंगले में रहते है । थोड़ी ही दूर अशोक नगर में रहने वालीं जिनके यहाँ जजमानी लेने मेरी दादी जाती थी वे भी बहुत बड़ी कवयित्री हैं । वे महादेवी वर्मा थीं । एक बार हमारे स्कूल में मुख्य अतिथि बनकर आयीं, रामजी पाण्डे जी के साथ उस कार्यक्रम मैने भी एक कविता सुनाई जो पहली उन्हीं लोगों की तरह की नयी किसम की कविता थी । उन्हें वह कविता अच्छी लगी और मैं पुरस्कृत हुआ । उनके प्रति मेरा सम्मान और आदर भाव तभी से बना फिर हमेशा रहा । बाद में रामजी पाण्डे के पुग बृजेश से मेरी दोस्ती हो गयी और वहाँ साना जाना हमेशा जारी रहा । बाद में गीतकार यश मालवीय से परिचय हुआ जो रामजी पाण्डे जी के दामाद हैं । उनके साथ एजी अड्डे की बैठक शुरू हुई और मैं नवगीत लिखने लगा । वही एहतराम इस्लाम की सोहबत मिली तब कुछ गजलें भी लिखी । कर्मचारी नेता कामरेड सुरेश कुमार शेष का साथ मिला और मार्क्सवाद को कुछ जाना । यही एजी अड्डे पर ही लक्ष्मी कांत वर्मा दूधनाथ सिंह खीन्द्र कालिया ममता कालिया शेखर जोशी मार्कण्डेय नीलाभ  अनिता गोपेश अजामिल , श्रीप्रकाश मिश्र हरीशचंद्र पाण्डे ' जगदीश गुप्त ' अजीत पुष्कल  सुभाष चंद्र गांगुली ' शिवकुटी लाल वर्मा आदि के बारे मे जाना, जिनसे मुलाकात की । कई तो यहीं पर मिलते ही थे । लक्ष्मी कांत वर्मा जी से बैठकी का लम्बा दौर चला और मै समकालीन कविता लिखने लगा । मेरे पहले संग्रह यह कैसा समय को लम्बी भूमिका उन्होंने लिखी राजेश जोशी ने उसका फ्लैप लिखा । मुझमे कुछ प्रतिभा देखकर दूधनाथ सिंह जी ने मुझे अपने घर बुलाया और मुझे जनवादी लेखक संघ का सदस्य बना लिया । मैं उनका विद्यार्थी नहीं था किन्तु उनका शिष्य बन गया । उन्होने मेरी कविताओ पर अपनी राय दी और मेरा कविता पाठ रखवाया । इसमें मेरे ही जैसे कवि रतीनाथ योगेश्वर हीरा लाल आदि भी रखे गए । हम जनवादी हो गए । बाद में मैं सी पी एम का विधिवत सदस्य बन गया । तब से लिखना पढ़ना जारी है अब तक तीन कविता संग्रह चार कविता पर आलोचना की किताबे और तीन चार किताबे सामाजिक राजनैतिक श्रेणी की प्रकाशित हो चुकी है । हाल में असुर जनजाति पर मेरी किताब लोक भारती राजकमल प्रकाशन समूह से आयी है । लिखना पढ़ना आज भी जारी है । आज मैं पेशे से वकील हूँ और साहित्य में जनता के पक्ष से जिरह करता हूँ ऐसा वरिष्ठ कवि आलोचक प्रो0 राजेन्द्र कुमार जी ने मेरे बारे में आशीर्वाद स्वरूप कहा है । भाई शिरोमणि महतो का आभार जिनके आग्रह पर मुझे आप सबके सामने यह सब बताने का सौभागय मिला ।


#कविताएँ=


01-पिता, रोटी और बच्चे 

   

दिन भर हाथ पैर मारते पिता

बोलते झूठ सच

किसी तरह

करते

पेट का प्रबन्ध ...

घर लौटने पर/माँ

नोचने लगती मुँह

वरक्कत नहीं कमाई में

परई भर रहती

दिन की

परई पर

रात की

अपने करम पर

रोती भर भर आंसू माँ

पर रो नहीं पाते पिता

सारा गुस्सा

उतारते माँ पर पिता

माँ खीजती बच्चों पर ...

