बुधवार, 30 सितंबर 2020

महात्मा गाँधी पर दो ग़ज़लें / डॉ. वेद मित्र शुक्ला

 *महात्मा गाँधी पर केंद्रित दो ग़ज़लें* 

- डा. वेद मित्र शुक्ल 

सहायक प्रोफ़ेसर, अंग्रेजी विभाग

राजधानी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय

राजा गार्डेन, नई दिल्ली – 110015

मोब.: 9599798727 

(1)

खुद को ही जिसने होम किया उसका तो जीवन यज्ञ रहा,

अंतिम जन को जो जान गया सच में वह इक सर्वज्ञ रहा।


अपने तो अपने ही थे पर दूजों की भी परवाह रही,

दुश्मन के अच्छे भावों को जो समझ सका मर्मज्ञ रहा।


जिसने जीवन में सत्य, अहिंसा और प्रेम को सीख लिया,

फिर कौन ज्ञान जो नहीं रहा, वह इस जग में तत्वज्ञ रहा।


जो कुछ भी है उस मालिक का फिर लेन-देन को क्यों झगड़े,

दुनियावी लाभ-हानि की चिंता को कब वह गणितज्ञ रहा।


जन-जन की सेवा को जिसने हरि की सेवा था मान लिया,

उसको जग भुला सके कैसे, युग बीते किन्तु कृतज्ञ रहा।


(2)

गाँधी जैसा बनते-बनते जिन्ना और जवाहर बनते,

बिरले ही होते हैं जो कुछ सत्ता से हो बाहर बनते।


बातें करना राजा से यों आँख दिखाकर कहाँ सरल पर,

बातें करते आँख मिला जो घोर निशा में दिनकर बनते।


दुनियादारी छोड़ विरागी और संत बनना आसां है,

पर, गाँधी सा होंगे कितने जो जग में ही रहकर बनते।


बुद्ध हुए थे या फिर गाँधी जिनकी दुनिया में तो साहिब,

लोग जरायम छोड़ा करते और अहिंसक नाहर बनते।


सोचो कुछ करने को जब भी सच्चाई इक पैमाना हो,

कहते सच तो शिव होता है औ शिव से सब सुंदर बनते।


अपने अंतरतम की सुनकर धीरे ही पर चलते कुछ तो,

क्यों लोगो के हाथों में हम बस इक बेबस मोहर बनते।

तरीका मदद का

 मैं पैदल घर आ रहा था । रास्ते में एक बिजली के खंभे पर एक कागज लगा हुआ था । पास जाकर देखा, लिखा था:   


प्रस्तुति -कृष्ण  मेहता 


"इस रास्ते पर मैंने कल एक 50 का नोट गंवा दिया है । मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता । जिसे भी मिले कृपया इस पते पर दे सकते हैं ।" ...


यह पढ़कर पता नहीं क्यों उस पते पर जाने की इच्छा हुई । पता याद रखा । यह उस गली के आखिरी में एक घऱ था । वहाँ जाकर आवाज लगाया तो एक वृद्धा लाठी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आई । मुझे मालूम हुआ कि वह अकेली रहती है । उसे ठीक से दिखाई नहीं देता ।


"माँ जी", मैंने कहा - "आपका खोया हुआ 50 मुझे मिला है उसे देने आया हूँ ।"


यह सुन वह वृद्धा रोने लगी ।


"बेटा, अभी तक करीब 50-60 व्यक्ति मुझे 50-50 दे चुके हैं । मै पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, । ठीक से दिखाई नहीं देता । पता नहीं कौन मेरी इस हालत को देख मेरी मदद करने के उद्देश्य से लिख गया है ।"


बहुत ही कहने पर माँ जी ने पैसे तो रख लिए । पर एक विनती की - ' बेटा, वह मैंने नहीं लिखा है । किसी ने मुझ पर तरस खाकर लिखा होगा । जाते-जाते उसे फाड़कर फेंक देना बेटा ।'मैनें हाँ कहकर टाल तो दिया पर मेरी अंतरात्मा ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन 50-60 लोगों से भी "माँ" ने यही कहा होगा । किसी ने भी नहीं फाड़ा ।जिंदगी मे हम कितने सही और कितने गलत है, ये सिर्फ दो ही शक्स जानते है..

परमात्मा और अपनी अंतरआत्मा..!! मेरा हृदय उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता से भर गया । जिसने इस वृद्धा की सेवा का उपाय ढूँढा । सहायता के तो बहुत से मार्ग हैं , पर इस तरह की सेवा मेरे हृदय को छू गई । और मैंने भी उस कागज को फाड़ा नहीं ।मदद के तरीके कई हैं सिर्फ कर्म करने की तीव्र इच्छा मन मॆ होनी चाहिए

🌿

                 *कुछ नेकियाँ*

                    *और*


                *कुछ अच्छाइयां..*


  *अपने जीवन में ऐसी भी करनी चाहिए,* 


          *जिनका ईश्वर के सिवाय..* 


          *कोई और गवाह् ना हो...!!*

महाभारत के नौ सूत्र सार

 यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय न हो तो भी इसके नौ सार- सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते है :-


1.संतानों की गलत माँग और हठ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो अंत में आप असहाय हो जायेंगे-  कौरव


2.आप भले ही कितने बलवान हो लेकिन अधर्म के साथ हो तो, आपकी विद्या, अस्त्र-शस्त्र शक्ति और वरदान सब निष्फल हो जायेगा -    कर्ण


3.संतानों को इतना महत्वाकांक्षी मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को आमंत्रित करे-

अश्वत्थामा


4.कभी किसी को ऐसा वचन मत दो  कि आपको अधर्मियों के आगे समर्पण करना पड़े -    भीष्म पितामह


5.संपत्ति, शक्ति व सत्ता का दुरुपयोग और दुराचारियों का साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन कराता है -    दुर्योधन


6.अंध व्यक्ति- अर्थात मुद्रा, मदिरा, अज्ञान, मोह और काम ( मृदुला) अंध व्यक्ति के हाथ में सत्ता भी विनाश की ओर ले जाती है -    धृतराष्ट्र


7.यदि व्यक्ति के पास विद्या, विवेक से बँधी हो तो विजय अवश्य मिलती है -

अर्जुन


8.हर कार्य में छल, कपट, व प्रपंच रच कर आप हमेशा सफल नहीं हो सकते -

शकुनि


9.यदि आप नीति, धर्म, व कर्म का सफलता पूर्वक पालन करेंगे, तो विश्व की कोई भी शक्ति आपको पराजित नहीं कर सकती -   युधिष्ठिर


*यदि इन नौ सूत्रों से सबक लेना सम्भव नहीं होता है तो जीवन मे महाभारत संभव हो जाता है ।

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

प्रेरक प्रेरणादायक

 प्रस्तुति, - अनिल कुमार चंचल: *संस्कार*


टी एन शेषन जब मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तो परिवार के साथ छुट्टीयां बिताने के लिए मसूरी जा रहे थे। परिवार के साथ उत्तर प्रदेश से निकलते हुऐ रास्ते में उन्होंने देखा कि पेड़ों पर कई गौरैया के सुन्दर घोंसले बने हुए हैं।


 यह देखते ही उनकी पत्नी ने अपने घर की दीवारों को सजाने  के लिए दो गौरैया के घोंसले लेने की इच्छा व्यक्त की तो उनके साथ चल रहे। पुलिसकर्मियों ने तुरंत एक छोटे से लड़के को बुलाया, जो वहां मवेशियों को चरा रहा था.उसे पेड़ों से तोड कर दो गौरैया के घोंसले लाने के लिए कहा।

लडके ने इंकार मे सर हिला दिया। 


श्री शेषन ने इसके लिए लड़के को 10 रुपये देने की पेशकश की। फिर भी  लड़के के इनकार करने पर  श्री शेषन ने बढ़ा कर  ₹ 50/ देने की पेशकश की

*फिर भी लड़के ने हामी नहीं भरी*.


 पुलिस ने तब लड़के को धमकी दी और उसे बताया कि साहब ज़ज हैं और तुझे जेल में भी डलवा सकते हैं। गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. 


लड़का तब श्रीमती और श्री शेषन के पास गया और कहा,- *"साहब, मैं ऐसा नहीं कर सकता। उन घोंसलों में गौरैया के छोटे बच्चे  हैं अगर मैं आपको दो घोंसले दूं, तो जो गौरैया अपने बच्चों के लिए भोजन की तलाश में बाहर गई हुई है जब वह वापस आएगी तो बच्चों को नहीं देखेगी तो बहुत दुःखी होगी जिसका पाप में नहीं ले सकता"*

यह सुनकर श्री टी एन शेषन दंग रह गए।


 *शेषन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-"मेरी स्थिति, शक्ति और आईएएस की डिग्री सिर्फ उस छोटे, अनपढ़ मवेशी चराने वाले  लड़के द्वारा बोले गए शब्दों के सामने पिघल गई*


"पत्नी द्वारा घोंसले की इच्छा करने और घर लौटने के बाद, मुझे उस घटना के कारण अपराध बोध की गहरी भावना का सामना करना पड़ा"


 *जरूरी नहीं की शिक्षा और महंगे कपड़े मानवता की शिक्षा दे ही दें। यह आवश्यक नहीं हैं, यह तो भीतर के संस्कारों से पनपती है। दया,करूणा,दूसरों की भलाई का भाव,छल कपट न करने का भाव मनुष्य को परिवार के बुजुर्गों द्वारा दिये संस्कारों से तथा संगत से आते है अगर संगत बुरी है तो अच्छे गुण आने का प्रश्न ही नही*

[9/29, 17:47] Anami: *बहुत ही महत्वपूर्ण*

      *कृपया सभी को साझा करें ..*

*कोयंबटूर ई एस आई अस्पताल*

 *141/141 इससे ठीक हो गए और घर लौट आए।*


● *पानी में थोड़ी काली मिर्च पाउडर, नींबू का रस और अदरक का एक टुकड़ा मिलाएं और पानी को उबालकर पिएं।*


● *यदि हम दिन में 2 या 3 बार इसको पीते हैं, तो हम वायरल या बैक्टीरियल संक्रमणों से प्रभावित नहीं होंगे।*


● *एक विशेष रासायनिक प्रतिक्रिया तब बनती है :-*

*जब अदरक, काली मिर्च और नींबू के रस को पानी में मिलाकर उबाला जाता है।*


● *यह नया रासायनिक परिवर्तन किसी भी बुरे वायरस और बैक्टीरिया को मार देगा। कोरोना नामक इस भ्रम के बारे में कैसे पता चलता है जो दिन-प्रतिदिन अपने आणविक आकार को बदलता है? चिकित्सा जगत खालीपन से घूर रहा है।*

● *अदरक, काली मिर्च और नींबू त्रिमूर्ति हैं जो भविष्य में सभी जादू वाइरस राक्षसों को नष्ट कर देंगे, चाहे इस कोरोना जादू की तरह कितने नए जादूगर हों।*


● *कर्नाटक में कोरोना रोग को नियंत्रित करने के लिए*

*"अदरक, काली मिर्च और नींबू के रस*

*का उपयोग किया जा रहा हैं*


 *कूर्ग और मदिकेरी जैसे शहर,जो उच्च गुणवत्ता की काली मिर्च पैदा करते हैं, सभी कर्नाटक में हैं।  कर्नाटक में भी यही प्रयोग से कोरोना मुक्ति पा रहे है।*


*आप इस पोस्ट को किसी भी फेसबुक, व्हाट्सएप ग्रुप पर पोस्ट कर सकते हैं ..।*


      *अदरक, नींबू, काली मिर्च  हर जगह उपलब्ध हैं। अगर यह अद्भुत, सरल चिकित्सा  दुनिया के सभी देशों में जाता है तो हम सभी कोरोना ग्रस्त पीड़ित को हराने में सहयोग कर  सकतें हैं ....*🙏🏼🙏🏼


*अगर हर एक व्यक्ति,इस मैसेज की पालना करता है,, तो निश्चित कोरोना पर विजय प्राप्त कर सकते है।*


   🙏🏻 *जनहित में होकर उपयोगी भी है* 🙏🏻

[9/29, 21:57] Swami Sharan: 🙏शिक्षा🙏


*एक पति ने अपने गुस्सैल पत्नी  से तंग आकर उसे कीलों से भरा एक थैला देते हुए कहा ,"तुम्हें जितनी बार क्रोध आए तुम थैले से एक कील निकाल कर बाड़े में ठोंक देना !"*


🎯पत्नी को अगले दिन जैसे ही क्रोध आया उसने एक कील बाड़े की दीवार पर ठोंक दी। यह प्रक्रिया वह लगातार करती रही।


🤦🏻‍♂धीरे धीरे उसकी समझ में आने लगा कि कील ठोंकने की व्यर्थ मेहनत करने से अच्छा तो अपने क्रोध पर नियंत्रण करना है और क्रमशः कील ठोंकने की उसकी संख्या कम होती गई।


🙋🏻‍♂एक दिन ऐसा भी आया कि पत्नी  ने दिन में एक भी कील नहीं ठोंकी।


🤷🏻‍♂उसने खुशी खुशी यह बात अपने पति को बताई। वे बहुत प्रसन्न हुए और कहा, "जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम एक बार भी क्रोधित नहीं हुई, ठोंकी हुई कीलों में से एक कील निकाल लेना।"


👱‍♀️पत्नी ऐसा ही करने लगी। एक दिन ऐसा भी आया कि बाड़े में एक भी कील नहीं बची। उसने खुशी खुशी यह बात अपने पति को बताई।


*पति उस पत्नी  को बाड़े* *में लेकर गए और कीलों के छेद* *दिखाते हुए पूछा, "क्या तुम ये छेद भर सकती हो?"*


🌿पत्नी ने कहा,"नहीं जी"


🌿पति  ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा,"अब समझी, क्रोध में तुम्हारे द्वारा कहे गए कठोर शब्द, दूसरे के दिल में ऐसे छेद कर देते हैं, जिनकी भरपाई भविष्य में तुम कभी नहीं कर सकते !"


 *सन्देश : जब भी आपको क्रोध आये तो सोचिएगा कि कहीं आप भी किसी के दिल में कील ठोंकने तो नहीं जा रहे ?*

ये बात सास बहू पिता पुत्र भाई भाई या भाई बहन या किसी मित्र मे भी हो सकती है

सोमवार, 28 सितंबर 2020

प्रेरक प्रेरणादायक

 *दो ऐसी सत्य कथाऐं जिनको पढ़ने के बाद शायद आप भी अपनी  ज़िंदगी जीने का अंदाज़ बदलना चाहें:-*


*पहली*


दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐक बार नेल्सन मांडेला अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद का खाना  आर्डर किया और खाना आने का इंतजार करने लगे। 

उसी समय मांडेला की सीट के सामने वाली सीट पर एक व्यक्ति अपने खाने का इंतजार कर रहा था। मांडेला ने अपने सुरक्षा कर्मी से कहा कि उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ। खाना आने के बाद सभी खाने लगे, *वो आदमी भी अपना खाना खाने लगा, पर उसके हाथ खाते हुए कांप रहे थे।*

खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर रेस्तरां से बाहर निकल गया। उस आदमी के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था, खाते वख़्त उसके हाथ लगातार कांप रहे थे और वह ख़ुद भी कांप रहा था। 

मांडेला ने कहा नहीं ऐसा नहीं है। *वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे कैद रखा गया था। जब कभी मुझे यातनाएं दी जाती थीं  और मै कराहते हुए पानी मांगता था तो ये मेरे ऊपर पेशाब करता था।*


मांडेला ने कहा *मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ शायद वैसा ही व्यवहार करूंगा। पर मेरा चरित्र ऐसा नहीं है। मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है। वहीं धैर्य और सहिष्णुता की मानसिकता हमें विकास की ओर ले जाती है।*


*दूसरी*


मुंबई से बैंगलुरू जा रही ट्रेन में सफ़र के दौरान टीसी ने सीट के नीचे छिपी लगभग तेरह/चौदह साल की ऐक लड़की से कहा 


टीसी "टिकट कहाँ है?"

काँपती हुई लडकी "नहीं है साहब।"

टी सी "तो गाड़ी से उतरो।" 


*इसका टिकट मैं दे रही हूँ।............पीछे से ऐक सह यात्री ऊषा भट्टाचार्य की आवाज आई जो पेशे से प्रोफेसर थी ।*


ऊषा जी - "तुम्हें कहाँ जाना है ?" 

लड़की - "पता नहीं मैम!" 

ऊषा जी - "तब मेरे साथ चलो, बैंगलोर तक!"

ऊषा जी - "तुम्हारा नाम क्या है?"

लड़की - "चित्रा"


बैंगलुरू पहुँच कर ऊषाजी ने चित्रा को अपनी जान पहचान की ऐक स्वंयसेवी संस्था को सौंप दिया और ऐक अच्छे स्कूल में भी एडमीशन करवा दिया। जल्द ही ऊषा जी का ट्रांसफर दिल्ली हो गया जिसके कारण चित्रा से संपर्क टूट गया, कभी-कभार केवल फोन पर बात हो जाया करती थी। 


करीब बीस साल बाद ऊषाजी को एक लेक्चर के लिए सेन फ्रांसिस्को (अमरीका) बुलाया गया । लेक्चर के बाद जब वह होटल का बिल देने रिसेप्सन पर गईं तो पता चला पीछे खड़े एक खूबसूरत दंपत्ति ने बिल चुका  दिया था।


ऊषाजी "तुमने मेरा बिल क्यों भरा?"

*मैम, यह मुम्बई से बैंगलुरू तक के रेल टिकट के सामने कुछ भी नहीं है ।*

ऊषाजी "अरे चित्रा!" ...


