गुरुवार, 26 नवंबर 2015

गरमी से जीव जंतुसमेत धरती बेहाल

 

 

 

 

 

 दिसंबर का महीना, सर्दी का नामोनिशान नहीं

Posted on: December 01, 2014 02:53 PM IST | Updated on: December 01, 2014 02:53 PM IST


नई दिल्ली। दिसंबर का महीना है, लेकिन सर्दी का नामोनिशान नहीं। हल्के-फुल्के कपड़े में धूप सेंकने वाला मौसम है। कायदे से दिसंबर में अच्छी-खासी ठंड होने लगती है मगर इस बार ऐसा नहीं है। इस गुनगुने मौसम का आनंद जरूर लें लेकिन बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मौसम की ये बेवफाई है खतरे की ग्लोबल घंटी।
धरती धीरे-धीरे गरम ग्रह में बदल रही है। दिल्ली में 28 नवंबर 5 साल का सबसे गरम दिन रहा। 5 साल में नवंबर के सबसे गर्म दिन के तौर पर 28 नवंबर का तापमान 30.2 डिग्री सेल्सियस रहा। साल 2014 की ये कोई अकेली घटना नहीं है। दुनिया की गरम मिजाजी का सबसे बड़ा सबूत ये है कि साल 2014 दुनिया का सबसे गरम साल साबित हो सकता है।
दुनिया में 1880 से हर साल के तापमान का रिकॉर्ड रखा जा रहा है, 130 साल के इतिहास में सबसे गरम साल साबित हो सकता है। ये इशारा है कुदरत के उस गुस्से का जिसकी वजह से दुनिया में बारहोमासी मौसम एक जैसा होने की तरफ बढ़ रहा है। यानी मई-जून, दिसंबर-जनवरी हर महीने में दुनिया एक जैसी होगी। ऐसा हुआ तो गंभीर नतीजे भुगतने पड़ेंगे।
लंबे वक्त से जानकार चेता रहे हैं कि एक जैसा मौसम हुआ तो दुनिया प्रलय के मुहाने पर आ सकती है। एक जैसा मौसम अपने साथ कई समस्याएं ले कर आएगा। फसलें चौपट हो जाएंगी, बीमारियां महामारी का रूप लेने लगेंगी और दुनिया के इस बदले चेहरे के जिम्मेदार होंगे हम।
दिसंबर 2014 में सर्दी में भी गर्मी, सितंबर 2014 'जनत' में जल प्रलय, जुलाई 2014 114 साल का सबसे बड़ा सूखा, जून 2014 औसत तापमान 45 डिग्री से.। ये साल 2014 की चार तस्वीरें हैं, जो मौसम के मिजाज में बदलाव का ही नहीं बल्कि सीधे जलवायु परिवर्तन की तरफ इशारा कर रही हैं।
इस साल भारत में हर मौसम में मौसम ने अपना चरम रूप दिखाया है। सितंबर में जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में भयंकर बाढ़ आई। जुलाई में बादल ऐसे रूठे थे कि 2014 में 114 साल का सबसे बड़ा सूखा पड़ा और मई-जून-और जुलाई में सूरज के सितम की कहानी ये थी कि भारत के तमाम शहरों में दिन चढ़ते ही कर्फ्यू जैसे हालात बन जाते थे।
इन महीनों में आमतौर पर शहरों का औसत तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास डोलता रहा। रही सही कसर दिसंबर में पूरी होती नजर आ रही है। जिस मौसम में सर्दी से हाड़-मांस कांप जाता था, उस मौसम में लोग स्वेटर पहने बिना दिन में गुलाबी गुनगुनी धूप सेंकते नजर आ रहे हैं।
