सोमवार, 24 जनवरी 2022

सुभाष भौमिक अंबेडकर स्टेडियम में / विवेक शुक्ला

 

सुभाष भौमिक को अंबेडकर स्टेडियम में दिल्ली के फुटबॉल प्रेमियों ने 1970 से 1980 के दशकों के दौरान अपने जलवे बिखते हुए खूब देखा है। उनका गेंद पर कंट्रोल और विरोधी टीम के खिलाड़ियों को चकमा देने की कला लाजवाब थी। भौमिक को दिल्ली ने कोलकात्ता के ईस्ट बंगाल क्लब और मोहन बागान की टीमों की तरफ से खेलते हुए देखा था। वे बेहद उम्दा राइट आउट थे। वे थोड़े से स्थूल थे पर इसके बावजूद वे मैदान में लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते थे।


 दरअसल दिल्ली में 20-25 साल पहले कोलकात्ता और पंजाब की टीमों के मैचों को देखने के लिए दर्शक बड़ी तादाद में उमड़ते थे। ईस्ट बंगाल और मोहन बागान को दिल्ली भरपूर प्यार देती थी। खासतौर पर  ईस्ट बंगाल का लाल एवं सुनहरा रंग दिल्ली के फुटबॉल के शैदाइयों की कई पीढ़ियों को अपनी तरफ खींचता रहा है। पूर्व भारतीय दिग्गज फुटबॉलर और मशहूर कोच सुभाष भौमिक का लंबी बीमारी के बाद विगत शनिवार को निधन हो गया।  सुभाष भौमिक 1970 में एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली फुटबॉल टीम के सदस्य थे। 


 अगर बात 1960 के दशक की करें तो दिल्ली को चुन्नी गोस्वामी का खेल भी बहुत पसंद था। डुरंड कप का 1965 का फाइनल मैच मोहन बागान बनाम पंजाब पुलिस के बीच  शुरू होने वाला था। अंबेडकर स्टेडियम दर्शकों से खचाखच भरा था। राष्ट्रपति एस. राधाकृष्नन मैच देखने स्टेडियम में आए हुए थे। उन्होंने देखा कि मोहन बागान के खिलाड़ियों के साथ चुन्नी गोस्वामी भी अभ्यास कर रहे हैं। 


राष्ट्रपति जी ने चुन्नी गोस्वामी को अपने पास बुलाकर कहा, “ मुझे लगता है कि तुम फाइनल मैच का स्थायी हिस्सा बन गए हो।”जरा सोचिए कि कितने खुशनसीब होते हैं वे लोग, जिनके फैन राष्ट्रपति भी होते हैं। चुन्नी गोस्वामी 1959 से  लेकर 1965 तक के हरेक डुरंड फाइनल मैच में खेले थे। दिल्ली उनकी मैदान में लय,ताल और गति की दिवानी थी।


 कोलकाता के किन खिलाड़ियों को पसंद करती दिल्ली


अगर बात सत्तर और अस्सी के दशकों की करें तो तब ईस्ट बंगाल, मोहन बागान और मोहम्डन स्पोर्टिंग के मैचों को देखने के लिए दिल्ली के दर्शक बेताब  रहते थे। ये सब टीमें अंबेडकर स्टेडियम में डीसीएम और डुरंड फुटबॉल कप में खेलती थी। कोलकाता की टीमों के सुरजीत सेन गुप्ता, सुधीर कर्माकर, भास्कर घोष, मोहम्मद हबीब,मनोरंजन भट्टाचार्य, सुभाष भौमिक, श्याम थापा जैसे बेहतरीन खिलाड़ियों की लय,ताल और गति को देखने के लिए दर्शकों में कमाल का उत्साह रहता था। ये मैच के शुरू होने से एक-दो घंटे पहले ही स्टेडियम में बैठ जाते थे। 


इन टीमों के मैच जब पंजाब के जेसीटी क्लब,बीएसएफ या पंजाब पुलिस से होते तो नजारा कमाल का होता था। पंजाब और बंगाल की टीमों के मैच बेहद संघर्ष के बाद समाप्त होते थे। इस तरह के मैचों में एक तरफ बंगाली दर्शक और दूसरी तरफ पंजाबी दर्शक होते थे। पंजाबी दर्शकों में सिखों की संख्या खासी रहा करती थी।


