शुक्रवार, 22 मई 2015

नेट न्यूट्रेलिटी और हम..

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-राजेश कुमार चौहान।।

प्रस्तुति- रिद्धि सिन्हा नुपूर 
इंटरनेट की दुनिया में एक प्रकार का साम्यवाद कायम है। यहाँ हम सब एक समान हैं, इंटरनेट किसी के पैसे और रूतबे को नहीं पहचानता है, यह बस अपने यूजर को जानता है। इंटरनेट के लिए उसके सारे यूजर एक समान हैं वह किसी से कोई भेदभाव नहीं करता। सोशल मीडिया वेबसाइट ने इस प्रक्रिया को और आसान बना दिया। एक समय था जब देश के प्रधानमंत्री की एक झलक पाने को पूरा देश बेताब रहता था, एक आज का दौर है जहाँ इंटरनेट के जरिए लोगों को प्रधानमंत्री के पल-पल की अपडेट मिल जाती है।
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इन सब के बीच “नेट न्यूट्रेलिटी” यानी कि नेट की आजादी के मसले पर एक ऐसी बहस ने जन्म लिया जिसमें इंटरनेट पर कहीं भी विचरण की आजादी पर एक तरह से लगाम लग सकती है। टेलिकॉम कंपनियाँ इंटरनेट पर यूजर की आजादी पर लगाम लगाना चाहती है। उसका तर्क है कि ऐसा करने से कुछ वेबसाइट के सर्फिंग पर पैसे ही नहीं चुकाने पड़ेंगे, लेकिन ऐसा होते ही कुछ साइटों तक यूजर की पहुँच ही मुश्किल हो जाएगी। फिलहाल किसी भी एेप को इस्तेमाल करने के लिए आपको एक ही इंटरनेट प्लान चाहिए होता है, लेकिन अगर ये लागू हुआ तो आपको एेप्स के लिए अलग प्लान लेना होगा। दरअसल टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि वॉइस कॉल देने वाली एेप्ससे उनका रेवेन्यू घटा है, इसलिए उनकी मांग हैं कि ये कमाई उन्हें मिले। इससे कंपनियों को तो फायदा होगा, लेकिन यूजर्स के लिए समस्या खड़ी हो जाएगी। वहीं ये सर्विस प्री-पेड और पोस्ट-पेड दोनों पर लागू किए जाने की मांग है। दूरसंचार कंपनियाँ “नेट न्यूट्रेलिटी” को अलग तरीके से परिभाषित कर रही हैं।
ट्राई ने नेट न्यूट्रेलिटी के संबंध में दूरसंचार कंपनियों से 24 अप्रैल और यूजर्स से 8 मई तक सुझाव देने के लिए कहा है। इसके लिए आपको advqos@trai.gov.in साइट पर अपनी राय देनी है। कंपनियाँ नेट न्यूट्रेलिटी के नाम पर रोकेगी रास्ता “नेट न्यूट्रेलिटी” यानी कि नेट की आजादी, अगर यह आजादी छीन जाए तो हमारे इंटरनेट इस्तेमाल करने पर इसका क्या असर पड़ेगा? जब हम एक बार कोई डाटा पैक डलवाते हैं उसमें पैसे देने के बाद हम व्हाट्सएप, फेसबुक, क्विकर, स्नैपडील, गूगल, यू ट्यूब जैसी कोई भी इंटरनेट सेवाएं इस्तेमाल कर पाते हैं। हर सेवा की स्पीड एक जैसी होती है और हर सेवा के अलग से कोई पैसे नहीं देने पड़ते हैं। यानी कि इंटरनेट का पैक भरवा लिया तो जब तक डाटा है कहीं भी-कुछ भी एक्सेस करिये बिंदास। लेकिन टेलिकॉम कंपनियों का कहना है कि उनके मुनाफे पर सबसे ज्यादा नुकसान व्हाट्सएप जैसे वॉइस कॉलिंग कंपनी के बढ़ते इस्तेमाल के कारण हुआ है। इसलिए टेलिकॉम कंपनियां इंटरनेट की आजादी को नए तरह से पेश करना चाहती है जिसमें कुछ सेवाएं मुफ्त हो सकती हैं तो कुछ के लिए अलग से पैसे भी देने पड़ सकते हैं। इतना ही नहीं कुछ सेवाओं के लिए ज्यादा स्पीड तो कुछ के लिए कम स्पीड का अधिकार भी कंपनियां अपने पास रखना चाहती हैं।
