रविवार, 31 मई 2020

किताबों की खिली खिली खुली दुनियां / चण्डीदत्त शुक्ला




आवरण कथा

मुंगेर, पटना, बक्सर, रोहतास और गया के साथ प्रदेश के कुल 534 प्रखंड मुख्यालय रेड ज़ोन में हैं, ऐसे में पढ़ने के शौकीन किताबों तक कैसे पहुंचें - ये बड़ा सवाल है।
हालांकि लॉकडाउन के दौरान अध्ययनशील लोगों ने पढ़ने-पढ़ाने के कई रास्ते तलाशे जरूर हैं। परिणाम भी सुखद रहे। किताबें न सिर्फ पढ़ी, बल्कि सुनी भी जा रही हैं...

*खिलीं, खुलीं, बोल उठीं किताबें*


 चण्डी दत्त

लॉकडाउन 4.O अब पूरा होने को है। कुछ हद तक घर की चारदीवारी से बाहर निकलने के मौके मिलने लगे हैं, दुकानें खुल रही हैं। एक-दूसरे से दूरी बरतते हुए लोग कुछ कदम आगे की तरफ बढ़ा रहे हैं। कोरोना का खतरा बरकरार है, लेकिन रुके रहने से ज़िंदगी भी रुक जाती है, ऐसे में सबको आगे आना ही है। लॉकडाउन के चार चरणों ने जहां ठहरने को मजबूर किया, वहीं इस मुश्किल दौर में हम सबने कई आदतों को नए रंग-रूप दिए हैं।
कहते हैं, किताबों से बेहतर दोस्त कोई नहीं होता और दोस्तों के बगैर खुश रहना मुमकिन नहीं। पुस्तकें घरों तक पहुंच नहीं पा रही थीं, इसलिए पढ़ने के शौकीनों ने खुद उन तक पहुंचने के रास्ते तलाशे। बंद पड़े पन्ने खुल गए, हर्फ खिल उठे। यहां तक कि किताबें बोलने भी लगीं। आखिरकार, हमारे देश में 65 करोड़ मोबाइल इंटरनेट उपयोगकर्ता जो हैं।
सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं-संगठनों ने इसका खयाल रखा कि घरों में बंद लोग ऊब का शिकार न हो जाएं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) ने चुनिंदा पुस्तकों के दरवाज़े पाठकों के लिए खोल दिए। ‘स्टे होम इंडिया विद बुक्स' नाम से जारी अभियान के तहत मुफ्त पीडीएफ डाउनलोड की सुविधा मुहैया कराई गई।

पीडीएफ में आईं किताबें
अध्ययन प्रेमियों ने ह्वाट्सएप के ज़रिए एक-दूसरे को मुद्रित सामग्री के पीडीएफ मुहैया कराए। इनमें चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी, नागराज, ध्रुव के कॉमिक्स थे, वहीं कई नई बेस्टसेलर और अनुपलब्ध किताबों के पीडीएफ भी शामिल थे। पहले चरण में धार्मिक पुस्तकों का लेन-देन भी खूब हुआ।
वैसे, कुछ बेस्टसेलर राइटर्स और प्रकाशकों को पीडीएफ के इस अवैध प्रसार से कोफ्त हुई। एक प्रकाशक ने कहा कि मुफ्त में पढ़ने की प्रवृत्ति, चाहे लॉकडाउन में हो या सामान्य दिनों में - प्रकाशन उद्योग के लिए नुकसानदेह है। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के ई-संस्करण डाउनलोड करके बिना सब्सक्रिप्शन के, गैरकानूनी तरीके से असंख्य लोगों तक पहुंचाने की आलोचना भी हुई।
इस बीच, दैनिक भास्कर समूह की चर्चित बाल पत्रिकाओं - बाल भास्कर और यंग भास्कर के डिजिटल संस्करण बाल एवं किशोर पाठकों के लिए मुफ्त में मुहैया कराए गए। इन दोनों पाक्षिक पत्रिकाओं के संयुक्त संस्करण को नन्हे-मुन्ने पाठकों ने खूब पसंद किया।
साहित्यिक पत्रिका हंस ने स्त्री-आधारित कथा संकलन का पीडीएफ उपलब्ध कराया। पायरेसी के ख़तरे और लेखक-प्रकाशक को होने वाले घाटे की आशंकाओं के मध्य ‘ई पुस्तकालय' जैसे डिजिटल ठिकाने पाठकों के लिए लाभ का सबब बने। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि हिंदी पट्टी में पुरानी किताबें अक्सर अनुपलब्ध रहती हैं। पूर्णिया के रामलाल कुशवाहा का कहना था कि साइबर मंचों की मदद से ही ऐसी पुस्तकें भी पढ़ने का मौका मिला, जिनके बारे में पहले उन्होंने सुना भर था।

किंडल ई-बुक संसार
मुद्रित किताबों से अलग, ई-अध्ययन का संसार पीडीएफ तक नहीं सिमटा। ई-बुक के कई रूप-स्वरूप उपलब्ध हैं, जैसे-ई-पब और मोबी। पटना की सुनीता वर्मा के मुताबिक, ;किंडल रीडर पर पढ़ना बेहद सुविधाजनक रहा, क्योंकि वहां अक्षर छोटे-बड़े करने और स्क्रीन की रोशनी बढ़ाने-घटाने की सुविधा उपलब्ध है।' यहीं के तनिष्क जायसवलाल का कहना था कि किंडल रीडर अलग से खरीदने की ज़रूरत भी नहीं होती। उसका मुफ्त संस्करण प्ले स्टोर में उपलब्ध है, वहीं कई किताबों के निःशुल्क संस्करण भी। इसी तरह गूगल बुक्स पर कुछ पन्ने बगैर शुल्क चुकाए पढ़े जा सकते हैं। इस सुविधा का लाभ लैपटॉप, टैब और सेलफोन पर उठाया जा सकता है।

देर तक लगे पढ़ने
फुर्सत के दिन इकट्ठा मिले तो लोग देर तक पढ़ने लगे, वो चाहे मुद्रित किताबें और अखबार वगैरह हों या फिर इंटरनेट पर पठन सामग्री। फोन कॉल के ज़रिए किए गए एक सर्वे के मुताबिक, लोगों ने एक अखबार पढ़ने के लिए एक घंटे का वक्त खर्च किया, जबकि पहले ये समय आधे घंटे के आसपास था।
जाहिर है, इस रुझान का लाभ ब्लॉग्स और वेबसाइट्स को भी मिला। हिंदी कविताओं के बड़े ई-ठिकाने ‘कविता कोश’ की ज्वायंट डायरेक्टर शारदा सुमन ने बताया कि सामान्य दिनों में आम तौर पर 61 लाख पेज व्यूज़ होते थे, जो लॉकडाउन के 54 दिनों में 82 लाख व्यूज़ तक पहुंच गए। इसी तरह पाठकों ने कविता कोश पर औसतन 17 फीसदी अधिक समय बिताया।
‘प्रतिलिपि’ की हिंदी संपादक वीणा वत्सल सिंह के मुताबिक, ‘पहले हर महीने 1.30 करोड़ लोग कहानियां आदि पढ़ते थे, जबकि लॉकडाउन के दिनों में यह संख्या 1.80 करोड़ तक पहुंच गई।’ कंटेंट प्लेटफॉर्म ‘मातृभारती’ की संपादक नीलिमा शर्मा की मानें तो पढ़ने के शौकीनों में इस बीच पैंतालीस फीसदी तक का इजाफा हुआ। शर्मा का कहना था कि घर में बंद रहकर बोरियत के अलावा, उदासी भी सबमें घर कर रही थी, जबकि मूड्स ऑफ लाकडाउन जैसी शृंखला ने पाठकों को काफी हद तक बांधे रखा।

सुनो कहानी और उपन्यास
वेबसाइट्स पर पाठकों का जमावड़ा खूब लगा, लेकिन वहां ज्यादातर सामग्री मुफ्त में उपलब्ध है, ऐसे में सवाल उभरता है कि क्या लॉकडाउन काल में ई बुक्स और ऑडियो बुक्स की खरीदारी भी बढ़ी? और किताबों के किस स्वरूप के प्रति रुचि में बदलाव आया?
‘राजपाल एंड संस’ के प्रणव जवाब देते हैं कि सोशल मीडिया पर जो लेखक और प्रकाशक सक्रिय रहे, उनकी ई-बुक्स और ऑडियो किताबों की मांग में इजाफा हुआ। ‘पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया’ के संजय गिरी का अनुमान था कि किताबें खरीदने के लिए डिजिटल एकमात्र माध्यम था, इसलिए हमारी ई-बुक और ऑडियो बुक्स की बिक्री अधिक हुई।
इस बातचीत से ये भी जाहिर हुआ कि मुद्रित किताबों की अनुपलब्धता की स्थिति में डिजिटल पुस्तकों ने पाठकों को आकर्षित किया है, वहीं ऑडियो बुक्स ने एक कदम आगे बढ़कर साहित्य प्रेमियों को दावत दे दी है।
‘स्टोरीटेल इंडिया’ के कंट्री मैनेजर योगेश दशरथ इस बात की पुष्टि करते हैं, ‘मार्च के आखिरी दो हफ्तों में कहानियां सुनने वालों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई। पिछले दिनों लोगों को अधिक वक्त मिला तो उन्होंने ऑडियो बुक्स सुनने को प्राथमिकता दी, क्योंकि इस तरह वे घर के काम करते हुए मनपसंद कहानी का लुत्फ़ उठा सकते थे।' यूं, ये अनुभव इस तरह दिलचस्प हो जाता है कि यहां मुद्रित शब्द पढ़ते हुए रुकने और विचार का अवसर नहीं मिलता, कथा वाचक अपनी शैली में अर्थ स्पष्ट करने का प्रयास करता है, जबकि श्रोता - पाठक अपने लिए बहुत-सी काल्पनिक अर्थानुभूति भी कर पाता है।
 किताबों की दुनिया में बदलाव, पाठकों और श्रोताओं के जुड़ाव और बिक्री व ग्राहकी के आंकड़ों में इजाफे की चर्चा के बीच दो ज़रूरी बातें याद रखनी होंगी।
पहली – ‘हिंदयुग्म’ के संपादक शैलेश भारतवासी की, जो कहते हैं कि ई बुक्स के बाज़ार में 90 फीसदी का उछाल आया है, लेकिन ये पर्याप्त नहीं है। मुद्रित किताबों की तुलना में ई बुक्स की बिक्री का अनुपात यूं भी दस पर एक का है। और किसी भी स्थायी बदलाव की उम्मीद से पहले देखना पड़ेगा कि परिवर्तन कितने अरसे के लिए आया है।
‘वाणी प्रकाशन’ की अदिति माहेश्वरी गोयल अहम निष्कर्ष देती हैं– ‘हमारी साढ़े तीन हज़ार किताबें इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। इनमें पाठकों ने रुचि तो दिखाई है, लेकिन इसके सामने ऑडियो बुक की लोकप्रियता में अधिक उछाल आया है। ये तकनीक का स्वभाव है। एक नई चीज़ अपनी सुविधाओं के साथ अधिक ग्राह्य हो जाती है। ई-बुक पढ़ने के लिए जहां आपको रीडर चाहिए, वहीं ऑडियो बुक कुछ भी करते या चलते हुए सुनी जा सकती है और उसके लिए आपका पढ़ा-लिखा होना भी ज़रूरी नहीं है...।' रंगकर्मी कंचन कुछ इस तरह पुष्टि करती हैं, 'ऑडियो का कमाल ये है कि तब आंखें नहीं, बल्कि कान पढ़ते हैं।' सचमुच, ये अनुभव ऐसा है, जब कल्पना के कई नए वितान खुल जाते हैं और पाठकीय आस्वाद और बढ़ जाता है।

रवि अरोड़ा की नजर से





लाला रामदेव की नीम हकीमी

रवि अरोड़ा

ऋषिकेश में एक नीम हकीम है नीरज गुप्ता । कई दशकों से उसने मिर्गी के शर्तिया आयुर्वेदिक इलाज के नाम पर ऊधम मचा रहा है और अब तक करोड़ों रुपये भी कमा चुका है । अख़बारों में पूरे पूरे पेज के उसके क्लीनिक के विज्ञापन छपते हैं और देश भर में उसके क्लीनिक की धूम रहती है । वर्ष 2004 में इसके क्लीनिक पर ड्रग कंट्रोल विभाग ने छापा  मारा और भारी मात्रा में ख़तरनाक स्टेरॉयड्स दवाएँ बरामद कीं। नतीजा उसे जेल भेज दिया गया और अब जाकर तीन साल पहले उसकी ज़मानत हुई । मगर आजकल उसकी दुकान फिर धूमधड़ाके से चल रही है और वह फिर लोगों के बहुमूल्य जीवन से खिलवाड़ कर रहा है । अकेला नीरज गुप्ता ही नहीं हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे शहरों की आध्यात्मिक पहचान को भुनाने वालों में बड़े बड़े नाम शामिल हैं । एसे तमाम शहरों में आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा की सैंकड़ों दुकानें खुली हुई हैं जो हमारी पुरानी चिकित्सा पद्धति के नाम को जम कर भुनाती हैं । कोरोना संकट के इस काल में तो आजकल इन नीम हकीमों की चाँदी ही कट रही है और लोगों की ज़िंदगी से जम कर खेला जा रहा है ।

अब बाबा रामदेव को ही लीजिए । बेशक नीरज गुप्ता से उनकी तुलना नहीं हो सकती मगर काम वे भी नीम हकीमों जैसा ही कर रहे हैं । कभी वे दावा करते हैं कि एक मिनट साँस रोक कर पता चल जाता है कि व्यक्ति को कोरोना है अथवा नहीं और कभी दावा करते हैं कि नाक में तेल डालने से कोरोना वायरस मर जाएगा । कभी आयुर्वेद से एक सप्ताह में कोरोना के मरीज़ को ठीक करने का दावा करते हैं और कभी कहते हैं कि उन्होंने गिलोय और अश्वगंधा से कोरोना का मरीज़ ठीक भी किया है । हालाँकि डब्ल्यूएचओ उनके तमाम दावों को ख़ारिज करता है और इन सब बातों से बचने की लोगों को सलाह देता है । रामदेव के मामले में राजनीतिक ड्रामा तो तब शुरू हुआ जब उनकी संस्था पतंजलि की कोरोना सम्बंधी आयुर्वेदिक दवा के मानवीय प्रयोग की अनुमति मध्य प्रदेश सरकार ने दे दी । जबकि नियमानुसार मनुष्य से पहले दवा चूहों और जानवरों पर आज़माने का प्रावधान है । हालाँकि हो हल्ला मचने पर बाद में यह अनुमति रद्द भी कर दी गई ।

रामदेव को लेकर ताज़ा विवाद इंडिया टीवी पर कोरोना और अन्य बीमारियों के इलाज सम्बंधी उनके दावों को लेकर है । सोशल मीडिया पर देश के अनेक आयुर्वेदिक चिकित्सक रामदेव के दावों की आजकल धज्जियाँ उड़ा रहे हैं । बक़ौल उनके रामदेव योगाचार्य हैं और योग की ही बात बतायें और आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा सम्बंधी ऊटपटाँग ज्ञान न बघारें । रामदेव को इस तरह की सलाह देने वालों में जाने माने चिकित्सक भी हैं जो यह भी पूछते हैं कि बिना किसी डिग्री के रामदेव कैसे आयुर्वेदिक इलाज कर रहे है ? हाल ही इंडिया टीवी पर जोंक से इलाज को भी पंचकर्म का हिस्सा बताने पर तो आयुर्वेदाचार्य बेहद कुपित हैं और कह रहे हैं की रामदेव को तो आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान भी नहीं है । बक़ौल उनके बेशक योग ग्राम के नाम से रामदेव हरिद्वार में डेड सौ एकड़ में फैला बड़ा प्राकृतिक चिकित्सालय चलाते हों और चिकित्सकों की लम्बी चौड़ी टीम के द्वारा एक ही समय में सात सौ लोगों का अपने आवासीय परिसर में इलाज करने का दावा भी करते हों मगर इससे वे स्वयं तो चिकित्सक नहीं हो जाते ? उनकी यह दलील भी वाजिब है कि आयुर्वेदिक की दवाएँ तो डाबर और झंडू जैसी कम्पनियाँ भी बनाती हैं , तो क्या उसके मालिक डाक्टर हो गए ? वे याद दिलाते हैं कि टीवी पर रामदेव की सलाह से कड़वी लौकी का जूस पीने से दिल्ली में एक व्यक्ति की मौत भी हो गई थी । ये आयुर्वेदाचार्य सोशल मीडिया पर अब लोगों से अपील कर रहे हैं कि संकट की घड़ी में इस तरह के नीम हकीमों से बचें । हालाँकि आयुर्वेदाचार्यो की इस मुहीम से कोई बड़ी उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि ये लोग जिस सरकार से हस्तक्षेप की माँग कर रहे हैं , बाबा उसे ही जेब में लेकर घूमते हैं ।

रवि अरोड़ा की नजर से





कुछ कहता है अब्दुल बिगाड़ू

रवि अरोड़ा

किसी गाँव में अब्दुल नाम एक आदमी रहता था जिसका प्रिय शग़ल था लोगों के काम बिगाड़ना । उसके बारे में मशहूर था कि वो किसी को खाता-कमाता नहीं देख सकता । नतीजा गाँव में उसका नाम पड़ गया- अब्दुल बिगाड़ू । गाँव से ऊपर उठ कर पूरे मुल्क की बात करें तो यहाँ भी एक से बढ़ कर एक अब्दुल बिगाड़ू हैं जो दूसरों को फलता-फूलता देख कर टोका टाकी करते हैं । अन्य लोगों की क्या कहूँ मुझे स्वयं अपने पर ही कई बार शक होता है । अब देखिए न मुझे आजकल देश के तमाम जनप्रतिनिधियों की कमाई चुभ रही है । क्या करूँ ये लोग दावा तो एसे ही करते हैं कि जैसे समाज के सच्चे सेवक यही हैं मगर हक़ीक़त यह है कि इनके हिस्से तो केवल मेवा ही मेवा आता है । आज जब देश कोरोना संकट से गुज़र रहा है और देश के सामने जन स्वास्थ्य के साथ साथ आर्थिक चुनौती भी मुँह बाये खड़ी है तब एसे में मेवे की इस बंदर बाँट पर क्या कड़ा अंकुश नहीं लगना चाहिये ?

बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर अपनी पार्टी की बैठक में जब भी आते उनका कुर्ता फटा होता । नतीजा पार्टी की कार्रवाई से पहले अध्यक्ष चंद्रशेखर को झोली फैला कर सब सदस्यों से कर्पूरी ठाकुर के लिए नए कुर्ते के पैसे एकत्र करने पड़ते । कर्पूरी ठाकुर ही क्यों , आज़ादी के समय और उसके कई दशक बाद तक नेता और जन प्रतिनिधि ज़मीन से उठे हुए संघर्षशील लोग ही बनते थे । शायद इन्हीं परिस्थितियों को मद्देनज़र रखते हुए ही देश की तमाम विधानसभाओं और संसद के सदस्यों के लिए वेतन और अन्य कार्यों के लिए भत्ते का प्रावधान किया गया होगा । मगर आज जब राजनीति सेवा नहीं पेशा है और सामान्य परिवार का व्यक्ति जन प्रतिनिधि बन ही नहीं सकता , तब देश पर इनके वेतन और भत्तों का बोझ डालने की क्या आवश्यकता है ? कमाल की बात यह है कि प्रतीकात्मक रूप से शुरू हुआ यह ख़र्च हर दो चार साल में दोगुना हो जाता है । पूरी दुनिया में महज़ भारत ही इकलौता एसा देश है जहाँ अपना वेतन तय करने का अधिकार स्वयं सांसद और विधायकों को ही है । इस मामले में भी भारत इकलौता देश है कि जहाँ एक दिन के लिए भी विधायक या सांसद बन जाओ तो तमाम उम्र पेंशन मिलती है । जनप्रतिनिधियों का वेतन और भत्ता बढ़ाने के विधेयक पर भारत में कभी चर्चा नहीं होती और कुछ ही सेकेंडों में यह स्वीकृत हो जाता है । दोनो सदनो में मिला कर देश में कुल 780 सांसद हैं और देश की तमाम विधानसभाओं में कुल 4120 विधायक हैं । सांसद को एक लाख रुपया वेतन के अतिरिक्त रोज़ाना भत्ता, संसद आने का भत्ता, क्षेत्र में जाने का भत्ता, कपड़े धुलवाने , कम्प्यूटर और फ़ोन भत्ते के अलावा हवाई और रेलगाड़ी यात्रा और न जाने क्या क्या सुविधा मुफ़्त है । संसद की कैंटीन की मूल्य सूची तो सोशल मीडिया पर अक्सर रहती ही है । मज़ाक़ की स्थिति तो यह है कि सांसद को टेलिफ़ोन भत्ता दस हज़ार रुपये महीना है जबकि हज़ार पंद्रह सौ से महँगा मासिक पैकेज तो किसी भी टेलिफ़ोन ओपरेटर कम्पनी का नहीं है । उधर विधानसभाएँ और भी अधिक खर्चीली हैं। तेलंगाना में विधायक को 2.5 लाख रुपये, दिल्ली में 2.1. लाख, उत्तर प्रदेश में 1.87 लाख, महाराष्ट्र में 1.7 लाख और जम्मू-कश्मीर में 1.6 लाख रुपये महीना मिलता है । केवल त्रिपुरा ही एसा राज्य है जो अपने विधायकों को सबसे कम यानि केवल 34 हज़ार रुपया महीना देता है । मंत्रियों के लिए लोकसभा और विधानसभाओं ने लगभग दोगुनी राशि के पैकेज रखे हुए हैं । अपना वेतन बढ़ाने में हमारे जनप्रतिनिधि कितनी फुर्ती दिखाते हैं इसका उदाहरण है मध्य प्रदेश जहाँ सन 1990 में विधायकों को केवल एक हज़ार रुपया मासिक मिलता था और अब यह राशि एक लाख को पार कर गई है । इनसे इतर देश के एक लाख से अधिक पूर्व सांसदों व विधायकों की पेंशन राशि भी काफ़ी आकर्षक है । सैंकड़ों नेता एसे हैं जिन्हें दोनो पेंशन एक साथ मिल रही हैं और वह भी सालाना आठ फ़ीसदी वृद्धि और भत्तों के साथ । अपना सवाल यह है कि कोरोना संकट में आज जब हर कोई क़ुर्बानी दे रहा है तब इन सांसदों, पूर्व सांसदों, विधायकों और पूर्व विधायकों पर इतना ख़र्च जायज़ है ? बेशक मोदी सरकार ने सांसदों के वेतन में तीस फ़ीसदी की कटौती है मगर क्या यह ऊँगली कटवा कर शहीद होने जैसा नहीं हैं ? जनप्रतिनिधियों पर ख़र्च हो रहा हज़ारों करोड़ रुपया इस तंगी में क्या देश के काम नहीं आना चाहिये ? क़ुर्बानी देने की ज़िम्मेदारी क्या केवल आम लोगों की है , नेताओं की नहीं ? हो सकता है कि इस मुद्दे पर बात करना मुझे भी पक्का अब्दुल बिगाड़ू बना दे मगर बात तो कभी कभी अब्दुल की भी ठीक होती होगी ?

युगोस्लोवाकिया यात्रा की यादें / त्रिलोकदीप






बात 17 सिंतबर, 1977 की है। सोवियत संघ की यात्रा समाप्त कर अगला ठौर युगोस्लाविया था। सुबह सवेरे बारिश के बीच मॉस्को के अपने होटल से साढ़े पांच बजे निकल गया। एयरपोर्ट डेढ़ घंटा पहले पहुंचना था। वक़्त से पहले ही मैं एयपोर्ट या रेलवे स्टेशन में पहुंचने में विश्वास रखता हूं। आठ बजे की फ्लाइट थी।समय पर बेलग्राद पहुंच गया। तब मास्को के ग्यारह बजे थे लेकिन बेलग्राद में नौ। बताया गया कि बेलग्राद का समय ग्रीनविच रेखा के अनुसार है यानी लंदन और बेलग्राद का समय समान है। बेलग्राद हवाई अड्डे पर इमीग्रेशन अधिकारी को अपना पासपोर्ट दिया तो देखने के बाद बिना मोहर लगाये हंस कर मुझे लौटाते हुए कहा 'आप तो गुटनिरपेक्ष देश के हैं अर्थात हमारे अपने हैं, मोहर की क्या ज़रूरत है।' उस अधिकारी के व्यवहार से मुझे खुशी और हैरत दोनों हुईं लेकिन मैं ने अपने पासपोर्ट पर मोहर लगाने का जब इसरार किया तो मेरा अनुरोध वह टाल नहीं सका। इससे पहले 1975 में भी मैं इस तरह के आश्चर्य का सामना पहले लंदन  और बाद में टोरंटो में भी  कर चुका था  जहां मैं बिना वीज़ा लिए इसलिए स्वीकार कर लिया गया था क्योंकि मैं राष्ट्रकुल देश का नागरिक हूं। उन देशों में तो राष्ट्रकुल देशों के यात्रियों की कतार ही अलग लगती है। गुटनिरपेक्ष देशों में भी ऐसी व्यवस्था है, इसकी जानकारी बेलग्राद पहुंचने पर हुई। नामुमकिन नहीं इस व्यवस्था का लाभ कुछ अवांछित तत्व भी उठाते रहे हों। बहरहाल मैं इमीग्रेशन अधिकारी का धन्यवाद कर  एयरपोर्ट के बाहर आ गया।

मैं युगोस्लाव सरकार का मेहमान था इसलिए मुझे लेने लिए एक अधिकारी आया हुआ था। उसका नाम था मिस्टर डैलीच। वह मुझे पैलेस होटल में छोड़ फिर मिलने का वादा कर चला गया। यह हिदायत ज़रूर देता गया कि आप खायें जो मर्ज़ी लेकिन पीने का भुगतान आपको खुद करना होगा। यह आम बात है। जिस दिन मैं वहां पहुंचा उन दिनों गुटनिरपेक्ष दिवस के उपलक्ष्य में समारोह चल रहे थे जो पूरा सिंतबर बड़ी शिद्दत के साथ मनाये जाते हैं। जगह जगह राष्ट्रपति ब्रोज़ टीटो के पोस्टर चिपके हुए थे। शायद यही कारण था कि आव्रजन अधिकारी मेरे पासपोर्ट पर मोहर लगाने से हिचकिचा रहा था। जिस दिन मैं बेलग्राद पहुंचा उस दिन शनिवार था। शनिवार और रविवार को औपचारिक मेल मुलाकातें वहां नहीं होतीं लिहाज़ा मैं ने इन दोनों दिनों का इस्तेमाल बेलग्राद दर्शन और खोज के लिए रख लिया। क्योंकि मैं लंबे समय से यूरोप के दौरे पर था इसलिए अगला कोई कार्यक्रम न देख मै 'केशी स्नान ' किया। ज़रूर भी थी। बहुत राहत मिली। कुछ समय तक लेटा रहा और अपनी यात्राओं को दिमाग के एक कोने में दर्ज करता रहा। उठने के बाद उन्हें अपनी डायरी पर उतारा। मुझे मास्को में अपने भारतीय मित्र देव मोरारका से हुई बातचीत याद आ रही थी जो पिछले बारह बरस से वहां रह रहा था। उसका मानना था कि रूस में खासी आज़ादी है लेकिन पश्चिमी देश इसे अपने चश्मे से देखते हैं जिन्हें रूस में बुराइयां ही नज़र आती हैं। देव मोरारका का तर्क था1कि हर देश की अपनी शासन व्यवस्था और प्रणाली होती है जो उस देश के अनुकूल होती है। सोवियत संघ की अपनी शैली है जिसे वह अपने देशवासियों के अनुकूल मानता है, इसमें पश्चिम को दिक्कत क्यों है। देव की दलील में दम है, उसे खारिज इसलिए भी नहीं किया जा सकता कि मैं अपनी दो यात्राओं में लोगों के चेहरों पर खुशी और संतोष के भाव देख चुका हूं।

जहां तक युगोस्लाविया का प्रश्न है, है तो यह भी समाजवादी देश लेकिन इसके साथ मार्शल टीटो का नाम जुड़ा है जो उस समय सब से कद्दावर नेता थे, दुनिया में उनकी जोड़ का कोई दूसरा नेता नहीं था। उनकी शासन करने की  अपनी एक 'स्वतंत्र लीक' थी जो गुटनिरपेक्ष देशों के संस्थापक नेता की थी और उनके नाम के साथ जुड़े थे भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर के नाम।इस तिकड़ी की धाक तब की तथाकथित दोनों विश्व शक्तियों के लिए किसी तीसरी ताकत से कम नहीं थी। गुटनिरपेक्ष देशों का दायरा इतना व्यापक हो गया था कि उसकी उपेक्षा करने का शायद ही किसी देश में साहस हो।इसलिए जब मैं बेलग्राद पहुंचा तो मार्शल टीटो जैसा महान नेता आज भी दूसरे देशों के लिए चुनौती माना जाता था। गुटनिरपेक्ष देश होने के नाते यहां के लोगों को हर तरह के बुनियादी अधिकार प्राप्त हैं, सूचना का अधिकार संविधान में निहित है जिस के चलते हर किसी को सरकार के कार्यों की जानकारी पाने का हक़ है। प्रेस पूरी तरह से आज़ाद है। यहां के अधिसंख्य समाचार पत्र औऱ पत्रिकाएं सर्ब और क्रोशियन भाषाओं में छपती हैं लेकिन विदेशी भाषाओं को अपने समाचारपत्र निकलने या विदेशों से मंगाने की पूरी छूट है। समाचार एजेंसी तानजुंग सभी भाषाओं के पत्रकारों में खासी लोकप्रिय है। वहां पत्रकारों से यही अपेक्षा की जाती है कि एक तो मार्शल टीटो की घोषणा नीतियों की अवहेलना न हो और दूसरे गुटनिरपेक्षता की उपेक्षा न हो।

होटल से बाहर निकला। थोड़ी दूर चलने पर एक बड़ा लम्बा चौड़ा बाजार देखा।दोनों तरफ दुकानें थीं।लोग पैदल ही चल रहे थे। न कोई साईकल, स्कूटर, टैक्सी थी और न ही कोई प्राइवेट कार। बताया गया यहां यातायात की मनाही है, ग्राहक पैदल चल कर खरीददारी करते हैं। सहसा मुझे दिल्ली के अजमल खान और करोलबाग याद आ गयी जहां की भीड़ और ट्रैफिक की गड्डमड्ड से खरीददारी का मज़ा ही किरकिरा हो जाता है। बताया गया कि बेलग्राद का यह पैदल बाजार दो किलोमीटर से ज़्यादा लंबा है। मैंने भी वहां कुछ देर चहलकदमी की लेकिन वह बाजार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।उसी बाजार में घूमते हुए मुझे चार हिंदुस्तानी मिल गये जो अपने आप को लुधियाना का बता रहे थे।एक कहता है कि वह पहले भी तीन बरस यूरोप में रह चुका। वे वहां से ग्रीस जाने की जुगाड़ में थे। एक बार ऐसे ही मुझे पोलैंड की राजधानी वॉरसॉ में भी कुछ लोग मिल गए थे। लगता है ये लोग बेचारे ट्रेवल एजेंटों के मारे थे । अब मुझे लगा कि मैंने अपने पासपोर्ट पर मोहर लगवा कर अच्छा ही किया। इतवार को मैं चर्च देखने चला गया। खूब रौनक थी।बड़ी तादाद में लोग आ जा रहे1थे, शादी की पोशाक में कुछ जोड़े भी। युवाओं की संख्या भी खासी थी। इबादत करने के लिए कुर्सियां भी रखी थीं।कुछ बुज़ुर्ग दीवार के साथ सटी कुर्सियों पर धंसे हुए थे। सब कुछ1बहुत अनुशासित था। अर्थ यह कि युगोस्लाविया में धर्म की आज़ादी है।

बेलग्राद डेन्यूब नदी के दोनों छोरों पर बसा है। युगोस्लाव डेन्यूब को दुनाव कहते हैं। इस नदी के एक छोर पर पुराना शहर है जबकि दूसरे छोर पर नया। वहां के1वास्तुशिल्प को देखकर पुराने और नये बेलग्राद की पहचान सहज हो जाती है। पुराने शहर के मकान सामंतवाद का प्रतीक दीखते हैं, अधिक ऊंचे नहीं बल्कि ज़्यादा खुले हुए। इनके बीच नये और ऊंचे मकान बन1गए हैं। लेकिन पुरानों की भव्यता बरकरार है। नये बेलग्राद में कई मंज़िला इमारतें हैं जो आधुनिक वास्तुकला का प्रतीक लगती हैं। यहां पर विभिन्न कारखानों की तरफ से अपने कर्मचारियों के लिए फ्लैट भी बनाए गए हैं।  युगोस्लाविया में निजी संपत्ति रखने का भी लोगों को अधिकार है और वहां पूंजीपतियों की कमी नहीं।नये बेलग्राद में ज़्यादातर नई आबादी ही है जो अपने आपको पुराने शहर से कटी हुई लेकिन अधिक आज़ाद पाती है। कई लोग तो अपने पुराने घरों को छोड़ या बेचकर नये बेलग्राद के फ्लैटों में शिफ्ट हो गए हैं। इन फ्लैटों को आधुनिकता की सोच शायद इसलिए माना जाता है क्योंकि इन फ्लैटों में बुद्धिजीवी, चित्रकार, अन्य शिल्पों से जुड़े संस्कृति प्रेमी निवास करते हैं। कुछ लोग नये बेलग्राद को अधिक संपन्न, ताज़ा आबोहवा वाला, स्वच्छ पर्यावरण से सुकून भरा मानते हैं। यहां की रौनक और ग्लैमर  आम युगोस्लाव को पश्चिम यूरोप के करीब होने का बोध कराता है। यहां पर हर तरह का विदेशी साहित्य उपलब्ध है, 80 प्रतिशत युवा अंग्रेज़ी पढ़ना पसंद करते हैं जबकि 20 फीसदी ही जर्मन, फ्रेंच आदि में दिलचस्पी है। रूसी भाषा के प्रति रुचि नहीं के बराबर है। यहां पर मार्शल टीटो के चित्र खूब चिपके हुए दीखे। एक तो गुटनिरपेक्ष दिवस के कारण और दूसरे मार्शल टीटो के 40 बरसों से सत्तारूढ़ होने की वजह से। यूरोप के ज़्यादातर देश नदियों के आसपास हैं या नदियां शहरों के बीचोंबीच बहती हैं जैसे मस्क्वा नदी शहर में सांप की तरह बहती है, पीटर्सबर्ग की नीवा नदी और उसकी शाखाएं शहर को घेरे हुए हैं, लंदन में थेम्स और हंगरी में बुदापेश्त की कहानी भी डेन्यूब के दोनों छोरों के आसपास की कथा ही कहती है।

सोमवार को मुलाकातों के दौर चले। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से बातचीत हुई तो सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों से मिलने और संस्थाओं को देखने के अवसर मिले।विदेश मंत्रालय में मार्शल टीटो की प्रशस्तिगान हुआ औऱ गुटनिरपेक्ष आंदोलन में उनकी भूमिकाओं को रेखांकित किया गया तो सवाल यह भी उठा कि उनके बाद इस आंदोलन का क्या होगा। बेलग्राद में टीटो के बाद युगोस्लाविया की एकता और अखंडता पर भी चर्चा हुई। उस समय भी यह साफ नहीं था कि टीटो के बाद क्या होगा। मीडिया के लोगों से बातचीत करने पर यह आभास तो हो गया कि टीटो के बाद युगोस्लाविया को विघटन अवशम्भावी है, किसी दूसरे नेता में इसे एकजुट रखने की न तो ताकत है और न ही रुतबा। इन सरकारी और सामाजिक लोगों के अलावा भारतीय दूतावास के प्रेस कॉउंसलकर श्री तवाकली से भी भेंट हुई। पहले तो उन्होंने अपनी कार से बेलग्राद का नगर दर्शन कराया। उस समय यह शहर बहुत ही खूबसूरत, साफ सुधरा और दिलकश नज़र आया। प्रेस की स्वाधीनता के बारे में उनकी राय थी कि अन्य समाजवादी देशों की तुलना में मार्शल टीटो के रहते इस देश में काफी स्वतंत्रता है।उनके घर जाने, दूसरे कई राजनियको से मिलने के साथ साथ श्रीमती तवाकली के हाथों का घरेलू भोजन करने का भी लुत्फ उठाया।

चार दिन के अपने प्रवास में युगोस्लाविया को कई कोणों और पहलुओं से देखने समझने का अवसर मिला। एक यूगोस्लाव लेखिका ग्रोजदाना ओलिच भी मिलने के लिए आयीं। उन्ही4बताया कि उनके पांच उपन्यास छप चुके हैं।अंग्रेज़ी के अमेरिका या इंग्लैंड में छपते हैं जबकि एकउपन्यास पंजाबी और  हिंदी में भी छपा है। उन्होंने अज्ञेय और अमृता प्रीतम की कुछ कविताओं का सर्ब भाषा में अनुवाद किया है जिसे वहां बहुत पसंद किया गया। वह राजपाल प्रकाशन के महेंद्र कुलश्रेष्ठ से भी परिचित हैं जिनका ज़िक्र उन्होंने अपनी बातचीत में कई बार किया। दिल्ली लौटकर मैं ने महेंद्र कुलश्रेष्ठ को ग्रोजदाना ओलिच का अभिवादन निवेदित कर दिया।

युगोस्लाविया की इस यात्रा को मैं यादगार और महत्वपूर्ण इस मायने में मानता हूं कि तब युगोस्लाविया एक देश था और।आज वह तीन देशों में विभाजित हो गया है सर्बिया, स्लोवेनिया औऱ क्रोशिया में। यह भी विडंबना है कि मार्शल टीटो का जन्म  मई, 1892 में क्रोशिया में हुआ, 4 मई, 1980 में निधन स्लोवेनिया में हुआ तथा दफन 8 मई, 1980 को बेलग्राद में किये गये।उनके निधन के बाद शुरू में आवर्ती व्यवस्था से शासन चलाने का प्रयास हुआ । जब यह प्रयोग सफल नहीं हुआ तो  तीनों इकाइयों ने अलग हो जाने में ही भलाई समझी। इसी प्रकार सोवियत संघ बनाने  और उसे संगठित रखने में लेनिन, स्टालिन, ख्रुचेव, ब्रेज़्नेव काफी हद तक कामयाब रहे लेकिन मिखाइल गोर्बाचेव का पेरेस्त्रोइका उन्हें 15 देशों के रूप में आज़ादी दे गया दिसंबर 1990 में। जर्मनी के विली ब्रांट के प्रयास दो जर्मनी को 3 अक्टूबर, 1990 को एकजुट कर गये। ये सभी बेशक़ ऐतिहासिक और साहसिक फैसले थे जो सदा यादगार पल रहेंगे।

