बुधवार, 25 नवंबर 2020

अहमद पटेल को याद करते हुए / संजीव आचार्य

अहमद पटेल नहीं रहे।

1991 से उनसे बहुत प्रगाढ़ सम्बंध थे। लिखते हुए, टीवी चैनलों पर डिबेट में कई बार मैंने उनकी तीखी आलोचना की लेकिन अन्य नेताओं के विपरीत, उन्होंने कभी मन में गांठ नहीं पाली। हाँ, फोन पर यह जरूर कहते थे- " तुम को गलतफहमी है कि कांग्रेस मैं ही चला रहा हूँ। अरे यार मैं सिर्फ मेसेज पास ऑन करता हूँ। तुम तो पार्टी की वर्किंग समझते हो। मैडम के डिसीजन होते हैं, मैं सिर्फ उनको रिलेटेड जनरल सेक्रेटरी को पास ऑन कर देता हूँ, उनकी बात मैडम तक पहुंचाता हूँ। चल आ जा सैटरडे को नौ बजे के बाद।" यह उनके रटे रटाये वाक्य थे। 

जब 23,  विलिंग्डन क्रिसेंट पहुंचो तो दो घण्टे से कम इंतजार नहीं करना पड़ता था। खैर, गलती उनकी नहीं होती थी, मुलाकाती ही इतने होते थे। अपनी किस्मत कि अगर बीच में कमरे से बाहर किसी को छोड़ने आ गए, मुझ पर नजर पड़ गयी, तो कहते-" अरे कब आये, आ जाओ। " फिर मिलते तो कोई शिकायत नहीं। बल्कि इस बारे में चर्चा भी नहीं करते थे कि मैंने क्या लिखा। हंसी मजाक, इधर उधर की बात। कुछ पूछो तो घुमा फिराकर इशारों में बता देते थे, आप को समझना आता हो तो ठीक। वरना वो जिस पोजिशन में थे, उनसे पार्टी की अंदरूनी खबर निकाल लोगे, यह कल्पना भी मूर्खता थी। संकेतों को पकड़ लो। फिर उनके करीबी पदाधिकारियों से डिटेल ले लो। खबर मिल जाती थी। 

काँग्रेस में सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने से हटने और फिर बनने तक अहमद भाई ही आंख, नाक, कान रहे। यह भी सत्य है कि उन्होंने जिसे चाहा वही पार्टी में कोई पद पा सका, जिसे बर्फ में लगाया, उसको गांधी परिवार चाहकर भी मदद नहीं कर सका। अभी विस्तार से लिखने का मौका नहीं है। 

अहमद पटेल बेहद मृदुभाषी, मिलनसार और सचमुच में चाणक्य थे। यह सत्य है कि राहुल गांधी से उनकी पटरी नहीं बैठी। राहुल के अध्यक्ष पद सम्हालने के बाद अहमद भाई किनारे लग गए थे। राहुल के बजाय प्रियंका उनकी राय को हमेशा से ही ज्यादा महत्व देती रही थी। मैंने जितेंद्र प्रसाद को भी नरसिंहराव के राजनीतिक सचिव के तौर पर सर्वशक्तिमान देखा और जब सोनिया ने उन्हें हाशिये पर डाला तो वह टूट गए थे। यही कुछ अहमद भाई के साथ भी हुआ। राजनीति का यह पहलू बड़ा दर्दनाक होता है। जब बरसों तक आपके बंगले के बाहर दर्जनों गाड़ियां, सैकड़ों लोग एक मिनट मुलाकात के लिए तरसते हैं। फिर आपके शक्तिहीन होते ही खास चमचे भी मुँह फेर लेते हैं। बहुत विरले लोग ही होते हैं जो इस हाल को झेल पाते हैं। अर्जुन सिंह, शीला दीक्षित भी कुछ हद तक इसी उपेक्षा से टूटे। मानसिक तनाव का स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद से अहमद पटेल गाहे बगाहे राजनीतिक बदले के खेल में निशाने पर थे। स्वाभाविक ही था। सोनिया गांधी के या मनमोहन सिंह सरकार के दस साल के कार्यकाल के सभी राज केवल वही जानते थे। कोयला घोटाले, हेलीकॉप्टर सौदे और अन्य कई मामलों में उन्हें लपेटने के लिए जांच एजेंसियों ने शिकंजा कसा हुआ था। इस वजह से भी वह जबरदस्त तनाव में थे। जाहिर है, इससे भी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ा। कोरोना ने कसर पूरी कर दी। दुनिया छोड़ गए। और छोड़ गए संकट में फंसी पुत्रमोह में परेशान सोनिया गांधी को, अकेली। 

