मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

करना क्या है / रवि अरोड़ा

 करना क्या है / रवि अरोड़ा


अभी अभी एक मित्र ने कल्याणी पश्चिम बंगाल में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशाल रैली का एक वीडियो भेजा है । इस चुनावी रैली में अपार भीड़ को देख कर मोदी जी गदगद नज़र आ रहे हैं और मंच से भीड़ को कह रहे हैं कि आपका इतनी बड़ी संख्या में आना मेरे लिये बड़े सौभाग्य की बात है । कोरोना के मामले में पाँचवे स्थान पर पहुँच चुके पश्चिम बंगाल की इस रैली में न प्रधानमंत्री ने मास्क पहन रहा है और न ही हजारों की भीड़ ने । कहना न होगा कि दो गज़ की दूरी वाला प्रधानमंत्री का डायलोग तो उनकी उपस्थिति में भी अर्थहीन दिखाई दे रहा था । सच बताऊँ तो मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आसपास चल क्या रहा है ? क्या यह चार्ली चैपलिन की हास्य फ़िल्म द ग्रेट डिकटेटर अथवा द सर्कस जैसा कुछ है या फिर त्रासदी लेखन के पितामह विलियम शैक्सपियर का नाटक हैमलेट अथवा आथेलो मेरे इर्दगिर्द खेला जा रहा है । आँखों के सामने ऐसी ऐसी भयावह त्रासदी हो रही हैं कि पूरा अस्तित्व डावाँडोल हुआ जा रहा है और कभी कभी इस त्रासदी में विद्रूपताओं का भी ऐसा दीदार हो रहा है कि रुलाई के माहौल में भी हँसी आ घेरती है । पता नहीं हम लोग हमेशा से ही इतने मूर्ख थे या हाल ही के वर्षों में हमे ऐसा बना दिया गया है अथवा मान लिया गया है । जो भी हो अपने पल्ले तो वाक़ई कुछ भी नहीं पड़ रहा । चुपचाप तमाशा देख रहे हैं और मुसीबत यह है कि टिक कर देखा भी नहीं जा रहा ।


कोरोना हर दूसरे घर में दिखाई दे रहा है मगर सरकारी आँकड़ा उतना भी नहीं जितना मेरे मोहल्ले का है । कोरोना प्रोटोकोल से ही कम से कम दस शव रोज़ हिंडन श्मशान घाट पर जलाये जा रहे हैं और सामान्य रूप से भी तीन गुना लाशें यहाँ रोज़ाना पहुँच रही हैं मगर सरकारी आँकड़ा हिलने को भी तैयार नहीं है । हमें कार में अकेले बैठने पर भी मास्क लगाना है और देश के प्रधानमंत्री-गृहमंत्री को लाखों की भीड़ में भी इसकी कोई ज़रूरत नहीं । सामान्य आदमी शादी में पचास और अंत्येष्टि में बीस से अधिक लोगों को नहीं बुला सकता मगर कुम्भ में लाखों लोगों को भी जाना हो तो कोई पाबंदी नहीं । चुनावी रैलियों के लिये तो पैसे देकर भीड़ जुटाई जा सकती है । जब दस पाँच हज़ार मरीज़ थे तब पत्ता भी खड़कने नहीं दिया और अब ढाई लाख मरीज़ का सरकारी आँकड़ा रोज का  है तो महीनों लम्बे चुनाव कराये जा रहे हैं । अस्पतालों में बेड नहीं , दवा की दुकानों पर ज़रूरी दवा नहीं , आक्सीजन और वेंटिलेटर के लिये वीवीआईपी भी धक्के खा रहे हैं मगर पूरी की पूरी केंद्र सरकार बंगाल में दीदी ओ दीदी का गीत गा रही है । श्मशान घाटों पर लम्बी लम्बी क़तारें हैं और पहली बार वहाँ टोकन बँट रहे हैं मगर सरकार नाम की चिड़िया कहाँ फुर्र है किसी को पता नहीं ।


