गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

सतसंग DB शाम RS 25/02

 राधास्वामी!! 25-02-2021- आज शाम सतसंग में पढे गये पाठ:- 

                                   


(1) सुरतिया हरष रही। निरखत गुरु चरन बिलास।।

 भँवरगुफा धुश सुन गई आगे। निज सूरज सँग मिला अभास।। -

(राधास्वामी मेहर दृष्टि से हेरें। प्रेम दुलार होय खाससुल्खास।।)

(प्रेमबानी-4-शब्द-12- पृ.स. )

                                                 

(2) सतगुरु मेरे पियारे। गुरु रुप धर के आये।

एक छिन में आप मुझको। चरनन लिया जगाय।।-

( करमों के अपने बस हो।

 देह ली मैं अब निरस हो।

चरनों की ओर ताकूँ।

 जल्दी लेओ बुलाये।।)

( प्रेमबिलास-शब्द-11-पृ.सं.)           

                                    

(3) यथार्थ प्रकाश

-भाग दूसरा-कल से आगे।।    

                                                    

  सतसंग के बाद- यू० पी० आर० एस० ऐ० की कव्वाली:-                                            

  (1) हर सू है आशकारा जाहिर जहूर तेरा।

 हर दिल में बस रहा है जलवावनूर तेरा।।

(प्रेमबिलास-शब्द-136-पृ.सं.200)  

                                                     

 (2) डा० जोशी बहन जी की कव्वाली:-                                                             

 बधाई हे बधाई बधाई है बधाई।

पावन घडी आई है । पावन घडी आई।।                                                    

  🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


**राधास्वामी l l 25-02 -2021-

आज शाम सत्संग में पढ़ा गया बचन-

 कल से आगे:-( 164 )

-आप संसार में ऐसी वस्तु का दृष्टांत पूछते हैं जो एकरस हो और उसमें लहर पैदा हो जाय। कदाचित आपको यह ज्ञात नहीं है कि संसार का सब मसाला क्षणभंगी है अर्थात् इसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता है। पर हाँ, अपने शास्त्रों से क्यों नहीं पूछते कि उसे एकरस ब्रह्म में क्रिया कैसे हुई? 

                                                            

  ( 165)- प्रश्न ४ का उत्तर ऊपर आ गया ।सृष्टि के आरंभ में कुल मालिक था किंतु वह कर्तारूप न था । वह रचना की क्रिया आरंभ होने पर कर्तार बना। जैसे समुद्र और समुद्र की लहर परस्पर विरुध नहीं होती ऐसे ही मालिक और मालिक की मौज भी विरोधी बातें नहीं हैं। 

                                            

(166)- प्रश्न ५- शब्द से यहाँ तात्पर्य उस आवाज से नहीं है जो जानदारों के मुंह से या चीजों के टकराने या चलायमान होने से उत्पन्न होती हैं। आपके शास्त्रों में इसी स्थूल शब्द को आकाश का गुण बतलाय है। तदनुसार वैशेषिक दर्शन में लिखा है कि " श्रोत( कान) से ग्रहण किया जाता जो अर्थ है, वह शब्द है" ( २/२/२१)। पर सृष्टि के आदि में जो शब्द प्रकट हुआ वह चेतन शब्द था, वह स्थूल कान से सुनाई देने वाला शब्द न था। सुरत-शब्द-योग के वर्णन में एक शब्द के विषय पर और अधिक प्रकाश डाला जायगा। इस समय इतना ही बता देना पर्याप्त होगा कि वह शब्द चेतन शक्ति का आदिम आविर्भाव था।।                                                

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻

यथार्थ प्रकाश- भाग दूसरा-

परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

शाहरुख का कोलबंस / विवेक शुक्ला


शाहरुख़ से भी चमकदार रतन भरे हैं सेंट कोलबंस में / विवेक शुक्ला 


बेशक,किसी भी स्कूल-कॉलेज की पहचान होते हैं वहां के विद्यार्थी और अध्यापक। इस मोर्चे पर 1941 में स्थापित सेंट कोलबंस स्कूल लगातार शानदार उदाहरण पेश करता रहा है। 

सेंट कोलबंस स्कूल ने बॉलीवुड बादशाह शाहरुख खान, एम्स के डायरेक्टर डा. रणदीप गुलेरिया, मोटिवेशनल गुरु डा. दीपक चोपड़ा, पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक डा. सिद्धार्थ मुखर्जी, डा. पलाश सेन, नजीब जंग, अभिषेक मनु सिंघवी, स्पाइस जेट के फाउंडर राजीव सिंह जैसी सैकड़ों हस्तियां को तराशा और बेहतर नागरिक बनाया। 

यहां से 1984 में पास आउट शाहरुख खान ने इधर ही नाटकों में भाग लेना शुरू कर दिया था। वे ‘मैं हूं ना’ फिल्म में अपने स्कूल के एक टीचर से मिलता-जुलता किरदार बिन्दु से करवाते हैं। 

सेंट कोलबंस स्कूल के पुराने स्टुडेंट को याद हैं स्वीमिंग कोच साहू सर। उनकी इंग्लिश गजब थी। दो उदाहरण पेश हैं। इन्हें पढ़कर मुस्कुराना मना है। वे कहते थे ‘मीट मी बिहाइंड दि लंच’ और ‘ओपन दि विंडो सो डैट क्लाइमट कैन कम’। अगर आपने ‘मैं हूं ना’ देखी होगी तो आपको याद होगा कि बिन्दु भी साहू सर वाले डायलाग बोलती हैं।

आप जब भी गोल डाक खाना के आगे से गुजरेंगे तो सेंट कोलंबस स्कूल की लाल रंग की इमारत आपका ध्यान खीचेगी। इसके डिजाइन में एक गरिमा है। आयरलैंड की क्रिश्चन ब्रदर्स नाम की संस्था ने सेंट कोलबंस को शुरू किया था। उसे एक अलग स्तर   पर ले जाने में ब्रदर एरिक डि सूजा.ब्रदर जी.पी.पिटो, मैडम एल डिसा जैसे दर्जनों अध्यापकों का अमूल्य योगदान रहा। इन और इन जैसे गुरुओं ने सेंट कोलंबस स्कूल में अनुशासन पर जोर दिया पर अनुशासन की आड़ में आतंक नहीं फैलाया। यहां पर बच्चों को अपने शिक्षकों से सवाल करने और स्वस्थ डिबेट करने की हमेशा छूट रही। 


सेंट कोलबंस स्कूल ने भारतीय सेना से एक करीबी रिश्ता बनाकर रखा। सेंट कोलबंस के ही छात्र रहे थे परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल। अरुण खेत्रपाल 1971 की जंग के हीरो थे। उन्होंने पंजाब-जम्मू सेक्टर के शकरगढ़ में शत्रु के दस टैंक नष्ट किए थे। वे तब 21 साल के थे। इतनी कम आयु में अब तक किसी को परमवीर चक्र नहीं मिला है।

 नोएडा का अरुण विहार उसी रणभूमि के योद्धा के नाम पर है। अरुण खेत्रपाल ने इंडियन मिलिट्री अकाडमी से जून, 1971 में ट्रेनिंग खत्म की। उसी साल दिसंबर में पाकिस्तान के साथ जंग शुरू हो गई। अरुण खेत्रपाल की स्क्वेड्रन 17 पुणे हार्स 16 दिसम्बर 1971 को शकरगढ़ में थी। वे टैंक पर सवार थे। टैंकों से दोनों पक्ष गोलाबारी कर रहे थे। वे शत्रु के टैंकों को बर्बाद करते जा रहे थे। तब ही उनके टैक में आग लग गई। वे शहीद हो गए। लेकिन उनकी टुकड़ी उनके पराक्रम को देखकर इतनी प्रेरित हुई कि वह दुश्मन की सेना पर टूट पड़ी। युद्ध में भारत को सफलता मिली। अरुण खेत्रपाल को शकरगढ़ का टाइगर कहा जाता है। 