कंपनियाँ उन कुछ वेबसाइटों को सर्फ करने के लिए अलग से पैसे चार्ज करने के फिराक में है जिनसे हमारा पल-पल का रिश्ता बन चुका है। जैसे उदाहरण के लिए जब आप व्हाट्सएप, फेसबुक, क्विकर, स्नैपडील, गूगल, यू ट्यूब जैसी ढेरों इंटरनेट सेवाएं इस्तेमाल करेंगे तो हर सेवा के लिए अलग अलग पैसे देने पड़ेंगे। इसे आप डीटीएच की तर्ज पर समझ सकते हैं कि यदि आपने किसी भी डीटीएच कंपनी में कोई पैक डलवाया है उसमें सारे चैनल आ रहे हैं लेकिन किसी स्पोर्ट्स के चैनल को देखने के लिए अलग से पैसे चुकाने पड़ते हैं। बदलाव का समर्थन करने वाली टेलीकॉम कंपनियों का तर्क है कि ऐसी स्थिति में मुफ्त इंटरनेट गरीब भी इस्तेमाल कर पाएंगे। लेकिन वो क्या इस्तेमाल कर पाऐंगे यह सोचने वाली बात है? दूसरा पक्ष यह है कि इस बदलाव से इंटरनेट की आजादी छिन जाएगी। यदि आपको यूट्यूब पर मुशायरा सुनने का मन हो गया तो उसके लिए आपको अलग से पैसे चुकाने होंगे।
दूसरी एक और समस्या जो सामने आई है वो है मोनोपॉली की, बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दूरसंचार कंपनी से समझौता कर उन्हें अपने उत्पाद के लिए इंटरनेट स्पीड तेज करने का प्रस्ताव करेगी और अन्य प्रतिस्पर्धी कंपनियों की स्पीड धीमी कर दी जाएगी, ऐसा करने पर छोटी कंपनियों को बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है। अभी हाल ही में एयरटेल ने फ्लिपकार्ट से हाथ मिलाया है। ऐसे में एयरटेल के इंटरनेट कनेक्शन पर फ्लिपकार्ट तेज चलेगी और फ्लिपकार्ट की प्रतियोगी कंपनियां हो सकता है कि धीमी हो जाएं। ये भी मुमकिन है कि ऐसे में किसी दूसरे टेलिकॉम कंपनी के कनेक्शन से आप फ्लिपकार्ट तक पहुंच ही ना पाएं। इन सारे तर्कों के अलावे मुनाफे पर जो चर्चा हो रही है वहाँ क्या डाटा पैक के जरिए कंपनियाँ काफी कमा रही हैं, जो कमाई आने वाले समय में और बढ़ने वाली है। इसलिए नेट न्यूट्रेलिटी के नाम पर इंटरनेट के उपभोक्ता की आजादी छीनने का प्रयास सरासर बड़ी कंपनियों को फायदा पहुँचाने की कोशिश है।
हालांकि, सरकार ने अब तक इस पर अपना रुख साफ नहीं किया है लेकिन टेलिकॉम मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद कह चुके हैं कि इंटरनेट इंसानी दिमाग की एक बेहतरीन खोज है। ये पूरी इंसानियत के लिए है ना कि कुछ लोगों के लिए, हमारी सरकार लोगोंके हित में इंटरनेट के इस्तेमाल में विश्वास रखती है। टेलिकॉम विभाग की एक समिति इस पूरे मामले को देखने के लिए बनाई गई है, यह समिति एक माह के भीतर अपनी रिपोर्ट दे देगी। इससे पहले पूरी दुनिया में इस तरह के प्रयोग भी हो चुके हैं और बहस आज भी जारी है। भारत में यह फैसला ट्राई को लेना है, ट्राई ने इस बार फैसला लेने से पहले आपकी राय मांगी है। लेकिन टेलिकॉम कंपनियों की यह लॉबिंग कामयाब रही तो इंटरनेट की आजादी खतरे में पड़ सकती है। ऐसा हुआ तो इंटरनेट पर बढ़ती लोअर मिड़ल क्लास आबादी पर ब्रेक लग जाएगा तब य़हाँ बिना दीवारों वाली दुनिया में भी उँच-नीच की दीवारें खड़ी हो जाएंगी