समझ नहीं आ रहा कि जब अस्पताल बढ़ाने चाहिए थे तब कोई आदमी दाढ़ी बढ़ा रहा था । जब वैक्सींन और रेमडीसिवर हमें मिलनी चाहिये थी तब कोई महात्मा गांधी और नेलसन मंडेला बनने के चक्कर में उसे निर्यात करवा रहा था । जब अस्पतालों के लिये पैसे जुटाने चाहिये थे तब कोई मंदिर के लिये घर घर जाकर रसीद कटवा रहा था । अजब हालात हैं पब्लिक क़ोरोना से लड़ रही है और नेता चुनाव लड़ रहे हैं । बच्चे एग्ज़ाम नहीं दे सकते मगर नेता लाखों की भीड़ वाली रैलियाँ कर सकते हैं । लूट के नये अड्डों अस्पतालों को खुली छूट है । नेता अफ़सर इस डर से चुप हैं कि हमें कुछ हुआ तो यही माई-बाप होंगे । जीएसटी कलेक्शन का आँकड़ा हर महीने बताते हैं मगर प्रधान मंत्री केयर फ़ंड का कुछ पता नहीं । पता नहीं कैसा कोमेडी शो चल रहा है कि पिछले साल जो बंदा रोज़ टीवी पर आकर हमें डराता था इस साल वो ख़ुद ही निडर हुआ घूम रहा है । अजी साहब सही सही बताओ तो .. करना क्या है ?

भारत सरकार मौन क्यों?

 कोरोना की दूसरी लहर पर भारत सरकार मौन क्यों ? / विजय केसरी


देशवासियों को  उम्मीद थी कि 2021 में कोरोना संक्रमण से मुक्ति मिल जाएगी , लेकिन इसके विपरीत स्थितियां उत्पन्न हो गई है।  कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर अति भयावह होती चली जा रही है। जिस तेजी के साथ कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या देशभर में बढ़ती चली जा रही है, बेहद चिंताजनक है । गत वर्ष 22 मार्च को संपूर्ण देश में लॉकडाउन की घोषणा की गई थी । लॉकडाउन की घोषणा के बाद भी कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ती गई थी । विचारणीय यह है कि अगर भारत सरकार द्वारा लॉकडाउन की घोषणा  नहीं की जाती तब देश की स्थिति क्या होती ? सिर्फ स्मरण कर मन सिहर जाता है।

 गत वर्ष कोरोना की स्पीड आज के मुकाबले 25% कम थी। आज कोरोना संक्रमण की गति गत वर्ष की तुलना में 75% अधिक है । फिर भारत सरकार मौन क्यों है ? यह बड़ा अहम सवाल है । आखिर भारत सरकार देश में बढ़ते कोरोना संक्रमितों पर गंभीर क्यों नहीं ? देशभर में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में दिन-ब-दिन इजाफा होता चला जा रहा है । जबकि 2020 में कोरोना के  प्रारंभिक लक्षण आने के बाद ही वायु सेवा बंद कर दी गई थी । लंबी दूरी की ट्रेनें बंद कर दी गई थी । बसों का संचालन बंद कर दिया गया था । एक राज्य से दूसरे राज्य में आने जाने में रोक लगा दी गई थी । सिर्फ जरूरी सामानों के आने-जाने पर रोक नहीं थी । इतनी सख्ति के बाद भी लाखों की संख्या में लोग कोरोना से संक्रमित हुए थे। असंख्य जाने गई थीं।

  आज गत वर्ष के मुकाबले कोरोना संक्रमण की स्पीड ज्यादा है । बीते बीस दिनों में ही संपूर्ण देश कोरोना संक्रमण की चपेट में आ गया है । महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, इंदौर, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश , पंजाब, चंडीगढ़ आदि राज्यों में कोरोना बहुत तेजी के साथ फैलता चला जा रहा है । महाराष्ट्र ,पंजाब और चंडीगढ़ जैसे राज्य कोरोना संक्रमण से बेहाल है । देश के बहुत से राज्यों में नाइट कर्फ्यू लगा दी गई है । मास्क पहनना जरूरी है । दो गज की दूरी जरूरी है । साबुन से हाथ धोने और सेनीटाइजर के इस्तेमाल जैसे  राज्यादेश भी लागू है । इन तमाम उपायों और कोशिशों के बावजूद भी देश के लगभग सभी प्रांतों में कोरोना संक्रमण तेजी से फैलता चला जा रहा है । महाराष्ट्र जैसे प्रांत में एक दिन में पच्चास हजार से अधिक कोरोना संक्रमित मरीज पाए जा गए हैं । प्रतिदिन एक सौ से अधिक जाने जा रही हैं । पंजाब ,चंडीगढ़ , दिल्ली में भी हजारों की संख्या में प्रति दिन मरीज निकल रहे हैं । इन राज्यों की स्थिति यह हो गई है कि कोरोना संक्रमित मरीजों को अस्पताल में दाखिल करने के लिए बेड  कम पड़ रहे हैं । संपूर्ण  देशवासी  त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहे हैं । 