अलविदा अहमद भाई। एक शानदार पारी खेली। अल्लाह आपको पनाह में ले। 

इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैही राजिऊन💐🙏🏼

दुर्गादास राठौड़ की 303 पुण्यतिथि पर नमन

 #पढ़े_वीर_योद्धा_की_गाथा


सनातन धर्म और मारवाड़ के रक्षक शत्रुओं के काल और क्षत्रिय राजपूत कुल की राठौड़ कुल के वीर शिरोमणि दुर्गादास जी राठौड़ की 303 वीं पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन जय जय राजपूताना।


आज भी मारवाड़ के गाँवों में बड़े-बूढ़े लोग बहू-बेटी को आशीर्वाद स्वरूप यही दो शब्द कहते हैं कि माई ऐहा पूत जण जेहा दुर्गादास बांध मरुधरा राखियो बिन खंभा आकाश अर्थात् हे माता! तू वीर दुर्गादास जैसा पुत्र जन्म दे जिसने मरुधरा (मारवाड़) को बिना किसी आधार के संगठन सूत्र में बांध कर रखा था।

नमन 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏✌️✌️

उस समय के विशाल मारवाड़ का कोई स्वामी सामंत या सेनापति नहीं था सब औरंगजेब के कुटिल विश्वासघात की भेंट चढ़ चुका था जनता भी कठोर दमन चक्र में फंसी थी।


सर्वत्र आतंक लूट-खसोट हिंसा और भय की विकराल काली घटा छाई थी उस समय मारवाड़ ही नहीं पूरा भारत त्राहि-त्राहि कर रहा था ऐसी संकटमय स्थिति में वीर दुर्गादास राठौड़ के पौरुष और पराक्रम की आंधी चली।


मारवाड़ आजाद हुआ और खुले आकाश में सुख की सांस लेने लगा दुर्गादास एक ऐसे देशभक्त का नाम है जिनका जन्म से मृत्यु पर्यंत संघर्ष का जीवन रहा दुर्गादास का जन्म 13 अगस्त 1638 को जोधपुर रियासत के गाँव सालवां कलां में हुआ जन्म से ही पिता का तिरस्कार मिला माँ -बेटे को घर से निकाला गया और जिस अजीत सिंह को पाल पोसकर दुर्गादास ने मारवाड़ का राजा बनाया उस अजीत सिंह ने भी इस वीर का सम्मान नहीं किया वरन् मारवाड़ से निष्कासित कर दिया।


पर धन्य है दुर्गादास की स्वराज्य भक्ति मारवाड़ की मंगल कामना करते हुए दुर्गादास ने अवंतिकापुरी को प्रस्थान किया और वहीं क्षिप्रा नदी के तट पर अंत तक सन्यासीवत् जीवन व्यतीत किया क्षिप्रा नदी के तट पर बनी दुर्गादास की छत्री (समाधि) गर्व के साथ आज भी उस महान पुरुष की वीरता और साहस की कहानी कह रही है वह ऐसे कठोर तप की श्रेष्ठ कहानी है जो शिशु दुर्गादास व उसकी माँ को घर से निकालने से शुरू होती है।


दुर्गादास को वीर दुर्गादास बनाने का श्रेय उसकी माँ मंगलावती को ही जाता है जिसने जन्मघुट्टी देते समय ही दुर्गादास को यह सीख दी थी कि बेटा मेरे धवल (उज्ज्वल सफेद) दूध पर कभी कायरता का काला दाग मत लगाना।


#मारवाड़_का_रक्षक


जन्म से ही माँ के हाथ से निडरता की घुट्टी पीने वाला दुर्गादास अपनी इस जन्मजात निडरता के कारण ही महाराजा जसवंत सिंह का प्रमुख अंगरक्षक बन गया था और यही अंगरक्षक आगे चलकर उस समय संपूर्ण मारवाड़ का रक्षक बन गया था जब जोधपुर के महाराज जसवंत सिंह के इकलौते पुत्र पृथ्वीसिंह को औरंगजेब ने षड्यंत्र रचकर जहरीली पोशाक पहनाकर मार डाला।


इस आघात को जसवंत सिंह नहीं सह सके और स्वयं भी मृत्यु को प्राप्त हो गए थे इस अवसर का लाभ उठाते हुए औरंगजेब ने जोधपुर पर कब्जा कर लिया और सारे शहर में लूटपाट आगजनी और कत्लेआम होने लगा और देखते ही देखते शहर को उजाड़ बना दिया गया।


लोग भय और आतंक के मारे शहर छोड़ अन्यत्र चले गए थे सारे हिंदुओं पर जजिया लगा दिया गया था राजधानी जोधपुर सहित सारा मारवाड़ तब अनाथ हो गया था।