 पर 1984 के बाद सिख दर्शक अंबेडकर स्टेडियम से दूर होने लगे। उसके बाद अंबेडकर स्टेडियम में बंगाल और पंजाब की टीमों के बीच पहले वाले कांटे के मुकाबले होने लगभग बंद हो गए। यह मानना होगा कि बंगाली फुटबॉल प्रेमी भी पंजाब की टीमों के इंदर सिंह, हरजिंदर सिंह,मंजीत सिंह, सुखविंदर सिंह जैसे बेहद प्रतिभावान खिलाड़ियों की क्षमताओं का लोहा मानते थे।


 ईस्ट बंगाल-मोहन बगान के मैच किसे बांटते थे


ईस्ट बंगाल और मोहन बागान के बीच होने वाले मैचों से दिल्ली का बंगाली समाज भी बंट जाता था। ईस्ट बंगाल को दिल्ली में मुख्य रूप से सपोर्ट मिलती थी पूर्वी बंगाल ( अब बांग्लादेश) से देश के बंटवारे के समय बसे बंगालियों की। इनके पुऱखे देश के बंटवारे के वक्त दिल्ली आए थे। ईस्ट बंगाल और मोहन बागान के बीच होने वाले मैचों में यह दूरियां साफ तौर पर नजर आती थीं। 


मोहन बागान के साथ  मौजूदा बंगाल से संबंध रखने वाले बंगाली बंधु खड़े होते थे। पर जब ये दोनों टीमें पंजाब की बीएसएफ, जेसीटी मिल्स या पंजाब पुलिस  की टीमों से भिड़ती तब सब बंगबंधु एक हो जाते।ईस्ट बंगाल और मोहन बागान की टीम जब राजधानी में मॉडर्न स्कूल या मिन्टो रोड के प्रेस ग्राउंड में अभ्यास करती तब भी भारी संख्या में स्कूलों- कॉलेजों के नौजवान इसके स्टार खिलाड़ियों को करीब से देखने के लिए पहुंच जाते। अर्थशास्त्री डा.अर्मत्य सेन भी ईस्ट बंगाल के मैच देखने के लिए अंबेडकर स्टेडियम में मौजूद रहते थे। 

Vivek Shukla


Navbharattimes 24 January 2022.

Picture- Subhash Bhowmick

नेताजी क़ो कोटि कोटि प्रणाम /गोपाल प्रसाद व्यास

प्रस्तुति --  संगीता सिन्हा 


खोए हुए शेरों की तलाश माँगता है देश,

फिर सुभाष और आज़ाद माँगता है देश ।

महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी के जन्म दिवस पर उन्हें शत्-शत् नमन........🇮🇳🙏


वह ख़ून कहो किस मतलब का

जिसमें उबाल का नाम नहीं।

वह ख़ून कहो किस मतलब का

आ सके देश के काम नहीं।



वह ख़ून कहो किस मतलब का

जिसमें जीवन, न रवानी है!

जो परवश होकर बहता है,

वह ख़ून नहीं, पानी है!


उस दिन लोगों ने सही-सही

ख़ून की कीमत पहचानी थी।

जिस दिन सुभाष ने बर्मा में

मॉंगी उनसे कुर्बानी थी।


बोले, स्वतंत्रता की ख़ातिर

बलिदान तुम्हें करना होगा।

तुम बहुत जी चुके जग में,

लेकिन आगे मरना होगा।


आज़ादी के चरणों   में जो,

जयमाल चढ़ाई जाएगी।

वह सुनो, तुम्हारे शीशों के

फूलों से गूँथी जाएगी।


आजादी का संग्राम कहीं

पैसे पर खेला जाता है?

यह शीश कटाने का सौदा

नंगे सर झेला जाता है”


यूँ कहते-कहते वक्ता की

आँखों में ख़ून उतर आया!

मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा

दमकी उनकी रक्तिम काया!


आजानु-बाहु ऊँची करके,

वे बोले, रक्त मुझे देना।

इसके बदले भारत की

आज़ादी तुम मुझसे लेना।


हो गई सभा में उथल-पुथल

सीने में दिल न समाते थे।

स्वर इनक्लाब के नारों के

कोसों तक छाए जाते थे।


`हम देंगे-देंगे ख़ून'

शब्द बस यही सुनाई देते थे

रण में जाने को युवक खड़े

तैयार दिखाई देते थे। 


बोले सुभाष, इस तरह नहीं

बातों से मतलब सरता है।

लो यह कागज़ है कौन यहॉं

आकर हस्ताक्षर करता है?