शनिवार, 30 मई 2020

अजित जोगी की यादों के संग पल दो पल / शिशिर सोनी




तब अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे। मैं दैनिक भास्कर दिल्ली में विशेष संवाददाता था। मैंने एक खबर लिखी, "सीबीआई ने चार्जसीट किया तो जोगी का जाना तय..." खबर रायपुर लैंड करते ही मेरा मोबाइल बजा। शिशिर जी नमस्कार, जोगी साहेब बात करेंगे - नरेश कुमार की आवाज थी। नरेश तब जोगी के राजनीतिक सलाहकार थे। उसके बाद आवाज थी जोगी जी की - ये क्या लिखा है आपने। कौन सीबीआई मुझे चार्जसीट कर रही है और मैं कहाँ जा रहा हूँ ? आप इस खबर को रोकें। ये गलत खबर है। मैंने कहा खबर तो चली गई। रुक नहीं सकती। तब अजीत जोगी अपने रौ के नेता थे। अखबार के दफ्तर में भी उनके खबरी होते थे। तभी तो मेरी खबर छपने से पहले ही उन्हें पता चली।

श्यामाचरन शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल जैसे नेताओं को पानी पिलाकर छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने थे। सोनिया गांधी से बेहद करीब रहे। इतने करीबी की मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद जोगी को सीधे सीएम बनाकर सोनिया गांधी ने उन्हे रायपुर भेज दिया था। वे चाहते तो सीधे भास्कर के चेयरमैन स्वर्गीय रमेश चंद अग्रवाल जी से बात कर सकते थे, लेकिन उन्होंने मुझे साधने के प्रयास में कुछ आड़ी तिरछी बात कर दी। मैंने फोन बंद कर दिया। उन्होंने बाद में रमेश जी को फोन मिलाया था क्या बात हुई मुझे आज तक नहीं पता, लेकिन वो खबर तब प्रमुखता से छपी थी। उसके बाद मेरे रिश्ते जोगी जी से खराब हो गए। दिल्ली आयें तो कोई बात मुलाकात नहीं। सब बन्द।

हमारे बीच बातचीत की शुरुआत रेणु भाभी ने कराई। जोगी जी की पत्नी डॉक्टर रेणु जोगी तब दिल्ली के अस्पताल में जोगी जी की सेवा में थी। जोगी जी का भारी सड़क एक्सिडेंट हुआ था। उसी के बाद वे व्हील चेयर पर रहे। बात मुलाकात बढ़ी। हमारी दोस्ती प्रगाढ़ हो गई। वे मुझे अच्छी तरह समझ गए। फिर खुल गए।    बेतकल्लुफ्फी से राजनीतिक, गैर राजनीतिक, पारिवारिक हर तरह की सलाह वो गाहे बगाहे लिया करते थे। सलाह मानते भी थे। मैं बिना लागलपेट के साफ साफ बात करता था, जो उन्हें अच्छा लगता था।

उन दिनों वीसी शुक्ल से उनकी ठनी हुई। राजनीति तक तो ठीक है मगर घर में इकलौते बेटे की शादी हो और वीसी शुक्ल जैसे कद्दावर नेता को न्यौता न जाए ये उपयुक्त नहीं, मैंने जोगी जी को बिना मांगे सलाह दिया। वे चौंके, पूछा आपको कैसे पता चला कि उनको न्यौता नहीं गया। जरूर गया होगा। मैंने कहा, नहीं गया मेरी शुक्ल जी से फोन पर बात हुई उनसे पूछा कि अमित की शादी में आप आ रहे हैं न... उन्होंने छूटते ही कहा, मुझे कार्ड किसने दिया? जोगी जी से इसे तुरंत correct करने को कहा। जोगी जी ने बात मानी। अगले दिन रेणु भाभी और अमित खुद कार्ड लेकर वीसी शुक्ल जी को सम्मान के साथ बुलाने गए। वो शादी में भी आये।

अभी ताबियत खराब होने और अस्पताल में भर्ती होने के पहले दो दिन तक बातें हुई। वे बेहद प्रसन्न थे। कुछ ही दिनों पहले कहा था मेरी उम्र चालीस के बाद ठहर गई है। मैं खुद के अंदर चालीस बरस सा ऊर्जा महसूस करता हूँ।

खैर, जोगी जी से मेरी आखिरी बात। उनकी सालों सेवा करने वाले उनके कई निजी सुरक्षाकर्मियों में से एक ने फोन कर कहा, साहेब बात करेंगे। फिर उधर से खनकती हुई आवाज आई, और शिशिर भाई सब ठीक है दिल्ली में? मैंने अपनी बेहतरीन आत्मकथा पूरी कर ली है। उसमें वो सब कुछ है जो अब तक किसी को नहीं पता। रेणु को भी नहीं। अब आप ये सलाह दीजिये की किस publication से छपवाया जाए? मैंने कहा, हिंदी और अंग्रेज़ी दोनो में penguine से छपवाया जायेगा। वो बोले वाह, बढ़िया सुझाव है। अभी प्रूफ रीडिंग चल रही है। उसके बाद सॉफ्ट कॉपी आपको भिजवाता हूँ। आप भी देख लेना। मैंने कहा बिल्कुल, बहुत बधाई आपको। मैंने चुटकी भी ली, मगर रेणु भाभी ने जो आप पर पुस्तक लिखी है उससे कम बिक्री होने दूंगा। वो ठठाकर हँसे। बोले लॉकडाउन खुलता है तब दिल्ली आता हूँ। मगर नियति को कुछ और मंजूर था। बार बार मौत से जीत कर लौटे योद्धा इस बार हार गए। अस्पताल से वापिस न लौट सके।

छत्तीसगढ़ के कण-कण में अजीत जोगी वर्षों तक अपने होने का एहसास कराएंगे।

जमीन से जुड़े इस नेता को मेरा सलाम

बुधवार, 27 मई 2020

जर्मनी की चुनावी यात्रा / त्रिलोकदीप




पश्चिम जर्मनी की राजधानी बोन में चुनावी प्रेस कांफ्रेंस के बाद एक जर्मन पत्रकार से बातचीत बहुत उपयोगी रही। वह भारत रह चुका था और हमारे यहां के लोकसभा चुनाव कवर भी कर चुका था। दोनों देशों के बीच की चुनावी पद्धित के अंतर की जानकारी पहले दी जा चुकी है। उस पत्रकार से बातचीत के बाद मैं ने यह तलाशने की कोशिश की क्या क्या कोई दूसरा पत्रकार भी भारत से आया। वह तो नहीं मिला किंतु जर्मन रेडियो डॉयचे वेले के राम नारायण यादव और सुभाष वोहरा दीख गये। थोड़ी दूर पर रजत अरोड़ा भी खड़े दिखाई दिये। राम नारायण यादव औऱ रजत अरोड़ा दोनों दिनमान के लिए लिखते हैं। अच्छा लगा उनसे मिलकर। सुभाष वोहरा पुराने परिचित हैं। विजय क्रांति से बाद में मुलाकात हुई। इन लोगों से भी कुछ चुनावी टिप्स लिये। इन लोगों से यह वादा भी किया कि जर्मनी छोड़ने से पहले उनसे मुलाकात होगी।रजत ने घर चलने का वचन लिया। इस मुलाकात के बाद अतिरिक्त ऊर्जा महसूस की।

अब हम पत्रकार कई हिस्सों में बंट गये। मेरे साथी बांग्लादेशी पत्रकार हो लिया और हमारी गाइड थी रोनाडा ब्लोक।बहुत ही प्रतिभाशाली और वहां की चुनावी प्रक्रिया की जानकार। उसकी शक्ल कुछ कुछ इंदिरा गांधी से मेल खाती थी।उसने बताया कि यहां का चुनाव कई तरह से होता है जैसे नुक्कड़ सभाएं, हाल में होने वाली मीटिंग्स औऱ सार्वजनिक सभाएं। रोनाडा के अनुसार ये के नेता नुक्कड़ सभाओं को अधिक तरजीह देते हैं। इन सभाओं में 50 से 100 लोग होते हैं जिनसे पार्टियों के बड़े बड़े नेता मिल कर अपनी और अपनी पार्टी के विचार रखते हैं। हमें पहले कार्नर मीटिंग्स में ले जाया गया। बहुत ही दिलचस्प नज़ारा था। किसी पार्टी के मंत्री से लोग तरह तरह के सवाल पूछ रहे थे और वादे ले रहे थे जो जीतने पर पूरे करने लाज़िमी थे। ज़्यादातर नेता अंग्रेज़ी बोलते और समझते हैं हम भी उनसे लगे हाथ प्रश्न पूछ  लेते। इस तरह इन नुक्कड़ सभाओं के चलते मेरे तो कई एक्सक्लूसिव इंटरव्यू तैयार हो गये। रोनाडा से जब मैंने पूछा कि ये नेता जो लोगों से वादे करते हैं जीतने पर उन्हें वाकई पूरा भी करते हैं कि कहत हैं कि चुनाव गये तो उसके साथ वादे भी गये। रोनाडा का उत्तर था कि नेता मुकर नहीं सकते क्योंकि वादा उस स्थान विशेष के बहुत लोगों के सामने किया गया होता है जिसे पूरा करना अनिवार्य होता है।आखिर पार्टी की साख का सवाल होता है।

बोन के अलावा हम लोगों जितने भी शहरों में गये रोनाडा ब्लोक हमारे साथ रही। इसका लाभ यह हुआ कि चुनाव कवर करने के साथ साथ उन शहरों की विशेषता भी जानते रहे। जर्मनी का हनोवर नगर औद्योगिक मेलों के आयोजन के लिये जाना जाता है। जहाजों का निर्माण भी हनोवर में होता है और राजनीतिक तौर पर भी यह महत्वपूर्ण नगर है। रोनाडा ने बताया कि यहां आज एस पी डी की सार्वजनिक सभा है जिस में पूर्व चांसलर विली ब्रांट और वर्तमान चांसलर हेल्मुट श्मिड्ट भाग ले रहे हैं। हमारे लिए यह बहुत ही बढ़िया मौका था। रोनाडा ने हम दोनों को अच्छीजगह बिठा दिया। वहां की जर्मन में होने वाली कार्यवाही को हमें वह अंग्रेजी में बताती रही। ब्रांट और श्मिड्ट के भाषणों का भी उसने सारांश बताते हुए कहा कि जिस तरह से जर्मनी की प्रगति और  विकास की दिशा में पूरी ईमानदारी के साथ उनकी पार्टी कृतसंकल्प है उसमें और बढ़ोतरी होगी। दूर से विली ब्रांट ने मुझे देख लिया और पहचान लिया। एक साल पहले जब वह दिल्ली आये थे2तब मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। आज भी बड़े तपाक से मुझे वह मिले और श्मिड्ट से भी मेरा परिचय कराया।उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस बार फिर उनकी पार्टी की विजय होने वाली है। उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई। बेशक़ ब्रांट को मैं जर्मनी का शिखर और श्लाघा पुरुष मानता हूं।

हनोवर के बाद हम लोग हैम्बर्ग गये। यह सुंदर शहर अपनी बंदरगाहों, अनेकानेक पुलों और ऑटोबान के लिए प्रसिद्ध है।यहां की ऑटोबान व्यवस्था को देखने के लिए दुनिया भर से न सिर्फ सैलानी ही आते हैं बल्कि परिवहन के क्षेत्रों में रुचि रखने वाले मंत्री और विशेषज्ञों की टोलियां भी। ऑटोबान ने केवल हैम्बर्ग की ही नहीं पूरे  यूरोप की यातायात व्यवस्था संतुलित कर रखी है। अलावा इसके यह शहर अपनी रंगीली रातों के लिए भी जाना जाता है। यहां का रिपेबन रंगीन मिज़ाज़ लोगों से भरा रहता है। रोनाडा ने कहा कि आप चाहें तो एक चक्कर लगा आयें मैं बाहर का इंतज़ार करूंगी। रस्मअदायगी के तौर पर रिपेबन को देखने के बाद बाहर आकर रोनाडा के साथ हो लिये। यह भी बताया गया कि लंदन औऱ पेरिस जैसे सारी रात जागने वाले नगरों में हैम्बर्ग भी शामिल हो गया है।राजनीतिक तौर पर भी हैम्बर्ग जागरूक और महत्वपूर्ण नगर है और चांसलर श्मिड्ट यहां से ही चुनाव जीतते आये हैं। उस1सार्वजनिक सभा के अतिरिक्त कुछ नुक्कड़ सभाएं भी देखीं जो बोन जैसी ही दीखीं।
जर्मनी अपने विश्वविख्यात विश्विद्यालयों के लिए भी ख्यात है। यहां के कोलोन और हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय जग प्रसिद्ध हैं। भारतीय संस्कृति और साहित्य के बारे में ये विश्विद्यालय अक्सर चर्चित रहे हैं। यहां मुझे हिंदी के विद्धवान मयान मिले जिन्होंने बताया कि हिंदी के साहित्यकार सच्चिदानंद वात्स्यायन कई बार विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर इस विश्वविद्यालय में आ चुके हैं। यह भी पता चला कि हिंदी और बांग्ला के जर्मन विद्वान लौठार लुत्से वात्स्यायन जी के अनन्य मित्रों में हैं और दोनों का एक दूसरे के देश में आना जाना लगा रहता है। यहां पर एक विशाल हाल में चुनावी सभा हुई सी डी यू की। वहां लोगों को व्यवस्थित तरीके से बिठाया गया। नेताओं ने आकर अपनी पार्टी औऱ उम्मीदवार की खूबियों का बखान किया।तालियां बजीं। कुछ उत्साही लोगों ने मेरा भी स्वागत किया। 40 बरस पहले शायद वहां कोई सिख नहीं पहुंचा था।
पश्चिम बर्लिन की चुनावी रौनक देखने के बाद मैं पूर्व बर्लिन भी गया।जर्मन दीवार पार करने के बाद मैं पूर्व जर्मनी की राजधानी पूर्व बर्लिन में प्रवेश कर गया। घंटे भर चहलकदमी करने के बाद मुझे कुछ ऐसी खुशहाली या जगमग दिखाई नहीं दी जो पश्चिम बर्लिन के जोड़ की हो।वहां सन्नाटा पसरा हुआ ही नज़र आया। दोनों भागों की शासन प्रणाली और लोगों के चेहरों के हावभाव से दोनों ओर के फ़र्क़ को महसूसा जा सकता था। लौटने पर मेरी बर्लिन वाली गाइड ने शरारती अंदाज़ में पूछा, कहो कैसा लगा हमारा बिछुड़ा भाई।

बहुत ही मज़ेदार रही पश्चिम जर्मनी की यह चुनावी यात्रा। जीत एस पी डी की हुई। श्मिड्ट पुनः चांसलर बने। एफ डी पी के साथ
गठबंधन सरकार। दिल्ली में जर्मनी के उपराजदूत रहे जॉन वेगनर से बोन में मुलाकात हुई। उनके घर भी गया। बहुत स्वागत सत्कार हुआ। रजत अरोड़ा के घर भी गया। उनकी जर्मन पत्नी औऱ दो बच्चों से भी मिला। एक औऱ यादगार मुलाकात। रेडियो जर्मन भी गया। विजय क्रांति और सुभाष वोहरा के साथ उनके जर्मन बॉस भी मिले। यात्रा के बारे और जर्मन जीवन शैली पर कुछ रिकॉर्ड कराया। वहां पर आपको एक मशीन के सामने बिठा दिया जाता है। उसमें सारी व्यवस्था होती है कि कैसे अपनी गलती कैसे ठीक करनी है। बाहर शीशे के बाहर आपको इशारे देने वाला कोई  व्यक्ति नहीं मिलेगा।

अगले दिन मैं लंदन के लिए रवाना हो गया। पहली बार मैं अकेला वहां गया था। हीथ्रो एयरपोर्ट पर उतर कर इमीग्रेशन की राष्ट्रकुल वाली लाइन में मैं खड़ा हो गया।मैं दिल्ली से वीज़ा लेकर नहीं गया था। तब राष्ट्रकुल देशों के लिए वीज़ा लेने की ज़रूरत नहीं होती थी। इमीग्रेशन अधिकारी ने मुस्कराते हुए स्वागत किया और मेरे पासपोर्ट पर एक मोहर लगा दी जिसके अनुसार मुझे  6 माह तक वहां रुकने की इजाज़त थी। 1975 से लेकर 1983 तक मैं जितनी बार भी लंदन गया बिना वीज़ा के ही गया। ब्रिटेन की अपनी पांच यात्राओं पर फिर कभी।

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कोरोनाः अब गांव की बारी / काली शंकर उपाध्याय





*काली शंकर उपाध्याय

*Covid-19 कोरोनावायरस स्पेशल*

*अब गांव की बारी*
*एक तरफ पूरा विश्व को रोना जैसी वैश्विक महामारी से परेशान है तो दूसरी तरफ भारत भी इस लड़ाई में किसी से कम नहीं इस लड़ाई में भारत में तमाम व्यवस्थाएं कर भारत जैसे बड़े देश में सुविधाओं के कमर कसे वही दूसरी तरफ मेडिकल सुविधाओं में भी बहुत सारे सुधार किए. कोरोनावायरस एक भयानक रूप ना ले ले इसलिए पूरे देश को लाक डाउन कर दिया गया लेकिन इस लाक डाउन के बीच गरीब तबके के लोग मध्यमवर्गीय लोग  या यूं कहें कि पूरे देश में हमारे कामगार साथी जिन मिल फैक्ट्री में कार्य करते थे उन मिल फैक्ट्रियों में भी लाक डाउन का ताला लग गया और सभी को अपने रोजी रोटी की तंगी आने लगी इसी कारणवश शहरी क्षेत्र में रहने वाले लोग जैसे मुंबई दिल्ली कोलकाता हरियाणा पंजाब गुजरात तमाम मेट्रो सिटी में रहने वाले लोगों को अपनी रोजी-रोटी पर आन पड़ी इसी को देखते हुए लोगों में एक भयावह स्थिति आ गई कि अगर में ऐसे ही चलता रहेगा तो हम क्या खाएंगे और कहां रहेंगे किराए के मकान में रह रहे लोगों को यह भी चिंता सताने लगी कि हम कमरे का किराया कहां से देंगे इसी को देखते हुए मजदूर मेट्रो सिटी से जब गांव की तरफ पलायन किया तो कोई पैदल कोई ट्रक कोई बस कोई साइकल कोई रिक्शा जो जैसे आ रहा था वैसे गांव की तरफ कूच कर दी अब गांव में कोरेंटिन  की क्या व्यवस्था है क्या व्यवस्था नहीं है इस पर बहुत सारा सवाल खड़ा होता है कि गांव में क्या व्यवस्था है गांव में सरकारी स्कूल प्राइमरी मिडिल या पंचायत भवन में कितने लोग आ सकते हैं या कितने लोग रह सकते हैं इसके अलावा भी एक सवाल यह है कि जो लोग दिल्ली मुंबई मेट्रो सिटीज से गांव की तरफ आये है या गांव  तरफ आ चुके हैं वह कोरेंटिन व्यवस्था को कितना महत्व देते हैं स्थिति अब शहर से गांव की तरफ चली  आ रही है और भारत में अब गांव की कोरोनावायरस रहा  है जैसा कि नतीजा आप लोगों के सामने दिख रहा है कि हर तरफ कोरोना का तांडव हर गांव से लेकर शहर तक चल रहा है अभी तो शहरों में सुना जा रहा था लेकिन जब से पलायन चालू हुआ है तब से कोरोना अपना तांडव गांव में भी चालू कर दिया है सोचने वाली बात यह है कि गांव में जहां लोग दो वक्त की रोटी के लिए दिन-रात खेत में मेहनत करते हैं तो कोरोना जैसी महामारी से क्या भारत का गांव लड़ पाएगा अब शहर में तो जो कोरोना की पॉजिटिव केसेस थे वह थे ही लेकिन अब सबसे ज्यादा कोरोना गांव में होगा बरहाल अगर मेट्रो सिटी से आए लोग गांव में सही तरीके से कोरेंटिन रहे तो कोरोना पर काबू पाया जा सकता है मैं निजी तौर पर और पूरे देश के मेट्रो सिटीज में रह रहे लोग जो गांव की तरफ पलायन कर रहे हैं उन से निवेदन करता हूं कि वह शहर से गांव में आ रहे हैं तो आए लेकिन कोरेंटिन व्यवस्था को100% पालन करें*