#संकट_का_सामना


ऐसे संकटकाल में दुर्गादास ने स्वर्गीय महाराज जसवंत सिंह की विधवा महारानी महामाया तथा उसके नवजात शिशु (जोधपुर के भावी राजा अजीत सिंह) को औरंगजेब की कुटिल चालों से बचाया दिल्ली में शाही सेना के पंद्रह हजार सैनिकों को गाजर-मूली की तरह काटते हुए मेवाड़ के राणा राजसिंह के पास परिवार सुरक्षित पहुंचाने में वीर दुर्गादास राठौड़ सफल हो गए।


तो औरंगजेब तिलमिला उठा और उनको पकड़ने के लिए उसने मारवाड़ के चप्पे-चप्पे को छान मारा यही नहीं उसने दुर्गादास व अजीत सिंह को जिंदा या मुर्दा लाने वालों को भारी इनाम देने की घोषणा की थी।


इधर दुर्गादास भी मारवाड़ को आजाद कराने और अजीत सिंह को राजा बनाने की प्रतिज्ञा को कार्यान्वित करने में जुट गए थे।


दुर्गादास जहाँ राजपूतों को संगठित कर रहे थे वहीं औरंगजेब की सेना उनको पकड़ने के लिए सदैव पीछा करती रहती थी कभी-कभी तो आमने-सामने मुठभेड़ भी हो जाती थी।


ऐसे समय में दुर्गादास की दुधारी तलवार और बरछी कराल-काल की भांति रणांगण में मुंडों का ढेर लगा देती थी।


#पूरे_परिवार_का_बलिदान


दुर्गादास के सामने समस्याएँ ही समस्याएँ थीं सबसे बड़ी समस्या तो जहाँ भावी राजा के लालन-पालन व पढ़ाई-लिखाई की थी वहाँ उससे भी बड़ी समस्या उनको औरंगजेब की नजरों से बचाने व उनकी सुरक्षा की थी।


इतिहास साक्षी है कि दुर्गादास ने विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी वे संपूर्ण व्यवस्थाएँ पूर्ण की थीं कि भले ही इस कार्य के संपादन में दुर्गादास को अपने माँ -भाई-बहनों यहाँ तक कि पत्नी तक का भी बलिदान देना पड़ा।


अरावली पर्वत श्रृंखला की वे कंदराएँ उन वीर और वीरांगनाओं के शौर्यपूर्ण बलिदान की साक्षियाँ दे रही हैं जहाँ अजीत सिंह की सुरक्षा के बदले दुश्मनों से संघर्ष करते हुए उन्होंने अपने आपको बलिदान कर दिया था।


#कठोर_ध्येय_साधना


छप्पन के पहाड़ों का प्रत्येक पत्थर और घाटियाँ दुर्गादास के छापामार युद्ध की गौरवगाथा कह रहे हैं जिन पत्थरों और घाटियों ने कर्मवीर दुर्गादास को देखा था वे मानो आज भी बता रहे हैं कि दुर्गादास ने आंखों को नींद और घोड़े को विराम नहीं दिया।


वे राजपूतों को संगठित करने में 24 में से अठारह घंटे घोड़े की पीठ पर ही गुजार देते थे वह भी एक-दो दिन या एक-दो माह नहीं पूरे 20 वर्षों तक उनके जीवन का ऐसा कठोर क्रम बना रहा।


उनका खाना-पीना यहाँ तक कि रोटी बनाना भी कभी-कभी तो घोड़े की पीठ पर बैठे-बैठे ही होता था इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज भी जोधपुर के दरबार में लगा वह विशाल चित्र देता है जिसमें दुर्गादास राठौड़ को घोड़े की पीठ पर बैठे एक श्मशान भूमि की जलती चिता पर भाले की नोक से आटे की रोटियाँ सेंकते हुए दिखाया गया है।


डा.नारायण सिंह भाटी ने 1972 में मुक्त छंद में राजस्थानी भाषा के प्रथम काव्य दुर्गादास नामक पुस्तक में इस घटना का चित्रण इस प्रकार किया है-


तखत औरंग झल आप सिकै,


सूर आसौत सिर सूर सिकै,


चंचला पीठ सिकै पाखरां-पाखरां,


सैला असवारां अन्न सिकै।।


अर्थात् औरंगजेब प्रतिशोध की अग्नि में अंदर जल रहा है आशकरण शूरवीर पुत्र दुर्गादास का सिर सूर्य से सिक रहा है यानी तप रहा है।


घोड़े की पीठ पर निरंतर जीन कसी रहने से घोड़े की पीठ तप रही है थोड़े से समय के लिए भी जीन उतारकर विश्राम देना संभव नहीं है। 


न खाना पकाने की फुरसत न खाना खाने की घोड़े पर चढ़े हुए ही भाले की नोक से सवार अपनी क्षुधा की शांति के लिए खाद्य सामग्री सेंक रहे हैं।


