बुधवार, 21 अक्तूबर 2020

रवि अरोड़ा की नजर से

 गुलगुलों से परहेज़ / रवि अरोड़ा 


रवि अरोड़ा

अन्य दिनो की तरह कल शाम भी मैं फल लेने को गोविंद पुरम के निकट खड़ी ठेलियों पर रुक गया । यहाँ आजकल फल आदि वही लोग बेच रहे होते हैं जिनका लॉकडाउन के बाद से पुराना रोज़गार चौपट है अथवा छिन चुका है । हापुड़ रोड के इस इलाक़े में पहले इक्का दुक्का ही फल विक्रेता मिलते थे मगर अब इनकी संख्या पचास के भी पार पहुँच चुकी है । ख़ैर , मैं पहचान के एक ठेली वाले से अभी फल तुलवा ही रहा था कि  तभी वहाँ पुलिस की एक जिप्सी आकर रुकी । पुलिस का वहाँ पहुँचना ही था कि ठेली वालों में भगदड़ मच गई । जिसका जिस ओर मुँह था वो उस ओर ही अपनी ठेली लेकर भागा । हड़बड़ाहट में कई ठेलियाँ आपस में टकरा गईं और उनमे रखे सेब, अनार, पपीते और अमरूद आदि सड़क पर बिखर गये । एक डरपोक से बालक की तो ठेली ही पलट गई और उस पर रखे सारे सेब सड़क पर आ गिरे । पुलिस का एसा ख़ौफ़ फल विक्रेताओं पर था कि कोई भी सड़क पर बिखरे अपने फलों को उठाने का साहस नहीं कर रहा था और सभी बचे ख़ुचे माल को लेकर ही सरपट भागे जा रहे थे । महँगाई के ज़माने में सड़क पर फल बिखरे हों तो भला बंदरबाँट को लोगबाग़ क्यों न रुकेंगे ? सो अनेक पैदल अथवा साइकिल सवार फल बटोरने लग गये । कई दुपहिया चालक भी अपना वाहन सड़क पर बेतरतीब खड़ा कर इस लूट में शामिल हो गए । सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इससे सड़क पर ट्रेफ़िक जाम हो गया और सड़क पर निर्बाध आवागमन की गरज से मौक़े से ठेलियों को हटवाने आई पुलिस की इस आमद से ही जाम लग गया । 


ठेली वालों के प्रति मेरी हमदर्दी हो सकता है कि बेवक़ूफ़ाना हो मगर पता नहीं क्यों यह पूरा घटनाक्रम मुझ पर बेहद नागवार गुज़रा । हालाँकि मैं मानता हूँ कि बेहतर नगरीय सुविधाओं के लिये किसी भी शहर में आवागमन की निर्बाध सुविधा होना शुरुआती शर्तों में से एक है । सामान्य दिनो में तो मैं स्वयं इसका हामी हूँ मगर आजकल जब चहुँओर रोटी के लाले हैं तब भी हम सामान्य दिनो जैसा स्वाँग करें तो यह कहाँ तक जायज़ है ? ग्लोबल हंगर इंडेक्स के हिसाब से भूख के मामले में हम 107 देशों में 94वें स्थान तक पहुँच गये हैं । यहाँ तक कि पाकिस्तान, बांग्ला देश और नेपाल जैसे पड़ौसी देशों की स्थिति भी हमसे बेहतर हैं । जानकर बता रहे हैं कि स्थितियाँ उससे अधिक ख़राब हैं , जितना अनुमान लगाया जा रहा है । ऐसे माहौल में यदि कोई सड़क किनारे खड़ा होकर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहा है तो क्या ग़लत है ? मुल्क में लाखों-करोड़ों लोग आजकल इसी ठेली-पटरी के सहारे हैं । मगर सोशल मीडिया पर रोज़ इन पर पुलिसिया क़हर टूटता दिखाई देता है । ये वो लोग हैं जिन्हें कोई बैंक लोन नहीं देता । किसी सरकारी रियायत अथवा योजना में भी इनकी कोई हिस्सेदारी नहीं होती । सरकारी सुविधा के नाम पर इन्हें बस इतना चाहिये कि कोई मुशटंडा इनसे हफ़्ता न वसूले अथवा कोई पुलिस वाला इनकी ठेली न पलटे । मगर हम इन्हें यही सुविधा देने को तैयार नहीं हैं । 


अनलॉक की प्रक्रिया में पूरे मुल्क के बाज़ार खुल गये हैं मगर पैठ और पटरी बाज़ार ही हम नहीं खोल रहे । यूँ ही कहीं भी बेतरतीब खड़े होकर ये लोग कुछ बेंचें तो गोविंद पुरम जैसा पुलिसिया क़हर इन पर टूट पड़ता है । बेशक ये शहर हमने अपने लिए बनाए हैं और इसे साफ़ देखने की हमारी ख़्वाहिश क़तई ग़ैर वाजिब नहीं है । विकसित देशों जैसी नगरीय सुविधाएँ पाने का हमें भी हक़ है मगर जब हम अपने घर के सारे काम ख़ुद नहीं करना चाहते और हमें घरेलू नौकर चाहिये । घर-दुकान की बिजली, पानी अथवा लकड़ी आदि के काम हमें आते नहीं । बड़े-बड़े और महँगे 

शॉपिंग मॉल में ख़रीदारी की हमारी हैसियत नहीं है और सारी जगह घूम कर कोई ठेली-पटरी वाला ही हम ढूंढ़ते हैं तो मुआफ़ कीजिएगा फिर हमें कोई हक़ नहीं कि हम इनके रोज़गार को तिरछी नज़र से देखें । गुड़ खाकर गुलगुलों से परहेज़ का ढकोसला अच्छा नहीं होता जनाब ।

सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

jरामधारी सिंह दिनकर

 द्वन्द्व गीत (1940) ●°•/ *रामधारी सिंह "दिनकर"* 

प्रस्तुति - विमल कुमार  वर्मा 


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            (०१) 

चाहे जो भी फसल उगा ले, 

तू जल धार बहाता चल। 

जिस का भी घर चमक उठे, 

तू मुक्त प्रकाश लुटाता चल। 

रोक नहीं अपने अन्तर का 

वेग किसी आशंका से, 

मन में उठें भाव जो, उन को 

गीत बना कर गाता चल। 


            (०२) 

तुझे फिक्र क्या, खेती को 

प्रस्तुत है कौन किसान नहीं? 

जोत चुका है कौन खेत? 

किसको मौसम का ध्यान नहीं? 

कौन समेटेगा, किस के 

खेतों से जल बह जायेगा? 

इस चिन्ता में पड़ा अगर 

तो बाकी फिर ईमान नहीं। 


            (०३) 

तू जीवन का कण्ठ, भंग 

इसका कोई उत्साह न कर, 

रोक नहीं आवेग प्राण के, 

सँभल सम्भल कर आह न कर। 

उठने दे हुंकार हृदय से, 

जैसे वह उठना चाहे; 

किसका, कहाँ वक्ष फटता है, 

तू इसकी परवाह न कर। 


            *(०४)* 

हम पर्वत पर की पुकार हैं, 

वे घाटी के वासी हैं; 

वे वन में भी गृही, और 

हम गृह में भी, संन्यासी हैं। 

वे लेते कर बन्द खिड़कियाँ 

डर कर तेज हवाओं से; 

झञ्झाओं में पंख खोल 

उड़ने के हम अभ्यासी हैं। 


            (०५) 

जब तब, मैं सोचता कि क्यों 

छन्दों के जाल बिछाता हूँ, 

सुनता भी कोई कि, शून्य में 

मैं झञ्झा सा गाता हूँ! 

आयेगा वह कभी पियासे 

गीतों को शीतल करने, 

जीवन के सपने बिखेर कर 

जिस का पन्थ सजाता हूँ? 


            (०६) 

रोक हॄदय में उसे, अतल से 

मेघ उठा जो आता है। 

घिरती है जो सुधा, बोल कर 

तू क्यों उसे गँवाता है? 

कलम उठा मत दौड़ प्राण के 

कम्पन पर प्रत्येक घड़ी। 

नहीं जानता, गीत लेख 

बनते बनते मर जाता है? 


            *(०७)* 

छिप कर मन में बैठ और 

सुन तो नीरव झंकारो को। 

अन्तर्नभ पर देख, ज्योति में 

छिटके हुये सितारों को। 

बड़े भाग्य से ये खिलते हैं 

कभी चेतना के वन में। 

यों बिखेरता मत चल, सड़कों 

पर अनमोल विचारों को। 


            *(०८)* 

तू जो कहना चाह रहा, 

वह भेद कौन जन जानेगा? 