*हिमांशु पाठक मानवाधिकार मीडिया मंडल प्रभारी वाराणसी*

मंगलवार, 26 मई 2020

एडवरटाईजमेंट की तिलिस्मी दुनियां





१९७० में हम उदयपुर में रहते थे. राजेंद्र कुमार और आशापारिख की नाइट होने वाली थी. फिल्म स्टारों का उन दिनों आज से भी ज्यादा क्रेज था. हम भी देखने गए. प्रवेश की शर्त क्या थी सुनकर आप को आश्चर्य होगा. प्रवेश टिकिट था कैवेंडर सिगरेट के दो पैकेट खरीदने होंगे. उन्हें गेट पर दिखाओ तब अंदर जा सकते हैं.
आप में से बहुत से मेरी उम्र ले लोगों को याद होगा कि कोल्डड्रिंक फेंटा पहले 'फेंटा ऑरेंज' के नाम से बिकता था जबकि उस पेय में शंतरे के रस का एक छींटा भी नहीं है. बाद में कानून की सख्ती के बाद मजबूरन कंपनी ने बंद किया.
कोलगेट टूथपेस्ट के विज्ञापन में एक प्लेट में पानी के ऊपर कोयले का पाउडर फैला दिया जाता था. फिर उसने एक बूँद कोलगेट की डाली जाती थी. पानी की सतह से कार्बन एक और फ़ैल जाता था. आजकल डेटोल का विज्ञापन भी उसी तरह का आता है. आप इस तरह का प्रयोग करें. किसी भी क्षार या साबुन की एक बूँद डालने पर वो सतह पर फ़ैल जाता है. एक विज्ञापन में प्लास्टर पेरिस की सीप बनाकर उसपर कोलगेट मला जाता है और फिर दो सीपों को टकराया जाता है. जिसपर कोलगेट नहीं लगा वो टूट जाती है. इसकी कोई प्रमाणिकता नहीं है.
फेयर एन लवली नाम की फेसक्रीम बरसों से महिलाओं को गोरा बनाने का दावा कर रही है जबकि विज्ञान ये सुनिश्चित कर चूका है कि इंसान की त्वचा का रंग स्थाई तौर पर बदलना असंभव है.
कई टैल्कम पाउडर ये कहकर बेचे जा रहे हैं कि इन्हे लगाने के बाद एयरकंडीशन लगाने की आवश्यकता नहीं है. पूरा शरीर ठंडा रहेगा जबकि विज्ञान के अनुसार किसी पाउडर से शरीर का तापमान नहीं गिराया जा सकता है.
डव जैसे कई साबुन ये दावा करते हैं कि उनमे क्रीम सम्माहित है जबकि क्रीम और साबुन अर्थात क्षार एक दुसरे के दुश्मन हैं. साबुन का काम ही चिकनाई और उसके साथ चिपकी गन्दगी को हटाना है. यदि उसमे क्रीम होगी तो फिर वो साबुन नहीं रहेगा.
अधिकतर फ्रूट जूस के नाम से बिकने वाले पेय में ५ से २० प्रतिशत फ्रूट पल्प रहता है. शेष अत्यंत हानिकारक फ़ूड कलर और प्रेजर्वेटिव भरे रहते हैं. रूहअफजा नामक शरबत में भारी मात्रा में लाल रंग, नकली खुशबू और हानिकारक प्रिजर्वेटिव भरा पड़ा है. बोतल पर पढ़कर देख लीजिये.
आजकल टेलीवीजन पर ब्रू कॉफी का विज्ञापन बहुत बढ़िया तरीके से मूर्ख बनाने का प्रयास करता है. पत्नी अपने पति को चाय की जगह कॉफी बनाकर देती है. पति प्रश्न करता है कि चाय मांगी थी कॉफी क्यों तो पत्नी कहती है इसलिए क्यों कि अभी आप को बैग उठाने की मेहनत करनी है". सबसे मजेदार बात अब सुनिए. विज्ञापन में नीचे छोटे अक्षरों में लोखा रहता है "क्यों कि चाय में ६५% दूध डाला जाता है और कॉफी १००% मिल्क के साथ प्रैफर की जाती है इसलिए कॉफी में दूध की कैलोरी अधिक हो जाती है. अर्थात आप कैफीन के हानिकारक नशे को दूध की ताकत के बहाने शक्ति शाली पेय के रूप में बेचकर आँखों में धूल झोंकना चाहते हैं.
सावधान रहिये. आँखे खुली रखिये. दुनिया आप को टोपी पहनाने को तैयार बैठी है.

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नेहरू की पहचान को खत्म करना सरल नहीं /विवेक शुक्ला




नेहरु की विरासत कैसे मिटाओगे

विवेक शुक्ला

पंडित जवाहरलाल नेहरु का अपने जीवन काल में ही कद इतना ऊंचा हो गया था कि देश उनके बिना रहने की कल्पना भी नहीं करता था। उनकी मृत्यु से एक साल पहले प्रख्यात अमेरिकी पत्रकार वेल्स हैंगन ने एक किताब लिखी थी,  ‘आफ्टर नेहरु हूं ?’  गांधी जी की 1948 में हत्या और फिर सरदार पटेल का 1951 में निधन उन्हें पूरा मौका देता था कि वे लगभग निरंकुश भाव से देश को चलाते। इसके विपरीत उन्होंने संसद में छोटे,बंटे हुए पर बेहद संभावनाओं से लबरेज विपक्ष के हमलों को झेला। उन्हें उनकी ताकत (संख्या बल) से अधिक महत्व दिया। नेहरु बहुत शिद्दत के साथ मानते थे कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सशक्त विपक्ष अनिवार्य है।

नेहरु की संसदीय लोकतंत्र के प्रति आस्था का एक उदाहरण लीजिए। वे चाहते तो देश के पहले लोकसभा चुनाव को देश के विभाजन और शरणार्थियों के पुनर्वास का बहाना बनाकर टलवा सकते थे। उन्होंने यह नहीं होने दिया। इसके विपरीत उन्होंने पहले लोकसभा चुनाव में साम्प्रदायिक ताकतों को पानी पिला दिय़ा जो भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की वकालत कर रहे थे।
पहले लोकसभा चुनाव की कैंपेन के दौरान नेहरु जी ने 25 हजार किलोमीटर का सफर तय किया। उन्होंने देश के चप्पे-चप्पे में जनता को संबोधित किया। उस कैंपेन के बारे में उन्होंने लेडी माउंटबेटन को 3 दिसंबर,1951 में एक पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि “इस कैंपेन से मुझे भारत और भारत की जनता को एक बार फिर से जानने-समझने का मौका मिला। दिल्ली में सरकार का कामकाज करते हुए मैं जनता से दूर हो गया था।”
 नेहरु ने जनता से सीधा संपर्क और संबंध बनाया। उन्होंने देश के हरेक नागरिक को यह अधिकार दिया कि वह उनसे बिना समय मिल सकता था। वे रोज एक घंटे लोगों के दुख-दर्द सुनते थे।

मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखना
नेहरु जी अक्तूबर 1947 से लेकर दिसंबर 1963 तक हर महीने की पहली और 15 तारीख को राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखते रहे। उसमें वे अपनी सरकार की नीतियों को विस्तार से बताते-समझाते थे। वे मुख्यमंत्रियों से फीड बैक भी लेते थे। उनके पत्र लंबे होते थे। उनमें सरकार की देश-विदेश नीति पर बात होती थी। उनके पत्रों को पढ़कर समझ आता है कि वे किसी विजनरी और बेहद समझदार इंसान ने लिखे हैं।हां, कभी-कभी पत्रों में ज्ञान देने वाला भाव भी झलकता है। लेकिन, नेहरु जिस कद के नेता थे, उसमें अगर वे कभी-कभार ज्ञान देने वाले अंदाज में लिखे तो इसमें क्या बुराई है। उन पत्रों में वे बिना केस चलाए किसी को जेल में बंद रखने,पुलिस फायरिंग और इनसे मिलते-जुलते मसलों पर भी अपनी राय रखते थे।

नेहरु ने अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में यह सुनिश्चित किया कि सरकार और धार्मिक मामलों के बीच किसी तरह का कोई घालमेल ना हो। वे चाहते थे कि साम्प्रदायिक्ता का जहर सेना या नौकरशाही पर कभी असर ना डाले। उनका मानना था कि कानून की नजरों में हर भारतीय एक हो जिससे साबित हो कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है ।

 यूं तो स्वाधीनता की जंग में अनेक नेताओं और जनता की भागेदारी रही,पर विधि को यही मंजूर था कि नेहरु ही देश की लंबे समय तक बागडोर संभाले। अपने 17 वर्षों के प्रधानमंत्रित्वकाल के दौरान नेहरु ने भारत के लोकतंत्र को उसके शैशवकाल से परिपक्व होता देखा।
लोकतंत्र का मतलब
उनके दिल के बेहद करीब थी जम्हूरियत और मानवाधिकार। एक बार नेहरु ने कहा भी था, “मैं लोकतांत्रिक व्यवस्था के सवाल पर कोई समझौता नहीं कर सकता।“ इससे उनके लोकतांत्रिक मूल्यों में गहरी आस्था साफतौर पर झलकती है। उनके लिए लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ मतदान,मतगणना या फिर चुने हुए नुमाइंदों से सरकार का गठन ही नहीं था। वे इससे आगे जाकर सोचते थे।
पशिचम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधान चंद्र राय को 25 दिसंबर,1949 को लिखे पत्र से कोई भी समझ सकता है कि उनके लिए लोकतंत्र का क्या मतलब है। उन्होंने लिखा, “मेरा मानना है कि सिर्फ जनता के लिए काम करना ही पर्याप्त नहीं है। बेहतर तो यह होगा कि उनके साथ मिलकर काम किया जाए ताकि उन्हें इस बात का यकीन हो कि उनका कोई सच में हितैषी है।”

 गजब की संसद में भागेदारी
नेहरु जी संसद में चलने वाली बहसों में लगातार बैठे रहते थे। उन्हें सुनते थे। वे एक तरह से अपने नौजवान संसद के साथिय़ों के लिए उदाहरण पेश करना चाहते थे कि संसद की कार्यवाही में ज्यादा से ज्यादा भागेदारी कितनी अहम है। वे संसद में लगातार बोलते थे। अपनी बात को रखते थे। हालांकि उनके दौर में कांग्रेस को संसद में प्रचंड बहुत हासिल था, पर वे यह सुनिश्चित करते थे कि संसद में पारित होने वाले बिल से देश को यह ध्वनि ना जाए कि विपक्ष की अनदेखी हो रही है। वे अपने अंतिम दिनों में खासे अस्वस्थ होने के बाद भी संसद में भाग लेना नहीं छोड़ते थे। संसद में हल्ला और अनुशासनहीनता का माहौल पैदा होने पर वे खड़े हो जाते थे।
नेहरु विचारभिन्नता को लोकतंत्र की प्राण और आत्मा मानते थे। उन्होंने 2 जून,1950 को एक जगह कहा था, “मैं विपक्ष से भयभीत नहीं होता। मेरी तो चाहत है कि विपक्ष का विस्तार हो। मैं यह कतई नहीं चाहता कि भारत में एक इंसान की हां में हां कहें लाखों लोग। मैं भारत में सशक्त विपक्ष देखना चाहता हूं।“


नेहरु ने ही कैबिनेट के सामूहिक फैसलों की परम्परा की नींव रखी। उन्होंने यह पसंद नहीं था कि उनकी कैबिनेट के सदस्य सब फैसले उन पर लेने के लिए छोड़ दें।नेहरु ने संसद,ज्यूडशरी,कैबिनेट और पार्टी को हमेशा सम्मान दिया। उन पर कभी कोई आरोप नहीं लगा सकता कि उन्होंने संस्थानों की गरिमा के साथ कभी छेड़छाड़ की हालांकि उनका जिस तरह का कद था,उसमें यह मुमकिन था।

उन्होंने एक बार कहा था कि बुद्ध से लेकर गांधी ने दुनिया को संदेश दिया कि भारत सबके साथ सदभाव के साथ रहने का इच्छुक है। वे मानते थे कि सहयोग और सहिष्णुता के बगैर लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं है।
 नेहरु के बारे कहा जाता है कि वे मूड़ी किस्म के इंसान थे। वे आदर्शवादी बुद्धिजीवी थे। धनी-सम्पन्न परिवार से संबंध रखने और ब्रिटेन में शिक्षा लेने के बाद भी उनके दिल में देश के मजदूर,किसान और आम इंसान को बेहतर जिंदगी देने का सपना था। दस सालों तक जेलों में रहे ईशवर में रत्तीभर भी आस्था नहीं रखने वाले नेहरु शिष्य बने संत रूपी गांधी जी के।

कायदे से देखा जाए तो भारत पर नेहरु का प्रभाव इतना साफ और अधिक है कि उसकी बार-बार समीक्षा करना मूर्खता ही होगी। उनकी विरासत इस देश की विरासत है,भले ही हमारा उनसे कुछ मसलों पर मतभेद ही क्यों ना हो।


Vivek Shukla

रवि अरोड़ा की नजर में..........





मरवा दिया आपने मोदी जी

रवि अरोड़ा


मेरी किसी ग़लती पर माँ जब भी नाराज़ होती हैं तो मुझे कहती हैं- तुझमें जोश है , होश नहीं है । बेहद बूढ़ी हो चुकी मेरी माँ को देश-दुनिया की कोई ख़बर नहीं रहती वरना यही बात वह मोदी जी के बारे में भी कहतीं । यह भी हो सकता है कि कहते समय उनकी तल्ख़ी कुछ ज्यादा ही अधिक होती ।

मेरी माँ ही क्या आज करोड़ों लोग कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं । ऐसा हो भी क्यों नहीं , मोदी जी के तमाम बड़े फ़ैसले यही तो साबित करते हैं कि कुछ भी नया करने से पहले वे आगे-पीछे नहीं देखते । अब कोरोना संकट को ही देख लीजिये । इस महामारी से निपटने को उन्होंने लॉक़डाउन का जो तीर चला वह बेशक कोरोना के लिए तुक्का साबित हुआ मगर ग़रीब आदमी के जीवन पर तो ब्रहमास्त्र बन कर ही गिरा । करोड़ों लोग सड़क पर आ गए , सैंकड़ों लोग सरकारी बेवक़ूफ़ी से मर गए और कोरोना बीमारी है कि दिन प्रतिदिन और विकराल रूप धारण करती जा रही है ।

कोरोना से निपटने को दुनिया के अनेक देशों ने लॉक़डाउन का सहारा लिया । देखा देखी मोदी जी भी आनन फ़ानन टीवी पर अवतरित हुए और उन्होंने 24 मार्च को इक्कीस दिनी लॉक़डाउन की घोषणा कर दी । उनका दावा था कि महाभारत का युद्ध 18 दिन में जीता गया और कोरोना के ख़िलाफ़ यह लड़ाई 21 में हम जीत लेंगे ।

 लॉक़डाउन से पहले न राज्य सरकारों को विश्वास में लिया गया और न ही अर्थशास्त्रियों से विचार विमर्श किया गया । अब सत्ता के शीर्ष पर मोदी जी ने जो सिंहासन अपने लिए तैयार किया है वहाँ तक सलाहकारों की आवाज़ तो जाती ही नहीं ।

 नतीजा उन्हें शायद किसी ने बताया ही नहीं कि कोरोना से तो पता नहीं जीतोगे अथवा नहीं मगर देश की अर्थव्यवस्था ज़रूर चौपट कर बैठोगे । किसी ने नहीं पूछा कि जिस देश की आधी आबादी के पास अगले  दिन के राशन की व्यवस्था नहीं है , उनका क्या होगा ? करोड़ों लोग जो दूर दराज़ के शहरों में छोटे मोटे काम करते हैं वे कहीं सड़क पर तो नहीं आ जाएँगे ?

मोदी जी को किसी ने नहीं बताया कि जिस देश में बीस करोड़ लोग झुग्गियाँ में रहते हैं और तमाम शहरों में सघन घनत्व वाली आबादियाँ हैं , वहाँ लॉक़ डाउन कैसे सम्भव है ? नतीजा वही हुआ जो होना था । लॉकडाउन फ़ेल हो गया और झेंप मिटाने को एक के बाद चार लॉक़डाउन लगाने पड़े मगर कोरोना फिर भी क़ाबू नहीं आया । कोरोना संकट से पार पाने के लिए प्रधानमंत्री ने जो नेशनल टास्क फ़ोर्स गठित की थी उसी के दो वैज्ञानिक सदस्यों ने भी स्वीकार कर लिया है कि लॉक़डाउन फ़्लॉप रहे । फ़ोर्स के सदस्य अब दबी ज़ुबान में यह भी कह रहे हैं कि लॉक़ डाउन बढ़ाते समय हमसे राय नहीं की गई ।

खिसियाई सरकार अब लॉक़डाउन सफल होने के दावे तो कर रही है मगर इस बात  का कोई जवाब उसके पास नहीं कि तमाम देशों में मरीज़ों की संख्या घटने पर लॉक़डाउन में छूट दी गई मगर भारत में मरीज़ों की संख्या डेड लाख के क़रीब पहुँचने पर ऐसा क्यों किया जा रहा है ? मज़दूरों के मामले में निर्णय लेने में सवा महीना क्यों लगा , इसका भी जवाब नहीं दिया जा रहा ।

लॉक़डाउन जैसा कुछ पहली बार नहीं हुआ है ।  नोटबंदी और जीएसटी भी लॉक़डाउन ही थे । बेशक मोदी जी ज़बरदस्त राजनीतिज्ञ हैं और जनता की तोपों का मुँह कभी पाकिस्तान कभी मुस्लिमों तो कभी कांग्रेस-नेहरु की ओर मोड़ देने में सक्षम हैं । फ़िलवक़्त भी नेपाल और चीन की हरकतें उन्हें कुछ ऐसा ही अवसर प्रदान कर रही हैं मगर लगता नहीं कि मोदी जी ख़ाली पेटों को इस बार फिर से बहला पाएँगे । उस आम आदमी से तो शायद वे अब आँख भी न मिला पाएंगे, जो कहता फिर रहा है- मरवा दिया आपने मोदी जी ।।

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जेके के लिए कुछ हो रहा है / सुरेश्‍वर त्रिपाठी




जम्मू कश्मीर में भारी बदलाव
बड़ी खबर…
हम कोरोना ओर लोकडाउन में ही उलझे रहे और उधर मोटा भाई ने जम्मूकश्मीर का बचाखुचा काम भी ढंग से निपटा दिया, गृहमंत्री अमित शाह 9 अभूतपूर्व फैसले लेने में लगे हुए थे, इस कोरोना लोकडाउन के बीच।

1. पांच लाख हिन्दू और सिक्ख परिवार जम्मू कश्मीर के मूल निवासी घोषित किये गये।

2. फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा के सभी अनावश्यक भत्ते व अन्य सरकारी सुविधायें समाप्त।

