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गुरूवार, 1 सितंबर 2011
By Administrator
vartika nanda

वर्तिका नन्दा, मीडिया विश्लेषक

आंदोलन के खत्म होने के बाद अब यह समय सरकार की करवट को भांपने और उसकी रफ्तार को देखने का है। पर साथ ही अब अन्ना टीम को भी जरा सतर्क होना होगा। कैमरे के पीछे बैठ कर कवर करने वालों ने भले ही वही दिखाया जो दिखाना जरूरी, जन हित, जनता की पसंद और टीआरपी की रूचि का था लेकन यह भी महसूस किया गया कि कई सिविल सोसायटी ग्रुप इस दौरान काफी उग्र बने रहे। नेताओं ने भी अपना गुस्सा भरकर निकाला।

अन्ना को लेकर जितना लिखा गया औऱ लिखा जा रहा है, वह अपने आप में एक रिकार्ड है। अन्ना अब आंदोलन और बदलाव जैसे शब्दों के पर्याय बन चुके हैं। बहरहाल लोकतंत्र और जन के बीच का रास्ता इस बार बड़ा और हवादार हुआ है और एक नया अध्याय खुल कर सामने आ गया है।

लेकिन हर आंदोलन कुछ सबक देकर जाता है। यह लाजमी भी है।

आंदोलन की समाप्ति पर अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में सबसे शपथ दिलवाते हैं कि वे लोग न तो घूस देंगे, न लेगें। यह एक तरह की रिमाइंडर थ्योरी है जो ठीक उसी तरह की है जैसे कि बचपन में स्कूल में शपथ ली जाती थी कि हम सभी भारतवासी भाई-बहन हैं। शपथ ज्यादातर पर कोई असर नहीं छोड़ती पर संजीदा लोगों को शायद वो सालों याद रहती होगी, उसी भाव के साथ। यहां भी शपथ मैदान से जाते लोगों को जैसे अपने अंदर एक भाव को भरकर आगे ले जाने के लिए प्रेरित करती है।

पर सवाल उठता यह भी है कि भ्रष्टाचार क्या सिर्फ वही है जो सरकारी अफसरों या फिर सांसदों के जरिए होता है या यह उससे आगे की भी चीज है। मेरी नजर में भ्रष्टाचार जितनी बड़ी सरकारी या राजनीतिक समस्या है, उतनी ही बड़ी सामाजिक भी। यह परिवार से शुरू होता है। दहेज के सपनों से वो फूलता है और फिर एक बड़ा आकार ले लेता है। इसलिए शपथ को शायद दहेज न लेने (यह बात देने से ज्यादा बड़ी लगती है मुझे) से भी जोड़ा जा सकता था या अब भी जोड़ा जा सकता है।

इस आंदोलन ने युवाओं के सोते देशप्रेम को जगा दिया लेकिन जब वे मैदान से गए तो यह भी लगा कि जैसे इतने दिनों से जिस शक्ति को एक बांध में रोका गया था, वो एकाएक फिर से खुल गया। खुला बांध बाढ़ भी लाता है कभी-कभी। शायद यह अच्छा होता कि इन युवाओं को किसी मकसद से जोड़ा जाता। किसी सतत बदलाव से भी जो भ्रष्टाचार से भी आगे होता। रात भर सड़को पर बाइक पर भागते युवाओं को किसी जरूरतमंद की मदद करने के लिए प्रेरित भी किया जा सकता था। अब भी इन्हें समाज के लिए हर रोज किसी सकारात्मक कदम से बांधा जा सकता है। बुजुगों की अनदेखी इस देश की बड़ी संवेदनशील समस्या रही है। जाने क्यों आंदोलन बार-बार युवा शक्ति अकेले की ही बात पर बार-बार दोहराव करता गया। राजनीतिक पार्टियां भी हमेशा युवाओं की ही बात किया करती हैं कुछ इस अंदाज में कि मानो जो युवा नहीं, वो काम का भी नहीं। इन युवाओं को अपने आपस-पास के परिवेश में सामाजिक काम करने, सड़कों पर बिखरे पत्थरों को हटाने या हटवाने, काम न करती ट्रैफिक लाइटों की व्यवस्था सुधरवाने, टूटी सड़कों को ठीक करवाने के लिए सांसदों पर जोर डालने, अपने परिसरों को साफ रखवाने, आस-पास के लोगों की मदद करने जैसे कई कर्तव्य याद दिलाए जा सकते थे। अब भी यह संभव है। यह शक्ति इस देश के बासी पड़ते चेहरे को रौनक से भर सकती है। वह सालों से रूके पड़े कामों को एक अनूठी गति देकर साबित कर सकती है कि इस देश की आबादी सिर्फ भीड़ नहीं बल्कि कर्मशील ताकत है।

दिल्ली के कुछ प्रमुख अखबार इस सारे आंदोलन के दौरान एक से बढ़कर एक तस्वीरें छापते हैं। एक तस्वीर एक नग्न अभिनेत्री की पीठ की है जिस पर अन्ना लिखा है। एक अभिनेत्री का बयान है कि वे अन्ना के साथ डेट पर जाना चाहती हैं और उन्हें 100 गुलाब भेंट करना चाहती हैं। कुछ गायकों की तस्वीरें हैं जो वहां जाकर देशभक्ति के गाने गाते हुए अपना जनसंपर्क भी कर आते हैं। टोपियों की बिक्री एक बड़ा व्यवसाय बन कर उभरती है वगैरह।

इन सबमें कई बातें छूट जाती हैं। देश के उत्तर-पूर्व में आई बाढ़, पाक अधिकृत कश्मीर में घुसपैठियों को मार शहीद हुआ एक 26 वर्षीय युवा, लीबिया, बढ़ती हुई महंगाई और भी न जाने क्या-क्या।