चित्रा और कोई नहीं बल्कि  *इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरमैन सुधा मुर्ति थीं जो  इंफोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति की पत्नी हैं।*

यह लघु कथा उन्ही की लिखी पुस्तक "द डे आई स्टाॅप्ड ड्रिंकिंग मिल्क" से ली गई है। 


*कभी कभी आपके द्वारा  की गई किसी की सहायता, किसी का जीवन बदल सकती है।*

यदि जीवन में कुछ कमाना है तो पुण्य अर्जित कीजिये, क्योंकि यही वो मार्ग है जो स्वर्ग तक जाता है....*

प्यार औऱ सम्मान की अपेक्षा

 बुर्जुगवारों को दया नहीं, दुलार चाहिए   मनोज कुमार


आप देश की राजधानी दिल्ली में रहते हों, या मायानगरी मुंबई में, आप इंदौर में रहते हैं, मैं भोपाल में रहता हूं. कोई किसी शहर में रहता हो लेकिन अपने अपने शहर से गुजरते हुए किसी वृद्धाश्रम से आपकी मुलाकात जरूर होती होगी. किसी शहर में दो-एक तो किसी शहर में आबादी के मान से कुछेक और बड़ी संख्या में वृद्धाश्रम. वैसे ही जैसे आपके-मेरे शहर में मंदिर-मस्जिद-गुरुद्धारा-चर्च आदि-इत्यादि हुआ करते हैं. वृद्धाश्रम और धार्मिक स्थलों में एक बारीक सा फर्क है. धार्मिक स्थलों के पास से गुजरते हुए मत्था टेक लेते हैं अपने लाभ-शुभ की कामना के साथ लेकिन दो मिनट के लिए भी हमारे पांव वृद्धाश्रम पर नहीं ठिठकते हैं. टिके भी तो क्यों? जिन्हें हमने बेकार और बेकाम बनाकर घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया है, वो हमारे किस काम के? उनसे कौन सी लाभ-शुभ की कामना करें? ऊपरवाले का एक अनजाना सा जो भय हमारे दिलो-दिमाग में है, वह डर अपने बूढ़े मां-बाप से कब का खत्म हो चुका है. यह एक हकीकत है हमारे उस भारतीय समाज की जहां हम ‘वसुधै कुटुम्कम्ब’ की बातें करते नहीं थकते हैं लेकिन अपने ही घर के कुटुम्ब को बिखरने से रोक नहीं पाते हैं. 


यह कड़़ुआ सच है और इस सच को जाहिर करने के लिए हमारे पास एक तिथि है 1 अक्टूबर. हालांकि पश्चिमी मिजाज ने जो और भी तारीखें तय कर रखी हैं डे के नाम पर उनमें से एक डे अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस भी है. हालांकि यूरोपियन के लिए ये डे होते हैं और भारतीय समाज के लिए तिथि. तिथि अर्थात वह कड़े दिन जब हम अपने स्वर्गवासी लोगों का स्मरण करते हैं. याद नहीं करते तो उन लोगों को जिन्हें हमने वृद्धाश्रम भेज दिया है. संयुक्त राष्ट्रसंघ चिंता करके अलग अलग तारीखों पर ऐसे दिन तय कर देता है. अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस भी उसने कोई दो दशक पहले इस उम्मीद से तय किया था कि वृद्धजनों के साथ अन्याय एवं दुव्र्यवहार के खिलाफ लोगों में जागरूकता आएगी. यूरोप के लोगों में कितनी जागरूकता आयी, कह पाना मुश्किल है लेकिन यूरोप से भारतीय समाज ने वृद्धाश्रम का कांसेप्ट ले आए. अब बुर्जुगवार घर में ही नहीं होंगे तो ना अन्याय होगा और ना दुव्र्यवहार. शायद इस तरह हम भारतीयों ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के मोटो को सच कर दिखाया है.


वृद्धाश्रम भारतीय संस्कृति के खाने में कहीं फीट नहीं बैठता है. आज बच्चों और युवाओं में जो तनाव आ रहा है, उसका एक बड़ा कारण वृद्धों से दूरी बनाना है. भोपाल की हालिया घटना इस बात की गवाही देती है कि एक बेटी लूडो के खेल में पिता से हार जाती है. उसे लगता है कि पिता उसे प्यार नहीं करता और वह परामर्श केन्द्र पहुंच जाती है. बेटी का यह दुख जायज है कि मां होती तो शायद ऐसा नहीं होता. लेकिन ऐसे असंख्य बच्चे हैं जो अपने दादा-दादी, नाना-नानी की परछायी में ना केवल सुकून में रहते हैं बल्कि उन्हें इस बात का हौसला भी होता था कि उनकी सुरक्षा के लिए ये हैं ना. अब वे किससे कहें कि उनकी सुरक्षा का हौसला कौन दे? उन्हें संस्कार कौन दे? पहले सामूहिक परिवारों का टुकड़ा-टुकड़ा हुआ और अब एकल परिवार में मां-बाप के होने के बाद भी बच्चे भयभीत हैं. परियों की कहानी सुनाने वाला कोई नहीं है. ऊंच-नीच की बातें सिखाने वाला गुरुकुल टूट गया है. दूसरी तरफ अपने नन्हें बच्चों से विलग होकर वृद्धाश्रम में रोज आंसू बहाते, सांसों को गिनते समय काट रहे हैं. यह सब बदलाव और बदनीयती का यह समय कोई दो दशकों में पसरने लगा है. ऐसा भी नहीं है कि यह बीमारी पूरे समाज में फैल गई है. बहुतेरे लोग हैं जो अपने माता-पिता के साथ रहते हैं. दोनों को किसी से शिकायत नहीं.


जब भारतीय समाज में पहला वृद्धाश्रम बना तो हमने विरोध नहीं किया. विरोध नहीं करने का कारण भी नाजायज रहा होगा. मन में एक सोच तो यह रही होगी कि इन वृद्धों से छुटकारा पाने का यह सुगम रास्ता है. लोग क्या कहेंगे कि लोक-लाज में थोड़े समय तो बूढ़े मां-बाप को वृद्धाश्रम भेजने से रोकते रहे लेकिन निर्जल्लता जब मन में घर कर गई तो वृृद्धाश्रम उनके सामने विकल्प था. बहाना भी ऐसा कि थके-हारे घर में आओ तो पत्नी की शिकायतों से तंग हो जाते थे. ऐसा करने वाले भूल गए कि बचपन में यही मां-बाप उनकी शिकायतों का हल ढूंढते थे. आप भी दिलासा दे सकते हैं कि घर में जिल्लत की जिंदगी जीने से बेहतर वे वृद्धाश्रम में हैं. यह सब उस टोटके की तरह है जब आप किसी बीमारी के वशीभूत हो जाते हैं. 


वृद्धाश्रम आश्रय नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति में एक रोग की तरह स्थायी जगह बना लिया है. परिजनों ने उन्हें निकाल बाहर किया है तो क्या पूरा समाज भी उन्हें बहिष्कृत मान बैठा है? मेरे बच्चे का जन्मदिन होगा तो मैं कुछ कपड़े और मिठाई, शायद दवा जैसी और कुछ जरूरी सामान लेकर पहुंच जाऊंगा. कोई खुशी मुझे मिली तो एक बार फिर मुझे वृद्धाश्रम में जिंदगी के दिन गिनते बुर्जुगवार याद आएंगे. सालाना जलसे की तरह इन वृद्धजनों का स्मरण करने के बजाय बहुत ज्यादा नहीं तो सप्ताह में एक बार उनके साथ समय बिताएं. उन्हें उनके होने का अहसास दिला तो सकते हैं. किसी बेटे-बहू का रवैया उनके लिए निर्दयी है तो आप उन्हें चाचा-चाची, मौसी, मामा और ऐसे ही रिश्तों के ताने-बाने में गुंथ कर उन्हें अकेलेपन से निजात दिला सकते हैं. उनके मन के भीतर का घाव भर सकते हैं लेकिन हम ठहरे उत्सवी लोग. ये लोग हमारे लिए टाइमपास हैं और हमारे मन में दान का भाव है. हम अभिभूत हो जाते हैं उन्हें कुछ देकर.


वृद्धाश्रम में जिन बुर्जुगवारों को पनाह मिली हुई है, वे सब अपने अपने फन के माहिर हैं. पता करेंगे तो कोई अकाउंट का मास्टरपीस है तो किसी के पास इंजीनियरिंग का लम्बा अनुभव है. कोई हिन्दी-अंग्रेजी में माहिर है तो किसी के पास गणित और विज्ञान का अनुभव अकूत है. इनके अपनों ने तो इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया है. अब समाज की बारी है कि इन्हें दुबारा जीने का हौसला दें. सरकार और प्रशासन से गुजारिश करें कि इन लोगों की सेवाएं स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने में ली जाए. महंगे कोचिंग कक्षाओं से मुक्ति दिलाकर आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की क्लास वृद्धाश्रम में लगायी जाए. इसमें सम्पन्न घरों के बच्चे भी पढऩे जा सकते हैं लेकिन उन्हें इसकी फीस अदा करने की शर्त भी रखी जाए. बुर्जुग महिलाओं मेें कोई सिलाई-बुनाई में दक्ष हैं तो किसी के पास लजीज खाना बनाने का गुण है. इनके अनुभव का लाभ भी लेने का कोई इंतजाम किया जाए. ऐसा करने से उनका अकेलापन ना केवल दूर होगा बल्कि ये लोग दुगुने उत्साह से जीवन जीने लगेंगे. उम्र के इस पड़ाव में इन्हें पैसों की बहुत जरूरत नहीं है. उन्हें अपनापन चाहिए. उन्हें हौसला चाहिए. क्यों ना इस बार अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर वृद्धाश्रम को गुरुकुल का चेहरा दें. बुर्जुगों के प्रति अन्याय और दुव्र्यवहार के प्रति जागरूकता की संयुक्त राष्ट्रसंघ की मंशा को सच कर दिखाएं. ध्यान रखिए हमारे बुर्जुगवार को दया नहीं, दुलार चाहिए. हमने मिलकर संकल्प लेकर ऐसा कर लिया तो भारतीय समाज से वृद्धाश्रम का यह कलंक आहिस्ता आहिस्ता दूर हो सकेगा. ध्यान रखिए हमारे बुर्जुगवार को दया नहीं, दुलार चाहिए.    

सभी भारतीय भाषाएँ राष्ट्रीय हैं. हैं

 सभी भारतीय भाषाएं हैं राष्ट्रभाषा : प्रो. अग्निहोत्री 


*


*नई दिल्ली, 28 सितंबर*


''सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं, इसलिए किसी भाषा को क्षेत्रीय भाषा और किसी को राष्ट्रीय भाषा कहना ठीक नहीं होगा। जिस दिन हमारे शिक्षकों ने भारतीय भाषाओं में पढ़ाना शुरू कर दिया, उस दिन हिन्दुस्तान अन्य देशों से बहुत आगे निकल जाएगा।'' यह विचार हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला के कुलपति *प्रो. कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री* ने सोमवार को भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) द्वारा आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में व्यक्त किए। 


कार्यक्रम की अध्यक्षता महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के कुलपति *प्रो. संजीव कुमार शर्मा* ने की। आयोजन में प्रसिद्ध लेखिका एवं दैनिक हिंदुस्तान की कार्यकारी संपादक *श्रीमती जयंती रंगनाथन* मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुईं। इसके अलावा नवभारत टाइम्स, मुंबई के पूर्व संपादक *श्री विश्वनाथ सचदेव*, दैनिक जागरण, नई दिल्ली के सह-संपादक *श्री अनंत विजय* और पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष *डॉ. सी जयशंकर बाबु* ने भी वेबिनार में अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम में भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक *प्रो. संजय द्विवेदी* भी विशेष तौर पर उपस्थित थे। 

 

‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भारतीय भाषाएं’ विषय पर मुख्य अतिथि के तौर पर बोलते हुए *प्रो. अग्निहोत्री* ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लक्ष्य भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाना है। इस दिशा में सभी लोगों को एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता है। 


उन्होंने कहा कि भाषा, ज्ञान नहीं है, बल्कि ज्ञान तक पहुंचने की कुंजी है। इसलिए अगर विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में ज्ञान लेंगे, तो उनका संपूर्ण विकास संभव हो पाएगा। उन्होंने कहा कि जिस तरह मां का दूध बच्चे के लिए सुपाच्य यानी आसानी से पचने वाला और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है, उसी तरह मातृभाषा में लिया गया ज्ञान भी बच्चे के जीवन के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है।


प्रो. अग्निहोत्री ने कहा कि इस नई शिक्षा नीति से भारत में ज्ञान विज्ञान की क्रांति होगी, जिसमें शिक्षकों को महत्वपूर्ण निभानी होगी।


*अंग्रेजी के चक्रव्यूह से निकलेंगे आधुनिक अभिमन्यु : प्रो. संजीव शर्मा* 


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के कुलपति *प्रो. संजीव कुमार शर्मा* ने कहा कि अंग्रेजी का जो चक्रव्यूह हमारे चारों तरफ है, उससे बाहर आने में आधुनिक अभिमन्यु पूरी तरह से सक्षम हैं। प्रो. शर्मा ने कहा कि ये भारत के शैक्षिक पुर्नजागरण का काल है, जिसमें गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों के निर्माण की आवश्यकता है।


प्रो. शर्मा ने कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय का भाव आवश्यक है। भारतीय भाषाओं में कोई विभेद नहीं है, कोई संघर्ष नहीं है। अगर हमें भाषाओं को सींचना है, तो सभी को मिलजुलकर प्रयास करने होंगे, जिसमें महत्वपूर्ण भूमिका हिंदी भाषी लोगों को निभानी होगी। 


*एक बहती नदी है हिंदी : रंगनाथन*


इस मौके पर मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए प्रसिद्ध लेखिका एवं दैनिक हिंदुस्तान की कार्यकारी संपादक *श्रीमती जयंती रंगनाथन* ने कहा कि हिंदी एक बहती नदी है। आप देखिए कि हिंदी के अखबार 30 वर्ष पहले सिर्फ 3 लाख प्रतियां छापते थे, लेकिन आज ये आंकड़ा 3 करोड़ के पार पहुंच चुका है। यही हिंदी की ताकत है।


रंगनाथन ने कहा कि तमिल मेरी मातृभाषा है, पर हिंदी मेरी कर्म भाषा है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों का जोर होता है कि बच्चे स्कूल में हिंदी में न बात करें, पर अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते हुए बच्चों को हमने ये सिखाया ही नहीं कि जीवन में चुनौतियों का सामना किस तरह करना है। आज हम यह भूल गए हैं कि शिक्षा का मकसद क्या है।  


जिंदगी और शिक्षा पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा हमें ये सिखाती है कि जिंदगी भागने का नाम नहीं, बल्कि रुकने और संभलकर चलने का नाम है। एक अच्छा नागरिक बनना और आशावादी जिंदगी जीना, यही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है। रंगनाथन ने कहा कि आने वाले दिनों में ये नई शिक्षा नीति हमारे बच्चों को ज्ञान की दृष्टि से ताकतवर बनाएगी।


*जोड़ती है मातृभाषा : सचदेव*


नवभारत टाइम्स, मुंबई के पूर्व संपादक *विश्वनाथ सचदेव* ने अपने संबोधन में कहा कि अंग्रेजी के माध्यम से हम दुनिया से तो जुड़ सकते हैं, लेकिन अपने आप से नहीं जुड़ सकते। अगर हमें स्वयं से जुड़ना है, तो हमें मातृभाषा का इस्तेमाल करना ही होगा। 


उन्होंने कहा कि किसी विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षित होकर आप अपने आप को पूर्ण शिक्षित नहीं मान सकते। शिक्षा के माध्यम से हम मनुष्य बन सकें, यही शिक्षा नीति का मूल उद्देश्य होना चाहिए। सचदेव ने कहा कि जब तुर्की एक रात में अपनी भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित कर सकता है, तो ये काम हमारे यहां क्यों नहीं हो सकता। 


उन्होंने कहा कि हमारा संकट ये नहीं है कि हमारी भाषा क्या होनी चाहिए, बल्कि हमारा संकट ये है कि किसी भी भाषा को सीखने का हमारा उद्देश्य क्या होना चाहिए। किसी भी शिक्षा नीति का उद्देश्य व्यक्ति को एक अच्छा इंसान बनाना होता है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि क्या पढ़ाया जाए और कैसे पढ़ाया जाए। सचदेव ने कहा कि नई शिक्षा नीति ये एहसास कराती है कि मातृभाषा में भी बच्चों को शिक्षित किया जा सकता है। 


*हिंदी और भारतीय भाषाओं को मिलकर चलना होगा : विजय*


भारतीय भाषाओं पर अपनी बात रखते हुए दैनिक जागरण, नई दिल्ली के सह-संपादक *अनंत विजय* ने कहा कि हिंदी और भारतीय भाषाएं एक दूसरे के साथ मिलकर चलेंगी, तो दोनों मजबूत होंगी। उन्होंने कहा कि मैकाले की शिक्षा नीति के बाद अगर आप देखें, तो पहली बार एक संपूर्ण और नई शिक्षा नीति आई है। इससे पहले जितनी भी नीतियां आई हैं, उन्हें नई न कहकर संशोधित नीतियां कहना ज्यादा बेहतर होगा।  


विजय ने कहा कि नई शिक्षा नीति भारत की ज्ञान परंपरा को केंद्र में रखते हुए काम करने पर जोर देती है। उन्होंने कहा कि भाषा वो ही जीवित रहती है, जिससे आप जीविकोपार्जन कर पाएं और भारत में एक सोची समझी साजिश के तहत अंग्रेजी को जीविकोपार्जन की भाषा बनाया जा रहा है।


भारतीय भाषाओं में पाठ्यपुस्तक निर्माण की चुनौतियों पर बोलते हुए विजय ने कहा कि भारत में लगभग 40 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं और 850 के आसपास राज्य विश्वविद्यालय हैं। अगर हम इसमें निजी विश्वविद्यालयों को भी शामिल कर लें, तो कुल मिलाकर लगभग 1,000 से अधिक विश्वविद्यालय होते हैं। अगर एक विश्वविद्यालय एक वर्ष में सिर्फ 2 पुस्तकों का भी निर्माण करे, तो एक वर्ष में लगभग 2,000 किताबें छात्रों के लिए तैयार होंगी। 