3. जम्मू कश्मीर राज्य सरकार का जम्मू और कश्मीर विधि विश्वविद्यालय, अन्य विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं से नियन्त्रण समाप्त।

4. जम्मू कश्मीर राज्य सरकार का सभी हिन्दू धार्मिक स्थलों से नियन्त्रण समाप्त।

5. कश्मीर घाटी के क्षेत्रीय सक्षम अधिकारी हिन्दू और सिक्खों द्वारा 1990 के दौरान घाटी छोड़ते समय पीछे छोड़ी गयी उनकी सभी संपत्तियों पर अनाधिकृत कब्जों का स्वत: संज्ञान लेकर उन्हें खाली करायेंगे।

6. विख्यात गोल्फ कोर्स एवं अन्य सभी क्लब कश्मीर राज्य सरकार के नियन्त्रण से मुक्त।

7. सभी शिक्षण संस्थान व विश्वविद्यालय जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री के अधिकार क्षेत्र से बाहर।

8. जिन अलगाववादियों व राष्ट्र द्रोहियों को सरकारी लाभ या कानूनी सुरक्षा मिली हुई थी वह हटाई गयी। यदि वह नागरिक सुरक्षा अधिनियम 1978 के अन्तर्गत वांछनीय हैं तो अब उनपर जम्मू कश्मीर राज्य के बाहर भी गिरफ्तार करके मुकदमा चलाया जा सकता है।

9. वर्तमान परिस्थितियों में सचिवालय श्रीनगर नहीं जायेगा और जम्मू में ही स्थापित रहेगा।

जिन को गृहमंत्री ढूंढे नहीं मिल रहे थे...!  उन्हें जान लेना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह हमेशा अपने टास्क पर लगे रहते हैं।

वंदेमातरम🇮🇳

दिल्ली में दिल्ली की तलाश / नलिन चौहान






कलकत्ता से नयी दिल्ली "राजधानी" का सफर

इस बात से कम व्यक्ति ही वाकिफ है कि ब्रिटिश शासन की एक बड़ी अवधि तक दिल्ली नहीं बल्कि कलकत्ता भारत की राजधानी थी। तीसरा दिल्ली दरबार दिसंबर 1911 में सम्राट जॉर्ज पंचम के संरक्षण में दिल्ली विश्वविद्यालय के निकट किंग्सवे कैंप में आयोजित किया गया। इसी दरबार में सम्राट ने राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने के अपने निर्णय की घोषणा की।

प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक “दिल्ली सरकार की शक्तियां और सीमाएं (तथ्य और भ्रम)” में एस के शर्मा लिखते हैं कि राजधानी के स्थानांतरण की अचानक घोषणा को अनेक लोगों ने “भारत के इतिहास की सबसे गुप्त घटना” कहा। घोषणा की विषयवस्तु के बारे में इंग्लैंड और भारत में केवल कुछ ही लोगों को पहले से मालूम था। भारत में शाही परिवार के आगमन से पूर्व इंग्लैंड की महारानी से भी इस परियोजना का खुलासा नहीं किया गया था।

राबर्ट ग्रांट इर्विंग अपनी पुस्तक “इंडियन समर” में लिखते हैं, "सम्राट के शब्द उष्णकटिबंधीय सूर्य की भांति मानसून के वर्षा बादलों के बीच से दिल्ली के ऊपर गर्जना किए। आधी सदी से भी अधिक तक प्रांतीय दर्जा प्राप्त यह नगर एक ही झटके में उपमहाद्वीप की राजधानी बन गया।"

15 दिसंबर, 1911 को उत्तरी दिल्ली में किंग्सवे कैंप के समीप कोरोनेशन पार्क में जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी के द्वारा नई दिल्ली का शिलान्यास किया गया। राजधानी के स्थानांतरण की घोषणा के एक महीने के अंदर ही नयी राजधानी के निर्माण हेतु आर्किटैक्ट्स की एक कमेटी नियुक्त कर दी गई, जिसके सभापति जी एस सी स्बिंटन और सदस्य जॉन ब्रांडी तथा एडवर्ड लुटियंस थे। बाद में सर हर्बर्ट बेकर भी 1913 में लुटियंस से जुड़ गए।

दिसंबर, 1911 में दिल्ली में राजधानी के स्थानांतरण की घोषणा करते हुए अंग्रेज सम्राट ने कहा कि हम अपनी जनता को सहर्ष घोषणा करते हैं कि कौंसिल में हमारे गर्वनर जनरल से विचार विमर्श के बाद की गयी हमारे मंत्रियों की सलाह से हमने भारत की राजधानी को कलकत्ता से प्राचीन राजधानी दिल्ली ले जाने का फैसला किया है।

12 दिसम्बर, 1911 के भव्य दरबार के लिए क्वीन मेरी के साथ जार्ज पंचम भारत आये तो उन्होंने तमाम बातों के साथ देश की राजधानी कलकत्ते से दिल्ली लाने की घोषणा की और यहीं दरबार स्थल के पास ही पत्थर रखकर जार्ज पंचम और क्वीन मेरी ने नये शहर का श्रीगणेश भी कर दिया। उस वक़्त के वायसराय लार्ड हार्डिंग की पूरी कोशिश थी कि यह योजना उनके कार्यकाल में ही पूरी हो जाए। सबसे पहले जरूरत माकूल जगह का चुनाव था। उन दिनों यह व्यापक विश्वास था कि यमुना का किनारा मच्छरों से भरा हुआ था और यह अंग्रेजों के स्वास्थ्य के लिहाज से स्वास्थ्यप्रद न होगा।

समुचित स्थान की खोज में दिल्ली के विभिन्न भागों के चप्पे-चप्पे की यात्रा के पश्चात समिति के सदस्यों में सरकार के आसन के लिए चुने जाने हेतु सदस्यों के बीच लंबी चर्चा और परामर्श भी हुआ। समिति अंततः शाहजहां के नगर के दक्षिण में एक स्थल पर सहमत हुई।

9 जून को लुटियंस ने घोषणा की कि स्थान का अंतिम रूप से चयन हो चुका है-दिल्ली के दक्षिण में, मालचा के समीप। यह प्रत्येक दृष्टि से उपयुक्त था-पहलू, ऊंचाई, पानी, स्वास्थ्य, मूलावस्था में जमीन और यह उल्लेख करने की जरूरत नहीं पूरी पुरानी दिल्ली का अद्भुत दृश्य, नष्ट मकबरों का उजाड़ क्षेत्र जो सात पुरानी दिल्लियों का अवशेष हैं। इसी तरह, किंग्सवे कैंप वाले स्थल के छोटा होने तथा गंदगी भरे पुराने शहर के ज्यादा करीब होने की वजह से नामंजूर कर दिया गया।

इस सिलसिले में समतल और चौरस जमीन से घिरी गयी रायसीना पहाड़ी इसके लिए आदर्श साबित हुई। पुराने किले के निकट होने के कारण उसने ब्रिटिश के पूर्ववर्ती साम्राज्य के बीच एक प्रतीकात्मक सम्बन्ध भी मुहैया करा दिया, जिसकी निर्माताओं को गहरी अपेक्षा थी।

इंपीरियल सिटी, जिसे अब नई दिल्ली कहा जाता है, का जब तक निर्माण नहीं हो गया और कब्जा करने के लिए तैयार नहीं हो गई तब तक तो पुरानी दिल्ली के उत्तर की ओर एक अस्थायी राजधानी का निर्माण किया जाना था। इस अस्थायी राजधानी के भवनों का निर्माण रिज पहाड़ी के दोनों ओर किया गया। मुख्य भवन पुराना सचिवालय पुराने चंद्रावल गांव के स्थल पर बना है। इसी में 1914 से 1926 तक केंद्रीय विधानमंडल ने बैठकें कीं और काम किया।

सरकार के आसन के दिल्ली स्थानांतरित होने के शीघ्र बाद, इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल का सत्र मेटकाफ हाउस (आज के चंदगीराम अखाड़ा के समीप) में हुआ, जहां से इसका स्थान बाद में पुराना सचिवालय स्थानांतरित कर दिया गया। राजधानी के निर्माण का कार्य पूरा होने के साथ, नई दिल्ली का औपचारिक रूप से उद्घाटन 1931 को हुआ। 1927 में संसद भवन का निर्माण के पूरा होने पर सेंट्रल असेंबली की बैठकें पुराना सचिवालय के स्थान पर संसद भवन में होनी प्रारंभ हो गई थीं।

जर्मनी की कुछ और यात्राएं और चुनावी प्रक्रिया / त्रिलोकदीप





1975 के बाद 1980 और 1983 में भी पश्चिम जर्मनी जाने के अवसर मिले। 1980  की यात्रा 24 सिंतबर से 7 अक्टूबर तक रही। मुख्य उद्देश्य था बुँदेस्टाग यानी संसद की निम्न सदन के चुनाव कवर करना। दूसरे कई देशों के पत्रकारों को भी न्योता गया था। उनकी मदद के लिये गाइड की व्यवस्था थी।

जब मैं अपने होटल के कमरे में दाखिल हुआ तो क्या देखता हूं कि सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का चुनावी लिटरेचर एक टेबल पर पड़ा है। उलट पुलट कर देखने से पता चलता है कि तीन प्रमुख पार्टियों सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एस पी डी), क्रिस्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सी डी यू) तथा फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी (एफ डी पी) का अपना अपना चुनावी घोषणा पत्र है।

सरसरी निगाह से तीनों पर नज़र मारता हूं तो सभी ने खासे दिलकश और लुभाने वादे किये हैं। उस शाम सभी पत्रकारों ने अपना अपना परिचय देने में ही बिताई। मेरे साथ बांग्लादेश का पत्रकार हो लिया। जहां भी मैं जाता मेरे साथ या पीछे  पीछे हो लेता। नाम मैं उसका भूल रहा हूं। मेरी गाइड के साथ वही चिपका खड़ा हुआ है।

अगले दिन सुबह एक प्रेस कांफ्रेंस हुई जिस में सभी आमंत्रित पत्रकारों के साथ स्थानीय पत्रकार भी शामिल हुए।  जर्मन चुनाव प्रमुख ने चुनावी कार्यक्रम का विस्तृत ब्यौरा दिया। उसके बाद सवाल जवाब का सेशन चलता रहा। ज़्यादातर सवाल चुनावी व्यवस्था को लेकर थे या किन्हीं नेताओं के चुनाव न लडने या लड़ने को लेकर भी हुए।

चाय पर अनौपचारिक बातचीत में कुछ जर्मन पत्रकार भी मिले जो भारत रह आये थे या चुनाव के अवसर पर गए थे। उन्होंने बताया चुनाव तो मोटे तौर पर हर लोकतंत्री देश में एक जैसे होते हैं लेकिन चुनावी व्यवस्थाओं में फर्क होता है। उनका मानना था कि भारत और ब्रिटेन में सारा का सारा मतदान प्रत्यक्ष प्रणाली से होता है जबकि जर्मनी में दोहरी प्रणाली है अर्थात 50 फीसदी प्रत्यक्ष प्रणाली से औऱ 50 प्रतिशत अनुपाती प्रतिनिधित्व प्रणाली से। इस प्रणाली का लाभ यह है कि हर वोट का वजन औऱ कीमत होती है। यहां वही पार्टी या गठबंधन विजयी करार दिया जाएगा जिसे 50 फीसद वोट प्राप्त हुए होंगे और पांच प्रतिशत से कम मत पाने वाली पार्टी को संसद में जगह नहीं मिलेगी।

एक प्रश्न के उत्तर में उस जर्मन पत्रकार ने यह भी बताया कि आप लोगों को यह पेचीदा प्रणाली लग सकती है लेकिन हमारे लिए तो यही सच्ची और सही लोकतांत्रिक है। आप स्वयं अपनी आंखों से देख लेंगे कि वोटिंग खत्म होने के बाद कितनी जल्दी रिजल्ट आने शुरू जो जाते हैं। फिर हंसते हुए बोले हमें चुनावी नतीजों के लिए कई दिनों या हफ़्तों तक इंतजार नहीं करना पड़ता।

 नतीजे आने के अगले ही दिन बहुमत वाली पार्टी प्रेस कांफ्रेंस कर  अपनी साथी पार्टी के नाम का ऐलान करने के साथ अपने एजेंडे की रूपरेखा भी बता देगी। फिर यह कहते हुए लेट्स  हेव ए गिलास ऑफ बियर लेकर आगे बात करते हुए बोले, अभी अभी तो आप आये हो अपनी आंखों से चुनाव देखो औऱ मज़ा लो। मोटी मोटी  बातें मैं ने आपको बता दी हैं। लगता था उसे फिर कुछ याद हो आया। बोला, जहां तक मेरी जानकारी है प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने जर्मन चुनाव प्रणाली अपनाने का मन बना लिया था लेकिन उनकी अपनी जनता पार्टी ने ही उनका साथ नहीं दिया था।

बेशक़ इस जर्मन पत्रकार से प्राप्त जानकारी पूरा चुनावी परिदृश्य जानने के लिए काफी थी। उस प्रेस कांफ्रेंस में मैंने किसी दूसरे भारतीय पत्रकार को तलाशने की कोशिश की लेकिन कोई नहीं दीखा अलबत्ता जर्मन


सोमवार, 25 मई 2020

वह जो पत्रकार है / महापंडित वाट्स एप्प



*पत्रकार क्या हैं,दो मिनट का समय निकाल कर जरूर पढ़ें*

 1. जब किसी दबंग व्यक्ति  द्वारा आपके अधिकार का हनन किया जाता है तब आपको एक पत्रकार की जरूरत पड़ती है?

2. जब प्रशासन के किसी कर्मचारी द्वारा आप परेशान किये जाते हैं तब आपको एक पत्रकार की जरूरत पड़ती है?

3. जब आप अपनी बात प्रशासन तक पहुंचना चाहते हैं तब आपको एक पत्रकार की जरूरत पड़ती है ?

4. जब कोई लेखपाल,कोटेदार, प्रधान या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा आपका हक छीनने की कोशिश की जाती है तब आपको एक पत्रकार की जरूरत पड़ती है ?

5. जब आप किसी राजनेता, अधिकारी के साथ किसी विशेष कार्यक्रम को करते हैं तब आपको एक पत्रकार की जरूरत पड़ती है ?

6. जब आपको समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर भगाने की चिंता होती है तब आपको एक पत्रकार की जरूरत पड़ती है ?

7. जब आप अपने बच्चे को स्कूल भेजते हैं और वहां उसे अध्यापक या किसी अन्य बच्चे द्वारा मानसिक यातनाएं दी जाती हैं तब एक पत्रकार की जरूरत पड़ती है ?

8. जब आप खेती करते हैं और  किसी कारणवश आपकी फसल का नुकसान हो जाता है तब आपको अपनी बात प्रशासन तक पहुंचाने के लिए आपको पत्रकार की जरूरत पड़ती है ?

9.घर पर बैठ कर पूरे विश्व में क्या हो रहा है ये जानने के लिए एक पत्रकार के लेख की जरूरत पड़ती है ?

10. जब आपको किसी भी सरकारी योजना का फायदा नहीं मिल पाता तब आपको अपनी बात रखने के लिए एक पत्रकार की जरूरत पड़ती है ?

11. जब भी कोई घटना-दुर्घटना होती है तो भी पत्रकार याद आते है ?

◆इन सवालों के जबाब स्वयं को दीजिये और फिर पत्रकारों के विषय में कुछ करने के बारे में सोचिए। हम ये नहीं कहते कि हम अच्छे हैं लेकिन सब के सब गलत होते है यह गलत बात है। एक बिना सेलरी पर काम करने वाला व्यक्ति आपको पूरा दिन और कभी कभी तो पूरी रात जागकर, तो कभी धूप तो कभी बरसात मे भीगकर आपको खबर उपलब्ध कराता है तो क्या उसे सम्मान और सहयोग मिलने का अधिकार है या नहीं आप को सोचना है।✔️

रवि अरोड़ा की नजर में




 संजय गांधी और कवारंटीन सेंटर

रवि अरोड़ा

संजय गांधी की राजनीति का मैं विरोधी रहा हूँ और आपातकाल में देश भर में हुई तमाम ख़ुराफ़ातों का असली गुनहगार भी उन्हें ही मानता हूँ मगर न जाने क्यों आजकल रह रह कर उनकी याद आती है ।
उनके पाँच सूत्रीय कार्यक्रम यदि देश में लागू हो जाते और हम उनकी नीति यानि बच्चे दो और पेड़ हज़ार का अक्षरश पालन करते तो संभवतः आज देश की यह हालत नहीं होती जो है ।
 कोरोना संकट में बेशक सरकारी स्तर पर अनेक महामूर्खताएँ हुई हैं मगर यह भी सच है कि देश की इतनी बड़ी अनपढ़ और जहिल आबादी को सम्भालना भी तो आसान नहीं है। इस महामारी को लेकर लोगों का जो लापरवाही पूर्वक व्यवहार है , वह बेहद शर्मनाक है ।
यही हालात रहे तो लाख प्रयासों के बावजूद इस महामारी को थामा तो नहीं जा सकेगा । देश भर में पहले लॉकडाउन के नाम पर तमाशा हुआ और अब कवारंटीन सेंटरों के नाम पर मज़ाक़ हो रहा है । अव्वल तो इन सेंटरों में समुचित इंतज़ाम नहीं हैं मगर जहाँ हैं उन सेंटरों में ठहराए गए लोग भी कहाँ सहयोग कर रहे हैं । ऊपर से भीषण गर्मी ने सभी व्यवस्थाओं को पलीता लगा दिया है । नतीजा स्कूल , कालेज, पंचायती भवन और बारात घरों में जहाँ जहाँ यह सेंटर बने हैं , वहाँ रोज़ाना बवाल हो रहे हैं । कोढ़ में खाज यह है कि भ्रष्टाचारी अफ़सरशाही लहरें गिनने में लगी है और चाँदी कूटने से फिर भी बाज़ नहीं आ रही है ।

सरकारी आँकड़ा कहता है कि देश में पौने पाँच करोड़ प्रवासी मज़दूर हैं और इनमे से लगभग अस्सी लाख लोगों को ट्रेन और बसों से उनके घर भेजा गया है । अपने घर जाने से पहले श्रमिकों को चौदह दिन के लिए कवारंटीन सेंटर में ठहरना होता है ।

 सरकारी स्तर पर देश भर में अधिक से अधिक एक करोड़ लोगों को ही इन सेंटरों में ठहराया जा सकेगा । उधर ग़ैरसरकारी आँकड़ा कहता है कि देश भर में बारह करोड़ प्रवासी मज़दूर हैं और उनमे से एक तिहाई अपने अपने साधनों अथवा पैदल अपने घर पहुँच भी चुके हैं । बिना सरकारी सहायता के घर लौटे लोग किसी प्रकार का कवारंटीन नहीं कर रहे हैं । सरकारी व्यवस्था का भी आलम यह है कि सेंटरों में ठहराए गए लोग भी शाम होते ही अपने घर चले जाते हैं और सुबह चाय-नाश्ते के समय वापिस सेंटर आ जाते हैं ।

गाँव देहात में आपसी रंजिशों के चलते न तो कोई एसे मामलों की शिकायत करता है और न ही अफ़सर इसका संज्ञान लेते हैं । ऐसे भी अनेक समाचार मिले हैं कि अक्सर लोग कवारंटीन सेंटरो से भाग जाते हैं अथवा आख़िरी स्टेशन से पहले चेन पुलिंग कर गाड़ी रोक लेते हैं और सेंटर से बचने के लिए रेलवे स्टेशन पर ही नहीं पहुँचते । घरों में कवारंटीन किए गए लोग तो खुलेआम घूमते मिलते ही हैं ।