आंदोलन के खत्म होने के बाद अब यह समय सरकार की करवट को भांपने और उसकी रफ्तार को देखने का है। पर साथ ही अब अन्ना टीम को भी जरा सतर्क होना होगा। कैमरे के पीछे बैठ कर कवर करने वालों ने भले ही वही दिखाया जो दिखाना जरूरी, जन हित, जनता की पसंद और टीआरपी की रूचि का था लेकन यह भी महसूस किया गया कि कई सिविल सोसायटी ग्रुप इस दौरान काफी उग्र बने रहे। नेताओं ने भी अपना गुस्सा भरकर निकाला।

अब समय संभल कर चलने का है। इसे बार-बार जीत न कहिए। जीतने वालों को जीत पाने के बाद सबसे पहले अपने गुमान और उससे होने वाले नशे पर ही नियंत्रण करना चाहिए। ताकत के मिलने पर बाकी दूसरे पक्ष यही देखा करते हैं कि ताकत औऱ जीत पाने वाला उसे हजम कर भी पा रहा है कि नहीं। रामलीला मैदान से जम कर छींटकशी हुई। किरण बेदी तो मुंह पर तौलिया ढक कर नकल भी उतार गईं। उधर संसद में लालू और शरद यादव भी जम कर बोल लिए। स्वामी अग्निवेश भी अपनी जुबान पर काबू नहीं रख पाए। सिविल सोसायटी भी अगर वही करने लगी जो संसद के अंदर बैठे महानुभव अक्सर करते हैं तो फिर दोनों में फर्क ही क्या रहेगा। इसलिए अब ठहर जाइए जरा और सुस्ता भी लीजिए। इस देश की बड़ी आबादी को अन्ना और उनकी टीम से जिस बखूबी जोड़ा है, उसे बार-बार दिशा याद दिलानी होगी। नारों से ज्या काम बताने होंगे। झंडे फहराने से ज्यादा अपनी सार्थकता के झंडे गाढ़ने होंगे। ऐसा काम कर दिखाना होगा कि ठंडे पड़े सरकारी महकमे भी हैरान हो जाएं। पर इसके लिए जरूरी होगा सब्र और संभला हुआ संवाद।

अब मौसम बदला है। इसलिए बदलाव के इस दौर में संयम रखिए क्योंकि इंसान की पहचान उत्सव में नहीं, तूफान में होती है।

नोट: समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडिया पोर्टल एक्सचेंज4मीडिया का नया उपक्रम है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें samachar4media@exchange4media.comपर भेज सकते हैं या 09899147504/ 09911612929 पर संपर्क कर सकते हैं।



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मीडियाकर्मी को न्याय के निजाम की स्थापना के लिए काम करना चाहिए
26/09/2011

शेष नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

सुप्रीम कोर्ट की जज ,न्यायमूर्ति श्रीमती ज्ञान सुधा मिश्रा ने कहा है कि मीडिया में काम करने वालों अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को सुनकर ही काम करना चाहिए . उन्होंने ख़ास तौर से टेलिविज़न वालों को संबोधित करते हुए कहा कि मीडियाकर्मी भी एक तरह के जज हैं , जो भी विषय उनके सामने आता है ,वे उस पर एक तरह से फैसला ही देते हैं . वे लोगों का क्रास एग्जामिनेशन करते हैं और उनके काम का असर देश काल पर पड़ता है . मीडियाकर्मी को ध्यान रखना चाहिए कि उनका भी एक मुख्य न्यायाधीश होता है जो उनकी आत्मा के अंदर बैठा रहता है
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क्यों इतना हंगामा है बरपा
16/09/2011
सुमंत भट्टाचार्य, ईपी, न्यूज एक्सप्रेस

देश की मीडिया का हाल वाकई दुखदाई है। खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का। कल की बड़ी खबर से साफ था, भारतीय मीडिया में कोई भी खबर आसानी से प्लांट कराई जा सकती है। उदाहरण है कांग्रेसनल रिसर्स सर्विसेस (सीआरएस) की रिपोर्ट।
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हिन्दी में ई पुस्तकों की मुश्किल डगर
15/09/2011

पीयूष पांडे, साइबर पत्रकार

इलेक्ट्रॉनिक किताबों की अहमियत सिर्फ इसलिए नहीं है क्योंकि इनकी कीमत पारंपरिक किताबों की तुलना में कम होती है। बल्कि इसलिए है क्योंकि अच्छी पुस्तकें आसानी से बाजार में उपलब्ध नहीं है। हिन्दी में हाल बहुत बुरा है। हिन्दी के तमाम बड़े प्रकाशकों की चर्चित पुस्तकें भी आम बुक स्टोर पर उपलब्ध नहीं हैं।
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देख-सुनकर समझने का वक्त
09/09/2011

नदीम एस. अख्तर, टीवी पत्रकार
जो मीडिया अन्ना के गांव से पल-पल की खबर दिखाता है, वह दिल्ली स्थित पीडब्ल्यूडी, सीएम और पुलिस कमिश्नर के दफ्तर तक नहीं पहुंच पाया। अखबारों में इससे संबंधित खबरें छप रही हैं लेकिन टीवी के पर्दे पर उतनी शिद्दत से नहीं दिखीं, जितनी शिद्दत से ऐश्वर्या राय के गर्भवती होने की खबरें दिखाई जाती हैं
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मीडिया असंतुलित है, अपराधी नहीं
01/09/2011

प्रमोद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
क्या मीडिया की साजिश है? मुझे यह साजिश तो नहीं लगती, हाँ बिजनेस के हाथों में जकड़े मीडिया हाउसों का असंतुलन ज़रूर लगता है। पिछले साल जब कॉमनवैल्थ गेम्स के घोटालों को लेकर मीडिया ने खबरों को उछालना शुरू किया तब मीडिया हाउसों का अंतर्विरोध सामने आया। इंडियन एक्सप्रेस सरकार के पक्ष में और टाइम्स ऑफ इंडिया ने मुखालफत में आवाज बुलंद की।