अफसोस कि दिल्ली ने उनके बलिदान को किसी रूप में याद नहीं रखा। लेकिन सेंट कोलंबस स्कूल को उन पर नाज है। इससे पहले भारतीय नेवी के एडमिरल बी.एस. सोमन ने 1962 में स्कूल के स्वीमिंग पूल का उदघाटन किया था। भारत-पाक की 1965 की जंग के बाद यहां भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल जे.एन.चौधरी आए। सेंट कोलबंस स्कूल ने उस जंग में शत्रु सेना पर ताबड़तोड़ हमले करने वाले मेजर भास्कर राय का भी गर्मजोशी से स्वागत किया। वे सेंट कोलंबस से ही थे। बहरहाल, चार अध्यापकों और 32 छात्रों के साथ शुरू हुआ सेंट कोलबंस स्कूल इस साल 80 साल की यात्रा पूरी कर रहा है। राजधानी में इससे पहले और बाद में भी कई स्तरीय स्कूल खुले। आगे भी खुलेंगे। पर सेंट कोलबंस स्कूल के शिखर को छूना इतना आसान नहीं है। Vivek Shukla 

लेख25 फरवरी 2021 को नवभारत टाइम्स के साड्डी दिल्ली कॉलम में छपा।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

निकट का बांग्ला साहित्य पर केंद्रित एक यादगार संग्रहणीय और पठनीय अंक / सुभाष नीरव

 निकट : बांग्ला साहित्य पर केंद्रित अंक / सुभाष नीरव 



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इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय भाषाओं का साहित्य बहुत समृद्ध और अमीर रहा है। इसकी झलक अनुवाद के माध्यम से हिन्दी पाठकों को मिलती रही है। हिन्दी की छोटी-बड़ी पत्रिकाओं और अखबारों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता जो समय समय पर भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे श्रेष्ठ साहित्य को अनुवाद के जरिये अपने पाठकों से रू-ब-रू करवाती रहती हैं। कोई भी व्यक्ति सभी भाषाओँ को नहीं सीख सकता है। उसे अन्य भाषाओं के साहित्य को पढ़ने, जानने-समझने के लिए अनुवाद पर ही आश्रित रहना पड़ता है। मैंने स्वयं विश्व का क्लासिक साहित्य ही नहीं, अपितु भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य को अनुवाद के माध्यम से ही पढ़ा है। अनुवाद की महत्ता को समझते हुए बहुत सी पत्र पत्रिकाएं अनूदित रचनाएं अब स्थायी तौर पर नियमित छापने लगी हैं। पर दूसरी भाषाओं का साहित्य अभी हिन्दी पाठकों के सम्मुख टुकड़े टुकड़े रूप में आता है। ऐसे में हिन्दी की कुछ पत्रिकाओं ने भारतीय भाषाओं के साहित्य पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित कर बड़े काम भी किये हैं जिससे हिंदी के साहित्यप्रेमी पाठक को किसी भाषा का साहित्य एक स्थान पर समग्र रूप में पढ़ने को उपलब्ध हो जाता है। पिछली सदी के अंतिम वर्षों में हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका 'कथादेश' ने 'उर्दू कहानी विशेषांक' और 'पंजाबी कहानी विशेषांक' प्रकाशित किये जो हिन्दी पाठकों द्वारा बड़े पैमाने पर सराहे और पसंद किए गए। इससे पहले 'सारिका' पत्रिका भी ऐसा करती रही। 'मंतव्य'और 'हिन्दी चेतना' ने भी 'पंजाबी कहानी' पर केंद्रित विशेष अंक प्रकाशित किये। 


ऐसा ही बेहद महत्वपूर्ण काम कथाकार कृष्ण बिहारी जी ने किया। उन्होंने अपनी पत्रिका 'निकट' का अक्टूबर-दिसम्बर 2020 अंक बांग्ला साहित्य पर केंद्रित कर उसे पूजा विशेषांक के रूप में हिन्दी के विशाल पाठक को उपलब्ध करवाया। यह बहुत ज़रूरी और दस्तावेजी अंक  हिन्दी के वरिष्ठ लेखक श्याम सुंदर चौधरी के अतिथि संपादन में आया है। श्याम सुंदर चौधरी हिन्दी-बांग्ला के साहित्यप्रेमियों में एक जाना-माना नाम हैं। वह हिन्दी में वर्षों से कहानियां लिख रहे हैं, अनेक कहानी संग्रह उनके प्रकाशित हो चुके हैं, वह फ़िल्म पत्रकारिता से भी जुड़े रहे हैं। सिनेमा पर इनके अनेक लेख अंग्रेजी-हिन्दी में छपते रहे हैं। इस सबके के साथ साथ उनका एक मजबूत पक्ष वर्षों से अनुवाद के रूप में हमारे सामने आता रहा है। वह हिन्दी से बांग्ला और बांग्ला से हिन्दी अनुवाद क्षेत्र में एक बड़े और समर्थ अनुवादक के रूप में जाने जाते हैं। अनुवाद की अनेक किताबें उनके खाते में चढ़ चुकी हैं। इनकी इसी प्रतिभा को देखते हुए शायद कृष्ण बिहारी जी ने इन्हें 'निकट' के बांग्ला साहित्य पर केंद्रित अंक का कार्य सौंपा होगा। और इस अंक को देख-पढ़ कर चौधरी की कार्य क्षमता और प्रतिभा का कायल होना पड़ता है। इस अंक में उन्होंने अपने दायित्व को बड़ी ईमानदारी से बखूबी निभाया है। श्याम सुंदर चौधरी ने इस अंक के लिए कहानियों, लघुकथाओं, साक्षात्कारों, कविताओं और अन्य रचनाओं का स्वयं चयन ही नहीं किया, बल्कि उन सबका स्वयं अनुवाद भी किया, जो निसंदेह चयन प्रक्रिया से कहीं अधिक श्रमसाध्य और दुष्कर कार्य है। बांग्ला के 13 कहानीकारों की कहानियां, छह लेखकों की लघुकथाएं, सात कवियों की कविताएं तो इस अंक में पढ़ने को मिलती ही हैं, इसके साथ साथ बांग्ला के प्रख्यात लेखक सुनील दास का  श्याम सुंदर चौधरी द्वारा लिया गया एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार भी पढ़ने को मिलता है। बांग्ला साहित्य की बात हो और नाटक पर बात न हो, ऐसा नहीं हो सकता। 'नाट्य प्रसंग' इस अंक का ऐसा ही विशिष्ठ हिस्सा है।