नवंबर के आखिरी हफ्ते और दिसंबर में मौसम की तस्वीर, 28 नवंबर का तापमान बताने के लिए काफी है। 28 नवंबर का अधिकतम तापमान इस साल 30.2 डिग्री सेल्सियस था। 2013 में ये 28 डिग्री सेल्सियस था। 2012 में 26 डिग्री सेल्सियस ही था।
सर्दी में गर्मी का ये अहसास सिर्फ अहसास की ही बात नहीं है, वैज्ञानिक पड़ताल की हकीकत भी गरम होते ग्रह की कहानी कह रही है। भारत ही नहीं समूची दुनिया में गर्मी बढ़ रही है। अमेरिकी वैज्ञानिक एजेंसी नेशनल ओशियानिक एंड एटमोसफेरिक एडमिनिस्ट्रेशन NOAA ने ताजा आंकड़ों के आधार पर आशंका जताई है कि साल 2014 दुनिया का सबसे गरम साल हो सकता है।
दुनिया में 1880 से यानी जबसे तापमान का रिकॉर्ड रखा जाना शुरू हुआ है, उसके मुताबिक 130 साल के इतिहास में 2014 के पहले 10 महीने सबसे गर्म रहे हैं। अमेरिका में हाल के हफ्तों में शुरुआती कड़ाके की सर्दी के बावजूद धरती के लिए यह साल अब तक का सबसे गर्म साल रहा है।
दुनिया के अबतक के आंकड़ों के मुताबिक में अक्टूबर का हालिया महीना सबसे गर्म रहा है। 20वीं सदी में अक्टूबर के औसत तापमान के मुकाबले साल 2014 का तापमान 0.74 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा है, जो इशारा है कि साल 2014 सबसे गर्म साल हो सकता है। हालांकि नासा ने साल 2014 को दूसरा सबसे गर्म साल और ब्रिटेन के मौसम विभाग ने इसे तीसरा सबसे गर्म साल कहा है।
अब तक साल 2010 दुनिया का सबसे गरम साल माना जाता है, इसके बाद 1998 को दूसरा सबसे गरम साल कहा जाता है। साल 2014 दोनों को पछाड़ पाएगा या नहीं, सही मायने में ये तय होगा अगले साल की जनवरी-फरवरी में जब 2014 के पूरे आंकड़े आ जाएंगे।
अलग अलग संस्थाएं अपने तरीके से मौसम का आकलन करती हैं। लिहाजा साल 2014 को लेकर हर संस्था के नजरिए में फर्क दिख रहा है। लेकिन अमेरिका के NOAA, NASA और ब्रिटेन के मौसम विभाग के आंकड़े विश्व मौसम विभाग भी लेता है। इनके आधार पर तय होगा कि साल 2014 कितना गर्म रहा-लेकिन इसमें कोई शक नहीं है दुनिया में गरमी बढ़ रही है।
2009 के कोपेनहेगन समझौते के मुताबिक दुनिया के तापमान में दो डिग्री सेल्सियस से ज्यादा की कोई भी बढ़ोतरी खतरनाक हो सकती है। दुनिया के तापमान में 2 से 3 डिग्री बढ़ोतरी के खौफनाक नतीजे सामने आ सकते हैं। भयंकर गर्मी, जबरदस्त सूखा, हाहाकारी तूफान, और जमा देने वाली बर्फबारी से जलवायु हमेशा के लिए बदल सकती है। इस लिहाज से खतरे की घंटी बज भी चुकी है। दुनिया के 10 सबसे गर्म साल 1997 के बाद रिकॉर्ड किए गए हैं। बीसवीं सदी में जहां औसत तापमान 57.1 डिग्री फाहरेनहाइट रहा है वहीं अब पारा इससे एक डिग्री से ऊपर चढ़ चुका है।