कौन तुझे तेरी आँखों से, 

बन्धु! यहाँ पहचानेगा? 

जैसा तू, वैसे ही तो 

ये सभी दिखाई पड़ते हैं; 

तू इन सबसे भिन्न ज्योति है, 

कौन बात यह मानेगा? 


            (०९) 

जादू की ओढ़नी ओढ़ जो 

परी प्राण में जागी है; 

उसकी सुन्दरता के आगे 

क्या यह कीर्त्ति अभागी है? 

पचा सकेगा नहीं स्वाद क्या 

इस रहस्य का भी मन में? 

तब तो तू, सत्य ही, अभी तक 

भी अपूर्ण अनुरागी है। 


            (१०) 

बहुत चला तू, केन्द्र छोड़ कर 

दूर स्वयम् से जाने को; 

अब तो कुछ दिन पन्थ मोड़ 

पन्थी! अपने को पाने को। 

जला आग कोई जिस से तू 

स्वयम् ज्योति साकार बने, 

दर्द बसाना भी यह क्या 

गीतों का ताप बढ़ाने को! 


            (११) 

कौन वीर है, एक बार व्रत 

ले कर कभी न डोलेगा? 

कौन संयमी है, रस पी कर 

स्वाद नहीं फिर बोलेगा? 

यों तो फूल सभी पाते हैं, 

पायेगा फल, किन्तु, वही, 

मन में जन्मे हुए वृक्ष का 

भेद नहीं जो खोलेगा। 


            (१२) 

तारे लेकर जलन, मेघ  

आँसू का पारावार लिये, 

संध्या लिये विषाद, पुजारिन 

उषा विफल उपहार लिये, 

हँसे कौन? तुझ को तज कर 

जो चला वही हैरान चला, 

रोती चली बयार, हृदय में 

मैं भी हाहाकार लिये। 


            (१३) 

देखें तुझे किधर से आ कर? 

नहीं पन्थ का ज्ञान हमें। 

बजती कहीं बाँसुरी तेरी, 

बस, इतना ही भान हमें। 

शिखरों से ऊपर उठने 

देती न हाय, लघुता अपनी; 

मिट्टी पर झुकने देता है 

देव, नहीं अभिमान हमें। 


            (१४) 

एक चाह है, जान सकूँ, यह 

छिपा हुआ दिल में क्या है। 

सुन कर भी न समझ पाया 

इस आखर अनमिल में क्या है। 

ऊँचे टीले पन्थ सामने, 

अब तक तो विश्राम नहीं, 

यही सोच बढ़ता जाता हूँ, 

देखूँ, मञ्जिल में क्या है। 


            (१५) 

चलने दे रेती खराद की, 

रुके नहीं यह क्रम तेरा। 

अभी फूल मोती पर गढ़ दे, 

अभी वृत्त का दे घेरा। 

जीवन का यह दर्द मधुर है, 

तू न व्यर्थ उपचार करे। 

किसी तरह ऊषा तक टिम टिम 

जलने दे दीपक मेरा। 


            (१६) 

क्या पूछूँ खद्योत, कौन सुख 

चमक चमक छिप जाने में? 

सोच रहा कैसी उमङ्ग है 

जलते से परवाने में। 

हाँ, स्वाधीन सुखी हैं, लेकिन, 

ओ व्याधा के कीर, बता, 

कैसा है आनन्द जाल में 

तड़प तड़प रह जाने में? 


            (१७) 

छू कर परिधि बन्ध फिर आते 

विफल खोज आह्वान तुम्हें। 

सुरभि सुमन के बीच देव, 

कैसे भाता व्यवधान तुम्हें? 

छिप कर किसी पर्ण झुरमुट में 

कभी कभी कुछ बोलो तो; 

कब से रहे पुकार सत्य के 

पथ पर आकुल गान तुम्हें! 


            (१८) 

देख न पाया प्रथम चित्र, 

त्यों, अन्तिम दृश्य न पहचाना, 

आदि अन्त के बीच सुना, 

मैंने जीवन का अफसाना। 

मञ्जिल थी मालूम न मुझ को 

और पन्थ का ज्ञान नहीं, 

जाना था निश्चय, इस से 

चुपचाप पड़ा मुझ को जाना। 


            (१९) 

चलना पड़ा बहुत, देखा था 

जब तक यह संसार नहीं, 

इस घाटी में भी रुक पाया 

मेरा यह व्यापार नहीं। 

कूदूँगा निर्वाण जलधि में 

कभी पार कर इस जग को, 

जब तक शेष पन्थ, तब तक 

विश्राम नहीं, उद्धार नहीं। 


            (२०) 

दिये नयन में अश्रु, हॄदय में 

भला किया जो प्यार दिया, 

मुझमें मुझे मगन करने को 

स्वप्नों का संसार दिया। 

सब कुछ दिया मूक प्राणों की 

वंशी में वाणी दे कर, 

पर क्यों हाय, तृषा दी, उर में 

भीषण हाहाकार दिया? 


            (२१) 

कितनों की लोलुप आँखों ने 

बार बार प्याली हेरी। 

पर, साकी अल्हड़ अपनी ही 

ईच्छा पर देता फेरी। 

हो अधीर मैंने प्याली को 

थाम मधुर रस पान किया, 

फिर देखा, साकी मेरा था, 

प्याली औ’ दुनियाँ मेरी। 


            (२२) 

विभा, विभा, ओ विभा हमें दे, 

किरण! सूर्य! दे उजियाली। 

आह! युगों से घेर रही 

मानव शिशु को रजनी काली। 

प्रभो! रिक्त यदि कोष विभा का 

तो फिर इतना ही कर दे; 

दे जगती को फूँक, तनिक 

झिलमिला उठे यह अँधियाली। 


            *(२३)* 

तू, वह, सब एकाकी आये, 

मैं भी चला अकेला था; 

कहते जिसे विश्व, वह तो 

इन असहायों का मेला था। 

पर, कैसा बाजार? विदा दिन 

हम क्यों, इतना लाद चले? 

सच कहता हूँ, जब आया 

तब पास न एक अधेला था। 


            (२४) 

मेरे उर की कसक हाय, 

तेरे मन का आनन्द हुई। 

इन आँखों की अश्रु धार ही 

तेरे हित मकरन्द हुई। 

तू कहता ’कवि’ मुझे, किन्तु, 

आहत मन यह कैसे माने? 

इतना ही है ज्ञात कि मेरी 

व्यथा उमड़ कर छन्द हुई। 


            (२५) 

मैं रोता था हाय, विश्व 

हिमकण की करुण कहानी है। 

सुन्दरता जलती मरघट में, 

मिटती यहाँ जवानी है। 

पर, बोला कोई कि जरा 

मोती की ओर निहारो तो। 

दो दिन ही तो सही, किन्तु, 

देखो कैसा यह पानी है! 


            (२६) 

रूप, रूप, हाँ रूप, सुना था, 

जगती है मधु की प्याली। 

यहाँ सुधा मिलती अधरों में, 

आँखों में मद की लाली। 

उतराता ही नित रहता 

यौवन रसधार तरंगों में, 

बरसाती मधुकण जीवन में 

यहाँ सुन्दरी मतवाली। 


            (२७) 

सो, देखा चाँदनी एक दिन 

राज अमा पर छोड़ गई। 

खिजाँ रोकता रहा लाख, 

कोयल वन से मुँह मोड़ गई। 

और आज क्यारी क्यों सूनी? 

अरे! बता, किसने देखा? 

गलबाँही डाले सुन्दरता 

काल संग किस ओर गई? 


            (२८) 

कलिके, मैं चाहता तुम्हें 

उतना जितना यह भ्रमर नहीं, 

अरी, तटी की दूब, मधुर तू 

उतनी जितना अधर नहीं; 

किसलय, तू भी मधुर, 

चन्द्रवदनी निशि, तू मादक रानी। 

दु:ख है, इस आनन्द कुञ्ज में 

*मैं ही केवल अमर नहीं।* 


            (२९) 

दूब भरी इस शैल तटी में 

उषा विहँसती आयेगी, 

युग युग कली हँसेगी, 

युग युग कोयल गीत सुनायेगी, 

घुल मिल चन्द्र किरण में 

बरसेगी भू पर आनन्द सुधा, 

केवल मैं न रहूँगा, यह 

मधु धार उमड़ती जायेगी। 


            (३०) 

बिछुड़े मित्र, छला मैत्री ने, 

जग ने अगणित शाप दिये; 

अश्रु पोंछ तू दूब फूल से 

मन बहलाती रही प्रिये! 