रवींद्र नाथ टैगोर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, विभूतिभूषण बंधोपाध्याय, विमल मित्र, शचीन्द्रनाथ वंधोपाध्याय, वरेन गंगोपाध्याय, बुद्धदेव गुहा, झरा बसु, सुनील दास, तपन बंधोपाध्याय, असित कृष्ण डे, राणा चट्टोपाध्याय, दुर्गादास चट्टोपाध्याय की कहानियों, रवींद्रनाथ टैगोर, दुर्गादास चट्टोपाध्याय, प्रगति माइति, दिलीप चौधरी, रमेन्द्रनाथ भट्टाचार्य, कृपाण मोइत्रा की लघुकथाओं और गौरीशंकर वंधोपाध्याय, शंकर चक्रवर्ती, श्यामल कांति दास, तापस ओझा, गौतम हाज़रा और स्वरूप चंद की कविताओं से गुजरते हुए यह बात पुख्ता हो जाती है कि बांग्ला में  विचार और संवेदना की दृष्टि से लिखा और लिखा जा रहा साहित्य बहुत विशिष्ट और उत्तम साहित्य है।


सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि श्याम सुंदर चौधरी ने बांग्ला में लिखी जा रही लघुकथाओं को भी अपनी चयन प्रक्रिया में तरजीह दी।


एक कमी इस अंक में मुझे जो खली, वह यह कि इस अंक में बांग्ला के युवा कथाकारों और कवियों का प्रतिनिधित्व न के बराबर हुआ है। बांग्ला में नई पीढ़ी के लोग क्या और कैसा लिख रहे हैं, हिन्दी के पाठक को इसकी भी जानकारी इस अंक से मिलती तो अधिक बेहतर होता और अंक और भी अधिक मजबूत बन पड़ता।


अंत में, अतिथि संपादक के तौर पर चौधरी ने अपने संपादकीय में अनुवाद को लेकर बहुत महत्वपूर्ण और जायज़ प्रश्नों को उठाया है। ये प्रश्न नए हैं और ग़ौरतलब हैं। अनुवाद की पीड़ा को एक अनुवादक ही बेहतर समझता है। मैंने स्वयं कई मंचों से अनुवाद से जुड़ी पीड़ाओं को साझा किया है। आज भी अनुवादक के श्रम को वो मान-सम्मान और मेहनताना नहीं मिलता, जिसका वह  अधिकारी होता है। अभी भी साहित्य समाज में अनुवाद के श्रमसाध्य काम को दोयम दर्जे का समझ कर उसकी अवहेलना की जाती है। यही कारण है कि साहित्यिक अनुवाद क्षेत्र में समर्पित भाव से बहुत कम लोग आना पसंद करते हैं।

बहरहाल, इस महती कार्य के लिए निकट के संपादक कृष्ण बिहारी जी और श्याम सुंदर चौधरी, दोनों ही बधाई के पात्र हैं।

-सुभाष नीरव

23 फरवरी 2021

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

गोदी मीडिया के बाद अब गोदी कोर्ट की तैयारी

91 99111 47707 / मीडिया के बाद 'न्यायपालिका' का 'शव' भी आने के लिए तैयार है।इस पूरी क्रोनोलॉजी पर आपका ध्यान नहीं गया होगा~


●12 जून, 1975 

को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस देश की सबसे ताकतवर महिला को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया! 


I repeat "Prime Minister Post" !


● 28 अक्टूबर, 1998

Three judges Case, में, सुप्रीम कोर्ट ने खुद को और अधिक मजबूत किया, और कोलेजियम सिस्टम को इंट्रोड्यूस किया, इससे ये हुआ कि अब जजों की नियुक्ति खुद न्यायपालिका करेगी, न कि सरकार करेगी।इससे सरकार का हस्तक्षेप कुछ कम हुआ, तो न्यायपालिका पर दबाव भी कम हुआ, कुलमिलाकर इसके बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अधिक बढ़ी।इसे न्यायपालिका की शक्ति का चर्मोत्कर्ष मान सकते हैं।


••••••••••••इसके बाद आई मोदी सरकार••••••••


●16 मई, 2014

मैं नरेंद्र मोदी शपथ लेता हूँ.......


●1 दिसम्बर 

जज लोया की मौत रहस्यमयी ढंग से हो जाती है, अमित शाह पर मर्डर और किडनैपिंग के मामले की सुनवाई इन्हीं जज लोया के अंडर हो रही थी।carvan मैगज़ीन ने इसपर डिटेल्ड स्टोरी की थीं।


●13 अप्रैल, 2015

मोदी सरकार ने National Judicial Appointments Commission (NJAC) एक्ट पास किया, इसका मोटिव था कोलेजियम व्यवस्था को तोड़ना, और जजों की नियुक्ति में सरकार का हस्तक्षेप लाना था।एकतरह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर मोदी सरकार का ये पहला स्पष्ट हमला था।


●16 अक्टूबर, 2015 

चूंकि अभी मोदी सरकार अपने शुरुआती दिनों में थी।न्यायपालिका में भी कुछ दम बचा हुआ था।सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत के साथ, NJAC कानून को अनकॉन्स्टिट्यूशनल करार देते हुए, खत्म कर दिया।इस तरह इस पहले टकराव में न्यायपालिका की जीत हुई।


● इसके बाद न्यायपालिका मोदी सरकार के निशाने पर आ गई. अब मोदी सरकार ने जजों की नियुक्तियों को मंजूरी देने में जानबूझकर देर लगाना शुरू कर दिया. पूर्व चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर ने तो सार्वजनिक मंचों से कई बार इस बात के लिए नरेंद्र मोदी सरकार मुखालफत की।चूंकि मोदी सरकार प्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका में हस्तक्षेप नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने बैक डोर से हस्तक्षेप करना शुरू किया।एक जज को, उनसे उम्र में 2 बड़े जजों को पास करते हुए देश का चीफ जस्टिस बना दिया।


● 11 जनवरी, 2018

अब तक न्यायपालिका की हालत वहां तक आ पहुंची थी कि सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों को प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ गई।ऐसा देश के न्यायिक इतिहास में पहली बार हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की हो।अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में भी ऐसा कभी नहीं हुआ।जजों ने मीडिया में आकर कहा - "All is not okay, democracy at stake"


● आज पूरे देश की हालत क्या है, सबको पता है।पूरे देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं, नागरिक अधिकारों का इतना स्पष्ट हनन कभी नहीं हुआ।देश में नागरिक अधिकारों का संरक्षण करने की जिम्मेदारी न्यायपालिका की है।संसद के एक कानून से लोग सहमत भी हो सकते हैं, असहमत भी हो सकते हैं।लेकिन सरकार ने एक ही विकल्प छोड़ा सिर्फ सहमत होने का, अन्यथा जेल।यदि आप No CAA का पोस्टर लेकर अपने घर के सामने भी खड़े होते हैं तो पुलिस उठाकर ले जा रही है।छात्रों के प्रदर्शन पर गोलियां बरस रही हैं।आसूं गैस, और वाटर कैनन का यूज तो आम बात हो गई।लेकिन न्यायालय एक मृत संस्था की भांति मौन हुआ पड़ा है।


सरकार के पास सबका इलाज है, पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोगोई पर एक लड़की के साथ छेड़छाड़ का आरोप है।जिसकी जांच भी उन्होंने स्वयं ही की।अंततः लड़की को ही समझौता करना पड़ा।इसके पीछे का गणित समझना उतना मुश्किल भी नहीं है।ऐसा भी अनुमान लगाया जाता है कि इसके पीछे सरकार और मुख्य न्यायाधीश के बीच कोई समझौता रहा है।


●9 जनवरी, 2019

CAA पर सुप्रीम कोर्ट में पहली सुनवाई हुई, अब आप मुख्य न्यायाधीश का बयान सुनिए 

" देश मुश्किल वक्त से गुजर रहा...आप याचिका नहीं शांति बहाली पर ध्यान दें! जब तक प्रदर्शन नहीं रुकते, हिंसा नहीं रुकती, किसी भी याचिका पर सुनवाई नहीं होगी." 