मंगलवार, 17 नवंबर 2015

टीवी रिपोर्टिंग सबसे तेज, कठिन और चुनौती भरा काम



डॉ. ब्रजमोहन:

( नवभारत टाइम्स से पत्रकारिता की शुरूआत। दिल्ली में दैनिक जागरण से जुड़े। 1995 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में। टीवीआई (बी.आई.टीवी), सहारा न्यूज, आजतक, स्टार न्यूज, IBN7 जैसे टीवी न्यूज चैनलों और ए.एन.आई, आकृति, कबीर कम्युनिकेशन जैसे प्रोडक्शन हाउस में काम करने का अनुभव। IBN7 न्यूकज चैनल में एसोसिएट एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर रहे । प्रिंट और इलेक्ट्रॉंनिक मीडिया में 19 साल का अनुभव)।



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समय के साथ बदली हिंदी पत्रकारिता की भाषा






संजय कुमार।

संजय कुमार।
हालांकि, इलैक्टोनिक मीडिया में आम बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। इसके पीछे तर्क साफ है कि लोगों को तुंरत दिखाया/सुनाया जाता है यहाँ अखबार की तरह आराम से खबर को पढ़ने का मौका नहीं मिलता है। इसलिए रेडियो और टी.वी. की भाषा सहज, सरल और बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। कई अखबारों ने भी इस प्रारूप को अपनाया है खासकर हिन्दी के पाठकों को ध्यान में रख कर भाषा का प्रयोग होने लगा है।
शुरुआती दौर की हिन्दी पत्रकारिता की भाषा साहित्य की भाषा को ओढे हुए थी। ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता साहित्य के बहुत करीब थी। जाहिर है इससे साहित्यकारों का ही जुड़ाव रहा होगा। बल्कि हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डालने से यह साफ हो जाता है। 30 मई 1826 में प्रकाशित हिंदी के पहले पत्र ‘‘उदंत मार्तण्ड’’ के संपादक युगल किशोर शुक्ल से लेकर भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र, पंडित मदनमोहन मालवीय, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, अंबिका प्रसाद वाजपेयी, बाबू राव विष्णु पराड़कर, आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी सहित सैकड़ों ऐसे नाम है जो चर्चित साहित्यकार-रचनाकार रहे हैं। अपने दौर में हिन्दी पत्रकारिता से जुड़े रहे और दिशा दिया। लेकिन समय के साथ ही हिंदी पत्रकारिता भी बदली है। संपादन, साहित्यकार से होते हुए पत्रकार के हाथों पहुंच गया और हिन्दी पत्रकारिता में हिन्दी भाषा की बिंदी अंग्रेजी बन गयी।
हिन्दी पत्रकारिता ने आज तकनीक विकास के साथ-साथ भाषायी विकास भी कर लिया है। भाषा को आम-खास के लिहाज से परोसा जा रहा है। जहाँ प्रिंट मीडिया व निजी सेटेलाइट चैनलों की भाषा अलग है वहीं सरकारी मीडिया रेडियो और दूरदर्शन की बिलकुल ही अलग। लेकिन, यह बात अहम है कि आज रेडियो, दूरदर्शन, सेटेलाइट चैनल और सोशल मीडिया पर हिन्दी को तरजीह मिल रही है। हिन्दी का वर्चस्व बढ़ा है, जो पूरे प्रभाव में है।
जहाँ धीरे-धीरे बदलाव के क्रम में पत्रकारिता से साहित्य और साहित्यकार दूर होते गये। वहीं भाषा में भी बदलाव आता गया। पत्रकारिता की साहित्यिक भाषा के स्थान पर सहज व सरल हिन्दी भाषा जो बोलचाल की भाषा रही है ने पांव जमा लिया। पैमाना बना कि पत्रकारिता की अच्छी भाषा वही है जिससे सूचना/खबर/जानकारी को साफ, सरल तथा सहज तरीके से लोगों तक पहुँचायी जा सके। पत्रकार और पत्रकारिता के उद्देश्य का वास्ता देकर कहा जाने लगा कि लाखों लोगों तक सूचना/खबर/जानकारी पहुँचे और सहजता से आम-खास जनता उसे समझ सकें। यही हुआ, हिन्दी पत्रकारिता में भाषा को आम चलन के तौर पर प्रयोग होते देखा गया।