खटते पिता

खटती माँ

बनता जो मिलता सीधा-पिसान

डरे सहमे चुपपचाप खा लेते जो मिलता बच्चे

खाली आतों में पानी भर कर सो जाती माँ

बच्चे रोज देखते माँ को

रोज देखते पिता को

रोज देखते तकदीर को

जो बदल ही नही रही थी पीढ़ियों से ...।


02-पहचान का संकट 


एक दिन

मुझे

न जाने क्या सूझा कि

मैं खुद को घर पर छोड़कर

निकल पड़ा बाजार घूमने

मैं

सबको पहचानता

पर न पहचानता मुझे कोई

आते जाते परिचितों को मैं

दुआ सलाम करता पर

कोई जबाव न देता

या हिलाता सिर भी तो

कुछ इस तरह से कि

कौन है सिरफिरा

जो कर रहा है अन्जानों को सलाम ...

गलती किसी की नहीं

सिर्फ और सिर्फ मेरी थी जो

मैं

अपनी पहचान घर छोड़ आया था

और

खाक छान रहा था सड़कों की

उस दिन मुझे लगा

कितना अप्रीतकर होता है

अपनी पहचान का साथ न होना

मै देर रात जब

लौटा घर

पहचान खँूटी पर टँगी थी

देर तक बतियाता रहा

बतायी बाजार वाली बात

वह खूब हँसी, ठहाके लगाये

मैं डूबता चला गया

अपनी पहचान की हँसी में ...।


।। 

03- कुछ छोटी कुछ बड़ी बात 

                       (पाब्लो नेरूदा के प्रति)

बड़ा कवि

अपने पाठक में भी

कविता के बीज रोपता चलता है

बड़ी कविता

अपने भीतर

अनेक छोटी कविता के बीज रोपती है

बड़ा आदमी

छोटेपन से ऊपर उठ कर ही बनता है बड़ा,

साहित्य में

अपने समय का समूचा झूठ भी

उपस्थित होना चाहिए सच की तरह

कोई जीवन आदर्श नहीं

जीवन के अपने आदर्श होते हैं

पाब्लो तुम्हारे जीवन के आदर्श

हमारे जीवन के आदर्श बने

इसी कवायद के साथ कविता लिखता हूँ

जो संभव है कविता ही न हो ....।

।। 


04- नुक्कड़ से नोमपेन्ह 

(कम्बोडिया में युद्धरत आम आदमी के पक्ष में)


वे जो

बहुत सुबह नहीं निकलते घर से बाहर

या फिर नहीं करते

किसी लाल गोले की पूजा

देर रात गए

जब महानगर की बसें चलनी बंद हो जाती हैं

कमरों में सिटकनी लगाकर

चित्त हो जाता है महानगर

लौटते हैं घर

और बची-खुची रात

उड़ेल देते हैं औरतों के संसार में ......

वे जो

नुक्कड़ पर सारा दिन

दुनिया के सर्वोत्तम महामहिमों के

पाजामें का नाड़ा खोलने में

बिताते हैं/खाते हैं लाई चना

या फिर दबा लेते हैं होंठों के नीचे सुर्ती

अनगिनत चाय की प्यालियाँ

झोंकते रहते हैं पेट की भट्टी में ........

वे जो

बहुत गंभीर होने पर

जोरदार ठहाका लगाते हैं/पीटने लगते हैं मेज

बातों-ही-बातों में

समुद्र के अथाह अपार जल को

हजारों फिट ऊपर उछालने में

तनिक विचलित नहीं होते

आम-आदमी के पक्षधर

वे जो

दाढ़ी को उल्टे ताज की तरह धारण करते हैं

जिनकी दाढ़ी के एक बाल से

लेखपाल कर सकता है

हजार बार धरती की पैमाइश ...........

वे जो केवल

आग की तरह गर्म

हवा की तरह आकारहीन या

पानी की तरह पतले नहीं होते

उनके ही शब्दों की पीठ पर

यात्रा करते हैं विचार

नुक्कड़ से नोमपेन्ह तक ......।


                                         

