गुरुवार, 30 जून 2016

रवीश कुमार की एक चिठ्टी पत्रकारिता के दुकानदारों के नाम







By: Ravish Kumar NDTV
मेरे प्यारे प्रेरितों,
आज कल पत्रकारिता की पढ़ाई की कई दुकानें खुल गईं हैं। इन दुकानों की दुकान चलती रहे इसलिए अब इनकी भी रेटिंग होने लगी है। इनकी रेटिंग के नाम पर पत्रिकाओं की दुकान चलाती रहती है। आप उन्हें पढ़कर अपने सपनों की दुकान खोल लेते हैं। आप में से कइयों से मिल कर लगता है कि आपने चैनलों के एंकरों से प्रभावित होकर पत्रकार बनने का फ़ैसला किया। आप उनसे प्रेरित हो जाते हैं और आपको प्रेरित करवाया भी जाता है। ध्यान रहे प्रेरित होना या फैन होना कृत्रिम प्रक्रिया है। वैसे तो आप लोग कई एंकर पत्रकारों से प्रेरित होंगे लेकिन मेर सामने आते हैं तो आप मेरा ही नाम लेते हैं। इसका डेटा बताता है कि ठगी का शिकार होने वाले कई छात्र मुझसे भी प्रेरित होते हैं। लिहाज़ा एक प्रेरक के रूप में मेरा फ़र्ज बनता है कि प्रेरित से साफ साफ कह दूँ। पहले भी कस्बा में कह चुका हूँ। कस्बा की पहुँच सीमित है सो दुबारा लिख रहा हूँ। कृपया इस लेख को प्राइवेट और कई बार सरकारी संस्थानों में पत्रकारिता पढ़ रहे छात्रों तक पहुँचाने में मेरी मदद करें।
आप सभी जब ककड़ी की तरह खिच्चा खिच्चा उम्र में मुझसे टकरा जाते हैं तो मैं थोड़ा अवसाद से भर जाता हूँ। ऐसा नहीं कि आप योग्य नहीं हैं या आप आगे जाकर कुछ नहीं करेंगे। आप में से कुछ क़ाबिल भी होते हैं और कई झोल भी। कई बार झोल अच्छा कर जाते हैं और क़ाबिल झोल हो जाते हैं। मैं आम तौर पर कइयों से मिल नहीं पाता और सच बात ये हैं कि मिलना भी नहीं चाहता क्योंकि मेरी फ़ितरत ही ऐसी है।
मुझे ऐसा लग रहा है कि कई प्राइवेट संस्थान पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए तीन साल के कोर्स के लिए सिर्फ फ़ीस के छह से दस लाख रुपये लेते हैं। कुछ दस से अठारह लाख तक ले रहे हैं। आप लोग सहर्ष दे भी रहे हैं। हॉस्टल और रहने खाने के भी ख़र्चे होते होंगे। अगर ये सही है तो भयावह है। प्रेरितों सुनो, सरकारी संस्थानों से दस बीस हज़ार की फ़ीस देकर पत्रकारिता पढ़ने में कोई बुराई नहीं है लेकिन दस लाख फीस देकर ज़र्नलिज्म का कोर्स करेंगे तो आप मूर्ख हैं। आपको दुनिया के बाज़ार ने मूर्ख बनाया है और आपने अपने माँ बाप को मूर्ख बनाया है। आप फँस गए दोस्त।
मुझे कोर्स और शिक्षक की गुणवत्ता का ज्ञान नहीं है इसलिए उस पर टिप्पणी नहीं करूँगा लेकिन मेरा दिल कहता है कि नज़दीक से देखने पर वे भी मुझे निराश नहीं करेंगे। थर्ड क्लास ही होंगे। एक बात बताइये। जिस देश के सैंकड़ों टीवी चैनलों की पत्रकारिता का कोई स्तर नहीं हो, उस देश में टीवी पत्रकारिता पढ़ाने वाले कहाँ से आ गए? अगर वे सभी टॉप क्लास के हैं तो उसकी झलक आप छात्रों में क्यों नहीं दिखती है। अपवाद से नियम नहीं बनता है। चंद अच्छे प्रोफेसर हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि इतने योग्य प्रोफेसर हैं कि वे हर जगह भरे होंगे।
मित्रों अगर पत्रकारिता की पढ़ाई आप विद्या यानी अकादमी के रूप में करते हैं तो कोई बात नहीं। फिर तो आप गहन अध्ययन करें, उसे लेकर शोध करें और दुनिया को समझने में मदद करें। संचार एक शानदार और गंभीर विषय है। आपको देखना होगा कि प्राइवेट संस्थान इस पैमाने पर कितने खरे उतरते हैं। सरकारी संस्थानों में कई क़ाबिल लोग पढ़ा रहे हैं लेकिन वहाँ भी संचार के सभी शिक्षक बेहतर हैं, ऐसा भी नहीं है।
अगर आप पत्रकारिता के कोर्स में कोई फैक्ट्री समझ कर आए हैं तो प्लीज़ एक काम कीजिए। मुझसे कभी न मिलिये। कभी मिल भी जाइये तो मुँह फेर के चले जाइये। तल्ख़ी से इसलिए कह रहा हूँ कि आपको बात समझ आए। इतनी नौकरियाँ नहीं हैं। अगर होती तो तमाम जगहों पर कैंपस सलेक्शन हो रहे होते। दो चार की संख्या में भर्ती निकलती है। अगर नौकरी पाने के उद्देश्य से दस लाख देकर इन संस्थानों में पढ़ रहे हैं तो भइया ये ज़ुल्म मत करो।