#प्रतिज्ञा_पूरी_हुई


ऐसी कठोर ध्येय साधना करने वाले दुर्गादास ने अपना संपूर्ण यौवन लक्ष्य प्राप्ति के लिए समर्पित कर दिया था अंतत: स्वतंत्रता देवी इस कर्मयोगी पर प्रसन्न हुई जोधपुर के किले पर फिर केसरिया लहरा उठा था और दुर्गादास ने अपनी चिर प्रतीक्षित प्रतिज्ञा को स्व.महाराजा जसवंत सिंह के एकमात्र पुत्र अजीत सिंह का अपने हाथों से राजतिलक कर पूरा किया था।


दक्षिण में शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी से मिलकर और पंजाब के गुरुओं का आशीर्वाद लेकर संगठित रूप में परकीय सत्ता को उखाड़ फेंकने की योजना थी दुर्गादास की परंतु औरंगजेब की पौत्री सिफतुन्निसा के प्रेम में पड़कर राजा अजीत सिंह ने अपने ही संरक्षक का निष्कासन करके इतिहास में काला धब्बा लगा दिया।


पर धन्य है वीरवर दुर्गादास जिन्होंने उस वक्त भी अजीत सिंह को आशीर्वाद और मंगलकामना करते हुए ही वन की ओर प्रस्थान किया था उज्जैन में क्षिप्रा के तट पर 22 नवम्बर 1718 को इस महान देशभक्त का निर्वाण हुआ।


दुर्गादास कहीं के राजा या महाराजा नहीं थे परंतु उनके चरित्र की महत्ता इतनी ऊंची उठ गई थी कि वह कितने ही पृथ्वीपालों से भी ऊंचे हो गये और उनका यश तो स्वयं उनसे भी ऊंचा उठ गया था-


धन धरती मरुधरा

धन पीली परभात।

जिण पल दुर्गो जलमियो


धन बा माँ झलरात।।


अर्थात् दुर्गादास तुम्हारे जन्म से मरुधरा धन्य हो गई। वह प्रभात पल धन्य हो गया और वह माँ झल रात भी धन्य हो गई जिस रात्रि में तुमने जन्म लिया।


(पोस्ट लेखक --: रॉयल राजपूत अज्य ठाकुर गोत्र भारद्वाज पंजाब जिला पठानकोट गांव अंदोई)

मंगलवार, 24 नवंबर 2020

हनुमान प्रसाद पोद्दार

 भारतीय संस्कृति के देदीप्यमान नक्षत्र/गीता प्रेस यानी हनुमान प्रसाद पोद्दार /कबीर (यूपी 


हनुमान प्रसाद पोद्दार (जन्म:1892 - मृत्य: 22 मार्च 1971) का नाम गीता प्रेस स्थापित करने के लिये भारत व विश्व में प्रसिद्ध है। भारतीय अध्यात्मिक जगत पर हनुमान पसाद पोद्दार नाम का एक ऐसा सूरज उदय हुआ जिसकी वजह से देश के घर-घर में गीता, रामायण, वेद और पुराण जैसे ग्रंथ पहुँचे सके। आज 'गीता प्रेस गोरखपुर' का नाम किसी भी भारतीय के लिए अनजाना नहीं है। सनातन हिंदू संस्कृति में आस्था रखने वाला दुनिया में शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जो गीता प्रेस गोरखपुर के नाम से परिचित नहीं होगा। इस देश में और दुनिया के हर कोने में रामायण, गीता, वेद, पुराण और उपनिषद से लेकर प्राचीन भारत के ऋषियों -मुनियों की कथाओं को पहुँचाने का एक मात्र श्रेय गीता प्रेस गोरखपुर के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार को है। प्रचार-प्रसार से दूर रहकर एक अकिंचन सेवक और निष्काम कर्मयोगी की तरह पोद्दार जी ने हिंदू संस्कृति की मान्यताओं को घर-घर तक पहुँचाने में जो योगदान दिया है, इतिहास में उसकी मिसाल मिलना ही मुश्किल है। श्रीराधा माधव चिन्तन इनके द्वारा लिखित कृति है।


जीवन परिचय

भारतीय पंचांग के अनुसार विक्रम संवत के वर्ष 1949 में अश्विन कृष्ण की प्रदोष के दिन उनका जन्म हुआ। राजस्थान के रतनगढ़ में 'लाला भीमराज अग्रवाल' और उनकी पत्नी 'रिखीबाई' हनुमान के भक्त थे, तो उन्होंने अपने पुत्र का नाम 'हनुमान प्रसाद' रख दिया। दो वर्ष की आयु में ही इनकी माता का स्वर्गवास हो जाने पर इनका पालन-पोषण इनकी दादी ने किया। 