भूलूँगा न प्रिया की चितवन, 

मैत्री की शीतल छाया, 

जाऊँगा जगती से, लेकिन, 

तेरी भी तसवीर लिये। 


            (०३१) 

यह फूलों का देश मनोरम 

कितना सुन्दर है रानी! 

इस से मधुर स्वर्ग? परियाँ 

तुझ सी क्या सुन्दर कल्याणी? 

अरे, मरूँगा कल तो फिर क्यों 

आज नहीं रसधार बहे? 

फूल फूल पर फिरे न क्यों, 

कविता तितली-सी दीवानी? 


            (०३२) 

पाटल सा मुख, सरल, श्याम दृग 

जिन में कुछ अभिमान नहीं, 

सरल मधुर वाणी जिस से 

मादक कवियों के गान नहीं; 

रेशम के तारों से चिकने बाल, 

हृदय की क्या जानूँ? 

आँखें मुग्ध देखतीं, रहता 

पाप पुण्य का ध्यान नहीं। 


            (०३३) 

बार बार द्वादशी चन्द्र की 

किरणों में तू मुस्काई, 

बार बार वनफूलों में तू 

रूप लहर बन लहराई। 

हिम कण से भींगे गुलाब तू 

चुनती थी उस दिन वन में, 

बार बार उसकी पुलक स्मृति 

उमड़ उमड़ दृग में छाई। 


            (०३४) 

ये नवनीत कपोल, गुलाबों 

की जिन में लाली खोई; 

ये नलिनी से नयन, जहाँ 

काजल बन लघु अलिनी सोई; 

कोंपल से अधरों को रंग कर 

कब वसन्त कर धन्य हुआ? 

किस विरही ने तनु की यह 

धवलिमा आँसुओं में धोई? 


            (०३५) 

युग युग से तूलिका चित्र 

खींचते विफल, असहाय थकी, 

उपमा रही अपूर्ण, निखिल 

सुषमा चरणों पर आन झुकी। 

बार बार कुछ गा कर कुछ की 

चिन्ता में कवि दीन हुआ; 

सुन्दरि! कहाँ कला अब तक भी 

तुझे छन्द में बाँध सकी? 


            (०३६) 

उतरी दिव्य लोक से भू पर 

तू बन देवि! सुधा सलिला, 

प्रथम किरण जिस दिन फूटी थी, 

उस दिन पहला स्वप्न खिला।

फूटा कवि का कण्ठ, प्रथम 

मानव के उर की खिली कली, 

मधुर ज्योति जगती में जागी, 

सत् चित् को आनन्द मिला। 


            (०३७) 

जिस दिन विजन, गहन कानन में 

ध्वनित मधुर मंजीर हुई, 

चौंक उठे ये प्राण, शिरायें 

उर की विकल अधीर हुईं। 

तूने बन्दी किया हॄदय में, 

देवि, मुझे तो स्वर्ग मिला, 

आलिंगन में बँधा और 

ढीली जग की जंजीर हुई। 


            (०३८) 

तू मानस की मधुर कल्पना, 

वाणी की झंकार सखी! 

गानों का अन्तर्गायन तू 

प्राणों की गुंजार सखी! 

मैं अजेय सोचा करता हूँ, 

क्यों पौरुष बलहीन यहाँ? 

सब कुछ होकर भी आखिर हूँ 

चरणों का उपहार सखी! 


            (०३९) 

खोज रही तितली-सी वन वन 

तुम्हें कल्पना दीवानी; 

रँगती चित्र बैठ निर्जन में 

रूपसि! कविता कल्याणी। 

मैं निर्धन ऊँघती कली से 

स्वप्न बिछा निर्जन पथ पर 

बाट जोहता हूँ, कुटीर में 

आओ अलका की रानी! 


            (०४०)

कुछ सुन्दरता छिपी मुकुल में, 

कुछ हँसते से फूलों में; 

कुछ सुहागिनी के कपोल, 

काजल, सिन्दूर, दुकूलों में। 

कविते, भूल न इस उपवन पर, 

मृत कुसुमों की याद करे; 

वह होगी कैसी छवि जो 

छिप रही चिता की धूलों में? 


            (०४१) 

आह, चाहता मैं क्यों जाये 

जग से कभी वसन्त नहीं? 

आशा भरे स्वर्ण जीवन का 

किसी रोज हो अन्त नहीं? 

था न कभी, तो फिर क्या चिन्ता 

आगे कभी नहीं हूँगा? 

यदि पहले था, तो क्या हूँगा 

अब से अरे, अनन्त नहीं? 


            (०४२) 

भू की झिलमिल रजत सरित ही 

घटा गगन की काली है; 

मेंहदी के उर की लाली ही 

पत्तों में हरियाली है; 

जुगुनू की लघु विभा दिवा में 

कलियों की मुस्कान हुई; 

उडु को ज्योति उसी ने दी, 

जिसने निशि को अँधियाली है। 


            (०४३) 

जीवन ही कल मृत्यु बनेगा, 

और मृत्यु ही नव जीवन, 

जीवन मृत्यु बीच तब क्यों 

द्वन्द्वों का यह उत्थान पतन? 

ज्योति बिन्दु चिर नित्य अरे, तो 

धूल बनूँ या फूल बनूँ, 

जीवन दे मुस्कान जिसे, क्यों 

उसे कहो दे अश्रु मरण? 


            (०४४) 

जाग प्रिये! यह अमा स्वयम् 

बालारुण मुकुट लिये आई, 

जल, थल, गगन, पवन, तृण, 

तरु पर, अभिनव एक विभा छाई; 

मधुपों ने कलियों को पाया, 

किरणें लिपट पड़ीं जल से, 

ईर्ष्यावती निशा अब बीती, 

चकवा ने चकवी पाई। 


            (०४५) 

दो अधरों के बीच खड़ी थी 

भय की एक तिमिर रेखा, 

आज ओस के दिव्य कणों में 

धुल उसको मिटते देखा। 

जाग, प्रिये! निशि गई, चूमती 

पलक उतर कर प्रात विभा, 

जाग, लिखें चुम्बन से हम 

जीवन का प्रथम मधुर लेखा। 


            (०४६) 

अधर सुधा से सींच, लता में 

कटुता कभी न आयेगी, 

हँसने वाली कली एक दिन 

हँस कर ही झर जायेगी। 

जाग रहे चुम्बन में तो क्यों 

नींद न स्वप्न मधुर होगी? 

मादकता जीवन की पी कर 

मृत्यु मधुर बन जायेगी। 


            (०४७) 

और नहीं तो क्यों गुलाब की 

गमक रही सूखी डाली? 

सुरा बिना पीते मस्ताने 

धो धो क्यों टूटी प्याली? 

उगा अरुण प्राची में तो क्यों 

दिशा प्रतीची जाग उठी? 

चूमा इस कपोल पर, उस पर 

कैसे दौड़ गई लाली? 


            (०४८) 

रति अनंग शासित धरणी यह, 

ठहर पथिक, मधु रस पी ले; 

इन फूलों की छाँह जुड़ा ले, 

कर ले शुष्क अधर गीले; 

आज सुमन मण्डप में सो कर 

परदेशी! निज श्रान्ति मिटा; 

चरण थके होंगे, तेरे पथ 

बड़े अगम, ऊँचे टीले। 


            (०४९) 

कुसुम कुसुम में प्रखर वेदना, 

नयन अधर में शाप यहाँ, 

चन्दन में कामना वह्नि, विधु 

में चुम्बन का ताप यहाँ। 

उर उर में बंकिम धनु, दृग दृग 

में फूलों के कुटिल विशिख; 

यह पीड़ा मधुमयी, मनुज 

बिंधता आ अपने आप यहाँ। 


            (०५०) 

यहाँ लता मिलती तरु से 

मधु कलियाँ हमें पिलाती हैं, 

पीती ही रहतीं यौवन रस, 

आँखें नहीं अघाती हैं। 

कर्म भूमि के थके श्रमिक को 

इस निकुञ्ज की मधुबाला 

एक घूँट में श्रान्ति मिटा कर 

बेसुध, मत्त बनाती है। 


            (०५१) 

यात्री हूँ अति दूर देश का, 

पल भर यहाँ ठहर जाऊँ, 

थका हुआ हूँ, सुन्दरता के 

साथ बैठ मन बहलाऊँ; 

’एक घूँट बस और’ हाय रे, 

ममता छोड़ चलूँ कैसे? 

