गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

नाकाबंदी में यूपी के हाटस्पाट इलाके


प्रस्तुति -  राजेश सिन्हा / आकांक्षा गुप्ता

*आगरा
आठ मस्जिदों सहित 22 इलाके बने हॉट स्पॉट।झारखंड
आजमपाड़ा, मंटोला, मगतई, हींग की मंडी सील।
तोपखाना, वजीरपुरा, घटिया, साबुन कटारा सील।
सीतनानगर, मोहरपुरा, इमिनेंट अपार्ट, कृष्णा विहार बंद।
सार्थक हॉस्पिटल, एसआर हॉस्पिटल क्षेत्र प्रतिबंधित।
सीतानगर, चारसू गेट सील।
किशोरपुरा, छोगरा तेहरा, सुभाषनगर बंद।
हसनपुर, घटिया, बसंत विहार सील।

*गाजियाबाद*


1. नंद ग्राम निकट मस्जिद थाना क्षेत्र सिहानी गेट
2. केडीपी ग्राउंड सवाना राजनगर एक्सटेंशन थाना क्षेत्र सिहानी गेट
3. B-77/ जी-5 शालीमार गार्डन extension-2 थाना क्षेत्र साहिबाबाद
4. पसोंडा थाना क्षेत्र टीला मोड़
5. ऑक्सी होम भोपुरा थाना क्षेत्र टीला मोड़
6. वसुंधरा सेक्टर 2-बी थाना क्षेत्र इंदिरापुरम
7. सेक्टर-06 वैशाली थाना क्षेत्र इंदिरापुरम
8.गिरनार सोसायटी कौशांबी थाना क्षेत्र कौशांबी
9. नाईपुरा लोनी
10. मसूरी
11. खाटू श्याम कॉलोनी दुहाई
12. कोविड-1 सीएचसी मुरादनगर
13. सेवियर सोसायटी मोहन नगर थाना क्षेत्र साहिबाबाद

*लखनऊ*


कैंट थाना क्षेत्र में अलीजान मस्जिद के आसपास का क्षेत्र सील-
वजीरगंज थाना क्षेत्र में मोहम्मदी मस्जिद के आसपास का क्षेत्र सील-
कैसरबाग थाना क्षेत्र में फूल बाग मस्जिद के आसपास का इलाका सील-
कैसरबाग थाना क्षेत्र में नजर बाग मस्जिद के आसपास का इलाका सील-
सहादत गंज थाना क्षेत्र में मोहम्मदिया मस्जिद के आसपास का इलाका सील-
तालकटोरा थाना क्षेत्र में पीर मक्का मस्जिद के आसपास का क्षेत्र सील-
हसनगंज थाना क्षेत्र में त्रिवेणी नगर में खजूर वाली मस्जिद के आसपास का इलाका सील-
गुडंबा थाना क्षेत्र में रजौली मस्जिद के आसपास का क्षेत्र सील-

लखनऊ के 8 बड़े हॉटस्पॉट के साथ 4 छोटे हॉटस्पॉट क्षेत्रों को भी सील किया गया
गोमती नगर थाना क्षेत्र में विजय खंड इलाका आंशिक तौर पर-
इंदिरानगर थाना क्षेत्र में मेट्रो स्टेशन, मुंशी पुलिया का आंशिक क्षेत्र-
खुर्रमनगर थाना क्षेत्र में अलीना एनक्लेव का आंशिक क्षेत्र-
मड़ियाव थाना क्षेत्र में आईआईएम पावर हाउस के पास का आंशिक क्षेत्र-

*नोएडा*


1-सेक्टर 41 नोएड़ा
2-हाईड पार्क सेक्टर 78, केप टाउन सेक्टर 74
3-लोटस ब्लू वर्ड सेक्टर 100
4 -अल्फा  1 ग्रेटर नोएडा
5 -निराला ग्रीन शायर सेक्टर 2 ,पतवाड़ी गांव
6- पारस टेरा सोसाइटी ,लोगिज बलुसम काउंटी ,वाजिदपुर गांव सेक्टर 137
7- एटीएस डॉल्स ज़ीटा 1 ग्रेटर नोएडा
8- एस गोल्फ सायर सेक्टर 150
9 -सेक्टर 27 और सेक्टर 28
10-ओमिक्रोन 3 सेक्टर 3 ग्रेटर नोएडा
11-मेहक रेजीडेंसी अच्छेजा
12 -जेपी विश टाउन 128
13-सेक्टर 44
14-ग्राम विश्नोई
15-सेक्टर 37
16-गांव घोड़ी बछेड़ा
17-स्टेलर एमआई ओमिक्रोन 3
18 -पाल्म ओलंपिया गौर सिटी 2 नोएड़ा वेस्ट सेक्टर 16
19-सेक्टर 22 चौड़ा गांव
20 -ग्रांड ओमेक्स सेक्टर 93 b
21-सेक्टर 5 और सेक्टर 8 जेजे कालोनी
22-डिजाइनर पार्क सेक्टर 62

*कानपुर नगर*

इन थाना क्षेत्र में है हॉट स्पॉट ।।
चमनगंज
अनवरगंज
कर्नलगंज
नौबस्ता
घाटमपुर
सजेती
बाबूपुरवा

*मेरठ*

शास्त्री नगर सेक्टर 13, थाना नौचंदी
सराय बहलीम सोहराब गेट थाना कोतवाली
हुमायु नगर थाना खरखोदा, व लिसाड़ी गेट
हरनाम दास रोड थाना सिविल लाइन
सूर्या नगर  थाना सिविल लाइन
आज़ाद नगर कॉलोनी थाना सरधना
ग्राम महेलका थाना फलावदा
मोहल्ला कल्याण सिंह थाना मवाना
मोहल्ला मुन्ना लाल थाना मवाना
AS डिग्री कॉलेज (मोहल्ला बड़ा महादेव) थाना मवाना
कस्बा खिवाई थाना सरूरपुर

*वाराणसी*


वाराणसी में सीलिंग प्रक्रिया को लेकर जिलाधिकारी का बयान
वाराणसी में 4 स्थानों को बनाया गया है पहले से हॉटस्पॉट
गंगापुर , लोहता ,मदनपुरा और बजरडीहा में रहेगा हॉटस्पॉट
वाराणसी में पहले जो प्रक्रिया चलती आ रही है वही रहेगा
जिन स्थानों पर नए मरीज मिलेंगे उन्हें सील किया जाएगा
हॉटस्पॉट इलाको में सीलिंग की तारीख बढाया गया है
30 अप्रैल तक हॉटस्पॉट एरिया में रहेगी सीलिंग

*सहारनपुर*

4 जगहों को बनाया गया है हॉट स्पॉट।
सहारनपुर थाना कुतुबशेर का मौहल्ला बकरीवाला, ढोलिखाल, जनकपुरी का महीपुरा और थाना चिलकाना का गांव दुमझेड़ा।

*महराजगंज*

दो थाना छेत्रो के 4 गाँव हुए सील
पुरंदरपुर और कोल्हुई थाना के चार गाव सील
पुरंदरपुर थाना के विशुनपुर  कुर्थीया,विशुनपुर फुलवरिया सील
कोल्हुई थाना के बड़हरा इंद्रदत्त, कम्हरिया बुजुर्ग गाँव हुआ सील
डीएम एसपी ने पहले ही किया था इन गावो को सील
आने जाने पर पूर्णतया प्रतिबंध
होम डिलीवरी से होगी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति

*बुलंदशहर*

बुलंदशहर सदर,
सिकंदराबाद
जहाँगीराबाद कोतवाली

*बस्ती*

बस्ती शहर में तीन चिन्हित हॉट स्पॉट
रहमतगंज, तुर्कहिया और गिदही खुर्द
तीनों स्पॉट शहर के अंदर
रहमतगंज और तुर्कहिया आपस में मिला हुआ मुहल्ला
रेड ज़ोन में सभी के आवागमन पूर्ण रूप प्रतिबंधित

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

गुलजारी लाल नंदा के साथ कुछ पल दो पल /अनामी शरण बबल


 गुलजारी लाल नंदा को अब याद करने का मतलब / अनामी शरण बबल




आजाद भारत के दूसरे गृहमंत्री और दो दो बार  कार्यवाहक प्रधानमंत्री रह चुके गांधीवादी नेता गुलजारी लाल नंदा को याद करने का आज क्या मतलब है? सजग हमेशा सक्रिय ईमानदार कई  संगठनों के जन्मदाता, दर्जनों किताबों के लेखक भारत रत्न से नवाजे गये कालजयी नेता  गुलजारी लाल नंदा को आज याद करने का कोई मतलब नहीं होने के बाद भी  नंदा के होने के कई मतलब होते हैं।

आज से 22 साल पहले भारत रत्न से सुशोभित होने वाले श्री नंदा नै जीवन का शतक पूरा करके अंतिम सांस ली थी। यानी वे आज 120 साल के होते। तो आज जब ज्यादातर लोग अपने जीते हुए ही अपनी पहचान खो देते हैं। उसी आधुनिक समाज में 121 साल के किसी रंगहीन गंधहीन सीधे साधे सरल सहज सबों के लिए सुलभ ईमानदार नेता मंत्री को अब क्यों याद किया जाए? मगर जमाना कितना भी बन जाए, मगर नंदा जैसे नेता न कभी अप्रासंगिक होते हैं और ना ही अपना महत्व खोते हैं। यही उनकी सादगी सज्जनता सरलता की ताकत  है कि उनकी यादें मंद हो जाने के बाद भी नंदा सरीखे महामानव के उपर कुछ लिखने के लालच से  आज बीस साल के बाद भी अपने आपको रोक नहीं पा रहा हूं।



मुमकिन है कि आज के ज्यादातर लोग शायद नंदा जी के बारे मे अपनी अनभिज्ञता ही प्रकट करे। तो मै भी यह साफ कर दूं कि नंदा जी को लेकर मेरे मन में भी कोई बडा आदर भाव या जानकारियां का भंडार नहीं था। मगर जब कभी भी भारत के प्रधानमंत्रियों की सूचना पर नजर जाती एक पल के लिए मेरा मन ठहर जाता। मैं इनके बारे में जानने को उत्कंठित हो जाता कि इतना वरिष्ठ और काबिल होने के बाद भी नंदा पीएम क्यों नहीं सन सके?। यही उत्कंठा मुझे नंदा जी के साथ बांध रखा था। जब अगस्त 1996 में मुझे सपरिवार अपने छोटे भाई आत्म स्वरुप के पास अहमदाबाद जाने का मौका मिला। अहमदाबाद की यह मेरी पहली यात्रा थी। मैं काफी उत्साहित भी था। नंदा जी का पता तो नहीं मिला, मगर आवश्यक जानकारियों का पुलिंदा मेरे पास था। अहमदाबाद में उस समय मेरा छोटा भाई स्वामी शरण गुजरात के उस समय इकलौते हिंदी अखबार विराट वैभव में बतौर उपसंपादक काम करता था। पटना के मेरे सबसे घनिष्ठ पत्रकार संपादक रहे शर्मान्जु किशोर उस समय विराट वैभव के संपादक थे।

 अहमदाबाद में पहुंचते ही मैं अगले दिन विराट वैभव में जाकर उनसे मिला। पटना में करीब चार साल 1983-87 जून तक। जीवंत संपर्क में रहने के बाद भी कभी मुलाकात नहीं हुई थी। मेरी पत्रकारिता के विकास और उत्थान में इनकी कितनी बडी और निस्वार्थ भूमिका रही है इस  संदर्भ को विश्लेषित करने के लिए एक लेख लिखना मेरे लिए अनिवार्य है। हालांकि लेख पढकर बहुतों की भुकृटियां तन जाएगी। लोग नापसंद भी करेंगे, मगर हर आदमी हर किसी के लिए एकसमान सरल सरस सहज और अच्छा नहीं हो सकता और खासकर जब  इनके निधन के लगभग डेढ़ दशक बीत जाने पर तो उनपर लिखना और जरूरी भी हो जाता है कि कैसे और किस तरह उन्होंने मुझे पत्रकारिता का ककहरा बताया और सीखाया था।

हां तो विराट वैभव के दफ्तर से नंदा जी की बेटी डॉ. प्रतिभा पाटिल के घर यानी नौरंगपुरा के हिंदू कालोनी का पता मिल गया। जब मैं शर्मान्जु किशोर से विदा होने लगा तब उन्होंने बताया कि गुजरात भाजपा में भयानक भीतरघात उफान पर है। तुम गांधीनगर आने का पक्का कार्यक्रम और डेट बताओगे तो मैं पायनियर के ब्यूरो चीफ आर के मिश्र से टाईम तय कराके सीएम सुरेश मेहता और भाजपा के खंभा उखाड़ पोलिटिक्स कर रहे शंकर सिंह वाघेला से तेरी बातचीत  पक्कर करवाता हूं।  शर्मान्जु जी के इतने ग्लैमरस आफर पर मेरा मन खिल उठा। पर फिलहाल कल नंदा जी से श्री गणेश कर आगे की योजना तय करने का मन बनाया।



अगले दिन सुबह सुबह बिना फोन फान किए ही मैं अपने भाई के साथ नौरंगपुरा के हिंदू कालोनी में था। उस समय सुबह के लगभग नौ बज रहे थे तो मुझे लगा कि मैं कुछ पहले ही आ गया हूं। आटो से उतरकर डॉ. प्रतिभा पाटिल के घर की खोज करना उचित प्रतीत हुआ। और विभिन्न सडकों गलियों में भटकते हुए नंदा जी और डॉ. पाटिल की टोह ली। मुझे यह जानकर विस्मय हुआ कि ज्यादातर लोगों ने दोनों के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की। अलबत्ता कुछेक ने बताया कि अगली सडक पर कोई वीआईपी फेमिली है जहां पर अक्सर गवर्नर सीएम या दिल्ली से आने वाले मिनिस्टर आते-जाते रहते हैं। मैं अपनी मंजिल के काफी करीब था। करीब दस बज चुके थे, लिहाजा मिडल क्लास संभ्रांत कॉलोनी में खोजबीन बंद कर एक चाय की दुकान से सही-सही पता लेकर मैं आजाद भारत के दूसरे गृहमंत्री और दो दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे गुलजारी लाल नंदा के निवास के बाहर कॉलबेल बजा रहा था। अपने साधारण से घर के बरामदे में बैठीं कोई 74-75 साल की एक महिला दरवाजे के करीब आयी। नमस्कार करके मैंने बंद दरवाजे के बाहर से ही अपना विजिटिंग कार्ड आगे करते-करते हुए कहा कि मैं अनामी शरण बबल पत्रकार दिल्ली से आया हूँ। आपके  घर का फोन नंबर मेरे पास नहीं था इस कारण बिना बताए समय लिए ही आ गया कि जब अहमदाबाद में हूँ तो नंदा जी के दर्शन के बगैर लौटने का मन नहीं किया मेरे परिचय प्रवचन का महिला पर अच्छा प्रभाव पड़ा। मेरे कार्ड को लेकर सीधे गेट खोलती हुई पूछी आपको यहां तक आने में तो कोई दिक्कत नहीं हुई अनामी। उनके मुंह से अपना नाम सुनकर बहुत भला लगा। अपना परिचय देती हुई वे बोली  मैं नंदा जी की बेटी डॉ. प्रतिभा पाटिल हूं। उनकी सहजता सरलता सरसता और आत्मीय माधुर्य को देखते हुए हम दोनों भाईयों ने बारी बारी से पैर छूकर प्रणाम किया। वे लगभग भाव विभोर सी हो उठी। मेरे हाथों को पकड़ कर वे बोली चरण स्पर्श करनेवाले किसी पत्रकार को मैं पहली बार देख रही हूं। फौरन पलटते ही मैंने कहा कि मैं भी सबका पैर नहीं छूता दीदी मगर कहां पर खड़ा हूं काल पात्र पद गरिमा और छवि को तो देखना पड़ता है। मैं देश के एक अनमोल रत्न को देखने-सुनने आ रहा हूं जहां पर पत्रकार का अभिमान करना बेमानी होगा। मेरी बातें सुनकर वे खिलखिला उठी और उनकी नजर मेरे भाई की तरफ गयी। मैंने तुरंत उसका परिचय देते हुए कहा कि यह मेरा अपना सगा छोटा भाई स्वामी शरण है और अहमदाबाद से हिंदी के इकलौते अखबार विराट वैभव  में उपसंपादक है। मैनें अपनी जेब से उसके कार्ड को निकाल कर आगे कर दिया। उसके कार्ड को लेकर देखा। उन्होंने जिज्ञासा प्रकट की कि स्वामी जी एकदम खामोश हैं इस पर मैं खिलखिला पडा़। अरे दीदी बस मेरे सम्मान में यह खामोश है अन्यथा बातचीत में वो मुझसे भी स्मार्ट है। तो इस तरह पांच मिनट के भीतर ही हमलोग पूरी तरह स्नेहिल माहौल में बातचीत करने लगे। मैने अब नंदा जी से मिलने का आग्रह किया तो वे फौरन हमलोग को लेकर अंदर चलने को तत्पर हो गयी।



और इस तरह जब मैं कमरे में दाखिल हुआ तो एकदम कमजोर काया के अत्यंत दुर्बल नंदा जी अचेतावस्था में बिस्तर पर सो रहे थे। डॉ. प्रतिभा ने बताया कि बाबूजी अमूमन सोए ही रहते हैं। इनकी देखभाल और देखरेख के लिए चार सहायक हैं। दो सहायता तो दिनरात यहीं पर रहते हैं, जबकि दो सहायक चार पांच  घंटे के लिए सुबह शाम आते हैं। पंडित हजारीलाल शर्मा सुबह शाम आकर भजन कीर्तन सुनाते हैं। जबकि देखभाल आदि के लिए हजारी चंद ठाकुर भंवरलाल नायक चिमन भाई चावला और कनुभाई के सहारे ही नंदा जी का सारा नित्य कर्म जीवन संपादित होता था। नंदा जी कितना समझ बूझ पाते थे यह तो नहीं कहा जा सकता था मगर सुबह-सुबह अखबारों की हेडिंग सुनते जबकि शाम को दूरदर्शन पर समाचार देखकर बताया जाता था। डा. प्रतिभा को सरकार द्वारा इनकी उपेक्षा का मलाल के साथ क्षोभ  भी था। 1980 तक नंदा जी दिल्ली के हरियाणा भवन में रहते थे। मगर गिरने से पैरों की हड्डी टूट गई। कोई सरकारी आवास नहीं होने के कारण लाचारगी में नंदा जी को  अपनी बेटी प्रतिभा पाटिल के साथ साथ रहने के लिए  अहमदाबाद लौटने पर विवश होना पड़ा। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री पीवी  नरसिम्हा राव को पत्र लिखकर अपना इलाज कराने की गुहार की. मगर प्रधानमंत्री राव की तरफ से कोई जवाब तक नहीं आया। अलबत्ता प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा द्वारा इलाज पेंशन सहायकों की सरकारी खर्चे पर व्यवस्था करा दी गयी। निरंतर जांच की व्यवस्था भी हुई। सरकार विदेश में भी इलाज के लिए सहमत थी मगर दुर्बलता के कारण डॉ. "बेटी ने इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दी।



करीब एक दर्जन किताबों के लेखक नंदा जी ने ही मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए इंटक का गठन कराया। भारत साधू समाज संगठन समाज हितकारी संगठनों की नींद रखी। पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद कार्य वाहक प्रधानमंत्री नियुक्त किए गये। इसके बावजूद कभी पीएम बनने की लालसा मन में नहीं जागी। जीवनभर सादगी और ईमानदारी के लिए विख्यात नंदा जी को भारत रत्न नहीं दिए जाने का मलाल पूरे परिवार को है।

करीब दो घंटे तक की गयी ढेरों यादों और दो दो बार चाय बिस्कुट के स्वागत परांत मै अपने बैग को संभालने लगा। दरवाजे तक आयी डॉ प्रतिभा का मन रखने के लिए मैनें कहा कि देखिएगा दीदी जिस दिन नंदा जी को भारत रत्न मिलेगा तो उस दिन मैं स्पेशली आपसे मिलकर खुशियों बांटने अहमदाबाद में  साथ-साथ रहूंगा। मेरी बात सुनकर वे खिलखिला पड़ी। क्या तुमको विश्वास है? मैनें तुरंत कहा कि यदि शंकर दयाल शर्मा जैसे समकालीन और नंदा जी को बहुत करीब से देखने और जानने वाला आदमी यदि राष्ट्रपति होकर भी भारत रत्न का सम्मान नहीं देंगे तो फिर भविष्य में भारत रत्न की उम्मीद बेमानी है। मेरी बातें सुनकर उनकी आंखे सजल हो गयी। इस तरह हास्य परिहास के बीच नंदा जी के सहायकों से भी हाथ मिलाकर मैं वहां से विदा हो गया।




 दिल्ली आकर नंदा जी की खबर सहित अहमदाबाद से लौटकर मेरी कोई चार पांच खबरें प्रकाशित हुई। फोन करके डॉ. प्रतिभा पाटिल को बताया और उनके आग्रह पर सहारा की कुछ प्रतियां भिजवा दी गयी। दिल्ली आकर भी मैं कुछेक दिनों में नंदा जी के हालचाल के साथ साथ अपनी मां से बडी़ उम्र की बहिन का भी हाल खबर ले लेता था। मैनें भले ही उनका मन रखने के लिए भारत रत्न मिलने की भविष्यवाणी कर दी हो पर हम सबको इसको लेकर अविश्वास ही था।

तभी अचानक मुझे कुछ बहुत जरूरी काम से अगले साल यानी 1997 के जुलाई माह के आखिरी सप्ताह में अहमदाबाद जाना पडा। गांधीनगर में फंसे रहने के चलते किसी से भी मिलने का समय नहीं निकाल सका। 25 जुलाई को शाम मे ट्रेन थी। 24 जुलाई को देर  रात तक सारा काम निपटाने के बाद भाई के साथ घर लौटा। अगले दिन यानी 25 जुलाई के पेपर में सुबह सुबह देखा कि नंदा को भारत रत्न मिल गया है राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने अपने पंचवर्षीय कार्यकाल के आखिरी दिन 24जुलाई 1997 को अरुणा आसफ अली और गुलजारी लाल नंदा को भारत रत्न प्रदान करने के आदेश पर हस्ताक्षर करके इस सर्वोच्च सम्मान की घोषणा को सार्वजनिक कर दी। पेपर देखते ही मैं उछल पडा और डॉ. पाटिल की खुशी में शामिल होने के लिए निकल गया।

 अपने घर के बाहर मुझे खड़ा देखकर डॉ. पाटिल अचंभित  सी हो गयी। भावविभोर होकर मेरा सत्कार की।  सजल नेत्रों से मुझे लेकर अंदर गमी और सबसे मेरा बतौर पत्रकार परिचय कराया
अमरीका में रह रही बेटी अभिलाषा और दामाद रश्मि भी मारे खुशी के फोन से पूरा-पूरा हाल लेने में तल्लीन थे। डा. पाटिल के पुत्र अलंकार नायक और बहू गीता नायक के चेहरे दमक रहे थे। बहू गीता अपने इस सौभाग्य पर नाज कर रही थी कि वे इस परिवार की बहू हैं। डा. पाटिल ने बताया कि कल से  सैकड़ों लोग आ चुके हैं और आज शाम तक कोई मुंबई से कोई चेन्नई कोलकाता दिल्ली या पटना लखनऊ से केवल शुभकामनाएं और मंगलमय बधाइयां देने के लिए आ रहे हैं। घर के चारो तरफ गुलदस्ते ही गुलदस्ते पडे थे। ओर इन्हीं फूलों के बीच 99 साल के नंदा जी के सहायक किसी तरह आरामकुर्सी पर सचेत सचेतन सचेतावस्था मे बैठा रखा था। इस भीड़ से अचंभित नंदा जी का चेहरा भी प्रफुल्लित था। नंदा जी के दोनों बेटे भी अपनी खुशी संभाल नहीं पा रहे थे। वही गेट के बाहर बैठे खुफिया अधिकारी भवानी गौड़ भी कल से इस घर के बाहर भीतर की हलचल में व्यस्त थे। बकौल भवानी
अमूमन यह घर शांत ही रहता था मगर कल से वीआईपी के आने-जाने का तांता लगा हुआ है।