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आखिर है क्या नेट न्यूट्रेलिटी..






- बालेन्दु शर्मा दाधीच

प्रस्तुति-   रिद्धि सिन्हा नुपूर, पटना 


दूरसंचार ऑपरेटर एयरटेल ने हाल ही में घोषणा की कि वह अपनी नए ‘‘एयरटेल जीरो‘‘ योजना के तहत उपभोक्ताओं को यह सुविधा देने जा रही है कि वे कुछ खास एप्लीकेशनों का इस्तेमाल डेटा प्लान लिए बिना भी अपने स्मार्टफोन पर कर सकेंगे. यानी मुफ्त के इंटरनेट कनेक्शन पर ऐसे एप्लीकेशनों का प्रयोग करना. यूजर के लिए फायदे का सौदा. लेकिन इस योजना का बाजार में खूब विरोध हो रहा है, यह कहते हुए कि यह नेट तटस्थता के सिद्धांत के खिलाफ है. आपको याद होगा कि हाल ही में अमेरिका में नेट तटस्थता या नेट न्यूट्रैलिटी को लागू करने के लिए कदम उठाए गए हैं. इसका अर्थ यह है कि दूरसंचार ऑपरेटर या इंटरनेट सर्विस प्रदाता किसी भी कंपनी, वेबसाइट, वेब सेवा, एप्लीकेशन आदि के पक्ष में कदम नहीं उठा सकते. जैसे किसी वेबसाइट को एक्सेस करने की रफ्तार बढ़ा दी जाए या फिर किसी एप्लीकेशन को बिना इंटरनेट प्लान के भी एक्सेस करने दिया जाए.
2015_04_15_06_37_05_LOCK-ON-NET-NEUTRALITY
वजह यह कि यह दूसरी वेबसाइटों या एप्लीकेशनों के साथ अन्याय है, भले ही इससे मोबाइल यूजर को निजी लाभ मिल रहा हो. यह समान आधार पर प्रतिद्वंद्विता के सिद्धांत के भी खिलाफ है.
दूसरी तरफ यह उन कंपनियों के लिए फायदे का सौदा है जिन्होंने एयरटेल जीरो प्लान में हिस्सेदारी की है. मिसाल के तौर पर इसमें शामिल होने वाली फ्लिपकार्ट के लिए यह नए ग्राहकों तक पहुंचने और मार्केटिंग का जरिया है. इसके लिए वह एयरटेल को शुल्क अदा करेगी तो क्या फर्क पड़ता है. आजकल आईटी और दूरसंचार कंपनियों में अपने बाजार को विस्तार देने की होड़ मची हुई है.
फेसबुक भी इसीलिए इंटरनेट.ऑर्ग नामक योजना पर काम कर रही है जिसके तहत लोगों को मुफ्त इंटरनेट कनेक्टिविटी मुहैया कराई जानी है. गूगल भी किसी न किसी रूप में ऐसा कर रहा है.
एयरटेल जैसी दूरसंचार कंपनियों के लिए यह दोहरा फायदे का सौदा है क्योंकि एक तरफ जहां उन्हें कंपनियों से रकम मिल रही है वहीं वे अपने ग्राहकों की संख्या बढ़ाने के लिए भी इस योजना का प्रयोग कर सकेंगी. आखिर कम पैसे में ज्यादा सुविधा कौन-सा ग्राहक नहीं चाहता. बहरहाल, फिलहाल नेट न्यूट्रैलिटी की बहस का अंजाम पर पहुंचना बाकी है.