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* A+E Networks I TV18 JV appoints MPG India as media AoR for History channel
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आज की पत्रकारिता और आज के पत्रकार


b4m
नूतन ठाकुर: "मर्द और औरत की शैतानी- इंसान की नादानी" देखिए आज रात दस बजे...  "कौन है लड़कियों का शिकार करने वाला शैतान बाबा"- पूरी खबर सिर्फ हमारे चैंनेल पर...  "शेर मरेगा, शकीरा नाचेगी, गोल होगा, गोली चलेगी, एक ठुमके पर एक मौत".... या "खुलेंगे नर्किस्तान के तीन दरवाजे, आयेगा जलजला".... ये वे कुछ ऐसे हेडलाइंस हैं जिन पर आज कल के महत्वपूर्ण और गंभीर टीवी चैनल अक्सर विचार-विमर्श करते और अपने दर्शकों को जागरुक करते हुए नज़र आ जाते हैं. कमोबेश यही स्थिति कई बार कुछ गंभीर, पुराने और प्रतिष्ठित अखबारों में भी दिख जाया करती हैं.
इन्‍हीं बातों को ध्यान में रखते हुए कई दिनों से मेरे मन में आज के पत्रकारों और पत्रकारिता को ले कर कुछ सवाल उठ रहे थे. जिस त्वरित गति   से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अब इन्टरनेट के जरिए देश-विदेश की खबरें दूर-दराज के इलाकों में भी आसानी से पहुंच रही हैं। उस से निसंदेह आज  के पत्रकार अछूते नहीं रहे हैं. खबरों को जल्दी से जल्दी जनता तक पहुंचाने की होड़ में उन्हें आये दिन न सिर्फ नई-नई चुनौतियों का सामना करना  पड़ता है अपितु कई बार तो इस पूरे क्रम में उनकी व्यक्तिगत जिंदगी भी काफी प्रभावित होती है.
फिर अचानक कल मुझे ख़याल आया कि क्यूँ नहीं इस सम्बन्ध में आजकल काफी धूम-धड़ाके से हिट फेसबुक पर इसी विषय पर कुछ वाद-विवाद छेड़ कर देखा जाए कि किस प्रकार हमारे समाज के विभिन्न वर्ग इस सम्बन्ध में अपने विचार रखते हैं. मुझे यह भी मालूम था कि चूँकि एक बड़ी भारी संख्या में हमारे पत्रकार साथी भी फेसबुक के शिकार हैं, इसीलिए उनकी तरफ से भी कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ जरूर आएँगी, और फिर दूसरे लोग भी इस विषय में अपने विचार रखेंगे. मैंने कुल मिला कर दो सवाल अपने साथियों के सामने रखे. पहला- ‎"आज के पत्रकार पहले के पत्रकारों की तुलना में अधिक क्षमतावान हैं. इस विषय पर आप की क्या राय है" और दूसरा- "पत्रकारिता ने अपनी प्रामाणिकता बहुत हद तक खो दी है. क्या आप इससे सहमत हैं?"इन सबसे जो राय मुझे मिले हैं वे इस लायक हैं जो आप के सामने रखा जा सके, जिससे हमारे बारे में उठ रही मान्यताओं को हम जान सकें.
पहले मैं दूसरे सवाल पर आई राय रखती हूँ. भोपाल की वन्य-जीव कार्यकत्री का जवाब सुने- "what a question Sir jee? सवाल में  ही जवाब है." वाराणसी के मैनेजमेंट फर्म का संचालन कर रहे राम राय कहते हैं- "और पीपली लाइव ने इसे प्रमाणित भी कर दिया है"  यानी कि पीपली लाइव से हम पत्रकारों का नुकसान ही नुकसान है, क्यूंकि अब तो आम आदमी भी हमारे अन्दर के तमाम खेलों को जानने-समझने लगा है. दिल्ली की वकील अनिता शुक्ला और मुंबई की गृहणी अनीता सिंह तो यह बात मानती ही हैं, नागपुर के लोकमत समाचार के सब एडिटर समीर ईनामदार तक यह कहने से नहीं चूकते-" I agree with u." बिहार के रजनीश कुमार कहते  हैं- "100%." लखनऊ के रहने वाले पर जेओर्जिया स्टेट विश्वविद्यालय के प्राध्यापक अरविन्द पाठक इसे ग्लोबल परिदृश्य में देखते हैं- "यह स्थिति अब पूरे विश्व में है."
लेकिन इसके विपरीत भी कहने वाले लोग हैं. भोपाल के एक पोर्टल के सम्पादक दीपक शर्मा बदले में पूछते हैं- "किस की प्रामाणिकता बढ़ी है." तो बुलंदशहर के एक अन्य पत्रकार पृथ्वीपाल सिंह तो खुल कर सामने आते हैं-"नहीं, कदापि नहीं। पत्रकारिता दिन प्रतिदिन नये आयामों को छू रही है। अत्याधुनिक संसाधनों से ओतप्रोत पत्रकारिता ने और अधिक सजग एवं चैतन्य प्रमाणिक बना दिया है। वर्तमान परिवेश में पत्रकारिता सही दिशा की ओर बढ़ रही है। गुण-दोष के आधार पर निरंतर उत्तरोत्तर प्रगतिशील है।"
एक तीसरी धारा भी बहती नज़र आती है. उदाहरण के लिए मधुबनी निवासी दिल्ली स्थित पत्रकार रजनीश झा का कहना है- "पत्रकारिता ने नहीं अपितु पत्रकारों ने अपनी प्रमाणिकता गंवाई है," तो बहराइच के फ्रीलांसर पत्रकार हरिशंकर शाही इसे आगे बढाते हैं- "बिलकुल सही कहा रजनीश जी ने पत्रकारिता ने नहीं पत्रकारों ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है, अब पत्रकार किसी मिशन के लिए नहीं अपितु वसूली के लिए आने लगे हैं. विचारों की जगह केवल सनसनी आ गयी है." राज कुमार रंजन, जो प्रभात खबर रांची के पत्रकार हैं, समन्वय बैठाने का प्रयास करते हैं- "कुछ लोगों के  चलते पत्रकारिता पर शक करना सही नहीं है ."
यह तो हुई पत्रकारिता की बात, अब पत्रकारों की काबिलियत पर हुई चर्चा को देखा जाए. इस पर अमिता शुक्ल कुछ यूँ प्रतिक्रया देती हैं- "इन लोगों के पास सुविधाएं तो बहुत हैं पर ज्ञान और विवेक बहुत कम है" इस पर दिल्ली के अधिवक्ता अरुण बक्षी पूछ बैठते हैं- "क्या सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर में तुलना की जा सकती है?" फरीदकोट के गुरप्रीत सिंह इस से सहमत हैं तो आगरा के प्रवक्ता राज किशोर सिंह पूर्णतया असहमत. लखनऊ से अपना साप्ताहिक अखबार निकालने वाले संजय शर्मा का कहना है- "हां" तो आगरा के सामजिक कार्यकर्ता जीतेंद्र शर्मा कहते हैं- "नहीं".
एक बार फिर रजनीश झा इसका विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं- "पहले के पत्रकार विचारों के साथ पत्रकारिता में आते थे, आज के पत्रकार पत्रकारिता की व्यवसायिकता को सीख कर पत्रकारिता में आते हैं. कार्यक्षमता नि:संदेह अधिक हो सकती है क्यूंकि सेठ की नौकरी करनी है तो क्षमता से प्रदर्शन भी करना होगा, मगर विचारों और पत्रकारिता के मूल सिद्दांतों में शून्यता आ गयी है." जिसका समर्थन हरिशंकर शाही यूँ करते  हैं-' क्षमतावान  नहीं संसाधन युक्त हो गए हैं, पहले पत्रकरिता में सोच होती थी अब सिर्फ ग्लैमर की चमक दिखती है."
अंत में गुडगांव के एक निजी अस्पताल में कार्यरत एक डाक्टर मुनीश प्रभाकर की बात कहूँगी- "शायद हां पर कुल मिला कर कुछ पीत-पत्रकारिता करने वालों, पेड न्यूज़ छापने वालों और उच्च कोटि के भ्रष्ट पत्रकारों ने इसे पूरी तरह बदनाम कर दिया है." अब इन सबों में कौन कितना सही है और कौन कितना गलत, ये तो हम सबों को ही विचारना होगा।
लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर लखनऊ से प्रकाशित 'पीपल्स फोरम' की एडिटर