आसपास के लोगों को भी काफी खुशी है। बहुतों को तो यह विस्मय हो रहा है कि उनके घर के बगल में इतनी बड़ी हस्ती सालों-साल से रह रहा है और इसकी भनक तक नहीं थी। घर के इर्द-गिर्द घूमती घाम और हाल का जायजा लेने के बाद मैंने रूस्तम होना ही बेहतर माना डा. प्रतिभा से मिला तो वे इन व्यस्तताओं के बाद भी मुझे मिठाई दी और मिठाई काएक डिब्बा देने लगी। मेरे तमाम विरोध के बाद भी वे बार बार बोलती रही कि इस मिठाई और सम्मान पर तुम्हारा भी अधिकार है। तुमने न केवल इस सम्मान की घोषणा की बल्कि इस अवसर पर यहां आकर  तुमने मेरी खुशी को बढा दिए। बकौल डा. प्रतिभा कल जब बाबूजी को इस सम्मान की घोषणा हुई तो मुझे तुम याद आए, मगर तुम इतनी जल्दी मेरे सामने खड़े रहोगे यह तो अकल्पनीय है। मेरे सिर पर हाथ फेरती वै गदगद हो उठी और मैं  भावुक।

अलबत्ता एचडी देवेगौड़ा को पूरा देश भले ही एक एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री मानता रहा हो मगर डा. प्रतिभा देवेगौड़ा को सबसे संवेदनशील और अपने देश के बुजुर्ग नेताओं के सच्चे हितैषी और अपना परिजन मानने वाला नेता की तरह देखती हैं। इस भावविभोर माहौल में सबों को नमस्कार करते हुए बाहर निकला। उनके बेटे ने अपनी कार से कॉलोनी के बाहर आटो स्टैंड तक छोड़ दिया। जहां से मैं अपने भाई के घर पहुंचा। शाम की ट्रेन से वापस दिल्ली आया। और दफ्तर में जाकर रिपोर्ट लिखी। जिसकी धूम रही। और इस तरह देश के एक महान स्वतंत्रता सेनानी और नेता से दो दो बार मिलने का मौका मिला या केवल देखने- का यह अहसास आज भी रोमांचित करता है। अलबत्ता 1998 मे नंदा जी के देहावसान के बाद तक तो मैं प्रतिभा नायक के संपर्क में रहा, मगर आज बीस साल के बाद वे या उनके परिवार में कौन है कहां है? इसकी जानकारी नहीं। इस बीच पिछले ही साल अहमदाबाद तीन बार गया मगर नंदा या नायक परिवार की न कोई खबर ले पाया न मिलकर हालचाल ही लिया। डा. प्रतिभा नायक दीदी अगर जीवित होंगी तो उनकी आयु भी कोई 93-94 साल की होगी। इस उम्र में उनको बेहतर सेहत की शुभकामनाएं दूं या.... दिवंगत दीदी के प्रति श्रध्दांजलि अर्पित करें। यह एक जटिल सवाल है। सबसे बेहतर है सबको सलाम नमस्कार के साथ अब भावनाओं की रेल को रोककर बस किया जाए। नंदा जी को विनम्र श्रद्धांजलि और नमन प्रणाम श्रद्धा सुमन अर्पित है।     -_

--   /    अनामी शरण बबल /13082018
8076124377 

उल्टा-पुल्टा अलग अलग अर्थ और किताब





प्रस्तुति - अनामी शरण बबल

क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े
तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे।

जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है।

इस ग्रन्थ को
‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे
पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और
विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक।

पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।"

उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

अर्थातः
मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो
जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।

विलोमम्:

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

अर्थातः
मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के
चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ
विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।

 " राघवयादवीयम" के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-

राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

विलोमम्:
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।
पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥

विलोमम्:
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।
राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥

कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।
सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥

विलोमम्:
भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।
कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥

रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।
नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥

विलोमम्:
यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।
तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥

यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥

विलोमम्:
तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।
सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥

मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।
काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥

विलोमम्:
तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।
तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥

रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।
कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥

विलोमम्:
मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।
तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥

सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।
साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥

विलोमम्:
हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।
यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥

सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।
सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥

विलोमम्:
सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।
यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥

तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।
यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥

विलोमम्:
हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।
सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।
भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥

विलोमम्:
सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।
होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥

यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।
सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥

विलोमम्:
भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।
वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥

रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।
यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥

विलोमम्:
नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।
हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥

यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।
सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥

विलोमम्:
यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।
गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥

दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।
ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥

विलोमम्:
नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥

सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।
तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥

विलोमम्:
हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।
जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥

सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।
न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७ विलोमम्:
तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।
सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥

तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।
वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥

विलोमम्:
केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।
ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥

गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।
सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥

विलोमम्:
हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।
यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥

हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।
राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥

विलोमम्:
घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।
धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥

ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।

हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि  ॥ २१॥

विलोमम्:
विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।
ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥

भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।
चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥

विलोमम्:
ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।
हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥

हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।
तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥

विलोमम्:
योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।
जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥

भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।
तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥

विलोमम्:
विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।
तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥

हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।
राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥

विलोमम्:
यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।
निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥

सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।
तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥

विलोमम्:
जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।
हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥

वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।
तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥

विलोमम्
नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।
सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥

हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।
चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥

विलोमम्
हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।
सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥

नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।
रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥

विलोमम्:
नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।
कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥

साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥
निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥

विलोमम्:
भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।स
गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥

॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री  ।।

कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें।

प्रकाश मनु से अनामी शरण बबल की बातचीत।



 विख्यात साहित्यकार प्रकाश मनु से बाल साहित्य के इतिहास लेखन के विभिन्न पहलुओं और लेखन तैयारी की पूरी रचनात्मक प्रक्रिया पर पत्रकार अनामी शरण बबल ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश -


बाल साहित्य का इतिहास आज समूचे हिंदी संसार की धरोहर बन चुका है...!