  भारत सरकार कहती है । सबका साथ और सबका विकास । यह कैसा साथ है ? यह कैसा विकास है ? गत वर्ष आज की तुलना में परिस्थिति कमतर  थी । इसके बावजूद भारत सरकार की मुस्तैदी देखते बनती थी । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बार-बार जनता के नाम संदेश देना । जनता को जागरूक करना । देश की जनता कैसे कोरोना संक्रमण से बचें ? भारत सरकार बार-बार जनता को जागरूक कर रही थी । देश की जनता का मनोबल टूटे नहीं, भारत सरकार अपनी बातें पूरी मजबूती के साथ रख रही थी।  देश की 136 करोड़ जनता भारत सरकार के आदेश का पूरी ईमानदारी से पालन किया था ।

आज गत वर्ष के मुकाबले स्थिति ज्यादा गंभीर हैं । फिर माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी मौन क्यों है ? देश की करोड़ों जनता को किसके हवाले छोड़ दिया गया है ? आज वह मुस्तैदी क्यों नहीं है ? आज कोरोना प्रति दिन सैकड़ों की संख्या में जाने जा रही हैं । क्या इंसानों की  जानों की कोई कीमत है ? जिन परिवारों से ये जाने जा रही  हैं ,  उन परिवारों पर क्या बीत रहे होंगे ? इस पर क्या भारत सरकार को विचार करने की फुर्सत नहीं है ?

  लाखों की संख्या में प्रति दिन देश के विभिन्न अस्पतालों में कोरोना संक्रमित मरीज भरती हो रहे हैं । हजारों की संख्या लोगों की जाने जा रही हैं ।  भारत सरकार की मुस्तैदी कहां गुम हो गई है ? यह सवाल मुझे इसलिए करना पड़ रहा है कि भारत सरकार की  2020 के मुकाबले  2021 में कार्रवाई में इतना फर्क क्यों ?  भारत सरकार की इस  चुप्पी के पीछे कौन सी बात छुपी हुई है ?  यह भी देश की जनता को जानना चाहती है ।

   भारत सरकार की मुस्तैदी सिर्फ देश के पांच राज्यों में दिख रही है । चूंकि इन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं।  इन पांच राज्यों में एक के बाद एक जनसभाएं हो रही हैं । इन जनसभाओं में लाखों की संख्या में उक्त राज्यों की जनता  जुट रही हैं ।  सरकार अपनी बातें रख रही हैैं । क्या जनता की जान से भी कीमती चुनाव हो गया है ? मेरी दृष्टि में भारत सरकार का यह कर्तव्य बनता है कि चुनाव के परिणामों को दरकिनार करते हुए देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कोरोना संक्रमण पर बातचीत करनी चाहिए। जैसा कि 2020 में किया गया था । प्रत्येक राज्यों में कोरोना संक्रमित मरीजों की स्थिति क्या है ? इस विषय पर गंभीरता से विचार विमर्श किया जाना चाहिए । कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज कैसा चल रहा है ? इन राज्यों को केंद्र से क्या सहायता की जरूरत है ? भारत सरकार इन राज्यों के लिए क्या कर सकती है ? मेरी दृष्टि में भारत सरकार की पहली प्राथमिकता यही होनी चाहिए ।

    भारत सरकार के सबसे बड़े नेता माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, गृहमंत्री अमित शाह जी एवं अन्य केंद्रीय मंत्री गण सिर्फ चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं । जबकि दिन-ब-दिन कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ती चली जा रही है । यह कैसा सबका साथ है ? यह कैसा सबका विकास है  ? जब मैं यह लेख लिख रहा हूं, देश भर में एक दिन में 168000  कोरोना संक्रमित मरीज  पाए गए हैं। महाराष्ट्र से संपूर्ण लॉकडाउन की खबरें आ रही हैं । देशभर के अखबारों में कोरोना वायरस से संबंधित खबरें प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हो रही हैैं । देश के लगभग सभी टीवी चैनलों में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की खबरें प्रमुखता के साथ दिखाई जा रही हैं । भारत सरकार क्यों अनजान बनी हुई है ? यह बेहद चिंता की बात है । भारत सरकार अपनी पूरी शक्ति  इन पांच राज्यों में चुनाव जीतने में  लगा दी है । मेरी दृष्टि में भारत सरकार का यह चुनावी कदम जनहित में नहीं है। 