Freelance Journalism



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Freelance Journalism
Advanced Freelance Journalism
Diploma FJ12B, Diploma FJA18B Advanced
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With the support of your tutor (a newspaper editor who works in the industry running a busy newspaper), you will learn the essential components of coming up with story ideas, structuring your story in the way that editors want, writing the story from headline to tail and you will acquire advanced skills in how to present your work for editors.

This is one of the most comprehensive correspondence courses available in Freelance Journalism. Through progressive learning and practical activities you will learn to write winning articles in the areas of fashion, travel, news and current affairs, general interest, health and fitness, women's and men's topics, and more.

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You will learn the keys to writing good articles that editors want to buy and you will learn how to working with the five fundamental questions every journalist must know to get their stories published. Also, in this Course you will learn about the value of selling and re-selling your articles and how syndication works. With this aim in mind, you will gain invaluable skills in how to profit from freelance journalism.

Career opportunities include: Freelance Journalist, Columnist, Feature Writer, News Reporter, Freelance Writer, Foreign Correspondent, Sub-editor, Researcher.

Industries include: newspaper/magazine publishing, television/media, corporate/government.

Journalists write and edit news reports, commentaries and features for newspapers, magazines and for radio or television stations. Most journalists are expected to be 'generalists', that is, able to cover almost any topic of interest. Journalists who work for large commercial organisations and government departments may also prepare annual reports and media releases. A journalist may perform the following tasks:
  • gather news and information by interviewing people and attending events
  • undertake research to provide background information for articles
  • assess the suitability of reports and articles for publication or broadcasting, within an established style and format, and edit as necessary
  • write articles that comment on or interpret news events, and that may put forward a point of view on behalf of the publication/broadcasting agency
  • comment on television/radio (in the broadcasting industry)
  • liaise with all sorts of people, particularly those in the media business.

Journalists usually start as in-house cadets or freelancers and report routine events and general interest stories. All journalists are required to understand the laws of defamation, contempt and copyright. They may have to work irregular hours and often need to complete work to meet publication or broadcasting deadlines. Travel is sometimes a necessary part of the work. After learning the ropes, a journalist may specialise as a:
  • News Reporter: reports on day-to-day news events (e.g. crime, education, health, sport, business)
  • Columnist: writes a regular section within their particular interest category (e.g. home decorating, beauty, fashion, politics).
  • Feature Writer: writes in-depth stories on specific news and general interest topics (often with accompanying photos taken by a photojournalist).
  • Foreign Correspondent: a reporter who is located overseas and writes stories on international affairs.
  • Rounds Reporter: reports on information provided by sources such as police, courts and hospitals.
  • Commentator, reviewer or critic: evaluating anything from sports, films and restaurants to art exhibitions, travel destinations and consumer goods.
  • Sub-editor: edit and proofread articles submitted by journalists and check for errors, inconsistencies and readability.
  • Researcher: work in print media or broadcasting and develop story ideas for programs or publication, as well as undertaking background research on all sorts of topics.
Course Information
This course has been developed to meet the requirements of freelance journalists working on assignment for a range of newspapers with some broadcasting elements. It is packed with practical activities and you will have real articles and features to write and submit to newspaper editors. In addition, you can access the online activities in the eLearning Centre to further practise and test your knowledge and skills. And you can talk with other students from all over the country in the Student Forum.