दूर देश जाना है, लेकिन, 

यह सुख रोज कहाँ पाऊँ? 


            (०५२) 

’दूर देश’ हाँ ठीक, याद है, 

यह तो मेरा देश नहीं; 

इस से हो कर चलो, यहीं तक 

रुकने का आदेश नहीं। 

बजा शंख, कारवाँ चला, 

साकी, दे विदा, चलूँ मैं भी, 

कभी कभी हम गिन पाते हैं 

प्रिये! मीन औ’ मेष नहीं। 


            (०५३) 

सचमुच, मधु फल लिये मरण का 

जीवन लता फलेगी क्या? 

आग करेगी दया? चिता में 

काया नहीं जलेगी क्या? 

कहती है कल्पना, मधुर 

जीवन को क्यों कटु अन्त मिले? 

पर, जैसे छलती वह सब को 

वैसे मुझे छलेगी क्या? 


            (०५४) 

मधुबाले! तेरे अधरों से 

मुझ को रञ्च विराग नहीं, 

यह न समझना देवि! कुटिल 

तीरों के दिल पर दाग नहीं; 

जी करता है हृदय लगाऊँ, 

पल पल चूमूँ, प्यार करूँ, 

किन्तु, आह! यदि हमें जलाती 

क्रूर चिता की आग नहीं। 


            (०५५) 

दो कोटर को छिपा रहीं 

मदमाती आँखें लाल सखी! 

अस्थि तन्तु पर ही तो हैं 

ये खिले कुसुम से गाल सखी! 

और कुचों के कमल? झरेंगे 

ये तो जीवन से पहले, 

कुछ थोड़ा सा मांस प्राण का 

छिपा रहा कंकाल सखी! 


            (०५६) 

बचे गहन से चाँद, छिपाऊँ 

किधर? सोच चल होता हूँ, 

मौत साँस गिनती तब भी जब 

हृदय लगा कर सोता हूँ। 

दया न होगी हाय, प्रलय को 

इस सुन्दर मुखड़े पर भी, 

जिसे चूम हँसती है दुनियाँ, 

उसे देख मैं रोता हूँ। 


            (०५७) 

जाग, देख फिर आज बिहँसती 

कल की वही उषा आई, 

कलियाँ फिर खिल उठीं, सरित पर 

परिचित वही विभा छाई; 

रंजित मेघों से मेदुर नभ 

उसी भाँति फिर आज हँसा, 

भू पर, मानों, पड़ी आज तक 

कभी न दु:ख की परछाईं। 


            (०५८)

रँगने चलीं ओस मुख किरणें 

खोज क्षितिज का वातायन, 

जानें, कहाँ चले उड़ उड़ कर 

फूलों की ले गन्ध पवन; 

हँसने लगे फूल, किस्मत पर 

रोने का अवकाश कहाँ? 

बीते युग, पर, भूल न पाई 

सरल प्रकृति अपना बचपन। 


            (०५९) 

मैं भी हँसूँ फूल सा खिल कर? 

शिशु अबोध हो लूँ कैसे? 

पी कर इतनी व्यथा, कहो, 

तुतली वाणी बोलूँ कैसे? 

जी करता है, मत्त वायु बन 

फिरूँ; कुञ्ज में नृत्य करूँ, 

पर, हूँ विवश हाय, पंकज का 

हिम कण हूँ, डोलूँ कैसे? 


            (०६०) 

शान्त पाप! जग के जंगल में 

रो मेरे कवि और नहीं, 

सुधा सिक्त पल ये, आँसू का 

समय नहीं, यह ठौर नहीं; 

अन्तर्जलन रहे अन्तर में, 

आज वसन्त उछाह यहाँ; 

आँसू देख कहीं मुरझें 

बौरे आमों के मौर नहीं। 


            (६१) 

औ’ रोना भी व्यर्थ, मृदुल जब 

हुआ व्यथा का भार नहीं, 

आँसू पा बढ़ता जाता है, 

घटता पारावार नहीं; 

जो कुछ मिले भोग लेना है, 

फूल हों कि, हों शूल सखे! 

पश्चाताप यही कि नियति पर 

हमें स्वल्प अधिकार नहीं। 


            (०६२) 

कौन बड़ाई, चढ़े श्रृंग पर 

अपना एक बोझ ले कर! 

कौन बड़ाई, पार गये यदि 

अपनी एक तरी खे कर? 

अबुध विज्ञ की माँ यह धरती 

उस को तिलक लगाती है, 

खुद भी चढ़े, साथ ले झुक कर 

गिरतों को बाँहें दे कर। 


            (०६३) 

पत्थर ही पिघला न, कहो 

करुणा की रही कहानी क्या? 

टुकड़े दिल के हुये नहीं, 

तब बहा दृगों से पानी क्या? 

मस्ती क्या जिस को पा कर 

फिर दुनियाँ की भी याद रही? 

डरने लगी मरण से तो फिर 

चढ़ती हुई जवानी क्या? 


            (०६४) 

नूर एक वह रहे तूर पर, 

या काशी के द्वारों में; 

ज्योति एक वह खिले चिता में, 

या छिप रहे मजारों में। 

बहतीं नहीं उमड़ कूलों से, 

नदियों को कमजोर कहो; 

ऐसे हम, दिल भी कैदी है 

ईंटों की दीवारों में। 


            (०६५) 

किरणों के दिल चीर देख, 

सब में दिनमणि की लाली रे! 

चाहे जितने फूल खिलें 

पर, एक सभी का माली रे! 

साँझ हुई, छा गई अचानक 

पूरब में भी अँधियाली, 

आती उषा, फैल जाती 

पश्चिम में भी उजियाली रे! 


            (०६६) 

ठोकर मार फोड़ दे उस को 

जिस बरतन में छेद रहे, 

वह लङ्का जल जाय जहाँ 

भाई भाई में भेद रहे। 

गजनी तोड़े सोमनाथ को, 

काबे को दें फूँक शिवा, 

जले कुराँ अरबी रेतों में, 

सागर जा फिर वेद रहे। 


            (०६७) 

रह रह कूक रही मतवाली 

कोयल कुञ्ज भवन में है,

श्रवण लगा सुन रही दिशायें, 

स्थिर शशि मध्य गगन में है। 

किसी महा सुख में तन्मय 

मञ्जरी आम्र की झुकी हुई, 

अभी पूछ मत प्रिये, छिपी सी 

मृत्यु कहाँ जीवन में है। 


            (०६८) 

तू बैठी ही रही हृदय में 

चिन्ताओं का भार लिये, 

जीवन पूर्व मरण पर भेदों 

के शत जटिल विचार लिये; 

शीर्ण वसन तज इधर प्रकृति ने 

नूतन पट परिधान किया, 

आ पहुँचा, लो अतिथि द्वार पर 

नूपुर की झंकार किये। 


            (०६९) 

वृथा यत्न, पीछे क्या छूटा, 

इस रहस्य को जान सकें; 

वृथा यत्न, जिस ओर चले 

हम उसे अभी पहचान सकें। 

होगा कोई क्षण उस का भी, 

अभी मोद से काम हमें; 

जीवन में क्या स्वाद, अगर 

खुलकर हम दो पल गा न सकें? 


            (०७०) 

तुम्हें मरण का सोच निरन्तर 

तो पीयूष पिया किसने? 

तुम असीम से चकित, इसे 

सीमा में बाँध लिया किसने? 

सब आये हँस, बोल, सोच, 

कह, सुन मिट्टी में लीन हुये; 

इस अनन्य विस्मय का सुन्दरि! 

उत्तर कहो दिया किसने? 


            (०७१) 

छोड़े पोथी पत्र, मिला जब 

अनुभव में आह्लाद मुझे, 

फूलों की पत्ती पर अंकित

एक दिव्य सम्वाद मुझे; 

दहन धर्म मानव का पाया, 

अतः, दुःख भयहीन हुआ; 

अब तो दह्यमान जीवन में 

भी मिलता कुछ स्वाद मुझे। 


            (०७२) 

एक एक कर सभी शिखाओं को, 

मैं गले लगाऊँगा, 

भोगूँगा यातना कठिन 

दुर्वह सुख भार उठाऊँगा; 

रह न जाय अज्ञेय यहाँ कुछ, 

आया तो इतना कर लूँ; 

बढ़ने दो, जीवन के अति से 

अधिक निकट मैं जाऊँगा। 


            (०७३) 

मधु पूरित मञ्जरी आम्र की 

देखो, नहीं सिहरती है; 

चू न जाय रस कोष कहीं, 

इस से मन ही मन डरती है! 