वरिष्ठ साहित्यकार और बाल साहित्य के इतिहास के लेखक प्रकाश मनु से अनामीशरण बबल की बातचीत
*
अनामीशरण बबल – मनु जी, आप बाल साहित्य के जाने-माने हस्ताक्षर हैं। कृपया बताएँ कि आप बाल साहित्य को किस तरह परिभाषित करेंगे?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, एकदम सीधे-सादे शब्दों में कहना हो तो बाल साहित्य का मतलब है बच्चों का साहित्य—बच्चों का अपना साहित्य, जिसे पढ़कर वे आनंदित हों, उसके साथ नाचें, झूमें-गाएँ और खेल-खेल में जीवन के महत्त्वपूर्ण पाठ भी सीख लें। यों यह बाल साहित्य ही है, जिसके जरिए किसी बच्चे का संपूर्ण और संतुलित विकास होता है, इसी के जरिए उसे जरूरी मानसिक खुराक मिलती है, और प्रेम, सहानुभूति, परदुखकातरता जैसे बुनियादी संस्कार भी, जो हर पल उसके साथ रहते हैं...उसे सही राह दिखाते हैं और कभी भटकने नहीं देते। बरसों पहले मैं पुरानी पीढ़ी के एक बड़े बाल साहित्यकार कन्हैयालाल मत्त जी से मिला था। बातों-बातों में मैंने उनसे पूछा कि मत्त जी, आपके खयाल से कोई अच्छी बाल कविता कैसी होनी चाहिए? सुनकर उन्होंने जवाब दिया था कि मनु जी, मैं तो उसी को अच्छी बाल कविता मानता हूँ जिसे पढ़ या सुनकर बच्चों के हदय की कली खिल जाए। मैं समझता हूँ, यह केवल अच्छी बाल कविता ही नहीं, समूचे बाल साहित्य की भी कसौटी है। कोई अच्छी कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक—यहाँ तक कि जीवनी और ज्ञान-विज्ञान साहित्य भी जब तक इस तरह न लिखा जाएगा कि वह बच्चों को आनंदित करे, तब तक वे उसे पढ़ने के लिए उत्साहित न होंगे, भले ही आपने उसमें कितने ही अच्छे-अच्छे विचार क्यों न जड़ दिए हों। बच्चे अपने लिए लिखी रचनों से आनंदित हों, यह पहली शर्त है। हाँ, पर इससे यह भी न समझ लेना चाहे कि बाल साहित्य केवल बच्चों के मनोरंजन के लिए है। बच्चे अपने लिए लिखी रचनाओं से आनंदित होंगे तो वे खेल-खेल में जीवन के बहुत से जरूरी पाठ भी सीख लेंगे। यही अच्छे बाल साहित्य का उद्देश्य भी है।
अनामीशरण – मनु जी, कृपया बताएँ कि बाल साहित्य क्या है और उसमें किन-किन विधाओं में प्रचुरता से लिखा गया है?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, बाल साहित्य क्या है, इसका जवाब तो मैंने अभी-अभी दिया ही है। आम तौर से बड़ों के साहित्य में जो विधाएँ हैं, वे सभी बाल साहित्य में भी आपको नजर आएँगी। बाल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, ज्ञान-विज्ञान साहित्य सबमें काफी काम हुआ है। हालाँकि संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत वगैरह में जितना काम होना चाहिए था, उतना नहीं हुआ। ऐसे ही कछ और विधाएँ हैं, जिनमें काम करने के लिए पूरा मैदान खाली है।
अनामीशरण - बाल साहित्य और इसकी सतत प्रवहमान धाराओं में आपको ऐसा क्या प्रतीत हुआ कि आपको लगा, बाल साहित्य का भी इतिहास लिखा जाना चाहिए?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, मोटे तौर से बीसवीं शताब्दी का प्रारंभिक काल ही बाल साहित्य के प्रारंभ का समय भी है। तब से कोई सौ-सवा सौ बरसों में बाल साहित्य की हर विधा में बहुत काम हुआ है। बाल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, बाल जीवनी और ज्ञान-विज्ञान साहित्य—सबमें बहुत साहित्य लिखा गया है और उनमें कुछ कृतियाँ तो इतनी उत्कृष्ट और असाधारण हैं कि चकित रह जाना पड़ता है। बाल साहित्य के इतिहास की भूमिका में मैंने लिखा है कि बाल साहित्य जिसे एक छोटा पोखऱ समझा जाता है, वह तो एक ऐसा अगाध समंदर हैं, जिसमें सृजन की असंख्य उत्ताल तरंगें नजर आती हैं। बीच-बीच में बहुत उज्जवल और चमकती हुई मणियाँ भी दिखाई दे जाती हैं।...एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि हिंदी साहित्य के बड़े से बड़े दिग्गजों ने बाल साहित्य लिखा और उस धारा को आगे बढ़ाया है। आपको आश्चर्य होगा, हिंदी का पहला बाल उपन्यास प्रेमचंद ने लिखा था। ‘कुत्ते की कहानी’ उस बाल उपन्यास का नाम है, और वह प्रेमचंद ने तब लिखा, जब वे ‘गोदान’ लिख चुके थे और अपने कीर्ति के शिखर पर थे। क्या पता, अगर वे और जीते रहते तो कितनी अनमोल रचनाएँ बच्चों की झोली में डालकर जाते। आपको पता होगा, प्रेमचंद के समय मौलिक उपन्यास तो न थे, पर अनूदित उपन्यास बहुत थे। पर प्रेमचंद को उनसे संतोष न था। उन्हें लगा कि पराई भाषा के उपन्यासों से बच्चों का उतना जुड़ाव नहीं हो पाता, और उन्हें सही परिवेश भी नहीं मिल पाता। इसलिए हिंदी में बच्चों के लिए कोई ऐसा उपन्यास लिखना चाहिए, जो उन्हें बिल्कुल अपना सा लगे। और तब लिखा उन्होंने बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’, जिसका नायक एक कुत्ता कालू है। उपन्यास में उसके कमाल के कारनामों का वर्णन है, पर इसके साथ ही प्रेमचंद ने भारतीय समाज की जाने कितनी विडंबनाएँ और सुख-दुख भी गूँथ दिए हैं। यहाँ तक कि गुलामी की पीड़ा भी। उपन्यास के अंत में कालू कुत्ते को हर तरह का आराम है। उसे डाइनिंग टेबल पर खाना खाने को मिलता है। तमाम नौकर-चाकर उसकी सेवा और टहल के लिए मौजूद हैं। पर तब भी वह खुश नहीं है। वह कहता है, मुझे सारे सुख, सारी सुविधाएँ हासिल हैं, पर मेरे गले में गुलामी का पट्टा बँधा हुआ है और गुलामी से बड़ा दुख कोई और नहीं है। ऐसे कितने ही मार्मिक प्रसंग और मार्मिक कथन हैं जो उपन्यास पढ़ने के बाद मन में गड़े रह जाते हैं। यह है प्रेमचंद के उपन्यास-लेखन की कला, जो उनके लिखे इस बाल उपन्यास में भी देखी जा सकती है।
पर अकेले प्रेमचंद नहीं हैं, जिन्होंने बच्चों के लिखा लिखा। अमृतलाल नागर, रामवृक्ष बेनीपुरी, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सुभदाकुमारी चौहान, दिनकर, जहूरबख्श, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद यादव, मन्नू भंडारी, शैलेश मटियानी, बच्चन, भवानी भाई, प्रभाकर माचवे, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय—सबने बच्चों के लिए लिखा और खूब लिखा।...तो जैसे-जैसे मैं बाल साहित्य के इस अगाध समंदर में गहरे डूबता गया, बाल साहित्य की एक से एक सुंदर और चमकीली मणियों से मैं परचता गया। और बहुत बार तो लगा कि ऐसी दमदार कृतियाँ तो बड़ों के साहित्य में भी नहीं हैं, जैसी बाल साहित्य में हैं। तब मुझे लगा कि यह बात तो दर्ज होनी चाहिए, कहीं न कहीं लिखी जानी चाहिए। पर मैं देखता था कि ज्यादातर बाल साहित्यकार इस चीज को लेकर उदासीन थे, या कम से कम वैसी व्याकुलता उनमें नहीं महसूस होती थी, जैसी मैं महसूस करता था और भीतर-भीतर तड़पता था।
तो अनामी भाई, उसी दौर में कहीं अंदर से पुकार आई कि प्रकाश मनु, तुम यह काम करो। बेशक यह काम बहुत चुनौती भरा है, पर तुम इसे कर सकते हो, तुम्हें करना ही चाहिए। और मैं इसमें जुट गया। मैं कितना कामयाब हो पाऊँगा या नहीं, इसे लेकर मन में संशय था। पर जैसे-जैसे काम में गहरे डूबता गया, यह संशय खत्म होता गया। मुझे लगा कि यह तो मेरे जीवन की एक बड़ी तपस्या है. और सारे काम छोड़कर मुझे इसे पूरा करना चाहिए। तो सारे किंतु-परंतु भूलकर मैं इस काम में लीन हो गया।
ऐसा नहीं कि बाधाएँ कम आई हों। मेरे पास कुछ अधिक साधन भी न थे। फिर भी किताबें खरीदना तो जरूरी था। बिना इसके इतिहास कैसे लिखा जाता? इन बीस बरसों में कोई डेढ़-दो लाख रुपए मूल्य की पुस्तकें खरीदनी पड़ीं। जो सज्जन कंप्यूटर पर मेरे साथ बैठकर घंटों कंपोजिंग और निरंतर संशोधन भी करते थे, वे बहुत धैर्यवान और मेहनती थे। पर उन्हें उनके काम का मेहनताना तो देना ही था। कोई बीस बरस यह काम चला और दो-ढाई लाख रुपए तो कंपोजिंग आदि पर खर्च हुए ही। हर बार नई किताबें आतीं तो मैं उन्हें बीच-बीच में जोड़ता। इतिहास का विस्तार बहुत अधिक न हो, इसलिए बार-बार उसे तराशना पड़ता। लिखना और संपादन, काट-छाँट...फिर लिखना, फिर संपादन, यह सिलसिला बीस बरस तक चलता रहा। इस पूरे महाग्रंथ के कोई सौ के लगभग प्रिंट लिए गए। हर बार काट-छाँटकर फिर नया प्रिंट।...सिलसिला कहीं रुकता ही न था। कभी-कभी तो लगता था कि मैं मर जाऊँगा और यह काम पूरा न होगा।...पर अंततः पिछले बरस यह काम पूरा हुआ और लगा कि सिर पर से कोई बड़ा भारी पहाड़ उतर गया हो। काम पूरा होने के बाद भी यकीन नहीं हो रहा था कि मैंने सच ही इसे पूरा कर लिया है।
अनामीशरण - आपसे पहले भी क्या बाल साहित्य के इतिहास पर काम हुआ है?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, यह हिंदी बाल साहित्य का पहला इतिहास है। हाँ, इससे पहले सेवक जी ने हिंदी बाल कविता का इतिहास लिखा था, ‘बालगीत साहित्य : इतिहास एवं समीक्षा’ शीर्षक से। सन् 2003 में मेधा बुक्स से खुद मेरा इतिहास-ग्रंथ आया था, ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’। बाल साहित्य के इस बृहत् इतिहास-ग्रंथ से पहले अभी तक कुल दो ही इतिहास छपे थे, पर ये दोनों केवल बाल कविता तक सीमित थे। हिंदी बाल साहित्य का पहला इतिहास-ग्रंथ तो यही है, जो सन् 2018 में प्रभात प्रकाशन से बड़े खूबसूरत कलेवर में छपकर आया है। इसे लिखने में मेरे जीवन के कोई बीस-बाईस वर्ष लगे।
अनामीशरण - बाल साहित्य का इतिहास न सही, पर क्या ऐसा कोई और बड़ा काम हुआ है, जिसमें बाल साहित्य के सिलसिलेवार विकास को दर्शाया गया हो?
प्रकाश मनु – इस इतिहास-ग्रंथ से पहले अनामी जी, मेरी एक पुस्तक ‘हिंदी बाल साहित्य : नई चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ आ चुकी थी, जिसमें अलग-अलग विधाओं में बाल साहित्य की विकास-यात्रा को दरशाया गया था। काफी लंबे-लंबे इतिहासपरक लेख इसमें हैं। यह पुस्तक सन् 2014 में आई थी। इसी तरह शकुंतला कालरा जी की एक संपादित पुस्तक ‘बाल साहित्य : विधा विवेचन’ भी आ चुकी थी, जिनमें बाल साहित्य की अलग-अलग विधाओं पर अलग-अलग साहित्यकारों ने लिखा। पर बाल साहित्य का कोई विधिवत और संपूर्ण इतिहास अब तक नहीं आया था। इसलिए मेरे ग्रंथ ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ ने, मैं समझता हूँ, एक बड़े अभाव की पूर्ति की। मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना तो यह था ही कि मैं हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखूँ। पर मेरे साथ-साथ यह बाल साहित्य के सैकड़ों लेखकों का भी सपना था कि ऐसा इतिहास-ग्रंथ सामने आए।...तो मैं समझता हूँ, मैंने केवल अपना ही नहीं, सैकड़ों बाल साहित्यकारों का सपना भी पूरा किया है। और यह काम हो सका, इसका श्रेय मैं अपने मित्रों, शुभचिंतकों और उन सैकड़ों बाल साहित्यकारों को देता हूँ जिनकी शुभकामनाएँ मेरे साथ थीं, और उसी से मुझे इतनी हिम्मत, इतनी शक्ति मिली कि यह काम पूरा हो सका। सच पूछिए तो अनामी जी, मुझे लगता है कि यह काम करने की प्रेरणा मुझे ईश्वर ने दी और उसी ने मुझसे यह काम पूरा भी करा लिया। मैं तो बस एक निमित्त ही था। इतनी सारी सद्प्रेरणाएँ मेरे साथ न होतीं तो मैं भला क्या कर सकता था? एक पुरानी कविता का सहारा लेकर कहूँ तो—‘कहा बापुरो चंद्र...!!’
अनामीशरण – ‘नंदन’ जैसी लोकप्रिय बाल पत्रिका में काम करने के अनुभव और बाल कथाओं के विपुल संसार से दो-चार होते रहने की सतत प्रकिया ने क्या आपके जीवन दर्शन, सोच-विचार और गहन वैचारिक मंथन पर गहरा प्रभाव डाला है? इतिहास लेखन में आपके ‘नंदन’ कार्यानुभव का असर पड़ा है?
प्रकाश मनु – निस्संदेह अनामी भाई, बाल पत्रिका ‘नंदन’ से जुड़ने पर ही मुझे पता चला कि बाल साहित्य का विस्तार कितनी दूर-दूर तक है। साथ ही उसमें बचपन की ऐसी खूबसूरत बहुरंगी छवियाँ हैं, कि उनका आनंद लेने के लिए आप फिर से बच्चा बन जाना चाहते हैं।... ‘नंदन’ में काम करते हुए जब भी मुझे फुर्सत मिलती, मैं पत्रिका की पुरानी फाइलें उठा लेता और पढ़ने लगता। मुझे यह बड़ा आनंददायक लगता था। इसलिए कि उन्हें पढ़ते हुए बरसों पहले ‘नंदन’ में छपे रचनाकारों से मेरी बड़ी जीवंत मुलाकात हो जाती और मैं अभिभूत हो उठता।... फिर ‘नंदन’ के शुरुआती अंक देखे तो मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं। उनमें ऐसा अपूर्व खजाना था कि मैं झूम उठा। अमृललाल नागर के ‘बजरंगी पहलवान’ और ‘बजरंगी-नौरंगी’ ऐसे जबरदस्त उपन्यास थे कि पढ़ते हुए मैं किसी और ही दुनिया में पहुँच गया। इसी तरह कमलेश्वर की ‘होताम के कारनामे’ एक विलक्षण कहानी थी। मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘आओ करें चाँद की सैर’ भी ऐसा ही अद्भुत था। यहाँ तक कि राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी और मोहन राकेश की बड़ी दिलचस्प कहानियाँ पढ़ने को मिलीं। मोहन राकेश ने बच्चों के लिए कुल चार कहानियाँ लिखी हैं, और वे चारों आपको ‘नंदन’ के पुराने अंकों में मिल जाएँगी। हरिशंकर परसाई, वृंदावनलाल वर्मा, रघुवीर सहाय, सबने बच्चों के लिए लिखा और जमकर लिखा। इनकी रचनाएँ मुझे ‘नंदन’ के पुराने अंकों में पढ़ने को मिलीं।
मैं अकसर सुना करता था कि हिंदी में बड़े साहित्यकारों ने बच्चों के लिए नहीं लिखा, पर यह तो उलटा ही मामला था। यानी मैं देखता कि भला कौन बड़ा साहित्यकार है जिसने बच्चों के लिए नहीं लिखा!...यह एक विलक्षण चीज थी मेरे लिए। मुझे लगता, यह बात तो किसी को पता ही नहीं। तो किसी न किसी को तो यह सब लिखना चाहिए। मैं बाल साहित्य पर विस्तृत लेख लिखता और उनमें इन बातों का जिक्र करता। धीरे-धीरे मुझे लगा कि हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखने के लिए जमीन खुद-ब-खुद तैयार हो गई है और फिर मैं इस काम में जुट गया।...तो इसमें शक नहीं, अनामी भाई, कि मैं ‘नंदन’ में था, इस कारण हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिख पाया। नहीं तो शायद मेरे लिए इतना बड़ा काम कर पाना कतई संभव न हो पाता।
अनामीशरण – मनु जी, आपने बाल साहित्य का इतिहास लिखा है, पर मेरा प्रश्न है कि बाल कविता, कहानी और पौराणिक कथाओं, लोककथाओं समेत अन्य कई विधाओं में लिखे गए बाल साहित्य को किस कसौटी पर साहित्य कहा और माना जा सकता है?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, इसका जवाब तो मैं पहले दे ही चुका हूँ। बच्चों के लिए लिखी गई कविता, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक और दूसरी विधाओं में रचे गए साहित्य का एक बड़ा हिस्सा बच्चों को एक गहरी रचनामक संतुष्टि और आनंद देता है, और अपने साथ बहा ले जाता है। वह जाने-अनजाने बाल पाठकों के व्यक्तित्व को निखारता और उन्हें जीवन जीने की सही दिशा और सकारात्मक ऊर्जा देता है। साथ ही उनके आगे विचार और कल्पना के नए-नए अज्ञात झरोखे खोलकर, उनके व्यक्तित्व का विकास करता है, उनके सामने नई संभावनाओं के द्वार खोलता है। यह काम ऊँचे दर्जे का साहित्य ही कर सकता है। मैं समझता हूँ कि बच्चों के लिए लिखी गई कविता कहानी, उपन्यास, नाटकों आदि की परख के लिए यह एक सही कसौटी है, जिसके आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाना चाहिए, और यही काम मैंने बाल साहित्य के इतिहास में किया है। बेशक बच्चों के लिए लिखी गई सभी रचनाएँ समान महत्त्व और ऊँचाई की नहीं हैं। बहुत सी साधारण रचनाएँ भी हैं। पर बाल साहित्य का इतिहास लिखते हुए मेरी निगाह बच्चों के लिए लिखी गई श्रेष्ठ और कलात्मक रूप से सुंदर रचनाओं पर ही रही है। मैं समझता हूँ कि उनके आधार पर ही बाल साहित्य का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
और यह तो बड़ों के साहित्य में भी है। वहाँ भी साधारण रचनाओं की काफी भीड़ है, पर हम किसी भी विधा की उत्कृष्ट रचनाओं के आधार पर ही उसका मूल्यांकन करते हैं, तथा उसकी शक्ति और संभावनाओं की पड़ताल करते हैं।...हाँ, जहाँ तक लोककथाओं और पौराणिक कथाओं का सवाल है, तो वे बाल पाठकों के लिए तो लिखी नहीं गई थीं। तो उनमें ऐसा बहुत कुछ है, जो बच्चों के काम का नहीं है। इसलिए लोककथाओं और पुराण कथाओं को बाल साहित्य नहीं माना जा सकता। हाँ, कुछ लेखकों ने लोककथाओं और पुराण कथाओं को बच्चों के लिए बड़ी कल्पनाशीलता के साथ नए और सर्जनात्मक रूपों में ढालकर प्रस्तुत किया है। मैं समझता हूँ, बच्चों के लिए विशेष रूप से पुनःसर्जित रचनाओं को ही बाल साहित्य के अंतगत लेना चाहिए। बाकी रचनाओं को भ्रमवश बाल साहित्य भले ही समझ लिया जाए, पर सच पूछिए तो उन्हें बाल साहित्य मानना एक बड़ी भूल होगी। मैंने अपने इतिहास-ग्रंथ में उन्हीं लोककथाओं और पुराण कथाओं की खासकर चर्चा की है, जिनका सच में ही बाल पाठकों के लिए पुनःसृजन किया गया है।
अनामीशरण - बाल साहित्य के इतिहास पर आपके लंबे शोध और साधना का साकार रूप एक बृहत् ग्रंथ के रूप में सन् 2018 में सामने आया है। पर यह कितने वर्षों के निरंतर विचार-मंथन, शोध, अनुसंधान, खोज और अंततः नियोजन का प्रतिफल है?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, मोटे तौर से इस इतिहास-ग्रंथ को पूरा करने में मुझे कोई बीस-बाईस बरस लगे। शुरू में पता नहीं था कि काम इतना बड़ा है कि मैं इसके नीचे बिल्कुल दब जाऊँगा।...धीरे-धीरे जब पुस्तकों की खोज में जुटा तो समझ में आया कि यह काम कितना कठिन है। हर कालखंड की सैकड़ों पुस्तकों को खोजना, गंभीरता से उन्हें पढ़ना, फिर उनके बारे में अपनी राय और विचारों को इस इतिहास-ग्रंथ में शामिल करना खेल नहीं था। बीच-बीच में साँस फूल जाती और लगता था कि यह काम कभी पूरा हो ही नहीं पाएगा। पर इसे ईश्वरीय अनुकंपा ही कहूँगा कि अंततः यह काम पूरा हुआ...और मुझे लगा कि सच ही मेरे जीवन का एक बड़ा सपना पूरा हो गया है।
अनामीशरण – यह इतिहास-ग्रंथ लिखने का विचार आपके मन में कब आया? फिर विचारों की इस पूरी पटकथा को मन से कॉपी पर उतारकर सामने लाना—यह एक लंबा सिलसिला रहा होगा। आपने ही अभी बताया, कोई बीस-बाईस वर्ष। तो इस बाबत अपने उन चंद मित्रों के नाम बताएँ, जिनसे आपने इतिहास लेखन की भावी योजनाओं पर गंभीरता से बात की। उन मित्रों की क्या प्रतिकिया रही?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, यह काम मोटे तौर से सन् 1997 से शुरू हुआ था, जब मैंने बाल साहित्य पर पत्र-पत्रिकाओं में खूब लंबे-लंबे लेख लिखने शुरू किए थे। वे लेख ऐसे थे, जिनके पीछे काफी तैयारी थी, और जो महीनों की मेहनत से तैयार किए गए थे। सन् 2003 में मेरा लिखा हुआ इतिहास-ग्रंथ ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’ आया। वह भी इसी योजना का एक हिस्सा था। कहना न होगा कि इस इतिहास को खूब सराहा गया। दामोदर अग्रवाल और डा. श्रीप्रसाद सरीखे बाल साहित्यकारों ने बड़े उत्साहवर्धक पत्र लिखे। दामोदर अग्रवाल जी का कहना था कि यह ऐसा काम है, जिसे आगे आने वाले सौ सालों तक भुलाया नहीं जा सकता। दूरदर्शन ने एक विशेष कार्यक्रम इस पर केंद्रित किया, जिसमें मेरे अलावा डा. शेरजंग गर्ग और बालस्वरूप राही जी भी सम्मिलित थे। यह एक स्मरणीय विचार-गोष्ठी थी। डा. शेरजंग गर्ग और राही जी ने बड़े सुंदर अल्फाज में इस इतिहास के महत्त्व पर प्रकाश डाला। कुल मिलाकर हिंदी बाल कविता के इतिहास का बहुत उत्साहपूर्वक स्वागत हुआ। इससे जाहिर है, मेरी हिम्मत भी बढ़ी। सन् 2003 में मैंने निश्चय कर लिया कि अब चाहे जितनी भी मुश्किलें आएँ, पर समूचे हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखना है। यह सिर पर पहाड़ उठा लेना है, तब यह न जानता था। पर एक थरथराहट भरे पवित्र संकल्प के साथ यह काम विधिवत मैंने शुरू कर दिया था।
तब से इसके कई प्रारूप बने और बदले गए। बीच-बीच में सैकड़ों नई-पुरानी पुस्तकें जुड़ती गईं। बच्चों के लिए लिखी गई जो भी अच्छी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक मुझे मिलती, मैं गंभीरता से उसे पढ़ता, फिर पुस्तक का संक्षिप्त ब्योरा और उस पर अपनी राय वगैरह दर्ज कर लेता। यों इस इतिहास-ग्रंथ का कलेवर भी समय के साथ-साथ बढ़ता गया। इसलिए बीच-बीच में लगातार संपादन भी जरूरी था। शुरू में इतिहास की जो परिकल्पना मन में थी, वह भी बाद में जाकर कुछ बदली, और इसमें बहुत कुछ नया जुड़ता और घटता रहा। यों इस इतिहास-ग्रंथ को पूरा करने में मुझे कोई बीस-बाईस बरस लगे।