    देश के प्रधानमंत्री और  गृहमंत्री जो जनसभाएं कर रहे हैं, लाखों की संख्या में इन जनसभाओं में जनता जुट रही है । आधे से ज्यादे लोग बिना  मास्क के  जुटते हैं ।  भारत सरकार चाहती तो जनसभाओं के  बिना  ही टीवी के माध्यम से अपनी बातों को  रख सकती ।  लेकिन ऐसा नहीं कर भारत सरकार ने एक बड़ी भूल की है।  भारत सरकार को जनता की तकलिफों को प्राथमिकता के आधार पर सबसे पहले देखनी चाहिए।  भारत सरकार का पहला कर्तव्य बनता है कि देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कोरोना के बढ़ते प्रभाव पर बातचीत करनी चाहिए । कोरोना से संक्रमित मरीजों की स्थिति का जायजा लें , जो संभव कदम हो उठाएं ।  संपूर्ण देश  लॉकडाउन  की ओर बढ़ रहा है। 


विजय केसरी

(कथाकार / स्तंभकार)

पंच मंदिर चौक, हजारीबाग -825 301.

मोबाइल नंबर - 92347 99550 .

साथ साथ चले / मनोज कुमार

 यह समय परखने का नहीं, साथ चलने का है  / मनोज कुमार


कोरोना महामारी को लेकर आज जो भयावह स्थिति बनी हुई है, वह किसी के भी अनुमान को झुठला रही है. एक साल पहले कोरोना ने जो तांडव किया था, उससे हम सहम गए थे लेकिन बीच के कुछ समय कोरोना का प्रकोप कम रहने के बाद हम सब लगभग बेफिक्र हो गए. इसके बाद ‘मंगल टीका’ आने के बाद तो जैसे हम लापरवाह हो गए. हमने मान लिया कि टीका लग जाने के बाद हमें संजीवनी मिल गई है और अब कोरोना हम पर बेअसर होगा. पहले टीका लगवाने में आना-कानी और बाद में  टीका लग जाने के बाद मनमानी. यह इस समय का कड़ुवा सच है. सच तो यह भी है कि यह समय किसी को परखने का नहीं है बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम कर साथ चलने का है. लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं. हम व्याकुल हैं, परेशान हैं और हम उस पूरी व्यवस्था को परखने में लगे हुए हैं जिसके हम भी हिस्सेदार हैं. यह मान लेना चाहिए. सोशल मीडिया में व्यवस्था को कोसने का जो स्वांग हम रच रहे हैं, हकीकत में हम खुद को धोखा दे रहे हैं. हम यह जानते हैं कि जिस आक्रामक ढंग से कोरोना का आक्रमण हुआ है, उससे निपटने में सारी मशीनरी फेल हो जाती है. फिर हमें भी इसकी कमान दे दी जाए तो हम भी उसी फेलुअर की कतार में खड़े नजर आएंगे. एक वर्ष पहले जब कोरोना ने हमें निगलना शुरू किया था, तब हमारे भीतर का आध्यात्म जाग गया था. हम र्नििर्वकार हो चले थे. हमें लगने लगा था कि एक-दूसरे की मदद में ही जीवन का सार है लेकिन जैसे-जैसे कोरोना उतार पर आया, वही आपाधापी की जिंदगी शुरू हो गई. एक-दूसरे को पीछे छोडक़र आगे बढऩे की जद्दोजहद शुरू हो गई.