05-नई सहस्राब्दी का सच


इस नयी सभ्यता में

जो कि है सूचना क्रान्ति का युग

सच बोलने की मनाही तो नहीं है कहीं

पर झूठ को ज्यादा दी जाती है तरजीह

अब ज्यादा फायदेमंद नजर आता है झूठ

सच की बनिस्बत


लोग 

झूठ बोलते-बोलते

झूठ सुनते-सुनते

झूठी हँसी, झूठी दिल्लगी

और झूठी जिन्दगी के इतने आदी हो चुके

हैं कि

यह सब झूठ ही सच लगता है


लेकिन 

कुछ माहिर हैं

जो निकाल लेेते हैं झूठ के बीच से

छाँटकर सच

और झेंप मिटाते हुए

बड़े-बड़े लोग

झूठी हँसी हँसने लग जाते हैं

पीठ थपथपाते हुए

चलो कोई तो है सच और झूठ की पहचान

करने वाला


वैसे इस नये समय में

सच की न तो किसी को जरूरत है

न किसी की मजबूरी

खाने को तो अभी भी लोग

खाते हैं

सच बोलने की ही सौगन्ध

लेकिन झूठ बोलने के सिवा कुछ नहीं

बोलते 


और यह झूठ ही

नई सहस्राब्दी का 

सबसे बड़ा सच है...।

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06-सौन्दर्य 


पहाड़

 ढँक जाता है

बर्फ  से इतना

 कि दिखता ही नहीं पहाड़

  पहाड़  के सिर पर लद जाता  है वर्फ का  पहाड़

वर्फ को  कभी बोझ नहीं मानता पहाड़


पृथ्वी 

लादे रहती  है  सिर  से पैर तक 

 नदी , जंगल , समुद्र,पहाड़

घरती की  पीठ पर होते है  कई -कई पहाड़

 पृथ्वी  दुनिया  के  बोझ से रहती है झुकी- झुकी

इसी से

 पृथ्वी कही जाती   है  धरती  

घरती के लिए  कभी भी

बोझ नहीं होता पहाड़


दूसरों का बोझ उठाने से ही     

दुनियाँ  बनती है सुन्दर  

भले ही  ज़िन्दगी में हों

दुख के लाखों  पहाड़  

पहाड़ का बोझ नहीं होती  बर्फ 

धरती  का बोझ नहीं

 होता    पहाड़ ।


07-अन्दाज-बे-अंदाज


जिन्दगी का अपना  होता है

 एक खास अन्दाज---

वाहन-चालक

पहिया नहीं ; गङ्ढा देखता है

और बचा लेता है

पहिए को गड्ढे में जाने से ,

अपने अन्दाज से

 चलती है गाड़ी---

सितार वादक

तार नहीं  , तार का व्यवहार देखता है

आँख मूँदकर बजाता है सितार 

बेसुरे समय में रचता है

सुरों का संसार

अपने खास अन्दाज से ---

आदमी 

मुँह नहीं देखता 

 कौर   मुँह में ही डालता  है

लेता है जीवन में  जीवन के स्वाद , 

अपने अन्दाज से---

 करने से होता है काम 

मेहनत और लगन से

 हो रियाज  

तो  पैदा हो ही जाता  है     एक अन्दाज 

अन्दाज जरूरी है जिन्दगी के लिए

जैसे गृहणी के लिए -दाल में नमक का अन्दाज ---

 अन्दाज से ही  बदलता है

 जीने का अन्दाज 

अन्दाज और तजुरबे  से ही 

ऑख मूँद कर भी 

होता जाता है सटीक काम

हर काम का होता है अपना अन्दाज ---

देखा-देखी 

करते हैं -नौसिखिए,- -सीखते-  सीखते 

एक दिन वे भी सीख ही जाते  हैं अन्दाज ---

लेकिन;

देखकर भी 

कुछ नहीं 

सीखते 

केवल --  --       बेअन्दाज---

बे-अन्दाजगी कितनी बढ़  चुकी है 

 हमारे समय में

किसी को नही है अभी 

इस बेअन्दाजगी  का अन्दाज ---।

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#परिचय=


            श्रीरंग


जन्म =सन् 1964


संप्रति =अधिवक्ता, इलाहाबाद हाईकोर्ट 


 पुस्तकें = तीन कविता संग्रह, चार आलोचना की किताबें, 

               चार अन्य किताबें ।

                                        

सम्मान = हिन्दी सेवा सम्मान 

               सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सम्मान 

                वसु मालवीय कविता  सम्मान

                डा0 सीताराम दीन स्मृति सम्मान

रविवार, 10 जनवरी 2021

मुंबई क् मुसलमान/ विवेक शुक्ला

 मुसलमान मुंबई के

साउथ मुंबई में ताज होटल के पीछे कोलाबा को देखते हैं। एक से बड़े एक शो-रूम,रेस्तरां, कॉफी शॉप और बड़ी कंपनियों के दफ्तर। किसी यूरोप के देश का हिस्सा लगता है कोलाबा। यूरोपीय अंदाज की इमारतों की भरमार है यहां। पारसी खूब रहते हैं।

इधर ज्यूलरी और दूसरे अनेकल शो-रूम मुसलमानों के हैं। ये इनके ऊपर लगे बोर्डों को पढ़कर समझ आ जाता है। ये जगह गेटवे ऑफ इंडिया से बिल्कुल करीब में है।

अब जुहू चलें। जुहू बीच पर हिजाब पहने मुसलमान लड़कियों का वॉलीबाल खेलना सामान्य बात है। दिल्ली से मुंबई गए किसी शख्स को ये छवियां अपनी तरफ खींचती हैं।