Your course is made up of tutorial workbooks (lessons), assignment projects and printed/online supplements. You have up to 5 years to complete your course and graduate or Fast Track your course over weeks or months.
When you successfully complete your course you will be awarded:

Diploma of Journalism (Freelance Journalism)

and if you complete the advanced level:
Diploma of Journalism (Advanced Freelance Journalism)

plus on your award and transcript:

The ACQ Diploma of Freelance Journalism and Diploma of Advanced Freelance Journalism are formally recognised by Central Queensland University (CQU). With successful completion you can apply for entry into and have some advanced standing in CQU degrees, including Bachelor of Arts (Journalism). These programs can be completed from home in distance mode. If accepted into a CQU program you will be exempted from two first year units:
JOUR11005 Introduction to Journalism
JOUR11006 News Writing and Reporting
This statement will appear on your Transcripts and the CQU logo will appear on your Diploma.

View the subjects on the CQU Handbook Freelance Journalism Course

Freelance Journalism:

Tutorial 1. The World of Journalism
Topic 1: An introduction to freelance journalism
Topic 2: The journalist's role
Topic 3: Careers in journalism
Topic 4: A brief history of journalism
Topic 5: Inside a newspaper
Topic 6: Working as a freelance journalist
Topic 7: The journalist's toolkit
Topic 8: Writing a journalism article
Topic 9: Getting started—space fillers

Tutorial 2. News Reporting 1A
Topic 1: What you need to succeed as a freelance news journalist
Topic 2: Article structure: the inverted pyramid
Topic 3: Writing the lead
Topic 4: Writing the body
Topic 5: Writing the tail
Topic 6: Writing for the media
Topic 7: How an editor assesses your article

Tutorial 3. Freelance Journalism Essentials: Responsible Journalism
Topic 1: Reporting the news
Topic 2: Responsible journalism
Topic 3: Journalist's equipment
Topic 4: Accounts and stationery
Topic 5: Tutorial summary

Tutorial 4. Writing as a Freelance Journalist
Topic 1: Selling yourself and your work
Topic 2: How to lay out your articles
Topic 3: Notes from an editor
Topic 4: A basic freelance contract
Topic 5: Tutorial summary

Tutorial 5. News Reporting 1B
Topic 1: Beginnings, middles and endings
Topic 2: Angles and hooks
Topic 3: Reporting quotes
Topic 4: Reporting media events
Topic 5: Writing tense
Topic 6: Tutorial summary

Tutorial 6. Research, Statistics and the Internet
Topic 1: Research and information sources
Topic 2: The Internet
Topic 3: External research resources
Topic 4: Accessing 'official' information
Topic 5: Tutorial summary

Tutorial 7. Journalism Interviews

Topic 1: Good interviewing
Topic 2: Interviews and profile articles
Topic 3: Setting up the interview
Topic 4: Observation, reporting and interview strategies
Topic 5: Interview quotes
Topic 6: Doing a TV interview
Topic 7: The art of the interview
Topic 8: Tutorial summary

Tutorial 8. Writing Style
Topic 1: Using newspaper style
Topic 2: Writing techniques
Topic 3: House style—journalistic rules and conventions
Topic 4: News Limited Style
Topic 5: Names and honorifics
Topic 6: Modifiers and clichs
Topic 7: Punctuation, spelling and grammar
Topic 8: Trade terminology and journalistic jargon
Topic 9: Ten tips for good writing

Tutorial 9. Newspaper Writing and Sub-Editing
Topic 1: A journalist's way with words
Topic 2: Working with the sub-editor
Topic 3: Newspaper language
Topic 4: Writing headlines
Topic 5: Writing editorial
Topic 6: Tutorial summary

Tutorial 10. Media Law and Ethics
Topic 1: Defamation
Topic 2: Confidentiality—a mixture of ethics and law
Topic 3: The law and court reporting
Topic 4: Copyright
Topic 5: Ethics and courtesy count, too
Topic 6: Tutorial summary

Tutorial 11. Feature Writing
Topic 1: FreelancIng for the mainstream media
Topic 2: Six mainstream journalism areas
Topic 3: Feature writing
Topic 4: Researching a feature story
Topic 5: Writing a feature story
Topic 6: Reviewing a feature story
Topic 7: Tutorial summary

Tutorial 12. Writing Columns and Reviews
Topic 1: A column of your own
Topic 2: Writing for specialist publications
Topic 3: Writing reviews
Topic 4: Writing arts and entertainment reviews
Topic 5: Writing a music review
Topic 6: Sports writing
Topic 7: Travel writing
Topic 8: Your contacts book
Topic 9: Tutorial summary

Advanced Freelance Journalism:
Tutorial 13. Applied Journalism and Multi-media
Topic 1: The role of applied journalism
Topic 2: Writing press releases and public relations pieces
Topic 3: Writing a ‘people’ piece
Topic 4: Writing editorials
Topic 5: Writing content for the web
Topic 6: The virtual newsroom: your news desk free facts pack
Topic 7: Producing copy under pressure

Tutorial 14. Choosing Assignments

Topic 1: Newspaper versus magazine writing
Topic 2: Writing for magazines
Topic 3: Choosing the right magazine
Topic 4: What magazine publisher’s want
Topic 5: Choosing your assignments
Topic 6: Domestic versus international markets