पर, किशोर कोंपलें विटप की 

निज को नहीं सम्भाल सकीं, 

पा ऋतुपति का ताप द्रवित 

उर का रस अर्पित करती है। 


            (०७४) 

प्राणों में उन्माद वर्ष का, 

गीतों में मधु कण भर लें; 

जड़ चेतन बिंध रहे, हृदय पर 

हम भी केशर के शर लें। 

यह विद्रोही पर्व प्रकृति का 

फिर न लौट कर आवेगा; 

सखि! बसन्त को खींच हृदय में 

आओ आलिंगन कर लें। 


            (०७५) 

पहली सीख यही जीवन की, 

अपने को आबाद करो, 

बस न सके दिल की बस्ती, 

तो आग लगा बरबाद करो। 

खिल पायें, तो कुसुम खिलाओ, 

नहीं? करो पतझाड़ इसे, 

या तो बाँधो हृदय फूल से, 

याकि इसे आजाद करो। 


            (०७६) 

मैं न जानता था अब तक, 

यौवन का गरम लहू क्या है; 

मैं पीता क्या निर्निमेष? 

दृग में भर लाती तू क्या है? 

तेरी याद, ध्यान में तेरे 

विरह निशा कटती सुख से, 

हँसी हँसी में किन्तु, हाय, 

दृग से पड़ता यह चू क्या है? 


            (०७७) 

उमड़ चली यमुना प्राणों की, 

हेम कुम्भ भर जाओ तो; 

भूले भी आ कभी तीर पर 

नूपुर सजनी! बजाओ तो। 

तनिक ठहर तट से झुक देखो, 

मुझ में किस का बिम्ब पड़ा? 

नील वारि को अरुण करो, 

चरणों का राग बहाओ तो। 


            (०७८) 

दौड़ दौड़ तट से टकरातीं 

लहरें लघु रो रो सजनी! 

इन्हें देख लेने दो जी भर, 

मुख न अभी मोड़ो सजनी! 

आज प्रथम संध्या सावन की, 

इतनी भी तो करो दया, 

कागज की नौका में धीरे 

एक दीप छोड़ो सजनी! 


            (०७९) 

प्रकृति अचेतन दिव्य रूप का 

स्वागत उचित सजा न सकी, 

ऊषा का पट अरुण छीन 

तेरे पथ बीच बिछा न सकी। 

रज न सकी बन कनक रेणु, 

कंटक को कोमलता न मिली, 

पग पग पर तेरे आगे वसुधा 

मृदु कुसुम खिला न सकी। 


            (०८०) 

अब न देख पाता कुछ भी यह 

भक्त विकल, आतुर तेरा, 

आठों पहर झूलता रहता 

दृग में श्याम चिकुर तेरा। 

अर्थ ढूँढते जो पद में, 

मैं क्या उन को निर्देश करूँ? 

चरण चरण में एक नाद, 

बजता केवल नूपुर तेरा। 


            (०८१) 

पूजा का यह कनक दीप 

खण्डहर में आन जलाया क्यों? 

रेगिस्तान हृदय था मेरा, 

पाटल कुसुम खिलाया क्यों? 

मैं अन्तिम सुख खोज रहा था 

तप्त बालुओं में गिर कर। 

बुला रहा था सर्वनाश को 

यह पीयूष पिलाया क्यों? 


            (०८२) 

तुझे ज्ञात जिस के हित इतना 

मचा रही कल रोर, सखी! 

खड़ा पान्थ वह उस पथ पर 

जाता जो मरघट ओर, सखी! 

यह विस्मय! जञ्जीर तोड़ 

कल था जिसने वैराग्य लिया, 

आज उसी के लिये हुआ 

फूलों का पाश कठोर, सखी! 


            (०८३) 

बोल, दाह की कोयल मेरी, 

बोल दहकती डारों पर, 

अर्द्ध दग्ध तरु की फुनगी पर, 

निर्जल सरित कगारों पर। 

अमृत मन्त्र का पाठ कभी 

मायाविनि! मृषा नहीं होता, 

उगी जा रहीं नई कोंपलें 

तेरी मधुर पुकारों पर। 


            (०८४) 

दृग में सरल ज्योति पावन, 

वाणी में अमृत सरस क्या है? 

ताप विमोचन कुछ अमोघ 

गुणमय यह मधुर परस क्या है? 

धूलि रचित प्रतिमे! तुम भी तो 

मर्त्य लोक की एक कली, 

ढूँढ़ रहा फिर यहाँ विरम 

मेरा मन चकित, विवश क्या है? 


            (०८५) 

चिर जाग्रत वह शिखा, जला तू 

गई जिसे मंगल क्षण में; 

नहीं भूलती कभी, कौंध 

जो विद्युत समा गई घन में। 

बल समेट यदि कभी देवता 

के चरणों में ध्यान लगा; 

चिकुर जाल से घिरा चन्द्र मुख 

सहसा घूम गया मन में। 


            (०८६) 

अमित बार देखी है मैंने 

चरम रूप की वह रेखा, 

सच है, बार बार देखा 

विधि का वह अनुपमेय लेखा। 

जी भर देख न सका कभी, 

फिर इन्द्र जाल दिखलाओ तो, 

बहुत बार देखा, पर लगता 

स्यात्, एक दिन ही देखा। 


            (०८७) 

हेर थका तू भेद, गगन पर 

क्यों उडु राशि चमकती है? 

देख रहा मैं खड़ा, मगन 

आँखों की तृषा न छकती है। 

मैं प्रेमी, तू ज्ञान विशारद, 

मुझ में, तुझ में भेद यही, 

हृदय देखता उसे, तर्क से 

बुद्धि न जिसे समझती है। 


            (०८८) 

उसे पूछ विस्मृति का सुख क्या, 

लगा घाव गम्भीर जिसे, 

जग से दूर हटा ले बैठी 

दिल की प्यारी पीर जिसे। 

जागरुक ज्ञानी बन कर जो 

भेद नहीं तू जान सका, 

पूछ, बतायेगा, फूलों की 

बाँध चुकी जंजीर जिसे। 


            (०८९) 

हर साँझ एक वेदना नई, 

हर भोर सवाल नया देखा; 

दो घड़ी नहीं आराम कहीं, 

मैंने घर घर, जा जा देखा। 

जो दवा मिली पीड़ाओं को, 

उस में भी कोई पीर नई; 

मत पूछ कि तेरी महफिल में 

मालिक, मैंने क्या क्या देखा। 


            (०९०) 

जिनमें बाकी ईमान, अभी 

वे भटक रहे वीरानों में, 

दे रहे सत्य की जाँच 

आखिरी दम तक रेगिस्तानों में। 

ज्ञानी वह जो, हर कदम धरे 

बच कर तप की चिनगारी से, 

जिन को मस्तक का मोह नहीं, 

उन की गिनती नादानों में। 


            (०९१) 

मैंने देखा आबाद उन्हें 

जो साथ जीस्त के जलते थे, 

मंजिलें मिलीं उन वीरों को 

जो अंगारों पर चलते थे। 

सच मान, प्रेम की दुनियाँ में 

थी मौत नहीं, विश्राम नहीं, 

सूरज जो डूबे इधर कभी, 

तो जा कर उधर निकलते थे। 


            (०९२) 

तुम भीख माँगने जब आये, 

धरती की छाती डोल उठी, 

क्या ले कर आऊँ पास? निःस्व 

अभिलाषा कर कल्लोल उठी। 

कूदूँ ज्वाला के अंक बीच, 

बलिदान पूर्ण कर लूँ जब तक, 

"मत रङ्गो रक्त से मुझे", बिहँस 

तसवीर तुम्हारी बोल उठी। 


            (०९३) 

अब साँझ हुई, किरणें समेट 

दिनमान छोड़ संसार चला, 

वह ज्योति तैरती ही जाती, 

मैं डाँड़ चलाता हार चला। 

"दो डाँड़ और दो डाँड़ लगा", 

दो डाँड़ लगाता मैं आया, 

दो डाँड़ लगी क्या नहीं? हाय, 

जग की सीमा कर पार चला। 


            (०९४) 

छवि के चिन्तन में इन्द्रधनुष सी 

मन की विभा नवीन हुई, 

श्लथ हुए प्राण के बन्ध, चेतना 

रूप जलधि में लीन हुई। 

अन्तर का रङ्ग उँड़ेल प्यार से 

जब तूने मुझ को देखा, 

दृग में गीला सुख बिहँस उठा, 

शबनम मेरी रङ्गीन हुई। 


            (०९५) 

पी चुके गरल का घूँट तीव्र, 

हम स्वाद जीस्त का जान चुके, 

तुम दुःख, शोक बन बन आये, 

हम बार बार पहचान चुके। 

खेलो नूतन कुछ खेल, देव! 