 क्या आपने दिल्ली में कनॉट प्लेस, साउथ एक्सटेंशन, राजौरी गॉर्डन या करोल बाग में किसी मुसलमान का बड़ा सा ज्वैलरी शो-रूम देखा है? अगर किसी ने देखा हो तो बताइये। मैंने तो नहीं देखा।  

मुंबई में जुहू,कोलाबा,बांद्रा से लेकर कलीना और कुर्ला के फीनिक्स मार्किट सिटी मॉल में मुसलमानों की दर्जनों दुकानें और शो-रूम देखे। 


साफ समझ आ गया कि दिल्ली का मुसलमान, जिसमें यूपी और बिहारी मुसलमान शामिल हैं, बहुत अलग हैं मुंबई वालों से। दिल्ली की बाबू मानसिकता सबको नौकरी करने के लिए प्रेरित करती है। मुंबई का मिजाज बिजनेस का है। उसका असर सारे मुंबईकरों पर होता है।


टाइम्स आफ इंडिया के सीनियर एडिटर और मित्र  Mohammed Wajihuddin जी बिहार से हैं। गुजरे 20-25 वर्षों से मुंबई में हैं। वे बता रहे थे कि मुंबई में खोजा, मेमन और बोहरा मुसलमान के खून में बिजनेस करना है। ये नौकरी के बजाय बिजनेस करना पसंद करते हैं। ये सब मोटा बिजनेस करते हैं।

मुंबई में ही है सिप्ला फार्मा कंपनी। ख्वाजा अब्दुल हामिद ने 1935 में अंधेरी में अपनी सिप्ला की पहली फैक्ट्री लगाई थी। उसमें 4 जुलाई,1939 को महात्मा गांधी खुद आए थे। गांधी जी ने हामिद से कहा था कि वे जीवन रक्षक दवाओं पर लगातार शोध करें। सिप्ला अब देश की चोटी की फार्मा कंपनी है। अरबों रुपये का सालाना कारोबार है। सिप्ला के मौजूदा चेयरमेन वाई.के.हामिद कॉरपोरेट इंडिया का बेहद खास नाम है।


 इसी मुंबई में ही 1960 में स्थापित हो गई Wockhardt pharmaceutical भी । इसकी मैन्यूफैक्टकिंग यूनिट भारत से बाहर ब्रिटेन,आयरलैंड, फ्रांस, अमेरिका में भी है। इसके चेयरमेन हबील खुराकीवाला फिक्की के भी चेयरमेन रहे हैं।


मुंबई ने यूपी वाले अबू आजमी को भी इतने मौके दिए कि वे भी कम से कम एक हजार करोड़ रुपए के साम्राज्य के तो मालिक हैं। उनकी बड़ी सी बिल्डिंग कोलाबा में है।

मुंबई के मुसलमान गुजराती, कोंकणी और मराठी भी बोल रहे हैं। आप मरीन ड्राइव पर शाम को बोहरा मुसलमानों को टहलते हुए गुजराती में बात करते हुए देख सकते हैं। ये टोपी भी अलग- अलग तरह की पहनते हैं। बोहरा मुसलमानों की टोपी ऊंची होती है। हाजी अली दरगाह में उर्दू सुनाई देती है। इधर लगे बोर्डो में गुजराती और हिन्दी भी पढ़ी जा सकती है।

मुंबई में हिजाब पहनकर महिलाएँ लक्जरी कारें  चला रही हैं। इनकी पहचान का हिस्सा है बुर्का और हिजाब। इन्हें आप जुहू के वेज रेस्तरां जैसे शिव सागर में डोसा या वड़ा पाव के साथ इंसाफ करते हुए भी देख सकते हैं।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

आज़ादी की क़ीमत / नीरा आर्या की कहानी

 आजादी की एक झलक😭😭😭😭😭

इतनी यातनाएं दी गईं और नेहरू कहता है चरखा से आजादी मिली? नीरा आर्य की कहानी। जेल में जब मेरे स्तन काटे गए ! स्वाधीनता संग्राम की मार्मिक गाथा। एक बार अवश्य पढ़े, नीरा आर्य (१९०२ - १९९८) की संघर्ष पूर्ण जीवनी:


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नीरा आर्य का विवाह ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था | नीरा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बचाने के लिए अंग्रेजी सेना में अपने अफसर पति श्रीकांत जयरंजन दास की हत्या कर दी थी | 


नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है | इस आत्म कथा का एक ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है -