गुरुवार, 21 मई 2015

गाय पर भी एक निबंध नहीं लिख सके मास्टर जी

गाय पर निबंध नहीं लिख पाने वाले शिक्षक के खिलाफ एफआईआर
By dastakmedia On 17 May, 2015 At 06:11 AM | Categorized As राज्य, राष्ट्रीय | With 0 Comments
cow 
रीनगर : देश में सरकारी शिक्षा के हालात क्या हैं इसका सबूत जम्मू-कश्मीर के हाईकोर्ट में देखने को मिला। अदालत ने एक अध्यापक की योग्यता परखने के लिए खुली अदालत में उसकी परीक्षा ली और गाय पर निंबध लिखने को कहा। लेकिन वह इसमें असफल रहा। इससे नाराज अदालत ने राज्य सरकार को शिक्षा क्षेत्र में खामियों को दूर करने के लिए कदम उठाने के निर्देश दिए। साथ ही अध्यापक पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं। खबरों के मुताबिक दक्षिण कश्मीर के एक स्कूल में मोहम्मद इमरान खान को रहबर-ए-तालीम (मार्गदर्शक शिक्षक) नियुक्त करने के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि खान को उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड दिल्ली और नगालैंड की ग्लोबल ओपन यूनिवर्सिटी की ओर से जारी किए गए प्रमाण पत्र मान्यता प्राप्त नहीं है। बोर्ड परीक्षा में खान को उर्दू में 74 फीसदी, अंग्रेजी में 73 फीसदी और गणित में 66 फीसदी मिले अंक पर भी शंका जताई गई थी।
इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मुजफ्फर हुसैन अत्तर की अदालत ने एक वरिष्ठ वकील से प्रतिवादी को अंग्रेजी से उर्दू और उर्दू से अंग्रेजी में अनुवाद के लिए एक आसान पंक्ति देने को कहा, लेकिन अध्यापक अनुवाद नहीं कर पाया। इसके बाद अध्यापक से उर्दू में गाय पर निबंध लिखने को कहा गया, लेकिन वह ऐसा भी नहीं कर पाया। यही हाल गणित का रहा, अध्यापक चौथी कक्षा का सवाल भी हल नहीं कर सका। इस पर अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे में केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है कि राज्य का भविष्य क्या होगा। अदालत ने कहा कि ऐसे शिक्षा से छात्र स्कूल जाकर भी मूर्ख बने रहेंगे। 



बुधवार, 20 मई 2015

सौ दिन, एक साल,- पहले मोदी फिर केजरीवाल








सौ दिन, एक साल, नेता खुशहाल, और  जनता बेहाल 


प्रस्तुति-- रिद्धि सिन्हा नुपूर, राहुल मानव  

केजरीवाल सरकार 24 मई को अपने सौ दिन पूरे कर रही है, तो मोदी सरकार 26 मई को एक साल! इन दोनों सरकारों से वाक़ई लोगों को बहुत बड़ी-बड़ी उम्मीदें थीं? क्या वे उम्मीदें पूरी हुईं? हुईं, तो कहाँ तक?

मोदी और केजरीवाल में एक और अजीब समानता है! ‘मन की ख़बर’ न हो तो एक मीडिया को ‘न्यूज़ ट्रेडर्स’ कहता है, दूसरा उसे ‘सुपारी मीडिया’ कहता है! पता नहीं कि इन दोनों को ही मीडिया से ऐसी शिकायतें क्यों हैं?