मेरे निकटस्थ साथियों और आत्मीय जनों में देवेंदकुमार, रमेश तैलंग और कृष्ण शलभ ऐसे करीबी मित्र थे, जिनसे लगातार इसे लेकर बात होती थी। इतिहास-ग्रंथ की पूरी परिकल्पना की उनसे दर्जनों बार चर्चा हुई। इसमें आ रही कठिनाइयों की भी। सबने अपने-अपने ढंग से मेरी मदद की। उन्होंने कुछ दुर्लभ पुस्तकें तो उपलब्ध कराईं ही, बीच-बीच में जब मेरी हिम्मत टूटने लगती थी, तो वे हौसला बँधाते। बाद के दिनों में श्याम सुशील भी जुड़े और उनका बहुत सहयोग मिला। उन्होंने यह पूरा इतिहास-ग्रंथ पढ़कर कई उपयोगी सुझाव दिए। संपादन में भी मदद की। सच पूछो तो ऐसे प्यारे और निराले दोस्त न मिले होते, तो यह काम शायद कभी पूरा ही न हो पाता। और अगर पूरा होता भी, तो शायद इतने सुचारु ढंग से संपन्न न होता। मेरा मकसद केवल इतिहास लिखना ही न था। बल्कि मैं चाहता था कि इस इतिहास-ग्रंथ की जो परिकल्पना मेरे मन में है, यह ठीक उसी रूप में पूरा हो। इस बृहत् कार्य में किसी भी तरह का समझौता मैं नहीं करना चाहता था। ऐसा भी हुआ कि लाखों रुपए खर्च करके जो पुस्तकें मैं खरीदकर लाया, उनमें से किसी पर सिर्फ दो-चार लाइनें ही लिखी गईं, किसी पर मात्र दो-एक पैरे। पर मुझे संतुष्टि थी कि हर पुस्तक को मैंने खुद पढ़ा और अपने ढंग से अपने विचारों को दर्ज किया। दूसरों के विचार मैं उधार नहीं लेना चाहता था, और वह मैंने नहीं किया। पुस्तकें खुद पढ़कर राय बनाई और फिर उसे उचित क्रम में तसल्ली से लिखा। इससे काम कई गुना बढ़ गया, पर इसी का तो आनंद था। इसीलिए जब यह इतिहास-ग्रंथ पूरा हुआ तो लगा, मेरी जीवन भर की तपस्या पूरी हो गई, और मेरी आँखों से आनंद भरे आँसू बह निकले।
अनामीशरण – मनु जी, क्या आपके आसपास के लेखकों और मित्रों की मिली-जुली प्रतिकियाओं ने भी इतिहास लेखन की धारणा और आपकी योजनाओं को सबल बनाया है?
प्रकाश मनु – हाँ, अनामी भाई, मैं बहुत खुले दिल और खुले विचारों का आदमी हूँ। मेरे जीवन में कुछ भी दबा-ढका नहीं है, और जो भी है वह सबके सामने है। इसलिए जो भी लेखक या मित्र मिलते, मैं इनसे खुलकर इस काम की चर्चा करता। फिर उनकी जो प्रतिक्रिया होती, उस पर भी पूर्वाग्रह मुक्त होकर खुले दिल से विचार करता। जो भी सुझाव मुझे काम के लगते, उन्हें मैं अपनाने की कोशिश करता। जाहिर है कि इससे मुझे बहुत लाभ हुआ और इतिहास कहीं अधिक मुकम्मल रूप में सामने आया।
अनामीशरण - जब आपने इस इतिहास की रूपरेखा पर काम आरंभ किया तो उस समय आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास लेखन, काल-विभाजन और अलग-अलग कालखंडों के नामकरण आदि को भी क्या आपने ध्यान में रखा? आपने बाल साहित्य के इतिहास में काल-विभाजन किस आधार पर और किन तार्किक मानदंडों पर रखकर निर्धारित किया?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में काल-विभाजन किया है। पर उनके और मेरे काल-विभाजन में बहुत फर्क है। इसलिए भी कि हिंदी साहित्य की परंपरा कई सदियों पुरानी है, जबकि हिंदी में बाल साहित्य की शुरुआत मोटे तौर से बीसवीं शताब्दी से ही हुई। तो मुझे केवल सौ-सवा सौ साल की कालावधि में ही वर्गीकरण करना था। शुक्ल जी ने अलग-अलग कालखंडों में हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियों के अनुसार काल-विभाजन किया, जबकि मेरा काल-विभाजन हिंदी बाल साहित्य की विकास-यात्रा या उसके ग्राफ को लेकर था। इसलिए बीसवीं सदी के प्रारंभ से आजादी हासिल होने तक के कालखंड, यानी स्वतंत्रता-पूर्व काल को मैंने हिंदी बाल साहित्य का प्रारंभिक दौर या आदि काल माना। आजादी के बाद हिंदी बाल साहित्य की ओर बहुत से साहित्यिकों का ध्यान गया और इस कालखंड में बहुत उत्कृष्ट रचनाएँ सामने आईं। खासकर छठे दशक से आठवें दशक तक का बाल साहित्य बड़ी ही अपूर्व कलात्मक उठान वाला बाल साहित्य है, जिसमें बाल साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में एक से एक उम्दा रचनाएँ लिखी गईँ। इसलिए इस दौर को मैंने हिंदी बाल साहित्य का गौरव काल कहा।
सन् 1981 से लेकर अब तक के बाल साहित्य में बहुत विस्तार है। बहुत से नए लेखकों का काफिला बाल साहित्य से जुड़ा और काफी लिखा भी गया गया। पर इस दौर में वह ऊँचाई नहीं है, जो विकास युग में नजर आती है। इस कालखंड को मैंने विकास युग का नाम दिया। इस तरह हिंदी बाल साहित्य के इतिहास में मेरा काल- विभाजन प्रवृत्तिगत न होकर, बाल साहित्य की विकास-यात्रा को लेकर है। मोटे तौर से यह अध्ययन की सुविधा के लिए है। इस पर कोई बहुत अधिक मताग्रह मेरा नहीं है कि इन कालखंडों के नाम और कालावधि बस यही हो सकती है। पर मैं देखता हूँ कि सामान्यतः सभी बाल साहित्य अध्येताओं ने इसे खुले मन से स्वीकार कर लिया है, और इसी आधार पर बाल साहित्य के अध्ययन की परंपरा चल निकली है। मुझे निश्चित रूप से यह सुखद लगता है। इसलिए कि काल-विभाजन पर निरर्थक विवाद के बजाय हमारा ध्यान तो बाल साहित्य की विकास की गतियों को जाँचने और आँकने में होना चाहिए।
अनामीशरण – मनु जी, बाल लेखन और बाल साहित्य के बीच क्या फर्क है, और किस मापदंड पर यह तय होता है कि अमुक रचना बाल साहित्य के अंतर्गत आएगी या नहीं?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, जो बाल लेखन है, या खास तौर से बच्चों के लिए लिखी गई रचनाएँ हैं, वही कुल मिलाकर बाल साहित्य है, अगर वे रचनाएँ बाल पाठकों को आनंदित करने के साथ-साथ एक तरह की रचनात्मक संतुष्टि दे पाती हैं। साथ ही उनकी शख्सियत को सँवारने और उसके सर्वांगीण विकास में अपनी अहम भूमिका निभाती हैं।
अनामीशरण – यानी आपके खयाल से बाल साहित्य वह है जो बच्चों को आनंदित करने के साथ ही उसे संस्कारित भी करे और कोई दृष्टिकोण भी दे?
प्रकाश मनु – बिल्कुल...। अनामी भाई, आपने एकदम ठीक कहा।
अनामीशरण - साहित्य की परिभाषा आपकी नजर में क्या है?
प्रकाश मनु – मोटे तौर से कहूँ तो साहित्य भाषा में मनुष्य के मन की अभिव्यक्ति है, जिसमें अपना और समाज का सुख-दुख, भविष्यत, सपनों की उड़ान, आकांक्षाएँ और जीवन यथार्थ प्रतिबिंबित होता हो। कोई अच्छा साहित्य हमें सृजनात्मक संतुष्टि तो देता ही है, पर इसके साथ ही वह जीवन की सहज आलोचना भी है, जिसमें हमारे आगत की दिशा, भीतर का मर्म और आदर्श छिपा होता हो। इस तरह वह हमें नैतिक आदर्शों की राह पर ले जाने में मार्गदर्शक का काम भी करता है।
अनामीशरण - यहाँ पर जब बाल साहित्य की बात चल रही है, तो कृपया बताएँ कि बड़ों के लिए लिखे गए साहित्य और बाल साहित्य के बीच मूल अंतर क्या है?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, मूलतः दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है। बस, एक ही अंतर है कि बाल साहित्य बच्चों के लिए लिखा जाता है, इसलिए इसकी भाषा और अभिव्यक्ति बाल मन के अनुकूल सीधी, सरल होती है, जिससे बच्चे उसका आनंद ले सकें। बाल साहित्य में उलझाऊ बिंब, कल्पना, अमूर्त भाषा और पेचीदा अभिव्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। हमारी दादी-नानियाँ बोलचाल की भाषा और लय में जो बातें कहती हैं, बच्चे उन्हें बड़ी आसानी से ग्रहण कर लेते हैं और उसी रौ में बहने लगते हैं। बाल साहित्य में भी इसी बोलचाल की भाषा और लय की दरकार है। और जहाँ तक किसी लेखक की रचनात्मक संतुष्टि या किसी रचना की अद्वितीयता और पूर्णता की बात है, वह बड़ों का साहित्य हो या बाल साहित्य, दोनों में समान ही होती है।
अनामीशरण - बाल साहित्य के आरंभिक काल और उसकी विकास-यात्रा को आपने किस तरह अपने इतिहास-ग्रंथ में रेखांकित किया है?
प्रकाश मनु – बहुत मोटे तौर से कहूँ तो अनामी भाई, बाल साहित्य के प्रारंभिक दौर में अभिव्यक्ति सीधी-सादी थी, बाल साहित्य की चौहद्दी भी बहुत बड़ी नहीं थी। बहुत थोड़े से विषय थे जिन पर कविता, कहानियाँ, नाटक लिखे जाते थे। फिर वह दौर हमारी पराधीनता का काल था, इसलिए बच्चों में देशराग और देश के गौरव की भावना भरना भी जरूरी था, ताकि ये बच्चे बड़े होकर आजादी की ल़ड़ाई के वीर सिपाही बनें और देश के लिए बढ़-चढ़कर काम करें। आजादी के बाद के बाल साहित्य में बहुत कलात्मक उठान के साथ ही अभिव्यक्ति के नए-नए रास्ते खुले और बाल साहित्य का परिदृश्य भी बड़ा होता गया। सन् 80 के बाद तो हमारे समाज में बड़ी तेजी से परिवर्तन हुआ और उसकी सीधी अभिव्यक्ति बाल साहित्य में देखने को मिलती है। इस कालखंड में बाल साहित्य में कहीं अधिक खुलापन आया और बाल मन की अभिव्यक्ति के नए-नए रास्ते दिखाई पड़े। कहीं बच्चे कंधों पर लटके भारी बस्ते की शिकायत कर रहे हैं, कहीं वे खेलकूद की आजादी माँगते दिखाई देते हैं और कभी विनम्रता से बड़ों से कह रहे हैं कि वे उन्हें दोस्तों के सामने न डाँटें, क्योंकि इससे उन्हें बहुत कष्ट होता है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर, गूगल, ईमेल तथा रोबोट समेत आधुनिक प्रोद्योगिकी की बहुत सी चीजें भी इधर बाल साहित्य में आई हैं। आजादी से पहले इनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
अनामीशरण - बाल लेखन में क्या आपको कोई ऐसा मोहक तत्व मिला, जिससे आपको बहुत आनंद और संतुष्टि मिली हो, और आपको लगा हो कि बाल साहित्य के इतिहास लेखन की आपकी लगन और मेहनत सार्थक हो गई है?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, बाल सहित्य में मैं जैसे-जैसे गहरे उतरता गया, मुझे लगा, कि अरे, यहाँ तो एक से एक सुंदर और कलात्मक कृतियों का भंडार है, जिसका किसी को पता ही नहीं है। अमृतलाल नागर के उपन्यास ‘बजरंगी पहलवान’ और ‘बजरंगी नैरंगी’ ऐसे ही थे, जिन्हें आप पढ़ लें तो बिल्कुल बच्चे ही बन जाएँ। प्रेमचंद की ‘कुत्ते की कहानी’ का मैंने ऊपर वर्णन किया है। वह एक अद्भुत उपन्यास है। भूपनारायण दीक्षित के ‘नानी के घर में टंटू’ और ‘बाल राज्य’ भी ऐसे ही अनूठे उपन्यास हैं, जिनमें बड़ा रस, बड़ा कौतुक है। इसी तरह बच्चों के लिए लिखी गई बड़ी ही अद्भुत कहानियाँ और नाटक मुझे मिले, जो मेरे लिए किसी अचरज से कम न थे। और बाल कविता की बात करें तो दामोदर अग्रवाल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, शेरजंग गर्ग, डा. श्रीप्रसाद, निरंकारदेव सेवक, द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी, इनके यहाँ ऐसी कविताओं का अनमोल खाना है जिसे हम दुनिया की किसी बड़ी से बड़ी भाषा के बाल साहित्य के समने बड़े गर्व से रख सकते हैं। सच कहूँ तो उनमें ऐसी बहुत सी चीजें भी थीं, जिन्हें पढ़ते हुए लगा कि शायद बड़ों के साहित्य में भी रचनात्मक ऊँचाई वाली वाली ऐसी सुंदर और भावपूर्ण रचनाएँ न होंगी।
हालाँकि बाल साहित्य में भी साधारण चीजों का बड़ा जखीरा है। उसे देखते हुए बार-बार लगता था कि बाल साहित्य में जो उत्कृष्ट है, उसे अलगाकर दिखाने और मूल्यांकन की बहुत जरूरत है, क्योंकि असल में तो यही बाल साहित्य है। मुझे लगता, किसी न किसी को तो यह काम करना चाहिए। पर मैंने अपने आसपास देखा, किसी को इस काम में रुचि नहीं थी। लोग कविता लिख रहे थे, कहानी लिख रहे थे, या और भी ऐसी ही चीजें। पर अपने लेखन के छोटे से दायरे के बाहर वे झाँकना भी नहीं चाहते थे। उनसे कहा जाता कि बाल साहित्य में एक से एक बड़ी निधियाँ हैं और उन्हें सबके लाने की दरकार है, तो वे ऊपर से हाँ-हाँ करते और फिर अपनी उसी छोटी सी दुनिया में लीन हो जाते। मैं समझ गया कि यह काम बड़ा है, इसलिए कोई हाथ में नहीं लेना चाहता। लोग यह तो चाहते हैं कि यह काम जरूरी है और होना चाहिए, पर वे चाहते हैं कि इस उलझाऊ और पेचीदा काम को कोई और करे, वे स्वयं इस पचड़े में न पड़ें। तब मुझे लगने लगा कि यह काम मुझे करना है, करना ही है, चाहे कितनी ही परेशानियाँ क्यों न आएँ, पर करना है। यों एक बड़ा सपना मन में पैदा हुआ और यह किसी ईश्वरीय अनुकंपा से कम नहीं है कि आखिर वह पूरा भी हुआ।
अनामीशरण - हिंदी साहित्य का इतिहास सबसे पहले तो शुक्ल जी ने लिखा, मगर बाद में उसकी बाढ़ आ गई। कइयों ने शुक्ल जी की ही पटकथा में दो-चार अध्याय काट-जोड़कर नई किताब लिख दी। अगर इसी तरह की स्थितियों से तुलना करते हुए, आपके इतिहास की चर्चा की जाए तो...? क्या आपको लगता है कि आपके बाद बाल साहित्य के कई और इतिहास भी लिखे जाएँगे, जो सीधे-सीधे आपसे प्रेरित होंगे?
प्रकाश मनु – हाँ, यह ठीक है अनामी भाई, कि आचार्य शुक्ल के बाद हिंदी साहित्य के इतिहास बहुत लिखे गए। थोड़ा फेर-फार करके नया इतिहास लिख देने का खेल भी बहुत चला। पर इससे आचार्य शुक्ल के इतिहास-ग्रंथ का महत्त्व तो कम नहीं हो जाता। बल्कि समय के साथ-साथ उसका महत्त्व निरंतर बढ़ता ही गया है। हो सकता है कि मेरे इतिहास-ग्रंथ ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ को पढ़कर और लोग भी बाल साहित्य का इतिहास लिखने के लिए उत्साहित हों। अगर ऐसा है, तो उनका स्वागत। चूँकि इस क्षेत्र में जमीनी काम मैंने बहुत कर दिया, इसलिए हो सकता है कि उनका बहुत श्रम बच जाए। जिस काम को करने में मेरे बीस बरस लगे, उसे वे थोड़े कम समय में भी कर सकते हैं। पर मेरा कहना है कि किसी इतिहास लेखक को गंभीर अध्येता भी होना चाहिए, और उसे इतिहास लिखते समय निज और पर की बहुत सी सीमाओं से ऊपर उठना चाहिए। किसी इतिहास लेखक के अपने विचार तो हो सकते हैं, होने चाहिए भी, पर उसे निजी संबंधों के घेरे से तो यकीनन ऊपर उठना होगा, क्योंकि अंततः तो महत्त्व कृति का है। इतिहास लेखक का मूल्यांकन जितना तटस्थ होगा, पूर्वाग्रहों से परे होगा, उतना ही उसके इतिहास को मान-सम्मान भी मिलेगा। मुझे खुशी है कि मेरे इस इतिहास-ग्रंथ को लेकर एक बड़ी हलचल दिखाई पड़ी तथा लेखकों और पाठकों की बड़े व्यापक स्तर पर प्रतिकियाएँ मिलीं। अधिकतर लेखकों ने बड़े उत्साह से इसका स्वागत किया। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ।
अनामीशरण - मेरे खयाल से इतनी तितर-बितर, बिखरी हई उपेक्षित बाल रचनाओं और उनके लेखकों की तलाश और उनकी रचनात्मकता को प्रकाश में लाना काफी कठिन काम था। खासा दुरूह। नहीं...?
प्रकाश मनु – निस्संदेह यह एक बड़ी तपस्या थी, अनामी भाई। इस इतिहास-ग्रंथ को लिखने के लिए पुस्तकें कहाँ-कहाँ से जुटाई गईं, अगर मैं यह बताने बैठूँ तो यह खुद में एक इतिहास हो जाएगा। मैंने आपको बताया कि कोई डेढ़-दो लाख रुपए की पुस्तकें मैंने खरीदीं। दिल्ली में जहाँ भी कहीं पुस्तक-पदर्शनी होती, मैं वहाँ जाता। जेब में डेढ़-दो हजार रुपए होते। उनसे जितनी अधिकतम पुस्तकें मैं खरीद सकता था, खऱीद लेता। बस, वापसी के लिए बस या रेलगाड़ी के टिकट के पैसे बचा लेता, ताकि घर पहुँच सकूँ। फिर दोनों हाथों में भारी-भारी थैले पकड़े हुए, पसीने से लथपथ मैं घर आता। उन किताबों को अपनी अलमारी में सहेजकर रखता। फिर उन्हें पढ़ने का सिलसिला चलता, और पढ़ने के बाद अलग-अलग विधा की पुस्तकों का वर्गीकरण करता। फिर इन पुस्तकों को इतिहास-ग्रंथ में उपयुक्त स्थान पर शामिल करने की मुहिम में जुट जाता। यह एक अंतहीन सिलसिला था। इसीलिए मैंने इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी तपस्या कहा।
अनामीशरण - आपने जब इतिहास लेखन पर काम करना आरंभ किया, तो बहुत से ऐसे प्रतिभाशाली लेखक होंगे, जिन पर पहले किसी का ध्यान न था, पर आपके इतिहासपरक लेखों आदि के जरिए वे एकाएक चर्चा में आ गए। या कहें कि उन्हें नया जीवन मिला। आपके खयाल से कितने ऐसे साहित्यकार हैं, जिनको इस इतिहास से नया जीवन मिला और उनके लेखन को कालजयी माना गया?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, मैंने इस तरह गिना तो नहीं। पर निश्चित रूप से दर्जनों ऐसे साहित्यकार होंगे, जिनके लिखे पर पहले लोगों का ध्यान नहीं गया था, पर इतिहास में विशेष चर्चा और फोकस होने पर बहुतों का ध्यान उनकी तरह गया। ऐसा बहुत से पुराने प्रतिभाशाली लेखकों के साथ हुआ और नए उभरते हुए लेखकों के साथ भी। पुराने लेखकों में भी बहुत से समर्थ रचनाकार किन्हीं कारणों से अलक्षित रह जाते हैं। उनकी रचना की शक्ति और विलक्षणता पर लोगों का ध्यान नहीं जाता। एक इतिहासकर का काम उन्हें खोजकर सामने लाना है, और बेशक वह काम मैंने किया। ऐसा करके मैंने किसी पर उपकार नहीं किया, बल्कि इतिहासकार का एक स्वाभाविक कर्तव्य है यह। आजादी से पहले के लेखकों में स्वर्ण सहोदर और विद्याभूषण विभु बड़े ही समर्थ बाल साहित्यकार हैं, जिनकी कविताओं में बड़ी ताजगी है, जो आज भी हमें लुभाती है। और भी ऐसे लेखक हैं, जिनकी तरफ पहले अधिक ध्यान नहीं गया था। पर पहले मेरे हिंदी बाल कविता के इतिहास, और अब इस इतिहास-ग्रंथ में भी उनके महत्त्व की इस ढंग से चर्चा हुई, जो आँखें खोल देने वाली है। इसी तरह बहुत से नए उभरते हुए, लेकिन समर्थ लेखकों की ओर भी मेरा ध्यान गया। प्रदीप शुक्ल, अरशद खान, फहीम अहमद, शादाब आलम ऐसे ही साहित्यकार हैं, जिनके महत्त्व को मैंने बाल साहित्य में एक नई संभावना के रूप में रेखांकित किया। उनकी रचनाओं की शक्ति, नएपन और ताजगी की चर्चा की। मैं समझता हूँ, इससे उनका हौसला तो बढ़ा ही होगा, औरों को भी इसी तरह बढ़-चढ़कर कुछ कर दिखाने की चुनौती मिली होगी। या उनके आगे एक नया मार्ग खुला होगा।...और अगर ऐसे और भी नए समर्थ लेखक आगे आए, तो मैं सबसे पहले उनका नोटिस लूँगा और इतिहास के अगले संस्करण में उन्हें शामिल करूँगा। इतिहास-लेखक के रूप में यह मेरा दायित्व है, इसलिए इससे मैं बच नहीं सकता। बल्कि सच पूछिए तो मुझे इसमें आनंद आता है।
अनामीशरण – मनु जी, आपका यह चिर प्रतीक्षित ग्रंथ अब आ गया है, और पिछले कई महीनों के दौरान इस पर ढेरों प्रतिकियाएँ आपको मिली होंगी। उनमें कोरी तारीफ और सराहना वाली औपचारिक टिप्पणियों को छोड़ दें, तो ऐसे कितने गंभीर सुझाव या प्रतिकियाएँ मिलीं, जिनसे आपको लगा कि अब भी कुछ काम बाकी है? क्या लेखकों की प्रतिक्रियाओं में कुछ ऐसे मुद्दे भी उभरे, जिन पर इतिहास लिखते समय आपका ध्यान तो गया, पर आपने कोई खास महत्त्व नहीं दिया था?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, आपने ठीक कहा। इस ग्रंथ के आते ही पाठकों और बाल साहित्यकारों की प्रतिकियाओं की मानो बाढ़ आ गई। ज्यादातर साहित्यकारों ने मुक्त कंठ से इसकी सराहना की, और इसे बाल साहित्य में ‘एक मील का पत्थर’ कहा। एक वरिष्ठ साहित्यकार ने तो आचार्य रामचंद शुक्ल के इतिहास से इसकी तुलना करते हुए कहा कि मनु जी, जिस तरह आचार्य शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखकर एक बड़ा और ऐतिहासिक काम किया, उसी तरह हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखकर आपने भी ऐसा काम किया है, जिसका महत्त्व समय के साथ निरंतर बढ़ता जाएगा। आज से सौ साल बाद भी लोग इतनी ही उत्सुकता और जिज्ञासा भाव के साथ इसे पढ़ेंगे। इसी तरह एक और बड़े साहित्यकार की टिप्पणी थी कि मनु जी, आपने बाल साहित्य के विशाल समंदर को मथकर उसकी सबसे उज्ज्वल मणियाँ और दुर्लभ खजाना खोज निकाला है और उसे इस बृहत् इतिहास-ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया है।...ऐसी और भी ढेरों प्रतिक्रियाएँ थीं। पर अनामी भाई, सच तो यह है कि मैं खुद को आचार्य शुक्ल के पैरों की धूल भी नहीं समझता। हाँ, इतना जरूर है कि आचार्य शुक्ल के इतिहास समेत हिंदी साहित्य के अन्यान्य इतिहास-ग्रंथों को मैंने बड़ी गभीरता से पढ़ा है, और उनसे बहुत कुछ सीखा भी है। बाल साहित्य का इतिहास लिखते हुए वह मेरे बहुत काम आया।
इस ग्रंथ को लेकर निस्संदेह ऐसे सुझाव और प्रतिकियाएँ भी मिलीं, अनामी भाई, जिनसे आगे के काम की दिशाएँ भी खुलती जान पड़ीं। मेरी बहुत कोशिशों के बावजूद कुछ नए-पुराने लोगों की कृतियाँ मुझे उपलब्ध नहीं हो पाई थीं। इसलिए मैं जिस तरह उन पर लिखना चाहता था, नहीं लिख पाया। इस इतिहास के आने पर बहुत से लेखकों ने अपना प्रकाशित साहित्य मुझे भेजा, जो पहले बहुत प्रयत्न करने पर भी मुझे हासिल नहीं हो पाया था। मैं इन कृतियों को पढ़कर नोट्स ले रहा हूँ, ताकि आगे चलकर इन्हें भी इतिहास में शुमार किया जाए। मुझे खेद है कि ये चीजें मुझे पहले नहीं मिलीं। पर अब मिली हैं तो मेरी पूरी कोशिश होगी कि इनमें से अच्छी कृतियों को उचित महत्त्व देते हुए, मैं इस इतिहास-ग्रंथ में शामिल करूँ तथा उनकी विशेषताओं को रेखांकित करूँ।
अनामीशरण - क्या अभी से आपने काम आरंभ कर दिया है, जिसे दूसरे संस्करण में समायोजित करेंगे?
प्रकाश मनु – जी हाँ, मैंने काम शुरू कर दिया है, और इस इतिहास-ग्रंथ के दूसरे संस्करण में वे सब चीजें शामिल हों, जो छूट गई थीं—मेरी यह पूरी कोशिश होगी। इसके अलावा इक्कीसवीं सदी के बाल साहित्य पर भी मेरी एक बड़ी पुस्तक आ रही है। उसमें भी इनमें से बहुत सी चीजों की चर्चा आपको मिलेगी।
अनामीशरण - इस इतिहास के लेखक प्रकाश मनु के बजाय, एक जाने-माने साहित्यकार तथा बच्चों के प्रिय लेखक और संपादक के तौर पर कृपया इस इतिहास के सबसे सबल और निर्बल पक्ष पर विस्तार से प्रकाश डालें।