पहले पता कीजिये कि हिन्दी अखबारों और चैनलों में शुरूआती तनख्वाह कितनी है। कितने वर्षों के बाद दस हज़ार से बढ़कर पचास हजार होती है। कितने साल में दस लाख की बचत होती है। मैं पुराने ज़माने का आदमी हूँ तो मेरी जानकारी थोड़ी पुरानी हो सकती है। अब हो सकता है कि लोग तीस हज़ार पर ज्वाइन कर रहे हों! कुछ लोगों की सैलरी अच्छी होती है मगर उन कुछ लोगों में शामिल होने में वर्षों निकल जाते हैं। मैं सिर्फ आपकी फीस और नौकरी की संभावना के अनुपात की बात कर रहा हूँ।
हिन्दी पत्रकारिता में अवसर होंगे मगर ये किस तरह के अवसर हैं,आप उनका भी तो मूल्याकंन कर लीजिए। आप हिन्दी के एक लोकप्रिय परंतु रद्दी अख़बार लीजिए और एक इंडियन एक्सप्रेस लीजिये। जनसत्ता नहीं। दोनों की ख़बरों के स्तर , दायरा और पन्नों की तुलना कीजिये।फिर देखिये कि किस चैनल में पत्रकारिता हो रही है, जो आपको प्रेरित करती है।अगर अपनी बुद्धि का विसर्जन करने का फ़ैसला कर ही लिया है तो मैं क्या कर सकता हूँ। क्या आप चीख़ने चिल्लाने के लिए दस लाख फीस देंगे।पाँच लाख भी बहुत ज़्यादा है। इतना ही शौक़ है तो फोन से अपना वीडियो रिकार्ड कर यू ट्यूब में डाल दीजिये।
अंग्रेजी में कोर्स करने वालों के साथ भी संकट है। कई बार हमें लगता है कि अंग्रेजी पत्रकारिता कोई स्वर्ग है। वहाँ की सैलरी के बारे में ज्ञान नहीं है लेकिन नौकरियाँ वहाँ भी कम है। वहाँ कई लोग छोड़ कर या अवकाश लेकर विदेशों में जाते रहते हैं तो जगह बनती रहती है। आप यहाँ पत्रकारिता का कोर्स कर रहे हैं और आपकी जगह कोई बेहतर ख़ानदान और विदेशी कालेज वाला आकर ले लेगा। बाहर के कालेजों में संचार और मीडिया की गंभीर पढ़ाई तो होती ही है। उनका छात्र जीवन तो कम से कम ठीक ही गुज़रता है। हर चैनल ने अपनी दुकान खोल रखी है और पत्रकारिता के नाम पर कैमरे का रिकार्ड बटन दबाना सीखाते हैं। स्पीड न्यूज करने के लिए आप दस लाख की फीस देंगे? घर में कोई डाँटने वाला नहीं है क्या ?
सवाल पैसे की कमी का नहीं है। हो सकता है आपके पास पैसे हों। आदरणीय माँ बाप दहेज की रक़म समझ कर निवेश कर देते हों। वैसे पत्रकार भी दहेज लेते हैं। बताइये कौन बेवकूफ होगा जो पत्रकार को दहेज देगा। इतना भी नहीं समझता होगा कि जो दहेज लेगा वो ख़ाक पत्रकारिता करेगा। जो अपने जीवन में किसी ज़हर को पीने से मना नहीं कर सकता वो दूसरों के बारे में क्या लिखेगा बोलेगा। और लड़कियों को ये दहेज लेने वाले बंदर पसंद कैसे आ जाते हैं । एनि वे फ्रैंड्स।
अगर पत्रकारिता के कोर्स को प्रोडक्ट बनाकर बेचा जा रहा है तो बच्चों पता तो कर लो कि गली गली में बिखरे इन देसी हावर्डों से निकल कर कितने को नौकरी मिल रही है? मिलती भी है या नहीं मिलती है? कितने की नौकरी मिलती है? इंटर्नशिप के नाम पर आपको ख़्वाब बेचा जाता है। प्यारे दस लाख देकर बेरोज़गार रहने वाला कोर्स मत करो। नौकरी मिलने पर भी आप कई साल तक बेरोज़गार ही रहते हैं। कई साल तक पंद्रह बीस हजार की नौकरी करनी पड़ती है।स्ट्रिंगर हो गए तो और भी बुरी हालत होती है।उनकी कहानी सुना दूँगा तो अपने वीसी का घेराव कर दोगे। घेराव करने से पहले सोच लेना कि जे एन यू और रोहित वेमुला के समय छात्र आंदेलन के बारे में तुम्हारी क्या राय थी।
ज़रूर इन्हीं में से बहुत लोग बहुत कुछ हो जाते हैं। जैसे मैं चिट्ठी छाँटते छाँटते यहाँ तक आ गया लेकिन ये तो लक बाइ चांस की भी कहानी है। ज़रूरी नहीं कि आपके लिए भी अवसरों का समुद्र इंतज़ार कर रहा है। लोग ऊपर आ भी रहे हैं मगर आँख फोड़ कर देखेंगे तो पता चलेगा कि उनकी संख्या दो या चार है। मैं अन्य चैनलों के लोगों से भी नहीं मिल पाता इसलिए सैलरी वगैरह का ख़ास अंदाज़ा नहीं है लेकिन आम तौर पर प्रतीत होता है कि सामान्य रूप से लोगों को कम सैलरी मिलती है। अवसर के नाम पर वही गूगल आधारित काम है जो मैं भी करता हूँ। कभी कभार कुछ चैनल सूखा वगैरह को यात्रा टाइप कर देते हैं उसके बाद राष्ट्रवाद की आड़ में सांप्रदायिकता फैलाते हैं। ये करने के लिए छह लाख फीस और चार लाख दिल्ली का ख़र्चा क्यों दोगे? सीधे किसी राजनीतिक दल में शामिल होकर नेता बनने की संभावना तलाशो। जब अभी गलत सही का फर्क नहीं समझोगे तो कब समझोगे मित्र।