Tutorial 15. Broadcast Journalism: Television and Radio

Topic 1: The electronic media market
Topic 2: Journalism in broadcasting
Topic 3: Reporting for television and radio
Topic 4: Television and radio writing techniques
Topic 5: Television and radio presenting techniques
Topic 6: Techniques for writing scripts and speeches

Tutorial 16. Photojournalism and Specialisms
Topic 1: The journalist and the photographer
Topic 2: Behind photojournalism
Topic 3: Photojournalism basics
Topic 4: Photography techniques
Topic 5: Getting into photojournalism
Topic 6: Writing for specialised markets
Topic 7: The trail of the ‘Paparazzi’

Tutorial 17. Professional Freelancing
Topic 1: How professionals get work
Topic 2: How professionals handle rejections
Topic 3: Building relationships with editors and sub-editors
Topic 4: The final edit
Topic 5: Earning an income from freelance journalism
Topic 6: Negotiating rates and contracts

Tutorial 18. On Assignment
Topic 1: Three elements of freelance success
Topic 2: What to take with you on assignment
Topic 3: Managing your assignments
Topic 4: Other sources of income
Topic 5: Building your freelance journalism business
Topic 6: Your future as a freelance journalist
For an outline and facts booklet, click on Free Facts Pack. Download it or have it mailed to you.