प्रकाश मनु – अनामी भाई, इस तरह अपने को अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर तो मैं नहीं देखता। मैं बच्चों के लिए लिखूँ या बड़ों के लिए, बाल साहित्य का इतिहास लिखूँ या बच्चों के लिए कविता, कहानियाँ, नाटक और उपन्यास, बंदा तो मैं एक ही हूँ, और वही रहूँगा। एक रचनाकार के रूप में मैं यह लिखूँ या वह लिखूँ, उसमें जीवन और रस भी वही होगा, भाषा की रवानगी, कल्पना का वितान और मेरे भीतर की चिंताएँ भी वही रहेंगी। यहाँ तक कि मेरी उधेड़बुन और सुख-दुख भी वही रहेंगे, जो कहीं न कहीं मेरी हर रचना का हिस्सा बनते हैं। बस, थोड़ा-थोड़ा लिखने का ढंग बदलता है, और यह भी बड़े सहज ढंग से होता है। इसके लिए मैं कोई लबादा नहीं ओढ़ता और न इसकी कोई जरूरत पड़ती है।...अलबत्ता इस इतिहास-ग्रंथ के सबल और निर्बल पक्षों की बात करनी हो, तो मैं कहूँगा कि इस इतिहास-ग्रंथ में मैंने मन का इतना रस डाल दिया है कि कोई चाहे तो इस इतिहास को इतिहास के साथ-साथ एक रोचक उपन्यास के तौर पर भी पढ़ सकता है, और उसे इसमें वाकई आनंद आएगा। उसे लगेगा कि वह एक ऐसी फुलवारी से गुजर रहा है, जिसमें तरह-तरह के रंग और गंधों वाले बेशुमार फूल खिले हैं और तरह-तरह की मोहक वीथियाँ हैं। बाल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, ज्ञान-विज्ञान साहित्य—बाल साहित्य की ये अलग-अलग विधाएँ ही जैसे उस सुंदर उद्यान की अलग-अलग सरणियाँ हैं। इनमें घूमते हुए पाठक एक रचनात्मक आनंद से भीगता है और उसका मन प्रफुल्लित होता है। इसलिए कि हर विधा की शक्ति और खूबसूरती को मैंने जगह-जगह बड़े आत्मीय ढंग से उजागर किया है।
इसी तरह अगर इस इतिहास-ग्रंथ की निर्बलता की बात करनी हो, तो अपनी एक कमजोरी की मुझे स्वीकारोक्ति करनी चाहिए। और वह यह, कि मैं कुछ फूलों की सुंदरता पर इतना मुग्ध हो जाता हूँ कि उनके रस-माधुर्य का वर्णन करते हुए भूल ही जाता हूँ कि इस चक्कर में कुछ दूसरे उपेक्षित भी हो रहे हैं। एक इतिहासकार के नाते मैंने भरसक तटस्थ रहने की कोशिश की, पर मैं अपने मन और विचारों का क्या करूँ? जिन रचनाकारों की रचनाओं से मैं अधिक मुग्ध होता हूँ, तो जाहिर है, इतिहास में उनका प्रमुखता से और बार-बार जिक्र होता चलता है। मैं चाहूँ या न चाहूँ, इससे बच ही नहीं सकता। शायद एक अच्छे इतिहासकार के नाते मुझे अपनी रुचियों से थोड़ा और ऊपर उठना चाहिए था।...हालाँकि अनामी, मैं देखता हूँ, कि अगर इस तरह की दुर्बलता की बात की जाए तो आचार्य शुक्ल भी इससे परे नहीं हैं। वहाँ भी तुलसी की बात हो तो शुक्ल जी का मन जैसे बह उठता है, पर वही जब कबीर की बात करते हैं, तो उनका लहजा हमें बदला-बदला सा नजर आता है। फिर इतिहासकार कोरा इतिहासकार तो नहीं। इसके साथ-साथ वह एक मनुष्य, एक रचनाकार, आलोचक और साहित्य का पाठक भी तो है। वह अपने विचारों से तटस्थ कहाँ तक हो सकता है? हाँ, निजी संबंधों के घेरे से बेशक उसे ऊपर उठना चाहिए, और यह शुक्ल जी के इतिहास में भी आपको नजर आएगा, और सौभाग्य से मेरे बाल साहित्य के इतिहास में भी।
अनामीशरण – प्राचीन काल से लोककथाओं के विविध स्वरूपों से हम परिचित रहे हैं। तो क्या इसी तरह बाल काव्य की भी प्राचीन काल में सृजनात्मक परंपरा रही है और रही है, तो समय के साथ उसमें किस तरह के बदलाव आते गए? आपने अपने इतिहास में इसे किस तरह समेटा?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, लोककथाओं की तरह बच्चों के खेलगीतों की परंपरा भी सदियों पुरानी है। ‘खेल कबड्डी आल-ताल, मेरी मूँछें लाल-लाल...’ सरीखे गीत हमारे यहाँ बरसोंबरस से गाए जाते रहे हैं। कितनी ही पीढ़ियों का बचपन इन्हें गाते हुए गुजरा। इसी तरह ‘बरसो राम धड़ाके से, बुढ़िया मर गई खाके से...’, ‘सूख-सूख पट्टी, चंदन गट्टी...’, ‘चंदा मामा दूर के, खोए पकाए दूर के...’ ऐसे गीत हैं, जिनका आज से साठ-पैंसठ बरस पहले मैंने अपने बचपन में आनंद लिया था। अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे पिछले तीन-चार सौ बरसों से तो चल ही रहे हैं। पिछली जाने कितनी पीढ़ियों का बचपन इन्हें गाते-गुनगुनाते हुए, इनके साथ झूमते-गाते हुए बड़ा हुआ, और आज के बच्चे भी इन्हें भूले नहीं हैं। हम नहीं जानते कि कब से यह परंपरा चली आती है, शायद पाँच-छह सौ बरस पहले से या शायद और भी पहले थे।...कहना चाहिए कि यह मौखिक बालगीतों की परंपरा थी। बीसवीं सदी में आकर वही नए-नए बालगीतों में ढलकर एक नया साहित्यिक कलेवर ले लेती है और बच्चों के गले का हार बन जाती है। यों इससे पहले सूर, तुलसी के वात्सल्य वर्णन में, या फिर अमीर खुसरो की पहेलियों में बहुत कुछ ऐसा है, जो बालगीतों के बहुत नजदीक है। पर इसकी कोई अनवरत परंपरा नहीं बन पाई। मेरा मानना है कि यह बाल साहित्य की पूर्व पीठिका है। बाल साहित्य की सुव्यवस्थित परंपरा तो बीसवीं सदी के प्रारंभ से ही बन पाई। मैंने अपने इतिहास में प्रमुख रूप से उसी की चर्चा की है। बाल साहित्य की मौखिक परंपरा और मध्यकाल में सूर, तुलसी आदि की बाल छवियों और क्रीड़ा आदि के वर्णन को मैंने शामिल नहीं किया।
अनामीशरण - बाल साहित्य से जुड़े लेखकों को आज भी हमारे आलोचक लेखक नहीं मानते। खासकर बालगीतकारों के साथ तो कुछ ज्यादा ही उपेक्षा और नजरअंदाज करने का रवैया रहा है। बड़ों और बाल साहित्य के रचनाकारों के बीच इस अनुचित भेदभाव के तरीके पर आपकी क्या टिपणी है?
प्रकाश मनु – असल में अनामी भाई, यह हमारे समाज के कुंठित होने की निशानी है, जिसमें न बच्चे के लिए सम्मानपूर्ण स्थान है और न बाल साहित्य के लिए। हालाँकि दुनिया की हर संपन्न भाषा में बाल साहित्य और बाल साहित्य रचने वालों के लिए बहुत गहरे आदर और सम्मान की भावना है। फिर हमारे यहाँ बाल साहित्य और बाल साहित्यकारों के प्रति यह दुर्भाव क्यों है, यह समझना मुश्किल है।...जरूर इसके पीछे हमारे आलोचकों की कोई कुंठा है। हालाँकि प्रेमचंद सरीखे हिंदी के दिग्गज कथाकार ने बच्चों के लिए एक से एक सुंदर कहानियाँ लिखीं, बल्कि ‘कुत्ते की कहानी’ सरीखा उपन्यास भी, जिसे हिंदी का पहला बाल उपन्यास होने का गौरव हासिल है। पर पता नहीं क्यों, ज्यादातर लोग इस बात से अनजान हैं। इसी तरह आपको शायद पता नहीं कि प्रेमचंद की ‘ईदगाह’, ‘गुल्ली-डंडा’, ‘बड़े भाईसाहब’, ‘दो बैलों की कथा’ सरीखी कहानियाँ असल में बड़ों के लिए लिखी गई थीं। यह अलग बात है कि बच्चे भी इनका आनंद लेते हैं।...पर आपको आश्चर्य होगा कि प्रेमचंद ने विशेष रूप से बच्चों के लिए ‘गुब्बारे में चीता’ सरीखी कई सुंदर और भावपूर्ण कहानियाँ लिखी थीं, जो उनकी पुस्तक ‘जंगल की कहानियाँ’ में शामिल हैं। ये इतनी सुंदर और रसपूर्ण कहानियाँ हैं कि इन्हें पढ़ते हुए आपका भी बच्चा बन जाने का मन करेगा, ताकि आप इनका भरपूर आनंद ले सकें। और अकेले प्रेमचंद ही क्यों, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान, रामनरेश त्रिपाठी और आगे चलकर निराला, पंत, महादेवी वर्मा, भवानी भाई, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना—सबने बच्चों के लिए लिखा और खूब लिखा। यह परंपरा आगे भी चलती आई और आज के दौर के कई बड़े और प्रतिभाशाली लेखक भी बच्चों के लिए लिख रहे हैं। निराला की ‘भिक्षुक’ जैसी मर्मस्पर्शी कविताएँ तो बच्चे पढ़ते ही हैं। पर उन्होंने बच्चों के लिए सुंदर जीवनियाँ भी लिखी हैं। इसी तरह निराला ने अपनी ‘सीख भरी कहानियाँ’ पुस्तक में ईसप की कथाओं को बच्चों के लिए बड़े ही खूबसूरत कलेवर में पेश किया है। इस पुस्तक की भूमिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, जिसमें निराला कहते हैं, कि वही लेखक अमर हो पाता है, जिसकी रचनाएँ बच्चे रस लेकर पढ़ते हैं। यानी जो साहित्य बच्चों के दिल में उतर जाता है, वही अमर साहित्य है। बाल साहित्य के लिए ये सम्मानपूर्ण अल्फाज किसी और के नहीं, महाप्राण निराला के हैं, जो हमारे शीर्षस्थ साहित्यकार हैं, और बीसवीं सदी के सबसे बड़े कवि। फिर भी अगर आलोचकों को बाल साहित्य का यह विशाल वैभव नहीं नजर आता तो यह हमारी आलोचना का दुर्भाग्य है, हिंदी के बाल साहित्य का नहीं।
वैसे अनामी भाई, आपको हैरानी होगी, हमारे आलोचक इतने कुंठित हैं कि जब वे रामनरेश त्रिपाठी, दिनकर, महादेवी वर्मा, रघुवीर सहाय या सर्वेश्वर के रचनाकार व्यक्तित्व की चर्चा करते हैं तो उनके बाल साहित्य को एकदम ओट कर देते हैं। पर वे नहीं जानते कि बाल साहित्य की चर्चा के बगैर इनमें से किसी भी साहित्यकार के व्यक्तित्व और संवेदना को वे ठीक से समझ ही नहीं सकते। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हिंदी की आलोचना अपनी पिछली भूल-गलतियों और सीमाओं से उबरेगी और बाल साहिय के महत्त्व को स्वीकारेगी। हालाँकि मैं फिर कहूँगा कि आलोचक स्वीकारें या नहीं, इससे हिंदी बाल साहित्य की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। वह तो है और अपने मीठे रस से लाखों बालकों को आनंदित कर रहा है, उनके व्यक्तित्व को दिशा दे रहा है। यह अपने आप में बड़ी बात है। आज आलोचना भूल कर रही है तो यकीनन कल वह भूल-सुधार भी करेगी, और तब उसे समझ में आएगा कि जिस बाल साहित्य को वह छोटा पोखर समझ रही थी, वह तो एक महासिंधु है। बस, आँखें खोलकर उसे देखने, समझने और सराहने की जरूरत है।
अनामीशरण – मनु जी, मेरे खयाल से बाल पाठकों के लिए करीब दर्जन भर बाल पत्रिकाएँ आज भी ठीक-ठाक निकल रही हैं, जिनके लाखों पाठक हैं। क्या आप इस स्थिति से संतुष्ट है?
प्रकाश मनु – पूरी तरह तो नहीं अनामी भाई, इसलिए कि इतने बड़े देश में हिंदी के बाल पाठकों के लिए कोई पचास-साठ पत्रिकाएँ तो होनी ही चाहिए। और कितना अच्छा हो, अगर उनकी ग्राहक संख्या लाखों में हो और वे देश के कोने-कोने में बैठे बच्चों तक पहुँचे। सच पूछिए तो मैं इन बाल पत्रिकाओं को, सिर्फ पत्रिका नहीं, बल्कि देश भर में फैले बाल पाठकों के लिए ओपन एयर यूनिवर्सिटी मानता हूँ। जीवन के ऐसे खुले विश्वविद्यालय, जिनमें नाम लिखाने की दरकार नहीं है। अगर आप नियमित पत्रिका पढ़ते हैं तो आप खुद-ब-खुद संस्कारित होंगे। आपकी भाषा, विचार, बल्कि कहना चाहिए समूचे व्यक्तित्व में निखार आएगा। इसलिए अनामी भाई, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे देश-समाज के बचपन को सँवारने में बाल पत्रिकाओं की बहुत बड़ी भूमिका है। हो सकता है, आज नहीं तो कल देश के विचारशील लोगों का ध्यान बाल पत्रिकाओं की ओर जाए, और यह बड़ी सुखद स्थिति होगी।
यों बाल पत्रिकाओं का वर्तमान भी कम उत्साहजनक नहीं है। बाल साहित्य बच्चों का साहित्य है और वह इन सुंदर, सुरुचिपूर्ण रूप-सज्जा वाली बाल पत्रिकाओं के जरिए उन तक पहुँच रहा है, तो संवाद अपने आप पूरा हो जाता है। बाल साहित्य के अच्छे आलोचक और पारखी हों तो यह और भी अच्छी बात है, पर अगर यह काम उतनी बड़ी मात्रा में नहीं हो पा रहा, तो भी अच्छा बाल साहित्य किसी सुंदर गुलदस्ते जैसी सजी-धजी, बहुरंगी पत्रिकाओँ के माध्यम से बच्चों तक पहुँचे, उनके व्यक्तित्व और रुचियों को सँवारे और उनके संपूर्ण विकास में अपनी भूमिका निभाए, तो यह भी कोई छोटी बात नहीं है। मेरा निश्चित मत है कि आज के निराशा भरे दौर में भी, अगर हमारे यहाँ बचपन अधिक भटका नहीं है, तो इसका श्रेय हमें अच्छी बाल पत्रिकाओं को देना होगा।
अनामीशरण – मनु जी, बाल साहित्य के समकालीन हालात पर आपकी प्रतिकिया?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, सच कहूँ तो वर्तमान दौर बाल साहित्य की सर्वांगीण उन्नति और बहुमुखी विकास का दौर है, जब कि उसकी पताका आसमान में ऊँची लहरा रही है। ‘नंदन’ के यशस्वी संपादक जयप्रकाश भारती जी बड़े जोर-शोर और उत्साह से इक्कीसवीं सदी को बालक और बाल साहित्य की सदी कहा करते थे। तब उनकी बात हमें ज्यादा समझ में नहीं आती थी। पर यह एक सुखद आश्चर्य है कि समय ने इसे सच कर दिया है। निस्संदेह इक्कीसवीं सदी बाल साहित्य के असाधारण उत्कर्ष की सदी है। इसे आज बड़ों के साहित्यकार भी महसूस कर रहे हैं और वे खुद बड़ी जिम्मेदारी के साथ बच्चों के लिए लिख रहे हैं। अगर कोई खुली आँखों से देखे तो उसे आज बाल साहित्य की विजय-गाथा हवाओं के मस्तक पर लिखी हुई नजर आ सकती है। जो लोग आज इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे, वे कल इसे स्वीकार करेंगे। इसके अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है।
अनामीशरण - कई दशक तक देश की सबसे अच्छी और सबसे अधिक बिकने वाली पत्रिका ‘नंदन’ के साथ आप जुड़े रहे। आपके खयाल से उस समय के ‘नंदन’ का सबसे सबल पक्ष क्या था? ऐसे ही, ‘नंदन’ में और क्या सुधार होना चाहिए था, ताकि इसका महत्त्व और बेहतर साख रहती?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, आपका यह सवाल बहुत अच्छा है। मैं कोई पच्चीस वर्षों तक ‘नंदन’ के संपादन से जुड़ा रहा। लगभग अपना पूरा जीवन ही मैंने ‘नंदन’ के जरिए बाल साहित्य की सेवा में लगाया है, और ये दिन मेरे लिए कितने आनंद भरे थे, मैं आपको बता नहीं सकता। इसलिए कि ‘नंदन’ के जरिए देश भर के बच्चों और बाल साहित्य दोनों से जुड़ने का आनंद मुझे मिला। इससे मेरा मन ही नहीं, आत्मा भी शीतल होती थी और कहीं अंदर लगता था कि बच्चों के लिए लिखकर हम उनके नन्हे हृदयों में उजाला कर रहे हैं। ऐसे असंख्य दीप जलाकर मानो हम ईश्वर का ही अधूरा काम पूरा कर रहे हैं, जिससे यह दुनिया कुछ और सुंदर और आनंदपूर्ण हो जाएगी! अनामी भाई, आपने ‘नंदन’ के सबसे सबल पक्ष के बारे में पूछा है। मेरे खयाल से ‘नंदन’ का सबसे सबल पक्ष यह था कि उसमें बच्चों के लिए ऐसी सामग्री हम लोग देते थे, जिसे पढ़कर वे आनंदित हों और खेल-खेल में बहुत कुछ सीखें भी। उसमें छपने वाली कहानियाँ हों, कविताएँ, लेख या फिर विविध किस्म की जानकारियाँ, ये सब इतनी आसान भाषा में और इतने रुचिकर ढंग से हम लोग प्रस्तुत करते थे, कि अगर किसी बच्चे के सामने ‘नंदन’ पत्रिका रखी हो, तो वह उसे उठाए बगैर रह ही नहीं सकता था। और एक बार हाथ में लेने के बाद वह उसे पढ़े बिना नहीं छोड़ सकता था। यह बहुत बड़ी चीज थी, जिसने ‘नंदन’ को लाखों बच्चों की सबसे लोकप्रिय और चहेती पत्रिका बना दिया।...उन दिनों जयप्रकाश भारती जी ‘नंदन’ के संपादक थे और उनके प्राण जैसे ‘नंदन’ में ही बसते थे। पत्रिका में छपने वाली रचनाओं का एक-एक शब्द उनकी आँखों से गुजरता था, तभी वह छपने जाता था। वे हमें सिखाते कि हम बच्चों के लिए जो भी लिखें, वह बेहद आसान भाषा में हो। वाक्य छोटे-छोटे, रोजमर्रा के जीवन में स्तेमाल होने वाले आसान शब्द...पर उन्हीं में हम चाहें तो बहुत गहरा प्रभाव ला सकते हैं। यह ‘नंदन’ की एक बड़ी विशेषता थी, जो आज भी बनी हुई है। इसी तरह भारती जी पत्रिका में ज्ञान या उपदेश ठूँसने के खिलाफ थे। वे कहते थे, ज्ञान की यह भारी गठरी तो बच्चों की पाठ्य पुस्तकों में ही बहुत है। हमें उसके सिर पर रखे बोझे को और बढ़ाना नहीं है, बल्कि कम करना है। बच्चा ‘नंदन’ की रचनाएँ उत्फुल्ल होकर पढ़ेगा तो उसके भीतर पढ़ने-लिखने की ऐसी ललक पैदा होगी कि स्कूल की किताबें भी वह बड़ी रुचि से पढ़ेगा, जीवन में बहुत कुछ सीखेगा और आगे चलकर देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनेगा, जिसके मन में दूसरों के लिए प्यार और हमदर्दी होगी। ऐसा सहृदय और संवेदनशील बच्चा किसी के साथ बेईमानी नहीं करेगा, किसी को धोखा नहीं देगा। सच पूछिए तो ‘नंदन’ बच्चों के भीतर बड़े-बड़े जीवन-मूल्य भरने वाली पत्रिका थी, पर यह सब इतना अनायास होता था कि बच्चे को पता ही नहीं चलता था कि वह खेल-खेल में कैसे जीवन की बड़ी-बड़ी बातें सीखता जा रहा है। मैं समझता हूँ, ‘नंदन’ की सबसे बड़ी खासियत शायद यही थी।
आपने उस दौर के ‘नंदन’ में सुधार की बात पूछी है, तो बस एक ही बात हम लोग महसूस करते थे कि इसमें परीकथाओं और पुराण कथाओं की अधिकता है। उस समय ‘नंदन’ पत्रिका अगर इस अति से बच पाती और साथ ही आधुनिक कथाएँ भी उसमें शामिल होतीं, जिनमें बच्चे अपने जीवन में नित्यपति जो देखते और झेलते हैं, उसके अक्स सामने आते, तो पत्रिका का रूप कुछ अधिक संतुलित हो जाता। इसी तरह खेल, विज्ञान आदि का महत्त्व दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, उनके बिना आज के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पर ‘नंदन’ में उनकी उपस्थिति उतनी न थी, जितनी होनी चाहिए थी। पत्रिका में बच्चों को खेल-खेल में विज्ञान की जानकारी दी जाती, तो जरूर वे रुचि से पढ़ते और बहुत कुछ सीखते भी। विज्ञान भी उनके लिए खेल की तरह ही होता। इसी तरह खेलों के इतिहास आदि की जानकरी उन्हें दी जाती तो यह बहुत आनंददायक होता। पर ‘नंदन’ में ये चीजें बहुत कम देखने को मिलती थीं और कभी-कभार ही नाम-मात्र के लिए उनके दर्शन हो जाते थे। बाद में भारती जी के सेवामुक्त होने पर जब क्षमा शर्मा जी कार्यकारी संपादक बनीं, तो ‘नंदन’ का रूप बदला। हम सबने उसके नए कलेवर के बारे में खुले मन से विचार किया। फिर ‘नंदन’ में बड़े अनूठे ढंग से नई-नई चीजें शुरू की गईं। बाल पाठकों ने इस बदलाव को बहुत पसंद किया। हम लोगों ने पत्रिका के एक से एक सुंदर विशेषांक निकाले, जिन पर बच्चो की बहुत उत्साहपूर्ण प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलती थीं।...काश, यह कुछ बरस पहले भारती जी के समय में ही हो जाता, तो ‘नंदन’ का जलवा आज कुछ और ही होता, और बेशक उसकी प्रसार संख्या भी बढ़ती।
अनामीशरण – मनु जी, देश में इस समय प्रकाशित हो रही बाल पत्रिकाओं के हाल पर आपकी क्या राय है?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, इस समय देश में हिंदी की कई अच्छी बाल पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं, जिनका जुदा-जुदा व्यक्तित्व है और अपने ढंग से सभी बाल साहित्य की सेवा कर रही हैं। इनमें ‘नंदन’ और ‘बाल भारती’ पत्रिकाएँ तो बहुत पुरानी हैं। उन्होंने एक तरह से अपना पुराना चोला उतारकर आज के समय से अपना रिश्ता बनाया है और पुनर्नवा होकर बच्चों और बाल साहित्य की महत्त्वपूर्ण संदेशवाहिका बनी हुई हैं। इनमें ‘बाल भारती’ पत्रिका सन् 1948 में प्रारंभ हुई थी और ‘नंदन’ सन् 1964 से निकल रही है। समय के बहुत थपेड़े झेलकर और बहुत सारे परिवर्तनों से होते हुए भी वे अच्छा बाल साहित्य बच्चों तक पहुँचा रही हैं, यह अच्छी बात है। इसी तरह ‘चकमक’ एक अलग तरह की पत्रिका है, जिसकी सोच काफी अलग है और उसने लीक से हटकर बहुत से अच्छे काम किए हैं। इन सबसे अलग एक बेहद महत्त्वपूर्ण पत्रिका, जिसके पीछे कोई बड़ा आर्थिक अवलंब नहीं है और जो बहुत कम साधनों से निकल रही है, वह है ‘बालवाटिका’, जिसने पिछले कुछ वषों में अपनी एक नई सबल पहचान बनाई है, और उसे बाल साहित्य की सर्वाधिक प्रतिनिधि पत्रिका होने का गौरव हासिल है। ‘बालवाटिका’ की विशेषता है कि उसके साथ देश भर के बाल साहित्यकार जुड़े हैं और पत्रिका के बड़े ही विनम्र और समर्पित संपादक भैरूँलाल गर्ग बड़े आदर के साथ नए-पुराने सभी बाल साहित्यकारों की रचनाएँ प्रकाशित करते हैं। बाल साहित्य और बाल साहित्यकारों का परिवार कितना बड़ा और रचनात्मक रूप से समृद्ध है, यह ‘बालवाटिका’ पढ़ने से ही पता चल जाता है।
‘बालवाटिका’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ न सिर्फ बाल साहित्यकारों की अच्छी से अच्छी रचनाएँ पढ़ने को मिलती हैं, बल्कि बाल साहित्य विमर्श की भी यह बड़ी महत्त्वपूर्ण पत्रिका है। बाल साहित्य से जुड़े हुए मुद्दों को वह बड़ी गंभीरता से उठाती है। इसी तरह अपना पूरा जीवन लगाकर बच्चों का साहित्य लिखने वाले बड़े और दिग्गज साहित्यकारों पर ‘बालवाटिका’ में समय-समय पर बड़े गंभीर और पठनीय लेख पढ़ने को मिल जाते हैं। इतना ही नहीं, पिछले कुछ वर्षों से बाल साहित्य के शिखर पुरुषों निरंकारदेव सेवक, द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी, हरिकृष्ण देवसरे, जयप्रकाश भारती, डा. श्रीप्रसाद, आनंदप्रकाश जैन, ठाकुर श्रीनाथ सिंह, शकुंतला सिरोठिया, मनोहर वर्मा, राष्ट्रबंधु आदि पर इतने सुंदर और स्मरणीय विशेषांक ‘बालवाटिका’ के निकले कि शायद कुछ बरस पहले इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। निश्चित रूप से ‘बालवाटिका’ का यह एक ऐतिहासिक अवदान है। इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। इसी तरह ‘बालवाटिका’ बाल साहित्य की एकमात्र पत्रिका है, जिसमें निरंतर बाल साहित्य की विविध विधाओं पर बड़ी रोचक सामग्री पढ़ने को मिल जाती है। यह भी, मैं समझता हूँ, बड़ी प्रशंसनीय कोशिश है। बच्चों के लिए बड़े ही सरस और भावपूर्ण संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, आत्मकथा-अंश, उपन्यास-अंश, एकांकी आदि जितनी बहुलता से ‘बालवाटिका’ में छपते हैं, वैसा कहीं और देखने को मिलेगा, यह कल्पना तक मुश्किल है। शकुंतला सिरोठिया, द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी जी और निरंकारदेव सेवक जी की जन्मशती पर किसी और पत्रिका में शायद दो पंक्तियाँ भी नहीं छपीं, पर ‘बालवाटिका’ ने सुंदर विशेषांक निकालकर उनका स्मरण किया। इससे बाल साहित्य का गौरव बढ़ा है, इसलिए देखते ही देखते ‘बालवाटिका’ बाल साहित्य की सबसे महत्त्वपूर्ण और प्रतिनिधि पत्रिका के रूप में उभरकर आई है, जिसके साथ बाल साहित्यकारों का एक बड़ा कारवाँ नजर आता है। आगे भी यह इसी तरह चले तो कोई शक नहीं कि बाल साहित्य की कीर्ति-पताका दूर-दूर तक लहराती नजर आएगी।