मालवीय पत्रकारिता संस्थान, काशी विद्यापीठ के पूर्व निदेशक, राममोहन पाठक की माने तो, ‘वर्तमान दौर की शायद सबसे बड़ी चुनौती पत्रकारिता की भाषा है। पौने दो सौ से ज्यादा साल में भी संचार और जन माध्यमों की एक सर्वस्वीकृति वाली भाषा का प्रारूप नहीं तैयार हो सका है। यह भी सच है कि इस बीच समाज की भाषा भी काफी बदली है और लगातार बदल रही है। बाबूराव विष्णु पराड़कर ने मीडिया की भाषा को आमजन, मजदूर, पनवाड़ी पान बेचने वाले, अशिक्षित या कम शिक्षितों की भाषा बनाने का विचार दिया था।
इसके साथ ही, वह व्याकरण या शब्द-रचना को भ्रष्ट भी नहीं होने देना चाहते थे। वैश्विक स्तर पर ‘नव परंपरावादी’ कन्जर्वेटिस्ट, स्कूल व्याकरण को बाध्यकारी न मानकर, यह मानता है कि संदेश पहुंचना चाहिए, व्याकरण जरूरी नहीं है। इस आधार पर व्याकरण को न मानने वालों की मीडिया में तादाद बढ़ी है, किंतु इससे एक अनुशासनहीन भाषा संरचना विकसित होने का खतरा है। (देखें-‘‘नई भाषा गढ़ रहा है हिंदी मीडिया’, हिन्दुस्तान लाइव ,30-5-2014)। हुआ भी यही। हिन्दी पत्रकारिता की भाषा को लेकर सवाल उठने लगे। बाबूराव विष्णु पराड़कर की सोच जहाँ दिखी वहीं राममोहन पाठक की चिंता भी। व्याकरण को न मानने वालों की मीडिया में तादाद बढ़ी है। देसज शब्द के साथ-साथ अंग्रेजी शब्दों का प्रचलन बढ़ता ही गया और आज यह हिन्दी पत्रकारिता का हिस्सा बन चुका है।
इन सबके बीच आज के दौर में सबसे बड़ी चुनौती हिन्दी पत्रकारिता की भाषा को है। इसे लेकर कोई मापदण्ड तय नहीं हो पाया है। बल्कि कोई प्रारूप भी नहीं है। जिसे जो मन में आया वह करता जा रहा है। जल्द से जल्द और पहले पहल खबर लोगों तक पहुंचने की होड़ में लगे खबरिया चैनलों में कई बार भाषा के साथ खिलवाड़ होते देखा जा सकता है। कहा जा सकता है कि अनुशासनहीन भाषा की संरचना विकसित हो गयी है। खबर के लिए सुबह अखबार के इंतजार को इंटरनेट मीडिया और 24 घंटे खबरिया चैनल ने खत्म कर दिया है। चंद मिनट में घटित घटना लोगों तक पुहंच रहा है। ऐसे में भाषा का की गंभीरता का सवाल सामने आ जाता है।
हालांकि, इलैक्टोनिक मीडिया में आम बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। इसके पीछे तर्क साफ है कि लोगों को तुंरत दिखाया/सुनाया जाता है यहाँ अखबार की तरह आराम से खबर को पढ़ने का मौका नहीं मिलता है। इसलिए रेडियो और टी.वी. की भाषा सहज, सरल और बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। कई अखबारों ने भी इस प्रारूप को अपनाया है खासकर हिन्दी के पाठकों को ध्यान में रख कर भाषा का प्रयोग होने लगा है। इसके पीछे सोच यह है कि हिन्दी के पाठक हर वर्ग से हैं। इसमें पढे़-लिखे, आमजन, मजदूर, पनवाड़ी, चाय विके्रता, अशिक्षित या कम शिक्षित सब शामिल है। बाबूराव विष्णु पराड़कर ने भी मीडिया की भाषा को आमजन, मजदूर, पनवाड़ी, अशिक्षित या कम शिक्षितों की भाषा बनाने का विचार दिया था। हिन्दी के साथ यह देखा जा सकता है। चाय या पान की दूकान हो या ढाबा अशिक्षित या कम शिक्षित यहाँ रखे अखकार को उलट-पुलट कर पढ़ने की कोशिश करते है। टो-टो कर पढ़ते हैं और फिर खबर पर चर्चा भी करते हैं। इन सब के बीच क्षेत्रीय बोलियों का भी समावेश हुआ है। राष्ट्रीय से राजकीय और जिला यानी क्षेत्रीय स्तर पर अखबारों के प्रकाशन से भाषा में बदलाव आया है। क्षेत्रीय और जिले तक सिमटे मीडिया में वहां की बोलियों को स्थान मिल रहा है ताकि पाठक अपने आपको जुड़ा महसूस करें।