इसको भरनेवाले जन को

सर्वस्व-समर्पण करना है

अपना तन-मन-धन-जन-जीवन

माता को अर्पण करना है


पर यह साधारण पत्र नहीं

आज़ादी का परवाना है

इस पर तुमको अपने तन का

कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!


वह आगे आए जिसके तन में

खून भारतीय बहता हो।

वह आगे आए जो अपने को

हिंदुस्तानी कहता हो!


वह आगे आए, जो इस पर

खूनी हस्ताक्षर करता हो!

मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए

जो इसको हँसकर लेता हो!


सारी जनता हुँकार उठी-

हम आते हैं, हम आते हैं!

माता के चरणों में यह लो,

हम अपना रक्त चढ़ाते हैं। ।


# गोपाल प्रसाद व्यास




जननायक कर्पूरी ठाकुर की सादगी बेमिसाल

 


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जननायक कर्पूरी ठाकुर की सादगी बेमिसाल व अनुकरणीय है। मुख्यमंत्री के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बावजूद आजीवन वे तामझाम व दिखावे से दूर रहे।
जननायक कर्पूरी ठाकुर की सादगी बेमिसाल व अनुकरणीय है। मुख्यमंत्री के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बावजूद आजीवन वे तामझाम व दिखावे से दूर रहे।
  • सुशील कुमार मोदी
सुशील कुमार मोदी
सुशील कुमार मोदी






ननायक कर्पूरी ठाकुर की सादगी बेमिसाल व अनुकरणीय है। मुख्यमंत्री के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बावजूद आजीवन वे तामझाम व दिखावे से दूर रहे। उनसे जुड़े अनेक संस्मरणों में से एक ऐसा है, जिसे मैं कभी भूल नहीं पाता हूं।

बात 1978 की है। पटना विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आए प्रसिद्ध गांधीवादी अर्थशास्त्री डा. जे. डी. सेठी मेरे राजेन्द्र नगर स्थित घर पर ठहरे हुए थे। एक दिन बाद विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में उन्हें शामिल होना था। मैंने उनसे पूछा कि वे पटना में किससे मिलना चाहेंगे। डा. सेठी ने कहा कि अगर संभव हो तो वे जननायक कर्पूरी ठाकुर जी से मिलना चाहेंगे। मैंने कर्पूरी जी के आफिस में फोन कर डा. सेठी के पटना में होने और उनसे मिलने की इच्छा के बारे में नोट करा दिया। मैंने आग्रह किया था कि जब भी कर्पूरी जी समय देंगे, मैं डा. सेठी को लेकर बताई गई जगह पर आ जाऊंगा।

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मैं सी.एम. आफिस से कोई सूचना आने का इंतजार ही कर रहा था कि 4-5 धंटे बाद मेरे घर का काॅल बेल बजा। मेरी भाभी दरवाजा खोली, सामने जननायक कर्पूरी ठाकुर जी खड़े थे। मगर वह कर्पूरी जी को पहचानती नहीं थी। उन्होंने पूछा, आप कौन है? किससे मिलना है? कर्पूरी जी ने कहा, ‘क्या सुशील मोदी जी का घर यही है, मैं कर्पूरी ठाकुर हूं।’ कर्पूरी ठाकुर का नाम सुनते ही भाभी भौंचक रह गई।

जब जननायक कर्पूरी जी मेरे घर पर पहुंचे थे, तब उनके साथ सुरक्षाकर्मी, स्काॅट, पायलट कुछ भी नहीं था। राजेन्द्र नगर स्थित मेरे घर पर पहुंचने से पहले अम्बेसडर गाड़ी में आगे बैठे कर्पूरी जी ने रास्ते में दो-तीन जगहों पर रूक कर लोगों से रास्ता पूछा था।

यह दीगर है कि जे. डी. सेठी का 74 के जेपी आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान था। कर्पूरी जी से उनका पुराना सम्पर्क-संबंध भी था। मगर किसी राज्य का मुख्यमंत्री किसी से मिलने के लिए स्वयं किसी दूसरे के घर पर बिना किसी पूर्व सूचना, तामझाम के पहुंच जाए यह विस्मित करने वाली बात थी।

यह भी पढ़ेंः कर्पूरी ठाकुर में जातीय कटुता की कभी धमक नहीं सुनाई दी(Opens in a new browser tab)