हालाँकि यह खुद में बड़े आश्चर्य की बात है कि इतने सीमित साधनों से ऐसा असंभव लगता काम गर्ग जी ने इतनी विनमता और समर्पण भाव के साथ कर दिखाया। उनके आग्रह पर रचनाकार अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए विकल रहते हैं। निस्संदेह इस सबने ‘बालवाटिका’ को बाल पत्रिकाओं की कतार में सबसे अलग और वरेण्य स्थान पर काबिज कर दिया है। यों सभी पत्रिकाएँ अपने-अपने ढंग से काम कर रही हैं, पर ‘बालवाटिका’ कई मामलों में बेनजीर है और अपने ढंग से बाल साहित्य की अनथक सेवा कर रही है। कुछ पत्रिकाएँ सिर्फ पत्रिकाएँ होती हैं और इतिहास में उनका नाम दर्ज होता है, पर कुछ पत्रिकाएँ आगे बढ़कर इतिहास निर्मित करती हैं। ‘बालवाटिका’ को भी मैं इस दृष्टि से, बाल साहित्य का इतिहास गढ़ने वाली पत्रिका कहता हूँ।
अनामीशरण - आज जब बाल साहित्य के इतिहास पर आपने काम कर लिया है तो आपकी नजर में बच्चों के लिए एक सार्थक, रचनात्मक और सर्वोत्तम बाल पत्रिका कैसी होनी चाहिए? इसकी रूपरेखा पर कृपया प्रकाश डालें।
प्रकाश मनु – मैंने बताया न, ‘नंदन’, ‘बाल भारती’, ‘चकमक’ और ‘बालवाटिका’—ये सभी पत्रिकाएँ अपने-अपने ढंग से बाल साहित्य की सेवा कर रही हैं। सभी का जुदा-जुदा व्यक्तित्व है, पर सभी में कुछ न कुछ ऐसा है जो औरों से अलग और विशिष्ट है। इसलिए इन सभी पत्रिकाओं की विशेषताएँ शामिल करके अगर कोई आदर्श पत्रिका बन सके, तो वह शायद मेरे ही नहीं, हर बच्चे और बाल साहित्यकार की भी सबसे प्रिय पत्रिका होगी, जो उसके दिल के बहुत करीब होगी। मेरे सपनों की इस आदर्श पत्रिका में ‘नंदन’ और ‘चकमक’ सरीखी पत्रिकाओं की मोहक सज्जा और आकर्षण होगा तो ‘बाल भारती’ सरीखा परंपरा और आधुनिकता का सम्मिलन भी। साथ ही उसमें ‘बालवाटिका’ सरीखी वैचारिक ऊर्जा, प्रखरता और रचनात्मक समृद्धि होगी। इतना ही नहीं, ‘बालवाटिका’ में बाल साहित्य के साथ-साथ बाल साहित्यकारों के प्रति भी असीम सम्मान का भाव नजर आता है। मेरी आदर्श पत्रिका में यह चीज जरूर होगी। इसी तरह ‘बालवाटिका’ में कहानी, कविता के साथ-साथ बड़े ही भावपूर्ण संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, आत्मकथा, उपन्यास-अंश, एकांकी आदि भी पढ़ने को मिल जाते हैं। मैं चाहूँगा कि मेरी आदर्श पत्रिका में बाल साहित्य की ये सभी विधाएँ शामिल हों, ताकि वह समस्त बाल साहित्य की सर्वाधिक प्रतिनिधि पत्रिका कहला सके।...यों बेशक उसमें ‘बालवाटिका’ का अंश सबसे अधिक होगा, इसलिए कि गर्ग जी उसमें बाल साहित्यकारों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रचनाएँ आग्रह कर-करके मँगवाते, और उतने ही आदर के साथ सँजोते भी हैं। ‘बालवाटिका’ और उसके उत्साही संपादक भैरूँलाल गर्ग जी के मन में लेखकों और साहित्यकारों के प्रति जो सम्मान का भाव है, उसका सौवाँ अंश भी मुझे किसी और पत्रिका में नजर नहीं आता। पर इसे मैं इन पत्रिकाओं की बड़ी कमजोरी मानता हूँ। अगर बाल साहित्यकारों के प्रति आपके मन में सम्मान नहीं है, तो बाल साहित्य के प्रति आपका अनुराग भी सच्चा नहीं हो सकता।
यों एक बात तो निश्चित है कि मेरी आदर्श बाल पत्रिका में बाल साहित्य के लिए जीवन अर्पित करने वाले साहित्यिकों की आपको निरंतर उपस्थिति देखने को मिलेगी। उनकी कालजयी रचनाओं के जरिए उन्हें याद करने का सिलसिला भी चलता रहेगा। मेरी वह आदर्श पत्रिका कब निकलेगी, कैसे निकलेगी और मेरे जीवन काल में निकलेगी भी कि नहीं, मैं नहीं जानता। पर कम से कम उसका सपना तो मैं देख ही सकता हूँ, और अनामी भाई, मैं अपने जीवन के आखिरी पल तक ऐसी सुंदर और सर्वांगपूर्ण पत्रिका का सपना देखता रहूँगा।
अनामीशरण – बड़ों के साहित्य के समकालीन परिदृश्य पर आपकी टिप्पणी? उसकी तुलना में बाल साहित्य के वर्तमान हालात को आप किस तरह देखते हैं?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, मोटे तौर से बड़ों के साहित्य और बाल साहित्य के समकालीन परिदृश्य में कोई बहुत अंतर नहीं है। दोनों ही रचनात्मक दृष्टि से खासे समृद्ध हैं और एक उत्साह भरा माहौल दोनों में ही नजर आता है। जिस तरह बड़ों के लिए लिखी जा रही कहानियों, कविताओं, उपन्यासों आदि में नई पीढ़ी बहुत प्रचुरता से हिस्सा ले रही है और एक ताजगी भरी फिजाँ दिखाई देती है, लगभग वही मंजर बाल साहित्य में भी है, जिसमें एक साथ तीन या चार पीढ़ियों के साहित्यकार निरंतर लिख रहे हैं और हर ओर खासी सक्रियता नजर आती है। शायद बड़ों के लिए लिखे जा रहे साहित्य का ही बाल साहित्य पर यह प्रभाव पड़ा कि अभी तक उपेक्षित रही विधाओं संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, रेखाचित्र, आत्मकथा आदि में भी अब खासी हलचल दिखाई देती है। और यहाँ तक कि जीवनी और ज्ञान-विज्ञान साहित्य में भी बहुत कुछ नयापन और कलातमक ताजगी नजर आती है। खासकर युवा पीढ़ी की सक्रियता दोनों ही जगह उत्साह भरा मंजर उपस्थित करती दिखाई देती है। इससे कई जगह तो पुरानी पीढ़ी के अंदर भी थोड़ी सक्रियता और कुछ नया करने की ललक पैदा हुई है। इसे मैं शुभ संकेत मानता हूँ।
इसी तरह बड़ों का साहित्य हो या बाल साहित्य, दोनों ही जगह अगर एक ओर उत्कृष्ट साहित्य नजर आता है तो दूसरी ओर बहुत सी साधारण चीजों की बाढ़ भी है, जिनके बीच से श्रेष्ठ और उत्कृष्ट को निरंतर अलगाने की जरूरत है। पर बड़ों के साहित्य को समीक्षा, आलोचना आदि के जैसे सुअवसर मिल जाते हैं, वैसा बाल साहित्य में बहुत कम है, और इसका कुछ खमियाजा भी उसे सहना पड़ता है। इसके कारण बाल साहित्य में जो श्रेष्ठ है, उस पर हमारा ध्यान नहीं जाता, और कई बार औसत साहित्य इतनी जगह घेर लेता है कि बहुत लोग पूछते हैं कि मनु जी, क्या यही है वह बाल साहित्य, जिसके आप इतने गुण गाते हैं? तब उन्हें समझाना पड़ता है कि देखिए, बाल साहित्य में बहुत सी साधारण चीजें भी हैं। जैसे कोई भूसे से भरी कोठरी हो, जिसमें बीच-बीच में बहुत मीठे रसभरे दाने भी नजर आ जाते हैं। पर किसी भी साहित्य का मूल्यांकन तो उसकी श्रेष्ठ रचनाओं से ही होना चाहिए। यह जितना बड़ों के साहित्य के बारे में सच है, उतना ही बाल साहित्य के बारे में भी। तो कुल मिलाकर अनामी भाई, हिंदी में बड़ों के लिए लिखा जाने वाला साहित्य और बाल साहित्य—ये दोनों दो समांतर चलती निरंतर प्रवहमान नदियाँ हैं, जो एक-दूसरे को भी कुछ न कुछ प्रेरणा देती हैं। मैं समझता हूँ, यह किसी भी भाषा के लिए बड़े गौरव की चीज है।
अनामीशरण – आपका यह महाग्रंथ बाल लेखन का इतिहास है या बाल साहित्य का इतिहास? यदि बाल साहित्य का इतिहास है तो बाल साहित्य क्या है, या साहित्य में बालपन क्या है, जिसके महत्त्व को निरंतर उपेक्षित किया जाता रहा है?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, बाल साहित्य और बाल लेखन में कोई फर्क तो है नहीं। वैसे मेरा इतिहास-ग्रंथ हिंदी बाल साहित्य का इतिहास है। यों भी बाल साहित्य, मेरे खयाल से, बाल लेखन की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और मानीखेज भी है। फिर बाल लेखन से कुछ ध्वनि इस तरह की भी निकलती है कि यह केवल बच्चों दारा लिखा गया साहित्य है, जबकि बाल साहित्य असल में तो बड़ों द्वारा बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य है। इसमें कुछ हिस्सा बच्चों द्वारा खुद भी लिखा गया है, पर मोटे तौर से तो बड़ों ने बच्चों के लिए जो सुंदर, मोहक और आनंदपूर्ण रचनाएँ लिखीं, वे ही बाल साहित्य के अंतर्गत आती हैं।
अनामीशरण - इतिहास लेखन के सिलसिले में बरसोंबरस जो गहरी खोजबीन आपने की, उसमें आपको क्या ऐसा अनोखा और रोमांचित करने वाला मिला, या कि अभी तक अज्ञात रहे कौन-कौन से ऐसे अनमोल रत्न हासिल हुए, जिन्हें अब आप किसी और तरह से सामने लाने की योजना पर काम कर रहे हैं?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, इतिहास लिखते समय जो सबसे अद्भुत चीजें मुझे मिलीं, वे थीं हमारे बड़े साहित्यकारों द्वारा बच्चों के लिए लिखी गई एक से एक मनोरम रचनाएँ। हिंदी बाल साहित्य का यह पक्ष बहुतों के लिए अज्ञात है। पर वह इतना सुंदर, मोहक, अनुपम और रोमांचित करने वाला है कि सच पूछिए तो मैं हैरान रह गया। हिंदी में बार-बार यह कहा जाता है कि बड़े साहित्यकारों ने बाल साहित्य नहीं लिखा, पर इतिहास लिखते समय निरंतर अध्ययन और खोजबीन से यह धारणा गलत साबित हुई। लगा कि हिंदी के एक से एक दिग्गज कवियों, कथाकारों ने बच्चों के लिए लिखा है। और बहुत अच्छा लिखा है। मैं प्रेमचंद क जिक्र तो पहले कर ही चुका हूँ, जिन्होंने बच्चों के लिए पहला उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ लिखा, और इसे मैं बाल साहित्य का बहुत बड़ा गौरव और सौभाग्य मानता हूँ। इसी तरह प्रेमचंद ने ‘जंगल की कहानियाँ’ शीर्षक से बच्चों के लिए विशेष रूप से कुछ कहानियाँ लिखीं, जिनका आज भी बहुतों को पता नहीं है। बाल साहित्य के प्रांरंभिक काल में हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, सुभदाकुमारी चौहान, रामनरेश त्रिपाठी सरीखे कवियों ने बच्चों के लिए एक से एक सुंदर कविताएँ लिखीं। ये कविताएँ सचमुच निराले और अनमोल रत्नों सरीखी हैं। इसी तरह मैथिलीशरण गुप्त की लिखा एक बड़ी सुंदर बाल कहानी भी मुझे मिली, जो ‘बाल भारती’ पत्रिका में छपी थी। कहानी का नाम है, ‘जगद्देव’ और यह वाकई मन को बाँध लेने वाली कहानी है, जिसमें जगद्देव का त्यागमय, उदात्त चरित्र भूलता नहीं है। बाद के दौर में भवानी भाई, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना सरीखे कवियों ने एक से एक अद्भुत कविताएँ लिखीं। पंत और महादेवी ने भी बच्चों के लिए रसपूर्ण कविताएँ लिखीं और निराला की ‘सीख भरी कहानियाँ’ तो बहुत ही दमदार हैं। निराला ने बच्चों के लिए सुंदर जीवनियाँ भी लिखीं, जिनका बहुतों को पता नहीं है। इसी तरह कमलेश्वर, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, शैलेश मटियानी, कृष्ण चंदर, कृष्ण बलदेव वैद, हरिशंकर परसाई सरीखे लेखकों ने बच्चों के लिए खूब लिखा। बल्कि आपको हैरानी होगी, मैंने कृष्णा सोबती के कुछ सुंदर कल्पनापूर्ण शिशुगीत भी पढ़े हैं, जो ‘नंदन’ के पुरानी फाइलों में सुरक्षित हैं। मैंने उनका जिक्र इस इतिहास-ग्रंथ में किया है। इसी तरह बाद के दौर में रमेशचंद्र शाह, राजेश जोशी, नवीन सागर समेत बहुत से लेखकों-कवियों ने बच्चों के लिए लिखा, जिनका कोई जिक्र नहीं करता और बहुतों को इसकी जानकारी भी नहीं है। पर इस इतिहास-ग्रंथ में उनके लिखे बाल साहित्य का मैंने बड़े सम्मान से जिक किया है। इसी तरह श्रीलाल शुक्ल ने रवींद्रनाथ ठाकुर की एक पद्यकथा के आधार पर इतना अद्भुत हास्य-विनोदपूर्ण बाल नाटक लिखा है कि उसे पढ़कर बच्चा बन जाने का मन करता है। यह नाटक है, ‘आविष्कार जूते का’। पढ़ते जाइए और खुदर-खुदर हँसते जाइए। मैं समझता हूँ, इस इतिहास-ग्रंथ में ऐसे एक से एक अनमोल नगीने हैं, जिन्हें पढ़कर बहुतों की आँखें खुल जाएँगी और बाल साहित्य की सीमाएँ कहाँ-कहाँ तक जा पहुँची हैं, जानकर वे अचरज में पड़ जाएँगे।...मेरा मन है कि बाल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि के बड़े संचयन निकालूँ, जिसमें मौजूद दौर के रचनाकारों के साथ-साथ पुराने साहित्य महारथियों के ऐसे अनमोल नगीनों को भी शामिल करूँ। वह कब तक हो पाएगा, हो पाएगा भी कि नहीं, मैं नहीं जानता। इसलिए कि अब मेरी शक्तियाँ क्षीण हो रही हैं। पर अगर साँसों की डोर चलती रही, तो ऐसे कुछ बड़े और यादगार काम तो मैं जरूर करना चाहूँगा।
अनामीशरण – मनु जी, अपने इतिहास लेखन की कुछ प्रेरणादायी बातों को आप पाठकों को बताना चाहेंगे?
प्रकाश मनु – हाँ, अनामी भाई। और इसमें सबसे प्रमुख बात यह है कि बाल साहित्य हर दौर में बच्चों से और अपने समय से करीबी तौर से जुड़ा रहा है और उसमें लगातार आशा, जिजीविषा के स्वर सुनाई देते रहे हैं, जिनसे बच्चों में कुछ कर दिखाने का हौसला पैदा होता है। फिर एक बड़ी बात है, बाल साहित्य की शाश्वत अपील की। आज से साठ बरस पहले की पीढ़ी जिस बाल साहित्य को पढ़कर बड़ी हुई, उसे उनके बच्चों ने और आगे चलकर नाती-पोतों ने भी पढ़ा और वही आनंद हासिल किया। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि बाल साहित्य हमारी भाषा और हमारे देश-समाज की स्थायी धरोबहर है। वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे देश के बचपन को सँवार रहा है। बच्चों को बचपन की उत्फुल्लता से जोड़ने के साथ-साथ बाल साहित्य उनके अनुभव-क्षितिज का भी निरंतर विस्तार करता है और उनकी आत्मा को उजला करता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर निश्चित रूप से देश के बहुत सजग, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनेंगे और बड़े-बड़े काम कर दिखाएँगे।
और सबसे बड़ी बात तो यह है कि बाल साहित्य हमें अच्छा मनुष्य बनाता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर इंजीनियर बने तो वे अच्छे और कुशल इंजीनियर साबित होंगे, डाक्टर बने तो अच्छे और सहानुभूतिपूर्ण डाक्टर बनेंगे और अध्यापक बने तो बड़े स्नेहिल और जिम्मेदार अध्यापक बनेंगे। मैं समझता हूँ, बाल साहित्य की यह बहुत बड़ी सेवा है। अनामी भाई, यह इतिहास लिखते हुए मैंने पाया कि ऐसा सुंदर, कल्पनापूर्ण और सुंदर भावों से भरा बाल साहित्य हमारे देश में हर काल में लिखा गया और उसने पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बचपन को सँवारा। इसका सीधा मतलब यह है कि इस देश को समृद्ध करने और सही दिशा में आगे बढ़ाने में बाल साहित्य की बहुत बड़ी भूमिका रही है। यह निस्संदेह बड़ी सुखद और रोमांचित करने वाली बात है, जो हमारे भीतर आशा और उम्मीदों का उजाला भर देती है।
अनामीशरण - इस इतिहास लेखन के बाद क्या बाल लेखन के प्रति आपकी धारणा में कोई बदलाव आया है? बाल साहित्य को लेकर आपकी सबसे बड़ी चिंता क्या है?
प्रकाश मनु – हाँ, अनामी भाई, बाल साहित्य का इतिहास लिखने के बाद एक बड़ा परिवर्तन तो आया है मेरे विचारों में। बल्कि एक नहीं, कई परिवर्तन। सबसे बड़ा परिवर्तन तो यह है कि इतिहास लेखन के बाद बाल साहित्य की शक्ति, रचनात्मक समृद्धि तथा बच्चों के भीतर भाव और संवेदना के विस्तार की उसकी अपरिमित सामर्थ्य को लेकर मेरे भीतर आस्था कहीं अधिक गहरी हुई है। मुझे लगता है कि आज जब हमारे समाज में चारों ओर निराशा का पसारा है, तो ऐसे माहौल में बाल साहित्य एक बड़ी संभावना है, जो हमारे दिलों में उम्मीद के दीए जलता है। यहीं एक बात और जोड़नी जरूरी लगती है कि बाल साहित्य बच्चों के लिए तो जरूरी है ही, पर वह केवल बच्चों के लिए ही नहीं, बड़ों के लिए भी उतना ही जरूरी है। बड़े उसे पढ़ते हैं तो उन्हें अपना भोला बचपन याद आता है। बचपन की उस निश्छल दुनिया में पहुँचना उन्हें कहीं अंदर से निमज्जित करता है और पवित्र बनाता है। फिर एक बात और। बड़े जब बाल साहित्य पढ़ेंगे, तो बच्चों के मन और संवेदना को अच्छी तरह समझ पाएँगे। इससे उन्हें यह भी समझ में आएगा कि हम कोई ऐसा काम न करें, जिससे बच्चों के कोमल हृदय को चोट पहुँचे। वे बच्चों के मन की उमंग और सपनों को बेहतर ढंग से समझ पाएँगे और उसे पूरा करने के लिए दोस्त बनकर मदद करेंगे। इससे बच्चों का व्यक्तित्व तो निखरेगा ही, बड़ों का व्यक्तित्व भी निखरेगा। वे अच्छे माता-पिता, अभिभावक और स्नेहशील अध्यापक बन सकेंगे।
अनामीशरण – पर मनु जी, यहीं एक सवाल है मेरा। आपको क्या लगता है, बाल लेखन क्या बच्चों की पहुँच में है?
प्रकाश मनु – हाँ, हिंदी में बच्चों के लिए अच्छी पत्रिकाएँ तो हैं ही, इसके अलावा उनके लिए बहुत पुस्तकें छपती हैं और वे बिकती भी हैं। यह एक संकेत तो है कि बाल साहित्य बच्चों तक पहुँच रहा है और पढ़ा जा रहा है। फिर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, साहित्य अकादेमी तथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय का प्रकाशन विभाग—ये सभी संस्थान बच्चों के लिए सुंदर ढंग से पुस्तकें छापकर उन्हें बच्चों तक पहुँचाने में बड़ी मदद कर रहे हैं। खुद मेरे पास अकसर बच्चों के फोन आते हैं कि अंकल, हमने आपकी यह कहानी पढ़ी और हमें अच्छी लगी।...वे दूर-दराज के बच्चे हैं, कोई बिहार, कोई छत्तीसगढ़ का—पर कोई अच्छी रचना पढ़कर लेखक से बात करने की इच्छा उनके भीतर जोर मारती है। इसका मतलब यह है कि बाल साहित्य पढा जा रहा है और वह बच्चों के दिलों मे भी अपनी जगह बना रहा है। मैं समझता हूँ, यह बड़ा शुभ संकेत है, जो मन को सुकून देता है।
अनामीशरण – आप कई दशकों तक ‘नंदन’ के संपादन से जुड़े रहे हैं तो बच्चों और उनके सृजन से भी परिचित हैं। इस लिहाज से कृपया बताएँ कि बाल लेखन में क्या बच्चों का कोई सृजनात्मक हाथ है या सभी वरिष्ठ और युवा लोग ही बाल लेखन में सक्रिय हैं?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, ‘नंदन’ में हम बच्चों के लिए कई प्रतियोगिताएँ रखते थे। उनमें वे कोई चित्र देखकर कहानी लिखते थे या फिर कविता की कुछ पंक्तियाँ जोड़ते थे। आज का तो मैं नहीं जानता, पर उन दिनों इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले बच्चों के उत्साह का ठिकाना न था। किसी एक प्रतियोगिता के लिए हजारों प्रविष्टियाँ हर महीने आती थीं। उनमें से किसे प्रथम, किसे द्वितीय या तृतीय स्थान पर रखा जाए, यह तय कर पाना बड़ा मुश्किल काम था। हम सभी साथी मिलकर बैठते थे और तब यह निर्णय होता था। काफी विचार-विमर्श और पूरी जिम्मेदारी के साथ। हमें बड़ी खुशी होती थी, जब उनमें से कई लोग बाद में आकर मिलते थे। तब वे बड़े लेखक या किसी और रूप में प्रसिद्धि पा चुके होते थे और कृतज्ञता से भरकर इसका श्रेय ‘नंदन’ को देते थे। ऐसा भी होता कि जिन्होंने बरसों पहले बच्चे के रूप में ‘नंदन’ की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया, बाद में बड़े होने पर उनकी रचनाएँ ‘नंदन’ में सम्मानपूर्वक छपीं। बच्चों की लिखी छोटी-छोटी कविताएँ भी कभी-कभार ‘नंदन’ में ‘नन्ही कलम’ शीर्षक से छपती थीं।
यों ‘नंदन’ में हम ज्यादातर बड़ों की रचनाएँ, या जाने-माने लेखकों की रचनाएँ ही देते थे। इसका कारण यह था कि बच्चों की कविताओं, कहानियों आदि में भाषा आदि की अनगढ़ता और लापरवाही होती थी। कविताओं में छंद, लय आदि की गड़बड़ियाँ भी होती थीं। दूसरे बच्चे इन्हें पढ़ें और इसी को मॉडल मानकर ग्रहण करें, तो वे भी अशुद्ध चीजें ही सीख लेंगे। इससे उनके मन में जो भ्रांति पैदा होगी, वह दूर तक उनके साथ रहेगी। यह तो अच्छी बात नहीं है। तो हमारी कोशिश यह रहती थी कि उनके लिए जो कविताएँ, कहानियाँ और दूसरी रचनाएँ ‘नंदन’ में छपें, वे बड़े और सिद्ध लेखकों की हों, जो बच्चों को लुभाएँ और पढ़ने पर खुद उन्हें भी रचनात्मक रूप से समृद्ध करें। इसलिए अनामी भाई, यह बात आपकी ठीक है कि ज्यादातर बाल साहित्य बड़ों का ही लिखा हुआ है। यह केवल हिंदी में ही नहीं, देश-दुनिया की सारी भाषाओं में है।
अनामीशरण – मनु जी, बाल लेखन का सबसे सबल पक्ष क्या है जो प्रायः सभी लेखकों की रचनाओं में देखा जा सकता है?
प्रकाश मनु – अनामी भाई, बाल साहित्य का सबसे सबल पक्ष तो वह रस-आनंद है, जो बच्चों के लिए लिखी गई प्रायः सभी रचनाओं में मिलता है, और पढ़ने वाले को अपने साथ बहा ले जाता है। इसी तरह बाल साहित्य आशा और उम्मीद का साहित्य है, और यह बात भी प्रायः सभी लेखकों की कविताओं और कहानियों में नजर आ जाती है। बड़ों के साहित्य और बाल साहित्य में एक बड़ा फर्क ही यह है कि बाल साहित्य उम्मीद के दीए जलाकर हमारी आत्मा को उजला और प्रकाशित करता है। इसीलिए मैं बार-बार आग्रह करता हूँ कि बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए नहीं है, उसे बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी पढ़ना चाहिए। और अगर बड़े उसे पढ़ेंगे तो वे नाउम्मीदी के अँ

