वेब पत्रकारिता ने शायद मान लिया है कि उसे कोई गंभीरता से लेने वाला नहीं है और वह एक अधपढ़े और संस्कृतिविहीन वर्ग की कुंठाओं को शांत करने का सामान भर है
कई सम्मान प्राप्त कर चुकी युवा पत्रकार प्रियंका दुबे इस शनिवार को एक हिंदी अख़बार की वेबसाइट पर अपनी तस्वीर देखकर हैरान रह गईं. वेबसाइट पर एक चटपटी सी ख़बर छपी थी कि पति की पिटाई देखकर पत्नी ने कुछ ऐसा किया कि सब शर्मिंदा हो उठे. जाहिर है, पत्नी की इस तथाकथित ‘शर्मिंदा’ कर देने वाली हरकत की कोई तस्वीर नहीं थी और इसलिए संपादकों ने इंटरनेट की मदद ली और एक ऐसी लड़की का फोटो उठा लिया जिसका इस वाकये से दूरदराज का भी वास्ता नहीं था.
दिलचस्प यह है कि इस वेबसाइट की ख़बर एक टीवी चैनल की वेबसाइट ने ज्यों की त्यों उठा ली और वहां भी यही तस्वीर चिपका दी. चूंकि संपादकों की फिक्र बस एक मसालेदार ख़बर पेश करने की थी इसलिए उन्हें इस बात की कतई परवाह नहीं थी कि ख़बर के साथ फोटो किसका जा रहा है और कहां से लिया गया है.
टीवी के फॉर्मेट की एक सीमा है कि वहां किसी 'खबर' के साथ सिर्फ न्यूज चैनल ही खेल कर सकता है. लेकिन वेब पर मौजूद किसी भी सामग्री को एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय होने की सुविधा है.
प्रियंका दुबे ने दोनों वेबसाइट्स को फोन मिलाया और वहां लंबी बहस - और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी - के बाद वे अपनी तस्वीर हटवाने में कामयाब रहीं. लेकिन उन्होंने बताया कि दोनों जगहों पर किसी को अपनी गलती का एहसास ही नहीं था. उनसे कहा गया कि उनका चेहरा नहीं, सिर्फ पीठ दिख रही है, इसलिए कोई फ़र्क नहीं पड़ता. अगर उन दोनों टीमों को यह एहसास नहीं हुआ होता कि अनजाने में उन्होंने अपनी ही बिरादरी की एक सदस्य की - यानी एक पत्रकार की - तस्वीर लगा डाली है तो शायद दूसरी किसी लड़की की वे परवाह भी नहीं करते.
यह बस एक मिसाल है कि इन दिनों हम कैसी हड़बड़ाई हुई पत्रकारिता कर रहे हैं. यह हड़बड़ी क्या सिर्फ डेडलाइन पूरी करने के दबाव का नतीजा है या कुछ और भी है? इस सवाल पर विचार करें तो हमारे सामने इस छोटी सी, मामूली सी लगने वाली ख़बर के कहीं ज़्यादा संजीदा पहलू खुलने लगते हैं. कहा जा रहा है कि ऑनलाइन पत्रकारिता आने वाले कल की पत्रकारिता है जिसमें कंप्यूटर से मोबाइल तक, छोटे-छोटे न्यूज़ कैप्सूल और वीडियो क्लिप सबसे महत्त्वपूर्ण होने वाले हैं. इसे ध्यान में रखते हुए सारे अख़बारों और टीवी चैनलों ने अब तक उपेक्षित रहे अपने ऑनलाइन माध्यमों में अचानक ही पैसा लगाना शुरू कर किया है. दुर्भाग्य से हिंदी भाषी वेब पत्रकारिता के बड़ा होने के इस दौर में सफल वेब पत्रकारिता की इकलौती कसौटी ‘हिट्स’ जुटाना बन गया है.
यह खेल टीवी चैनलों की टीआरपी रेस से ज़्यादा ख़तरनाक है, क्योंकि टीवी के फॉर्मेट की एक सीमा है कि वहां किसी 'खबर' के साथ सिर्फ न्यूज चैनल ही खेल कर सकता है. लेकिन वेब पर मौजूद किसी भी सामग्री को एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय होने की सुविधा है. इस बहुलता का सम्मान कर, इसे सही तरीके से इस्तेमाल करने की जगह हिंदी वेब पत्रकारिता क्या कर रही है? ज़्यादातर वेबसाइट्स का एक कोना बहुत ही घिनौने ढंग से सेक्स की कुत्सित चर्चा में लीन मिलता है और उनके मुख्य पन्नों पर भी जहां-तहां ऐसी ही छौंक दिखाई पड़ती है.
ख़बरों को चटपटा बनाने का खेल धीरे-धीरे संपादकीय नीति का हिस्सा हो बन गया है जिसके पीछे यह नज़रिया काम कर रहा है कि अगर आप किसी विषय को गंभीरता से लेंगे तो पाठक भाग जाएगा.
अनजाने में ही हम पाते हैं कि यह पूरी पत्रकारिता अपने पूरे चरित्र में भयानक स्त्री विरोधी और संस्कृति विरोधी हो उठी है. हिट्स जुटाने के लिए ख़बरों को चटपटा बनाने का खेल धीरे-धीरे संपादकीय नीति का हिस्सा हो बन गया है जिसके पीछे यह नज़रिया काम कर रहा है कि अगर आप किसी विषय को गंभीरता से लेंगे तो पाठक भाग जाएगा. यानी वहां गंभीर विषयों का भी तमाशा ही बनाया जा सकता है.
बेशक, यह बीमारी अख़बारों और टीवी चैनलों में भी दिखने लगी है, लेकिन वेब तो इस पर कुरबान है. उसने जैसे मान लिया है कि उसे कोई गंभीरता से देखने-पढ़ने वाला नहीं है, कि वह एक अधपढ़े, खा-पीकर अघाए और संस्कृतिविहीन वर्ग की कुंठाओं को शांत करने का सामान है जो अपने मोबाइल पर चटपटी लड़ाइयां और वे तस्वीरें देखता रहता है जो सेक्स शिक्षा के नाम पर उसे परोसी जा रही हैं. इस क्रम में किसी अनजान लड़की की पीठ दिख कहीं दिख भी गई तो क्या हुआ?
इस तरफ ध्यान खींचना इसलिए ज़रूरी है कि आने वाला दौर इसी पत्रकारिता का होना है. अगर इसकी कमान गैरपेशेवर, मूलतः प्रतिगामी और स्त्री विरोधी लोगों के हाथों में रही तो अभी अपने चुटकुलों में मगन तथाकथित वेब पाठक अपने लिए नया शगल मांगेगा और इसके जवाब में जब यह मीडिया कोई नया नशा मुहैया कराना चाहेगा तो उसके कहीं ज़्यादा विकृत और तकलीफदेह रूप सामने आने लगेंगे.