आज जब हालात एक बार फिर बेकाबू हो चला है तब हमारे निशाने पर सरकार और सरकारी तंत्र है. यह स्वाभाविक भी है. दवा, ऑक्सीजन, बिस्तर की कमी बड़े संकट के रूप में हमारे सामने हैं. इसके अभाव में लोग मरने को मजबूर है तो सरकार पर गुस्सा आना गलत नहीं है. सरकार से समाज की अपेक्षा गलत नहीं है लेकिन क्या आलोचना से स्थिति बेहतर हो सकेगी? शायद नहीं. समय-समय पर तर्क और तथ्यों के साथ तंत्र की कमजोरी उजागर करना हमारी जवाबदारी है. ऐसा जब हम करते हैं तो सरकार की आलोचना नहीं होती बल्कि हम सरकार के साथ चलतेे हुए सचेत करते हैं. बिगडैल और बेकाबू तंत्र की कमजोरी सामने आते ही सरकार चौकस हो जाती है. शायद ऐसा करने से समाज में एक तरफ सकरात्मकता का भाव उत्पन्न होता है तो दूसरी तरफ हम एक जिम्मेदार समाज का निर्माण करते हैं. चुनाव में बेधडक़ जमा होती भीड़ के लिए हम सयापा करते रहे लेकिन अपने-अपने घरों से निकल कर कितने लोगों ने भीड़ को वहां जाने से रोका? भीड़ राजनीतिक दलों की ताकत होती है लेकिन इस भीड़ को नियंत्रण करने के लिए हमारी कोशिश क्या रही? कोरोना के आने से लेकर अब तक के बीच में जिस तरह सभा-संगत, प्रदर्शनी और मेले-ठेले सजते रहे, उनका कितनों ने विरोध किया? तब हम सबको लग रहा था कि कोरोना खत्म हो गया है. जीवन अब पटरी पर है और जीवन है तो जीवन में उत्सव भी होना चाहिए. आज हमारे सामने यक्ष प्रश्र यह है कि सरकार ने बीते साल भर में कोई इंतजाम क्यों नहीं किया? बात में दम तो है लेकिन हमने सरकार इस इंताजम को पुख्ता करने के लिए कभी याद दिलाया? आज कोरोना का यह भयावह चेहरा नहीं आता तो सबकुछ ठीक था लेकिन आज सब खराब है. बात खरी है लेकिन चुभेगी.

लगातार ड्यूटी करते पुलिस वाले, नगर निगम के कर्मचारी, डॉक्टर, नर्स और इनके साथ जुड़े लोग पस्त हो चुके हैं लेकिन वे अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद हैं. इसके बाद भी छोटी सी चूक पर हम उनके साथ दो-दो हाथ करने के लिए खड़े हो जाते हैं. निश्चित रूप से काम करते करते कुछेक गलतियां हो सकती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि हम उनके इतने लम्बे समय से किए जा रहे सेवा कार्य को भुला दें. एक डॉक्टर आहत होकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर हो जाता है, यह बात जोर-शोर से उठती है और उठनी भी चाहिए लेकिन इसके बाद इन डॉक्टरों को और मेडिकल स्टॉफ को सुरक्षा मिले, इस पर हम कोई बातचीत नहीं करते हैं? पूरे प्रदेश में दो या तीन पुलिस की ज्यादती की आधा-अधूरा वीडियो वॉयरल होता है और हम मान लेते हैं कि पुलिस अत्याचार कर रही है. कभी इस बात की चिंता की कि पुलिस वाले कितने तकलीफों के बीच अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं. खासतौर पर छोटे पुलिस कर्मचारी. कोरोना के शुरूआती दौर में पुलिस के सहयोग और सेवा कार्य की अनेक खबरें आती रही लेकिन इस बार ये खबरें क्यों गायब है? क्या पुलिस ने सेवा कार्य बंद कर दिया है या जानबूझकर उन्हें अनदेखा किया जा रहा है. कोरोना किसी भी तरह से, कहीं से फैल सकता है लेकिन इस बात की परवाह किए बिना आपकी और हमारी चिंता में नगर निगम के कर्मचारी सेवा कार्य में जुटे हुए हैं. क्या इन सबकी सेवा भावना को आप अनदेखा कर सकते हैं. शायद नहीं.