यूपी के समस्त विधायक 40 3 / 2017-2022



प्रस्तुति - गब्बर सिंह बब्बल / दर्शनलाल

प्रदेश के सभी 403 विधायक के मोबाइल नंबर - 2017

एम.एल.ए. हृदय नारायण दीक्षित अध्यक्ष विधान सभा 8887150966
एम.एल.ए. राम गोविंद चैधरी नेता विपक्ष 9415275519
एम.एल.ए. लालजी वर्मा कटेहरी-1 8887151077
एम.एल.ए. लालजी वर्मा कटेहरी-2 9936890035
एम.एल.ए. संजू देवी टांडा-1 9453995060
एम.एल.ए. संजू देवी टांडा-2 8887151078
एम.एल.ए. अनीता आलापुर-1 7379716121
एम.एल.ए. अनीता आलापुर-2 8887151079
एम.एल.ए. रितेश पाण्डेय जलालपुर-1 9670055550
एम.एल.ए. रितेश पाण्डेय जलालपुर-2 8887151080
एम.एल.ए. राम अचल राजभर अकबरपुर-1 8887151081
एम.एल.ए. राम अचल राजभर अकबरपुर-2 9415007042
एम.एल.ए. अनूप खैर-1 8887150871
एम.एल.ए. अनूप खैर-2 9568787777
एम.एल.ए. दलवीर सिंह बरौली-1 8765954771
एम.एल.ए. दलवीर सिंह बरौली-2 9359503201
एम.एल.ए. संदीप कुमार सिंह अतरौली-1 9412444444
एम.एल.ए. रवेन्द्र पाल सिंह छर्रा-1 8887150874
एम.एल.ए. रवेन्द्र पाल सिंह छर्रा-2 8057437777
एम.एल.ए. अनिल पराशर कोल-1 8887150875
एम.एल.ए. अनिल पराशर कोल-2 9412275111
एम.एल.ए. संजीव राजा अलीगढ़-1 8887150876
एम.एल.ए. संजीव राजा अलीगढ़-2 9412273279
एम.एल.ए. राजवीर दिलेर-1 8887150877
एम.एल.ए. राजवीर दिलेर-2 9411803636
एम.एल.ए. राजीव कुमार धनौरा 8887150839
एम.एल.ए. चेतन चैहान नौगांवा सदात 9810223882
एम.एल.ए. महबूब अली अमरोहा 9415905508
एम.एल.ए. महेंद्र सिंह खड़गवंशी 8887150842
एम.एल.ए. सुरेश कुमार जगदीशपुर 7081222221
एम.एल.ए. राकेश प्रताप सिंह गौरीगंज-1 8765954884
एम.एल.ए. राकेश प्रताप सिंह गौरीगंज-2 9919051555
एम.एल.ए. गरिमा सिंह अमेठी-1 8887150986
एम.एल.ए. गरिमा सिंह अमेठी-2 9452264609
एम.एल.ए. मयंकेश्वर शरण सिंह तिलोई अमेठी 9554684345
एम.एल.ए. राम प्रताप सिंह एत्मादपुर आगरा-1 8887150886
एम.एल.ए. राम प्रताप सिंह एत्मादपुर आगरा-2 9412263999
एम.एल.ए. राम प्रताप सिंह एत्मादपुर आगरा-3 9415120511
एम.एल.ए. गिर्राज सिंह धर्मेश आगरा कैंट-1 8887150887
एम.एल.ए. गिर्राज सिंह धर्मेश आगरा कैंट-2 9760843130
एम.एल.ए. योगेन्द्र उपाध्याय आगरा द.-1 9412260666
एम.एल.ए. योगेन्द्र उपाध्याय आगरा द.-2 8765954781
एम.एल.ए. जगन प्रसाद गर्ग आगरा-1 8765954788
एम.एल.ए. जगन प्रसाद गर्ग आगरा-2 9412259181
एम.एल.ए. हेमलता दिवाकर आगरा उ.-1 8887150890
एम.एल.ए. हेमलता दिवाकर आगरा उ.-2 901616506
एम.एल.ए. चै. उदय भान सिंह फतेहपुर सी.-1 8887150890
एम.एल.ए. चै. उदय भान सिंह फतेहपुर सी.-2 94122265081
एम.एल.ए. महेश कुमार गोयल खैरागढ़ 8887150892
एम.एल.ए. जीतेंद्र वर्मा फतेहाबाद-1 975975001
एम.एल.ए. जीतेंद्र वर्मा फतेहाबाद-2 8887150893
एम.एल.ए. रानी पक्षालिका सिंह वाह-1 8887150894
एम.एल.ए. रानी पक्षालिका सिंह वाह-2 8937846000
एम.एल.ए. डाॅ. संग्राम यादव अतरौलिया-1 8768955042
एम.एल.ए. डाॅ. संग्राम यादव अतरौलिया-2 9415240222
एम.एल.ए. नफीस अहमद गोपालपुर-1 9721299990
एम.एल.ए. नफीस अहमद गोपालपुर-2 8887151144
एम.एल.ए. वंदना सिंह सगडी 9415747000
एम.एल.ए. शाहआलम मुबारकपुर-1 8765955045
एम.एल.ए. शाहआलम मुबारकपुर-2 9810065087
एम.एल.ए. दुर्गा प्रसाद यादव आजमगढ़-1 8887151147
एम.एल.ए. दुर्गा प्रसाद यादव आजमगढ़-2 9415905667
एम.एल.ए. आलम बदी निजामाबाद 8765955047
एम.एल.ए. अरूण कुमार यादव फूलपुर पवई-1 8887151149
एम.एल.ए. अरूण कुमार यादव फूलपुर पवई-2 7408003237
एम.एल.ए. सुखदेव राजभर दीदारगंज-1 9415607554
एम.एल.ए. सुखदेव राजभर दीदारगंज-2 8887151150
एम.एल.ए. आजाद अरिमर्दन लालगंज-1 9415370426
एम.एल.ए. आजाद अरिमर्दन लालगंज-2 8887151151
एम.एल.ए. कल्पनाथ पासवान मेहनगर-1 9451575160
एम.एल.ए. कल्पनाथ पासवान मेहनगर-2 8887151152
एम.एल.ए. शिवपाल सिंह यादव जसवंतनगर 9936744444
एम.एल.ए. सरिता भदौरिया इटावा 9412283092
एम.एल.ए. सावित्री कठेरिया भरथना-1 8887151001
एम.एल.ए. सावित्री कठेरिया भरथना-2 9457626030
एम.एल.ए. विक्रमाजीत मौर्य फाफामऊ-1 8887151054
एम.एल.ए. विक्रमाजीत मौर्य फाफामऊ-2 9415289835
एम.एल.ए. डाॅ. जमुना प्रसाद सरोज सोरांव-1 7388073073
एम.एल.ए. डाॅ. जमुना प्रसाद सरोज सोरांव-2 8887151055
एम.एल.ए. प्रवीण पटेल फुलपुर-1 8887151056
एम.एल.ए. प्रवीण पटेल फुलपुर-2 7317002025
एम.एल.ए. मो. मुजतवा सिद्दीकी प्रतापपुर-1 8887151057
एम.एल.ए. मो. मुजतवा सिद्दीकी प्रतापपुर-2 9415905719
एम.एल.ए. हाकिम लाल बिन्द हण्डिया-1 8887151058
एम.एल.ए. हाकिम लाल बिन्द हण्डिया-2 9415747617
एम.एल.ए. हाकिम लाल बिन्द हण्डिया-3 9935285280
एम.एल.ए. नीलम करवरिया मेजा-1 8887105059
एम.एल.ए. नीलम करवरिया मेजा-2 9415215457
एम.एल.ए. उज्जवल रमण सिंह करछना 9839076324
एम.एल.ए. सिद्धार्थ नाथ सिंह इलाहाबाद प. 9532802411
एम.एल.ए. हर्षवर्धन बाजपेयी इलाहाबाद उ.-1 9415235106
एम.एल.ए. हर्षवर्धन बाजपेयी इलाहाबाद उ.-2 9415215976
एम.एल.ए. नन्द गोपाल गुप्ता नन्दी इलाहाबाद द.-1 9839609501
एम.एल.ए. नन्द गोपाल गुप्ता नन्दी इलाहाबाद द.-2 9455073953
एम.एल.ए. डाॅ. अजय कुमार बारा-1 8765954963
एम.एल.ए. डाॅ. अजय कुमार बारा-2 9415283936
एम.एल.ए. डाॅ. राजमणि कोल कोरांव-1 887151065
एम.एल.ए. डाॅ. राजमणि कोल कोरांव-2 9473997367
एम.एल.ए. कुलदीप सिंह सेंगर बांगरमऊ-1 9415905570
एम.एल.ए. बंबा लाल सफीपुर-1 8887150963
एम.एल.ए. बंबा लाल सफीपुर-2 9810114999
एम.एल.ए. बृजेश कुमार मोहन-1 8887150964
एम.एल.ए. बृजेश कुमार मोहन-2 9450012828
एम.एल.ए. पंकज गुप्ता उन्नाव-1 8765954704
एम.एल.ए. पंकज गुप्ता उन्नाव-2 9838108077
एम.एल.ए. अनिल सिंह पुरवा-1 8887150967
एम.एल.ए. अनिल सिंह पुरवा-2 9415107689
एम.एल.ए. अनिल सिंह पुरवा-3 8887150967
एम.एल.ए. विपिन कुमार डेविड एटा-1 8887150904
एम.एल.ए. विपिन कुमार डेविड एटा-2 9837237917
एम.एल.ए. वीरेन्द्र भरहरा-1 9412490792
एम.एल.ए. वीरेन्द्र भरहरा-2 8887150905
एम.एल.ए. संजीव कुमार दिवाकर जलेसर-1 9412895303
एम.एल.ए. संजीव कुमार दिवाकर जलेसर-2 8887150906
एम.एल.ए. सत्यसिंह राठौर अलीगंज, एटा-1 8887150903
एम.एल.ए. सत्यसिंह राठौर अलीगंज, एटा-2 9412281827
एम.एल.ए. विनय शाक्य, विधूना, औरैया-1 9415902768
एम.एल.ए. विनय शाक्य, विधूना, औरैया-2 887151002
एम.एल.ए. लाखन सिंह, दिबियापुर, औरैया-1 8887151003
एम.एल.ए. लाखन सिंह, दिबियापुर, औरैया-2 9411989943
एम.एल.ए. रमेश चन्द्र दिवाकर, औरैया-1 887151004
एम.एल.ए. रमेश चन्द्र दिवाकर, औरैया-2 9997851799
एम.एल.ए. रमेश चन्द्र दिवाकर, औरैया-3 7248371954
एम.एल.ए. अर्चना पाण्डेय, छिबरामऊ, कन्नौज-1 9455074340
एम.एल.ए. अर्चना पाण्डेय, छिबरामऊ, कन्नौज-2 9720799000
एम.एल.ए. अर्चना पाण्डेय, छिबरामऊ, कन्नौज-3 9415026145
एम.एल.ए. कैलाश राजपूत, तिर्वा, कन्नौज-1 9455074340
एम.एल.ए. कैलाश राजपूत, तिर्वा, कन्नौज-2 8887150997
एम.एल.ए. अनिल कुमार दोहरे, कन्नौज-1 8765954897
एम.एल.ए. अनिल कुमार दोहरे, कन्नौज-2 9554779966
एम.एल.ए. भगवती प्रसाद सागर, बिल्हौर, कानपुर नगर-1 8887151009
एम.एल.ए. भगवती प्रसाद सागर, बिल्हौर, कानपुर नगर-2 9455094456
एम.एल.ए. भगवती प्रसाद सागर, बिल्हौर, कानपुर नगर-3 7388285626
एम.एल.ए. अभिजीत सिंह सांगा, बिठूर, कानपुर नगर 9918221386
एम.एल.ए. नीलम कटियार, कल्याणपुर, कानपुर नगर-1 8887151011
एम.एल.ए. नीलम कटियार, कल्याणपुर, कानपुर नगर-2 9935600377
एम.एल.ए. सत्यदेव पचैरी, गोविंद नगर, कानपुर नगर-1 9455073842
एम.एल.ए. सत्यदेव पचैरी, गोविंद नगर, कानपुर नगर-2 9415051777
एम.एल.ए. हाजी इरफान सोलंकी, सीसामऊ, कानपुर नगर 9415044813
एम.एल.ए. अमिताभ बाजपेई, आर्यनगर, कानपुर नगर-1 9839101111
एम.एल.ए. अमिताभ बाजपेई, आर्यनगर, कानपुर नगर-2 8887151014
एम.एल.ए. अमिताभ बाजपेई, आर्यनगर, कानपुर नगर-3 9889171111
एम.एल.ए. महेश चन्द्र, किदवई नगर, कानपुर नगर-1 887151015
एम.एल.ए. महेश चन्द्र, किदवई नगर, कानपुर नगर-2 9621151617
एम.एल.ए. सोहिल अख्तर अंसारी, कानपुर कैंट- 8887151016
एम.एल.ए. सतीश महाना, महाराजपुर, कानपुर नगर-8765951916
एम.एल.ए. सुश्री कमल रानी, घाटमपुर, कानपुर नगर-1 8887151018
एम.एल.ए. सुश्री कमल रानी, घाटमपुर, कानपुर नगर-2 9415477300
एम.एल.ए. निर्मला शंखवार, रसूलाबाद, कानपुर देहात-1 8887151005
एम.एल.ए. निर्मला शंखवार, रसूलाबाद, कानपुर देहात-2 9415727530
एम.एल.ए. निर्मला शंखवार, रसूलाबाद, कानपुर देहात-3 9839830421
एम.एल.ए. प्रतिभा शुक्ला, अकबरपुर रनिया, कानपुर देहात-1 8887151006
एम.एल.ए. प्रतिभा शुक्ला, अकबरपुर रनिया, कानपुर देहात-2 9935590475
एम.एल.ए. मथुरा प्रसाद पाल, सिकंदरा, कानपुर 9415126255
एम.एल.ए. विनोद कुमार कटियार कानपुर देहात-1 8887151008
एम.एल.ए. विनोद कुमार कटियार कानपुर देहात-2 9810550579
एम.एल.ए. देवेंद्र सिंह राजपूत, कासगंज देहात-1 9415734699
एम.एल.ए. देवेंद्र सिंह राजपूत, कासगंज देहात-2 887150900
एम.एल.ए. देवेंद्र प्रताप सिंह, अमापुर, कासगंज-1 9412734699
एम.एल.ए. देवेंद्र प्रताप सिंह, अमापुर, कासगंज-2 8887150901
एम.एल.ए. ममतेश शाक्य, पटियाली, कासगंज-1 9412282494
एम.एल.ए. ममतेश शाक्य, पटियाली, कासगंज-2 9415607515
एम.एल.ए. जटाशंकर, खड्डा, कुशीनगर-1 9838704111
एम.एल.ए. जटाशंकर, खड्डा, कुशीनगर-2 8887151129
एम.एल.ए. स्वामी प्रसाद मौर्य, पडरौना, कुशीनगर 8765955029
एम.एल.ए. अजय कुमार ‘लल्लू’, तमकुहीराज, कुशीनगर-1 876595030
एम.एल.ए. अजय कुमार ‘लल्लू’, तमकुहीराज, कुशीनगर-2 9415826419
एम.एल.ए. गंगा सिंह कुशवाहा, फाजिलनगर, कुशीनगर-1 9451370607
एम.एल.ए. गंगा सिंह कुशवाहा, फाजिलनगर, कुशीनगर-2 8765955031
एम.एल.ए. रजनीकांत मणि त्रिपाठी, कुशीनगर-1 9450475339
एम.एल.ए. रजनीकांत मणि त्रिपाठी, कुशीनगर-2 8887151133
एम.एल.ए. पवन कुमार, हाटा, कुशीनगर 9721855585
एम.एल.ए. रामानन्द बौद्ध, रामकोला, कुशीनगर-1 8953239194
एम.एल.ए. रामानन्द बौद्ध, रामकोला, कुशीनगर-2 8887151135
एम.एल.ए. शीतला प्रसाद, सिराथू, कौशाम्बी-1 8887151051
एम.एल.ए. शीतला प्रसाद, सिराथू, कौशाम्बी-2 9415360627
एम.एल.ए. लाल बहादुर, मंझनपुर, कौशाम्बी-1 8887151052
एम.एल.ए. लाल बहादुर, मंझनपुर, कौशाम्बी-2 9919244799
एम.एल.ए. संजय कुमार, चायल, कौशाम्बी-1 8887151053
एम.एल.ए. संजय कुमार, चायल, कौशाम्बी-1 9839324411
एम.एल.ए. नन्द किशोर, लोनी, गाजियाबाद 9718182818
एम.एल.ए. अजीत पाल त्यागी, मुरादनगर, गाजियाबाद 9871862288
एम.एल.ए. सुनील कुमार शर्मा, साहिबाबाद, गाजियाबाद 9312024862
एम.एल.ए. अतुल गर्ग, गाजियाबाद 9811037560
एम.एल.ए. डाॅ. मंजू शिवाच, मोदी नगर, गाजियाबाद-1 8887150857
एम.एल.ए. डाॅ. मंजू शिवाच, मोदी नगर, गाजियाबाद-2 9837072768
एम.एल.ए. त्रिवेणी राम, जखनिया, गाजीपुर-1 8887151173
एम.एल.ए. त्रिवेणी राम, जखनिया, गाजीपुर-2 7235984545
एम.एल.ए. सुभाष पासी, सैदपुर, गाजीपुर-1 9616428888
एम.एल.ए. सुभाष पासी, सैदपुर, गाजीपुर-2 8765955073
एम.एल.ए. संगीता, गाजीपुर-1 8887151175
एम.एल.ए. संगीता, गाजीपुर-2 9451589385
एम.एल.ए. विरेंद्र कुमार यादव, जंगीपुर, गाजीपुर-1 8885151176
एम.एल.ए. विरेंद्र कुमार यादव, जंगीपुर, गाजीपुर-2 9415345152
एम.एल.ए. ओमप्रकाश राजभर, जहूदराबाद, गाजीपुर 9415818184
एम.एल.ए. अलका राय, मेहम्मदाबाद, गाजीपुर-1 8887151178
एम.एल.ए. अलका राय, मेहम्मदाबाद, गाजीपुर-2 9415202600
एम.एल.ए. सुनीता, जमानियां, गाजीपुर-1 9450548722
एम.एल.ए. सुनीता, जमानियां, गाजीपुर-2 8885171179
एम.एल.ए. फतेह बहाुदर, कैम्यिरगंज, गोरखपुर-1 9415467501
एम.एल.ए. फतेह बहाुदर, कैम्यिरगंज, गोरखपुर-2 9415302202
एम.एल.ए. महेन्द्र पाल सिंह, पिपराइच, गोरखपुर-1 9005376200
एम.एल.ए. महेन्द्र पाल सिंह, पिपराइच, गोरखपुर-2 9415210536
एम.एल.ए. महेन्द्र पाल सिंह, पिपराइच, गोरखपुर-3 8887151121
एम.एल.ए. डाॅ. राधा मोहर दास अग्रवाल, गोरखपुर शहर 9415905646
एम.एल.ए. विपिन सिंह, गोरखपुर ग्रामीण-1 9455355555
एम.एल.ए. विपिन सिंह, गोरखपुर ग्रामीण-2 8887151123
एम.एल.ए. शीतल पाण्डेय, सहजनवा, गोरखपुर-1 9450868858
एम.एल.ए. शीतल पाण्डेय, सहजनवा, गोरखपुर-2 8887151124
एम.एल.ए. संत प्रसाद, खजनी, गोरखपुर-1 8765955024
एम.एल.ए. संत प्रसाद, खजनी, गोरखपुर-2 9452058356
एम.एल.ए. संगीता यादव, चैरी-चैरा, गोरखपुर-1 7080885848
एम.एल.ए. संगीता यादव, चैरी-चैरा, गोरखपुर-2 94525623628
एम.एल.ए. संगीता यादव, चैरी-चैरा, गोरखपुर-3 8887151126
एम.एल.ए. डाॅ. विमलेश पासवान, बांसगांव, गोरखपुर-1 8887151127
एम.एल.ए. डाॅ. विमलेश पासवान, बांसगांव, गोरखपुर-2 9839752077
एम.एल.ए. विनय शंकर तिवारी, चिल्लूपार, गोरखपुर-1 9417777777
एम.एल.ए. विनय शंकर तिवारी, चिल्लूपार, गोरखपुर-2 8887151128
एम.एल.ए. विनय कुमार द्विवेदी, मेहनान, गोण्डा-1 9670086000
एम.एल.ए. विनय कुमार द्विवेदी, मेहनान, गोण्डा-2 8887151095
एम.एल.ए. प्रतीक भूषण सिंह, गोण्डा 9415327999
एम.एल.ए. बावन सिंह, कटरा बाजार, गोण्डा-1 9935600060
एम.एल.ए. बावन सिंह, कटरा बाजार, गोण्डा-2 8765954996
एम.एल.ए. कुँ. अजय प्रताप सिंह करनैलगंज, गोण्डा-1 9454451010
एम.एल.ए. कुँ. अजय प्रताप सिंह करनैलगंज, गोण्डा-2 8887151098
एम.एल.ए. प्रेम नरायण पाण्डे, तारबगंज, गोण्डा-1 9451023000
एम.एल.ए. प्रेम नरायण पाण्डे, तारबगंज, गोण्डा-2 8887151099
एम.एल.ए. रमापति शास्त्री, मनकापुर, गोण्डा 9415120668
एम.एल.ए. प्रभात कुमार वर्मा, गौरा, गोण्डा-1 9452736915
एम.एल.ए. प्रभात कुमार वर्मा, गौरा, गोण्डा-2 8887151101
एम.एल.ए. पंकज सिंह, नोएडा, गौतमबुद्ध नगर-1 9452052000
एम.एल.ए. पंकज सिंह, नोएडा, गौतमबुद्ध नगर-2 9899955200
एम.एल.ए. तेजपाल सिंह नागर, दादरी, गौतमबुद्ध नगर-1 8887150862
एम.एल.ए. तेजपाल सिंह नागर, दादरी, गौतमबुद्ध नगर-2 9311011678
एम.एल.ए. धीरेन्द्र सिंह, जेवर, गौतमबुद्ध नगर-1 8887150863
एम.एल.ए. धीरेन्द्र सिंह, जेवर, गौतमबुद्ध नगर-2 9412225444
एम.एल.ए. साधना सिंह, मुगलसराय, चंदौली-1 9415374742
एम.एल.ए. साधना सिंह, मुगलसराय, चंदौली-2 8887151180
एम.एल.ए. प्रभु नारायण यादव, सकलडीहा, चंदौली-1 8887151181
एम.एल.ए. प्रभु नारायण यादव, सकलडीहा, चंदौली-2 9415336184
एम.एल.ए. सुशील सिंह, सैयद राजा, चंदौली-1 9415607447
एम.एल.ए. सुशील सिंह, सैयद राजा, चंदौली-2 7897900000
एम.एल.ए. शारदा प्रसाद, चकिया, चंदौली-1 8887151183
एम.एल.ए. शारदा प्रसाद, चकिया, चंदौली-2 9415905687
एम.एल.ए. चन्द्रिका प्रसाद उपाध्याय, चित्रकूट, 9415340450
एम.एल.ए. आर.के. सिंह पटेल, मानिकपुर, चित्रकूट-1 9838363864
एम.एल.ए. आर.के. सिंह पटेल, मानिकपुर, चित्रकूट-2 8887151037
एम.एल.ए. आर.के. सिंह पटेल, मानिकपुर, चित्रकूट-3 9415143993
एम.एल.ए. मूलचन्द्र सिंह, माधौगढ़, जालौन-1 8887151019
एम.एल.ए. मूलचन्द्र सिंह, माधौगढ़, जालौन-2 9415064357
एम.एल.ए. कुँवर नरेन्द्र पाल सिंह, कालपी, जालौन-1 8887151020
एम.एल.ए. कुँवर नरेन्द्र पाल सिंह, कालपी, जालौन-2 9415592790
एम.एल.ए. गौरी शंकर, उरई, जालौन-1 8887151021
एम.एल.ए. गौरी शंकर, उरई, जालौन-2 9936079372
एम.एल.ए. रमेश चन्द्र मिश्र, बदलापुर, जौनपुर-1 9415969452
एम.एल.ए. रमेश चन्द्र मिश्र, बदलापुर, जौनपुर-2 9670000606
एम.एल.ए. रमेश चन्द्र मिश्र, बदलापुर, जौनपुर-3 8887151164
एम.एल.ए. शैलेंद्र यादव ‘ललई’, शाहगंज, जौनपुर 8765955064
एम.एल.ए. गिरीश चन्द्र यादव, जौनपुर-1 7800302798
एम.एल.ए. गिरीश चन्द्र यादव, जौनपुर-2 9415287591
एम.एल.ए. पारस नाथ यादव, मल्हनी, जौनपुर-1 9415349797
एम.एल.ए. पारस नाथ यादव, मल्हनी, जौनपुर-2 8887151167
एम.एल.ए. सुषमा पटेल, मुंगराबाद शाहपुर, जौनपुर-1 8887151168
एम.एल.ए. सुषमा पटेल, मुंगराबाद शाहपुर, जौनपुर-2 7607068306
एम.एल.ए. जगदीश सोनकर, मछलीशहर, जौनपुर 8887151169
एम.एल.ए. लीना तिवारी, मडियांहू, जौनपुर-1 9984985555
एम.एल.ए. लीना तिवारी, मडियांहू, जौनपुर-2 8887151170
एम.एल.ए. डाॅ. हरेन्द्र प्रसाद सिंह, जफराबाद, जौनपुर-1 9838827999
एम.एल.ए. डाॅ. हरेन्द्र प्रसाद सिंह, जफराबाद, जौनपुर-2 8887151171
एम.एल.ए. दिनेश चैधरी, केराकत, जौनपुर-1 8887151172
एम.एल.ए. दिनेश चैधरी, केराकत, जौनपुर-2 9565825000
एम.एल.ए. राजीव सिंह ‘पारीछा’, बबीना, झांसी 9450927212
एम.एल.ए. रवि शर्मा, झांसी नगर-1 9415030340
एम.एल.ए. रवि शर्मा, झांसी नगर-2 8765954922
एम.एल.ए. बिहारी लाल आर्य, मउरानीपुर, झांसी-1 8887151024
एम.एल.ए. बिहारी लाल आर्य, मउरानीपुर, झांसी-2 9198966463
एम.एल.ए. जवाहर लाल राजपूत, गरौठा, झांसी-1 8887151025
एम.एल.ए. जवाहर लाल राजपूत, गरौठा, झांसी-2 9451334019
एम.एल.ए. जय प्रकाश निषाद, रुद्रपुर, देवरिया 9415213414
एम.एल.ए. जनमेजय सिंह, देवरिया-1 8765955036
एम.एल.ए. जनमेजय सिंह, देवरिया-2 8887151137
एम.एल.ए. सूर्यप्रताप शाही, पथरदेवा, देवरिया-1 962890777
एम.एल.ए. सूर्यप्रताप शाही, पथरदेवा, देवरिया-2 9415022598
एम.एल.ए. कमलेश शुक्ल, रामपुर कारखाना, देवरिया-1 9412088587
एम.एल.ए. कमलेश शुक्ल, रामपुर कारखाना, देवरिया-2 8887151139
एम.एल.ए. आशुतोष उपाध्याय, भाटपार रानी, देवरिया-1 8887151140
एम.एल.ए. आशुतोष उपाध्याय, भाटपार रानी, देवरिया-2 8765955039
एम.एल.ए. काली प्रसाद, सलेमपुर, देवरिया-1 9450483549
एम.एल.ए. काली प्रसाद, सलेमपुर, देवरिया-2 8887151141
एम.एल.ए. सुरेश तिवारी, बरहज, देवरिया-1 9415320607
एम.एल.ए. सुरेश तिवारी, बरहज, देवरिया-2 8887151142
एम.एल.ए. संजय सिंह गंगवार, पीलीभीत-1 8887150927
एम.एल.ए. संजय सिंह गंगवार, पीलीभीत-2 9412297133
एम.एल.ए. संजय सिंह गंगवार, पीलीभीत-3 8477820000
एम.एल.ए. किशन लाल राजपूत, बरखेड़ा, पीलीभीत-1 8887150928