— क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
दिल्ली दिलचस्प संयोग देख रही है. एक सरकार के सौ दिन, दूसरी के एक साल! दिलचस्प यह कि दोनों ही सरकारें अलग-अलग राजनीतिक सुनामियाँ लेकर आयीं. बदलाव की सुनामी! जनता ने दो बिलकुल अनोखे प्रयोग किये, दो बिलकुल अलग-अलग दाँव खेले. केन्द्र में मोदी, दिल्ली में केजरीवाल! मोदी परम्परागत राजनीति के नये माडल की बात करनेवाले, तो केजरीवाल उस परम्परागत राजनीति को ध्वस्त कर नयी वैकल्पिक राजनीति के माडल की बात करने वाले. दोनों नयी उम्मीदों के प्रतीक, दोनों नये सपनों के सौदागर. जनता ने एक साथ दोनों को मौक़ा दिया. कर के दिखाओ! जनता देखना चाहती है कि राजनीति का कौन-सा माडल बेहतर है, सफल है, मोदी माडल या केजरीवाल माडल? या फिर दोनों ही फ़्लाप हैं? या दोनों ही नये रंग-रोग़न में वही पुरानी खटारा हैं, जिसे जनता अब तक मजबूरी में खींच रही थी!

मोदी और केजरीवाल : कितनी उम्मीदें पूरी हुईं?

केजरीवाल सरकार 24 मई को अपने सौ दिन पूरे कर रही है, तो मोदी सरकार 26 मई को एक साल! इन दोनों सरकारों से वाक़ई लोगों को बहुत बड़ी-बड़ी उम्मीदें थीं? क्या वे उम्मीदें one-year-of-modi-and-hundred-days-of-kejriwalपूरी हुईं? हुईं, तो कहाँ तक? केजरीवाल तो दावे करते हैं कि जनता तो उनसे बहुत ख़ुश है और वह हर पन्द्रह दिन में जनता के बीच सर्वे किया करते हैं. और उनके मुताबिक़ अगर आज दिल्ली में वोट पड़ें तो उनकी आम आदमी पार्टी को 72 प्रतिशत वोट मिल जायेंगे, जबकि पिछले चुनाव में तो 54 प्रतिशत वोट ही मिले थे! लेकिन क्या वाक़ई जनता केजरीवाल से इतनी ही ख़ुश है? उधर, दूसरी तरफ़, एक बड़े मीडिया समूह के सर्वे के मुताबिक़ मोदी सरकार के कामकाज से देश में 60 प्रतिशत लोग आमतौर पर ख़ुश हैं!

मोदी: छवि का संकट!