दो चोट नई, कुछ दर्द नया, 

यह व्यथा विरस निःस्वाद हुई, 

हम सार भाग कर पान चुके। 


            (०९६) 

खोजते स्वप्न का रूप शून्य 

में निरवलम्ब अविराम चलो, 

बस की बस इतनी बात, पथिक! 

लेते अरूप का नाम चलो। 

जिन को न तटी से प्यार, उन्हें 

अम्बर में कब आधार मिला? 

यह कठिन साधना भूमि, बन्धु! 

मिट्टी को किये प्रणाम चलो। 


            (०९७) 

बाँसुरी विफल, यदि कूक कूक 

मरघट में जीवन, ला न सकी, 

सूखे तरु को, पनपा न सकी, 

मुर्दों को, छेड़ जगा न सकी। 

यौवन की वह मस्ती कैसी 

जिस को अपना ही मोह सदा? 

जो मौत देख ललचा न सकी, 

दुनियाँ में आग लगा न सकी। 


            (०९८) 

पी ले विष का भी घूँट बहक, 

तब मजा सुरा पीने का है, 

तन कर बिजली का वार सहे, 

यह गर्व नये सीने का है। 

सिर की कीमत का भान हुआ, 

तब त्याग कहाँ? बलिदान कहाँ? 

गरदन इज्जत पर दिये फिरो, 

तब मजा यहाँ जीने का है। 


            (०९९) 

धरती से व्याकुल आह उठी, 

मैं दाह भूमि का सह न सका, 

दिल पिघल पिघल उमड़ा लेकिन, 

आँसू बन बन कर बह न सका। 

है सोच मुझे दिन रात यही, 

क्या प्रभु को मुख दिखलाऊँगा? 

जो कुछ कहने मैं आया था, 

वह भेद किसी से कह न सका। 


            (१००) 

रंगीन दलों पर जो कुछ था, 

तस्वीर एक वह फानी थी, 

लाली में छिप कर झाँक रही 

असली दुनियाँ नूरानी थी। 

मत पूछ फूल की पत्ती में 

क्या था कि देख खामोश हुआ? 

तूने समझा था मौन जिसे, 

मेरे विस्मय की बानी थी। 


            (१०१) 

चाँदनी बनाई, धूप रची, 

भूतल पर व्योम विशाल रचा, 

कहते हैं, ऊपर स्वर्ग कहीं, 

नीचे कोई पाताल रचा। 

दिल जले देहियों को केवल 

लीला कह कर सन्तोष नहीं; 

ओ रचने वाले! बता, हाय! 

आखिर क्यों यह जञ्जाल रचा? 


            (१०२) 

था अनस्तित्त्व सकता समेट 

निज में क्या यह विस्तार नहीं? 

भाया न किसे चिर शून्य, बना 

जिस दिन था यह संसार नहीं? 

तू राग मोह से दूर रहा, 

फिर किस ने यह उत्पात किया? 

हम थे जिस में, उस ज्योति या कि 

तम से था किस को प्यार नहीं? 


            (१०३) 

सम्पुटित कोष को चीर, बीज 

कण को किस ने निर्वास दिया? 

किस को न रुचा निर्वाण? मिटा 

किस ने तुरीय का वास दिया? 

चिर तृषावन्त कर दूर किया 

जीवन का देकर शाप हमें, 

जिस का न अन्त वह पन्थ, लक्ष्य 

सीमा विहीन आकाश दिया। 


            (१०४) 

क्या सृजन तत्त्व की बात करें, 

मिलता जिस का उद्देश नहीं? 

क्या चलें? मिला जो पन्थ हमें 

खुलता उस का निर्देश नहीं। 

किससे अपनी फरियाद करें? 

मर मर, जी जी चलने वाले? 

गन्तव्य अलभ, जिस से हो कर 

जाते वह भी निज देश नहीं। 


            (१०५) 

कितने आये जो शून्य बीच 

खोजते विफल आधार चले, 

जब समझ नहीं पाया जग को, 

कह असत् और निस्सार चले। 

माया को छाया जान भूला, 

पर, वे कैसे निश्चिंत चलें? 

अगले जीवन की ओर लिये 

सिर पर जो पिछला भार चले।


            (१०६) 

जो सृजन असत्, तो पुण्य पाप 

का श्वेत नील बन्धन क्यों है? 

स्वप्नों के मिथ्या तन्तु बीच 

आबद्ध सत्य जीवन क्यों है? 

हम स्वयम् नित्य, निर्लिप्त अरे, 

तो क्यों शुभ का उपदेश हमें? 

किस चिन्त्य रूप का अन्वेषण? 

यह आराधन पूजन क्यों है? 


            (१०७) 

यह भार जन्म का बड़ा कठिन, 

कब उतरेगा, कुछ ज्ञात नहीं, 

धर इसे कहीं विश्राम करें, 

अपने बस की यह बात नहीं। 

सिर चढ़ा भूत यह हाँक रहा, 

हम ठहर नहीं पाये अब तक, 

जिस मञ्जिल पर की शाम, वहाँ 

करने को रुके प्रभात नहीं। 


            (१०८)

हर घड़ी प्यास, हर रोज जलन, 

मिट्टी में थी यह आग कहाँ? 

हमसे पहले था दु:खी कौन? 

था अमिट व्यथा का राग कहाँ? 

लो जन्म; खोजते मरो विफल; 

फिर जन्म; हाय, क्या लाचारी! 

हम दौड़ रहे जिस ओर सतत, 

वह अव्यय अमिय तड़ाग कहाँ? 


            (१०९) 

गत हुए अमित कल्पान्त, सृष्टि 

पर, हुई सभी आबाद नहीं, 

दिन से न दाह का लोप हुआ, 

निशि ने छोड़ा अवसाद नहीं। 

बरसी न आज तक वृष्टि जिसे 

पी कर मानव की प्यास बुझे 

हम भली भाँति यह जान चुके 

तेरी दुनियाँ में स्वाद नहीं। 


            (११०) 

हम ज्यों ज्यों आगे बढ़े, दृष्टि पथ 

से छिपता आलोक गया, 

सीखा ज्यों ज्यों नव ज्ञान, हमें 

मिलता त्यों त्यों नव शोक गया। 

हाँ, जिसे प्रेम हम कहते हैं, 

उस का भी मोल पड़ा देना, 

जब मिली संगिनी, अदन गया, 

कर से विरागमय लोक गया। 


            (१११) 

भू पर उतरे जिस रोज, धरी 

पहिले से ही जञ्जीर मिली, 

परिचय न द्वन्द्व से था, लेकिन, 

धरती पर सञ्चित पीर मिली। 

जब हार दुखों से भाग चले, 

तब तक सत्पथ का लोप हुआ, 

जिस पर भूले सौ लोग गये, 

सम्मुख वह भ्रान्त लकीर मिली। 


            (११२) 

नव नव दु:ख की ज्वाला कराल, 

जलता अबोध संसार रहे, 

हर घड़ी सृष्टि के बीच गूँजता 

भीषण हाहाकार रहे। 

कर नमन तुझे किस आशा में 

हम दुःख शोक चुपचाप सहें? 

मालिक कहने को तुझे हाय, 

क्यों दु:खी जीव लाचार रहे? 


            (११३) 

भेजा किसने? क्यों? कहाँ? 