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रविवार, 23 जनवरी 2022

नितीश बोले मैं बनूंगा CM BY हुक or crook / सुरेंद्र किशोर

 

जब नीतीश कुमार ने टेबल पर मारा मुक्का और बोले- मैं बनूंगा सीएम, By hook or by crook, पढ़ें क्या है ये कहानी

बिहारके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

बिहारके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

पटना का कॉफी बोर्ड जो Coffee House के नाम से भी जाना जाता रहा है, आज खमोश है. आने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कुछ राजनेताओं-पत्रकारों के जेहन में इसकी बरबस ही याद आ गई. आइए जानते हैं कॉफी हाउस से जुड़े कुछ खास संस्मरण...

पटना. 'नीतीश कुमार ने टेबल पर मुक्का मारा और बोले मैं बनूंगा एक दिन बिहार का मुख्यमंत्री, BY HOOK OR CROOK'... ये दिलचस्प वाकया है, पटना के उस कॉफी बोर्ड (Coffee board) का जिसे लोग पटना कॉफी हाउस (Patna Coffee House) के नाम से भी जानते हैं. दरअसल, सत्तर के दशक में डाकबंगला चौराहा पर भारत सरकार के उपक्रम के तौर पर कॉफी बोर्ड का कार्यालय खुला था. उस वक्त कॉफी हाउस का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि बिहार (Bihar) के साहित्य जगत से लेकर राजनीति के तमाम दिग्गज यहां पहुंचते थे, और न सिर्फ कॉफी का आनंद लेते थे बल्कि देश और दुनिया के साहित्य से लेकर राजनीति की तमाम चर्चाएं कॉफी बोर्ड में होती थी.

दरअसल, कॉफी हाउस की कई ऐसी कहानियां हैं जिसे आज भी वहां बैठने वाले लोग बताते हैं तो अतीत की यादों में खो जाते हैं. ऐसा ही दिलचस्प वाकया बताया बिहार के वरिष्ठ और देश के जाने-माने पत्रकार सुरेंद्र किशोर (Journalist Surendra Kishore) ने. सुरेंद्र किशोर सत्तर के दशक में सोशलिस्ट विचारधारा से प्रभावित हो राजनीति में थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) के प्राइवेट सेक्रेटरी भी रह चुके थे.

सुरेंद्र किशोर बताते हैं कि आए दिन की तरह कॉफी हाउस में बैठे हुए थे, नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भी तब छात्र नेता के तौर पर तेजी से उभर रहे थे. लेकिन 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की हार हो गई थी. इस वजह से वे परेशान भी थे. इसी परेशानी के बीच नीतीश कुमार उनके सामने बैठे थे और इसी बीच कॉफी टेबल पर आ गई. दोनों कॉफी पी रहे थे. तभी तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की चर्चा छिड़ गई. चर्चा हो रही थी कि जिस उम्मीद से वे मुख्यमंत्री बने थे वो पूरी नहीं हो पा रही थीं.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व अन्य (फाइल फोटो)

जब सुरेंद्र किशोर ने इसी चर्चा के दौरान सवाल किया कि क्या बिहार को एक अच्छा मुख्यमंत्री नहीं मिलने वाला है? इस बात को सुन नीतीश कुमार ने अचानक सामने की टेबल पर मुक्का मारा और बोले, सुरेंद्र जी, एक दिन मैं बिहार का मुख्यमंत्री बनूंगा, By hook or by crook, और मैं बिहार में सब ठीक कर दूंगा.

दरअसल, कॉफी बोर्ड में कई दिग्गज राजनेता आते थे. जिनमें कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur), लालू यादव (Lalu Yadav), सुशील मोदी (Sushil Modi), शिवानंद तिवारी, सुबोधकांत सहाय और सरयू राय जैसे कई बड़े नेता शामिल थे. तब माना जाता था कि कॉफी बोर्ड युवा राजनेताओं को तैयार करने का एक बड़ा सेंटर है. जहां तब के युवा नेताओं ने, जिन्होंने बाद में चलकर बिहार और देश के बड़े नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई, आया करते थे. आज की तारीख में बिहार के जितने जाने-माने राजनीतिक चेहरे हैं, वे सभी कॉफी बोर्ड में बैठा करते थे. उस समय समाजवादी राजनीति की चर्चाएं ज्यादा होती थीं.