5 मार्च 1902 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के खेकड़ा नगर में एक प्रतिष्ठित व्यापारी सेठ छज्जूमल के घर जन्मी नीरा आर्य आजाद हिन्द फौज में रानी झांसी रेजिमेंट की सिपाही थीं, जिन पर अंग्रेजी सरकार ने गुप्तचर होने का आरोप भी लगाया था। 


इन्हें नीरा ​नागिनी के नाम से भी जाना जाता है। इनके भाई बसंत कुमार भी आजाद हिन्द फौज में थे। इनके पिता सेठ छज्जूमल अपने समय के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे, जिनका व्यापार देशभर में फैला हुआ था। खासकर कलकत्ता में इनके पिताजी के व्यापार का मुख्य केंद्र था, इसलिए इनकी शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता में ही हुई। 


नीरा नागिन और इनके भाई बसंत कुमार के जीवन पर कई लोक गायकों ने काव्य संग्रह एवं भजन भी लिखे | 1998 में इनका निधन हैदराबाद में हुआ।


नीरा आर्य का विवाह ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था | 


नीरा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बचाने के लिए अंग्रेजी सेना में अपने अफसर पति श्रीकांत जयरंजन दास की हत्या कर दी थी।


आजाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद जब लाल किले में मुकदमा चला तो सभी बंदी सैनिकों को छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हें पति की हत्या के आरोप में काले पानी की सजा हुई थी, जहां इन्हें घोर यातनाएं दी गई। 


आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।


नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है | इस आत्म कथा का एक ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है - 

‘‘मैं जब कोलकाता जेल से अंडमान पहुंची, तो हमारे रहने का स्थान वे ही कोठरियाँ थीं, जिनमें अन्य महिला राजनैतिक अपराधी रही थी अथवा रहती थी।


 हमें रात के 10 बजे कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कंबल आदि का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी कि इस गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में रहते स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, जहाँ अभी तो ओढ़ने बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी है?


 जैसे-तैसे जमीन पर ही लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो कम्बल लेकर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेंककर चला गया। कंबलों का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा, परंतु कंबलों को पाकर संतोष भी आ ही गया। 


अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था।


‘‘सूर्य निकलते ही मुझको खिचड़ी मिली और लुहार भी आ गया। हाथ की सांकल काटते समय थोड़ा-सा चमड़ा भी काटा, परंतु पैरों में से आड़ी बेड़ी काटते समय, केवल दो-तीन बार हथौड़ी से पैरों की हड्डी को जाँचा कि कितनी पुष्ट है। 


मैंने एक बार दुःखी होकर कहा, ‘‘क्याअंधा है, जो पैर में मारता है?’’‘‘पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी?’’ 


उसने मुझे कहा था।‘‘बंधन में हूँ तुम्हारे कर भी क्या सकती हूँ...’’ फिर मैंने उनके ऊपर थूक दिया था, ‘‘औरतों की इज्जत करना सीखो?’’


जेलर भी साथ थे, तो उसने कड़क आवाज में कहा, ‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा,यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं?’’


‘‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे,’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘सारी दुनिया जानती है।’’


‘‘नेताजी जिंदा हैं....झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए?’’ जेलर ने कहा। 

‘‘हाँ नेताजी जिंदा हैं।’’


‘‘तो कहाँ हैं...।’’


‘‘मेरे दिल में जिंदा हैं वे।’’ 


जैसे ही मैंने कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोले, ‘‘तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।’’ और फिर उन्होंने मेरे आँचल पर ही हाथ डाल दिया और मेरी आँगी को फाड़ते हुए फिर लुहार की ओर संकेत किया...लुहार ने एक बड़ा सा जंबूड़ औजार जैसा फुलवारी में इधर-उधर बढ़ी हुई पत्तियाँ काटने के काम आता है, उस ब्रेस्ट रिपर को उठा लिया और मेरे दाएँ स्तन को उसमें दबाकर काटने चला था...लेकिन उसमें धार नहीं थी, ठूँठा था और उरोजों (स्तनों) को दबाकर असहनीय पीड़ा देते हुए दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, ‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये दोनों गुब्बारे छाती से अलग कर दिए जाएँगे...’’ 


उसने फिर चिमटानुमा हथियार मेरी नाक पर मारते हुए कहा, ‘‘शुक्र मानो महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग से नहीं तपाया, आग से तपाया होता तो तुम्हारे दोनों स्तन पूरी तरह उखड़ जाते।’’ सलाम हैं ऐसे देश भक्त को। आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।


जय हिन्द, जय माँ भारती, वन्देमातरम !!!


पढ़ने के बाद ही रूह कांप जाती है जिन पर बीती होगी उसका दर्द वही जानते होंगे नमन हैं ऐसे क्रांतिवीरों को!