आप अनुमान लगा सकते हैं कि उच्च न्यायालय के सबसे बड़े न्यायाधीश किस हद तक असंवेदनशील हो चुके हैं।क्या शांतिबहाली का काम भी पीड़ितों का है? सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है? स्टेट स्पोंसर्ड वायलेंस को भी याचिकाकर्ता ही रोकेंगे? और जब तक हिंसा नहीं रुकती न्याय लेने का अधिकार स्थगित रहेगा? ये कैसा न्याय है?


चीफ जस्टिस बोबड़े के अगली पंक्ति पर तो आप सर पकड़ लेंगे, बोबड़े कहते हैं- "हम कैसे डिसाइड कर सकते हैं कि संसद द्वारा बनाया कानून संवैधानिक है कि नहीं?" 


ऊपर वाली पंक्ति इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि न्यायपालिका, सरकार की तानाशाही के आगे नतमस्तक हो चुकी है।अगर न्यायपालिका नहीं जाँचेगी तो कौन जाचेगा? ये कैसी बेहूदी और मूर्खाना बात है कि न्यायपालिका जांच नहीं करेगी!


सच तो ये है कि आज किसी भी जज की हिम्मत नहीं है कि जजों का "लोया" कर देने वाले अमित शाह के सामने मूंह खोलने की हिम्मत कर लें।


डेमोक्रेसी का एक फोर्थ पिलर मीडिया पहले ही गिर चुका है। आज मीडिया का प्रत्येक एंकर, सरकार का भोंपू बन चुका है।चैनल का मालिक गृहमंत्री के स्तुति गान में लगा हुआ है, ऐसे में लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण खम्बा यानी न्यायपालिका भी अब लगभग गिरने को है।


न्यायपालिका कोई बहुमंजिला इमारत नहीं है, जिसकी, ईंट,पत्थर, दरवाजे गिरते हुए दिखेंगे।न्यायपालिका एक तरह से जीवंत संविधान है।जो हर रोज आपके-हमारे सामने मर रहा है।


बीते दशकों में न्यायपालिका एक 'प्रधानमंत्री' को बर्खास्त करने से लेकर एक 'गृहमंत्री' के चरणों में लिपट जाने तक का सफर तय कर चुकी है।बस उसका शव आपके सामने आना बाकी है!!!

[2/23, 21:32] +91 85298 64918: https://youtu.be/FWOxgd4OZXM

गांधी, संसद, प्रतिमाएंऔर चित्र विवेक शुक्ला

 संसद का बजट सत्र चालू हुआ तो संसद भवन में आने वालों को यहां पर स्थापित महात्मा गांधी की आदमकद प्रतिमा को ना देखकर हैरानी हुई। कहां गई? इसे देश संसद सत्र के समय बार-बार देखता रहा है। इसके आगे विपक्षी दलों के नेता धरना दे रहे होते थे या किसी मसले पर सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए नारेबाजी कर रहे होते थे।


चूंकि नई संसद के निर्माण का काम गति पकड़ रहा है, इसलिए बापू की मूर्ति को सुरक्षित स्थान पर रख दिया गया है। अब उसे नई संसद भवन परिसर के किसी उपयुक्त स्थान पर लगाया जाएगा। ध्यान की मुद्रा में बनी यह मूर्ति 17 फीट ऊंची है। इसका तत्कालीन राष्ट्रपति डा.शंकर दयाल शर्मा ने 2 अक्तूबर1993 को अनावरण किया था।


 इसके साथ ही संसद भवन के बाहर और रेल भवन के आगे स्वाधीनता सेनानी गोविन्द वल्लभ पंत की आदमकद मूर्ति  को भी फिलहाल हटा दिया गया है। वजह वही नई संसद भवन के निर्माण का काम है। नई दिल्ली में आजादी के बाद लगी किसी शख्यिसत की यह पहली प्रतिमा थी। पंत जी के 7 मार्च 1961 को निधन के बाद इसे 1963 में स्थापित किया गया था। इसमें गति व भाव का शानदार समन्वय है। इसके पास खड़े होकर देखें तो लगता है कि मानो पंत जी राजधानी पर पैनी नजर रख रहे हैं।


संसद भवन परिसर के भीतर देश की लगभग 50 आदरणीय शख्सियतों की आदमकद या ध़ड़ प्रतिमाएं अलग-अलग स्थानों पर स्थापित हैं। इनमें महाराणा प्रताप,महाराजा रणजीत सिंह,महात्मा ज्योतिराव फुले,रविन्द्र नाथ टेगौर, जवाहर लाल नेहरु,बिरसा मुंडा,शहीद भगत सिंह वगैरह शामिल हैं।


 इन्हें राम  सुतार,जी.के.महात्रे, देवव्रत चक्रवर्ती, बी.वी.वाघ,फकीर चंद परीदा जैसे चोटी के मूर्तिशिल्पियों ने बनाया है।ये सब मूर्तियां भी नए संसद भवन में स्थापित की जाएगी। कोशिश ये होनी चाहिए कि ये उन स्थानों पर लगें ताकि इनके लोग दर्शन कर पाएं। अभी गेट नंबर 12 पर महाराणा प्रताप की प्रतिमा स्थापित है। यह 18 फुट ऊँची कांस्य प्रतिमा है। इसे यहां आने वाले कायदे से देख नहीं पाते क्योंकि इस तरफ से ही उपराष्ट्रपति का आना-जाना होता है।

 लिहाजा सुरक्षा बल इस ओर लोगों को  आने- जाने नहीं देते हैं। संसद भवन परिसर में 107 महापुरुषों के चित्र भी लगे हैं। इन्हें  बहुमुखी प्रतिभा के धनी निकलाय रोरिक, के.के.हेब्बार, चिंतामणी कार, वसीम कपूर वगैरह ने तैयार किया  है।संसद भवन में पहला चित्र गांधी जी का सेंट्रल हॉल में 28 अगस्त 1947 को लग गया था। मतलब उनके जीवनकाल में ही उनका चित्र संसद भवन में लगा दिया गया था। इसे  ओस्वर्ड बिरली ने तैयार किया था। 


गांधी जी के बाद बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय,बल्लभभाई पटेल  वगैरह के भी चित्र  संसद भवन में लगते रहे। लाला लाजपत राय का चित्र बनाया था सतीश गुजराल ने। इसका पंडित जवाहरलाल नेहरु ने 17 नवबंर 1956 को अनावरण किया था। इसे देखकर लगता है कि लाला लाजपत राय कभी भी बोलने लगेंगे। अदभुत है यह।  कहते हैं, इस चित्र को देखकर नेहरु जी ने सतीश गुजराल को तीन मूर्ति भवन में चायपान के लिए बुलाया था।


सतीश जी के साथ तीन मूर्ति भवन उनके अग्रज आई.के.गुजराल भी गए। नेहरु जी के साथ उस बैठक के बाद आई.के.गुजराल बार-बार तीन मूर्ति भवन जाने लगे। अनुज की बदौलत उनकी किस्मत के सितारे खुल गए। इधर एम.एफ.हुसैन का कोई चित्र ना होना हैरान करता है। बहरहाल,संसद भवन में लगे चित्र नई संसद को भी सुशोभित करेंगे।