पत्रकारिता – अर्थ एवं परिभाषा





पत्रकारिता
सामाजिक जीवन में चलने वाली घटनाओं, झंझावातों के बारे में लोग जानना चाहते हैं, जो जानते हैं वे उसे बताना चाहते हैं । जिज्ञासा की इसी वृत्ति में पत्रकारिता के उद्भव एवं विकास की कथा छिपी है । पत्रकारिता जहाँ लोगों को उनके परिवेश से परिचित कराती ह, वहीं वह उनके होने और जीने में सहायक है । शायद इसी के चलते इन्द्रविद्यावचस्पति पत्रकारिता को पांचवां वेदमानते हैं । वे कहते हैं – “पत्रकारिता पांचवां वेद है, जिसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान संबंधी बातों को जानकर अपना बंद मस्तिष्क खोलते हैं ।”1
वास्तव में पत्रकारिता भी साहित्य की भाँति समाज में चलने वाली गतिविधियों एवं हलचलों का दर्पण है । वह हमारे परिवेश में घट रही प्रत्येक सूचना को हम तक पहुंचाती है । देश-दुनिया में हो रहे नए प्रयोगों, कार्यों को हमें बताती है । इसी कारण विद्वानों ने पत्रकारिता को शीघ्रता में लिखा गया इतिहास भी कहा है । वस्तुतः आज की पत्रकारिता सूचनाओं और समाचारों का संकलन मात्र न होकर मानव जीवन के व्यापक परिदृश्य को अपने आप में समाहित किए हुए है।
यह शाश्वत नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक मूल्यों को समसामयिक घटनाचक्र की कसौटी पर कसने का साधन बन गई है । वास्तव में पत्रकारिता जन-भावना की अभिव्यक्ति, सद्भावों की अनुभूति और नैतिकता की पीठिका है । संस्कृति, सभ्यता औस स्वतंत्रता की वाणी होने के साथ ही यह जीवन अभूतपूर्व क्रांति की अग्रदूतिका है । ज्ञान-विज्ञान, साहित्य-संस्कृति, आशा-निराशा, संघर्ष-क्रांति, जय-पराजय, उत्थान-पतन आदि जीवन की विविध भावभूमियों की मनोहारी एवं यथार्थ छवि हम युगीन पत्रकारिता के दर्पण में कर सकते हैं ।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. अंजन कुमार बनर्जी के शब्दों में पत्रकारिता पूरे विश्व की ऐसी देन है जो सबमें दूर दृष्टि प्रदान करती है । वास्तव में प्रतिक्षण परिवर्तनशील जगत का दर्शन पत्रकारिता के द्वारा ही संभव है ।
पत्रकारिता की आवश्यकता एवं उद्भव पर गौर करें तो कहा जा सकता है कि जिस प्रकार ज्ञान-प्राप्ति की उत्कण्ठा, चिंतन एवं अभिव्यक्ति की आकांक्षा ने भाषा को जन्म दिया ।ठीक उसी प्रकार समाज में एक दूसरे का कुशल-क्षेम जानने की प्रबल इच्छा-शक्ति ने पत्रों के प्रकाशन को बढ़ावा दिया । पहले ज्ञान एवं सूचना की जो थाती मुट्ठी भर लोगों के पास कैद थी, वह आज पत्रकारिता के माध्यम से जन-जन तक पहुंच रही है । इस प्रकार पत्रकारिता हमारे समाज-जीवन में आज एक अनिवार्य अंग के रूप में स्वीकार्य है । उसकी प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता किसी अन्य व्यवसाय से ज्यादा है । शायद इसीलिए इस कार्य को कठिनतम कार्य माना गया । इस कार्य की चुनौती का अहसास प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी को था, तभी वे लिखते हैं
खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो”3
पत्रकारिता का अर्थ
सच कहें तो पत्रकारिता समाज को मार्ग दिखाने, सूचना देने एवं जागरूक बनाने का माध्यम है । ऐसे में उसकी जिम्मेदारी एवं जवाबदेही बढ़ जाती है । यह सही अर्थों में एक चुनौती भरा काम है ।
प्रख्यात लेखक-पत्रका डॉ. अर्जुन तिवारी ने इनसाइक्लोपीडिया आफ ब्रिटेनिका के आधार पर इसकी व्याख्या इस प्रकार की है – “पत्रकारिता के लिए जर्नलिज्मशब्द व्यवहार में आता है । जो जर्नलसे निकला है । जिसका शाब्दिक अर्थ है – ‘दैनिक। दिन-प्रतिदिन के क्रियाकलापों, सरकारी बैठकों का विवरण जर्नल में रहता था । 17वीं एवं 18 वीं शताब्दी में पीरियाडिकल के स्थान पर लैटिन शब्द डियूनरलऔर जर्नलशब्दों का प्रयोग आरंभ हुआ । 20वीं सदी में गम्भीर समालोचना एवं विद्वतापूर्ण प्रकाशन को इसके अन्तर्गत रका गया । इस प्रकार समाचारों का संकलन-प्रसारण, विज्ञापन की कला एवं पत्र का व्यावसायिक संगठन पत्रकारिता है । समसामयिक गतिविधियों के संचार से सम्बद्ध सभी साधन चाहे वह रेडियो हो या टेलीविज़न, इसी के अन्तर्गत समाहित हैं ।
एक अन्य संदर्भ के अनुसार जर्नलिज्मशब्द फ्रैंच भाषा के शब्द जर्नीसे उपजा है । जिसका तात्पर्य है प्रतिदिन के कार्यों अथवा घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करना ।पत्रकारिता मोटे तौर पर प्रतिदिन की घटनाओं का यथातथ्य विवरण प्रस्तुत करती है। पत्रकारिता वस्तुतः समाचारों के संकलन, चयन, विश्लेषण तथा सम्प्रेषण की प्रक्रिया है । पत्रकारिता अभिव्यक्ति की एक मनोरम कला है । इसका काम जनता एवं सत्ता के बीच एक संवाद-सेतु बनाना भी है । इन अर्थों में पत्रकारिता के फलित एव प्रभाव बहुत व्यापक है ।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है सूचना देना, शिक्षित करना तथा मनोरंजन करना । इन तीनों उद्देश्यों में पत्रकारिता का सार-तत्व समाहित है । अपनी बहुमुखी प्रवृत्तियों के कारण पत्रकारिता व्यक्ति और समाज के जीवन को गहराई से प्रभावित करती है । पत्रकारिता देश की जनता की भावनाओं एवं चित्तवृत्तियों से साक्षात्कार करती है । सत्य का शोध एवं अन्वेषण पत्रकारिता की पहली शर्त है । इसके सही अर्थ को समझने का प्रयास करें तो अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध दर्ज करना इसकी महत्वपूर्ण मांग है ।
असहायों को सम्बल, पीड़ितों को सुख, अज्ञानियों को ज्ञान एवं मदोन्मत्त शासक को सद्बुद्धि देने वाली पत्रकारिता है, जो समाज-सेवा और विश्व बन्धुत्व की स्थापना में सक्षम है । इसीलिए जेम्स मैकडोनल्ड ने इसे एक वरेण्य जीवन-दर्शन के रूप में स्वीकारा है
पत्रकारिता को मैं रणभूमि से भी ज्यादा बड़ी चीज समझता हूँ । यह कोई पेशा नहीं वरन पेशे से ऊँची कोई चीज है । यह एक जीवन है, जिसे मैंने अपने को स्वेच्छापूर्वक समर्पित किया ।
पत्रकारिता की प्रकृति
सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन प्रदान करने के तीन उद्देश्यों में सम्पूर्ण पत्रकारिता का सार तत्व निहित है । पत्रकारिता व्यक्ति एवं समाज के बीच सतत संवाद का माध्यम है । अपनी बहुमुखी प्रवृत्तियों के चलते पत्रकारिता व्यक्ति एवं समाज को गहराई तक प्रभावित करती है । सत्य के शोध एवं अन्वेषण में पत्रकारिता एक सुखी, सम्पन्न एवं आत्मीय समाज बनाने की प्रेरणा से भरी-पूरी है । पत्रकारिता का मूल उद्देश्य ही अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध दर्ज करना है । सच्ची पत्रकारिता की प्रकृति व्यवस्था विरोधी होती है । वह साहित्य की भाँति लोक-मंगल एवं जनहित के लिए काम करती है। वह पाठकों में वैचारिक उत्तेजना जगाने का काम करती है । उन्हें रिक्त नहीं चोड़ती । पीड़ितों, वंचितों के दुख-दर्दों में आगे बढ़कर उनका सहायक बनना पत्रकारिता की प्रकृति है । जनकल्याण एवं विश्वबंधुत्व के भाव उसके मूल में हैं । गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है
कीरति भनति भूलि भलि सोई, सुरसरि सम सबकर हित होई
उपरोक्त कथन पत्रकारिता की मूल भावना को स्पष्ट करता है । भारतीय संदर्भों में पत्रकारिता लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित है । वह समाज से लेना नहीं वरन उसे देना चाहती है । उसकी प्रकृति एक समाज सुधारक एवं सहयोगी की है । वह अन्याय, दमन से त्रस्त जनता को राहत देती है, जीने का हौसला देती है । सत्य की लड़ाई को धारदार बनाती है । बदलाव के लिए लड़ रहे लोगों की प्रेरणा बनती है । पत्रकारिता की इस प्रकृति को उसके तीन उद्देश्यों में समझा जा सकता है ।
1. सूचना देना
पत्रकारिता दुनिया-जहान में घट रही घटनाओं, बदलावों एवं हलचलों से लोगों को अवगत कराती है । इसके माध्यम से जनता को नित हो रहे परिवर्तनों की जानकारी मिलती रहती है । समाज के प्रत्येक वर्ग की रुचि के के लोगों के समाचार अखबार विविध पृष्ठों पर बिखरे होते हैं, लोग उनसे अपनी मनोनुकूल सूचनाएं प्राप्त करते हैं । इसके माध्यम से जनता को सरकारी नीतियों एवं कार्यक्रमों की जानकारी भी मिलती रहती है । एक प्रकार से इससे पत्रकारिता जनहितों की संरक्षिका के रूप में सामने आई है ।
2. शिक्षित करना
सूचना के अलावा पत्रकारिता लोक गुरूकी भी भूमिका निभाती है । वह लोगों में तमाम सवालों पर जागरुकता लाने एवं जनमत बनाने का काम भी करती है । पत्रकारिता आम लोगों को उनके परिवेश के प्रति जागरुक बनाती है और उनकी विचार करने की शक्ति का पोषण करती है । पत्रकारों द्वारा तमाम माध्यमों से पहुंचाई गई बात का जनता पर सीधा असर पड़ता है । इससे पाठक यादर्शक अपनी मनोभूमि तैयार करता है । सम्पादकीय, लेखों, पाठकों के पत्र, परिचर्चाओं, साक्षात्कारों इत्यादि के प्रकाशन के माध्यम से जनता को सामयिक एवं महत्पूर्ण विषयों पर अखबार तथा लोगों की राय से रुपरू कराया जाता है । वैचारिक चेतना में उद्वेलन का काम भी पत्रकारिता बेहतर तरीके से करती नजर आती है । इस प्रकारपत्रकारिता जन शिक्षण का एक साधन है ।
3 मनोरंजन करना
समाचार पत्र, रेडियो एवं टीवी ज्ञान एवं सूचनाओं के अलावा मनोरंजन का भी विचार करते हैं । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर आ रही विषय वस्तु तो प्रायः मनोरंजन प्रधान एवं रोचक होती है । पत्र-पत्रिकाएं भी पाठकों की मांग का विचार कर तमाम मनोरंजक एवं रोचक सामग्री का प्रकाशन करती हैं । मनोरंजक सामग्री स्वाभाविक तौर पर पाठकों को आकृष्ट करती है । इससे उक्त समाचार पत्र-पत्रिका की पठनीयता प्रभावित होती है । मनोरंजन के माध्यम से कई पत्रकार शिक्षा का संदेश भी देते हैं । अलग-अलग पाठक वर्ग काविचार कर भिन्न-भिन्न प्रकार की सामग्री पृष्टों पर दी जाती है । ताकि सभी आयु वर्ग के पाठकों को अखबार अपना लग सके । फीचर लेखों, कार्टून, व्यंग्य चित्रों, सिनेमा, बाल , पर्यावरण, वन्य पशु, रोचक-रोमांचक जानकारियों एवं जनरुचि से जुड़े विषयों पर पाठकों की रुचि का विचार कर सामग्री दी जाती है। वस्तुतः पत्रकारिता समाज का दर्पण है। उसमें समाज के प्रत्येक क्षेत्र में चलने वाली गतिविधि का सजीव चित्र उपस्थित होता है । वह घटना, घटना के कारणों एवं उसके भविष्य पर प्रकाश डालती है । वह बताती है कि समाज में परिवर्तन के कारण क्या हैं और उसके फलित क्या होंगे ? इस प्रकार पत्रकारिता का फलक बहुत व्यापाक होता है ।