कॉफी हाउस की चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं, उस समय कई सोशलिस्ट विचारधारा के लोग कॉफी हाउस में बैठा करते थे. 1974 के जेपी आंदोलन के समय कॉफी बोर्ड की भूमिका काफी बढ़ गई थी. कॉफी बोर्ड में घंटों जेपी मूवमेंट की चर्चा होती. लालू यादव भी उन्हीं दिनों नेता के तौर पर तेजी से उभर रहे थे, लेकिन उनकी पहचान तब छात्र नेता के तौर पर ही थी. रवि उपाध्याय बताते हैं कि लालू यादव भी कॉफी हाउस में आया करते, थोड़ा समय गुजार किसी के साथ कॉफी पी लेते और निकल जाते थे. लेकिन, तब भी उनका स्वभाव मसखरापन वाला ही था.

कॉफी हाउस की चर्चा और महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि उस वक्त के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर से जब पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने, जो तब 'आज' अखबार में पत्रकार थे, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सवाल पूछा तो सवाल सुनते ही कर्पूरी ठाकुर ने तेज आवाज में कहा था, मुझे पता है कि कॉफी हाउस में क्या-क्या चर्चा होती है मेरी सरकार के बारे में. जाहिर है इससे समझा जा सकता है कि तब के सत्ता के शीर्ष में बैठे नेताओं को पता था कि कॉफी हाउस का लेवल क्या था और वो कहां तक की जानकारी रखते थे.

पटना के डाकबंगला चौराहे पर स्थित कॉफी हाउस.

कॉफी बोर्ड में सिर्फ राजनीतिक जगत के लोगों का ही जमावड़ा नहीं लगता था, बल्कि साहित्य जगत के दिग्गज भी कॉफी बोर्ड में बैठते थे. फणीश्वर नाथ रेणु, नागार्जुन, शंकर दयाल सिंह, योग जगत के जाने-माने चेहरे फूलगेंदा सिंह जो अमेरिका में योग सिखाते थे, जब बिहार आते तो कॉफी बोर्ड में आना नहीं भूलते. कॉफी बोर्ड में एक खास कॉर्नर साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेणु के लिए बुक रहता था, जिसका नाम था रेणु कॉर्नर. जब रेणु जी आते तो कॉफी हाउस में बैठे लोग उनके पास आ जाते और उनकी बातों को घंटों सुना करते थे.

सर गणेश दत्त के पोते और विधानसभा के सदस्य रह चुके गजानन शाही, जिन्हें लोग मुन्ना शाही के नाम से भी जानते हैं, कॉफी बोर्ड में प्रतिदिन बैठा करते थे. कॉफी बोर्ड की बातों की चर्चा होते ही यादों में खो जाते हैं. मुन्ना शाही बताते हैं कि एक समय था जब पटना के डाकबंगला चौराहा पास बने कॉफी बोर्ड में बैठना राजनीतिक जगत के हों, या फिर किसी दूसरे क्षेत्र के, सम्मान की बात समझी जाती थी. रौनक का आलम ये था कि एक कप कॉफी पीने के लिए लोग इंतजार करते थे. अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गजों से मिलने के लिए इससे बेहतर जगह कोई दूसरी नहीं थी.

मुन्ना शाही बताते हैं कि 1990 के बाद जब भारत सरकार की तरफ से खोले गए कॉफी बोर्ड को घाटा होने लगा, तो पटना के कॉफी हाउस को भी बंद कर दिया गया. बहुत प्रयास किया गया कॉफी बोर्ड बंद ना हो, लेकिन पटना का कॉफी बोर्ड, जिसे पटना कॉफी हाउस भी बोला जाता था, बंद हो ही गया. इतिहास के कई यादगार पलों को अपने में समेटे पटना कॉफी हाउस पटना के डाकबंगला चौराहा के पास आज भी दिखता है, लेकिन आज यहां अब कोई बैठक नहीं लगती.

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Tags:Bihar NewsCM Nitish KumarKarpoori ThakurLalu Prasad YadavNitish kumarPATNA NEWS

सुभाष भौमिक अंबेडकर स्टेडियम में / विवेक शुक्ला

  सुभाष भौमिक को अंबेडकर स्टेडियम में दिल्ली के फुटबॉल प्रेमियों ने 1970 से 1980 के दशकों के दौरान अपने जलवे बिखते हुए खूब देखा है। उनका गें...