नवभारत टाइम्स में पिछली 18 फरवरी,2021 को छपे  लेख के अंश।

अखंड आजमगढ़ माटी के लाल आजमियो की तलाश

  शहर की इस भीड़ में चल तो रहा हूं,

जेहन में पर , गांव का  नक्शा रखा है ।


सुनील कुमार मल्ल                                                         

प्रस्तुति सुनील दत्ता कबीर ,


ताहिर अजीम के इस शेर का असर अखंड आजमगढ़ बेल्थरा रोड दोहरी घाट सड़क पर बेल्थरा से 11 किमी पश्चिम और मधुबन से 8 किमी पूर्व मर्यादपुर स्टेशन है । मार्यादपुर बस अड्डे से 2 किमी उत्तर एक , गांव है "लखनौर" के मल्ल परिवार में 28 जून 1966 को आसमान से एक चमकता सितारा , गांव में रौशन हुआ ।

घर के लोग उसे सुनील नाम दिए , ।


शिक्षा। प्राथमिक पाठशाला ,उरुवा बाजार गोरखपुर से पूरा किया उसके बाद श्री राम रेखा सिंह इन्टर कालेज उरुवा बाजार गोरखपुर से सीधी उड़ान 1984 में अाई अाई टी रुड़की से होते हुए 1988 में महामना द्वारा स्थापित काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में अाई अाई टी में प्रवेश लिया और शानदार सफलता अर्जित किया ।

इसके बाद 1992 में भारतीय राजस्व सेवा में सहायक आयुक्त पद पर कार्य करने लगे । 1994 से 2018 तक अहमदाबाद और बड़ौदा में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए 2019 में मुंबई में कस्टम आयुक्त के रूप में वर्तमान में कार्यरत है , महानगरों में रहते हुए भी सुनील मल्ल जी अपने गांव की सोधी महक उसके एहसास को खेत खलिहानों के उछल कूद को आज भी अपने जेहन में ताजा किए हुए है, आइए उनके इन एहसासों के साथ हम सब जुड़कर अपनी सोधि मिट्टी का एहसास करे ।

सलाम लखनौर


शहर की इस भीड़ में चल तो रहा हूँ,

जेहन में पर, गाँव का नक्शा रखा है |     

                 --- ताहिर अजीम


    गांव  की जमीन से सक्रिय सम्बन्ध खत्म हुए अब तीन दशक से ऊपर हो रहे हैं | पर आज भी रात में सोते समय शहर के घर की सूनी छत को निहारते हुए गाँव के उस फैले आसमान की याद आ जाती है जिसकी बदौलत सप्तर्षि मंडल और आकाशगंगा हमारी हर रात के हिस्से होते थे | अपने अनजान पडोसी के बगल से गुजरते हुए गांव का मंजर याद आता है जिसमें जिंदगी अपनेपन से सराबोर थी और जहाँ परायेपन का किसी को भान नहीं था |

    बेल्थरा रोड- दोहरीघाट सड़क पर बेल्थरा से 11 कि.मी. पश्चिम और मधुबन से 8 कि.मी. पूर्व मर्यादपुर स्टेशन है | मर्यादपुर बस स्टेशन से 2 कि.मी. उत्तर एक गांव है “लखनौर” | यही लखनौर गांव मेरे बचपन की यादों के केंद्र में अवस्थित है | इस गांव में अधिकतर ‘मल्ल’ परिवार हैं जो ‘विशेन’ वंशीय क्षत्रीय हैं | साथ ही ब्राह्मण, यादव , कोइरी, गोड़, बारी  और हरिजन परिवार भी हैं | गांव में एक मुस्लिम परिवार भी है |

 मध्युगीन भारत में “माध्यमिका” क्षेत्र पर मल्लों के पूर्वज राज करते थे और उनकी राजधानी ककराडीह थी जो मधुबन के पास ताल रतोय के किनारे है | सन 1193 में मुहम्मद गोरी के हाथों जयचंद की पराजय के बाद माध्यामिका क्षेत्र की सीमा मुहम्मद गोरी की सीमा से टकराने लगी | इस कारण सुरक्षा की दृष्टि से माध्यामिका क्षेत्र के तत्कालीन शासकों ने अपनी राजधानी को सरयू के उस पार मझौली में स्थानांतरित कर दिया | इस तरह मल्लों का मझौली राज्य अस्तित्व में आया | अकबर के शासन काल में मझौली राज्य पर राजा देव मल्ल का शासन था | राजा देव मल्ल अकबर के कृपा पात्रों में से थे | अकबर के प्रभाव में राजा देव मल्ल ने अपने तीन पुत्रों-प्रसाद मल्ल, माधव मल्ल और राय मल्ल , में से अपने मंझले पुत्र माधव मल्ल को सरयू के इस पार के विस्तृत क्षेत्र  का प्रबंधन संभालने के लिए भेज दिया | माधव मल्ल ने अपनी राजधानी जिस जगह पर बनायी उस जगह का नाम उन्हीं के नाम पर ‘मधुबन’ पड़ा जो आज मऊ जिले की एक तहसील हैं | राजा माधव मल्ल के बिशेनवंशीय मल्ल वंशज मधुबन के ईर्द-गिर्द करीब दर्जन भर गांवों में रहते हैं | इस पुरे इलाके को “मल्लान” के नाम से जाना जाता है | क्षेत्रीय भाषा भोजपुरी है | भोजपुरी की छ: मुख्य उप-शाखायें है , यथा (1) मल्लिका ( मल्ल गणतंत्र, आजमगढ़ क्षेत्र), (2) काशिका (काशी क्षेत्र), (3) बल्लिका (बलिया-आरा क्षेत्र ), (4) छपरहिया (छपरा-पटना  उत्तर गंगा) (5) नगपुरिया (कर्मनाशा से रांची क्षेत्र) और , (6) विदेशी (सूरीनाम, मॉरिशस, फिजी, गयाना इत्यादि) | अथ, यही मल्लिका भोजपुरी इस क्षेत्र की भाषा है| राहुल सांकृत्यायन, अयोध्यासिंह उपाध्याय “हरिऔध”, लक्ष्मीनारायण मिश्र, डॉ विजयशंकर मल्ल और पण्डित  कन्हैयालाल मिश्र सरीखे महापुरषों की मातृभाषा यही मल्लिका भोजपुरी रही है | भाषा की मिठास ऐसी कि इस मिठास पर भी कटाक्ष किया जाता था | बचपन में मैंने ऐसी ही कटाक्षभरी कुछ पंक्तियां सुनी थी जो आज भी याद हैं –