एम.एल.ए. किशन लाल राजपूत, बरखेड़ा, पीलीभीत-2 9012882882
एम.एल.ए. किशन लाल राजपूत, बरखेड़ा, पीलीभीत-3 9412519253
एम.एल.ए. बाबूराम पासवान, पूरनपुर, पीलीभीत-1 8887150929
एम.एल.ए. बाबूराम पासवान, पूरनपुर, पीलीभीत-2 9412554606
एम.एल.ए. अगयश रामसरन वर्मा, बीसलपुर, पीलीभीत 8765954829
एम.एल.ए. आराधना मिश्रा (मोना), रामपुर खास, प्रतापगढ़-1 9415905590
एम.एल.ए. आराधना मिश्रा (मोना), रामपुर खास, प्रतापगढ़-2 9935170000
एम.एल.ए. विनोद सरोज, बाबागंज, प्रतापगढ़-1 9415607364
एम.एल.ए. विनोद सरोज, बाबागंज, प्रतापगढ़-2 9005147500
एम.एल.ए. रघुराज प्रताप सिंह, कुण्डा, प्रतापगढ़ 9415607363
एम.एल.ए. राकेश कुमार वर्मा विश्वनाथगंज, प्रतापगढ़ 8765954713
एम.एल.ए. संगम लाल गुप्ता, प्रतापगढ़-1 9821876739
एम.एल.ए. संगम लाल गुप्ता, प्रतापगढ़-2 9323619169
एम.एल.ए. संगम लाल गुप्ता, प्रतापगढ़-3 8887151048
एम.एल.ए. राजेन्द्र प्रताप सिंह पट्टी, प्रतापगढ़-1 9415905593
एम.एल.ए. राजेन्द्र प्रताप सिंह पट्टी, प्रतापगढ़-29839072727
एम.एल.ए. अभय कुमार ओझा, रानीगंज, प्रतापगढ़-1 8924925300
एम.एल.ए. अभय कुमार ओझा, रानीगंज, प्रतापगढ़-2 8887151050
एम.एल.ए. अभय कुमार रानीगंज, प्रतापगढ़-3 7317798032
एम.एल.ए. जय कुमार सिंह जैकी, जहानाबाद, फतेहपुर-1 9919195050
एम.एल.ए. जय कुमार सिंह जैकी, जहानाबाद, फतेहपुर-2 9792485050
एम.एल.ए. करण सिंह पटेल, बिन्दकी, फतेहपुर-1 8887151039
एम.एल.ए. करण सिंह पटेल, बिन्दकी, फतेहपुर-2 9415214886
एम.एल.ए. विक्रम सिंह, फतेहपुर-1 8765954719
एम.एल.ए. विक्रम सिंह, फतेहपुर-2 9554967777
एम.एल.ए. विकास गुप्ता, आयाहशाह, फतेहपुर-1 8887151041
एम.एल.ए. विकास गुप्ता, आयाहशाह, फतेहपुर-2 9415033262
एम.एल.ए. विकास गुप्ता, आयाहशाह, फतेहपुर-3 9918046999
एम.एल.ए. रणवेन्द्र प्रताप सिंहहु सैनगंज, फतेहपुर-1 9415064951
एम.एल.ए. रणवेन्द्र प्रताप सिंह हुसैनगंज, फतेहपुर-2 9936599436
एम.एल.ए. कृष्णा पासवान, खागा, फतेहपुर-1 8765954942
एम.एल.ए. कृष्णा पासवान, खागा, फतेहपुर-2 9651539000
एम.एल.ए. अमर सिंह, कायमगंज, फर्रूखाबाद-1 9450009425
एम.एल.ए. अमर सिंह, कायमगंज, फर्रूखाबाद-2 8887150992
एम.एल.ए. सुशील कुमार शाक्य, अमृतपुर, फर्रूखाबाद-1 8887150993
एम.एल.ए. सुशील कुमार शाक्य, अमृतपुर, फर्रूखाबाद-2 9415146245
एम.एल.ए. मे. सुनील दत्त द्विवेदी, फर्रूखाबाद-1 8887150994
एम.एल.ए. मे. सुनील दत्त द्विवेदी, फर्रूखाबाद-2 9415146477
एम.एल.ए. नागेन्द्र सिंह राठौर, भोजपुर, फर्रूखाबाद-1 8887150995
एम.एल.ए. नागेन्द्र सिंह राठौर, भोजपुर, फर्रूखाबाद-2 9838543508
एम.एल.ए. नागेन्द्र सिंह राठौर, भोजपुर, फर्रूखाबाद-3 8874695555
एम.एल.ए. सत्यपाल सिंह बघेल, टूण्डला, फिरोजाबाद 9412750555
एम.एल.ए. राम गोपाल पप्पू लोधी, जसराना, फिरोजाबाद-1 9837932222
एम.एल.ए. राम गोपाल पप्पू लोधी, जसराना, फिरोजाबाद-2 8887150896
एम.एल.ए. मनीष असीजा, फिरोजाबाद 9837035102
एम.एल.ए. डाॅ. मुकेश चन्द्र वर्मा, शिकोहाबाद, फिरोजाबाद-1 8887150898
एम.एल.ए. डाॅ. मुकेश चन्द्र वर्मा, शिकोहाबाद, फिरोजाबाद-2 8938974530
एम.एल.ए. हरि ओम यादव, सिरसागंज, फिरोजाबाद-1 8765954798
एम.एल.ए. हरि ओम यादव, सिरसागंज, फिरोजाबाद-2 9412492229
एम.एल.ए. बाबा गोरखनाथ, मिल्कीपुर, फैजाबाद-1 8303888880
एम.एल.ए. बाबा गोरखनाथ, मिल्कीपुर, फैजाबाद-2 8887151073
एम.एल.ए. शोभा सिंह चैहान, बीकापुर, फैजाबाद-1 8887151074
एम.एल.ए. शोभा सिंह चैहान, बीकापुर, फैजाबाद-2 9838519794
एम.एल.ए. वेद प्रकाश गुप्ता, अयोध्या, फैजाबाद-1 8887151075
एम.एल.ए. वेद प्रकाश गुप्ता, अयोध्या, फैजाबाद-2 9415048050
एम.एल.ए. इन्द्र प्रताप तिवारी गोसाईगंज, फैजाबाद-1 7310069999
एम.एल.ए. इन्द्र प्रताप तिवारीगोसाईगंज, फैजाबाद-2 8887151076
एम.एल.ए. रामचन्द्र यादव, रुदौली, फैजाबाद-1 9415220081
एम.एल.ए. रामचन्द्र यादव, रुदौली, फैजाबाद-2 8765954970
एम.एल.ए. कुशाग्र सागर, बिसौली, बदायूँ-1 8887150912
एम.एल.ए. कुशाग्र सागर, बिसौली, बदायूँ-2 706010567
एम.एल.ए. ओमकार सिंह, सहसवान, बदायूँ 8765954812
एम.एल.ए. पं. राधा कृष्ण शर्मा, बिल्सी, बदायूँ-1 8006160000
एम.एल.ए. पं. राधा कृष्ण शर्मा, बिल्सी, बदायूँ-2 8887150914
एम.एल.ए. महेश चन्द्र गुप्ता, बदायूँ-1 9415607320
एम.एल.ए. महेश चन्द्र गुप्ता, बदायूँ-2 8887150915
एम.एल.ए. धमेन्द्र सिंह शेखूपुर, बदायूँ-1 9719684515
एम.एल.ए. धमेन्द्र सिंह शाक्य शेखूपुर, बदायूँ-2 8887150916
एम.एल.ए. राजीव कुमार सिंह दातागंज, बदायूँ-1 9412295100
एम.एल.ए. राजीव कुमार सिंह दातागंज, बदायूँ-2 8887150917
एम.एल.ए. छत्रपाल सिंह गंगवार, बहेड़ी, बरेली-1 9012723465
एम.एल.ए. छत्रपाल सिंह गंगवार, बहेड़ी, बरेली-2 9415607327
एम.एल.ए. डाॅ. डी.सी. वर्मा, मीरगंज, बरेली-1 8887150919
एम.एल.ए. डाॅ. डी.सी. वर्मा, मीरगंज, बरेली-2 9412345044
एम.एल.ए. बहोरन लाल मौर्य, भोजीपुर, बरेली-1 8887150920
एम.एल.ए. बहोरन लाल मौर्य, भोजीपुर, बरेली-2 9412193339
एम.एल.ए. केसर सिंह, नवाबगंज, बरेली-1 9415903131
एम.एल.ए. केसर सिंह, नवाबगंज, बरेली-2 8887150921
एम.एल.ए. डाॅ. श्याम बिहारी लाल, फरीदपुर, बरेली-1 8887150922
एम.एल.ए. डाॅ. श्याम बिहारी लाल, फरीदपुर, बरेली-2 9412287816
एम.एल.ए. राजेश कुमार मिश्रा विथरी चैनपुर, बरेली-1 941229119
एम.एल.ए. राजेश कुमार मिश्रा विथरी चैनपुर, बरेली-2 887150923
एम.एल.ए. डाॅ. अरुण कुमार, बरेली-1 9837747102
एम.एल.ए. डाॅ. अरुण कुमार, बरेली-2 8765954823
एम.एल.ए. राजेश अग्रवाल, बरेली कैंट-1 8765954825
एम.एल.ए. राजेश अग्रवाल, बरेली कैंट-2 9412287576
एम.एल.ए. धर्मपाल सिंह, आंवला, बरेली-1 9412292355
एम.एल.ए. धर्मपाल सिंह, आंवला, बरेली-2 8765954825
एम.एल.ए. कैलाश नाथ शुक्ल, तुलसीपुर, बलरामपुर-1 9450513588
एम.एल.ए. कैलाश नाथ शुक्ल, तुलसीपुर, बलरामपुर-2 8887151091
एम.एल.ए. शैलेश कुमार सिंह शैलू, गैसडी, बलरामपुर-1 9454011111
एम.एल.ए. शैलेश कुमार सिंह शैलू, गैसडी, बलरामपुर-2 9792811111
एम.एल.ए. शैलेश कुमार सिंह शैलू, गैसडी, बलरामपुर-3 8887151092
एम.एल.ए. राम प्रताप उतरौला, बलरामपुर-1 9838281150
एम.एल.ए. राम प्रताप , उतरौला, बलरामपुर-2 9415664651
एम.एल.ए. राम प्रताप उतरौला, बलरामपुर-3 8887151093
एम.एल.ए. पल्टूराम, बलरामपुर-1 9792319000
एम.एल.ए. पल्टूराम, बलरामपुर-2 8887151094
एम.एल.ए. धनन्जय कनौजिया, बेल्थरा रोड, बलिया-1 8887151157
एम.एल.ए. धनन्जय कनौजिया, बेल्थरा रोड, बलिया-2 9454255501
एम.एल.ए. उमाशंकर सिंह, रसड़ा-1 9839866666
एम.एल.ए. उमाशंकर सिंह, रसड़ा-2 8765955057
एम.एल.ए. संजय यादव, सिकन्दरपुर, बलिया-1 9811845999
एम.एल.ए. संजय यादव, सिकन्दरपुर, बलिया-2 8887151159
एम.एल.ए. उपेन्द्र तिवारी, फेफना, बलिया-1 9415681415
एम.एल.ए. उपेन्द्र तिवारी, फेफना, बलिया-2 8765955059
एम.एल.ए. आनन्द स्वरूप शुक्ल, बलिया नगर-1 9451223865
एम.एल.ए. आनन्द स्वरूप शुक्ल, बलिया नगर-2 8887151161
एम.एल.ए. राम गोविन्द, बांसडीह, बलिया-1 9415275579
एम.एल.ए. राम गोविन्द, बांसडीह, बलिया-2 8887151162
एम.एल.ए. सुरेन्द्र, बैरिया, बलिया-1 9450778819
एम.एल.ए. सुरेन्द्र, बैरिया, बलिया-2 8887151163
एम.एल.ए. अजय कुमार सिंह अजय सिंह, हरैया, बस्ती-1 9919033333
एम.एल.ए. अजय कुमार सिंह अजय सिंह, हरैया, बस्ती-2 8887151107
एम.एल.ए. चन्द्र प्रकाश कप्तानगंज, बस्ती-1 9670055999
एम.एल.ए. चन्द्र प्रकाश कप्तानगंज, बस्ती-2 8009900009
एम.एल.ए. चन्द्र प्रकाश कप्तानगंज, बस्ती-3 8887151108
एम.एल.ए. संजय प्रताप जयसवाल, रुधौली, बस्ती-1 8765955008
एम.एल.ए. संजय प्रताप जयसवाल, रुधौली, बस्ती-2 9838365389
एम.एल.ए. दया राम चैधरी, बस्ती सदर-1 9415069432
एम.एल.ए. दया राम चैधरी, बस्ती सदर-2 8887151110
एम.एल.ए. रवि कुमार सोनकर, महादेवा, बस्ती-1 9415122332
एम.एल.ए. रवि कुमार सोनकर, महादेवा, बस्ती-2 8887151111
एम.एल.ए. अक्षयवर लाल, बलहा, बहराइच-1 8887151082
एम.एल.ए. अक्षयवर लाल, बलहा, बहराइच-2 9415054009
एम.एल.ए. माधुरी वर्मा, नानपारा, बहराइच-1 9415546806
एम.एल.ए. माधुरी वर्मा, नानपारा, बहराइच-2 8765954982
एम.एल.ए. यासर शाह, मटेरा, बहराइच 9838111786
एम.एल.ए. सुरेश्वर सिंह, महसी, बहराइच-1 8887151085
एम.एल.ए. सुरेश्वर सिंह, महसी, बहराइच-2 9415036649
एम.एल.ए. अनुपमा जायसवाल, बहराइच 9839906175
एम.एल.ए. सुभाष त्रिपाठी, प्रयागपुर, बहराइच 8887151087
एम.एल.ए. मुकुट बिहारी वर्मा, कैसरगंज, बहराइच-1 9415036618
एम.एल.ए. मुकुट बिहारी वर्मा, कैसरगंज, बहराइच-2 8765954987
एम.एल.ए. सहेन्द्र सिंह रमाला, छपरौ, बागपत
एम.एल.ए. कृष्णपाल मलिक, बड़ौत, बागपत-1 8888333334
एम.एल.ए. कृष्णपाल मलिक, बड़ौत, बागपत-2 9756201121
एम.एल.ए. योगेश धामा, बागपत-1 8887150852
एम.एल.ए. योगेश धामा, बागपत-2 9810741835
एम.एल.ए. बृहेश कुमार प्रजापति, तिन्दवारी, बांदा-1 8887151032
एम.एल.ए. बृहेश कुमार प्रजापति, तिन्दवारी, बांदा-2 8960210207
एम.एल.ए. चन्द्रपाल कुशवाहा, बबेरू, बांदा-1 8887151033
एम.एल.ए. चन्द्रपाल कुशवाहा, बबेरू, बांदा-2 9450228228
एम.एल.ए. राजकरन कबीर, नरैनी, बांदा 9695154633
एम.एल.ए. प्रकाश चन्द्र द्विवेदी, बंादा-1 9005277777
एम.एल.ए. प्रकाश चन्द्र द्विवेदी, बंादा-2 9415144025
एम.एल.ए. साकेन्द्र प्रताप वर्मा, कुर्सी, बाराबंकी-1 8887151066
एम.एल.ए. साकेन्द्र प्रताप वर्मा, कुर्सी, बाराबंकी-2 9415437029
एम.एल.ए. शरद कुमार अवस्थी, रामनगर, बाराबंकी-1 8887151069
एम.एल.ए. शरद कुमार अवस्थी, रामनगर, बाराबंकी-2 9415141951
एम.एल.ए. धर्मराज सिंह उर्फ सुरेश यादव, बाराबंकी-1 8765954967
एम.एल.ए. धर्मराज सिंह उर्फ सुरेश यादव, बाराबंकी-2 9415142514
एम.एल.ए. उपेन्द्र सिंह, जैदपुर, बाराबंकी-1 8887151069
एम.एल.ए. उपेन्द्र सिंह, जैदपुर, बाराबंकी-2 9415152609
एम.एल.ए. सतीश चन्द्र शर्मा, दरियाबाद, बाराबंकी-1 8887151070
एम.एल.ए. सतीश चन्द्र शर्मा, दरियाबाद, बाराबंकी-2 9898362626
एम.एल.ए. बैजनाथ रावत, हैदरगढ़, बाराबंकी-1 9415059645
एम.एल.ए. बैजनाथ रावत, हैदरगढ़, बाराबंकी-2 8887151072
एम.एल.ए. तसलीम अहम, नजीबाबाद, बिजनौर-1 9837007861
एम.एल.ए. तसलीम अहम, नजीबाबाद, बिजनौर-2 8765954716
एम.एल.ए. मनोज कुमार पारस, नगीना, बिजनौर-1 9412146840
एम.एल.ए. मनोज कुमार पारस, नगीना, बिजनौर-2 8765954717
एम.एल.ए. सुशांत कुमार, बढ़ापुर, बिजनौर 7899977777
एम.एल.ए. अशोक कुमार राण, धामपुर, बिजनौर 8887150820
एम.एल.ए. ओम कुमार, नहटौर, बिजनौर 8765954720
एम.एल.ए. सुचि, बिजनौर-1 9897666841
एम.एल.ए. सुचि, बिजनौर-2 8887150882
एम.एल.ए. कमलेश सैनी, चाँदपुर, बिजनौर-1 9410297635
एम.एल.ए. कमलेश सैनी, चाँदपुर, बिजनौर-2 9412856829
एम.एल.ए. लोकेन्द्र सिंह चैहान, नूरपुर, बिजनौर-1 8765954723
एम.एल.ए. लोकेन्द्र सिंह चैहान, नूरपुर, बिजनौर-2 9917012222
एम.एल.ए. बिमला सिंह सोलंकी, सिकन्दराबाद, बुलन्दशहर 8765954763
एम.एल.ए. वीरेन्द्र सिंह सिरोह, बुलन्दशहर-1 8887150865
एम.एल.ए. वीरेन्द्र सिंह सिरोह, बुलन्दशहर-2 9415000410
एम.एल.ए. देवेन्द्र सिंह लोधी एडवोकेटे, बुलन्दशहर-1 8887150866
एम.एल.ए. देवेन्द्र सिंह लोधी एडवोकेटे, बुलन्दशहर-2 9634220444
एम.एल.ए. संजय, अनूपशहर, बुलन्दशहर-1 9818326000
एम.एल.ए. संजय, अनूपशहर, बुलन्दशहर-2 8887150867
एम.एल.ए. अनीता लोधी राजपूत, डिबाई, बुलन्दशहर-1 9457978099
एम.एल.ए. अनीता लोधी राजपूत, डिबाई, बुलन्दशहर-2 8887150868
एम.एल.ए. अनिल कुमार, शिकारपुर, बुलन्दशहर 9415905818
एम.एल.ए. विजेन्द्र सिंह, खुर्जा, बुलन्दशहर-1 8887150870
एम.एल.ए. विजेन्द्र सिंह, खुर्जा, बुलन्दशहर-2 9456028186
एम.एल.ए. रविन्द्र नाथ त्रिपाठी, भदोही-1 9415607453
एम.एल.ए. रविन्द्र नाथ त्रिपाठी, भदोही-2 8887151192
एम.एल.ए. विजय मिश्र, ज्ञानपुर, भदोही-1 9198111999
एम.एल.ए. विजय मिश्र, ज्ञानपुर, भदोही-2 9415905696
एम.एल.ए. दीनानाथ भाष्कर, औराई, भदोही-1 8887151194
एम.एल.ए. दीनानाथ भाष्कर, औराई, भदोही-2 9415223895
एम.एल.ए. दारा सिंह चैहान, मधुबन, मऊ 9560961877
एम.एल.ए. फागू चैहान, घोसी, मऊ-1 9415240909
एम.एल.ए. फागू चैहान, घोसी, मऊ-2 8887151154
एम.एल.ए. श्रीराम सोनकर, मुहम्दाबाद गोहना, मऊ-1 9415260338
एम.एल.ए. श्रीराम सोनकर, मुहम्दाबाद गोहना, मऊ-2 8887151155
एम.एल.ए. मुख्तार अंसारी, मऊ 8768955055
एम.एल.ए. लक्ष्मी नारायण, छता, मथुरा 9760000031
एम.एल.ए. श्याम सुन्दर शर्मा, मांट, मथुरा-1 9415905804
एम.एल.ए. श्याम सुन्दर शर्मा, मांट, मथुरा-2 8765954781
एम.एल.ए. कारिंदा सिंह, गोवर्धन, मथुरा
एम.एल.ए. श्रीकांत शर्मा, मथुरा-1 9455073832
एम.एल.ए. श्रीकांत शर्मा, मथुरा-2 9999476555
एम.एल.ए. पूरन प्रकाश, बलदेव 9412281250
एम.एल.ए. बजरंग बहादुर सिंह, फरेन्दा, महराजगंज-1 7607563830
एम.एल.ए. बजरंग बहादुर सिंह, फरेन्दा, महराजगंज-2 8887151115
एम.एल.ए. अमनमणि त्रिपाठी, नौतनवा, महराजगंज-1 8181932194
एम.एल.ए. अमनमणि त्रिपाठी, नौतनवा, महराजगंज-2 8887151116
एम.एल.ए. प्रेम सागर पटेल, सिसवां, महराजगंज-1 9911885916
एम.एल.ए. प्रेम सागर पटेल, सिसवां, महराजगंज-2 9450531056
एम.एल.ए. जय मंगल, महाराजगंज-1 9918498559
एम.एल.ए. जय मंगल, महाराजगंज-2 8887151118
एम.एल.ए. ज्ञानेन्द्र, पनियारा 9936811570
एम.एल.ए. राकेश कुमार गोस्वामी, महोबा 9935911532
एम.एल.ए. ब्रजभूषण राजपूत चरखारी, महोबा-1 8887151031
एम.एल.ए. ब्रजभूषण राजपूत चरखारी, महोबा-2 8004644444
एम.एल.ए. राहुल प्रकाश, छानबे, मिर्जापुर-1 9415912000
एम.एल.ए. राहुल प्रकाश, छानबे, मिर्जापुर-2 8887151195
एम.एल.ए. रत्नाकर मिश्र, मिर्जापुर-1 9415208916
एम.एल.ए. रत्नाकर मिश्र, मिर्जापुर-2 9559559000
एम.एल.ए. शुचिस्मिता मौर्या, मझवां, मिर्जापुर-1 9839001364
एम.एल.ए. शुचिस्मिता मौर्या, मझवां, मिर्जापुर-2 8887151197
एम.एल.ए. अनुराग सिंह, चुनार, मिर्जापुर 8887151198
एम.एल.ए. रमाशंकर सिंह, मड़िहान, मिर्जापुर-1 9839739139
एम.एल.ए. रमाशंकर सिंह, मड़िहान, मिर्जापुर-2 8887151199
एम.एल.ए. उमेश मलिक, बुढ़ाना, मुजफ्फरनगर-1 9412211911
एम.एल.ए. उमेश मलिक, बुढ़ाना, मुजफ्फरनगर-2 8887150811
एम.एल.ए. विजय कुमार कश्यप, चरवावल, मुजफ्फरनगर 8887150812
एम.एल.ए. प्रमोद उटवाल, पुरकाजी, मुजफ्फरनगर 837432111
एम.एल.ए. कपिलदेव अग्रवाल, मुजफ्फरनगर-1 9837067089
एम.एल.ए. कपिलदेव अग्रवाल, मुजफ्फरनगर-2 8887150814
एम.एल.ए. विक्रम सिंह, खतौली-1 9897776870
एम.एल.ए. विक्रम सिंह, खतौली-2 8887150815
एम.एल.ए. अवतार सिंह बडाना, मीरापुर, मुजफ्फरनगर-1 8887150816
एम.एल.ए. अवतार सिंह बडाना, मीरापुर, मुजफ्फरनगर-2 9891406007
एम.एल.ए. राजेश कुमार सिंह (चुन्नू), कांठ, मुरादाबाद-1 8887150825
एम.एल.ए. राजेश कुमार सिंह (चुन्नू), कांठ, मुरादाबाद-2 9412243141
एम.एल.ए. नवाब जान, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद 8765954725
एम.एल.ए. हाजी इकराम कुरैशी, मुरादाबाद, मुरादाबाद-1 9412244665
एम.एल.ए. हाजी इकराम कुरैशी, मुरादाबाद, मुरादाबाद-2 9058482444
एम.एल.ए. रीतेश कुमार गुप्ता, मुरादाबाद नगर
एम.एल.ए. मोहम्मद रिजवान, कुन्दरकी, मुरादाबाद 9759672095
एम.एल.ए. मोहम्मद फईम, बिलारी 8765954729
एम.एल.ए. जितेन्द्र पाल सिंह शिवालखास, मेरठ-1 8887150843
एम.एल.ए. जितेन्द्र पाल सिंह शिवालखास, मेरठ-2 7351011011
एम.एल.ए. संगीत सिंह सोम, सरघना, मेरठ 8765954743
एम.एल.ए. दिनेश खटीक, हस्तिनापुर, मेरठ-1 887150845
एम.एल.ए. दिनेश खटीक, हस्तिनापुर, मेरठ-2 9759794191
एम.एल.ए. सत्यवीर त्यागी, किठौर, मेरठ-1 8887150846
एम.एल.ए. सत्यवीर त्यागी, किठौर, मेरठ-2 9412663224
एम.एल.ए. सत्य प्रकाश अग्रवाल, मेरठ कैन्ट 9412515005
एम.एल.ए. रफीक अंसारी, मेरठ 8887150848
एम.एल.ए. डाॅ. सोमेन्द्र तोमर, मेरठ दक्षिण 8887150849
एम.एल.ए. राजकुमार उर्फ राजू यादव, मैनपुरी 8765954806
एम.एल.ए. राम नरेश अग्निहोत्री, भोगांव, मैनपुरी-1 9412286531
एम.एल.ए. राम नरेश अग्निहोत्री, भोगांव, मैनपुरी-2 8887150908
एम.एल.ए. इंजी. बृजेश कठेरिया, किशनी, मैनपुरी-1 7500228000
एम.एल.ए. इंजी. बृजेश कठेरिया, किशनी, मैनपुरी-2 8765954808
एम.एल.ए. सोवरन सिंह यादव, करहल, मैनपुरी 8765954809
एम.एल.ए. मो0 अब्दुल्ला आजम खाँ, स्वार, रामपुर 8887150834
एम.एल.ए. नसीर अहमद खाँ, रमव्वा, रामपुर-1 9897385306
एम.एल.ए. नसीर अहमद खाँ, रमव्वा, रामपुर-2 9837300808
एम.एल.ए. बलदेव सिंह औलख, विलासपुर, रामपुर 9412251006
एम.एल.ए. मो0 आजम खाँ, रामपुर 9415607314
एम.एल.ए. राजबाला, मिलक, रामपुर-1 8887150838
एम.एल.ए. राजबाला, मिलक, रामपुर-2 7617606443
एम.एल.ए. राम नरेश रावत, बछरांवा, रायबरेली-1 8887150977
एम.एल.ए. राम नरेश रावत, बछरांवा, रायबरेली-2 8874336000
एम.एल.ए. राकेश सिंह, हरचन्द्रपुर, रायबरेली-1 9415034200
एम.एल.ए. राकेश सिंह, हरचन्द्रपुर, रायबरेली-2 8887150979
एम.एल.ए. अदिति सिंह, रायबरेली-1 9984177772
एम.एल.ए. अदिति सिंह, रायबरेली-2 8887150980
एम.एल.ए. दल बहादुर, सलोन, रायबरेली-1 9936887033
एम.एल.ए. दल बहादुर, सलोन, रायबरेली-2 8887150981
एम.एल.ए. धीरेन्द्र बहादुर सिंह, सरेनी, रायबरेली-1 8887150982
एम.एल.ए. धीरेन्द्र बहादुर सिंह, सरेनी, रायबरेली-2 84002227777
एम.एल.ए. मनोज कुमार पाण्डेय, ऊंचाहार, रायबरेली 80054890066
एम.एल.ए. जय देवी, मलिहाबाद, लखनऊ-1 9483833158
एम.एल.ए. जय देवी, मलिहाबाद, लखनऊ-2 8887150968
एम.एल.ए. अविनाश द्विवेदी, बख्शी का तालाब, लखनऊ 9415192522
एम.एल.ए. स्वाती सिंह, सरोजनी नगर, लखनऊ 9519977111
एम.एल.ए. सुरेश कुमार श्रीवास्तव, लखनऊ (प) 9415028736
एम.यूपु.ए. डाॅ. नीरज बोरा, लखनऊ (उ)-1 8887150972
एम.एल.ए. डाॅ. नीरज बोरा, ?