विजय ने कहा कि जैसे ही आप भारत कें​द्रित पाठ्यक्रम की बात करेंगे, तो लोग विरोध में खड़े हो जाएंगे। ऐसा कहा जाएगा कि भारतीय भाषाओं में ज्ञान की बात नहीं हो सकती, अगर आपको ज्ञान की बात करनी है, तो सिर्फ अंग्रेजी में ही हो सकती है। जबकि आप देखिए कि जर्मनी में लोग संस्कृत भाषा की पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय किसी भी शिक्षा नीति को सफल बनाने का सबसे महत्वपूर्ण उपक्रम है। 


*भारतीय भाषाओं के व्यवहारिक प्रयोग की आवश्यकता : डॉ. बाबु* 


इस मौके पर पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष *डॉ. सी जयशंकर बाबु* ने कहा कि भारतीय भाषाओं के व्यवहारिक प्रयोग पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि दुनिया की कुल भाषाओं में से एक तिहाई भाषाएं हमारे पास हैं, लेकिन हमने अब तक मुठ्ठीभर भाषाओं को शिक्षण में अपनाया है। 


उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा में भाषा को लेकर शिक्षा नीति में अभी उतनी स्पष्टता नहीं है, जितनी प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर है, लेकिन हमें इससे प्रेरणा लेते हुए उच्च शिक्षा में भी भारतीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार करने चाहिए। डॉ. बाबु ने तमिलनाडु का जिक्र करते हुए कहा कि वहां राज्य की नौकरियों में मातृभाषा में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को प्राथमिकता दी जाती है, क्या ऐसी पहल अन्य राज्यों में नहीं होनी चाहिए।


डॉ. बाबु ने कहा कि तमिलनाडु में इंजीनियरिंग और चिकित्सा शिक्षा के पाठ्यक्रम तमिल भाषा में पढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। ये पहल सराहनीय है और ऐसे ही प्रयासों से भारतीय भाषाएं ताकतवर होंगी। 


कार्यक्रम का संचालन भारतीय जन संचार संस्थान की छात्र संपर्क अधिकारी विष्णुप्रिया पांडे ने किया। वेबिनार के अंत में आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने इस ज्ञान यज्ञ में भाग लेने के लिए सभी वक्ताओं का धन्यवाद दिया।

प्रधानमंत्री FIR औऱ रिश्वत

 जब एक किसान गंदे कपड़े पहन थाने में पहुंचा…थाने में कुछ ऐसा हुआ कि #पूरा_थाना_हुआ_सस्पेंड…‼️

_______ सन 1979 की बात है। शाम 6 बजे एक किसान इटावा ज़िला के ऊसराहार थाने में मैला कुचैला कुर्ता धोती पहने पहुँचा और अपने बैल की चोरी की रपट लिखाने की बात की।

छोटे दरोग़ा ने पुलिसिया अंदाज में 4 आड़े-टेढ़े सवाल पूछे और बिना रपट लिखे किसान को चलता किया। जब वो किसान थाने से जाने लगा तो एक सिपाही पीछे से आया और बोला “बाबा थोड़ा खर्चा-पानी दे तो रपट लिख जाएगी।”


अंत में उस समय 35 रूपये की रिश्वत लेकर रपट लिखना तय हुआ।

रपट लिख कर मुंशी ने किसान से पूछा “बाबा हस्ताक्षर करोगे कि अंगूठा लगाओगे?”

किसान ने हस्ताक्षर करने को कहा तो मुंशी ने दफ़्ती आगे बढ़ा दी जिस पर प्राथमिकी का ड्राफ़्ट लिखा था। किसान ने पेन के साथ अंगूठे वाला पैड उठाया तो मुंशी सोच में पड़ गया।


हस्ताक्षर करेगा तो अंगूठा लगाने की स्याही का पैड क्यों उठा रहा है?

किसान ने हस्ताक्षर में नाम लिखा #चौधरी_चरण_सिंह और मैले कुर्ते की जेब से मुहर निकाल के कागज पर ठोंक दी, जिस पर लिखा था “प्रधानमंत्री, भारत सरकार "ये देखकर सारे थाने में हड़कंप मच गया।


असल में ये मैले कुर्ते वाले बाबा किसान नेता और भारत के उस समय के #प्रधानमंत्री_चौधरी_चरण_सिंह थे।

जो थाने में किसानों की सुनवाई का औचक निरीक्षण करने आये थे। अपनी कारों का दस्ता-क़ाफ़िला थोड़ी दूर खड़ा करके कुर्ते पर थोड़ी मिट्टी डाल कर आ गए थे।

ऊसराहार का पूरा थाना सस्पेंड कर दिया गया। आज देश को भी ऐसे नेताओं की ज़रूरत है।।

शहीदेआजम की संसद में तस्वीर

संसद भवन - भगत सिंह का चित्र किसने बनाया

संसद भवन में एक चित्र  शहीद भगत सिंह और उनके साथी कामरेड बटुकेश्वर दत्त का भी लगा हुआ है। इसे महाराष्ट्र के चित्रकार ए.बी. मणकपुरे ने बनाया था। इस 36x28  साइज के चित्र में दोनों के चेहरे के भावों को मणकपुरे जी ने बेहद शानदार तरीके से उभारा है।


 हरेक शख्स इस चित्र को कुछ पल देखने के बाद नमन करके ही आगे निकलता है। इसी संसद में, इन दोनों क्रातिकारियों ने 8 अप्रैल 1929 को बम फेंका था। तब इसे सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली कहा जाता था। ये बम फेंकने के बाद इंनकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे थे। इस चित्र को संसद सदस्य श्री सुरेंद्र मोहन ने सोनीपत की भारतीय स्वतंत्र स्मारक समिति की ओर से भेंट किया था। 


ये दोनों सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में सेफ़्टी बिल पेश होने से दो दिन पहले 6 अप्रैल, 1929 को गए थे। दरअसल येसेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली को कायदे से देखने गए थे ताकि ये जाने लें कि कि पब्लिक गैलरी किस तरफ़ हैं और किस जगह से वहाँ बम फेंके जाएंगे।

 भगत सिंह, कश्मीरी गेट, 4 अप्रैल, 1929

शहीद भगत सिंह ने कश्मीरी गेट के  रामनाथ स्टुडियो से 4 अप्रैल, 1929 को फोटो खिंचवाया था। वह उन्होंने हैट पहनकर खिंचवाया था। तब उनके साथ बटुकेश्वर दत्त भी थे। 


उन्होंने भी फोटो खिंचवाया था।  भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के साथ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपबल्किन आर्मी ( एचएसआरए) के सदस्य जयदेव कपूर भी रामनाथ फोटो स्टुडियो गए थे। कपूर ने ही संसद पर हमले की सारी योजना की रणनीति बनाई थी। 


रामनाथ फोटो स्टुडियो  कश्मीरी गेट में सेंट जेम्स चर्च के पास  खैबर  रेस्तरां के पास से चलता था।रामनाथ स्टुडियो सन 1990 के आसपास बंद हो गया था। भगत सिंह पर लंबे समय से शोध कर रहे श्री Rajshekhar Vyas बताते हैं कि रामनाथ स्टुडियो में भगत सिंह की बड़ी सी फोटो लगी हुई थी।

 बहरहाल, बम फेंकने की घटना के बाद रामनाथ फोटो स्टुडियों पर भी पुलिस बार-बार पूछताछ के लिए आने लगी थी। जयदेव कपूर ने भगत सिंह और दत्त के फोटो और नेगेटिव बाद में रामनाथ फोटो स्टुडियो में जाकर लिए थे।


 कश्मीरी गेट में एक ए.आर.दत्त नाम का भी बेहद खास फोटो स्टुडियो हुआ करता था। वह अब गुरुग्राम चला गया है।

 दिल्ली में भगत सिंह की पहली प्रतिमा कौन सी

भगत सिंह ने इसी दिल्ली में अपनी भारत नौजवान सभा का  हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में विलय किया और काफी विचार-विमर्श के बाद आम सहमति से एसोसिएशन को एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।


 ये अहम बैठक 8- 9 अक्तूबर 1928 को फिरोजशाह कोटला मैदान से सटे मैदान थी। इसमें चंद्रशेखर आजाद, बिजय कुमार सिन्हा,भगवती चरण वोहरा,शिव वर्मा जैसे क्रांतिकारियों ने भाग लिया था।  यहां 2005 में भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव की एक बड़ी आदमकद मूर्ति  लग गई है।


 कम से कम अब ये तो पता चल जाता है कि इस स्थान का भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन से क्या संबंध था। इससे पहले तो यहां एक मिटता हुआ स्मृति चिन्ह लगा हुआ था।इसे मूर्तिशिल्पी राम सुतार जी ने बनाया था।  ये प्रतिमा 9 फीट ऊंची है।  राजधानी में संभवत: पहली भगत सिंह की प्रतिमा सन 1995 में स्थापित हुई। ये अष्टधातु की प्रतिमा है।

कैसी-कैसी प्रतिमाएं भगत सिंह की

शहीद भगत सिंह की संसद भवन और दिल्ली विधान सभा में प्रतिमाएं लगी हैं। संसद भवन में उन्हें पगड़ी में दिखाया गया है, जबकि विधानसभा में वे हैट पहने हैं। दोनों से कुछ जानकर अलग-अलग कारणों से नाखुश रहे हैं। 


उन्हें संसद भवन में लगी 18 फीट ऊंची कांस्य की प्रतिमा में पगड़ी में दिखाया गया हैं। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल,1929 को केन्द्रीय असेम्बली ( अब संसद भवन) में बम फेंका था। उस घटना के लगभग 80 वर्षों के बाद भगत सिंह की प्रतिमा संसद भवन में सन 2008 स्थापित की गई थी। इसके लगते ही बवाल चालू हो गया था। कहते हैं कि भगत सिंह ने सन 1928 से 23 मार्च, 1931 को फांसी दिए जाने तक पगड़ी नहीं पहनी। 


कुछ इतिहासकारों और भगत सिंह के संबंधी मानते रहे हैं कि संसद भवन में लगी प्रतिमा में उन्हें सही से नहीं दिखाया गया। भगत सिंह यूरोपियन स्टाइल की हैट पहनते थे,तो फिर उन्हें पगड़ी में क्यों दिखाया गया? भगत सिंह पर शोध करने वाले प्रो.चमनलाल तो यहां तक कहते हैं कि उन्हें हैट में ना दिखाना अक्षम्य है। 


हालांकि संसद भवन में लगी भगत सिंह की प्रतिमा के शिल्पकार राम सुतार कहते हैं कि उन्हें जैसी भगत सिंह की मूर्ति हुसैनीवाला में लगी है, उसी तरह की मूर्ति तैयार करने के लिए कहा गया था। उसमें वे हैट में नहीं है। उधर, दिल्ली विधानसभा में सन 2016 में स्थापित अर्धप्रतिमा में भगत सिंह हैट पहने है। इस पर दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीसी) ने विरोध जताया था। इसका कहना था कि भगत सिंह सिख थे और उनकी प्रतिमा में उन्हें सिख के रूप में दिखाया जाना चाहिए था।

 

 

नव भारत टाइम्स में प्रकाशित लेख के अंश

रविवार, 27 सितंबर 2020

Iimc महानिदेशक संजय द्विवेदी सम्मानित

 *मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति ने प्रो. संजय द्विवेदी का किया सम्मान*

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*प्रो.संजय द्विवेदी की अध्यक्षता में आयोजित हुई मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति की बैठक*

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*मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति की बैठक में भविष्य की कार्ययोजनाओं पर हुई चर्चा*


*नई दिल्ली।* मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति के अध्यक्ष प्रो. संजय द्विवेदी को भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली का महानिदेशक नियुक्त किए जाने पर समिति की ओर से ऑनलाइन सम्मान समारोह आयोजित किया गया। समारोह की अध्यक्षता भी प्रो.संजय द्विवेदी ने की। जिसमें मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति के संचालन परिषद व कोर कमेटी के पदाधिकारियों सहित देशभर से अनेक वरिष्ठ पत्रकार शामिल हुए। इस समारोह में मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति की भविष्य की कार्ययोजनाओं पर भी चर्चा की गई। बता दें कि दिसंबर 2019 में मध्यप्रदेश के इंदौर में हुए समिति के चुनाव में प्रो. संजय द्विवेदी को अध्यक्ष चुना गया था।


समारोह की शुरूआत में समिति की ओर से सचिव बी.के. डॉ रीना ने प्रो. संजय द्विवेदी का सम्मान किया। समिति के संस्थापक व वरिष्ठ पत्रकार प्रो.कमल दीक्षित ने प्रो.द्विवेदी का सम्मान करने के साथ समिति की कार्यवाही से सभी सदस्यों को अवगत कराया। 


इस अवसर पर प्रो. संजय द्विवेदी ने संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में मीडिया के लोगों को मूल्यों के लिए प्रेरित व प्रभावित करना आसान नहीं है। लेकिन यदि फिर भी हम सभी अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के अनुसार तय कर लें तो ऐसा जरूर कर पाएंगे। उन्होंने संदेशवाहक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया और मीडिया को भारतीय संस्कृति की दृष्टि से जोड़ने को लेकर बल दिया। 


बैठक में प्रजापति ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की इंदौर जोनल प्रमुख बीके हेमलता दीदी ने संबोधित करते हुए वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार मीडिया में आध्यात्म को जरूरी बताया। 

जयपुर से वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद प्रो. संजीव भानावत ने कोरोना काल मीडिया के समक्ष उपजी चुनौतियों के बारे में बताया और समिति के विस्तार पर चर्चा की। 

भोपाल से वरिष्ठ पत्रकार विनोद नागर ने संस्था की गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के कुछ नए प्रस्ताव रखें। प्रस्तावों को बैठक में मौजूद सदस्यों की सहमति से पारित भी किया गया। बैठक में नई दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार वैभव वर्धन ने संबोधित करते हुए कहा कि मूल्यानुगत मीडिया के उद्देश्यों को अब एक मिशन के रूप में चलाया जाना चाहिए ताकि इस अच्छे विचार से अन्य लोग भी लाभान्वित हों।

समिति के पूर्व अध्यक्ष संदीप कुलश्रेष्ठ, वरिष्ठ पत्रकार कल्याण कोठारी, समिति के कोषाध्यक्ष प्रभाकर कोहेकर, उपाध्यक्ष राजेश राजोरे, प्रियंका कौशल, श्रीगोपाल नरशन, दिलीप बोरसे, मुकेश नेमा आदि ने भी अपने विचार रखे। समारोह का तकनीकी समन्वय डॉ सोमनाथ वडनेरे ने, संचालन युवा पत्रकार सोहन दीक्षित ने व आभार नारायण जोशी ने माना।

होटल की पार्टी

 💐Daughter's Day special 💐

पार्टी की कीमत 


 एक फटी धोती और फटी कमीज पहने एक  व्यक्ति अपनी 10-11 साल की बेटी के साथ एक बड़े होटल में पहुंचा। उन दोंनो को कुर्सी पर बैठा देख एक वेटर ने उनके सामने दो गिलास साफ ठंडे पानी के रख दिए और पूछा- आपके लिए क्या लाना है? उस व्यक्ति ने कहा- "मैंने मेरी बेटी को वादा किया था कि यदि तुम कक्षा 5th में जिले में प्रथम आओगी तो मैं तुम्हे शहर के सबसे बड़े होटल में एक डोसा खिलाऊंगा।इसने वादा पूरा कर दिया। कृपया इसके लिए एक डोसा ले आओ।"वेटर ने पूछा- "आपके लिए क्या लाना है?" उसने कहा-"मेरे पास एक ही डोसे का पैसा है।"पूरी बात सुनकर वेटर मालिक के पास गया और पूरी कहानी बता कर कहा-"मैं इन दोनो को भर पेट नास्ता कराना चाहता हूँ।अभी मेरे पास पैसे नहीं है,इसलिए इनके बिल की रकम आप मेरी सैलेरी से काट लेना।"मालिक ने कहा- "आज हम होटल की तरफ से इस होनहार बेटी की सफलता की पार्टी देंगे।" होटलवालों ने एक टेबल को अच्छी तरह से सजाया और बहुत ही शानदार ढंग से सभी उपस्थित ग्राहको के साथ उस गरीब बच्ची की सफलता का जश्न मनाया।मालिक ने उन्हे एक बड़े थैले में तीन डोसे और पूरे मोहल्ले में बांटने के लिए मिठाई उपहार स्वरूप पैक करके दे दी। इतना सम्मान पाकर आंखों में खुशी के आंसू लिए वे अपने घर चले गए।      


समय बीतता गया और एक दिन वही लड़की I.A.S.की परीक्षा पास कर उसी शहर में कलेक्टर बनकर आई।उसने सबसे पहले उसी होटल मे एक सिपाही भेज कर कहलाया कि कलेक्टर साहिबा नास्ता करने आयेंगी। होटल मालिक ने तुरन्त एक टेबल को अच्छी तरह से सजा दिया।यह खबर सुनते ही पूरा होटल ग्राहकों से भर गया।कलेक्टर रूपी वही लड़की होटल में मुस्कराती हुई अपने माता-पिता के साथ पहुंची।सभी उसके सम्मान में खड़े हो गए।होटल के मालिक ने उन्हे गुलदस्ता भेंट किया और आर्डर के लिए निवेदन किया।उस लड़की ने खड़े होकर होटल मालिक और उस बेटर के आगे नतमस्तक होकर  कहा- "शायद आप दोनों ने मुझे पहचाना नहीं।मैं वही लड़की हूँ जिसके पिता के पास दूसरा डोसा लेने के पैसे नहीं थे और आप दोनों ने  मानवता की सच्ची  मिसाल पेश करते हुए,मेरे पास होने की खुशी में एक शानदार पार्टी दी थी और मेरे पूरे मोहल्ले के लिए भी मिठाई पैक करके दी थी।आज मैं आप दोनों की बदौलत ही कलेक्टर बनी हूँ।आप दोनो का एहसान में सदैव याद रखूंगी।आज यह  पार्टी मेरी तरफ से है और उपस्थित सभी ग्राहकों एवं पूरे होटल स्टाफ का बिल मैं दूंगी।कल आप दोनों को "" श्रेष्ठ नागरिक "" का सम्मान एक नागरिक मंच पर किया जायेगा।  