14 टिप्पणियाँ:


आनंद ने कहा…
बहुत अच्‍छा प्रयास है। हम जैसे लोग पत्रकार नहीं हैं पर पत्रकारिता के बारे में जानने के उत्‍सुक हैं। हमारे लिए यह चिट्ठा बड़ा शिक्षाप्रद होगा। शुभकामनाएँ - आनंद पुनश्‍च : यह शब्‍द पुष्टिकरण हटा लें। खटकता है।
डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने कहा…
nam men bahut kuchh hota hai janab.
वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…
swaagat hai.
My Jungles ने कहा…
्बहुत खूब
नारदमुनि ने कहा…
koun se dor ki sikhaoge? benam teacher.narayan narayan
अजय कुमार ने कहा…
हिंदी ब्लॉग लेखन के लिए स्वागत और शुभकामनायें कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें तथा अपने सुन्दर विचारों से उत्साहवर्धन करें
Amit K Sagar ने कहा…
चिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं. --- महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!
uthojago ने कहा…
great, excellent
Devi Nangrani ने कहा…
Patrakarita par tavaju dene ke liye is jaise blog ki sakht zaroorat rahi. ab kami poori hogi. Roshini padti rahe, follow up hota rahe... shubhkamna ke saath Devi nangrani
pinkeshwer sahu ने कहा…
it is a very good sourse for our gk impro
सौरभ कुमार ने कहा…
बहुत अच्छा लिखा है.पत्रकारिता के सम्पूर्ण स्वरुप को समझने में उपयोगी।
Gopal Kumar ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
Gopal Kumar ने कहा…
लेख ज्ञानवर्धक होने के साथ-साथ अत्यंत रोचक भी है। पत्रकारिता एक साधारण व्यावसायिक कार्य ही नहीं, वरन् अत्यंत जिम्मेदारीपूर्ण कार्य है जिससे यह कार्य स्वतः सराहनीय ही नहीं बल्कि सम्माननीय भी बन जाता है। गोपाल कुमार, एम.ए. (हिंदी) अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद.
Gopal Kumar ने कहा…
एक बात समझ में नहीं आई। बचपन में विद्यालय की पाठ्य-पुस्तक में व्यास मुनि द्वारा रचित 'महाभारत' को पाँचवे वेद के रूप में मान्यताप्राप्त पढ़ा था, एम.ए. की कक्षा में भरतमुनि द्वारा रचित 'नाट्य शास्त्र' को पाँचवे वेद के रूप में जाना और अब आपके इस लेख में 'पत्रकारिता' को पाँचवाँ वेद बताया गया है। आख़िर कौन सी पुस्तक है 'पाँचवाँ वेद'?

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