मोदी सरकार के काम की तुलना स्वाभाविक रूप से पिछली मनमोहन सरकार से ही होगी. वैसे लोग कभी-कभी उनकी तुलना अटलबिहारी वाजपेयी सरकार से भी कर लेते हैं. लेकिन केजरीवाल की तुलना किसी से नहीं हो सकती क्योंकि वह ‘आम आदमी’ की ‘वीआइपी संस्कृति विहीन’ और एक ईमानदार राजनीति का बिलकुल नया माडल ले कर सामने आये. इसलिए वह कैसा काम कर रहे हैं, इसकी परख केवल उन्हीं के अपने माडल पर ही की जा सकती है.
तो पहले मोदी. इसमें शक नहीं कि नरेन्द्र मोदी के काम करने और फ़ैसले लेने की एक तेज़-तर्रार शैली है, इसलिए यह सच है कि सरकार के काम में चौतरफ़ा तेज़ी आयी है. भ्रष्टाचार का कोई धब्बा सरकार पर नहीं लगा है. विदेश नीति को भी मोदी ने नयी धार दी है और एक साल में 19 विदेश यात्राएँ कर अन्तरराष्ट्रीय मंच पर भारत की गम्भीर उपस्थिति दर्ज करायी है और साथ ही पूरी दुनिया पर अपनी छाप भी छोड़ी ही है. लेकिन यह भी सच है कि इस सबके बावजूद सरकार आर्थिक मोर्चे पर कुछ ख़ास आगे नहीं बढ़ सकी. सरकार के नये आर्थिक विकास माडल, कई प्रस्तावित विवादास्पद क़ानूनी संशोधनों और कुछ कारपोरेट दिग्गजों से प्रधानमंत्री की ‘नज़दीकी’ की चर्चाओं के कारण एक तरफ़ उसकी छवि ‘कारपोरेट तुष्टिकरण’ करनेवाली सरकार की बनी, दूसरी तरफ़ किसानों को किये समर्थन मूल्य के वादे से मुकर जाने, मनरेगा और दूसरी तमाम कल्याणकारी योजनाओं के बजट में कटौती कर देने और भूमि अधिग्रहण क़ानून पर अपने ही सहयोगी दलों के विरोध को अनदेखा कर अड़ जाने के कारण सरकार की ‘ग़रीब-विरोधी’ और ‘किसान-विरोधी’ छवि भी बनी. आशाओं के सुपर हाइवे पर चल कर आयी हुई किसी सरकार के लिए एक साल में ऐसी नकारात्मक छवि बन जाना चौंकानेवाली बात है, ख़ासकर उस नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए जिसने आज की राजनीति में मार्केटिंग और ब्रांडिंग का आविष्कार किया हो!

केजरीवाल: विवादों से पीछा नहीं छूटता!

और अब केजरीवाल. यह सही है कि केजरीवाल सरकार ने बिजली-पानी जैसे कुछ वादे फटाफट पूरे कर दिये, सरकार में कहीं वीआइपी संस्कृति नहीं दिखती, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हेल्पलाइन फिर शुरू हो गयी, और ‘स्वराज’ के तहत दिल्ली का बजट बनाने की क़वायद मुहल्लों में जा कर जनता के बीच की जा रही है, लेकिन इन सौ दिनों में ही केजरीवाल सरकार भी सैंकड़ों विवादों में घिर चुकी है. केन्द्र की बीजेपी सरकार, दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली पुलिस से केजरीवाल सरकार का रोज़-रोज़ का टकराव तो आम बात है ही, हालाँकि इसमें केन्द्र सरकार और उसके इशारे पर उप-राज्यपाल नजीब जंग द्वारा की जा रही राजनीति की भी कम भूमिका नहीं है. इन सौ दिनों में ही पार्टी बड़ी टूट का शिकार भी हो गयी. एक मंत्री की कथित फ़र्ज़ी डिग्री का विवाद काफ़ी दिनों से अदालत में है और हैरानी है कि इस मामले पर स्थिति अब तक साफ़ क्यों नहीं हो पायी है? सारी डिग्रियाँ असली हैं, तो एक विज्ञापन निकाल कर जनता को बता दीजिए, बात ख़त्म. लेकिन वह मामला जाने क्यों अब तक गोल-गोल घूम रहा है? आम आदमी पार्टी ने जैसी स्वच्छ राजनीति का सपना दिखाया था, उस पर पिछले चुनाव के दौरान ही कई सवाल उठे थे और बाद में पार्टी में हुई टूट के दौरान कई नये विवाद सामने आये थे? केजरीवाल-विरोधी गुट का उन पर यही आरोप था कि पार्टी जिन सिद्धाँतों को लेकर बनी थी, उनकी पूरी तरह अनदेखी की जा रही है. पार्टी में टूट का चाहे भले जो कारण रहा हो, लेकिन इस आरोप में सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि ‘स्वच्छ राजनीति’ के बजाय ‘आप’ को मौक़ा पड़ने पर ‘सुविधा की राजनीति’ के तौर-तरीक़े अपनाने में कोई संकोच नहीं होता.

तब की बात, अब की बात!