हिन्दी पत्रकारिता का हाल देख लीजिए। इसका जनाधार है मगर कोई आधार नहीं है। दायरा सीमित है और स्तर विवादित। अपवाद की बात मत कीजिये। दूसरा किसी में हिम्मत नहीं है विश्व स्तरीय पत्रकारिता करने की। संसाधन बहाना है। अचानक कहाँ से पैसा आ गया प्रधानमंत्री का यात्रा कवर करने के लिए। पहले तो ये इतनी संख्या में रिपोर्टर भी नहीं भेजते थे। हिन्दी पत्रकारिता अपने जनाधार को असरदार नहीं बनाती बल्कि किसी राजनीतिक प्रभाव के विस्तार में आसानी से सहायक बन जाती है।यह हाल अंग्रेजी का भी है। ज़रा संपादकों के लेख को ध्यान से पढ़िये, पता चलेगा।
हिन्दी का आम पत्रकार आता तो है जुनून लेकर लेकिन जब संस्थाएँ मौका नहीं देती है तो वह भी जल्दी ठंडा पड़ जाता है। साधारण परिवारों से होने के कारण नौकरी मिलने का ही अहसान चुकाने के लिए तमाम तीर्थ यात्राएँ करने लगता है। ज्योतिष से मूँगा पुखराज बनवा लेता है और कलाई में रक्षा बँधवा लेता है। हिन्दी के नौकरीदेवा संपादकों के फेसबुक कमेंट पढ़कर भावुक या प्रभावित होते रहता है। इस देश का हर आदमी ख़ुद को अवतार मोड में देखता है। कुछ लोग अवतार से आशीर्वाद प्राप्त करने की होड़ में लग जाते हैं।
मेरा काम सिर्फ लिखना है तो लिख दे रहा हूँ। वैसे आपके लिए लिखना भी नहीं चाहिए था। जो जवानियाँ महँगी फीस और घटिया पढ़ाई के फर्क को राजनीतिक तौर से नहीं देख पाती हैं, वो किसी काम की नहीं होती हैं। इतना तो आपको देखना चाहिए था कि क्यों दस लाख देकर पत्रकारिता की पढ़ाई करें। किस लिए ? जिस पेशे में न नौकरी का सिस्टम है, न वेकैंसी का है उसमें आप भेंड की तरह आएँगे तो आप समझिये। जरूर कीजिये पत्रकारिता मगर जिन बंदर एंकरों से प्रेरित होकर लाखों रुपये दे रहे हैं वो मत दीजिए। प्लीज। नौजवान पत्रकार तो आने ही चाहिएं मगर दस लाख देकर नहीं दोस्त। वो पैसा लेकर बार्सीलोना और टोक्यो घूम आइये ।
हम लोगों की सूरत से जो आप सपने देख रहे हैं, वो एक हद तक ही ठीक है। हम भी आपकी उम्र में ऐसे सपने देखते थे। हालाँकि मैं वो भी नहीं देखता था, मगर इससे बात समझ में आती है तो लिख दे रहा हूँ। ऐसा भी मुगालता नहीं है कि आप हम एंकरों को देख कर ही पत्रकारिता में आते हैं। कई लोग पत्रकारिता के लिए आते हैं और करते भी हैं। मगर दोस्तों अपनी जवानी में थोड़ी धार लाओ। बोका बनके मत घूमो। कोई तुम्हारी पूँजी हड़प कर बोका बना रहा है। किसी पत्रकार से पूछना कि उसके खाते में दस लाख की बचत करने में कितने साल लगे।
ओ मेरे प्यारे प्रेरितों अपने इस प्रेरक की बात याद रखना। मैंने प्रेरणा बनने का अहसान चुका दिया। अब तुम प्रेरित होने का फ़र्ज़ निभाओ। मैं बदल नहीं सकता मगर लिख सकता हूँ। छात्र हो राजनीतिक चेतना का विस्तार करो। समझो सिस्टम और बाज़ार के खेल को। किसी उत्पाद का उतना ही मूल्य चुकाओ जितनी उसकी उपयोगिता हो। आप लोगों को जब इंटर्नशिप नहीं मिलती है और नौकरियाँ नहीं मिलती हैं तो दुख होता है। आपके हालात से गुज़रे हैं इसी मोह के कारण लिख रहा हूँ। मेरे लेख में निगेटिव पोजिटिव मत खोजना। फिर भी लगता है कि बीस लाख खर्च कर पत्रकारिता पढ़ी जाए तो दो चार लाख मुझे भी किसी एकादशी को दे जाना। माल रखकर आशीर्वाद दे दूँगा। बहुत बहुत शुभकामनाएँ ।
आपका प्रेरक
रवीश कुमार

बुधवार, 29 जून 2016

पत्रकारिता के नाम पर दुकान चलाने का मैं पक्षधर नहीं हूं : सुरेंद्र प्रताप सिंह










आधुनिक पत्रकारिता के कालजयी पत्रकार संपादक एसपी यानी सुरेन्द्र प्रतप सिंह








सुरेन्द्र प्रताप सिंह से कुमार नरेन्द्र सिंह का लिया गया एक सक्षात्कर







पत्रकारिता के नाम पर दुकान चलाने की स्वतंत्रता का मैं पक्षधर नहीं हूं : सुरेंद्र प्रताप सिंह


प्र.- पत्रकारिता में आने के पीछे आपका क्या उद्देश्य था ?