                          चार चोर चौदह हमनी के,

 खेदलें चोर, भगलीं हमनी के,

वहा रे हमनी के, वहा रे हमनी के |  

राजा माधव मल्ल की सांतवी पीढ़ी के वंशज बाबू रामदुलार मल्ल ने 1750 ई. में लखनौर गांव  बसाया | गांव  के सीवान पर पडोसी गांव  हैं – मर्यादपुर, अजोरपुर, बांकेपुर, बैरियाडीह, भेड़ौरा, डुमरी इत्यादि | शिक्षा और समृद्धि दोनों ही मामलों में लखनौर क्षेत्र के अग्रणी गांवों में शुमार होता रहा है | जमींदारी उन्मूलन से पहले क्षेत्र के कुछ सबसे बड़े जमींदार इस गांव के थे | गांव की  प्राथमिक पाठशाला, जिसकी स्थापना ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रथम भारतीय वकील मुंशी चोआलाल ने  अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्घ में की, बहुत लम्बे अरसे तक दूर-दराज के बच्चों को उपलब्ध एकमात्र स्कूल था | प्रसिद्ध विधिवेत्ता और उत्तर प्रदेश के दीर्घकालीन महाघिवक्ता पण्डित कन्हैयालाल मिश्र और हिन्दी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटककार पं. लक्ष्मीनारायण मिश्र ने इसी स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की | लखनौर के बाबू जमुनाप्रसाद मल्ल, जिन्होंने सन 1900 के आस-पास थामसन कॉलेज ऑफ़ सिविल इंजीनियरिंग (वर्तमान में आई.आई.टी रूडकी) से डिप्लोमा किया, डॉ विजयशंकर मल्ल, जो हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार और बनारस हिन्दू विशवविधाल्य  में प्रोफेसर हुए, डॉ लल्लन प्रसाद मल्ल, जो उज्जैन विशवविधाल्य में वनस्पति शास्त्र के प्रोफ़ेसर हुए और श्री कृष्णमोहन मल्ल जो भारतीय रेलवे से महाप्रबन्धक (जी एम) पद से रिटायर हुए-सभी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक पाठशाला लखनौर से ग्रहण की | बींसवी शताब्दी के पूर्वार्ध में पढने-लिखने की ऐसी समृद्ध परम्परा ग्रामीण भारत के लिए विरली ही थी |

 इस श्रृंखला की एक कड़ी मेरे बाबूजी स्वर्गीय हृद्याशंकर मल्ल भी थे जो तमाम आर्थिक आवरोधों के बावजूद प्राथमिक पाठशाला लखनौर, मिडिल स्कूल फतेहपुर, शहीद इंटर कॉलेज मधुबन से होते हुए गोरखपुर विशवविधाल्य से अंग्रेजी में स्नात्तकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएट) होने में सफल हुए और फिर सन 1960 से सन 1994 तक इंटरमीडिएट कॉलेज, उरुवा बाज़ार गोरखपुर में अंग्रेजी के प्राध्यापक और फिर प्रधानाचार्य के रूप में जिन्होंने न सिर्फ अपने परिवार के लोगों में, अपितु सैंकडो-हजारों अन्य की जिन्दगी में, शिक्षा को एक केन्द्रीय स्थान दिलाने में सफलता प्राप्त की |

 गोरखपुर शहर से करीब 43 किमि दक्षिण में कस्बाई चरित्र  वाला एक गाँव है उरुवा बाजार | बाबूजी वहां पर आध्यापक थे और हमारा जुलाई से मार्च का शिक्षा सत्र  उरुवा में ही गुजरता था | पर मार्च का अंत आते-आते इंटरमीडिएट कॉलेज में परीक्षायें  समाप्त हो जाती थीं  और हम सब लखनौर के लिए प्रस्थान करते थे | फिर मार्च के अंत से कॉलेज खुलने तक, अर्थात जुलाई के प्रथम सप्ताह तक, लखनौर का घर-आंगन, खेत-खलिहान, ताल-तलैया, बाग-बगीचे, हाहा (घाघरा की एक उपशाखा) हमारे संगी-साथी हो जाते |

 गांव  में प्रवेश करते ही वो अभिवादन सुनाई देता जो लखनौर की सोच और संस्कृति दोनों का बयान करता है | अगर बाबूजी साथ हुए तो गांव के बड़ों को देखकर  बोलते थे – “काका सलाम” “चाचा सलाम” “सलाम बाबा” और अगर आम्मा साथ होती थी तो गाँव के बाबूजी के हमउम्र अभिवादन करते हुए बोलते थे “भौजी सलाम” और हमारे हमउम्र बोलते थे “ चाची सलाम” “काकी सलाम” | पता नहीं लखनौर में सलाम कहने और करने की यह परम्परा कब और कैसे आयी पर घाघरा के उस देहात में गंगा-जमुनी तहजीब का यह अकेला उदाहरण नहीं था | अपने बचपन में लखनौर की इस परम्परा पर मुझे बहुत गर्व होता था और आज, गांव से इतनी दूर बैठकर लिखते हुए, मन में घबराहट हो रही है कि पता नहीं आज के दूषित माहौल में यह परम्परा अब जीवित बची है कि नहीं |

 लखनौर के दो कोस उतर (करीब 6-7 कि मी) सोनाडीह नामक जगह है जहाँ पर हमारे गांव  के लोगों की सिद्ध देवी का मंदिर है और मुंडन इत्यादि  अनुष्ठान वहीँ पर संपन्न किये जाते हैं | (मेरे दो बेटों का मुण्डन तो अहमदाबाद और बड़ौदा में बिना किसी अनुष्ठान के सम्पन्न हुआ पर अम्मा ने बाद में उनके बाल को सोनाडीह में अनुष्ठापूर्वक चढ़ाया) | हमारे बचपन में हर वर्ष नवरात्रि के समय सोनाडीह में माह भर चलने वाला मेला लगता था | जब हम मार्च के अंत में उरुवा बाजार से लखनौर पहुँचते तो यह मेला अपने अंतिम चरण में होता | गांव पहुँचते ही सबसे पहले तो अपने चचेरे भाइयों-बहनों और यार-दोस्तों से उस साल के मेले की कहानियां इकट्ठी की जातीं और रात में सोने से पहले ही यह निर्णय भी ले लिया जाता कि सोनाडीह कब जाना है | सोनाडीह के मेले का महत्व सबकी जिन्दगी में ऐसा था कि गांव के बुजुर्ग भी पहला प्रश्न यही करते थे कि हम लोग सोनाडीह गये कि नहीं | इतना ही नहीं, गांव के बुजुर्ग मेले के लिए हम बच्चों को अपनी-अपनी  क्षमतानुसार पैसे भी देते थे- दसपैसे, चार आना, आठ आना | और,  फिर अगले दो-चार दिन हमारी जिन्दगी मेले में ख़रीदे गये खिलौनों के साथ व्यतीत होती | वैसे तो इस मेले में मैंने ऐसा कुछ भी नहीं ख़रीदा जिससे मेरी सोच “ईदगाह” कहानी के हामिद जैसी लगे पर आजभी यह सोच कर शर्म और फक्र (और हसीं भी) का मिला जुला भाव आता है कि एकबार मेले में एक दुकान से चंदन की लकड़ी का एक छोटा सा टुकड़ा बिना पैसे दिये उठा लेने में मैंने अपने चचेरे भाइयों का साथ दिया था- यह सोचकर कि मेरी बड़ी मां, जिसे हम लोग माई कहते थे, शुक्रवार के दिन संतोषी माता का व्रत और पाठ करती है और उसे चंदन की लकड़ी का भी इस्तेमाल करना होता है |

 मार्च के अंत में, जब हम गांव पहुँचते थे, आम के पेड़ों पर बौर आ चुके रहते थे- अकसर पेड़ों पर बौर के बाद छोटे-छोटे टिकोरे भी आ चुके होते थे | गाँव पहुंचते ही दोस्तों से यह भी ब्योरा लिया जाता था कि इस बार आम की फसल कैसी है, कि इसबार लंगडू बाबा के बारहमासी पेड़ों पर फल लगे हैं कि नहीं, कि बुढ़िया की बारी (एक बड़ा सा बगीचा जिसकी रखवाली एक बुढ़िया करती थी और जिसके होते हुए आम तोड़ना नामुमकिन था) की बुढ़िया अभी जिन्दा है की मर गई, कि कालीमाई के मंदिर के पास वाले बुदबुदहवा पेड़ पर आम हैं कि नहीं, कि भीते के पास सिनुरहवा ( सिन्दूर जैसे आम ) पर फसल आई है कि नहीं, कि “मियां की बागी” (बागीचे में) में इसबार आम हैं कि नहीं |