भेद अब तक न, क्षुद्र यह जान सका। 

युग युग का मैं यह पथिक श्रान्त 

अपने को अब तक पा न सका। 

यह अगम सिन्धु की राह, और 

दिन ढला, हाय! फिर शाम हुई; 

किस कूल लगाऊँ नाव? घाट 

अपना न अभी पहचान सका। 


            (११४) 

हम फूल फूल में झाँक थके, 

तुम उड़ते फिरे बयारों में, 

हमने पलकें कीं बन्द, छिटक 

तुम हँसने लगे सितारों में। 

रो कर खोली जब आँख, तुम्हीं 

सा आँसू में कुछ दीख पड़ा, 

उँगली छूने को बढ़ी, तभी 

तुम छिपे ढुलक नीहारों में। 


            (११५) 

तिल तिल कर हम जल चुके, 

विरह की तीव्र आँच कुछ मन्द करो, 

सहने की अब सामर्थ्य नहीं, 

लीला प्रसार यह बन्द करो। 

चित्रित भ्रम जाल समेट धरो, 

हम खेल खेलते हार चुके, 

निर्वापित करो प्रदीप, शून्य में 

एक तुम्हीं आनन्द करो। 


                 ❤️ 

 

🌹🌻🌼🌹🌼🌻🌹

रविवार, 18 अक्तूबर 2020

किताब

 किताब गली / घूमो मगर प्यार से 


कई बार गंभीर व्यंग्य की तीक्ष्णता से आम पाठक उचटने लगते हैं, जबकि बाज दफा हास्य की अधिक मात्रा विषय को ही हल्का कर देती है। इस चुनौती के बीच, अर्चना चतुर्वेदी के व्यंग्य ‘मध्यमार्गी’ हैं और धीमी रफ्तार से जोर का झटका लगा देते हैं...


 


घूरो मगर प्यार से


व्यंग्यकार : अर्चना चतुर्वेदी


प्रकाशक : भावना प्रकाशन, दिल्ली


मूल्य : 195 रुपए


 


व्यंग्य में साफ नज़र आते किरदार


भवानी प्रसाद मिश्र ‘कलम अपनी साध’ का आह्वान करते हुए लिखते हैं – ‘जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख / और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख’। इस तरह वे लेखन में सहज और ईमानदार होने की सीख देते हैं। व्यंग्यकार अर्चना चतुर्वेदी के जीवन और सृजन पर ये बात अलहदा तरीके से लागू होती है। वे स्वयं स्पष्ट और बिंदास हैं और उनका लेखन भी इसका प्रतिबिंब है।


अर्चना ने नए व्यंग्य संग्रह ‘घूरो मगर प्यार से’ में धारदार शैली बरकररार रखी है और सामाजिक विसंगतियों पर मीठी चुटकी भी ली है। गौरतलब है कि व्यंग्य में जब हास्य समाहित होता है, तब उसकी तीक्ष्णता कम हो जाती है। बावजूद इसके समकालीन व्यंग्य लेखन अधिकतर जगह हंसगुल्ले बन गया है। इस स्थिति से निराशा होती है, लेकिन अर्चना की सफलता कहेंगे कि वे मध्यमार्ग का निर्माण कर पाई हैं। उनका व्यंग्य एकबारगी तो घायल नहीं करता, लेकिन ऐसे निशान ज़रूर बना देता है, जिससे देर में, देर तक दर्द होता रहता है।


अर्चना हास्य की चाशनी में मिर्च के पकौड़े डुबाकर रखने के कौशल से लैस हैं। ये कला उन्हें अलग स्तर तक पहुंचाती है। 49  व्यंग्य आलेखों के संग्रह में एक रचना ‘कविवर, कैब और कन्या’ याद आती है। इसमें कैब यात्रा के दौरान लोलुप कविवर ‘हनी ट्रैप’ का शिकार हो जाते हैं। ये देखना मनोरंजक है और साहित्य जगत में आई गिरावट भी बयां करता है।


पिछले एक दशक से व्यंग्य की दुनिया में सक्रिय अर्चना चतुर्वेदी ने लेखक समाज की कुरीतियों और कृत्रिमता पर बेधड़क कलम चलाई है। ‘जंग बहादुर की पहली किताब’, ‘लेखक की आत्मा’, ‘साहित्यिक दिगम्बर’, ‘हिंदी की व्यथा’ जैसी रचनाएं इसका नायाब उदाहरण हैं। दृश्य-श्रव्य माध्यमों से जुड़ाव के चलते उनके व्यंग्य में भरपूर चित्रात्मकता है, जो अर्चना के लेखक को लाभ पहुंचाती है। दरअसल, राजनीति पर व्यंग्य लिखना कदरन सरल है, क्योंकि वहां वर्णित पात्रों की देह भाषा और चरित्र की बुनावट पाठक के जेहन में पहले से छपी होती है, लेकिन सामाजिक मुद्दों पर लिखा व्यंग्य पढ़ते समय ‘इमेजिनेशन’ का सहारा लेना पड़ता है। अर्चना की बिंबात्मकता यहीं पर कारगर सिद्ध होती है। वे हमारे आसपास के लोगों, रिश्तों, चाल-बनावट और व्यवहार को व्यंग्य का विषय बनाती हैं, फिर भी उनके किरदार साफ नज़र आते हैं।


-    चण्डीदत्त शुक्ल

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

दुर्लभ ग्रंथ

 अति दुर्लभ एक ग्रंथ ऐसा भी है हमारे सनातन धर्म मे


इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए ---


यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ


क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो राम कथा के रूप में पढ़ी जाती है और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े

तो कृष्ण कथा के रूप में होती है ।


जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है।


इस ग्रन्थ को

‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे

पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और

विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा (उल्टे यानी विलोम)के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक।


पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।"


उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः


वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।

रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥


अर्थातः

मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो

जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।


अब इस श्लोक का विलोमम्: इस प्रकार है


सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥


अर्थातः

मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के

चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ

विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।


" राघवयादवीयम" के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-


राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।

रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥


विलोमम्:

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥


साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।

पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥


विलोमम्:

वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।

राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥


कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।

सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥


विलोमम्:

भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।

कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥


रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।

नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥


विलोमम्:

यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।

तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥


यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।

तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥


विलोमम्:

तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।

सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥


मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।

काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥


विलोमम्:

तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।

तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥


रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।

कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥


विलोमम्:

मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।

तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥


सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।

साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥


विलोमम्:

हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।

यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥


सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।

सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥


विलोमम्:

सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।

यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥


तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।

यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥


विलोमम्:

हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।

सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥


वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।

भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥


विलोमम्:

सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।

होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥


यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।

सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥


विलोमम्:

भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।

वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥


रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।

यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥


विलोमम्:

नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।

हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥


यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।

सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥


विलोमम्:

यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।

गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥


दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।

ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥


विलोमम्:

नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।

हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥


सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।

तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥


विलोमम्:

हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।

जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥


सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।

न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७ विलोमम्:

तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।

सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥


तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।

वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥


विलोमम्:

केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।

ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥


गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।

सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥


विलोमम्:

हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।

यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥


हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।

राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥


विलोमम्:

घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।

धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥


ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।


हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ २१॥


विलोमम्:

विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।

ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥


भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।

चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥


विलोमम्:

ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।

हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥


हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।

तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥


विलोमम्:

योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।

जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥


भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।

तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥


विलोमम्:

विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।

तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥


हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।

राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥


विलोमम्:

यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।

निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥


सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।

तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥


विलोमम्:

जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।

हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥


वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।

तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥


विलोमम्

नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।

सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥


हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।

चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥


विलोमम्

हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।

सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥


नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।

रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥


विलोमम्:

नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।

कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥


साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥

निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥


विलोमम्:

भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।स

गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥


॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री ।।


कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें कि यह दुनिया में कहीं भी ऐसा न पाया जाने वाला ग्रंथ है ।

जय श्री कृष्णा....

साभार...