‘आप’ अगर परम्परागत राजनीतिक दल के तौर पर ही मैदान में उतरी होती, तो इन बातों को लेकर कोई उससे निराश नहीं होता. लेकिन अगर आप वैकल्पिक राजनीति की बात करते हैं, तो ये सवाल शिद्दत से उठेंगे ही क्योंकि शुरू में ‘आप’ ने इन्हीं बुराइयों के विरुद्ध विकल्प के तौर पर अपने को पेश किया था. ‘आप’ ने सिद्धाँतों और ईमानदारी के झंडे लहरा कर अपनी बुनियाद रखी थी. और अगर दो साल में ही वह लगातार अपनी ज़मीन से फिसलते हुए दिखे, तो यह उन लोगों के लिए भारी निराशा की बात होगी, जिन्होंने ‘आप’ के भीतर किसी नये वैकल्पिक राजनीतिक माडल का सपना देखा था! आप आज अपनी बात पर नहीं टिके रह सकते तो कल किसी बात पर टिके रहेंगे, इसका क्या भरोसा?
दिलचस्प बात यह है कि यही बात नरेन्द्र मोदी पर और बीजेपी पर भी लागू होती है. आधार कार्ड, बांग्लादेश से सीमा समझौता, रिटेल में एफ़डीआइ, पाकिस्तान नीति समेत ऐसे मु्द्दों की लम्बी सूची है, जिनका मोदी और बीजेपी ने यूपीए सरकार के दौरान मुखर विरोध किया था और सरकार की नींद हराम कर दी, संसद नहीं चलने दी, आज उन्हीं को वह पूरे दमख़म से लागू कर रहे हैं. अगर तब वह ग़लत था, तो आज क्यों सही है? और अगर तब वह सही था, तो आप उसका विरोध क्यों कर रहे थे? क्या यह विरोध सिर्फ़ राजनीति के लिए था, सिर्फ़ तत्कालीन सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने के लिए था? अगर इसका उत्तर ‘हाँ’ है, तो यक़ीनन आज हमें ऐसी राजनीति नहीं चाहिए. ऐसी राजनीति देशहित में नहीं है. जनता को अब मुद्दों पर निरन्तरता चाहिए, राजनीतिक बाज़ीगरी नहीं.

‘न्यूज़ ट्रेडर्स’ बनाम ‘सुपारी मीडिया!’

मोदी और केजरीवाल में एक और अजीब समानता है! ‘मन की ख़बर’ न हो तो एक मीडिया को ‘न्यूज़ ट्रेडर्स’ कहता है, दूसरा उसे ‘सुपारी मीडिया’ कहता है! पता नहीं कि इन दोनों को ही मीडिया से ऐसी शिकायतें क्यों हैं? और यही मीडिया जब लगातार मनमोहन सिंह सरकार की खाल उधेड़ रहा था तो सही काम कर रहा था!
बहरहाल, एक सरकार के सौ दिन और एक सरकार के एक साल पर आज उनके कामकाज से हट कर उनकी चालढाल को लेकर उठे सवाल ज़्यादा ज़रूरी हैं. ख़ास कर इसलिए भी कि ये दोनों सरकारें उम्मीदों के उड़नखटोले लेकर आयी हैं. इनसे लोगों ने केवल काम करने की ही उम्मीदें नहीं लगायी हैं, बल्कि यह आस भी लगायी है कि ये देश और राजनीति की दशा-दिशा भी बदलें. और वह तभी होगा, जब इनकी चालढाल भी बदले!
(लोकमत समाचार, 16 मई 2004) http://raagdesh.com

मंगलवार, 19 मई 2015

बीबीसी के 75 साल@.इँडिया /





(विशेषआयोजन)

हमारा मक़सद रोशनी फैलाना है न कि सनसनी. बीबीसी हिंदी के 75 साल के सफ़र पर 

 निधीश त्यागी का विशेष लेख.



प्रस्तुति-- रिद्धि सिन्हा नुपूर,(पटना) 


 

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