वहीं, यह भी सच है कि मीडिया खुद अपनी भाषा गढ़ रहा है। इसमें अंग्रेजी से आये संपादक और अंगे्रजीदां मालिक की भूमिका अहम रही है। नयी पीढ़ी तक अखबार को पहुंचाने के आड़ में हिन्दी में अंग्रेजी को प्रवेश करा दिया गया है। दिल्ली से प्रकाशित ज्यादातर हिन्दी अखबार की खबरें हिंगलीश हो गयी वहीं, र्शीषक आधा हिन्दी आधा अंग्रेजी में दिया जाता है। इसमें हिन्दी के चर्चित अखबार भी शामिल हुए जो हिन्दी भाषा के लिए जाने जाते थे। वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर की माने तो, ’नवभारत टाइम्स के दिल्ली संस्करण से विद्यानिवास मिश्र विदा हुए ही थे। वे अंग्रेजी के भी विद्वान थे, पर हिंदी में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बिलकुल नहीं करते थे। विष्णु खरे भी जा चुके थे। उनकी भाषा अद्भुत है। उन्हें भी हिंदी लिखते समय अंग्रेजी का प्रयोग आम तौर पर बिलकुल पसंद नहीं। स्थानीय संपादक का पद सूर्यकांत बाली सँभाल रहे थे। अखबार के मालिक समीर जैन को पत्रकारिता तथा अन्य विषयों पर व्याख्यान देने का शौक है। उस दिनों भी था। वे राजेंद्र माथुर को भी उपदेश देते रहते थे, सुरेंद्र प्रताप सिंह से बदलते हुए समय की चर्चा करते थे, विष्णु खरे को बताते थे कि पत्रकारिता क्या है और हम लोगों को भी कभी-कभी अपने नवाचारी विचारों से उपकृत कर देते थे। आडवाणी ने इमरजेंसी में पत्रकारों के आचरण पर टिप्पणी करते हुए ठीक ही कहा था कि उन्हें झुकने को कहा गया था, पर वे रेंगने लगे। मैं उस समय के स्थानीय संपादक को रेंगने से कुछ ज्यादा करते हुए देखता था और अपने दिन गिनता था। समीर जैन की चिंता यह थी कि नवभारत टाइम्स युवा पीढ़ी तक कैसे पहुँचे(देखें-‘हिंदी पत्रकारिता की भाषा’, हिन्दी समय में प्रकाशित)।
वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर जी की टिप्पणी देखें तो हिन्दी पत्रकारिता की भ्रष्ट होती भाषा के पीछे मालिकों की सोच जिम्मेदार है। अंग्रेजी भाषा में विद्वान होने के बावजूद हिन्दी के प्रति संपादकों का समपंर्ण दर्शाता है कि वे भाषा के प्रति सजग थे चाहे वह कोई भी भाषा हो, साथ ही उस भाषा से समझौता नहीं करते थे। हिन्दी पत्रकारिता की भ्रष्ट भाषा को खबरिया चैनलों ने भी खूब बढ़ावा दिया है। समाचार हो या बहस हिन्दी भाषा की टांग तोड़ा जाता है। व्याकरण का गड़बड़ झाला और हिन्दी में अंग्रेजी का तड़का अजीब हालात पैदा कर जाता है। हालांकि अभी भी कुछ मीडिया हाउस व्याकरण के गड़बड़ झाला और हिन्दी में अंग्रेजी के तड़के से परहेज करते है। कोशिश करते हैं कि भाषा भ्रष्ट न हो। लेकिन बाजारवाद के झांझेवाद में फंसा हिन्दी पत्रकारिता कंशमंश की स्थिति में है। बाजारवाद को भले ही दोषी ठहरा दें, यह भी वजह है कि आज पत्रकारिता में वह तेवर नहीं या फिर वह पुरानी बात नहीं जहंा आने वाला शक्स भाषा विद्वान हुआ करता था। भाषा पर पकड़ होती थी। अंग्रेजी हो या हिन्दी उसकी विद्ववता साफ झलकती थी। बदलाव के काल में हिन्दी पत्रकारिता की भाषा बदली तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन सवाल इसके भ्रष्ट होने का है। जो भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।
संजय कुमार दूरदर्शन केन्द्र, पटना में समाचार संपादक हैं.
संपर्क: 09934293148 ईमेल: sanju3feb@gmail.com