उ.- पत्रकारिता में मैं दुर्घटनावश ही आया।इसलिए कहूं कि कोई महान उद्देश्य लेकर आया था तो यह झूठ होगा।हां,आने के बाद धीरे-धीरे उद्देश्य मेरे सामने स्पष्ट होने लगे।पत्रकारिता का जीवनदर्शन खुलने लगा।यह प्रक्रिया आज भी चल रही है।
प्र.- सफल पत्रकार आप किसे कहेंगे ?
उ.- सफल पत्रकार मैं उसे कहूंगा जो देश,समाज और व्यक्ति (मैं समाज में अंतिम व्यक्ति की बात कर रहा हूं) के हित में इस काम को करता है या जो उसे करना चाहिए,उसमें वह सफल है।सफलता के कई मानदंड हो सकते हैं।हो सकता है कि कोई व्यक्ति पत्रकार के रूप में सफल न हो,पर पत्रकार का रूप धर कर सफल व्यक्ति बन जाए।बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके लिए पत्रकारिता अन्य कुछप्राप्त करने का साधन है।पत्रकारिता के जरिए कोई राजनीति में जाना चाहता है,कोई पैसा बनाना चाहता है और कोई नाम कमाना चाहता है।मैं समझता हूं कि इस तरह की सफलता पत्रकारिता की नहीं,बल्कि व्यक्ति की सफलता के मानदंड हैं।पत्रकार तो वही सफल है जो उसका सफलतापूर्वक संप्रेषण करता है,जिसे वह कहना चाहता है।यानि जो कुछ वह कहता है लोग उसे उसी तरह ग्रहण करते हैं।उसके कहने के पीछे कोई दूसरा कारण नहीं ढूंढते।इस मायने में मैं अरुण शौरी को एक सफल पत्रकार मानता हूं।(यद्यपि उनके विचारों से मैं घोर असहमति रखता हूं।) वे जो कुछ कहते हैं उसको लोग गंभीरता से लेते हैं।
प्र.- पत्रकारिता में आप अपने को कितना सफल मानते हैं ?
उ.- मैंने पत्रकारिता का लंबा और टेढ़ा रास्ता चुना। सीधा रास्ता यह है कि अपने विचारों को धड़ाधड़ लिखकर पत्रकारिता में अपनी जगह और पहचान बना लें।लेकिन पता नहीं किन कारणों से मैंने यह रास्ता नहीं चुना।जो रास्ता मैंने चुना,वह जरा कठिन है।यह बात मैं कोई शहीदी मुद्रा या प्रशंसा पाने के उद्देश्य से नहीं कह रहा हूं।मुझे लगा कि मेरे लिए यही रास्ता ठीक है।पाठक तक एक व्यक्ति की बात पहुंचाने की बजाय मैंने सोचा कि हम ऐसा साधन विकसित करें जिससे बात संस्थागत रूप में पाठक तक पहुंचे।मैं रहूं या न रहूं, व्यक्ति रहे या न रहे,लेकिन वह बात लोगों तक पहुंचती रहे।इसमें मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं था कि मैं क्या लिख रहा हूं बल्कि मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण था कि और लोग क्या लिख रहे हैं।मेरे लिए महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि हम किस तरह की पत्रिका निकाल रहे हैं या हमने किस तरह की टीम बनाई है।पत्रकारिता के अपने शुरुआती दिनों में मैं खूब लिखता था।पर जैसे-जैसे समझ बढ़ी,मुझे लिखने से डर लगने लगा कि मैं यह क्या कर रहा हूं।मुझे लगा कि लेखकों की पत्रकारिता में पूरी-की-पूरी पहचान बनाने का काम एक टीम के रूप में ही किया जा सकता है।रविवारके माध्यम से थोड़ा-बहुत ऐसा करने का प्रयास मैंने किया। नवभारत टाइम्समें आने के बाद भी मैंने इस काम को जारी रखा।पर नवभारत टाइम्सएक बहुत बड़ा अखबार है।इसका एक जमा हुआ तंत्र है इसलिए उसमें काफी समय लगा।मुझे खुशी है कि आज पत्रकारिता उसी दिशा में बढ़ रही है जिस दिशा में मैंने उसे बढ़ानेका प्रयास किया था।अच्छी पत्रकारिता की दिशा में मैंने ठोस कदम उठाने का प्रयास किया, इसे ही आप मेरी सफलता या उपलब्धि मान सकते हैं।
प्र.- अखबार की कोई निश्चित विचारधारा होनी चाहिए या नहीं ?