उन्होंने गीता पर एक टीका लिखी और उसे कलकत्ता के 'वाणिक प्रेस' में छपवाई। पहले ही संस्करण की पाँच हज़ार प्रतियाँ बिक गई। लेकिन पोद्दार जी को इस बात का दु:ख था कि इस पुस्तक में ढेरों ग़लतियाँ थी। इसके बाद उन्होंने इसका संशोधित संस्करण निकाला मगर इसमें भी ग़लतियाँ दोहरा गई थी। इस बात से भाई जी के मन को गहरी ठेस लगी और उन्होंने तय किया कि जब तक अपना खुद का प्रेस नहीं होगा, यह कार्य आगे नहीं बढ़ेगा। बस यही एक छोटा सा संकल्प गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना का आधार बना। उनके भाई गोयनका जी का व्यापार तब बांकुड़ा, बंगाल में था और वे गीता पर प्रवचन के सिलसिले में प्राय: बाहर ही रहा करते थे। तब समस्या यह थी कि प्रेस कहाँ लगाई जाए। उनके मित्र घनश्याम दास जालान गोरखपुर में ही व्यापार करते थे। उन्होंने प्रेस गोरखपुर में ही लगाए जाने और इस कार्य में भरपूर सहयोग देने का आश्वासन दिया। इसके बाद मई 1922 में गीता प्रेस का स्थापना की


स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव


उस समय देश ग़ुलामी की जंज़ीरों मे जकड़ा हुआ था। इनके पिता अपने कारोबार का वजह से कलकत्ता में थे और ये अपने दादा जी के साथ असम में। कलकत्ता में ये स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों अरविंद घोष, देशबंधु चितरंजन दास, पं, झाबरमल शर्मा के संपर्क में आए और आज़ादी आंदोलन में कूद पड़े। इसके बाद लोकमान्य तिलक और गोपालकृष्ण गोखले जब कलकत्ता आए तो पोद्दार जी उनके संपर्क में आए 

  1906 में उन्होंने कपड़ों में गाय की चर्बी के प्रयोग किए जाने के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया और विदेशी वस्तुओं और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के लिए संघर्ष छेड़ दिया। युवावस्था में ही उन्होंने खादी और स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना शुरू कर दिया। 


आन्दोलन और जेल

कलकत्ता में आज़ादी आंदोलन और क्रांतिकारियों के साथ काम करने के एक मामले में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने हनुमान प्रसाद पोद्दार सहित कई प्रमुख व्यापारियों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इन लोगों ने ब्रिटिश सरकार के हथियारों के एक जख़ीरे को लूटकर उसे छिपाने में मदद की थी। जेल में पोद्दार जी ने हनुमान जी की आराधना करना शुरू कर दी। बाद में उन्हें अलीपुर जेल में नज़रबंद कर दिया गया। नज़रबंदी के दौरान पोद्दार जी ने समय का भरपूर सदुपयोग किया। वहाँ वे अपनी दिनचर्या सुबह तीन बजे शुरू करते थे और पूरा समय परमात्मा का ध्यान करने में ही बिताते थे। बाद में उन्हें नजरबंद रखते हुए पंजाब की शिमलपाल जेल में भेज दिया गया। 


सम्मान और उपाधि

अंग्रेज़ों के समय में गोरखपुर में उनकी धर्म व साहित्य सेवा तथा उनकी लोकप्रियता को देखते हुए तत्कालीन अंग्रेज़ कलेक्टर पेडले ने उन्हें 'राय साहब' की उपाधि से अलंकृत करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन पोद्दार जी ने विनम्रतापूर्वक इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद अंग्रेज़ कमिश्नर होबर्ट ने 'राय बहादुर' की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा लेकिन पोद्दार जी ने इस प्रस्ताव को भी स्वीकार नहीं किया। देश की स्वाधीनता के बाद डॉ. संपूर्णानंद, कन्हैयालाल मुंशी और अन्य लोगों के परामर्श से तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने पोद्दार जी को 'भारत रत्न' की उपाधि से अलंकृत करने का प्रस्ताव रखा लेकिन उन्होंने इसमें भी कोई रुचि नहीं दिखाई।


निधन

22 मार्च 1971 को पोद्दार जी ने इस नश्वर शरीर का त्याग कर दिया।


इस महान कर्म योगी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ,धर्म और संस्कृति के रक्षक को शत बार प्रणाम।