 गांव के जिस हिस्से में हमारा घर था उसको “पूरब” टोला बोलते थे | गांव के ठीक पूर्व तीन पोखरे थे- नौका पोखरा (जिसमें दो तरफ पक्के घाट बने हुए थे और जिसका प्रयोग सिर्फ नहाने के लिए होता था), पुराना पोखरा (या पुरनका पोखरा जिसके पानी का इस्तेमाल नित्य कर्म के लिए होता था) और धोबियों का पोखरा (जिसका प्रयोग गांव के धोबी कपडे धोने के लिए करते थे) | इन पोखरों के ईर्द-गिर्द और इनके बाद एक विस्तृत क्षेत्र था- कम से कम दो वर्ग किमी का-जिसमें गांव के सभी लोगों के सम्मिलित बाग-बगीचे-बंसवारी थे | इनमें अधितकर पेड़ आम के थे और इन पेड़ों और बगीचों को हम इनके रखवालों के नाम से जानते थे, मालिकों की चिन्ता हमें नहीं थी | मेरे जैसे सभी बच्चों का सुबह के शाम तक का लगभग सम्पूर्ण समय बगीचे में आम बीनते या तोड़ते, पोखरे में नहाते या खेलते हुए व्यतीत होता | सुबह की शुरुआत मुहं अंधेरे बगीचे में पहुँचने से होती – रात के गिरे हुए आम बटोरने के लिए | दिन में एक बार पोखरे में नहाने की अनुमति होती थी जो सुबह आठ-नौ बजे ही पुरी हो जाती | फिर दिन में तीन- चार बार बिना घर में बताये नहाने का दौर होता था और फिर गीले कपड़ों में ही बाग में घूमना होता था जब तक कि गीले कपड़े सूख न जायें | इकट्ठा  किये और तोड़े हुए आमों को दिनभर ट्राफियों की तरह प्रदर्शित करने के बाद शाम को उनके यथोचित उपयोग का निर्णय होता था- कच्चे हुए तो खट्मीठवा, अचार, मुरब्बा इत्यादि और पके हुए तो गादा, अमावट  इत्यादि | दिनभर बगीचे में तरह तरह के खेल भी होते रहते थे- ओल्हा-पाती (पेड़ पर), लट्ठा दौड़ (पोखरे में), कबड्डी, चिक्का, ऊ़़ढा़ कूद (एक ऊँचे प्लेटफॉर्म से अखाड़े में कूदना), कुश्ती, खुन्टेलवा, गिल्ली-डंडा इत्यादि | गरज कि दिन का एक-एक लम्हा किसी न किसी सक्रिय काम में ही गुजरता | घर पर सिर्फ नाश्ता और खाने के लिए आना होता | हमारे गाँव के घर पर मेरी बड़ी मां (माई) हमारी चचेरी बहन के साथ रहती थी | घर की मलिकाइन का दर्जा माई को ही प्राप्त था | पुरे गरमी की छुट्टी जब तक हम गांव  में रहते हमारी सारी जरूरतें माई द्वारा ही पूरी होतीं ए माई खाना दो !, ए माई  ! पैसा दो, ए माई ! क्या बना है, गरमी  ये बनाओ इत्यादि । पूरीगरमी भर माई ही हमारी दात्री होती, साथ ही वह अम्मा, भाई और बहनों के हाथों डांट और पिटाई में भी हमारे रक्षक का काम करती । 

   गांव में बड़े और बुजुर्गों के भी अड्डे थे जहाँ रुचि अनुसार लोग इकट्ठे होते थे अपने अपने शौक पूरा करने के लिए । इनमें एक अड्डा था हमारे घर की चहारदीवारी से लगा हुआ “बरदौर” जहाँ पर लोगों के बैल-गाय रखे जाते थे और अनाज और पशुओं का चारा संग्रहीत होता था | उसी बरदौर में, एक छप्पर के नीचे, हर दोपहर तीन-चार बजे के आस-पास गांव के कुछ बुजुर्ग जुटते थे- ताश खेलने के लिए |   भीड़ में तीन पीढ़ियों के लोग होते थे- बाबा भी और नाती भी | बीच में बाबूजी की पीढ़ी थी | दो-तीन टीमें अलग-अलग,  पर एक ही छप्पर के नीचे,  ट्वेंटी नाइन खेलने में व्यस्त रहती | मेरी पीढ़ी के बहुत सारे बच्चे अपने दादाजी-चाचाजी को सलाह देने में लगे रहते कि “पनवा का इक्कवा चलीं” | फिर अचानक राम लाल बाबा की कान के पर्दे चीरने वाले तेज़ आवाज़ सुनाई देती की “ हई पेवर (यानी पेयर) ह पेवर !”


दूसरा अड्डा था “बिन्सरी बाबा का हाता” यानी विन्देश्वरी पंडित का हाता । यहाँ की बैठकों का चरित्र अलग होता था । यहाँ पर गाँव के विवेकशील  और कुछ विवादशील  लोग सम सामयिक घटनाओं पर, इतिहास और साहित्य पर बहस (और कभी-कभी विवाद) करते थे- सयंत और असयंत | ऐसे में मुझ जैसे बच्चों का काम था बगल में पनहारिन के घर से बाबा-चाचाजी लोगों के लिए उनकी पसंद का पान  लाना। इन्हीं अड्डों पर एक पीढ़ी द्वारा अगली पीढ़ी को बुजुर्गों और माटी का इतिहास सौंपा जाता था, किस्से-कहानियों और गल्पों के साथ। इन परंपरागत कहानियों में कितना सच होता है और कितना झूठ या रोमांस, कहना मुश्किल है। पर, लिखित इतिहास तो सिर्फ राजाओं-महाराजओं का होता है। आम आदमी की गाथायें तो ऐसे किस्सों कहानियों के माध्यम से ही जीवित रह पाती हैं | ऐसी ही चौपाल की कहानियों से मैंने बचपन में ही जान लिया था कि -

बाबर की सेना अफगानों से लड़ाई के पश्चात वापस लौटते हुए हमारे गाँव के सिवान में रुकी थी और इसलिए हमारे गाँव के उस हिस्से के खेत आज भी “खेमहुआं” कहलाते हैं (खेमा शब्द से व्युत्पति)

अठारह सौ सत्तावन के स्वतंत्रता संग्राम में हमारे गाँव के लोगों ने हिस्सा लिया था और कुँवरसिंह की सेना को खाना खिलाया था। मैंने ये भी सुना है की विजयशंकर बाबा के हाते के निर्माण के लिए नींव की खुदाई करते समय स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की बंदूकें जमीन के अंदर गड़ी हुई मिलीं। 

जमीन के स्थायी बंदोबस्त के अपने आखिरी चरण में लॉर्ड कार्नवालिस मधुबन क्षेत्र में था और उसी क्षेत्र में वह बीमार पड़ गया और फिर गाजीपुर पहुँचकर उसकी मृत्यु हो गई। चूंकि कार्नवालिस अपने दौरे के लिए ऊंट का प्रयोग कर रहा था जिसे स्थानीय लोग “डंकिनी” कह कर बुलाते थे इसलिए स्थायी बंदोबस्त वाले इलाके को मल्लान के लोग लंबे दौर तक “डंकिनी” ही के नाम से जानते थे। 