यह समय हमेशा नहीं रहने वाला है. लेकिन हमने समय रहते अपनी जिम्मेदारी नहीं समझा तो यह दुख हमेशा हमें सालता रहेगा. आप सिर्फ इतना करें कि आप और आपके नातेदार, दोस्तों और परिचय मेें आने वालों को अपने अपने घर पर रोक लें. सडक़ों पर भीड़ कम होगी तो तंत्र पर दबाब कम होगा और दबाव कम होगा तो परिणाम का प्रतिशत बड़ा होगा. क्यों ना हम सोशल मीडिया की ताकत का उपयोग कर लोगों को जागरूक बनाने में करें क्योंकि आलोचना से आपके मन को तसल्ली मिल सकती है लेकिन संकट मुंहबाये खड़ा रहेगा. यह संकट कब और किसके हिस्से में आएगा, कोई नहीं कह सकता. इससे अच्छा है कि संकट को हरने के लिए सोशल मीडिया संकटमोचक बने. कोरोना से बचने के छोटे उपाय मास्क पहनों, हाथ धोएं और आपस में दूरी बनाकर रखें. नमस्ते तो हमारी संस्कृति है. समय को आपकी हमारी जरूरत है. साथ चलिए क्योंकि कमियां गिनाने के लिए खूब वक्त  मिलेगा, पहले हम दुश्मन से दो-दो हाथ कर लें.     

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

दो मई का इंतज़ार / वीरेन्द सेंगर


 दो मई का इंतज़ार करने की जरूरत नहीं है अब ... आप सभी राजनेता जीत चुके है ... क्यूंकि जनता हार चुकी है ...  आपकी जीत के गवाह हैं ये बन्द पड़े बाजार ये लाशों से भरे श्मशान ... जाइए जीत का जश्न मना लीजिए ..  लोकतंत्र में तंत्र का बचा रहना  ज्यादा ज़रूरी है चाहे "लोक" बचे ना बचे ... लाखों की रैलियां कर कर के लोकप्रियता दिखाना ज्यादा जरूरी था चाहे लोग बीमार हो जाएं ... वाकई इस देश में सिर्फ चुनाव जरूरी है ... रैलियां जरूरी है ...  बधाई हो आप सभी एक बार फिर इस जनता को मूर्ख बनाने में सफल हुए .... इसके लिए आप सभी दलों के राजनेताओं को हार्दिक बधाइयां ...


 आप को शायद अंदाजा भी ना हो ... की आप की इस दो मई की चिंता ने ना जाने कितनो की दो जून की रोटी को संकट में डाल दिया है !!! 


और हां  इंसानों की लाशों के ऊपर बिछी इन कुर्सियों पर बैठ कर एक ट्वीट ज़रूर कर दीजियेगा .. दो गज दूरी मास्क है जरूरी !!!

रविवार, 18 अप्रैल 2021

रवि अरोड़ा ली नजर से

 करना क्या है /  रवि अरोड़ा


अभी अभी एक मित्र ने कल्याणी पश्चिम बंगाल में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशाल रैली का एक वीडियो भेजा है । इस चुनावी रैली में अपार भीड़ को देख कर मोदी जी गदगद नज़र आ रहे हैं और मंच से भीड़ को कह रहे हैं कि आपका इतनी बड़ी संख्या में आना मेरे लिये बड़े सौभाग्य की बात है । कोरोना के मामले में पाँचवे स्थान पर पहुँच चुके पश्चिम बंगाल की इस रैली में न प्रधानमंत्री ने मास्क पहन रहा है और न ही हजारों की भीड़ ने । कहना न होगा कि दो गज़ की दूरी वाला प्रधानमंत्री का डायलोग तो उनकी उपस्थिति में भी अर्थहीन दिखाई दे रहा था । सच बताऊँ तो मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आसपास चल क्या रहा है ? क्या यह चार्ली चैपलिन की हास्य फ़िल्म द ग्रेट डिकटेटर अथवा द सर्कस जैसा कुछ है या फिर त्रासदी लेखन के पितामह विलियम शैक्सपियर का नाटक हैमलेट अथवा आथेलो मेरे इर्दगिर्द खेला जा रहा है । आँखों के सामने ऐसी ऐसी भयावह त्रासदी हो रही हैं कि पूरा अस्तित्व डावाँडोल हुआ जा रहा है और कभी कभी इस त्रासदी में विद्रूपताओं का भी ऐसा दीदार हो रहा है कि रुलाई के माहौल में भी हँसी आ घेरती है । पता नहीं हम लोग हमेशा से ही इतने मूर्ख थे या हाल ही के वर्षों में हमे ऐसा बना दिया गया है अथवा मान लिया गया है । जो भी हो अपने पल्ले तो वाक़ई कुछ भी नहीं पड़ रहा । चुपचाप तमाशा देख रहे हैं और मुसीबत यह है कि टिक कर देखा भी नहीं जा रहा ।