श्री भावेश मिश्रा जी के वाल से

व्यक्त होकर ही आदमी व्यक्ति होता है / भारत यायावर

 व्यक्त होकर ही आदमी व्यक्ति होता है / भारत यायावर 

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जीवन में कुछ लोग मिलते हैं जो सुंदर, सुरुचिपूर्ण और आकर्षक लगते हैं।  लेकिन वे जल्दी खुलते नहीं हैं।अव्यक्त रहने वाले ऐसे लोगों को जानना-समझना मुश्किल होता है। इसीलिए वे रहस्यमय दिखाई देते हैं। फिर भी लगता है कि उनके भीतर बहुत कुछ है, जिसे देखा नहीं मैंने। अव्यक्त होकर भी वे आकर्षक होते हैं। "बनास जन" पत्रिका के संपादक पल्लव ऐसे ही व्यक्ति हैं। उनसे फरवरी 2019 के भारतीय भाषा परिषद, कलकत्ता द्वारा आयोजित साहित्यिक पत्रकारिता पर आयोजित समारोह में पहली बार भेंट हुई। मगर औपचारिक संवाद के अलावा कुछ नहीं हुआ। फिर उन्होंने रेणु पर लिखी जा रही जीवनी का एक अंश छापा। वे फेसबुक पर मेरे मित्र हैं। लेकिन किसी के लेखन पर टिप्पणी नहीं करते। उन्होंने एक दिन किसी के कथन को उद्धृत किया था। मैंने उनसे आग्रह किया कि अपने चिंतन को भी कभी-कभार प्रकट कीजिए, इसपर उन्होंने जवाब दिया कि इससे आत्म-प्रचार हो जाता है। तबसे मैं सोच में पड़ा हुआ हूं कि अपनी सोची हुई बात कहने से आत्म-प्रचार कैसे हो जाता है ?

  आदमी व्यक्त होकर ही व्यक्ति बनता है। व्यक्ति में अभि उपसर्ग लगने से व्यक्ति अभिव्यक्ति में रूपांतरित हो जाता है। सुंदर, सुचिंतित, सुविचारित व्यक्ति ही अभिव्यक्ति है। सघन साधना और कठोर परिश्रम कर भाषा की परिपक्वता अर्जित कर ही अभिव्यक्ति संभव हो पाती है। श्रुत-अश्रुत -पूर्व अव्यक्त ध्वनियों और वाणी को प्रकट करना ही अभिव्यक्ति का परम लक्ष्य है। खोज की अनवरत प्रक्रिया उसका सहवर्ती है। जटिल और उलझी हुई ज्ञान की अनेक शिराओं को सुलझा कर प्रकट करने की कोशिश भी अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाती है। जीवन के बीहड़ और दुर्गम और दुर्लभ प्रसंगों को उजागर करने से उसकी रोचकता बढ़ती है तथा उसका स्वरूप संवरता है।

  अव्यक्त को अभिव्यक्त करना वैसा ही जैसे निराकार को साकार करना। जैसे अंधकारमय वातावरण को ज्योतिर्मय कर जगमगा देना। व्यक्ति का अभिव्यक्ति बनना परम पद की प्राप्ति है। लेकिन इसे आत्मप्रचार कहना इसकी सरासर अवहेलना है। आत्म का प्रसार और प्रसारण एक उपलब्धि है।

     संचार माध्यमों ने इस दुस्तर कार्य को सहज बनाया है। भवभूति जिस समधर्मा की आकांक्षा पालकर लिख रहे थे, वह आज किसी देश के किसी शहर में सरलता से मिल जाता है। 

  प्रचारित-प्रसारित होना सभ्यता का उज्ज्वल वरदान है। अभिव्यक्ति अस्तित्व की अस्मिता है और यह जब फैलती है तो मानवता के प्रति कल्याण की भूमिका निभाती है।

    लेकिन अभिव्यक्ति जब दूषित मानसिकता से प्रकट होती है तब वह जीवन में ज़हर घोलती है। ऐसे में वह अपने स्वरूप में नहीं रह जाती और व्यक्त की गई चेतना अभि व्यक्ति की जगह कु व्यक्ति के रूप में स्थापित हो जाती है।

  पल्लव अपने को अभिव्यक्त करने से डरते हैं। हिचकते हैं कि कहीं उनकी बातों से लोग नाराज़ न हो जाएं।उनका आकर्षण कहीं खत्म न हो जाए। या वह कौन-सी बात है जिसके कारण वे कुछ भी कहने से डरते हैं?

सोमवार, 23 नवंबर 2020

Jk में रौशनी एक्ट भी ख़त्म

 भाई वेद प्रकाश Ved Prakash जी की वाॅल से...


भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए, जम्मू कश्मीर का 'रोशनी एक्ट' खत्म कर दिया है।


सोचिए आज तक किसी मीडिया ने हम लोगों को 'रोशनी एक्ट' के बारे में बताया ही नहीं ।


यह 'रोशनी एक्ट' कश्मीर छोड़कर भाग गए हिंदुओं के मकान, दुकान और जमीन और खेत मुस्लिमों को देने का फारुख अब्दुल्ला द्वारा बनाया गया एक  षड्यंत्र था जिसमें कांग्रेस भी शामिल थी।


1990 के दशक में जितने भी हिंदू कश्मीर से भागे, उन्हें पाकिस्तान के मुसलमानों ने मारकर नहीं भगाया बल्कि उनके ही पड़ोसी, जिनके साथ वह बचपन में सेवई खाते थे, त्यौहार मनाते थे, चाय पीते थे, उन्हीं पड़ोसियों अब्दुल-असलम-गफ्फार ने मार-मार कर भगाया ।


उसके बाद जब पूरी कश्मीर घाटी हिंदुओं से खाली हो गयी, तब फारुख अब्दुल्ला के पास कुछ मुस्लिम गए और बोले कि हिंदुओं के इन मकानों, दुकानों, जमीनों, खेतों-खलिहानो  को  मुसलमानों को देने के लिए आप कुछ नियम बनाइए ।


तब फारुख अब्दुल्ला ने एक 'रोशनी एक्ट' बनाया और इस 'रोशनी एक्ट' के द्वारा सिर्फ ₹101 में किसी भी हिंदू की जमीन, खेत, मकान या दुकान एक मुसलमान की हो जाती थी।


शगूफा यह छोड़ा गया कि मुसलमानों के घरों के आसपास के घर, जो हिंदुओं के थे, वे नहीं हैं; बिजली का कनेक्शन काट देने की वजह से उनके आसपास अंधेरा रहता है जिससे उनके लिए खतरा हो सकता है, इसलिए ऐसे घरों को रोशन करना जरूरी है।


 इस तरह 'रोशनी एक्ट' का ताना-बाना बुना गया।


चूँकि हिंदू जब अपना सब-कुछ छोड़कर भाग गए, तब बिजली का बिल नहीं चुका  पाने की वजह से उनके खेतों के ट्यूबेल का या दुकानों का या घर का बिजली का कनेक्शन काट दिया गया.... फिर फारुख अब्दुल्ला ने एक 'रोशनी एक्ट' बनाया जिसके द्वारा मात्र ₹101 फीस भरकर कोई भी मुसलमान अपने नाम से उस हिंदू के खेत-खलिहान, मकान, दुकान के लिए बिजली का कनेक्शन लेने का आवेदन भर सकता था।

 इस तरह पहले उस मुसलमान के नाम बिजली का बिल जनरेट कर दिया जाता था; उसके बाद कुछ ही सालों में उस वक्त हिंदू की मकान, दुकान या खेत का पूरा मालिकाना हक उस मुसलमान को दे दिया गया।


इस तरह इस अन्यायी 'रोशनी एक्ट' द्वारा फारुख अब्दुल्ला ने कश्मीर घाटी के हजारों हिंदुओं की  बहुमूल्य संपत्ति मुसलमानों को मात्र ₹101  रुपये में दे दी।


और सबसे आश्चर्य कि भारत की वामपंथी मीडिया ने कभी इस 'रोशनी एक्ट' की चर्चा तक कहीं नहीं की।

(व्हाट्सएप पर प्राप्त)

(लघुकथा ) -बुलबुले/बलराम अग्रवाल

बुलबुले/बलराम अग्रवाल 


कामिनी की आँखों में उन्हें इज्जत देने जैसी कोई चीज कभी दिखाई नहीं  दी, वह अलग बात है; लेकिन आज तो उसने हद ही कर दी! न राम-राम न दुआ-सलाम! कमरे में उनका कदम पड़ते ही बरस पड़ी—“आप इधर मत आया करो, प्लीज़!”

वे चौंक गये। गोया कि उनके अधिकार को चेलैंज कर दिया गया हो। गले से एकाएक निकला, “क्यों?”

इस तल्ख सवाल का उसने कोई जवाब नहीं दिया। मुँह बिचकाकर रसोई की ओर बढ़ गयी। 

और दिनों की तरह वे उसके पीछे-पीछे नहीं गये। ड्राइंग रूम बना रखी लॉबी में पड़े सोफे पर पसर गये। 

चलता-फिरता मोहल्ला नहीं था, कि आते-जाते हर किसी पर पड़ोसियों की नजर गड़ती हो। सोसाइटी थी। सिक्योरिटी गार्ड्स सब पहचानते थे, सो वे बिना रोक-टोक चले भी आते थे। यह एक वन-रूम सेट था, जिसमें वह किरायेदार थी और वे मालिक मकान।

औपचारिकता के मद्देनजर, कुछ ही देर बाद वह रसोई से निकल आयी। ट्रे में कोल्ड ड्रिंक भरा एक गिलास और काजू भरी एक प्लेट साथ थी।

“ऐसा क्यों कहा तुमने?” काजू उठाकर मुँह में रखते हुए उन्होंने सवाल किया।

 “मुझे पसन्द नहीं है, इसलिए!” उसने दृढ़ता से कहा।

“पसन्द नहीं है, मतलब!” वे बोले, “मैं चला आता हूँ कि दूसरे प्रांत से आयी अकेली लड़की हो। हजार तरह के लोग सोसाइटी में रहते हैं। हजार तरह की बातें आये दिन अखबारों में और न्यूज चैनलों में आती रहती हैं। कल को कुछ ऊँच-नीच हो गया तो... आँच तो मुझ पर भी आयेगी न!”