शेरशाह सूरी की पहली संतान, उसकी बेटी मानु बेगम, रौजा दरगाह (मधुबन के पास) के पीर के आशीर्वाद स्वरूप पैदा हुई और मन्नत स्वरूप शेरशाह ने मानुबेगम को दरगाह को सौंप दिया। दरगाह की आमदनी के लिए शेरशाह ने बावन गावों की मालगुजारी भी दरगाह को सौंप दी। इसलिए, सदियों तक उन बावन गांवों के समूह को “चकमानो”कहा जाता था। 

गांव के दक्षिण-पश्चिम में एक “मंगलहिया” गाड़ही भी थी जिसके बारे में प्रसिद्ध था की बाबर की सेना ने ही उसकी खुदाई की थी। लखनौर में “मटन” को, जिसे गोरखपुर में “गोश्त’ के नाम से जाना जाता था, “कालिया” कहते थे (बबरनामा के हिन्दी अनुवाद में भी मैंने मटन के लिए “कालिया” शब्द पढ़ा है)। जाहिर है की गंगा-जमुनी तहजीब मेरे गांव की मिट्टी में रची बसी है। वहाँ के खान-पान, संस्कृति और शब्द-व्यवहार हमारे संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मूर्त रूप देते हैं। बचपन में लंबे समय तक गर्मी की छुट्टियाँ लखनौर में गुजारने के दौरान इन बातों ने मुझे छुआ भी होगा और आकार भी दिया होगा, इसमें कोई शक नहीं है। इसमें भी कोई शक नहीं कि मेरे शरीर और मन मस्तिष्क को रूप और आकार देने वाले और मेरे सबसे बड़े आदर्श मेरे बाबूजी के विशालमना व्यक्तित्व को भी सबसे मजबूत आधार इसी मिट्टी और इसकी संस्कृति से मिला होगा। 

 गांव से इतने लंबे समय तक दूर रहने के बावजूद आज भी जब शहर की भौतिकता और कृत्रिमता मन को अवसादग्रस्त करने लगती है तो उस गांव की और बचपन की यादें ही सहारा देती हैं। मेरे शहर के अंदर अगर मेरा गांव नहीं होता तो जीवन का संतुलन निश्चित ही बिगड़ जाता। इसलिए मैं हमेशा सलाम करता हूँ गाँव के उस खु़लूस को, उस जिन्दादिली और नेकदिली को जिससे शहरी ज़िन्दगी की कलुषताओं का सामना करने की एक सहज सामर्थ्य मुझे मिली है। 

 सुनील कुमार मल्ल                                                         

प्रस्तुति सुनील दत्ता कबीर ,

 स्वतंत्र पत्रकार , दस्तावेजी प्रेस छायाकार

यूपी के 10 लाख अभ्युदय योजना के छात्रों को मिलेगा टैबलेट / राजेश सिन्हा

 *'अभ्युदय' के मेधावी छात्रों को  मिलेगा टैबलेट का तोहफा*


*मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के लिए 28 फरवरी तक करा सकते हैं पंजीयन*


*बजट में सरकार ने की है टैबलेट देने की घोषणा, जल्द जारी होंगे पात्रता नियम*


*05 और 06 मार्च को होगी ऑनलाइन परीक्षा, समय-सारणी घोषित*


राजेश  सिन्हा

*लखनऊ, 23 फरवरी:l

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाली अनूठी कोचिंग 'अभ्युदय' के छात्रों को जल्द ही टैबलेट का तोहफा मिलने जा रहा है। योगी सरकार के ताजा बजट में इस बाबत घोषणा के बाद एक ओर जहां छात्रों में उत्साह है, वहीं अधिकाधिक युवाओं को इसका लाभ देने के लिए पंजीयन की प्रक्रिया एक बार फिर शुरू कर दी गई है। प्राथमिक योजना के मुताबिक मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना में पंजीकृत करीब 10 लाख युवाओं को टैबलेट प्रदान किए जाने की योजना है, ताकि घर बैठे वह दुनिया-जहान की जानकारी अच्छे ढंग से हासिल कर सकें। 


'मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना' के क्रियान्वयन के लिए गठित राज्य स्तरीय समिति के सदस्य, मंडलायुक्त लखनऊ रंजन कुमार ने बताया कि टैबलेट वितरण के लिए पात्रता नियम बहुत जल्द घोषित किए जाएंगे। वर्तमान में करीब 05 लाख युवा अलग-अलग प्रतियोगी छात्र इस मंच के माध्यम से पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अभ्युदय योजना के अंतर्गत समस्त मंडलों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए निःशुल्क कोचिंग की साक्षात कक्षाओं के लिए आवेदन फिर से शुरू हो गए हैं। इच्छुक युवा http://abhyuday.up.gov.in पर पंजीयन करा सकते हैं। मंडलायुक्त लखनऊ ने बताया कि टैबलेट वितरण के लिए पात्रता नियम बहुत जल्द घोषित किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि सिविल सेवा, जेईई, नीट, एनडीए व सीडीएस परीक्षा के लिए स्तरीय तैयारी की सुविधा वाली इस खास कोचिंग की साक्षात कक्षाओं के लिए 28 फ़रवरी 8 बजे तक आवेदन किया जा सकता है। इस तिथि के बाद आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएँगे। जो छात्र पहले से साक्षात कक्षायें कर रहे हैं उन्हें आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है। वो छात्र जिन्होंने 28 फ़रवरी से पहले पंजीकरण करा लेंगे अथवा वो पहले से ऑनलाइन कक्षाओं के लिये पंजीकृत हैं, वह सभी यह परीक्षा दे सकेंगे।

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*साक्षात कक्षाओं के लिए प्रवेश परीक्षाओं की समयसारणी*

एनडीए/सीडीएस: 5 मार्च 12 बजे से 1 बजे

जेईई: 5 मार्च 2 बजे से 3 बजे

नीट: 5 मार्च 4 बजे से 5 बजे

सिविल सेवा : 6 मार्च 2 बजे से 3 बजे


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*मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना की खास बातें*


*ई-लर्निंग प्लेटफार्म*

राज्य स्तर पर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित डिजिटल कन्टेन्ट उपलब्ध कराने हेतु एक ई-लर्निंग प्लेटफार्म की व्यवस्था है|


*राज्य सरकार में कार्यरत अधिकारियों द्वारा निःशुल्क मार्गदर्शन एवं शिक्षण*

आईएएस, आईपीएस, भारतीय वन सेवा, पीसीएस संवर्ग के अधिकारियों द्वारा निःशुल्क मार्गदर्शन एवं शिक्षण की व्यवस्था


*वर्चुअल क्लासेज*

राज्य स्तर के मार्गदर्शन एवं विषय वस्तु से संबंधित वर्चुअल क्लासेज का आयोजन ई-लर्निंग प्लेटफार्म के माध्यम से


*गाइडेंस एवं संदेह निवारण*

प्रत्येक मंडल मुख्यालय पर गाइडेंस एवं संदेह निवारण के लिए राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा वर्चुअल एवं साक्षात कक्षाओं का आयोजन किया जा रहा है


*कॅरियर काउंसलिंग*

प्रत्येक जनपद में युवाओं हेतु कैरियर काउंसलिंग सत्रों का आयोजन वेब पोर्टल एवं साक्षात्कार के माध्यम से किया होगा