कोरोना हर दूसरे घर में दिखाई दे रहा है मगर सरकारी आँकड़ा उतना भी नहीं जितना मेरे मोहल्ले का है । कोरोना प्रोटोकोल से ही कम से कम दस शव रोज़ हिंडन श्मशान घाट पर जलाये जा रहे हैं और सामान्य रूप से भी तीन गुना लाशें यहाँ रोज़ाना पहुँच रही हैं मगर सरकारी आँकड़ा हिलने को भी तैयार नहीं है । हमें कार में अकेले बैठने पर भी मास्क लगाना है और देश के प्रधानमंत्री-गृहमंत्री को लाखों की भीड़ में भी इसकी कोई ज़रूरत नहीं । सामान्य आदमी शादी में पचास और अंत्येष्टि में बीस से अधिक लोगों को नहीं बुला सकता मगर कुम्भ में लाखों लोगों को भी जाना हो तो कोई पाबंदी नहीं । चुनावी रैलियों के लिये तो पैसे देकर भीड़ जुटाई जा सकती है । जब दस पाँच हज़ार मरीज़ थे तब पत्ता भी खड़कने नहीं दिया और अब ढाई लाख मरीज़ का सरकारी आँकड़ा रोज का  है तो महीनों लम्बे चुनाव कराये जा रहे हैं । अस्पतालों में बेड नहीं , दवा की दुकानों पर ज़रूरी दवा नहीं , आक्सीजन और वेंटिलेटर के लिये वीवीआईपी भी धक्के खा रहे हैं मगर पूरी की पूरी केंद्र सरकार बंगाल में दीदी ओ दीदी का गीत गा रही है । श्मशान घाटों पर लम्बी लम्बी क़तारें हैं और पहली बार वहाँ टोकन बँट रहे हैं मगर सरकार नाम की चिड़िया कहाँ फुर्र है किसी को पता नहीं ।


समझ नहीं आ रहा कि जब अस्पताल बढ़ाने चाहिए थे तब कोई आदमी दाढ़ी बढ़ा रहा था । जब वैक्सींन और रेमडीसिवर हमें मिलनी चाहिये थी तब कोई महात्मा गांधी और नेलसन मंडेला बनने के चक्कर में उसे निर्यात करवा रहा था । जब अस्पतालों के लिये पैसे जुटाने चाहिये थे तब कोई मंदिर के लिये घर घर जाकर रसीद कटवा रहा था । अजब हालात हैं पब्लिक क़ोरोना से लड़ रही है और नेता चुनाव लड़ रहे हैं । बच्चे एग्ज़ाम नहीं दे सकते मगर नेता लाखों की भीड़ वाली रैलियाँ कर सकते हैं । लूट के नये अड्डों अस्पतालों को खुली छूट है । नेता अफ़सर इस डर से चुप हैं कि हमें कुछ हुआ तो यही माई-बाप होंगे । जीएसटी कलेक्शन का आँकड़ा हर महीने बताते हैं मगर प्रधान मंत्री केयर फ़ंड का कुछ पता नहीं । पता नहीं कैसा कोमेडी शो चल रहा है कि पिछले साल जो बंदा रोज़ टीवी पर आकर हमें डराता था इस साल वो ख़ुद ही निडर हुआ घूम रहा है । अजी साहब सही सही बताओ तो .. करना क्या है ?

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

कोरोना ka विस्फोट दो लाख की मौत

 भयभीत है भारत, हो गया कोरोना का भारत meविस्फोट, एक दिन में दो लाख से ज्यादा नए केस, इतनी मौतें

कोरोना का दूसरा दौर डरावनी तस्वीर कर रहा पेश …
लगातार सामने आ रहे कोरोना के नए-नए रिकॉर्ड
ध्वस्त हो गए कोरोना के सभी रिकॉर्ड

Corona Blast in India : भारत को अब कोरोना वायरस भयभीत कर रहा है| देश में इसका फैलाव इस कदर शुरू हो गया है कि एक-एक दिन में आने वाले केसों की संख्या देखते ही देखते दो लाख के आंकड़े को छू गई है| पिछले 24 घटों में देश में कोरोना वायरस के दो लाख से ज्यादा नए मामले दर्ज किये गए हैं और हजार से ज्यादा मौतें हुई हैं| मतलब अब भारत में पिछले 24 घंटे में COVID19 के 2,00,739 नए मामले आने के बाद कुल पॉजिटिव मामलों की संख्या 1,40,74,564 पहुंच गई है और 1,038 नई मौतों के बाद कुल मौतों की संख्या 1,73,123 हो गई है।