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2020

रिया रिया रिया का चक्कर

 Riyहर तरफ रिया ही रिया.../ राज किशोर सत्संगी 


का

एक मेधावी छात्र, छोड़ इंजीनियरिंग, पहुंच गया मुंबई 'नगरिया'


फिल्में क्या हिट हुईं, जौहर-खान की आंख में 'किरकिरिया'


रिया आई जिंदगी में, देख सुशांत की भरी हुई 'तिजोरिया'


करके काला जादू, बन बैठी बिन-व्याहे उसकी 'गुजरिया'


बुला लाई भूत-प्रेत, वह तो बेचारा चैन से कर रहा था 'बसरिया'


यूरोप का ट्रिप, घिरा मानसिक-अवसाद का बादल 'घनेरिया' 


नशा ना टूटे, उसी के पैसे से लाती ड्रग्स की भर-भर 'गगरिया'


जब तक सब ठीक, तब तक था वह भला-मानुष साजन 'सांवरिया'


आई दिशा, खुला भेद, लड़ी-भागी, बदल ली अपनी 'नजरिया'


मोबाइल पर किया ब्लॉक, ना ली कोई खोज ना 'खबरिया' 


तेरह की रात, कैमरे बंद, फांद कर आया कोई 'चाहरदीवरिया'


टपकवाकर निर्दयता से, खुश हुई, इस्टा पर मटकाई अपनी 'कमरिया' 


मौत में रहस्य गहरा, होना ही था, हुआ जग 'जाहिरिया' 


दोष मढ़े सुशांत पर, आज-तक पे, बैठ बीच 'बजरिया'


बोल रही है, वह था पहले से डरपोक-नशेड़ी और 'बीमरिया'


अपने को सुपर स्मार्ट, सभी को समझ रही ढोल 'गंवरिया'


इतराती फिर रही ओढ़कर, अंडरवर्ल्ड की 'छतरिया' 


किया कीमती वकील, महेश भट्ट की कर रही 'शुकरिया'


सीबीआई कितना भी पूछे, बन जाती है 'झिंगुरिया'


ED-CBI-NCB देख एक साथ, पूरे परिवार को हुआ 'डायरिया'


फिल्म व ड्रग्स की संग-संग, दिखती एक ही 'डगरिया' 


जनता टकटकी लगाए टीवी पर, छूटी पड़ी है जो उनकी 'नौकरिया'


गर होती यूपी पुलिस, निकाल देती नौटंकी, ना कर पाती वह कोई 'तिरिया'


नचा रही है ऊंगली पर सबको, मदारी नचावे जैसे बंदर 'बंदरिया' 


सहमी-सकपकाई भी हुई है, छाई देखकर गिरफ्तारी की काली 'बदरिया'


मीडिया से बच रही, पहन के हुड, तो कभी ओढ़कर 'चुनरिया'


बन के एक विष-कन्या, उजाड़ दी एक चमकते सितारे की, अच्छी-खासी हरी-भरी 'फुलवरिया'

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(राज किशोर सतसंगी)

शनिवार, 10 अक्तूबर 2020

परंपरा, संस्कृति और ज्ञान पर आधारित है नयी शिक्षा नीति : संजय द्विवेदी

*'ग्लोबल सिटीजन' तैयार करेगी नई शिक्षा नीति : प्रो. द्विवेदी*


*कोलकाता, 10 अक्टूबर ।* ''नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों को अपनी परंपरा, संस्कृति और ज्ञान के आधार पर 'ग्लोबल सिटीजन' बनाते हुये उन्हें भारतीयता की जड़ों से जोड़े रखने पर आधारित है।'' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक *प्रो. संजय द्विवेदी* ने रविवार को भारतीय संस्कृति संसद, कोलकाता द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त किए। 


दो सत्रों में आयोजित इस संगोष्ठी के पहले सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार *राहुल देव* ने की। कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल *श्री केसरी नाथ त्रिपाठी* भी विशिष्ट तौर पर उपस्थित थे। 


*'राष्ट्रीय शिक्षा नीति और आज का समय'* विषय पर मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए *प्रो. द्विवेदी* ने कहा कि नई शिक्षा नीति सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ व्यवहारपरक ज्ञान पर बल देती है, जिससे बच्चों के कंधे से बैग के बोझ को हल्का करते हुये उनको भावी जीवन के लिये तैयार किया जा सके। इसके अलावा वैदिक गणित, दर्शन और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विषयों को महत्त्व देने की कवायद भी नई शिक्षा नीति में की गई है।


प्रो. द्विवेदी ने कहा कि इस शिक्षा नीति का सबसे बड़ा पहलू ये है कि इस नीति से शिक्षा की गुणवत्ता और उपयोगिता, दोनों को ही बल मिलेगा। स्कूली स्तर पर ही छात्रों को किसी न किसी कार्य कौशल से जोड़ दिया जाएगा। इसका अर्थ है, जब बच्चा स्कूल से पढ़कर निकलेगा, तो उसके पास एक ऐसा हुनर होगा, जिसका वह आगे की जिंदगी में इस्तेमाल कर सकता है। उन्होंने कहा ​कि यह सिर्फ एक नीतिगत दस्तावेज नहीं है, बल्कि 130 करोड़ से अधिक भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है।


उन्होंने कहा कि 21वीं सदी ज्ञान की सदी है। यह सीखने और अनुसंधान की सदी है। और इस संदर्भ में भारत की नई शिक्षा नीति अपनी शिक्षा प्रणाली को छात्रों के लिए सबसे आधुनिक और बेहतर बनाने का काम कर रही है। इस शिक्षा नीति के माध्यम से हम सीखने की उस प्रक्रिया की तरफ बढ़ेंगे, जो जीवन में मददगार हो और सिर्फ रटने की जगह तर्कपूर्ण तरीके से सोचना सिखाए।   


संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार *राहुल देव* ने कहा कि नई शिक्षा नीति में शिक्षा के अभूतपूर्व ढांचे को प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा कि हर बच्चा विशिष्ट है और उसकी क्षमताओं के आधार पर उसके विकास की बात नई शिक्षा नीति करती है। पांचवी कक्षा तक, शिक्षा प्रदान करने के माध्यम के रूप में मातृभाषा को बढ़ावा देने की पहल, सरकार का एक महत्वपूर्ण और प्रशंसनीय निर्णय है।  


इस संगोष्ठी के दूसरे सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति *डॉ. गिरीश्वर मिश्र* ने की। इस सत्र में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति *प्रो. बलदेव भाई शर्मा* और नेशनल लाइब्रेरी के पूर्व महानिदेशक *डॉ. अरुण चक्रवर्ती* ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इस आयोजन में भारतीय संस्कृति संसद के अध्यक्ष *डॉ. बिट्ठलदास मूंधड़ा* एवं सचिव *विजय झुनझुनवाला* एवं *राजेश दूगड़* भी मौजदू थे। संगोष्ठी का संचालन *डॉ. तारा दूगड़* ने किया।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

4 मिले 64 खिले

 *ये चमत्कार हिंदी में ही हो सकता है …!!*


*चार मिले चौसठ खिले, बीस रहे कर जोड़!*

*प्रेमी-प्रेमी दो मिले, खिल गए सात करोड़!!*


मुझसे एक बुजुर्गवार ने इस कहावत का अर्थ पूछा। काफी सोच-विचार के बाद भी जब मैं बता नहीं पाया, तब मैंने कहा – बाबा आप ही बताइए, मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा।


तब एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ बाबा समझाने लगे – 


देखो भाग्यवान, यह बड़े रहस्य की बात है – *चार मिले –* मतलब जब भी कोई मिलता है, तो सबसे पहले आपस में दोनों की आंखें मिलती हैं। इसलिए कहा, चार मिले।


फिर कहा, *चौसठ खिले –* यानि बत्तीस-बत्तीस दांत – दोनों के मिलाकर चौसठ हो गए – इस तरह “चार मिले, चौसठ खिले” – हुआ!


*“बीस रहे कर जोड़”* – दोनों हाथों की दस उंगलियां – दोनों व्यक्तियों की 20 हुईं – बीसों मिलकर ही एक-दूसरे को प्रणाम की मुद्रा में हाथ बरबस उठ ही जाते हैं!


वैसे तो शरीर में रोम की गिनती करना असम्भव है, लेकिन मोटा-मोटा अर्थात् अनुमानतः साढ़े तीन करोड़ कहते हैं कहने वाले। तो कवि ने अंतिम रहस्य भी प्रकट कर दिया *– “प्रेमी प्रेमी दो मिले – खिल गए सात करोड़!”*


ऐसा अंतर्हृदय में बसा हुआ प्रिय व्यक्ति जब कोई मिलता है, तो रोम-रोम खिलना स्वाभाविक ही है भाई।


जैसे ही कोई ऐसा मिलता है, तो कवि ने अंतिम पंक्ति में पूरा रस निचोड़ दिया – *“खिल गए सात करोड़”* यानि हमारा रोम-रोम खिल जाता है!


भई वाह, आनंद आ गया। हमारी हिंदी कहावतों में कितना सार छुपा है। एक-एक शब्द चाशनी में डूबा हुआ। 👌😊