उ.- अखबार का मतलब मैं दैनिक समाचार पत्र समझता हूं और अगर वह किसी विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में माना जाता है तो यह उसकी असफलता है।इसमें मैं थोड़ा परंपरावादी हूं।मैं मानता हूं कि समाचार पत्र के तीन काम हैं- सूचना देना,जन शिक्षण करना और मनोरंजन करना।सूचना के भी दो अंग हैं- समाचार और विचार।समाचार के मामले में मैं चाहता हूं कि पत्रकार बहुत ही वस्तुनिष्ठ हों,निर्मम और निरपेक्ष हों।उस घटना का समाचार भी,जिसका प्रभाव लोगों पर भिन्न-भिन्न रूपों में पड़ता हो,चाहे वह घटना कितनी भी बड़ी क्यों न हो,और उसका प्रभाव बड़े से बड़े समूह पर क्यों न पड़े,पत्रकार को निरपेक्ष होकर देना चाहिए।बड़ा दुख होता है कि पत्रकार ऐसी घटनाओं के प्रति निरपेक्ष नहीं रह पाते।देश के अंदर की घटनाओं पर तो निरपेक्ष रहते भी हैं,पर जहां भारत और पाकिस्तान का मामला आता है,हम निरपेक्ष नहीं रह पाते। विचार के मामले में बहुत वस्तुनिष्ठ नहीं हुआ जा सकता।पत्रिकाएं निश्चित विचारधारा की हो सकती हैं और होनी भी चाहिए।इसमें कोई बुराई नहीं है।पांचजन्यनिकलने से मुझे कोई परेशानी नहीं होती,क्योंकि हमें मालूम है कि वे कौन लोग हैं,उनकी विचारधारा क्या है और वे किस उद्देश्य से निकाल रहे हैं।इसी तरह अन्य दलों या व्यक्तियों की पत्रिकाएं भी हो सकती हैं।
प्र.- अखबार में क्या छपे,इसका अंतिम अधिकार मालिकान को होना चाहिए या संपादक को ? संपादकीय विभाग की स्वतंत्रता के आप किस हद तक पक्षधर हैं ?
उ.- देखिए,इस अधिकार का निर्णय रोज-रोज नहीं होता।मालिकान और संपादकों के संबंध का भी निर्धारण रोज-रोज नहीं होता।वैज्ञानिक तरीका यह है कि मालिक जिस दिन संपादक को नियुक्त करता है उसी दिन उसे बता देता है कि हमारे अखबार की नीति क्या है।उस गाइडलाइन के अंदर अखबार को कैसे निकाला जाएगा,कौन सा समाचार जाएगा,यह सारा कार्य संपादक का होता है,उसमें मालिक कहीं नहीं आता।निर्धारित गाइडलाइन्स के अनुसार संपादक काम कर रहा है या नहीं,यह देखने का काम मालिक का है।जहां तक संपादकीय विभाग की स्वतंत्रता का सवाल है,तो उसमें बहुत साफ लाइनें खिंची हुई हैं यानि समाचार देने में वे स्वतंत्र नहीं हैं। समाचार जो हैं,वे हैं और उन्हें जाना चाहिए।पर कहीं न कहीं स्वतंत्रता की सीमा रेखा खींचनी होगी और वह सीमा रेखा है संपादक।पत्रकारिता के नाम पर दुकान चलाने की स्वतंत्रता का मैं पक्षधर नहीं हूं। तर्कपूर्ण ढंग से और सुसंस्कृत भाषा में लिखे गए विचारों को समाचार पत्रों में स्थान मिलना चाहिए- चाहे वे जैसे भी विचार हों।
प्र.- संपादकीय विभाग और प्रबंधकों के बीच विवाद की मुख्य वजह और इसका समाधान क्या है ?
उ.- मैं समझता हूं कि इसकी मुख्य वजह संपादकीय नीति का अभाव है,जिसके चलते प्रबंधकों एवं संपादकों के विचारों में टकराहट होती है।अपने देश में दिक्कत यह है कि प्रबंधक कोई संपादकीय नीति नहीं बनाना चाहते।संपादकीय नीति बनाना तलवार की धार पर चलने के समान है।इसमें प्रबंधकों को कहना पड़ेगा कि उनके संस्थान की संपादकीय नीति यह है या यह नहीं है,पर उनमें इतना साहस नहीं है। वे तो गंगा आए गंगादास,जमुना आए जमुना दासहोते हैं।नरसिंह राव की सरकार है तो नरसिंह राव का गुणगान,आडवाणी जी आएंगे तो आडवाणी जी महान और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसा कवि तो देखा ही नहीं।यानि जिसकी सत्ता उसका खेल उन्हें खेलना होता है।इसमें जो द्वंद्व चलता है,वह अखबार में भी प्रकट होता है।पश्चिम के देशों में संपादकीय नीति है। उदाहरण के लिए,इंग्लैंड में जब चुनाव होते हैं तो संपादक संपादकीय लिखता है कि वह अमुक पार्टी या अमुक उम्मीदवार का समर्थन करता है। मतदाताओं से उस दल के उम्मीदवार को वोट देने की अपील भी करता है।