नतीजा यह महामारी अब घर घर पहुँच रही है और कुछ ही दिनो में इसका बड़ा केंद्र देश के गाँव देहात होंगे । कल्पना कीजिए कि शहरों में सिमटते कारोबार और घटती नौकरियों के चलते यदि लोग अपने घरों को यूँ ही लौटते रहे तो किसी भी सूरत इतनी बड़ी आबादी को कवारंटीन तो नहीं ही किया जा सकेगा।

उधर कवारंटीन सेंटरों से श्रमिकों के बचने के पीछे अफ़सरशाही की रीति-नीति भी कम नहीं है । आए दिन सेंटरों पर खाने और सुविधाओं के लिए बवाल होते रहते हैं । कहीं पानी नहीं मिल रहा तो कहीं भीषण गर्मी में बिजली का संकट है । एक जगह महिला से बलात्कार हो गया तो दो जगह लोगों को सांप ने काट लिया । सुविधाओं के अभाव सम्बंधी वीडियो वायरल होने पर किरकिरी होते देख अब इन सेंटरों पर मोबाइल फ़ोन ले जानें पर ही बंदिश लगा दी है । पता नहीं कहाँ जाकर ख़त्म होगी यह दुःखभरी कहानी जिसकी असली जड़ तो इतनी बड़ी आबादी ही लगती है । संजय बाबू कुछ ज़्यादा ही जल्दी चले गए आप ।

भारत फिर से चैंपियन बने- बलवीर सिंह / राकेश थपलियाल



मेरी अंतिम इच्छा है  भारत फिर से हॉकी के शिखर पर पहुंचे
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 कमेंट ----
‘राकेश मेरी उम्र का मैच ‘गोल्डन गोल स्टेज’ में है। जैसे हॉकी में मैच निर्धारित समय और ‘टाईब्रेकर’ में बराबरी पर छूटने पर पहले ‘सडन डेथ’ होता था। उसकी जगह अब गोल्डन गोल होने लगा है। मेरी उम्र ‘गोल्डन गोल स्टेज’ पर है और मेरा जो विपक्षी है वह बहुत मजबूत है उसे मैं हरा नहीं सकता लेकिन अपनी तरफ से डटकर उसका सामना कर रहा हूं।’ - बलबीर सिंह सीनियर, पूर्व भारतीय ओलंपिक कप्तान
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राकेश थपलियाल

मेजर ध्यानचंद का ओलंपिक करियर समाप्त होने के बाद विश्व हॉकी में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले बलबीर सिंह सीनियर आज सोमवार 25 मई, 2020 को 95 वर्ष की उम्र में दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए। 1948, 1952 और 1956 के तीन ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक पहनने वाले बलबीर सिंह के पार्थिव शरीर पर प्रेम और सम्मान की अंतिम माला पड़ गई।
आठ वर्ष पूर्व नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा था, ‘राकेश मेरी उम्र का मैच ‘गोल्डन गोल स्टेज’ में है। जैसे हॉकी में मैच निर्धारित समय और ‘टाईब्रेकर’ में बराबरी पर छूटने पर पहले ‘सडन डेथ’ होता था। उसकी जगह अब गोल्डन गोल होने लगा है। मेरी उम्र ‘गोल्डन गोल स्टेज’ पर है और मेरा जो विपक्षी है वह बहुत मजबूत है उसे मैं हरा नहीं सकता लेकिन अपनी तरफ से डटकर उसका सामना कर रहा हूं।’

वास्तव में बलबीर सिंह ने एकदम सही कहा था कि उनका विपक्षी बहुत मजबूत है और उसे वह हरा नहीं सकते। जो मां की कोख से जन्मा है एक दिन उसकी मृत्यु होनी तय है। यह जीवन का ऐसा सत्य है जिसे कोई नकार नहीं सकता पर ध्यान देने वाली बात यह है कि बलबीर सिंह ने यह भी कहा था कि वह अपनी तरफ से विपक्षी (मृत्यु) का डटकर सामना कर रहे हैं। भारत के इस बेहद मजबूत खिलाड़ी ने वास्तव में जिस तरह से डटकर मुकाबला किया उसकी मिसाल भारतीय खेल जगत में ज्यादा नहीं मिलेंगी। पिछले एक दशक के दौरान वह अनेक बार गंभीर रूप से बीमार पड़े। कई बार लंबे समय तक अस्पताल में रहकर मुस्कुराते हुए घर लौटे, लेकिन इस बार उनका मजबूत विपक्षी बाजी मार गया।

 भारतीय हॉकी के बेहद सौम्य, मृदुभाषी और बेहद सम्मानित ‘गोल्ड बॉय’ पर, बावजूद इसके कि एक्सट्रा टाइम में गोल्डन गोल का नियम खत्म किया जा चुका है, मजबूत विपक्षी ‘गोल्डन गोल’ करने में सफल हो गया। पिछले सात -आठ वर्षों से बलबीर सिंह यह मान रहे थे कि उनकी जिंदगी का ‘एक्सट्रा टाइम’ चल रहा है और विपक्षी कभी भी गोल्डन गोल कर मुकाबला जीत सकता है। फिर भी वह हॉकी के मैच देखने मैदानों में जाते थे, खेल के समारोहों में शिरकत करते थे और मीडिया को इंटरव्यू भी देते थे। अनेक बार ऐसा हुआ कि मैंने कुछ सवाल उनके नाती कबीर को भेजे और वह तुरंत अपने नानाजी के साथ बात करके जवाब भेज देते थे।

भारतीय हॉकी के बेहद प्रतिष्ठित खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर मेजर ध्यान चंद नेशनल स्टेडियम या शिवाजी स्टेडियम में आते थे तो उनके बुजुर्ग शरीर की ताकत बढ़ जाती थी। एक बार उन्होंने कहा था, ‘राकेश उम्र के इस पड़ाव पर मेरी अंतिम इच्छा यही है कि भारत फिर से हॉकी के शिखर पर पहुंचे।’ ऐसा कब होगा? या कभी होगा भी या नहीं? कहना मुश्किल है लेकिन जिस दिन ऐसा हुआ बलबीर सिंह की आत्मा को असली शांति तभी मिलेगी। मेरे यह पूछने पर कि जब आप खेलते थे तो क्या आपने कभी सोचा था कि एक दिन भारत ओलंपिक के लिए क्वालिफाई भी नहीं कर पाएगा? इस पर भावुक होते हुए 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता टीम के कप्तान ने कहा था, ‘उस वक्त यह ख्याल तो किसी के जेहन में आ ही नहीं सकता था। हम तो विजेता हुआ करते थे। लेकिन दुख इस बात का है कि हम हालात के हिसाब से नहीं बदले। मैदान और नियम बदलते रहे और उसके अनुसार अपने को नहीं ढाल सके। यह सही नहीं था, हमें वक्त के साथ बदलना चाहिए था। अच्छी चीजें जहां से भी मिलें हमें सीखनी चाहिए।
 भारतीय हॉकी में बलबीर सिंह नाम के खिलाड़ी तो बहुत हुए हैं लेकिन बलबीर सिंह सीनियर जैसा खिलाड़ी और व्यक्तित्व फिर मिलेगा इसकी संभावना बहुत कम है। रब से दुआ तो यही है कि केवल भारतीय हॉकी ही नहीं बल्कि हर खेल में बलबीर सिंह सीनियर जैसे सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों खिलाड़ी उभर कर सामने आएं और देश का नाम रोशन करें। महान शख्सियत को अंतिम खेल सलाम!

 (लेखक ‘खेल टुडे’ पत्रिका के संपादक हैं)

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रविवार, 24 मई 2020

रवि अरोड़ा की नजर में.......




बात लूलुओं की

रवि अरोड़ा


सुबह से कई लोगों को फ़ोन कर चुका हूँ मगर संतोषजनक उत्तर नहीं मिला । बाबा गूगल भी तसल्लीबक्शर जवाब नहीं दे पा रहा । दरअसल मैं ‘ लूलू ‘ शब्द का कोई शालीन सा पर्यायवाची शब्द ढूँढ रहा हूँ मगर मिल ही नहीं रहा । कोई कहता है इसके बदले निरा बेवक़ूफ़ शब्द इस्तेमाल किया जा सकता है तो कोई इसका सही शाब्दिक अर्थ बेवक़ूफ़ बताता है । अंग्रेज़ीदाँ लोग क्रेज़ी जैसे शब्द थमा देते हैं मगर सटीक जवाब कहीं नहीं मिल रहा । अब आप पूछ सकते हैं कि आख़िर लूलू शब्द पर मेरा गेयर क्यों अटका हुआ है । जनाब दरअसल मैं ऊँची कुर्सियों पर बैठे लोगों को जो नीतियाँ बनाते हैं , उन्हें लूलू कहे बिना लूलू कहना चाहता हूँ इस लिए कोई बढ़िया सा पर्यायवाची शब्द तलाश रहा हूँ । चलिए आप अपने मन मे कोई भी इसका विकल्प तय कर लीजिये और पूरा ध्यान इन लूलुओं की रीति-नीति पर केंद्रित कीजिये ।

शुरुआती लॉकडाउन में जब हालात सामान्य थे तब सख़्ती और अब जब मरीज़ों का आँकड़ा सवा लाख पार कर गया तब अनेक प्रकार की छूट की बहस पुरानी हो गई है । लाखों लाख मज़दूरों के सड़कों पर भूखे प्यासे सैंकड़ों किलोमीटर का सफ़र पैदल तय करने पर चर्चा भी बासी है । लॉकडाउन की तकलीफ़ों से मरे सैंकड़ों लोगों पर अब बात करने का भी कोई मोल नहीं । अब तो बस हर कोई यह जानना चाह रहा है कि एसे में जब संकट चरम की ओर बढ़ रहा है तब हवाई यात्रा क्यों शुरू की जा रही हैं ? जबकि इस सत्य से सरकार भी वाक़िफ़ है कि देश में क़ोरोना की आमद हवाई यात्रियों के कारण ही हुई । सत्तर फ़ीसदी कोरोना मरीज़ उन्ही शहरों में हैं जहाँ हवाई अड्डे हैं । चलिए हवाई यात्रा किसी मजबूरीवश आपने खोल भी दी परंतु हवाई जहाज में एक सीट छोड़ कर बैठने का नियम क्यों नहीं बनाया जबकि यातायात के अन्य साधनों पर यह सख़्ती से लागू है । साफ़ दिख रहा है कि नियम बनाने वाले अमीर को उस निगाह से नहीं देखते जिससे ग़रीब को देखते हैं ।

अमीर-ग़रीब ही नहीं नीति निर्धारकों ने सरकारी और निजी लाभ को भी अलग अलग चश्मे से देखा है । लॉकडाउन चार में अनेक प्रकार की रियायतें केंद्र सरकार ने पहले ही दिन घोषित कर दीं थीं । प्रदेश सरकार ने भी कुछ बंदिशों के साथ अगले दिन बाज़ार खुलने की घोषणा कर दी मगर अनेक जिलों में बाज़ार अभी भी नहीं खुलने दिए गए । मेरे अपने शहर में पाँच दिन लग गये यह फ़ैसला होने में कि बाज़ार किस व्यवस्था के अनुरूप खुलेंगे । अब जब तय हुआ है तो इस तरह कि लोगबाग़ चक़रघिन्नी बने घूम रहे हैं । हर इलाक़े के लिए केवल तीन दिन निर्धारित किये गए हैं । सोमवार को फ़लाँ इलाक़ा तो मंगलवार को फ़लाँ क्षेत्र । दुकान खुलने का समय भी होगा सुबह दस से शाम पाँच बजे तक । रविवार को सबकुछ बंद । उस दिन सफ़ाई करो और उस दिन बिक्री । अब कोई ऊँची कुर्सियों पर बैठे लोगों से पूछे कि नागरिक जेब में सूची लेकर घूमें कि आज कहाँ का बाज़ार खुला है और कहाँ का बंद है ? चंद दुकानों के सीमित समय के लिए खुलने से वहाँ भीड़ अधिक होगी अथवा कम ? कोई यह भी पूछे की इस तरह की बंदिशें शराब की दुकानों के लिए क्यों नहीं हैं ? वे तो पिछले बीस दिनो से खुली हैं और सातों दिन शाम सात बजे तक खुलती हैं । क्या उन पर इसलिए कोई बंदिश नहीं लग सकती कि उनसे सरकार को मोटी कमाई होती है और अन्य छोटी-मोटी दुकानें खुलने से मध्य वर्गीय परिवारों का पेट भरता है ?

लूलुओं ग़ौर से देखो । आज समाज में सबकी हालत पतली है । तुम्हारी शराब की दुकानों की बिक्री भी चालीस परसेंट रह गई है । देशी दुकानों की तो कई बार बोहनी भी नहीं हो रही और अंग्रेज़ी शराब की दुकान पर पंद्रह सौ रुपये से महँगी बोतल नहीं बिक रही । मौक़े की नज़ाकत समझ समझ कर शराब निर्माता भी अब महँगी शराब नहीं बना रहे । अपनी कमाई की आपको इतनी चिंता है कि निर्धारित कोटे से कम शराब बेचने वाले दुकानदार पर जुर्माना लगा रहे हो और उन छोटे दुकानदारों की ज़रा भी फ़िक्र नहीं जिन्हें रुपयों की शक्ल देखे हुए कई दिन हो गये ?  श्रीमान लूलुओं जी ज़रा एयर कंडीशंड कमरों से बाहर आकर ज़मीनी हालत भी तो देखो ।

मेरी पहली विदेश यात्रा भाग- 3 / त्रिलोकदीप






माफ करें आज मेरा फोन मेरा साथ नहीं द पाया  । मैं यह बताना भूल गया कि विमान पर सवार होने से पहले नई दिल्ली नगरपालिका के एक विशेष कक्ष से टीका लगवा कर इस आशय का अंतरराष्ट्रीय प्रमाण पत्र प्राप्त करना होता था जिसे देखने के बाद ही एयरपोर्ट पर तैनात इमीग्रेशन अधिकारी विमान पर सवार होने की अनुमति दिया करते थे। दो तीन बार मुझे टीका लगवाने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। अब शायद यह व्यवस्था खत्म कर दी गई है। जैसा मैंने पहले कहा कि फ्रैंकफर्ट एक ऐसा नगर है जो आपको अंतरराष्ट्रीय मिज़ाज़ और अंदाज़ का परिचय देता है।इसका भव्य एयरपोर्ट कभी दुनिया के बड़े औऱ व्यस्ततम हवाई अड्डों में शुमार था। यहां की ऊंची ऊंची इमारतें, खान पान की किस्में, बहुराष्ट्रीय निगमों के आफिस, दुनिया भर की नस्लें, परिवहन और यातायात के सभी साधन उपलब्ध हैं जो केवल पूरी जर्मनी को ही नही बल्कि पूरे यूरोप को जोड़ते हैं। फ्रैंकफर्ट है तो हेस्से राज्य का हिस्सा लेकिन सैलानियों के लिए अपने आप किसी राज्य से कमतर नहीं है। सभी लोगों की सुविधाओं का फ्रैंकफर्ट ख्याल रखता है लेकिन अपने सीनियर सिटीजन्स के लिये उसकी विशेष सहूलियत उसके पास है। मैं  होटल फ्रैंकफर्ट हाफ में ठहरा था।उस होटल की गहमागहमी औऱ बालकोनी से बाजार का दिलकश नज़ारा देख कर मन खुश हो जाता था।

जैसा मैंने पहले कहा कि जिस तेजी के  साथ पश्चिम जर्मनी में प्रगति की गति है उससे ऐसा1लगता ही नहीं कि इसने विश्व युद्ध में कितना कुछ खोया है। लोग वर्तमान में जीते हैं औऱ उसे सवारने में जुटे हुए हैं। जब मैं नवनिर्मित राजधानी बोन पहुंचा तो कहीं से यह लगता ही नहीं था कि इस पूरे शहर का निर्माण हाल ही में हुआ है। मुझे बताया गया कि बोन जर्मनी के सब से घने राज्य नार्थ राइन-वेस्टफलिया का एक कस्बा था । जिस तरह से उसका निर्माण हुआ था उसे देखकर लगता ही नहीं था कि उसमें राजधानी जैसी गरिमा नहीं है। वहां का संसद भवन, राष्ट्रपति निवास, मंत्रियों के आवास इस तरीके से बनाये गए थे मानो बोन पश्चिम जर्मनी की पुरानी राजधानी है। क्योंकि मैं जितनी बार भी गया हूं पश्चिम जर्मनी ही और बोन ही गया हूं। वहां के लोगों से कुछ औपचारिक और गैरऔपचारिक बातचीत से पता चला कि पश्चिम जर्मनी की मौजूदा शक्ल गढ़ने के पीछे विली ब्रांट की अहम भूमिका रही है।कुछ लोग विली ब्रांट को पूरी जर्मनी की रूह मानते हैं। उनका तर्क है कि चाहे वह 1957 से 1966 तक बर्लिन के मेयर रहे हों, 1966 से 1969 तक देश के वाईस चांसलर यानी उपप्रधानमंत्री और विदेशमंत्री या 1969 से 1974 तक चांसलर अर्थात प्रधानमंत्री उन्होंने दो ही सपने देखे थे। एक, दोनों जर्मनी का पुनः एकीकरण करना तथा पूरे यूरोप में एकता औऱ शांति स्थापित करना। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पहले 1966 में क्रिस्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सी डी यू) के साथ मिल कर अपनी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एस पी डी) का विराट गठबंधन करना और विदेशमंत्री का पद सम्हालना। उस समय  चांसलर थे कुर्त किसिंगर। विदेशमंत्री रहते हुए ही उन्होंने पूरे यूरोप में शान्ति स्थापित करने के 'देतें ' का मंत्र दिया। दूसरे देशों के नेताओं को तैयार किया और चांसलर बनने के बाद उस पर अमल करना शुरू कर दिया। 1970 में उन्होंने सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि की, 1970  में ही पोलैंड की राजधानी वारसा में जाकर  यहूदियों की याद में बने स्मारक के समक्ष झुक कर अपने देश के नेताओं
 की गलतियों के लिये माफी मांगी और1971 में मैत्री संधि भी की । यहां तक कि पूर्व जर्मनी के साथ भी संधि कर बर्लिन में दोनों देशों क नागरिकों के बेरोकटोक आने जाने का रास्ता साफ किया तथा 1973 में चेकोस्लोवाकिया से भी मैत्री संधि की। इस तरह से विली ब्रांट ने पूर्व और पश्चिम के बीच का फर्क मिटाते हुए यूरोप में शांति का1मार्ग प्रशस्त किया। इन्हीं प्रयासों के चलते विली ब्रांट को  1971 का शांति नोबेल पुरस्कार दिया गया।