हालाँकि, कुल पॉजिटिव मामलों की संख्या 1,40,74,564 में इतनी संख्या में लोग 1,24,29,564 लोग कोरोना को मात दे चुके हैं| इसलिए देश में सक्रिय मामलों की कुल संख्या 14,71,877 है| आपको बतादें कि भारत में कल तक कोरोना वायरस के लिए कुल 26,20,03,415 सैंपल टेस्ट किए जा चुके हैं| जिनमें से 13,84,549 सैंपल बीते बुधवार को टेस्ट किए गए|

इससे पहले भी टूटा था रिकॉर्ड केस आये थे सामने ….

इससे पहले भी देश में कोरोना वायरस संक्रमण के एक दिन में सर्वाधिक 1,84,372 नये मामले सामने आए थे और 1,027 लोगों की मौत हुई थी|

इस तरह के दलाल जूता चाटने वाले (?) संपादकों की बाहर करो

 ज़ी न्यूज़ के संवाददाता विनोद मित्तल द्वारा असाइनमेंट हेड को भेजा गया इस्तीफा पढ़ें-

सेवा में,
आदरणीय श्रीमान प्रमोद शर्मा जी,
असाइनमेंट हेड, ज़ी मीडिया
फिल्म सिटी नोएडा

विषय- ज़ी न्यूज़ चैनल से इस्तीफा देने बारे।

महोदय,
श्रीमान जी मैंने ज़ी मीडिया समूह को 1 अप्रैल 2014 को ज्वाइन किया था। इस अंतराल में मेरा यह प्रयास रहा कि संस्थान को अच्छा काम करके दिखाऊं और मेरी वजह से संस्थान का नाम कहीं भी खराब ना हो। हमेशा आप जैसे उच्च अधिकारियों का जो भी आदेश मुझे मिला मैंने उसे पूरा करने का हर संभव प्रयास किया। कल मैं जब आपके पास आया तो मेरे ऊपर वह सभी आरोप लगाए गए जो मुझसे कोसों दूर है। मैंने अपनी पत्रकारिता में किसी से कोई लिफाफा या पैसे नहीं लिए शायद यही कारण है कि आज भी मैं दो पहिया वाहन पर ही घूम कर अपना काम करता हूं।

आदरणीय संपादक श्री दिलीप तिवारी जी ने जो कहा उनमें से कोई भी बात जरा भी सच नहीं है। हां यह सच है कि मेरे जूतों पर पॉलिश नहीं थी, लेकिन मैंने कभी भी किसी को धमकाया नहीं और चैनल के नाम पर कभी कोई दुकानदारी नहीं की। यहां तक की इन 7 सालों में जो भी लोकसभा, विधानसभा या स्थानीय निकाय के चुनाव हुए मैं वहां पर किसी भी प्रत्याशी के पास विज्ञापन और पैसे मांगने के लिए भी नहीं गया। न ही मैंने किसी को यह कह कर धमकाया कि मैं वैश्य समाज से हूं और ऊपर बड़े लोगों को जानता हूं। लेकिन फिर भी मुझ पर इस तरह के कई लांछन आपके सामने लगाए गए।

महोदय, संस्थान मेरे काम से खुश नहीं है तो मुझे कोई अधिकार नहीं है कि मैं ज़ी मीडिया में आगे काम कर सकूं। इसलिए महोदय मैं आपके पास अपना इस्तीफा और चैनल की आईडी प्रेषित कर रहा हूं। अगर इस दौरान मुझसे कोई गलती हुई है तो उसके लिए मैं आपसे बारंबार क्षमा प्रार्थी हूं। आपको मैंने अपने पिता का दर्जा दिया है इसलिए आपसे स्पेशल माफी मांग रहा हूं। आपका आशीर्वाद मेरे ऊपर बना रहे और मैं किसी दूसरे संस्थान में काम करूं इसी कामना के साथ आपको प्रणाम करता हूं।

चैनल की आईडी में आपको कोरियर कर रहा हूं। फिर कभी यदि मुझे दोबारा मौका मिला तो मैं आपके सानिध्य में और अच्छा काम करके दिखाऊंगा।

आपका
विनोद मित्तल
9871496644