पर यह बात रिपोर्टिंग में नहीं झलकनी चाहिए।अपने यहां तो संपादक सबको खुश करने की नीति अपनाते हैं।अखबार से पैसा भी कमाएंगे,मिशन भी बनाएंगे,उसे अंधेरे में बेच भी देंगे और पवित्रता की बात भी करेंगे।प्रबंधक और संपादक,दोनों ही नहीं चाहते कि कोई संपादकीय नीति बने।इसका समाधान मैं समझता हूं कि अखबार का नियंत्रण पेशेवर (प्रोफेशनल) लोगों के हाथ में होना चाहिए।अन्य प्रोफेशनल्स जैसे डाक्टर,वकील,चार्टर्ड एकाउंटेंट आदि अपनी शर्तों पर काम करते हैं पर अखबारी पेशे का समीकरण कुछ इस तरह बना और बिगड़ा कि प्रोफेशनल्स अखबार के नियंत्रण में हैं।इसका समाधान तभी होगा जब ऐसी संस्थाएं बनेंगी,जिनमें कुछ संपादक या लेखक ही अखबार निकालंगे।मुझे दिख रहा है कि यह दिन दूर नहीं है।इसमें सब कुछ खुला होगा।पांच संपादक बैठकर तय कर लेंगे कि उनकी संपादकीय नीति क्या होगी।जिनके लिए अखबार निकाला जाता है,जो अखबार निकालते हैं या जिन्हें निकालना चाहिए- उस पर यदि उनका नियंत्रण होगा तो स्थिति सुधरेगी,वरना ऐसे ही चलती रहेगी छापामार लड़ाई।
प्र.- आप अखबार के प्रबंधन को अन्य उत्पाद इकाइयों के समान ही मानते हैं या उससे भिन्न ? आप पत्रकार को एक विशिष्ट बुद्धिजीवी कर्मचारी मानते हैं या अन्य के समकक्ष एक सामान्य कर्मचारी ?
उ.- मैं समझता हूं कि हर उत्पाद का प्रबंधन दूसरे से अलग होता है।उस मायने में अखबार का प्रबंधन भी दूसरे से अलग होता है।आखिर जूता बनाने और डालडा बनाने का प्रबंधन एक तो नहीं हो सकता।मैं इस तरह का वर्गीकरण नहीं कर सकता कि अखबार के प्रबंधन का एक वर्ग और बाकी उत्पाद इकाइयों का दूसरा वर्ग।अखबार को एक उत्पाद के रूप में तो देखना ही पड़ेगा,पर अखबार निकालने का उद्देश्य सिर्फ बेचना नहीं हो सकता।क्योंकि अगर सिर्फ बेचना ही उद्देश्य होता तो वह अन्य उत्पाद इकाई भी बैठा सकता है।किसी ने अखबार निकाला है तो निश्चित रूप से उसका उद्देश्य सिर्फ बेचना नहीं है,कुछ और भी है और यही उद्देश्य इसे अन्य उत्पादों से अलग करता है।मैं पत्रकार को कोई विशिष्ट बुद्धिजीवी कर्मचारी नहीं मानता।क्या डाक्टर, वकील, इंजीनियर और कुशल मजदूर बुद्धिहीन होते हैं ? पत्रकार लिखने का विशिष्ट कार्य अवश्य करता है पर वह अकेला बुद्धिजीवी नहीं है।
प्र.- अखबारों में सेवा शर्तों के संबंध में प्रबंधकों के मनमानेपन की स्थिति बरकरार क्यों है ?
उ.- यह स्थिति हर क्षेत्र में है।मैं प्रबंधकों की मनमानी को डिफेंड नहीं कर रहा हूं।मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि जिस तरह का समाज हमने बनाया है,उसमें मजदूरी करने वाले लोगों के साथ लगातार अन्याय होता आ रहा है,चाहे वह कोई भी क्षेत्र या धंधा हो।यह सिर्फ अखबारों की स्थिति नहीं है।पत्रकार संगठित रूप से उनके मनमानेपन का विरोध नहीं कर रहे हैं।अखबारों में मजबूत ट्रेड यूनियन की परंपरा रही है।वह परंपरा नष्ट हो रही है इसलिए प्रबंधकों के मनमानेपन की स्थिति बरकरार है।
प्र.- इस संदर्भ में आखिर बछावत आयोग की सिफारिशें क्यों लागू नहीं की जातीं ?
उ.- बछावत आयोग अपने आप में इस समस्या का समाधान नहीं है।बछावत तो उनके लिए है जो नियम मानने के लिए तैयार हैं।आज पत्रकारिता में,खासकर हिंदी पत्रकारिता में,ऐसी स्थिति है कि जो लोग अखबार निकाल रहे हैं,सेवा शर्तों की बात तो छोड़ दीजिए,वे किसी भी नियम-कानून को नहीं मानते।बछावत आयोग इसलिए लागू नहीं होता कि मालिक पैसा नहीं देना चाहते हैं।बहुत साधारण बात है कि अगर मालिक का काम दो पैसे देकर चल जाता है तो वह पचास पैसे क्यों देगा? इस देशमें कौन सा कानून लागू होता है? आप जिस समाज में रहते हैं उसी का तो कानून लागू होगा।ऐसा तो है नहीं कि पत्रकारिता के लिए अलग स्थिति है।
प्र.- अखबार में क्या आप यूनियन के पक्षधर हैं ?