जर्मनी अपनी हरियाली के लिए जगप्रसिद्ध है। उस देश में साफ सफाई, पर्यावरण, लोगों का सदा हंसता हुआ चेहरा, विनयशीलता, काम के प्रति प्रतिबद्धता और समर्पण की भावनाबऔर अनुशासन जैसे ऐसे गुण हैं जो जर्मनी की समृद्धि के कारक हैं। कहने को तो लोग बवेरिया को अनुदारवादी राज्य कहते हैं लेकिन इसकी राजधानी म्युनिक की प्रसिद्धि और पहचान किसी की मोहताज नहीं।यहां की बियर सारी दुनिया में मशहूर है ही, अलावा इसके बीएमडब्ल्यू, ऑडी और साइमन के निर्माताओं के शहर  के तौर पर भी जाना  जाता है। मुझे बताया गया कि म्युनिक में जितने प्रकाशक हैं, जर्मनी में और कहीं नहीं।
अगर ऑडी का निर्माण म्युनिक में होता है तो मर्सेडीज़ के निर्माण का गौरव स्टुटगार्ट को प्राप्त है। यहां मर्सेडीज़ की फैक्टरी देखने में पूरा एक दिन गुज़र गया फिर भी वह पूरा देखा नहीं जा सका। स्टुटगार्ट अपने ब्लैकफारेस्ट के लिए भी मशहूर है।दूर दूर तक जंगल फैले हुए हैं। यहां की एक सौगात जो स्टुटगार्ट आने वाले हर बन्दे को भाती है वह है कुकू वाच। वाल क्लॉक, टेबल क्लॉक या हैंड वाच के तौर पर उपलब्ध है। चलते चलते बीच बीच में यह घड़ी कू कू की सुरीली आवाज़ करती रहती है। हर राज्य की अपनी खूबी औऱ सिफत होती है। बर्लिन को पढ़े लिखों का शहर कहा जाता है।उच्च शिक्षा के यहां बहुत संस्थान हैं। बर्लिन को फिल्मी नगरी भी माना जाता है। यहां पर अक्सर फ़िल्म समारोह आयोजित होते रहते हैं। मेडिसीन बनाने वाली बायर समेत कई कंपनियां यहाँ कार्यरत हैं।
कमाल का है पश्चिम जर्मनी।अगली बार जर्मनी के बारे और दिलचस्प जानकारी।
क्रमशः - - - - -

संजय द्विवेदी की सफलता के पीछे / मनोज कुमार




एक सपने के सच हो जाने जैसा
वो एक दुबला-पतला सा लड़का। आंखों में सपने लिए दूर एक कस्बानुमा शहर से भोपाल चला आया था। उत्तरप्रदेष के कस्बानुमा बस्ती शहर के इस लड़के के भीतर आग थी। इसी आग के कारण वह पत्रकारिता की पढ़ाई करने चला आया था। जैसा कि होता है युवा मन में आमूलचूल परिवर्तन की आग होती है। यह आग उसके भीतर भी थी। सपना था तो पत्रकारिता में मुकाम बनाने का। यह इसलिए भी कि संजय द्विवेदी नाम के इस लड़के का रिष्ता उस प्रदेष से था जहां पत्रकारिता पेषा नहीं, परम्परा के रूप में इतिहास के पन्नों पर दर्ज हैै। बाबूराव पराड़कर और गणेषषंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता को पढ़ते, देखते और सुनते हुए संजय के मन में कुछ करने की लालसा थी। सपना था। पत्रकारिता की औपचारिक डिग्री लेने के बाद अपने साथियों के साथ वह भोपाल के अखबारों में सबक सिखता रहा। संजय के भीतर आग के साथ सपने भी थे तो उसके लक्ष्य बड़े थे। वह कुछ अलग करने की लालसा में आगे निकल जाना चाहता था। निकला भी। बस्ती से भोपाल और भोपाल से दिल्ली, मुंबई होते हुए रायपुर बिलासपुर को उसने अपना मुकाम बना लिया। अखबारों में वह संपादक की श्रेणी में जा बैठा। बिलासपुर में स्वदेष के श्रीगणेष करने का श्रेय भी संजय के हक में था तो भास्कर और हरिभूमि जैसे सुपरिचित अखबारों में वह पहली पंक्ति में अपना स्थान बनाया। हौले हौले संजय के सपने जमीन पर उतर रहे थे। वह कागज की दुनिया से कैमरे के सामने जा खड़ा हुआ। जी छत्तीसगढ़ में एक बड़ी जिम्मेदारी के साथ काम करते रहे।
यथा नाम तथा गुण की कहावत संजय पर खरी उतरती है। वह हवा के रूख को भांप लेते हैं। उसे लगा कि मीडिया का भविष्य वैसा नहीं है, जैसा उसने सोचा था। मीडिया की दुनिया को अलविदा कहकर वह अकादमिक की ओर मुड़ गए। पहले कुछ दिनों तत्कालीन कुषाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विष्वविद्यालय में अध्यापन करने के बाद जिस विष्वविद्यालय से सफर शुरू हुआ था, वहीं पहुंच गए। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विष्वविद्यालय में बतौर प्राध्यापक नियुक्त हो गए। लगातार 10 वर्षों तक जनसंचार विभाग के मुखिया रहने के बाद इसी विष्वविद्यालय में लम्बे समय तक कुलसचिव बने रहने का गौरव भी पाया। जिस विष्वविद्यालय में वह कभी विद्यार्थी हुआ करता था, आज कार्यवाहक कुलपति के पद पर आसीन है। संजय की कामयाबी उनके अपने लोगों को कभी नहीं रूचा। जब तब उसके रास्ते में कांटें बोते चले गए। लेकिन जिद्दी संजय भी उन्हें धता बताकर आगे और आगे बढ़ते गए। अभी वह उम्र के जिस पड़ाव पर है और जिन पदों प रवह रह चुके हैं अथवा बने हुए हैं, लोगों की तकलीफ का बड़ा कारण है। उसके समकालीन लोग उसकी कामयाबी से इसलिए खफा हैं कि वे उस मुकाम को हासिल नहीं कर सके।
जो लोग संजय को निकट से नहीं जानते हैं। उनके लिए संजय एक पहेली भी है। संजय मीठा बोलते हैं। कुषल प्रवक्ता हैं और नियमित लिखते हैं। एक पत्रकार, एक अकादमिक होने के साथ वे एक कामयाब पीआरओ भी हैं। उन पर संघ का करीबी होने की छाप है। यह सच भी है लेकिन यह भी सच है कि उनके रिष्ते सभी राजनीतिक दलों से है। वे पत्रकार के रूप में प्रतिबद्ध हैं लेकिन संघ की विचारधारा उनकी निजी है। इसका असर उनके रिष्तों पर नहीं पड़ता है। पत्रकारिता के गुरुओं को वे पूरा सम्मान देते हैं। अपने अनुजों का, अपने विद्यार्थियों का खयाल रखते हैं। समवय के लोगों के साथ वे तो दोस्ताना रहना चाहते हैं लेकिन उन्हें संजय रास नहीं आते हैं। वे कई बार आपस में चर्चा में कहते हैं- जो मिला, ईष्वर और बड़ों की कृपा से। मैं अपने शत्रुओं पर अपना समय खर्च नहीं करता हूं। इतने समय में मैं कुछ अच्छा पढ़ लूं, कुछ अच्छी बातें कर लूं। यही मेरे लिए सार्थक औ उपयोगी होगा।
संजय मेरे अनुज की तरह हैं। मैं बहुत ज्यादा जानने का दावा नहीं कर सकता लेकिन इतना कह सकता हूं कि वे जिसे सम्मान देते हैं तो दिल से। संजय की खूबिया खूब है तो कुछ कमियां भी है। हवा के रूख को पहचान कर वे अपना रास्ता तय कर लेते हैं। सम्पर्कों का लाभ उठाने में कभी पीछे नहीं रहे लेकिन किसी का नुकसान कर आगे बढ़ने में उनकी रूचि नहीं रही। स्वयं की ब्राडिंग करने में वे कभी चूकते नहीं हैं। विद्यार्थियों के वे हमेषा से प्रिय रहे हैं। उनकी सभा-संगत या किसी पहल को संजय का ना केवल समर्थन मिलता है बल्कि खुले हाथांे से उनकी आर्थिक मदद भी करते हैं। एक छात्र से कार्यवाहक कुलपति तक पहुंचने के रास्ते में संजय को कंटक भरे रास्तों से गुजरना पड़ा है। खासतौर पर बीते डेढ़-पौने दो साल तो जैसे बुरे स्वप्न की तरह था। कलाम साहब की उस वाक्य को भी संजय जीते हैं। उन्होंने कहा था-सपने खुली आंखों से देखो। आज खुली आंखों से देखा हुआ सपना संजय का सच हो गया। यह सब लिखते हुए निजी तौर पर मैं इसलिए प्रसन्न हूं कि दो साल पहले मैंने इसी विष्वविद्यालय के कुलपति बनाये गए मेरे अग्रज जगदीष उपासने पर लिखा था कि उपासने हो जाना सरल नहीं है तो इस बार अपने अनुज की उपलब्धि पर लिखते हुए उतनी ही प्रसन्न्ता महसूस कर रहा हूं कि एक सपने का सच हो जाने जैसा है प्रोफेसर संजय द्विवेदी का कार्यवाहक कुलपति बन जाना। यह भी संयोग है कि जब उपासनेजी कुलपति बने थे तो पत्रकार जगत में उनका स्वागत हुआ था तो संजय द्विवेदी के कार्यवाहक कुलपति बनाये जाने पर भी ऐसा ही स्वागत हुआ है। प्रोफेसर संजय द्विवेदी के सामने चुनौतियों का पहाड़ है लेकिन मुझे पता है कि वे भरोसे को कायम रखेंगे। बधाई संजय।

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मेरी पहली विदेश यात्रा भाग-2 / त्रिलोकदीप





उन दिनों विदेशी मुद्रा1के लिए रिज़र्व।बैंक का परमिट ज़रूरी होता था। वैसे विदेश जाने वाले सैलानी को 8 डॉलर या 3 पाउंड ही मिला करते थे। पश्चिम जर्मनी की मेरी यह यात्रा 16 फरवरी से  1 मार्च, 1975 तक थी। उसके बाद मुझे लंदन औऱ रोम जाना था जिस का प्रबंध मेरी जर्मनी वाली टिकट में ही कर दिया गया। लंदन में उस समय टाइम्स ऑफ इंडिया के विशेष संवाददाता जे.डी. सिंह थे, उन्हें मैंने अपने लंदन आने की खबर दे दी थी। पश्चिम जर्मनी देखने का मन में बहुत उत्साह था। 1945 में दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हुआ था। लेकिन सितंबर 1949 को ही मित्र देशों अमेरिका,।ब्रिटेन और फ्रांस से खुदमुख्तारी प्राप्त हुई थी। उसकी पुरानी राजधानी बर्लिन पर मित्र देशों का अधिकार था। लिहाज़ा उसने बोन में अपनी नई राजधानी बनाने का1फैसला किया और वहां के लोग दिलोजान से देश के पुनर्निर्माण के काम में जुट गये। इसी प्रकार ध्वस्त हुए दूसरे शहरों के पुर्ननिर्माण का काम पूरी रफ्तार पर था। मन में यह देखने की ललक थी कि किस तरह से तीस साल के भीतर न केवल अपने देश को जर्मनी ने नई राजधानी सहित  देश को  अपने पैरों पर खड़ा कर दिया बल्कि आर्थिक तौर पर भी वह बहुत मजबूत ही गया है।  जब मैं फ़्रंकफ़र्ट एयरपोर्ट पर उतरा तो उसे देखकर गजब का रोमांच महसूस हुआ। न केवल वह बहुत ही आधुनिक हवाई अड्डा था बल्कि उस दौर का सबसे बड़ा।  ऐसा लग कि वास्तव में यह1शहर जर्मनी की धड़कन ह। ऊंची गगनचुंबी इमारतें, दुनिया भर के बैंक, रेलों से जुड़ाव, सभी2संस्कृतियों2का1संगम वहा दीख रहा था।



दिल्ली की दिल्ली में तलाश- दिल्लीवाल / नलिन चौहान



देहलीवाल

बारहवीं शताब्दी के मध्य में अजमेर के चौहानों से पहले तोमरों राजपूतों ने दिल्ली को अपनी पहली बार अपने राज्य की राजधानी बनाया था। तोमर वंश के बाद दिल्ली की राजगद्दी पर बैठे चौहान शासकों के समय में दिल्ली राजनीतिक स्थान के साथ एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन गई थी। तत्कालीन दिल्ली में व्यापक रूप से प्रचलित मुद्रा, देहलीवाल कहलाती थी। वैसे तो उस समय सिक्के, शुद्ध चांदी से लेकर तांबे के होते थे। पर सभी सिक्कों को चांदी की मुद्रा के रूप में ढाला गया था और सभी एक ही नाम देहलीवाल से जाने जाते थे।

सन् 1192 में तराइन के लड़ाई में विदेशी मुसलमान हमलावर मुहम्मद गौरी की जीत और अंतिम भारतीय हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की हार के साथ दिल्ली की राजनीति में बदलाव से साथ आर्थिक रूप से दिल्ली टकसाल की गतिविधियों में भी परिवर्तन आया। दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में सत्ताईस हिंदू मंदिरों के ध्वंस की सामग्री से खड़ी की गई नई मस्जिद के शिलालेख में उत्कीर्ण जानकारी के अनुसार, इस मस्जिद के निर्माण में 120 लाख देहलीवाल का खर्च आया।

उल्लेखनीय है कि विदेशी मुस्लिम हमलावर भी दिल्ली के हिंदू राजपूत शासकों की मुद्रा को देहलीवाल के नाम से ही पुकारते थे। वैसे बैल-और-घुड़सवार के सिक्कों का उत्पादन तो जारी रहा पर इन सिक्कों से राजपूत शूरवीरों की आकृति को हटा दिया गया। उनकी आकृति के स्थान पर संस्कृत में उरी हउमीरा (अमीर या सेनापति) और देवनागरी लिपि में उरी-महामदा के साथ बदल दिया गया।

इस पूरी अवधि के दौरान दिल्ली टकसाल की उत्पादन क्षमता स्थिर और उत्पादन की दर भी काफी हद तक एकसमान थी। अंग्रेज़ इतिहासकार एडवर्ड थॉमस के अनुसार, मोहम्मद बिन साम यानी मुहम्मद गौरी की मौत तक जन साधारण व्यक्तियों का मौद्रिक लेनदेन देहलीवाल की मुद्रा में ही होता थी। देहलीवाल मुद्रा का भार 32 रत्ती था। ऐसा देखा गया है कि अधिकतर प्राचीन भारतीय मुद्राएं औसत रूप से 50 ग्रेन भार की होती थी। जैसे वराह वाली चांदी की पुराने मुद्राओं सहित राजपूत मुद्राओं का औसतन भार 50 ग्रेन होता था। उल्लेखनीय है कि भारत में महाराज मनु के काल से ही चांदी तौलने का माप रत्ती होता था।

भारतीय इतिहासकार डी.सी. सरकार की पुस्तक भारतीय सिक्कों में अध्ययन के अनुसार, बारहवीं शताब्दी के अंत में, मोहम्मद गौरी ने अपनी स्वर्ण मुद्रा के लिए गहड़वाल की सिक्के पर बैठी लक्ष्मी को अपनाया। गुलाम वंश के सुल्तानों ने देहलीवाल नामक सिक्के जारी किए, जिसमें एक ओर प्रसिद्व चौहान घुड़सवार और दूसरी ओर भगवान शिव के बैल के साथ नागरी अक्षरों में शाही नाम खुदा हुआ था। उनके सिक्के आम तौर पर चांदी और तांबे के मिश्रण से बने थे, जिनका वजन 56 सेर था। उनके सोने के सिक्के भी चांदी और तांबे के मिश्रण वाले सिक्कों के समान ही थे।

गौरतलब है कि दिल्ली के विभिन्न शासकों-तोमर, चौहान, गौरी और गुलाम-वंश के दौर में दिल्ली टकसाल की स्थिति कोई खास अलग नहीं थी। 12 वीं सदी में विभिन्न राजपूत शासकों के शासनकाल में दिल्ली टकसाल ने करीब एक अरब सिक्के ढ़ाले थे।

वर्ष 1053 के बाद से गांधार यानि आज के अफगानिस्तान में स्थित गजनी राज्य से चांदी की लगातार आमद ने दिल्ली टकसाल के पीढ़ी दर पीढ़ी सिक्का बनाने वाले कारीगरों को एक मानक स्तर के वजन वाले सिक्के (3.38 ग्राम) तैयार करने में मदद की थी। उस समय धातु सामग्री, सामान्य वजन सीमा और डिजाइन में यह सिक्का शाही दिरहम पर आधारित था। चांदी-तांबा की मिश्र धातु वाले इन सिक्कों में विशुद्ध रूप से 0.59 ग्राम चांदी होती थी।

उस दौर में भारतीय व्यापारी अपने व्यापार के लिए लाल सागर की नौवहन प्रणाली का उपयोग करते थे। इस समुद्रपारीय व्यापार के कारण इन सिक्कों का चलन फारस की खाड़ी से भारत के उत्तर पश्चिम तट तक हो गया था। उल्लेखनीय है कि इन सिक्कों में वर्ष 1180 में खलीफा शासन के दौरान यूरोपीय चांदी के टुकड़ों से दोबारा गढ़े गए सिक्के शामिल थे।

बारहवीं सदी के उत्तरार्ध में पश्चिम यानी यूरोप से होने वाली चांदी की नियमित आपूर्ति के परिणामस्वरूप उत्तर भारत में सिक्के गढ़ने वालों ने गुजराती गड़िया पैसा और राजपूतों के देहलीवाल सिक्के बनाए।
हालांकि पूरे मुइजिद शासन (1192-1210) और गुलाम वंश के कालखंड में बैल-और-घुड़सवार वाले देहलीवाल सिक्कों का उत्पादन और पूर्ववर्ती राजपूत सिक्कों के रूप में उनका उपयोग समान रूप से जारी रहा। लेकिन सिक्के के मानक भार में पांच प्रतिशत की वृद्धि करने के साथ समान रूप से ही उतनी ही प्रतिशत चांदी घटा दी गई।

दिल्ली के बैल-घुड़सवार के सिक्कों के ढलने यानि तैयार करने का कार्य जारी रहने के कारण ही वर्ष 1192-1216 तक के कालखंड में इन सिक्कों का निर्यात गांधार, पंजाब और अफगानिस्तान से आगे तक होता रहा।
मुहम्मद बिन साम (1193-1206), इल्तुतमिश (1210-1235), रूक्न अल दीन फिरोज (1235), रादिया (1236-1240), मुइज्ज अल दीन बहराम (1240-1242), अलाउद्दीन मसूद (1242-1246) और नासिर उल-दीन महमूद (1246-1266) के सोने और तांबे के सिक्के देहलीवाल ही कहलाते थे। इन छोटे सिक्कों की एक ओर शिव का बैल (नंदी) और दूसरी ओर राजपूत घुड़सवार होता था और लंबाई में राजा का नाम नागरी लिपि में या अरबी की कुफिक शैली में लिखा होता था।

उत्तर भारत में स्थापित दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने चांदी और तांबे के सिक्कों पर आधारित मुद्रा प्रणाली को ही चलाए रखा जिसमें चांदी के टका और देहलीवाल का प्रभुत्व था। इसके साथ ही, तांबे का जीतल का भी प्रचलन था। जीतल पुरानी हिंदू देहलीवाल मुद्रा का ही एक विस्तार था जो कि देहलीवाल से अधिक लोकप्रिय तो था पर उसका दायरा एक हद तक शहर तक ही सीमित था।

जब वर्ष 1210 में इल्तुमिश दिल्ली के सुल्तान बना तो उसे विरासत में मिली सिक्कों की टकसालों में दिल्ली में मुसलमानों के राज से पहले के राजपूती सिक्कों का गढ़ना जारी था। यह काम वर्ष 1220 में मध्य एशिया में चांदी के उत्पादन के खत्म होने तक कायम रहा।

तुर्कों की दुश्मन रियासतों के गुजरात और बंगाल के समुद्री तटों पर कब्जे के कारण वर्ष 1220 में दिल्ली सल्तनत को पश्चिम से समुद्र की ओर से होने वाली होने वाली चांदी की महत्वपूर्ण आपूर्ति अवरुद्ध हो गई। इसका परिणाम देहलीवाल के अस्तित्व पर संकट के रूप में सामने आया।
अंग्रेज़ इतिहासकार एच नेल्सन राइट के अनुसार, शम्स अल-दीन इल्तुतमिश (1210-1235) के दौर में दिल्ली की मुद्रा के मानकीकरण के साथ इन सिक्कों में चांदी की मात्रा को घटाकर आधा कर दिया गया।