 शिक्षा-- किसी भी गरीब की गरीबी का मजाक  बनाने के वजाय उसकी प्रतिभा का उचित सम्मान करें।संभव है आपके कारण कोई गुदड़ी का लाल अपनी मंजिल तक पहुंच जाए।  卐


 🙏अनुकरणीय🙏

रवि चोपड़ा की नजर से

 ग़लत गाड़ी का मुसाफ़िरर/ रवि अरोड़ा


शायद सन 2005 की कोई गुलाबी सुबह थी जिस दिन अनिल अम्बानी के दादरी पावर प्रोजेक्ट का धौलाना में भूमि पूजन होना था । मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और उनके हमसाया अमर सिंह दिल्ली से कार द्वारा कार्यक्रम स्थल पर पहुँच चुके थे मगर कम्पनी के मालिक अनिल अम्बानी अभी मुम्बई में ही थे । शायद उनके पास कार्यक्रम में शामिल होने का समय नहीं था मगर अमर सिंह ने उन्हें फ़ोन कर अनुरोध किया कि नेता जी यानी मुख्यमंत्री आपका इंतज़ार कर रहे हैं अतः आप आ ही जाइये । अनिल अम्बानी ने बताया कि उन्हें पहुँचने में दो-तीन घंटे लगेंगे । अमर सिंह ने फ़ोन होल्ड कराकर मुलायम सिंह को यह बात बताई । मुलायम सिंह ने जब कहा कि वे इंतज़ार कर लेंगे , इस पर अनिल अम्बानी अपने निजी जहाज से मुम्बई से दिल्ली को रवाना हुए । दिल्ली पहुँच कर उन्होंने अपने दो हेलीकाप्टर लिये और कार्यक्रम स्थल पर दोपहर तक पहुँच सके । देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री ने उनका, उनकी पत्नी टीना अम्बानी और आधा दर्जन लोगों की उनकी टीम का ख़ूब स्वागत किया । घंटों इंतज़ार करने का ज़रा भी दुःख अथवा नाराज़गी न मुलायम सिंह के चेहरे पर थी और न ही अमर सिंह के । अधिकारियों, नेताओं, पत्रकारों और आम जनता की तो ख़ैर क्या मजाल जो इस लंबे इंतज़ार का रंज प्रकट कर सकें। पैसे वाले का जलवा क्या होता है , क़ायदे से मैंने भी यह पहली बार उसी दिन महसूस किया । निजी हवाई जहाज़ों और हेलीकाप्टरों वाले इसी अनिल अम्बानी की आज अख़बार में मुफ़लिसी की ख़बर पढ़ी तो बहुत दुःख हुआ । पता चला कि अनिल अम्बानी के पास अब बस एक कार है और वकीलों की फ़ीस चुकाने को भी उन्हें अपनी बीवी के ज़ेवर बेचने पड़ रहे हैं । देर सवेर वे दिवालिया भी घोषित हो जाएँगे और कोई बड़ी बात नहीं कि विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे दर्जनों बड़े बिज़नसमैनों की तरह देश ही छोड़ दें । 


2005 में अनिल अम्बानी जब बड़े भाई मुकेश अम्बानी से अलग हुए तो उनके पास 45 अरब डालर की सम्पत्ति थी मगर अब सब कुछ डूब चुका है । हालाँकि शुरुआती दिनो में सभी यही मानते थे कि अनिल अपने भाई को बहुत पीछे छोड़ देंगे मगर हुआ उसका उल्टा । मुकेश आज दुनिया के सातवें सबसे बड़े रईस हैं और अनिल कंगाल हो गये । हालाँकि बड़े बिज़नेसमैनों की गुड्डी चढ़ने और नीचे आने के तमाम कारण होते हैं और कोई भी उनसे बच नहीं सकता मगर फिर भी आज के दौर में तो एक महत्वपूर्ण कारण यह भी हो चला है कि आप किस राजनीतिक दल की गोद में बैठे हैं । यूँ तो आज़ादी के समय से ही यह खेल हो रहा है और बिरला जैसे घरानों के आगे बढ़ने में उनकी कांग्रेस पार्टी पर पकड़ की भी बड़ी भूमिका है मगर अब तो बिना राजनीतिक संरक्षण के कोई भी बिज़नेस ग़्रुप एक हद से आगे नहीं बढ़ सकता । हालाँकि शुरुआत अनिल अम्बानी ने भी इसी तरीक़े से की थी और उन्होंने मुलायम सिंह और अमर सिंह जैसों को अपना बनाया । उनके खेमे में सुब्रत राय सहारा और अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज भी थे मगर ये सभी मोहरे पिट गये । जबकि गुजरात में अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए मुकेश अम्बानी ने नरेंद्र मोदी से नज़दीकियाँ बढ़ाईं और जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो उसका भी जम कर लाभ लिया । मोदी जी से नज़दीकियों का लाभ गौतम अडानी को भी मिल रहा है और आज उनकी तूती बोल रही है जबकि कुछ साल पहले तक देश के बड़े क़र्ज़दारों में वे शुमार होते थे । हालाँकि बड़े भाई की मेहरबानी से अनिल अम्बानी भी अब मोदी जी के नज़दीकियों में शुमार हो गये हैं और शायद यही वजह है कि उन्हें राफ़ेल जहाज बनाने वाली फ़्रांस की दसाँ कम्पनी ने अपना ओफसेट पार्टनर बनना भी तय किया है मगर बात फिर भी नहीं बन रही। कम्पनी ने वादा किया था कि वो अपने ओफसेट पार्टनर को तीस हज़ार करोड़ के काम देगी मगर उसने अभी तक यह वादा पूरा नहीं किया है । शायद अनिल अम्बानी का वक़्त ही ख़राब है । काश समय रहते उन्होंने मोदी जी की गाड़ी पकड़ी होती तब यूँ रुसवा न होना पड़ता ।


शनिवार, 26 सितंबर 2020

समय बड़ा बलवान

 *देव तुल्य लोग जीवित हैं।*

*✍✍✍️✍️*


*एक फटी धोती और फटी कमीज पहने एक व्यक्ति अपनी 15-16 साल की बेटी के साथ एक बड़े होटल में पहुँचा ।* 

उन दोनो को कुर्सी पर बैठा देख एक वेटर ने उनके सामने दो गिलास साफ ठंडे पानी के रख दिए और पूछा - आपके लिए क्या लाना है ? उस व्यक्ति ने कहा - "मैंने अपनी बेटी से वादा किया था कि यदि तुम दसवीं कक्षा में जिले में प्रथम आओगी तो मैं तुम्हें शहर के सबसे बड़े होटल में एक डोसा खिलाऊंगा । 

*आज मेरी बेटी ने अपना वादा पूरा कर दिया है, अब बारी मेरी है इसलिए कृपया इसके लिए एक डोसा ले आओ ।"वेटर ने पूछा - "आपके लिए क्या लाना है ?" उसने कहा -"मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं, मेरे पास केवल एक डोसे का ही पैसा है , इसलिए आप मेरी बेटी को  केवल एक डोसा खिला दें ।"* 

पूरी बात सुनकर वेटर काफी भावुक हो गया और मालिक के पास गया और पूरी कहानी बता कर कहा -"मैं इन दोनों को भर पेट खाना खिलाना चाहता हूँ ।अभी मेरे पास पैसे नहीं हैं, इसलिए इनके बिल की रकम आप मेरी सैलरी से काट लें । 

*"मालिक ने कहा - "हम ऐसा नहीं करेंगे, आज हम इस होनहार बेटी को अपने होटल की तरफ से एक शानदार पार्टी देंगे ।" होटल वालों ने एक टेबल को अच्छी तरह से सजाया और बहुत ही शानदार ढंग से सभी उपस्थित ग्राहकों के साथ उस गरीब बच्ची की सफलता का जश्न मनाया।*

मालिक ने उन्हें एक बड़े थैले में तीन डोसे और पूरे मोहल्ले में बांटने के लिए मिठाई उपहार स्वरूप पैक करके दे दी । इतना सम्मान पाकर आँखों में खुशी के आंसू लिए वे अपने घर चले गए ।      


*धीरे - धीरे समय बीतता गया और एक दिन वही लड़की आई. ए. एस. की परीक्षा पास कर उसी शहर में कलेक्टर बनकर आई । उसने सबसे पहले उसी होटल मे एक सिपाही भेज कर अपना संदेशा भिजवाया कि आज  रात का भोजन कलेक्टर साहिबा इस होटल में करने आयेंगी ।*

होटल मालिक ने तुरन्त एक टेबल को अच्छी तरह से सजा दिया । यह खबर सुनते ही पूरा होटल ग्राहकों से भर गया । तय वक्त के अनुसार कलेक्टर साहिबा अपने माता-पिता के साथ होटल पहुँची । जब कलेक्टर साहिबा ने मुस्कुराते हुए होटल में मुस्कराते हुए होटल में प्रवेश किया तो होटल के मालिक सहित होटल के सभी कर्मचारी कलेक्टर साहिबा के सम्मान में उठकर खड़े हो गए । 

*होटल के मालिक ने उन्हें गुलदस्ता भेंट किया और ऑर्डर के लिए निवेदन किया । कलेक्टर साहिबा ने खड़े होकर होटल के मालिक और उस वेटर के आगे नतमस्तक होकर कहा- "शायद आप दोनों ने मुझे पहचाना नहीं ।* 

मैं वही लड़की हूँ जिसके पिता के पास दूसरा डोसा लेने के पैसे नहीं थे और आप दोनों ने मानवता की सच्ची मिशाल पेश करते हुए, मेरे दसवीं पास होने की खुशी में एक शानदार पार्टी दी थी और मेरे पूरे मोहल्ले के लिए भी आपने मिठाई पैक करके दी थी । आज मैं आप दोनों की बदौलत ही कलेक्टर बनी हूँ। *आप दोनों का एहसान मैं सदैव हमेशा याद रखूंगी।आज की यह पार्टी आप सभी के लिए मेरी तरफ से है और इस पार्टी में शामिल सभी ग्राहकों एवं पूरे होटल के कर्मचारियों का बिल मैं दूंगी ।* 

कल आप दोनों को " श्रेष्ठ नागरिक " का सम्मान एक नागरिक मंच पर किया जायेगा ।             

 *इस कहानी को आपके साथ साझा करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि आज से हम अपनी आमदनी का कम से कम 5% समाज के निर्धन होनहार बच्चों की शिक्षा और उनके बेहतर भविष्य के लिए खर्च करेंगे ताकि ये बच्चे Mission pay back to society को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित हों ।*

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शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

रवि अरोड़ा की नजर से...

 शगूफा, कौतुक और वो / रवि अरोड़ा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने बहुत अच्छी पहल की है । हाल ही में उन्होंने देश के जाने माने खिलाड़ियों और कुछ चुनिंदा हस्तियों से फ़िटनेस पर बातचीत की और उनकी सेहत का राज़ जाना । भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली से उन्होंने दिल्ली के छोले-भटूरों पर चर्चा की तो मॉडल और सिने-अभिनेता मिलिंद सोमन से उनकी माँ के एक्सरसाइज सम्बंधी वीडियो पर तस्करा किया । बक़ौल मोदी जी यह वीडियो उन्होंने चार बार देखा है। पैरालिंपियन खिलाड़ी देवेंद्र झाझरिया से मोदी जी ने उनकी कंधे की चोट पर बातचीत की तो न्यूट्रीशियन रजुता दिवेकर से दूध-हल्दी, स्वामी शिव ध्यानम सरस्वती से योग और कश्मीर की फ़ुटबॉलर अशफाँ से जाना कि वे क्रिकेटर धोनी से कितनी प्रभावित हैं ? सबसे रोचक बातचीत मोदी जी और विराट कोहली के बीच ही हुई जिसमें मोदी जी ने कोहली से पूछा कि वे थकते क्यों नहीं ? विराट के यो यो टेस्ट और मिलिंद से उनकी उम्र सम्बंधी उनका हँसी मज़ाक़ भी मनमोहक रहा । इसी बातचीत की रौशनी में कुछ ख़याली पुलाव आज मन में पक रहे हैं । हालाँकि ऐसा कदापि सम्भव नहीं मगर फिर भी कल्पना कर रहा हूँ कि यदि मोदी जी ने कभी किसी दिन आंदोलनरत देश के किसानों, अपने गाँवों को लौट चुके श्रमिकों , लॉक़डाउन के चलते बेरोज़गार हो गए युवाओं और काम-धाम ठप होने के कारण भूखे मर रहे छोटे दुकानदारों और कारोबारियों को फ़ोन किया तो उनकी यह बातचीत कैसी होगी ? अब ज़ाहिर है कि पुलाव ख़याली है तो हवा हवाई ही होगा । वास्तविक थोड़ा ही हैं तो पक कर सामने ही आ जाये । 


कल्पना कीजिये कि मोदी जी यदि किसी किसान से बात करते तो क्या वे पूछते कि भाई क्यों रेलगाड़ियाँ रोक रहे हो, क्यों चक्का जाम कर रहे हो ? आपके नाम पर संसद में तीन विधेयक जो मैं लाया हूँ उसका अम्बानियों-अडानियों से कोई लेना देना नहीं है ? क्या वे किसी श्रमिक से पूछते कि शहर से अपने गाँव वह पैदल कितने दिन में पहुँचा था और रास्ते में उसके कितने साथी भूख-प्यास से मरे ? क्या वे कभी किसी व्यापारी से जानना चाहेंगे कि छः महीने से जो काम धंधा बंद है तो उसका गुज़ारा कैसे चल रहा है ? बेरोज़गार हुए किसी युवा से यदि मोदी जी वीडियो काँफ़्रेस करते तो क्या कहते कि भाई आत्महत्या का ख़याल दिल में मत लाना और कुछ ऊट पटाँग सोचने से पहले अपने घर वालों का भी ध्यान कर लेना ? किसी ठेली-पटरी वाले को यदि वे फ़ोन करते तो क्या पूछते कि भाई आजकल दाल-रोटी का जुगाड़ हो भी पा रहा है या नहीं ? 


चलिये ख़यालों की दुनिया से लौट आता हूँ और स्वीकार कर लेता हूँ कि मोदी जी ऐसे लोगों से कभी बात नहीं करेंगे । मगर पता नहीं क्यों मन करता है कि काश मोदी जी ऐसा करते । खिलाड़ियों और सेलीब्रिटीज के साथ उन्हें कभी आम लोगों की भी याद आती । मोरों को दाना खिलाने के साथ साथ वे आदमियों के दाना-पानी का भी जुगाड़ करते । चाटुकारों और अपने सपनों के संसार से बाहर आकर कभी देखते कि कैसे मुल्क तबाह हो रहा है । काश कोई मोदी जी को बता पाता कि मुल्क केवल विराट कोहलियों और अक्षय कुमारों से ही नहीं तैयार होता । केवल अम्बनियों और अडानियों को बना कर ही देश नहीं बनेगा । मशीन को सारे पुर्ज़े चाहिये । छोटे भी और बड़े भी । छोटे पुर्ज़े नाज़ुक हैं सो उन्हें अधिक देखभाल चाहिये । मगर पता नहीं क्यों मोदी जी को ये पुर्ज़े नहीं दिखते । उनकी टूट फूट की आवाज़ें उनके कानों तक नहीं पहुँचतीं । चलिये जाने दीजिये और कल्पना कीजिये कि अब मोदी जी का अगला शगूफा क्या होगा ? अगली बार वे क्या कौतुक करेंगे ?