उ.- मैं हमेशा यूनियन का पक्षधर रहा हूं,क्योंकि मैं समझता हूं कि यूनियन एक ऐसी संस्था है जो दूसरे पक्ष को वैज्ञानिक तरीके से सामने लाती है।समझौते में अगर दूसरा पक्ष संस्था के रूप में सामने नहीं बैठेगा तो प्रबंधन के किसी निर्णय की प्रतिक्रिया कई रूपों में प्रकट होगी और इससे सिर्फ ऊर्जा का नाश होगा।मैं समझता हूं कि किसी संस्था में यूनियन का होना उतना ही आवश्यक है,जितना एक अच्छे प्रबंधक का होना।
प्र.- अखबार में सत्ता के राजनीतिक दखल को क्या उचित मानते हैं ? क्या आप मानते हैं कि सत्ता से तालमेल किए बिना आसानी से अखबार नहीं चलाया जा सकता ?
उ.- अखबार में सत्ता के राजनीतिक दखल को मैं बहुत अनुचित मानता हूं।वैसे बहुत सारे अक्षम लोग इसे अपने निकम्मेपन की ढाल भी बनाते हैं।अपने 20-22 सालों की पत्रकारिता में ऐसा कोई उदाहरण याद नहीं पड़ता जब मेरे ऊपर सत्ता का दबाव पड़ा हो।अगर आप बेईमान नहीं हैं,राजनीतिकों से पैसा नहीं लेते या उनकी राजनीति नहीं करते, तो आपके ऊपर सत्ता का दबाव नहीं डाला जा सकता।लेकिन आप अगर चोर-चोर मौसेरे भाईहैं तो आप पर सत्ता का दबाव पड़ेगा।मैं ऐसा कतई नहीं मानता कि सत्ता से तालमेल किए बिना अखबार नहीं चलाया जा सकता।
प्र- आप पर भी सत्ता की राजनीति करने के आरोप लगाए जाते हैं,खासकर जनता दल का समर्थन करने के लिए।इस संदर्भ में आपका क्या कहना है ?
उ.- जब तक जनता दल सत्ता में रहा,तब तक के अखबार निकालकर देख लीजिए,पता चल जाएगा कि मैं जनता दल का समर्थन कर रहा था या नहीं। यह तो ऐसी चीज़ है कि जिसे आप चाहकर भी छिपा नहीं सकते।मैं जनता दल का समर्थक हूं या नहीं,यह तो अखबार से ही देखा जा सकता है।सौभाग्य या दुर्भाग्यवश उस समय मैंने बहुत कम लिखा।मैं तो सिर्फ समाचारों का संयोजन करता था,वह भी पूर्वाग्रह से मुक्त होकर।मैंने लिखना तब शुरू किया जब मंडल और मंदिर का मुद्दा सामने आया।उस समय जनतादल के समर्थक तो क्या,जनता दल के खुद के नेता जनतादल के विरोधी हो गए थे। अगर कोई यह समझता है कि मैं मंडल का समर्थन कर रहा था इसलिए जनता दल का समर्थन कर रहा था तो उससे बड़ा मूर्ख मैं किसी को नहीं समझता।वह तो मेरे लिए अलोकप्रियता के पाताल में ले जाने वाला कदम था,पर मैंने वह कदम इसलिए उठाया क्योंकि मैं वैचारिक रूप से उसे उचित मानता था।उसमें भी मैं समाचारों में कोई दखलअंदाज़ी नहीं करता था।संपादकीय नीति राजेन्द्र माथुर तय करते थे और चूंकि मेरी राय भी उनसे मिलती थी, इसलिए एक तरह की नीति चलती थी।वैसे संपादकीय नीति निर्धारण में सूर्यकांत बाली, विष्णु खरे या राजकिशोर आदि भी सहयोगी होते थे।मैं जो उचित समझता था,उसे मैं अपने नाम से लिखता था और इसके लिए मुझे कहीं कोई शर्म या मलाल नहीं है। आपको सूचित कर दूं कि सत्ता की राजनीति करके पूरे जनता दल के शासन काल में मैं विश्वनाथ प्रताप सिंह से एक बार भी नहीं मिला।
प्र.- इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रसार क्या हिंदी पत्रकारिता के लिए चुनौती नहीं है ? इन चुनौतियोंका सामना कैसे किया जा सकता है ?
उ.- यह चुनौती खुद पत्रकारिता के लिए है।हां,हिंदी पत्रकारिता कोई विशेष पत्रकारिता है,ऐसा मैं नहीं समझता।इलेक्ट्रॉनिक मीडिया छपे हुए शब्दों के लिए चुनौती है।मैं इसे खतरा नहीं मानता।मैं सूचना के मुक्त बहाव में विश्वास करता हूं,चाहे वह किसी भी स्रोत से प्राप्त हो।इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चुनौती का सामना करने के लिए समाचार पत्रों को और विश्वसनीय बनाना पड़ेगा,इसे समाज से और जोड़ना पड़ेगा। समाचार पत्र के विचार पक्ष को और सुदृढ़ करना होगा क्योंकि दृश्य-श्रव्य माध्यम की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि दर्शक के दिमाग से शब्द बड़ी तेजी से गायब होते हैं।यहीं पर प्रिंट माध्यम की भूमिका शुरू होती है।अखबार की बात को महीनों,वर्षों और सदियों तक सुरक्षित रखा जा सकता है पर इसके लिए आपको तय करना होगा कि अखबार से आप परचून की दुकान चलानी है या विचारों का लेन-देन करना है।
प्र.- क्या आप पत्रकारिता जगत में आई चारित्रिक गिरावट की बात स्वीकार करते हैं ? अगर हां,तो  इसकी वजह क्या है ?