बुधवार, 4 नवंबर 2015

और अब देशव्यापी प्रदर्शन करेंगे पत्रकार




Posted by on Nov 2, 2015 | 0 comments
Jpegनई दिल्ली 2 नवंबर 2015:- नेशनल यूनियन आॅफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) की अगुवाई में आगामी 7 दिसंबर को पत्रकार सुरक्षा अधिनियम की गठन की मांग को लेकर देशभर के पत्रकार संसद का घेराव करेंगे। सोमवार 2 नंवबर, 2015 को एनयूजे के जंतर मंतर स्थित कार्यालय में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में यह घोषणा की गई। इस मौके पर प्रस्तावित घेराव का पहल पोस्टर भी जारी किया गया। इंटरनेशनल फैडरेशन आफ जर्नलिस्ट्स (ब्रूसेल्स) के अंतराष्ट्रीय कार्यक्रम ‘‘यून डे टू एंड-ईम्पयून्टिी एगेस्ट जर्नलिस्ट्स‘‘ के लिए प्रतिबद्धता जताते हुए बैठक में निर्णय लिया गया 2 नवंबर से 23 नवंबर, 2015 तक एनयूजेआई की सभी राज्य इकाईयां प्रदेश तथा जिला स्तर पर ज्ञापन देकर पत्रकारों की हत्याओं, शोषण और छंटनी के खिलाफ आवाज बुलंद करेगी। इस कड़ी में आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को ज्ञापन दिया गया।
बैठक में एनयूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष रासविहारी, महासचिव रतन दीक्षित, कोषाध्यक्ष दधिबल यादव, भारत सरकार की प्रेस एसोसिएशन के सचिव मनोज वर्मा, दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के महासचिव आनंद राणा,एनयूजे कार्यकारिणी के सदस्य मनोज मिश्र, प्रमोद मजूमदार, मनोहर सिंह, के अलावा वरिष्ठ पत्रकार राकेश आर्य, अशोक किंकर, संजीव सिन्हा, पवन भार्गव ने अपने विचार रखे।
राष्ट्रीय अध्यक्ष रासविहारी ने पत्रकार सुरक्षा अधिनियम के गठन को अत्यंत आवश्यक बताते हुए कहा कि आज देश भर में पत्रकारों की हत्या और जानलेवा हमलों की वारदाते बेतहाशा बढ़ती जा रही हैं। पत्रकारों में असुरक्षा का महौल व्याप्त है। उन्होंने कहा कि मीडिया काउंसिल और मीडिया कमीशन की मांग भी संसद घेराव के दौरान पुरजोर ढंग से उठाई जाएगी।
महासचिव रतन दीक्षित ने कहा कि इस प्रर्दशन में देशभर से करीब दो हजार पत्रकार हिस्सा लेगें। उन्होंने ‘‘एंड-ईम्पयून्टिी‘‘ में एनयूजे आई की भागीदारी का खाका पेश करते हुए बताया कि सभी राज्य इकाइयां संबंधित राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन देकर पत्रकार सुरक्षा के लिए आवाज बुलंद करेंगी। ज्ञापन जिला स्तर पर भी दिया जाएगा।
डीजेए महासचिव आनंद राणा ने  संसद के घेराव और ‘‘यून डे टू एंड-ईम्पयून्टिी एगेस्ट जर्नलिस्ट्स‘‘ कार्यक्रम को लेकर चलाए जा रहे राष्ट्रव्यापी सोशल मीडिया कंपैन की प्रगति पर रिपोर्ट बैठक में रखी।
बैठक में निर्णय लिया गया की आगामी एक महीने के दौरान राजनैतिक दलों, सांसदों और सामाजिक और श्रमिक संगठनों को पत्रकारों से जुड़ी समस्याओं से अवगत कराया जाएगा।