नए सिक्के, जिसे जीतल का नाम दिया गया, का वजन 32 रत्ती था। जीतल में प्रयुक्त चांदी और तांबे का संयुक्त मूल्य चांदी की दो रत्ती के बराबर था। जबकि तांबे के लिए चांदी का सापेक्ष मूल्य 1:80 था। दक्षिण भारत में देवगिरी पर दिल्ली सल्तनत के सुलतानों की जीत के बाद उत्तरी भारत में जीतल का चांदी के टका का सापेक्ष मूल्य बदलकर 1:48 और दक्कन में 1:50 हो गया। दक्षिण भारत में इसके थोड़े से अंतर से महंगा होने का कारण यह था कि तांबा विदेशों से आयात किया जाता था।

तत्कालीन इतिहास की पुस्तकों में सिंध के शासक मलिक नासिरूद्दीन कुबाचा के अपने बेटे के माध्यम से इल्तुतमिश को एक सौ लाख देहलीवाल की पेशकश करने और अपने पिता की मौत पर उसके बेटे के इल्तुतमिश के शाही खजाने में पांच सौ लाख देहलीवाल जमा करवाने का हवाला आता है।

उत्तर भारत में दिल्ली के सुल्तान शम्स अल-दीन इल्तुतमिश का शासनकाल को राजनीतिक सुदृढ़ीकरण का दौर माना जाता है और राइट के मुताबिक, यह दिल्ली के सिक्कों के इतिहास में एक मील का पत्थर था।
इतिहासकार राइट के अनुसार 48 जीतलों का एक टका था। एक जीतल दो रत्तियों के बराबर था। और इस तरह से, वह टका और जीतल दोनों को तब उत्तर भारत में प्रचलित माशा और रत्ती के सोने के वजन मानक से जोड़ने में सफल रहा। उसके बाद हमारे समय में दशमलव प्रणाली को अपनाया गया था।

"हिस्ट्री ऑफ सिविलाइजेशनंस ऑफ सेंट्रल एशिया" पुस्तक में लेखक मुकम्मद साजपिदिनोविक अस्मीमोव लिखते हैं कि एडवर्ड थॉमस के बारे में अपने पहले के विचारों का खंडन करने के बाद, राइट ने इल्तुतमिश की चांदी के टका का सही ढंग से मूल्य आंकने का दावा किया जो कि एक तोले के बराबर था। उदाहरण के लिए, 12 माशा और प्रत्येक माशा में 12 रत्ती थी। ऐसे, एक तोला 96 रत्तियों के बराबर था। भारतीय रुपए के मामले में वजन का मानक आज के समय तक कायम है। दूसरी नई बात जीतल का चलना था, जिसने पुराने देहलीवाल मुद्रा का स्थान लिया।

शनिवार, 23 मई 2020

1975 में पहली विदेश यात्रा / त्रिलोकदीप




आज सहसा मुझे  1975 की अपनी पहली प्रमुख विदेश यात्रा की याद आ गयी।

प्रमुख इसलिए क्योंकि इस से पहले नेपाल की तराई बिराट नगर कुछ घंटों के लिए  हो आया था अपनी एक बिहार यात्रा के दौरान ।

यह प्रमुख यात्रा संघीय जर्मन गणराज्य यानी पश्चिम जर्मनी की थी। उस समय दो जर्मनी थीं। दूसरी का नाम था जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य यानी GDR यानी पूर्व जर्मनी। एक दिन पश्चिम जर्मनी के प्रेस कॉउंसलकर मिस्टर पुटकर्मर को शाम करीब चार बजे फोन आया कि हमारी सरकार ने आपको दो हफ्ते के लिए आमंत्रित किया है।

कुछ दिनों के बाद विदेश मंत्रालय के माध्यम से पश्चिम जर्मनी के भारत में राजदूत Guenter Diehl  ने औपचारिक निमंत्रण पत्र भेजते हुए आशा व्यक्त की कि मेरी इस यात्रा से भारत और जर्मनी में मैत्री संबंध सुदृढ़ होंगे तथा दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी समझदारी और भाईचारा बढ़ेगा। विदेश मंत्रालय के नत्थी पत्र में यह बताया गया था कि  वित्त  मंत्रालय को इस निमंत्रण के बारे में जानकारी देते हुए 'पी' फॉर्म भेजा गया है ताकि वह रिज़र्व बैंक को मुझे यथोचित विदेशी मुद्रा देने का परमिट जारी कर सके।


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रवि अरोड़ा की नजर में




समुद्र मंथन से निकलेगा झुनझुना

रवि अरोड़ा

यदि हमसे पूछा जाए कि पौराणिक कथा समुंद्र मंथन में मथनी किस पर्वत को बनाया गया था तो यक़ीनन हममें से अनेक लोग झट से बता देंगे- मंदराचल पर्वत । अब यदि पूछा जाये कि कोरोना संकट से अमृत निकालने को जो सरकारी प्रयास हो रहे हैं , उसमें वह मथनी कौन है जिसके हिस्से केवल पीड़ा और टूट-फूट ही आनी है तब शायद कुछ ही लोगों के मुँह से निकलेगा- मध्य वर्ग यानि मिडिल क्लास । जवाब न देने का कारण लोगों की अज्ञानता नहीं वरन पीड़ा को चुपचाप सह जाने की प्रवृत्ति ही है । कोरोना मंथन में अमृत निकलेगा अथवा नहीं , अन्य रत्न क्या क्या होंगे , शेषनाग की भूमिका में कौन है और दैत्य व देवता किसे कहा जाये ? इसका कोई भी जवाब मेरे पास नहीं है मगर एक छोटा सा भाग होने के चलते यह मैं यक़ीन से कह सकता हूँ कि इस मंथन में मंदराचल की तरह चक़रघिन्नी मध्य वर्ग ही बनेगा ।


आँकड़े बताते हैं कि देश में तीस करोड़ से अधिक लोग मध्य वर्ग की श्रेणी में आते हैं । विश्व गुरु और चौथी बड़ी आर्थिक शक्ति बनने का ख़्वाब देश इसी वर्ग के दम पर देख रहा है । यही वह वर्ग है जिसकी क्रय शक्ति को तमाम सरकारें दुनिया भर में भुनाती रही हैं । जीडीपी और शेयर बाज़ार का सेंसेक्स इसी के दम पर कुलाँचे मारता है । रीयल एस्टेट, कम्प्यूटर, मोबाइल फ़ोन, विलासिता के तमाम ब्राण्ड और क्रेडिट कार्ड जैसे इकोनोमिक बूस्टर इस मिडिल क्लास के रहमो करम पर हैं । इसी वर्ग के हाउसिंग लोन, कार-स्कूटर और कंजयूमर लोन ही देश की बैंकिंग व्यवस्था का आक्सीजन हैं । बीमा कम्पनियों को भी सर्वाधिक भुगतान यही वर्ग करता है । पैसे-धेले की दुनिया से इतर बात करें तो तमाम सांस्कृतिक-धार्मिक़ और सामाजिक मूल्यों का  पोषक भी यही वर्ग है । मगर कोरोना संकट के इस काल में देश के इस महत्वपूर्ण वर्ग के प्रति व्यवस्था कितनी सहयोगी है , यह प्रश्न मौजू है ।

इसमें कोई दो राय नहीं कि मध्य वर्ग भारतीय मानस का शब्द ही नहीं है और इसे हमने यूरोप से उधार लिया है । यह भी सच है कि अंग्रेज़ों से पहले इस तरह का कोई वर्ग हमारे यहाँ था ही नहीं । अपने लाभ के लिए अंग्रेज़ी हुकूमत ने जो अभिजात्य वर्ग पैदा किया मूलत वही इस वर्ग का सृजक है । इससे पूर्व तो हम वर्ण और जातीय व्यवस्था वाले देश थे । विद्वान बताते हैं कि देश 1857 की पहली क्रांति से पहले देश सामाजिक वर्गों में और क्रांति के बाद राजनैतिक वर्गों में विभाजित हुआ । आज़ादी यानि 1947 के बाद ही आर्थिक केटेगरी बनी और शहरीकरण के चलते यह मध्यवर्ग परवान चढ़ा । न जाने क्या वजह रही कि दुनिया भर के राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषकों ने कभी इस वर्ग को गम्भीरता से नहीं लिया । मार्क्सवादी विचारधारा के जनक कार्ल मार्क्स ने तो बुर्जुआ कह कर इसे हेय दृष्टि से ही देखा । भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी देखें तो इस वर्ग को वह सम्मान और सहयोग अभी तक नहीं मिला है , जिसकी वह हक़दार है ।


क़ोरोना संकट से पार पाने के लिए बीस लाख करोड़ की बंदर बाँट आजकल हो रही है । इसी पैकेज से कोरोना मंथन होना है । मगर साफ़ दिख रहा है कि मंथन में पर्वत बने मध्य वर्ग के हिस्से अभी तक झुनझुना भी नहीं आया है । भविष्य के सपने बुनने वाली हवाई योजनाएँ यदि धरती पर उतर भी आईं तो भी अमृत चाटने को समृद्ध वर्ग तैयार बैठा है । मध्य वर्ग को तो बस जो बैंकों की किश्त छः महीने बाद अदा करने का झुनझुना मिला है उससे भी अंततः उसकी ही जेब कटेगी । न बिजली का बिल मुआफ़ हुआ न हाउस टैक्स । न कोई किश्त मुआफ़ हुई न कोई सरकारी अदायगी । लघु उद्योगों के नाम पर कुछ घोषणाएँ हैं , वह भी क़र्ज़ देने भर की हैं । सीधे लाभ के नाम पर तो पाँच रुपये का एक अदद मास्क तक नहीं मिला । ऊपर से ताली-थाली बजाने और दीया जलाने का काम भी इसी वर्ग के ज़िम्मे । शायद इसे ही कहते हैं- रहने को घर नहीं , सारा जहाँ हमारा है ।

गामा पहलवान की कहानी




Navbharatimes

दिल्ली में  गामा पहलवान, लाहौर में मंटो के साथ

कुश्ती और अखाड़ों का जब भी जिक्र होगा तो गामा पहलवान का नाम बड़े आदर भाव से लिया जाएगा। गामा दिल्ली जब भी आए तो वे सब्जी मंड़ी में घंटाघर के पास, रोबिन सिनेमा के करीब, अब भी आबाद खलीफा बद्री के अखाड़े में अवश्य पहुंचे। अपने जीवनकाल में ही दंतकथाओं का पात्र बन गए गामा के साथ उनके छोटे भाई और बेहतरीन पहलवान इमामबख्श और दो-तीन चेले भी हुआ करते थे। 22 मई  1878 को  अमृतसर  में जन्में गामा का 23 मई 1960 को लाहौर में निधन हो गया था। गुरु हनुमान बताते थे कि गामा उनके शक्ति नगर स्थित अखाड़े में दिल्ली आने पर आते थे। दिल्ली में 1947 से पहले पंचकुईया रोड का मुन्नी पहलवान का अखाड़ा भी बहुत मशहूर हुआ करता था। इनके अलावा छोटे-मोटे अखाड़े तो अनेक थे ही। इस बीच, अजीब संयोग है कि लाहौर के एक कब्रिस्तान में मंटो और गामा बिलकुल साथ साथ चिर निद्रा में हैं ।

दिल्ली में गामा पहलवान आमतौर पर तब ही आते थे जब उन्हें जामा मस्जिद के पास तिकाना पार्क में होने वाले दंगलों में भाग लेने के लिए इतिहादी दंगल कमेटी आमंत्रित करती थी। इनमें देश भर के मशहूऱ पहलवान भाग लेते रहे हैं। पर इस बात के प्रमाण नहीं मिलते कि गामा दिल्ली के दंगल में कभी जोर-आजमाइश के लिए उतरे हों। दरअसल वे एक शर्त पर लड़ते थे। उनकी शर्त होती थी कि जो पहलवान उनके भाई को चित कर देगा उससे वे दो-दो हाथ करेंगे। हालांकि गामा दिल्ली के दंगल में आकर उभरते हुए पहलवानों को कुछ गुर अवश्य दे दिया करते थे। बहरहाल गामा को साक्षात देखने के लिए दिल्ली टूट पड़ा करती थी। वे किसी सुपर स्टार से कम नहीं थे। दिल्ली मेें तब कुदे सिया बाग में खलीफा चिरंजी भी दंगल करवाते थे।

 किसे बचाया था गामा ने 1947 में
देश बंटा तो गामा को भारत छोडना प़डा। वे दुखी मन से लाहौर चले गए। लाहौर में सांप्रदायिक दंगे भड़के हुए थे। तब गामा और उनके भाई ने अपनी जान को जोखिम में डालकर हिन्दुओं और सिखों को दंगाइयों से बचाया।  कहते हैं कि गामा ने भारत का रुख कर रहे कुछ
परिवारों की महिलाओं को ओढ़ने को चादरें भी  दी थी। गामा ने कहा था की काश हमारा जिस्म और बड़ा होता तो उसकी नाप के कपड़े बड़े होते,जो ज़्यादा लोगों के काम आते। गामा ने दंगाइयों को चेतावनी दी थी कि उसके मोहल्ले के हिंदुओं-सिखों को कोई हाथ भी लगाएगा तो उसे गामा छोडेगा नहीं। गामा महीनों अपनी गली की रखवाली करते रहे। अफसोस किगामा का अंतिम वक़्त आर्थिक तंगी में गुजरा। जब इसका बात की जानकारी उद्योगपति जी.डी.बिड़ला को मिली तो उन्होंने गामा को हर महीने 500 रुपए पेंशन भेजनी चालू कर दी थी।

बिहारी होने पर गर्व है क्योंकि............



प्रस्तुति-अमिताभ सिंह

बिहार -जहाँ भगवान राम की पत्नी सीता का जन्म हुआ
बिहार -जहाँ महाभारत के दानवीर करण का जन्म हुआ
बिहार - जहाँ सबसे पहले महाजनपद बना!
बिहार - जहा बुद्ध को ज्ञान मिला
बिहार -जहाँ भगवान महावीर का जन्म हुआ
बिहार -जहाँ सिखों के गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म हुआ
बिहार - जहाँ के राजा चन्द्रगुप्त मौर्या से लड़ने की हिम्मत सिकंदर को भी नही हुई
बिहार - जहाँ के राजा महान अशोक ने अरब तक हिंदुस्तान का पताका फहराया
बिहार - राजा जराशंध,पाणिनि(ज
िसने संश्कृत व्याकरण लिखा )
आर्यभट, चाणक्य(महान अर्थशात्री ) रहीम, कबीर का जन्म हुआ !
बिहार - जहाँ के ८० साल के बूढ़े ने अंग्रेजो के दांत खट्टे कर दिए (बाबु वीर कुंवर सिंह )
बिहार - जिसने देश को पहला राष्ट्रपति दिया
बिहार - जहाँ के गोनू झा के किस्से पुरे हिंदुस्तान में प्रशिद्ध है !
बिहार - जहाँ महान जय प्रकाश नारायण का जन्म हुआ !
बिहार - जहाँ भिखारी ठाकुर (विदेशिया) का जन्म हुआ !
बिहार - जहाँ शारदा सिन्हा जैसी महान भोजपुरी गायिका का जन्म हुआ !
बिहार - जहाँ - स्वामी सहजानंद सरस्वती, राम शरण शर्मा, राज कमल झा ,
विद्यापति, रामधारी सिंह‘दिनकर' रामवृक्ष बेनीपुरी, देवकी नंदन खत्री,
इन्द्रदीप सिन्हा, राम करण शर्मा, महामहोपाध्याय पंडित राम अवतार शर्मा,
नलिन विलोचन शर्मा, गंगानाथ झा, ताबिश खैर, कलानाथ मिश्र, आचार्य रामलोचन सरन, गोपाल सिंह नेपाली, बिनोद बिहारी वर्मा, आचार्य रामेश्वर झा
राघव शरण शर्मा, नागार्जुन आचार्य जानकी बल्लभ शाश्त्री जैसे महान लेखको का जन्म हुआ !
बिहार - जहाँ बिस्स्मिल्लाह खान का जन्म हुआ
बिहार - जहाँ आज भी दिलो में प्रेम बसता है
बिहार - जहाँ आज भी बच्चे अपने माँ - बाप के पैर दबाये बिना नही सोते
बिहार - जहाँ से सबसे ज्यादा बच्चे देश का सबसे कठिन परीक्षा u .p .s .c. और IIT पास करते है
बिहार - जहाँ के गाँव में आज भी दादा दादी अपने बच्चो को कहानिया सुनाते है
बिहार - जहाँ आज भी भूखे रह के अतिथि को खिलाया जाता है
बिहार - जहाँ के बच्चे कोई सुविधा न होते हुए भी देश में सबसे ज्यादा सरकारी नौकरी पते है !
हम इसी बिहार के रहने वाले हैं !
बिहार -जहां लोगों ने कोरोना संक्रमण के संकटग्रस्त समय में पूरे भारत को 🚶 पैदल ही नाप दिया,महामारी में भी बिहारी मजदूरों ने सरकार को भी स्वावलम्बन का मतलब बता दिया।।
तो क्यों न करे खुद के बिहारी होने पर गर्व !
और जो नही है वो जानकारी तो जरूर रखे।।
आखिर भारत के बाहर जाके तो बोल ही सकते है।।
जय बिहार तय बिहार।।
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शुक्रवार, 22 मई 2020

डा. मुरली मनोहर जोशी के साथ कुछ पल दो पल / त्रिलोकदीप




1999 की बात है। तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ .मुरली मनोहर जोशी ने एक दिन कहा कि नवंबर में गुरु नानक देव के 530वें जन्मदिन एक भव्य आयोजन की योजना है जिस का उदघाटन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी करेंगे। मैं चाहता हूं कि ऐसे सिख विद्वानों की एक सूची बनाकर मुझे दें जो अधिकारपूर्वक गुरु जी के जीवन पर अपने विचार व्यक्त कर सकें। मैं ने उन्हें करीब सौ लोगों की लिस्ट बना कर दे दी जिस में बुद्धिजीवियों से लेकर इतिहासकारों, संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों,  राजनीतिकों, पत्रकारों, सामाजिक एक्टिविस्ट के नाम दर्ज थे। इस सूची में देश भर के लोगों के नाम शामिल किये गए थे। मेरा नाम न देखकर जोशी जी बोले, तुमने अपना नाम क्यों नहीं लिखा। जब मैं ने कहा कि मैं कौनसा विशेषज्ञ हूं, उनका उत्तर था, यह तय करना न तुम्हारा काम है और न ही अधिकार ।सचमुच डॉ. जोशी का मुझे बहुत स्नेह प्राप्त है, और आज भी है। 5 नवंबर, 1999 में एक भव्य आयोजन हुआ। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उपस्थिति देखकर आश्वस्त दीखे शायद इसलिए कि उनमें से बहुत से लोगों को वह व्यक्तिगत तौर पर जानते थे। उदघाटन समारोह बहुत ही गरिमापूर्ण रहा। जब मैं बाहर आया तो मेरी धर्मपत्नी ने फोन कर के बताया कि मेरी माता जी का निधन हो गया है। डॉ जोशी को मैं सूचित कर जब चलने लगा तो मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि धीरज रखो। मेरे साथ ही उस समय मेरे दो साथी सुदीप और शम्मी सरीन भी चल पड़े।