उ.- चारित्रिक गिरावट से आपका क्या मतलब है? क्या आप कहना चाहते हैं कि पत्रकार चरित्रहीन हो गए हैं,सवाल को थोड़ा स्पष्ट कीजिए।
प्र.- मेरा मतलब है कि पत्रकारिता के जरिए कुछ पत्रकार अन्य सुविधाएं और उद्देश्य हासिल करने में लगे हुए हैं।
उ.- इस तरह की चारित्रिक गिरावट निश्चित रूप से आई है,पर यह गिरावट समाज के हर अंग में आई है। अखबार पलट कर देख लीजिए,आपको पता चल जाएगा कि कानून की रक्षा करने वाली पुलिस स्वयं हर प्रकार के संगीन जुर्म में शामिल है।ऐसे बहुत से पत्रकार हैं जो पत्रकार के रूप में नेतागिरी करते हैं और नेता बनने के बाद पत्रकारिता करते हैं।पत्रकार कोई देवदूत नहीं होता।इनमें भी बहुत सारे दलाल घुसे हुए हैं।समाज के बाहर रहकर पत्रकारिता नहीं हो सकती।यह कैसे हो सकता है कि समाज तो भारत का हो और पत्रकारिता फ्रांस की हो ? समाज में आई चौतरफा गिरावट पत्रकारिता में भी परिलक्षित हो रही है।पत्रकारों की विश्वसनीयता अवश्य कम हुई है पर मेरे लिए यह कोई ज्यादा चिंताजनक बात नहीं है।मेरे लिए चिंताजनक बात यह है कि लोगों का विश्वास राज्य की सत्ता से ही उठता जा रहा है।न्याय व्यवस्था,प्रशासन और सरकार पर से लोगों का विश्वास उठ रहा है।मैं इसे पत्रकारिता की विशेष समस्या नहीं मानता।
प्र.- कई संस्थानों में मालिक ही संपादक भी हैं। संपादकीय कामों के बगैर किसी कार्यानुभव के क्या किसी को संपादक होना चाहिए ?
उ.- मालिक संपादक हो, इसके खिलाफ मैं नहीं हूं। ऐसे बहुत से अच्छे संपादक हैं जो मालिक भी हैं। एन राम (हिंदू), हरिकिशोर (डेक्कन हेराल्ड),कर्पूरचन्द्र कुलिश (राजस्थान पत्रिका),लाला जगतनारायण, विजय कुमार (पंजाब केसरी),नरेन्द्र मोहन (जागरण) आदि अच्छे संपादक रहे हैं और हैं। लेकिन जो लोग संपादक के रूप में सिर्फ अपना नाम देना चाहते हैं या जिनके लिए संपादक का नाम छपने से मंत्रियों के दरवाजे खुल जाते हैं,उस पर मुझे आपत्ति है।
प्र.- मौजूदा समस्याओं मसलन सांप्रदायिकता, जातीयता आदि को बढ़ाने में क्या प्रेस की भी भूमिका रही है ? इस संदर्भ में उसे किस तरह की नीति अख्तियार करनी चाहिए ?
उ.- बहुत बुरी भूमिका रही है।मैं समझता हूं कि एक दौर,जिसमें सैंकड़ों नौजवानों ने अपने को जलाकर मार डाला,के पीछे सबसे बड़ी भूमिका अखबारों की रही है।कुछ अखबारों ने बाकायदा इस पर कैम्पेनचलाया।मंडल का विरोध उन्हें तब तक संतुष्ट नही कर पाया जब तक नौजवान जलकर मरने नहीं लगे। जलकर मरने वालों का समाचार जब न्यूज़रूम में पहुंचता था तो वहां जैसे उल्लास का एक वातावरण बन जाता था।उसी तरह राम मंदिर मामले में भी देखने को मिला कि पत्रकार कार सेवक बन बैठे।मैं यह नहीं कहता कि पत्रकार धार्मिक भावना से अछूता रहे,पर इतना मैं जरूर सोचता हूं कि पत्रकार को चाहिए कि इस भावना को दबाकर,समेटकर रखे। इसका प्रचार अखबार के माध्यम से न करे।
प्र.- प्रभाष जोशी ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि विश्व हिंदू परिषद,बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघवादी जैसे संगठनों को कमजोर करने के लिए पत्रकारों को भाजपा का समर्थन करना चाहिए क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो सारे देश में पंजाब जैसी स्थिति हो जाएगी।उनकी इस टिप्पणी पर आप क्या सोचते हैं ?
उ.- मैं चूंकि यह नहीं जानता हूं कि प्रभाष जोशी जी ने किस संदर्भ में यह बात कही है।वैसे इतना मैं जरूर कहूंगा कि विहिप,बजरंग दल,आरएसएस को भाजपा से अलग मानकर अगर वे कोई विश्लेषण करते हैं तो मैं विनम्रतापूर्वक इससे असहमत होना चाहूंगा।मैं भाजपा को विहिप,आरएसएस और बजरंग दल से अलग कोई सत्ता नहीं मानता और न मैं यह मानता हूं कि भाजपा में आडवाणी जी खराब हैं या अटल जी अच्छे हैं। मैं इन सबको एक ही परिवार,संघ परिवार का सदस्य मानता हूं।
(साभार:15 नवंवर 1992,राष्ट्रीय सहारा,हस्तक्षेप)

Satyendra Pratap Singh <spsnewsbureau@gmail.com>