“उस ऊँच-नीच के डर से ही आपको समझा रही हूँ, सर।” कामिनी ने कहा, “पढ़ी-लिखी कामकाजी लड़की हूँ। दूसरे प्रांत, दूसरे शहर में जाकर कैसे रहना है, सब सीख रखा है। बदन नुचवाना और कपड़े फड़वाना बिल्कुल भी पसन्द नहीं है मुझे!”

“मुझसे कह रही हो यह बात, मुझसे!” आश्चर्य के उच्च शिखर से वे चीखे, “कपड़े फाड़ने की छोड़ो, मैंने अपना एक पोर भी कभी लगाया तुम्हें?” 

“एक बार नहीं, हजार बार!” वह संयत स्वर में  बोली, “आते ही खुद को नंगा करना और मुझको नोंचना-खसोटना शुरू कर देते हो। विनय बाबू, पोर और नाखून सिर्फ उँगलियों में नहीं  होते... आँखों में भी होते हैं!”

उनके कानों की लवें धधक उठीं यह सुनकर। नजरें नहीं उठा पाये। काजूभरी प्लेट की ओर बढ़ता हाथ एकाएक रुक गया। गिलास की भीतरी सतह पर जमे कोल्ड ड्रिंक के छोटे-छोटे बुलबुले चटकने और फूटने लगे थे। एक झटके से वे उठे और...

“अगले महीने के आखीर तक... खाली कर देना यह सेट!” कहते हुए बाहर निकल गये।

(यह 'काले दिन' में संग्रहीत है। मो.:8826499116)

रामायण / भारत यायावर

 रामायण / भारत यायावर 


रामायण अर्थात राम का अयन। / भारत यायावर 


अयन का अर्थ होता है :

 गति

चलना

मार्ग

रास्ता

गृह

आश्रय आदि।


तो रामायन का अर्थ हुआ

राम की गति

राम का चलना

राम का मार्ग

राम का रास्ता

राम का घर

राम का आश्रय।


कुछ लोग रामायन का अर्थ राम की कथा ही समझते हैं। लेकिन वाल्मीकि ने किस अर्थ में रामायण शब्द का प्रयोग किया है?


  जैसा कि तुलसी ने कहा है कि रामायन शत कोटि अपारा। यहां शत कोटि का मतलब अनेकानेक से लेना चाहिए, सौ करोड़ नहीं। तात्पर्य यह कि जितने कवियों ने रामायन की रचना की है, सबके अलग-अलग तात्पर्य रहे होंगे।


 राम की कथा में वह कौन-सी विशेषताएं हैं जो कवियों को आकर्षित करती रही हैं ? बौद्ध, जैन, सनातनी, मुस्लिम,कृस्तान मतावलंबियों ने भी अपनी तरह से रामायन की कथा लिखी है तो सबका उद्देश्य एक ही कैसे होगा?


   राम एक गतिशीलता है। राम एक रास्ता है।राम एक निवासस्थल यानी घर है।राम एक सहारा यानी आश्रय है।


तुलसी ने राम के चरित्र को मानसरोवर की तरह निर्मल और पवित्र मानकर ही रामचरितमानस की रचना की है। मैथिलीशरण गुप्त ने राम की जन्मभूमि साकेत को ही महत्त्व दिया है।


   रामायण विश्व मानवता के लिए धरोहर है। इसीलिए इसकी वैश्विक स्वीकृति है। मैं जब रांची में पढ़ता था,तब प्राय: गुरुवर दिनेश्वर प्रसाद के साथ फादर कामिल बुल्के के यहां जाता था और उनके साथ लम्बी बैठकी होली थी। रामकथाओं के उनके विस्तृत ज्ञानालोक में विचरने के साथ-साथ मेरे मन में यह प्रश्न भी उभरता रहता था कि इतनी तरह-तरह की रामकथाओं के मतलब क्या हैं?


   महाभारत तो युगों-युगों के भारतीय मानस की गाथा है। किन्तु रामायण एक गतिशील जीवन प्रक्रिया की वैश्विक स्वीकृति है।


 भारत यायावर