मीडिया एजुकेशन कॉउंसिल

 जरूरी है मीडिया एजुकेशन काउंसिल: डॉ. जोशी


नई दिल्ली, 21 सितंबर


''मीडिया शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए मीडिया एजुकेशन काउंसिल की आवश्यकता है। इसकी मदद से न सिर्फ पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षा के पाठ्यक्रम में सुधार होगा, बल्कि मीडिया इंडस्ट्री की जरुरतों के अनुसार पत्रकार भी तैयार किये जा सकेंगे।'' यह विचार प्रसिद्ध विद्वान एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने आज भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) द्वारा आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में व्यक्त किए।


'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 : भारत में पत्रकारिता और जनसंचार शिक्षा की भविष्य की दिशा' विषय पर बोलते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि नई शिक्षा नीति में कहीं भी मीडिया या पत्रकारिता शब्द का जिक्र नहीं है, लेकिन हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति से प्रेरणा लेते हुए जनसंचार और पत्रकारिता शिक्षा के भविष्य के बारे में सोचना होगा। 


डॉ. जोशी ने कहा कि अख़्तर अंसारी का एक शेर है, 'अब कहां हूं कहां नहीं हूं मैं, जिस जगह हूं वहां नहीं हूं मैं, कौन आवाज़ दे रहा है मुझे, कोई कह दो यहां नहीं हूं मैं।' यानी जो कहीं नहीं है, वो हर जगह है। जैसे शिक्षा नीति में मीडिया शब्द न होकर भी हर जगह है। उन्होंने कहा कि तकनीक ने मीडिया को भी बदल दिया है। आज स्कूलों में 3डी तकनीक से पढ़ाई हो रही है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के पॉइंट 11 की चर्चा करते हुए हमें होलिस्टिक एजुकेशन पर ध्यान देना होगा। इस संदर्भ में अगर हम भारतीय संस्कृति की बात करें, तो प्राचीन काल में भारतीय शिक्षा-क्रम का क्षेत्र बहुत व्यापक था। शिक्षा में कलाओं की शिक्षा भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती थीं और इनमें चौंसठ कलाएं महत्वपूर्ण हैं। अगर हम देखें तो ये कलाएं आज हमारे अत्याधुनिक समाज का हिस्सा हैं।  


नई शिक्षा नीति है एक क्रांतिकारी कदम


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो. गीता बामजेई ने कहा कि नई शिक्षा नीति भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक क्रांतिकारी कदम है। प्रो. बामजेई ने कहा कि अगर हम इस शिक्षा नीति को सही तरह से अपनाते हैं, तो ये नीति हमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तरफ ले जाएगी। उन्होंने कहा कि इस शिक्षा नीति से ज्ञान और कौशल के माध्यम से एक नए राष्ट्र का निर्माण होगा। 


मीडिया शिक्षा के परिदृश्य पर चर्चा करते हुए प्रो. बामजेई ने कहा अब समय आ गया है कि हमें जनसंचार शिक्षा में बदलाव करना चाहिए। हमें पत्रकारिता के नए पाठ्यक्रमों का निर्माण करना चाहिए, जो आज के समय के हिसाब से हों। उन्होंने कहा कि हमें अपना विजन बनाना होगा कि पत्रकारिता के शिक्षण को हम किस दिशा में लेकर जाना चाहते हैं। 


मीडिया शिक्षण में चल रही है स्पर्धा


इस मौके पर नवभारत, इंदौर के पूर्व संपादक प्रो. कमल दीक्षित ने कहा कि मीडिया शिक्षण में एक स्पर्धा चल रही है। अब हमें यह तय करना होगा कि हमारा लक्ष्य स्पर्धा में शामिल होने का है, या फिर बेहतर पत्रकारिता शिक्षण का माहौल बनाने का है। 


प्रो. दीक्षित ने कहा कि आज के समय में पत्रकारिता बहुत बदल गई है, इसलिए पत्रकारिता शिक्षा में भी बदलाव आवश्यक है। आज लोग जैसे डॉक्टर से अपेक्षा करते हैं, वैसे पत्रकार से भी सही खबरों की अपेक्षा करते हैं। उन्होंने कहा कि हम ऐसे कोर्स बनाएं, जिनमें कंटेट के साथ साथ नई तकनीक का भी समावेश हो। प्रो. दीक्षित ने कहा कि हमें यह तय करना होगा कि पत्रकारिता का मकसद क्या है। क्या हमारी पत्रकारिता बाजार के लिए है, कॉरपोरेट के लिए है, सरकार के लिए है या फिर समाज के लिए है। अगर हमें सच्चा लोकतंत्र चाहिए, तो पत्रकारिता को अपने लक्ष्यों के बारे में बहुत गहराई से सोचना होगा।



जो चीज 'चैलेंज' करती है, वहीं 'चेंज' करती है


हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की प्रो. कंचन मलिक ने अपने संबोधन में कहा कि अगर हम नई शिक्षा नीति का गहन अध्ययन करें, तो हम पाएंगे इसमें कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर जोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति आत्मनिर्भर बनने पर जोर देती है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं, कि 'जो चीज आपको चैलेंज करती है, वही आपको चेंज करती है।' 


प्रो. मलिक ने कहा कि जनसंचार शिक्षा का प्रारूप बदलना हमारे लिए बड़ी चुनौती है, लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति से प्रेरणा लेकर हम यह कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया शिक्षा का काम सिर्फ छात्रों को ज्ञान देना नहीं है, बल्कि उन्हें इंडस्ट्री के हिसाब से तैयार भी करना है। मीडिया शिक्षकों को इस विषय पर ध्यान देना होगा। 


न्यू मीडिया है अब न्यू नॉर्मल


न्यू मीडिया पर अपनी बात रखते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की प्रोफेसर पी. शशिकला ने कहा कि न्यू मीडिया अब न्यू नॉर्मल है। हम सब जानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण लाखों नौकरियां गई हैं। इसलिए हमें मीडिया शिक्षा के अलग अलग पहलुओं पर ध्यान देना होगा। हमें बाजार के हिसाब से प्रोफेशनल तैयार करने चाहिए। 


क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान देने की जरुरत


इस मौके पर मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एहतेशाम अहमद खान ने कहा कि नई शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान देने की बात कही गई है। जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें इस पर ध्यान देना होगा। मीडिया शिक्षा के संस्थानों को तकनीक के हिसाब से खुद को तैयार करना होगा। उन्होंने कहा कि भारतीय जनसंचार संस्थान को इस विषय पर सभी मीडिया संस्थानों का मार्गदर्शन का काम करना चाहिए। 


समाज के विकास के लिए संवाद आवश्यक


महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय के प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे ने कहा कि किसी भी समाज को आगे ले जाने और उसके विकास के लिए संवाद जरूरी है। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति गुणवत्ता की बात करती है। इसके साथ ही हमें शिक्षा के बाजारीकरण और महंगी होती शिक्षा पर लगाम लगाना होगा।



संवाद और संचार का भारतीय मॉडल


भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह देश में पहला मौका है, जब हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संदर्भ में जनसंचार शिक्षा के बारे में बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य एक बेहतर दुनिया बनाना है। 


प्रो. द्विवेदी ने कहा कि मीडिया शिक्षा की यात्रा को वर्ष 2020 में 100 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन हमें अभी भी बहुत काम करना बाकी है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा के पास विदेशी मॉडल की तुलना में बेहतर संचार मॉडल हैं। इसलिए हमें संवाद और संचार के भारतीय मॉडल के बारे में बातचीत शुरू करनी चाहिए। इसके अलावा भारत की शास्त्रार्थ परंपरा पर भी हमें चर्चा करनी चाहिए। 


उन्होंने कहा कि शिक्षा का व्यवसायीकरण चिंता का विषय है। इसके खिलाफ सभी लोगों को एकत्र होना चाहिए। हमें समाज के अंतिम आदमी के लिए शिक्षा के द्वार खोलने चाहिए। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि जनसंचार शिक्षा में हमें क्षेत्रीय भाषाओं पर काम करने की जरुरत है।

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

सुबह का सतसंग

 **राधास्वामी!! 24-09-2020

- आज सुबह  सतसंग में पढे गये पाठ:-       

                            

(1) गुरु गुरू मैं हिरदे धरती। गुरु आरत की सामाँ करती।। मोटे बंधन जगत के, गुरुभक्ति से काट।झीने बंधन चित्त के, करे नाम प्रताप।।-( यों आरत अब करी बनाई। सतगुरु पूरे रहे सहाई।।) (सारबचन-शब्द-पहला-पृ.सं.177)                                                               

 (2) राधास्वामी प्रीति हिये छाय रही।।टेक।। जब से स्वामी दरशन कीने। छबि उनकी मन भाय रही।।-(राधास्वामी सतगुरु मिले दयाला। चरनन सुरत लगाय रही।।) (प्रेमबानी-2-शब्द-43,पृ.सं.313)                                        🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**

[9/24, 16:32] +91 97176 60451: **राधास्वामी!! 24-09-2020- आज शाम सतसंग में पढे गये पाठ:-                                

  (1) सुर्त आवाज को पकड के गई। नभ पर पहुँची व जानकार हुई।।-( राधास्वामी गुरु ने की किरपा। भाग जागा है मेरा अब धुर का।।) (प्रेमबानी-3-वजन-2,पृ.सं.379)                                            

(2) मनमोहन गुरु रुप लगे मोहि अति प्यारा।।टेक।। नैनकमल गुरु सदा बिराजें। चरन कमल निज धारा।।-(बिना गहे चरन राधास्वामी। कभी न हो निस्तारा।। ) (प्रेमबिलास-शब्द-59, पृ.सं.77)                                                                (3) यथार्थ प्रकाश-भाग पहला-कल से आगे।।        

                   

  🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


**राधास्वामी!! /

 आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन-

 कल से आगे -(119) 

धर्म का दूसरा अपराध यह है कि यह धैर्य, सहिष्णुता तथा क्षमा के उपदेश सुनाकर दीन श्रमजीवियों के हृदयों को इतना कोमल बना देता है उनके मन में आपने दुःख होने देने वालों को पीडित करने और उनकी उद्दंडता का दंड देने का विचार तक नहीं उत्पन्न होता। परिणाम यह है कि वे चुपचाप उनके अत्याचार सहन करते हैं और जीते जी नरक भोगते हैं और पूँजीपति निःशंक् आमोद प्रमोद के जीवन का सुख भोंगते हैं।     पूर्वोक्त दो कारणों के आधार पर राष्ट्रीय नेता कहते हैं कि प्रत्येक बुद्धिमान रूसी का प्रथम कर्तव्य यह होना चाहिए कि इस  मिथ्या शिक्षा के स्रोत अर्थात धर्म के गले पर छुरी फेर कर ही दम ले। सो अप्रैल सन 1929 ई० में रूस में एक व्यवस्था प्रचलित की गई जिसके अनुसार शासन की ओर से हर व्यक्ति को धर्म के विरुद्ध विप्लव-प्रसार(प्रोपेगेंडा) करने की आज्ञा दी गई और धर्म के पक्ष में बोलने वालों के लिए रोक लगाई गई कि सिवाय उन घरों की चहारदीवारी के भीतर के, जिनके लिए शासन आज्ञा दें, कोई व्यक्ति मुँह न खोले। एवं धार्मिक समुदायों के लिए आवश्यक ठहराया गया है कि पूजा और उपासना के कामों के अतिरिक्त और किसी कार्यवाइयो में सम्मिलित न हो। अर्थात अब उनको यह अधिकार नहीं है कि पूर्ववत् सहयोगी संस्थाएँ या पाठशालाएँ  तथा विद्यालय आदि स्थापित करें। इन उपायों अथवा विधानों का परिणाम यह हुआ है कि आधुनिक रूसी नवयुवक धर्म और ईश्वर का नाम तक लेने के विरुद्ध है। और उनके विचारों की चिंगारियाँ उड उड कर अन्य देशों के धार्मिक संस्था रुपी खलिहानों  को अग्नि देवता के समर्पण कर रही है।।    

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻

 यथार्थ प्रकाश- भाग पहला-

 परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!**

मंगलवार, 22 सितंबर 2020

ग्वालियर में फाँसीघर / कबीर

 ग्वालियर किला: -यहां इत्र में नहाती थीं रानियां, फांसी पर लटके थे बाग़ी /


ग्वालियर। मैं गढ़ गोपाचल हूं, आज लोग मुझे पूर्व के जिब्राल्टर और ग्वालियर किले के रूप में पहचानते हैं। दुनिया भर की धरोहरों को सहेजने के क्रम में मुझे यूनेस्को ने सम्मानित किया है। सम्मानों / सराहनाओं से अब मैं बहुत खुश नहीं होता। निर्विकार भाव से मैं पहले भी अपमान और सम्मान को पचा लेता था, अब भी वैसे ही आत्मसात करता हूं।

मुझे भारत या पूर्व का जिब्राल्टर कहा गया, क्योंकि जिस तरह भूमध्य सागर की छाती पर उग आई इस मजबूत चट्टान ने यूरोप को अफ्रीका के रास्ते अरब हमलों से महफूज रखा, उसी तरह मैंने भी हिंदुस्तान की उत्तरी सीमाओं से देश की दहलीज दिल्ली तक घुस आए आक्रमणकारियों

को बस वहीं तक रुके रहने को मजबूर कर दिया था। कोई भी सूरमा मुझे ललकार कर सीधे पराजित करते हुए इस रास्ते से देश के पश्चिमी और दक्षिणी प्रदेशों में नहीं घुस सका।

ऐसा नहीं है कि मैं कभी हारा नहीं...थका नहीं या परेशान नहीं हुआ, लेकिन जब-जब मैं हारा, वजह अपनों के दिए घाव ही रहे। अपनी ही संतानों के भितरघातों ने मुझे अपमान के वो दंश दिए कि अब किसी सम्मान का अमृत उस विष के असर को खत्म नहीं कर सकता। आज भी ढेरों टूरिस्ट आते हैं। मेरे कोने-कोने को कौतूहल से ताकते हैं और अलग-अलग व्याख्या करते हैं।

किसी को वो जगह आकर्षित करती है, जहां बंदियों को फांसी दी जाती थी, तो कोई उस जगह को देखकर मुग्ध होता है, जहां रनिवास था। जहां रानियां गुलाब जल और तरह-तरह के इत्र और फूलों की खुशबू से भरे पानी में स्नान करती थीं. तो कोई उस एकांत की छांव को पसंद करता है, जहां बुर्ज में बैठकर मेरा मुखिया अपनी प्रजा को दर्शन देता था.कोई गदगद हो जाता है तोप के मुहाने पर बैठकर...यहां शोर है बच्चों की मस्ती का, यहां नाद हैं सुरों का, यहां का मौन, सन्नाटा भी आवाज़ करता है..आइए ज़रूर एक बार मुझसे मिलने..मुझे क्यूं हर साल बेहतरी का सरकारी प्रमाण पत्र मिलता है, ये खुद आपके कान में बुदबुदा कर मैं ही बताऊंगा. मैं ग्वालियर का क़िला बोल रहा हूं...

( दैनिक भास्कर  से अनुसरण )

रवि अरोड़ा की नजर से....

 हाल चाल ठीक ठाक है/ रवि  अरोड़ा 


रवि अरोड़ा

मेरे कमरे से सड़क पर आता-जाता हर कोई दिखता है । आजकल काम-धाम कुछ है नहीं सो हर उस चीज़ पर भी निगाह जाती है जिसका कोई महत्व नहीं । यूँ भी आदमी जब फ़ुर्सत में हो तो अपना ही दूसरों का भी हिसाब लगाने लगता है । शायद यही वजह रही कि मैंने आज उन सब्ज़ी-फल वालों की गिनती की जो सुबह नौ से बारह बजे के बीच मेरे मोहल्ले में आये । देख कर हैरानी हुई कि ठेली, हाथ व ई रिक्शा पर सब्ज़ी व फल आदि बेचने बाईस लोग मेरे घर के सामने से गुज़रे । मुझे अच्छी तरह याद है की छः महीने पहले तक आधा किलो टमाटर भी लेने हों तो सेक्टर दस की मार्केट जाना पड़ता था । बच्चों की कोई खास फ़रमाइश हो तो दो-चार किलोमीटर की दौड़-धूप तय होती थी । हैरानी तो तब हुई जब देखा कि रेत का भुट्टा बेचने वाली एक ठेली भी घर के सामने से गुज़री । एक समय में सिहानी गेट और मनोहर टाकिज़ के अतिरिक्त ये कहीं नहीं मिलते थे । अब तो हापुड़ रोड पर कलेक्ट्रेट के सामने ही एक दर्जन ठेली वाले खड़े होते हैं । 


इत्तेफाकन शाम को गोविंद पुरम जाना हुआ । शास्त्री नगर चौक से कालोनी तक फल-सब्ज़ी की ठेलियाँ ही ठेलियाँ दिखाई पड़ीं । ख़ाली दिमाग़ को काम मिल गया और लगे हाथ ये ठेलियाँ ही गिन डालीं । पूरी 78 थीं । कई ग्रामीण भी अपनी भैंसा बुग्गी में सेब और मौसमी आदि बेचते मिले । इस इलाक़े में सेब तो दूर मौसमी भी नहीं उगती सो ज़ाहिर है कि मंडी से लाकर ही इसे बेच रहे होंगे । लगे हाथ दो चार फल विक्रेताओं से मिज़ाजपुर्सी भी कर डाली । सबसे मेरा एक ही सवाल था कि यह काम कब से कर रहे हो ? हैरानी हुई कि कोई भी इस धंधे में चार-छः महीने से पुराना नहीं था । मूलतः कोई पेंटर था तो कोई बढ़ई । कोई किसी फ़ैक्ट्री में पल्लेदार था तो कोई दिहाड़ी मज़दूर । लॉक़डाउन में काम छूटा तो पेट पालने को फल-सब्ज़ी बेचने लगे । ठेली भी किराये मिल जाती है और किसी दूसरे सब्ज़ी वाले की गारंटी दिला दो तो माल भी उधार मिल जाता है । परिवार चलाने को इससे बेहतर उन्हें कुछ और नहीं मिला तो लग गए लाइन में । 


उधर, पता चला है कि गोल मार्केट का एक व्यापारी बाज़ार के पैंतीस करोड़ रुपये मार कर परिवार सहित फ़रार हो गया है । कमेटी चलाने वाले भी कई लोग भूमिगत हैं । नौकरी और एजेंसी आदि दिलवाने के नाम लोगों को ठगने वालों की ख़बरें लगभग रोज अख़बारों में छपती है । सौ दो सौ रुपये के लिये भी लोग बाग़ एक दूसरे का सिर फाड़ रहे हैं । हत्याओं और आत्महत्याओं का भी अनवरत सिलसिला शुरू हो गया है । झपटमारी , लूट-खसोट और ठगी की वारदात आम हो चली हैं । सरकारी विभागों में रिश्वतों के दाम दोगुने हो गए हैं तो समाज में जिनकी ईमानदारी की क़समें खाई जाती थीं, वे भी थोड़ी-थोड़ी रक़मों के लिए बे-ईमान हो रहे हैं । अविश्वास की ऐसी बयार चली है कि कोई किसी पर विश्वास नहीं कर रहा । न कोई उधार रूपया अथवा माल दे रहा है और न किसी को मिल रहा है । पुरानी देनदारियों को चुकाने में लोगबाग़ हाथ खड़े कर रहे हैं । मकान और दुकान मालिकों को किराया नहीं मिल रहा । जो ज़्यादा दबाव बना रहे हैं उनकी प्रोपर्टी ख़ाली हो रही है । एक्सपोर्ट के ओर्डर लगभग पूरे हो गए हैं तो अब उद्योगों में पुनः छटनी शुरू हो गई है । 


चार दिन पहले घड़ी डिटर्जेंट वालों के एक सेल्समैन को सदरपुर के पास दिन दहाड़े क़ट्टा सिर पर लगा कर लूट लिया गया। मालिक भाजपा के नेता हैं फिर भी पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी । पुलिस सेल्समैन को हड़का रही है कि तूने शोर क्यों नहीं मचाया। मालिक का कहना है कि सिर पर तमंचा लगा हुआ हो तो भला कोई कैसे चिल्ला सकता है ? पुलिस का तर्क बेशक मूर्खतापूर्ण है मगर उसकी अपनी मुसीबत है । सारी रिपोर्ट लिख लें तो एक ही दिन में सबके बोरिया बिस्तर बँध जाएँगे । अब और क्या क्या बताऊँ ? जो हालत मेरे शहर की है , कमोवेश यही सूरते हाल पूरे मुल्क का है । कुल मिला कर हर कोई अच्छे दिनो के आनंद में है ।

पटौदी खानदान की दास्तान / विवेक शुक्ला

 क्यों पटौदी खानदान रहा त्यागराज मार्ग पर/ विवेक शुक्ला 

हालांकि राजधानी के त्यागराज मार्ग  में कोई पटौदी हाउस नहीं है, पर मंसूर अली खान पटौदी, उनकी पत्नी शर्मिला और इन दोनों के बच्चे यहां के एक शानदार सरकारी बंगले में लंबे समय तक रहे।


 मंसूर अली खान पटौदी की आज (  22 सितंबर)  पुण्यतिथि है। दरअसल इफ्तिखार अली खान पटौदी सीनियर की 1951 में एक पोलो मैच के दौरान दुर्घटना होने के कारण मौत हो गई थी।


 तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मंसूर अली खान पटौदी की मां श्रीमती साजिदा सुल्तान के नाम पर त्यागराज मार्ग  में एक बंगला आवंटित कर दिया। साजिदा सुल्तान को समाज सेविका के कोटे से बंगला मिला। इधर ही पटौदी लेकर आए शर्मिला को अपनी बहू बनाकर। साजिदा सुल्तान की साल 2003 में मृत्यु के बाद पटौदी परिवार को उस बंगले को खाली करना पड़ा।

 हालांकि कहने वाले तो कहते हैं कि पटौदी साहब ने हरचंद कोशिश की थी कि बंगला उनकी पत्नी शर्मिला के नाम पर आवंटित हो जाए। एक बात और। दिल्ली में Pataudi हाउस दरिया गंज और अशोक रोड के पीछे हैं ।


 कनॉट प्लेस और पटौदी हाउस का रिश्ता

हरियाणा में स्थित पटौदी हाउस और अपने कनॉट प्लेस का एक करीबी संबंध है। दरअसल दोनों को रोबर्ट टोर रसेल ने डिजाइन किया था। 


कहते हैं कि इफ्तिखार अली खान पटौदी क्नॉट प्लेस के डिजाइन से इस कद्र प्रभावित हुए थे कि उन्होंने निश्चय किया कि उनके महल का डिजाइन रसेल ही तैयार करेंगे। 


 रसेल ने पटौदी हाउस का डिजाइन बनाते हुए भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। महल के आगे बहुत से फव्वारे लगे है। फव्वारों क साथ ही गुलाब के फुलों की क्यारियां हैं, जिधर बेशुमार गुलाब के फुलों से सारा माहौल गुलजार रहता है। महल के भीतर भव्य ड्राइंग रूम के अलावा सात बेडरूम,ड्रेसिंग रूम और बिलियर्ड रूम भी है।


 सारे महल का डिजाइन बिल्कुल राजसी अंदाज में तैयार किया गय़ा। इसका डिजाइन तैयार करते वक्त रसेल को आस्ट्रेलिया के आर्किटेक्ट कार्ल मोल्ट हेंज का भी पर्याप्त सहयोग मिला। रसेल ने ही सफदरजंग एयरपोर्ट, वेस्टर्न कोर्ट और तीन मूर्ति को भी डिज़ाइन किया था।

 

जामिया में नवाब पटौदी कहाँ


मंसूर अली खान पटौदी अबजामिया मिलिया इस्लामिया  यूनिवर्सिटी में भी है। जामिया के जिस क्रिकेट स्टेडियम का पहले नाम भोपाल ग्राउंड था, वह अब मंसूर अली खान स्टेडियम कहलाता है। इसकी पवेलियन का नाम वीरेंदर सहवाग पर है । सहवाग जामिया से है । भोपाल की रियासत ने जमीन जामिया को दान में दी थी। 


इस बीच, नवाब साहब ने दिल्ली क्रिकेट को एक झटके में छोड़ दिया था। वे जब 1960 के आसपास दिल्ली के रणजी ट्रॉफी में कप्तान थे, तब उन्होंने हैदराबाद का रुख कर लिया था। फिर वे हैदराबाद कीटीम से अपने मित्र एम.एल.जयसिम्हा की अगुवाई में खेलते रहे।  कुछ साल पहले पटौदी

 साहब का फिरोजशाह कोटला में 'हालऑफफेम'  बनाया गया है। पर ये सवाल तो पूछा ही जाएगा कि उन्होने दिल्ली से खेलना क्यों छोड़ा था?   हालांकि वे यहां पर ही रहते थे।


बेशक पटौदी जुझारू क्रिकेटर थे। भारत का कप्तान बनने से चंद माह पहले एक कार हादसे में उनकी दायीं आँख की रोशनी जाती रही थी। पर पटौदी ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक आँख से बल्लेबाजी करते हुए टेस्ट मैचों में 6 शतक और 16 अर्धशतक ठोके। 


 वे जब बल्लेबाजी करते थे तब उन्हंो दो गेंदें अपनी तरफ आती हुई दिखती थीं। इन दोनों के बीच कुछ इंचों की दूरी भी रहती थी। पर पटौदी ने हमेशा उस गेंद को खेला जिसे उन्हें खेलना चाहिए था।

ये लेख आज पब्लिश हुआ है ।

हिंदी पर कैसा यह ब्रेक? / मनोज कुमार

 ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी पर ब्रेक मनोज कुमार

ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी के चलन पर ब्रेक लग गया है. आप हिन्दी के हिमायती हों और हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिन्दी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिन्दी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न करें लेकिन सच है कि नकली अंग्रेजियत में डूबे हिन्दी समाचार चैनलों ने हिन्दी को हाशिये पर ला खड़ा किया है. हिन्दी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ने दर्शकों को भरमा कर रख दिया है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारिता की राह से गुजरते हुए समाचार चैनल मीडिया में बदल गए हैं. संचार या जनसंचार शब्द का उपयोग अनुचित प्रतीत होता है तो विकल्प के तौर पर अंग्रेजी का मीठा सा शब्द मीडिया तलाश लिया गया है. अब मीडिया का हिन्दी भाव क्या होता है, इस पर चर्चा कभी लेकिन जब परिचय अंग्रेजी के मीडिया शब्द से होगा तो हिन्दीकी पूछ-परख कौन करेगा. हालांकि पत्रकारिता को नेपथ्य में ले जाने में अखबार और पत्रिकाओं की भी भूमिका कमतर नहीं है. चैनलों की नकल करते हुए अखबारों ने खबरों और परिशिष्ट के शीर्षक भी अंग्रेजी शब्दों से भर दिए हैं. शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है. प्रधानमंत्री लिखने से अखबारों में जगह की कमी हो जाती है तो पीएम से काम चलाया जा रहा है. मुख्यमंत्री सीएम हो गए और आयुक्त कमिश्रर. जिलाधीश के स्थान पर कलेक्टर लिखना सुहाता है तो संपादक के स्थान पर एडीटर शब्द सहज हो गया है. यानि समाचार चैनल से लेकर अखबार के पन्नों में भी हिन्दी को दरकिनार किया जा रहा है. हालांकि इस दौर का मीडिया गर्व से इस बात को लिखता जरूर है कि हिन्दी का श्रेष्ठ चैनल या हिन्दी का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार लेकिन हिन्दी को कितना स्थान है, यह उन्हें भी नहीं मालूम.  

हम हर साल 14 सितम्बर को इस बात को लेकर शोर मचाते रहें कि हिन्दी माथे की बिंदी है. हिन्दी से हमारा स्वाभिमान है. हिन्दी हमारी पहचान है लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता से मीडिया में बदलते परिदृश्य में हिन्दी हाशिये पर है. हिन्दी के चैनलों के पास हिन्दी के शब्दों का टोटा है. उनके पास सुप्रभात कमतर शब्द लगता है और गुडमार्निंग उनके लिए ज्यादा प्रभावी है. दस बड़ी खबरों के स्थान पर टॉप टेन न्यूज की सूची पर्दे पर दिखाना उन्हें ज्यादा रूचिकर लगता है. हिन्दी के नाम पर कुमार विश्वास की कविता का पाठ कराने वाले चैनलों को कभी निराला या पंत की कविताओं को सुनाने या पढ़ाने में रूचि नहीं होती है. सच तो यह है कि हिन्दी की पीठ पर सवार होकर अंग्रेजी की टोपी पहने टेलीविजन न्यूज चैनलों ने जो हिन्दी को हाशिये पर लाने की कोशिश शुरू की है, वह हिन्दी के लिए अहितकर ही नहीं बल्कि दुर्भाग्यजनक है. हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने वालों का दिल इस बात से दुखता है कि जिनकी पहुंच करोड़ों दर्शक और पाठक के बीच है, वही संचार माध्यम हिन्दी से दूर हैं. इन संचार माध्यमों की आत्मा हिन्दी के प्रति जाग गई तो हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने में कोई बड़ी बाधा नहीं होगी लेकिन यह संभव होता नहीं दिखता है. हम तो हिन्दी के दिवस, सप्ताह और अधिक से अधिक हिन्दी मास तक ही स्वयं को समेट कर रखना चाहते हैं. हिन्दी की श्रीवृद्धि के नाम पर यह पाखंड हम दशकों से करते चले आ रहे हैं और शायद यह क्रम ना टूटे. इसे हिन्दी के प्रति पाखंड परम्परा का नाम भी दे सकते हैं. कुछेक को यह नागवार गुजरेगा लेकिन सच से कब तक मुंह चुराएंगे.

हिन्दी की यह दुर्दशा अंग्रेजी से प्रभावित हिन्दी समाचार चैनलों के आने के पहले से हो रही है. मेरी तरह आपने भी कभी महाविद्यालय की परीक्षा दी होगी. परीक्षा में प्रश्र पत्र आपके सामने शिक्षक ने रखे होंगे और उसमें प्रश्र पहले हिन्दी में और इसी हिन्दी का रूपांतरण अंग्रेजी में दिया होता है. अब असल बात यह है कि प्रश्र पत्र के निर्देश को पढ़ें जिसमें साफ साफ लिखा होता है कि हिन्दी में कोई त्रुटि हो तो अंग्रेजी के सवाल ही मान्य है. अर्थात हमें पहले समझा दिया गया है कि हिन्दी के चक्कर में मत पड़ो, अंग्रेजी ही सर्वमान्य है. हिन्दी पत्रकारिता में शिक्षा लेकर हाथों में डिग्री लेकर भटकते प्रतिभावान विद्यार्थियों को उचित स्थान क्यों नहीं मिल पाता है तो इसका जवाब है कि उन्हें अंग्रेजी नहीं पढ़ाया गया. बताया गया कि हिन्दी माध्यम में भी अवसर हैं. यदि ऐसा है तो प्रावीण्य सूची में आने वाले विद्यार्थियोंं का भविष्य अंधेरे में क्यों है? टेलीविजन चैनलों में उनका चयन इसलिए नहीं हो पाता है कि वे अंग्रेजी नहीं जानते हैं या उस तरह की अंग्रेजी नहीं जानते हैं जिसके बूते पर वे एलिट क्लास को ट्रीटमेंट दे सकें. ऐसे में हिन्दी के प्रति विमोह और अंग्रेजी के प्रति मोह स्वाभाविक हो जाता है. हालांकि हिन्दी के प्रति समर्पित लोगों को ‘एक दिन हमारा भी टाइम आएगा’ जैसे भाव से भरे लोग उम्मीद से हैं. हिन्दी के हितैषी भी इस बात का सुख का अनुभव करते हैं कि वे वर्ष में एक बार हिन्दी को लेकर बोलते हैं, लिखते हैं और हिन्दी की श्रीवृद्धि के लिए लिए विमर्श करते हैं. एक दिन, एक सप्ताह और एक माह के बाद हिन्दी आले में टांग दी जाती है. कुछ लोग हैं जो वर्ष भर क्या लगातार हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए प्राण-प्रण से जुटे हुए हैं. इन लोगों की गिनती अंगुली भर की है लेकिन हिन्दी को हाशिये पर डालने वालों की संख्या असंख्य है. 

इस पर सबसे पहले मीडिया कटघरे में आता है. यूरोप की नकल करते हुए हम भूल जाते हैं कि हिन्दीभाषी जनता ही इनके चैनल को टीआरपी दिलाती है. उनके होने से ही मीडिया का अस्तित्व है लेकिन करोड़ों लोगों की बोली-भाषा को दरकिनार कर उस अंग्रेजी को सिर पर कलगी की तरह बांधे फिरते हैं, जो उन्हें अपना अर्दली समझती है. यह भी सच है कि टेलीविजन चैनलों में काम करने वाले साथियों में अधिसंख्य मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि में शायद ही अंग्रेजियत हो लेकिन उन्हें टेलीविजन प्रबंधन भी लार्ड मैकाले की तरह अंग्रेजी बोलने और लिखने पर मजबूर करता है. मैकाले की समझ में यह बात आ गई थी कि भारत को बर्बाद करना है तो उसकी शिक्षा पद्धति को नष्ट करो और उनमें कुंठा भर दो. मैकाले यह करने में कामयाब रहा और मैकाले के रूप में आज लाखों मीडिया मैनेजर यही कर रहे हैं. जिस किसी को अंग्रेजी नहीं आती, वे हीनता के भाव से भरे हैं. अंग्रेजी उन पर लाद दिया गया है क्योंकि अंग्रेजी के बिना जीवन शून्य है. 

मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि आज से कोई 35 वर्ष पूर्व जब पत्रकारिता का सबक लेने गया वहां भी अंग्रेजी जानने वाले को हमसे ज्यादा सम्मान तब भी मिलता था और आज भी हम. हम हिन्दीपट्टी के लोग दरकिनार कर दिया करते थे. तब मीडिया उत्पन्न नहीं हुआ था. अखबार था तो पत्रकारिता थी. आज की तरह पेडन्यूज नहीं हुआ करता था बल्कि पीत पत्रकारिता की यदा-कदा चर्चा हुआ करती थी. लेकिन हमारे गुरु तो हिन्दुस्तानी भाषा में पगे-बढ़े थे और वे हमें आकर्षित करते थे. हमें लगता था कि जिस भाषा को समाज समझ सके, वही पत्रकारिता है. शायद आज भी हम पिछली पंक्ति में खड़े हैं तो हिन्दी के प्रति मोह के कारण है या कह सकते हैं कि अंग्रेजी को अंगीकार नहीं किया, इसलिए भी पीछे धकेल दिए गए. हालांकि सच यह भी है कि हम जो कर रहे हैं, वह आत्मसंतोष है. किसी एक अघढ़ समाजी का फोन आता है कि आप का फलां लेख पढऩे के बाद मैं आपको फोन करने से रोक नहीं पाया तो लगता है कि मैंने यहां आकर अंग्रेजी को परास्त कर दिया है. क्योंकि फोन करने वाला कोई टाई-सूट पहने नकली किस्म का बुद्धिजीवी नहीं बल्कि ठेठ भारतीय समाज का वह पुराने किस्म का कोई आदमी है जिसके पास दिमाग से अधिक दिल है. हिन्दी की श्रेष्ठता के लिए, हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने लिए दिमाग नहीं दिल चाहिए. दिल वाले आज भी पत्रकारिता कर रहे हैं और दिमाग वालों की जगह मीडिया में है. हिन्दी को श्रेष्ठ स्थान दिलाना चाहते हैं तो दिल से हिन्दी को गले लगाइए. हिन्दी दिवस और सप्ताह, मास तो औपचारिकता है. एक बार प्रण लीजिए कि हर सप्ताह हिन्दी में एक लेख लिखेंगे, हिन्दी में संवाद करेंगे. हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा. मीडिया का क्या है, वह तो बदल ही जाएगा.

सोमवार, 21 सितंबर 2020

मीना कुमारी औऱ हलाला

 मीना कुमारी का हलाला कभी नहीं हुआ- ताजदार अमरोही


ताजदार झूठ बोल रहे हैं। अगर नहीं, तो मीना कुमारी ज़ीनत अमन के पिता लेखक अमानुल्लाह खान की एक रात की बेगम क्यों बनीं? फिर इद्दत यानी मासिक आने के बाद उन्होंने तलाक लेकर फिर से कमाल के पास आने की सोची, उसके बाद उन्होंने जब कहा कि अगर इस रस्म को निभाना है, तो मुझमें और एक वेश्या में क्या फर्क रह गया? मीना फिर कमाल अमरोही के पास नहीं गईं। 

अगर ताजदार को गलत लगता है तो कंगना क्यों? पहले उन तमाम किताबों, सोशल मीडिया पर केस करें, जहां यह किस्से बहुतायत पढ़ने को मिलते हैं। लोग सुनाते हैं।

सच कितना भी छिपाओ ताजदार साहब, सच यही है कि बाकर अली से थप्पड़ खाने के बाद मीना कुमारी ने कमाल से ही नहीं, अपनी ज़िंदगी से रिश्ता तोड़ लिया था।

मीना से उसके बाद लोग खिलौने की मानिंद खेलते रहे, उनकी धज्जी धज्जी रात हुई, तन्हा तन्हा दिन बिता, तो उसके कारण कमाल अमरोही थे। आप कुछ भी कहिये, पर सच यही है...

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

कँगना VS सन्नी लियोन / संजीव आचार्य

 सनी_लियॉन_को_कंगना_के_खिलाफलोग_समर्थन_दे_रहे


 #कंगना रनौत एक अच्छी अदाकार हैं। अपनी मेहनत और कला से फ़िल्म इंडस्ट्री में एक मुकाम हासिल किया। एकाएक पिछले कुछ वर्षों में उसने विवादों को गले लगाने का ऐसा सिलसिला शुरू किया जिससे उनकी उपलब्धियों पर पानी फिरना शुरू हो गया। मैं यह नहीं कहता कि अगर वो आरोप लगाती है कि उसका और हर उसके जैसी बगैर स्थापित खानदान के आने वाली लड़की को बिस्तर गर्म करना पड़ता है, तो वह गलत आरोप लगा रही है। आपत्ति यह है कि एक्टर या निर्माता निर्देशक के खिलाफ नामजद रिपोर्ट कराये। जैसा मी टू केम्पेन में हुआ। 

ताजा विवाद में उसने खुद का खुद ही पर्दाफाश कर लिया कि वो केंद्र सरकार और भाजपा के हाथों में कठपुतली बनकर महाराष्ट्र सरकार और शिवसेना के खिलाफ टुच्ची बातें कर रही है। जया बच्चन के खिलाफ कंगना ने जिस अभद्र भाषा का उपयोग किया, उससे उसका हल्कापन नँगा हो गया। उर्मिला मातोंडकर को मैंने एनडीटीवी पर सुना। शाबाश उर्मिला, साफ और सीधे शब्दों में कंगना को धो कर रख दिया। बिल्कुल सही कहा कि जब कंगना पैदा भी नहीं हुई थी, जया जी गुड्डी, अभिमान और मिली जैसी फिल्मों में शानदार अभिनय से शोहरत हासिल कर चुकी थी। एक संजीदा अभिनेत्री के अलावा एक सांसद के तौर पर भी उन्होंने समय समय पर संसद में फ़िल्म इंडस्ट्री और महिलाओं के उत्पीड़न के मुद्दों पर अपनी बात जोरदार तरीके से रखी। उनके बारे में कंगना को टिप्पणी करने से पहले आईने में अपना अक्स जरूर देख लेना चाहिए था। 

फ़िल्म इंडस्ट्री अकेली नहीं है जहां ड्रग्स के शिकंजे में लोग फंसे हुए हैं। इस विकराल धंधे की जद में देश के कई क्षेत्र हैं। प्रमोद महाजन के पुत्र राहुल के बंगले पर जो घटना हुई थी वो प्रधानमंत्री निवास से कुछ सौ मीटर दूर था। हत्या हो गई। सब दब गया। सुशांत सिंह मामले में भी जांच शुरू हुई उसकी हत्या की आशंका से। परिजनों ने आरोप लगाए। जांच का रुख नशे की ओर मुड़ गया। सुशांत की छवि एक नशेड़ी की उघड़ कर आई। उसकी गर्लफ्रैंड को गिरफ्तार कर लिया। तमाशा बना। फिर अचानक कंगना पैराशूट से कूदी। गिरी विवादों के दलदल में और तब से कीचड़ उछाल रही है। केंद्र सरकार ने उसको वाई केटेग़री सुरक्षा दे दी!? आज तक तमाम महिला बलात्कार पीड़ितों ने जान का खतरा बताकर सुरक्षा मांगी, उनको मरने दिया गया। ये कांग्रेसी कार्यकर्ता माँ की बेटी को सिर्फ इसलिए वीवीआइपी श्रेणी की सुरक्षा मिल गयी क्योंकि वो मोदी की सार्वजनिक फैन है। खुलकर तारीफ करती है। ठाकरे परिवार के खिलाफ बोल रही है। माँ ने काँग्रेस छोड़कर भाजपा की सदस्यता ले ली। अब वो भी टीवी पर राग भाजपा गा रही हैं। 

ये विवाद अब सनी लियोन तक आ पहुंचा है। कंगना ने कहा था कि उर्मिला मातोंडकर तो सॉफ्ट पोर्न स्टार है। सनी लियोन का भी हवाला दिया। अब सनी लियोन ने कहा कि जो लोग किसी के बारे में कुछ नहीं जानते वो सबसे ज्यादा बोलते हैं। यह अजीब है। 4 लाख लोगों ने उसके बयान को समर्थन दे कर यह साबित किया है कि वो कंगना से बेहतर सनी को मानते हैं।

मद्रास होटल की यादें / विवेक शुक्ला

एक था मद्रास होटल

85 साल के प्रियवदन राव अब कनॉट प्लेस के आसपास आने से बचते हैं। इसी कनॉट प्लेस में उनके पिता के.सुब्बा राव ने मद्रास होटल खोला था। ये बातें 1935 की हैं। तब कनॉट प्लेस नया-नया बना था।


 मद्रास होटल नाम इसलिए रखा गया था क्योंकि तब तक दिल्ली के लिए दक्षिण भारत का मतलब मद्रास ही होता था। सुब्बा राव तो मौजूदा कर्नाटक के उड़पी से थे।


 मद्रास होटल में डोसा,इडली,वड़ा खाने के लिए लोग आने लगे। दिल्ली पहली बार दक्षिण भारतीय डिशेज का स्वाद चख रही थी। इससे पहले दिल्ली में निश्चित रूप से इस तरह का कोई रेस्तरां नहीं था।


पर सुब्बा राव की 1955 में अकाल मृत्यु के बाद मद्रास होटल को संभालने की जिम्मेदारी उनके पुत्र प्रियवदन राव पर आ गई। उन्होंने पहला फैसला ये लिया कि डोसे के एक-दो बार आलू की अतिरिक्त मांग करने वालों तथा बार-बार सांभर मांगने वालों को मना नहीं किया जाएगा। उनसे अतिरिक्त पैसा भी नहीं लिया जाएगा।


 यकीन मानिए कि इस पहल से दिल्ली मद्रास होटल पर जान निसार करने लगी। ये मद्रास होटल की यूएसपी बन गई। आपको अब भी दर्जनों दिल्ली वाले मिल जाएंगे जिन्होंने यहां आकर दो –तीन बार आलू और पांच-छह बार तक सांभर लिया। मद्रास होटल का गर्मागर्म सांभर पीकर आत्मा भी तृप्त हो जाया करती थी।  


सत्तर के दशक के आते-आते मद्रास होटल का जादू सिर चढ़कर बोलने। इधर रोज हजारों स्वाद के शैदाई आने लगे। मद्रास होटल की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1967 में शिवाजी स्टेडियम से सटे बस टर्मिनल का नाम ही मद्रास होटल हो गया। हालांकि उसे 1982 में बदला गया।


कनॉट प्लेस आने वालों के लिए मद्रास होटल में लजीज डिशेज का भोग लगाना अनिवार्य हो गया। गुस्ताफी माफ, जिन्होंने मद्रास होटल के जायके नहीं चखे उन्हें इस बात का सही से अंदाजा कभी नहीं होगा कि वहां क्यों टूटती थी दिल्ली।


 खस्ता- करारा डोसा, वड़ा और इडली तो दिव्य होता था। उसके साथ मिलने वाली नारियल की चटनी का स्वाद भी अतुल्नीय रहता था।


 दिल्ली रोज हजारों डोसे, इडली, वड़ा वगैरह चट करके भी अतृप्त ही रहती। कौन भूल सकता है मद्रास होटल की लाजवाब थाली को। उसमें गीली सब्जी, सूखी सब्जी, रस्म, दही पापड़, अचार, मिष्ठान आदि रहता था। 


लंच 12-3 बजे तक चलता था। इस दौरान सैकड़ों भूखे सुस्वादु थाली के साथ कायदे से न्याय करते थे।


मद्रास होटल के शेफ के काम तय होते थे। कुछ शेफ सिर्फ डोसा ही बनाते थे, तो कुछ इडली और वड़ा। सभी शेफ उड़पी के होते थे। 

मद्रास होटल में कभी नान-वेज डिशेज नहीं परोसे गए। राव साहब इस मसले पर किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हुए। 


वे खुद सुबह-शाम  होटल परिसर में ही घूमते थे। वे बीच-बीच में मद्रास होटल में आने वालों से पूछ लेते थे कि “क्या स्वाद और सर्विस में कोई कमी तो नहीं रह गई है?” अब अपने ग्राहकों को कौन देता है इतना मान-सम्मान।


पर साल 2005 मद्रास होटल के लिए मनहूस रहा। उसे अपना किराये का स्पेस खाली करना पड़ा क्योंकि जिनका स्पेस था उन्होंने उसे अपने उपयोग के लिए उसे लेना था।


 इस तरह दिल्ली के सबसे महत्वपूर्ण लैंडमार्क कनॉट प्लेस का हमेशा आबाद रहने वाला हिस्सा उजाड़ हो गया। आखिरी बार राव साहब मद्रास होटल से निकले तो  बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोए थे। समाप्त।


लेख  17 सितम्बर 2020 को पब्लिश हुआ।

दिलीप कुमार के साथ

दिलीप  कुमार औऱ j. R.D  Tata 

एक बार J R D TATA फ्लाइट में बैठे थे उसके बगल में दिलीप कुमार बैठे थे। दिलीप कुमार से रहा नहीं गया उन्होंने अपना परिचय दिया मैं नामी filmstar हूं आप मेरी film देखी होगी।


JRD TATA ने जवाब दिया- नहीं, कौन दिलीप कुमार 

उस वक़्त दिलीप कुमार की बेजती हो गई। सभीNews paper में खबर आई थी।


आज देश के अनमोल रत्न रतनजी टाटा पर पूरे देश को गर्व है।


उसके जीवन की तीन घटनाएं जो मैंने पढ़ी है आपको बताता हूं।


एक बार अमिताभ के बगल की सीट पर फ्लाइट में सफर कर रहे थे अमिताभ ने पूछा, आप फिल्म देखते हैं, इन्होंने कहा समय नहीं मिलता, अमिताभ ने बताया कि वह फिल्म स्टार है। इन्होंने कहा बहुत खुशी हुई आपसे मिलकर। अमिताभ बहुत प्रसन्न थे। अपना फिल्मस्टार वाला एटिट्यूड दिखा रहे थे। जब एयरपोर्ट पर उतरे तो अमिताभ ने पूछा कि आपने परिचय नहीं दिया तो इन्होंने कहा टाटा ग्रुप ऑफ इंडस्ट्री के चेयरमैन हूं  रतन टाटा नाम है। अमिताभ को काटो तो खून नही।


दूसरी घटना मुंबई हमले की बाद की है। पाकिस्तान ने टाटा सूमो की हजारों गाड़ियों का आर्डर दिए था। जो मुंबई हमले के बाद टाटा ने डिलीवरी को कैंसिल कर दी व ये कहकर गाड़ियां देने से मना कर दिया की मैं उस देश को गाड़ी नहीं दे सकता जो गाड़ी मेरे देश के खिलाफ इस्तेमाल करे।


तीसरी घटना मुंबई हमले के बाद की है मुंबई ताज होटल की मॉडिफिकेशन का था पाकिस्तान के एक पार्टी इस काम के लिए इनसे मिलने आई। इन्होंने मिलने से मना कर दिया। पार्टी ने दिल्ली जाकर आनन्द शर्मा से सिफारिश करवाई। शर्मा ने पार्टी की तारीफ करते हुए कहा इन्हें काम दीजिए ये अच्छा काम करेंगे। रतन टाटा का जवाब था- You may be shameless,I am not (आप बेशर्म हो सकते हैं, मैं नहीं!)


प्रधानमंत्री के आग्रह पर वो व्यक्ति दीया लिये खड़ा है

यही वो व्यक्ति है जिन्होंने कोरोना फंड में1500 करोड़ दान किए हैं और कहा है जरूरत पड़ने पर अपनी पूरी संपत्ति देश के लिए दे सकता है।


ऐसा देश भक्त महान पुरुष, कर्मयोद्धा को करबद्ध नमन है। ये है हमारे देश के असली हीरो। आज के युवा को इन्हें अपना आदर्श मानना चाहिए और इन पर गौरव करना चाहिए , न कि टुच्चे नेताओं को हीरो मानकर उनके पीछे चक्कर लगाना चाहिए।


मेरे नजर में भारत रत्न का हकदार ये असली रत्न, ये कर्मयोद्धा है जिसने भारत की औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व किया और उत्पाद

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

रवि अरोड़ा की नजर से...

 ना मैं गिनाँ ते ना मेरे घटण


रवि अरोड़ा

बीस-पच्चीस साल पहले जब फ़ील्ड रिपोर्टिंग करता था , उन दिनो पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी फ़रवरी माह में एक वार्षिक प्रेस मीट करते थे और बीते साल में हुए अपराधों के आँकड़े अख़बारों के प्रतिनिधियों को उपलब्ध करवाते थे । दरअसल उस दिया गया पुलिस का प्रेस नोट झूठ का पुलिंदा और आँकड़ों की बाज़ीगिरी भर होता था और अधिकारियों की उम्मीद के विपरीत उसे यथावत कोई भी अख़बार नहीं छापता था । रिपोटर्स की थानेवार मुंशियों से सेटिंग और डिस्ट्रिक्ट कंट्रोल रूम में भी जुगाड़ के चलते कोई ख़बर उनसे छुपती न थी । साल भर बाद पुलिस अधिकारी जब दावा करते कि उनके कार्यकाल में फ़लाँ अपराध केवल इतने हुए तो रिपोर्टर लिखते कि नहीं, सही आँकड़ा यह है। अनाड़ी से अनाड़ी क्राइम रिपोर्टर भी सारे अख़बार खँगालता था और प्रतिदिन हो रहे अपराधों को अपनी डायरी में लिखता जाता था । अब पुलिस कुछ भी बताये मगर हर रिपोर्टर को पता होता था कि अपराध का असली आँकड़ा क्या है ? अब जब केंद्र सरकार कह रही है कि लॉक़डाउन में कितने श्रमिक मरे, यह जानने का कोई साधन उसके पास नहीं है । तब मेरी तुच्छ बुद्धि में यह सवाल आता है कि क्यों नहीं देश भर में जिले वार अख़बारों की कटिंग मँगवा ली जातीं ? दूध-पानी सामने आ जाएगा । वैसे दुर्घटना हुई होगी तो पोस्टमार्टम भी अवश्य हुआ होगा । तमाम मोर्चरी से भी उस दौरान के आँकड़े मँगाये जा सकते हैं । मार्च से जून तक जब सख़्त लॉक़डाउन था और परिंदा भी पर नहीं मार पा रहा था, ज़ाहिर है ऐसे में दुर्घटना में मरा व्यक्ति श्रमिक ही रहा होगा । सरकार की मुआवज़ा देने की नीयत हो तो इससे बेहतर तरीक़ा और भला क्या होगा ? माना कि इससे दो चार फ़ीसदी ग़ैर श्रमिकों को भी शायद मुआवज़ा मिल जाये , तब भी इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है ? 


ग़ैर सरकारी सूत्र कहते हैं कि लॉक़डाउन में छः सौ प्रवासी श्रमिकों की विभिन्न दुर्घटनाओं में मौत हुई । सबसे कम आँकड़ा सेव लाइफ़ फ़ाउंडेशन का है और उसके अनुसार भी 198 श्रमिकों की उस दौरान मौत हुई । 30 मई तक 82 मज़दूरों के स्पेशल ट्रेनों में मरने की बात स्वयं रेलवे ने स्वीकारी थी । 16 मई को औरेया में सड़क दुर्घटना में 24 प्रवासी श्रमिकों , 8 मई को महाराष्ट्र के ओरंगाबाद में 16 श्रमिकों की ट्रेन से कुचल कर और 14 मई को गूना में ट्रक-बस की टक्कर में 8 श्रमिकों की मौत तो राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में भी थीं । अब और किस तरह का आँकड़ा सरकार को चाहिये ? कैसे उसने बेशर्मी से संसद में कह दिया कि लॉक़डाउन में मरे श्रमिकों का कोई आँकड़ा उसके पास नहीं है ? अजब सरकार है । उसकी मूर्खता से कितने लोग बेरोज़गार हुए, कितनो की मौत हुई और कितने अब भूखे मर रहे हैं , उसके पास कोई आँकड़ा ही नहीं है ? बूचड़खाने में शाम तक कितने जानवर कटे यह आँकड़ा भी जब रखा जाता है तो क्या ये श्रमिक जानवरों से भी गये गुज़रे थे ? जानवरों की तरह सड़कों पर भूखे-प्यासे मरे मज़दूरों के परिवारों को मुआवज़ा नहीं देना तो मत दो । कोई आपके पास माँगने तो नहीं आ रहा मगर यह कहना कि मारे गए मज़दूरों की गिनती करने का कोई साधन आपके पास नहीं है , यह तो बेहद ही शर्मनाक है । वैसे आप अपने उन नेताओं को इस काम पर लगाओ न जो गिन लेते हैं कि कितने आदमियों का इस साल धर्मांतरण हुआ, इतनो का लव जेहाद हुआ अथवा फ़लाँ क़ौम की कितनी आबादी बढ़ रही है । उन लोगों को लगाओ जिन्होंने जेएनयू में सिगरेट के टोटे, शराब की बोतलें और इस्तेमाल किये हुए कंडोम गिने थे । अजी नीयत हो तो क्या नहीं हो सकता ? सच कहूँ तो  किसी मामूली से क्राइम रिपोर्टर के ज़िम्मे भी यह काम लगाओगे तो वह भी हफ़्ते भर में अख़बारों से टोटल करके दे देगा । हाँ पंजाबी व्यापारियों की तरह आपने भी तय कर लिया है कि न मैं गिनाँ न मेरे घटण तो बात दूसरी है ।

सोमवार, 14 सितंबर 2020

समस्‍त भाषाएं, राष्‍ट्रीय भाषाएं हैं : प्रो. संजय द्विवेदी

भारतीय जन संचार संस्‍थान में  ‘भारतीय भाषाओं में अंतर-संवाद’ विषय पर वेबिनार


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नई दिल्‍ली, 14 सितम्‍बर, 2020.’’भाषा का संबंध इतिहास, संस्‍कृति और परम्‍पराओं से है। भारतीय भाषाओं में अंतर-संवाद की परम्‍परा पुरानी है और ऐसा सैकड़ों वर्षों से होता आ रहा है, यह उस दौर में भी हो रहा था, जब वर्तमान समय में प्रचलित भाषाएं अपने बेहद मूल रूप में थीं। श्रीमद् भगवत गीता में समाहित श्रीकृष्‍ण का संदेश दुनिया के कोने-कोने में केवल अनेक भाषाओं में हुए उसके अनुवाद की बदौलत ही पहुंचा। उन दिनों अंतर-संवाद की भाषा संस्‍कृत थी, तो अब यह जिम्‍मेदारी हिंदी की है।‘’ यह विचार वरिष्‍ठ पत्रकार एवं माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय,भोपाल के पूर्व कुलपति श्री अच्‍युतानंद मिश्र ने भारतीय जन संचार संस्‍थान (आईआईएमसी) में आज हिंदी पखवाड़े के शुभारंभ के अवसर पर ‘भारतीय भाषाओं में अंतर-संवाद’ विषय पर आयोजित वेबिनार में व्‍यक्‍त किए।


भारतीय भाषाओं के बीच अंतर-संवाद में रुकावट कारण अंग्रेजी : श्री अच्‍युतानंद मिश्र


            श्री मिश्र ने कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच अंतर-संवाद में रुकावट अंग्रेजी के कारण आई और इसकी वजह हम भारतीय ही थे, जिन्‍होंने हिंदी या अन्‍य भारतीय भाषाओं के स्‍थान पर अंग्रेजी को अंतर-संवाद का माध्‍यम बना लिया। उन्‍होंने कहा कि हिंदी के विद्वानों, पत्रकारों और संस्‍थाओं को इस दिशा में कार्य करना चाहिए था लेकिन उन्‍होंने यह जिम्‍मेदारी नहीं निभाई। उन्‍होंने कहा कि जब डॉ. राम मनोहर लोहिया ने ‘अंग्रेजी हटाओ’ अभियान शुरु किया, तो उसका आशय ‘हिंदी लाओ’ कतई नहीं था, लेकिन दुर्भाग्‍यवश ऐसा प्रचारित किया गया। इससे राज्‍यों के मन में भ्रांति फैली। इसका निराकरण हिंदी के विद्वानों, पत्रकारों और संस्‍थाओं  को करना चाहिए था। श्री मिश्र ने कहा कि अन्‍य भारतीय भाषाओं के हिंदी के करीब आने का कारण मनोरंजन, पर्यटन और प्रकाशन क्षेत्र है। हिंदी की लोकप्रियता का श्रेय हिंदी के बुद्धिजीवियों को नहीं अपितु इन क्षेत्रों को दिया जाना चाहिए।


            उन्‍होंने कहा कि वर्तमान सरकार द्वारा घोषित राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति को देखते हुए उससे कुछ अपेक्षाएं हैं। इसमें मातृभाषा में शिक्षा और भारतीय भाषाओं के प्रोत्‍साहन की बात हो रही है, अनुवाद की बात हो रही है ऐसे में हिंदी से जुड़ी संस्‍थाएं यदि पहल करें तो हिंदी परस्‍पर आदान-प्रदान का व्‍यापक माध्‍यम बन सकती है।


 


जहां भाषा खत्‍म होती है, वहां संस्‍कृति भी दम तोड़ देती है : सुश्री अद्वैता काला  


                        मुख्‍य वक्‍ता एवं पटकथा लेखक एवं स्‍तम्‍भकार सुश्री अद्वैता काला ने अपने संबोधन में कहा कि जहां भाषा खत्‍म होती है, वहां संस्‍कृति भी उसके साथ दम तोड़ देती है। हमें सभी भाषाओं को महत्‍व देना चाहिए, उन्‍हें समझना चाहिए और उनका सम्‍पर्क का माध्‍यम हिंदी है, इसे स्‍वीकार करना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि वैसे भाषा बहुत निजी मामला है। इसके माध्‍यम से हम केवल दुनिया से ही नहीं बल्कि स्‍वयं से भी संवाद करते हैं।


             हिंदी की स्थिति की चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि फिल्‍मों की पटकथा और संवाद रोमन में लिखे जाते हैं, क्‍योंकि लोग हिंदी की लिपि नहीं पढ़ पाते, जबकि हिंदी मीडिया की पहुंच बहुत व्‍यापक है ।  सुश्री काला ने बताया कि उनकी खुद की हिंदी भी हिंदी में लेखन से जुड़ने के बाद ही बेहतर हुई और उन्‍हें लगता है कि शिक्षा प्रणाली यदि सही रही होती, ऐसा नहीं होता। उनका सुझाव है कि बच्‍चों को अंग्रेजी और हिंदी के साथ-साथ कोई न कोई क्षेत्रीय भाषा भी पढ़ाई जानी चाहिए।


 


भाषाओं में अंतर-संवाद कोई नई बात नहीं : श्री मुकेश शाह


            गुजराती भाषा के ‘साप्‍ताहिक साधना’ के प्रबंध सम्‍पादक श्री मुकेश शाह ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि शब्‍दों को हमने ब्रह्म माना है और भाषाओं में अंतर-संवाद कोई नई बात नहीं है। उन्‍होंने महात्‍मा गांधी का उदाहरण देते हुए कहा कि बापू ने अंग्रेजी में ‘हरिजन’ प्रकाशित किया, लेकिन उसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्‍होंने उसे गुजराती और हिंदी में भी स्‍थापित किया। उन्‍होंने गुजराती में 70 पुस्‍तकों की रचना करने वाले फादर वॉलेस और गुजरात में विद्यालय, महाविद्यालय और विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना करने वाले सयाजीराव गायकवाड़ के योगदान का भी उल्‍लेख किया। उन्‍होंने कहा कि उत्‍तर-दक्षिण भारत की भाषाओं में व्‍यापक अंतर होने के बावजूद उनमें अंतर-संवाद और अनुवाद होता आया है।उन्‍होंने कहा कि भाषाओं का राष्‍ट्रीय चरित्र के निर्माण में योगदान होता है।


 


परस्‍पर आदान-प्रदान से ही भाषाएं समृद्ध होती हैं : श्री स्‍नेहशीष सुर


            कोलकाता प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष श्री स्‍नेहशीष सुर ने इस अवसर पर कहा कि हिंदी दिवस के अवसर पर भारतीय भाषाओं के बीच अंतर-संवाद विषय पर विमर्श का आयोजन करके भारतीय जन संचार संस्‍थान ने दर्शाया कि हिंदी दिवस केवल हिंदी के लिए नहीं है। सभी भाषाओं के बीच संवाद, सम्‍पर्क, उनके कल्‍याण तथा विकास को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के पास बहुत विशाल विरासत और व्‍यवसायिक कौशल है लेकिन यह कौशल अंतर्राष्‍ट्रीय मानकों के अनुरूप होना चाहिए। समस्‍त भाषाएं आगे बढ़े और उनकी पत्रकारिता आगे बढ़े यह प्रयास होना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि हिंदी भारतीय भाषाओं के बीच सम्‍पर्क का माध्‍यम है, इसमें कोई दो राय नहीं है। बीतते समय के साथ हिंदी के साथ अन्‍य भाषाओं के लोगों की भी सहजता बढ़ी है और परस्‍पर आदान-प्रदान से दोनों ही भाषाएं समृद्ध होती हैं।


 


भाषा ही मेल-मिलाप कराती है : श्री अमीर अली खा


            हैदराबाद से प्रकाशित होने वाले उर्दू दैनिक ‘डेली सियासत’ के सम्‍पादक श्री अमीर अली खान ने इस अवसर पर कहा कि पाकिस्‍तान ने जब उर्दू को अपनी राजभाषा बनाया, तो यहां हिंदी और उर्दू में अंतर आ गया । श्री खान ने कहा कि भारत एक छोटे यूरोप की तरह है, इसके एक ही दिशा में नहीं ले जा सकते। यहां विविध भाषाएं हैं और भाषा ही मेल-मिलाप कराती है। उन्‍होंने कहा कि हिंदी की किताबों को उर्दू में अनुवाद कराया जाना चाहिए, लेकिन अन्‍य भाषाओं की पुस्‍तकें भी हिंदी में अनुवाद होनी चाहिए। इससे अंतर-संवाद को बढ़ावा मिलेगा। उन्‍होंने कहा कि अंतर संवाद को बढ़ावा देने में योगदान प्रदान कर हम खुद को गौरवांवित समझेंगे। 


समस्‍त भाषाएं, राष्‍ट्रीय भाषाएं हैं : प्रो. संजय द्विवेदी


            इस विमर्श के अध्‍यक्ष एवं भारतीय जन संचार संस्‍थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने अध्‍यक्षीय भाषण में कहा कि  सरकार की ओर से घोषित नई राष्‍ट्रीय नीति में सभी भारतीय भाषाओं को महत्‍व दिया गया है। हिंदी अकेली राष्‍ट्र भाषा नहीं है, क्‍योंकि समस्‍त भाषाएं इसी राष्‍ट्र के लोगों के द्वारा बोली जाती हैं, लिहाजा वे सभी राष्‍ट्रीय भाषाएं ही हैं। हर जगह सम्‍पर्क का माध्‍यम अंग्रेजी बन जाने से नुकसान पहुंचा है, क्‍योंकि बहुत कम लोग हैं, जो अंग्रेजी बोलते हैं। प्रो. द्विवेदी ने ऐसे अनेक विद्वानों का उल्‍लेख किया जिन्‍होंने  हिंदी और भाषायी पत्रकारिता में अभूतपूर्व योगदान दिया है। नई राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति की विशेषताएं गिनाते हुए उन्‍होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में अंतर संवाद से वे एक दूसरे के गुण अपनाएंगी और अंतत: सर्वव्‍यापी, सर्वग्राह्य बनेंगी। इससे भाषायी विद्वेष की भावना का अंत होगा, परम्‍पराओं का समन्‍वय होगा और सभी को सामाजिक न्‍याय तथा आर्थिक न्‍याय प्राप्‍त होगा।


            उन्‍होंने कहा कि भाषायी विविधता और बहुभाषी समाज आज की आवश्‍यकता है और समस्‍त भाषाओं के लोगों ने ही विश्‍व में अपनी उपलब्धियों के पदचिन्‍ह छोड़े हैं। उन्‍होंने कहा कि भारत सदैव वसुधैव कुटुम्‍बकम की बात करता आया है और सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने के पीछे भी यही भावना है।


भाtरतीय भाषाओं के बीच संवाद को व्‍यापक रूप से प्रोत्‍साहन दिया जाना चाहिए : प्रो. आनंद प्रधान


            भारतीय जन संचार संस्‍थान के भारतीय भाषायी पत्रकारिता विभाग के प्रो. आनंद प्रधान ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को व्‍यापक रूप से प्रोत्‍साहन दिया जाना चाहिए। हिंदी दिवस के अवसर पर इस विषय पर विमर्श का आयोजन इस दिशा में काफी महत्‍वपूर्ण है। उन्‍होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में बीच संवाद सैंकड़ों वर्षों से जारी है और इनका विकास भी साथ-साथ ही हुआ है। मसलन बांग्‍ला और मैथिली में इतनी समानता है कि उनमें अंतर करना मुश्किल है, इसी तरह अवधी और ब्रज भाष तथा हिंदी और उर्दू में भी ऐसा ही है। इस संबंध में उन्‍होंने एक शोध का हवाला दिया। प्रो. प्रधान ने बताया कि हिंदी और उर्दू दैनिकों की भाषा पर हुए एक शोध में देखा गया कि उनमें केवल 23 प्रतिशत शब्‍द ही अलग थे। उन्‍होंने कहा कि वैसे ही हिंदी पत्रकारिता के विकास में मराठी, बांग्‍ला और दक्षिण भारतीय भाषाओं के योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती।


           इस विमर्श में भारतीय जन संचार संस्‍थान मुख्‍यालय, क्षेत्रीय केंद्रों के संकाय सदस्‍य, कर्मचारी अधिकारी, भारतीय सूचना सेवा के प्रशिक्षु और पूर्व छात्र शामिल हुए।

शनिवार, 12 सितंबर 2020

हे हिंदी हाय हिंदी

 हिन्दी के लिये रुदन/ मनोज  कुमार 


हिन्दी के प्रति निष्ठा जताने वालों के लिये हर साल सितम्बर की 14 तारीख रुदन का दिन होता है। इस एक दिनी विलाप के लिये वे पूरे वर्ष भीतर ही भीतर तैयारी करते हैं लेकिन अनुभव हुआ है कि सालाना तैयारी हिन्दी में न होकर लगभग घृणा की जाने वाली भाषा अंग्रेजी में होती है। हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने की कोशिश स्वाधीनता के पूर्व से हो रही है और हर एक कोशिश के साथ अंग्रेजी भाषा का विस्तार होता गया। स्वाधीनता के पूर्व और बाद के आरंभिक वर्षों में हिन्दी माध्यम के हजारों शालायें थी लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में हर गांव और गली में महात्मा गांधी विद्यालय के स्थान पर पब्लिक स्कूल आरंभ हो चुका है। ऐसे में हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कैसे और कितनी हिन्दी सिखा पायेंगे, एक सोचनीय सवाल है। अंग्रेजी भाषा में शिक्षा देने वाली शालाओं को हतोत्साहित क्यों नहीं कर रहे हैं? क्यों हम अपनी हिन्दी भाषा में शिक्षा देेने वाली शालाओं की दशा सुधारने की दिशा में कोशिश नहीे करते? शिक्षा ही संस्कृति की बुनियाद है और भाषा इसके लिये माध्यम। हमने अपनी बुनियाद और माध्यम दोनो को ही कमजोर कर दिया है। फिर रुदन किस बात का? जो है, ठीक है।

 अब थोड़ी बात, समाज को शिक्षित करने का एक बड़ा माध्यम पत्रकारिता पर। पत्रकारिता ने स्वयं में अंग्रेजी का एक शब्द गढ़ लिया है मीडिया। मीडिया शब्द के अर्थ पर यहां चर्चा करना अनुचित लगता है लेकिन इससे यह बात तो साफ हो जाती है कि वह भी हिन्दी के प्रति बहुत रूचिवान नहीं रहा। हालांकि बाजार के लिये उसने हिन्दी भाषा को चुना है और अंग्रेजी के प्रकाशन हो या प्रसारण, उन्हें हिन्दी में आना पड़ा है। उसने अपनी जरूरत तो समझ ली लेकिन अंग्रेजी का मोह नहीं छोड़ पाया, सो वह ठेठ हिन्दी में न आकर हिंग्लिश में हिन्दीभाषियों पर कब्जा करने लगा। साठ और सत्तर के दशक में जन्मी पीढ़ी की अक्षर ज्ञान के लिये प्रथम पाठशाला अखबार के पन्ने होते थे लेकिन अब इन पन्नों से सीखने का अर्थ स्वयं को उलझन में डालना है। भाषा का जो बंटाधार इन दिनों तथाकथित पत्रकारिता वाले मीडिया में हो रहा है, वह अक्षम्य है। किसी ने बंधन नहीं डाला है कि प्रकाशन-प्रसारण हिन्दी में करें लेकिन लालच में हिन्दी में आना मजबूरी थी और इस मजबूरी में भी हिन्दी पट्टी को उसने मजबूर कर दिया कि वे हिन्दी नहीं, अंग्रेजी भी नहीं, हिंग्लिश पढ़ें। एक ऐसी भाषा के शिकार हो जायें जो न आपको घर का रखेगी न घाट का।

 हैरानी की बात है कि जब हम कहते हैं कि पत्रकारिता, माफ करेंगे, मीडिया, जब कहती है कि वह व्यवसायिक हो चली तो उसे इस बात को समझ लेना चाहिये कि हर व्यवसाय अपने गुण-धर्म का पालन करता है लेकिन मीडिया तो इसमें भी असफल होता दिखता है। क्या हम उससे यह सवाल कर सकते हैं कि हिन्दी के प्रकाशन-प्रसारण में तो बेधडक़ अंग्रेजी शब्दों का उपयोग होता है तो क्या अंग्रेजी के प्रकाशन-प्रसारण में हिन्दी के लिये भी मन क्या इतना ही उदार होता है? जवाब हां में तो हो नहीं सकता। अब हम सबको मान लेना चाहिये कि हम हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिये रुदन करते रहेंगे लेकिन कर कुछ नहीं पायेंगे। सच में हिन्दी के प्रति आपके मन में सम्मान है तो संकल्प लें कि हम अंग्रेजी स्कूलों को हतोत्साहित करेंगे। जब यह संकल्प अभियान में बदल जायेगा तो कोई भी ताकत नहीं जो हिन्दी को भारत क्या, संसार की प्रमुख औऱ लोकप्रिय भाषा बनने से रोक सके।



बना रहे रस बनारस

 बना रहे बनारस( प्राचीन शहर )


जिस प्रकार हिन्दु धर्म कितना प्राचीन है पता नही चलता ठीक उसी प्रकार काशी कितनी प्राचीन है ,पता नही लग सका |

यद्धपि बनारस की खुदाई से प्राप्त अनेक मोहरे ,ईट,पथ्थर ,हुक्का ,चिलम और सुराही के टुकडो का पोस्मार्टम हो चुका है फिर भी सही बात अभी तक प्रकाश में नही आई है |जन -साधारण में अवश्य काशी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है |कहा जाता है कि सृष्टि कि उत्पत्ति के पूर्व काशी को शंकर भगवान अपने त्रिशूल पर लादे घूमते -फिरते थे |जब सृष्टि कि उत्पत्ति हो गयी तब इसे त्रिशूल से उतारकर पृथ्वी के मध्य में रख दिया गया |

यह सृष्टि कितनी प्राचीन है ,इस सम्बन्ध में उतना ही बड़ा मतभेद है जितना यूरोप और एशिया में या पूर्वी गोलार्द्ध में है |सृष्टि कि प्राचीनता के सम्बन्ध में एक बार प्रसिद्ध पर्यटक बर्नियर को कौतूहल हुआ था |अपनी इस शंका को उसने काशी के तत्कालीन पंडितो पर प्रगट की,नतीजा यह हुआ कि उन लोगो ने अलजबरा कि भांति इतना बड़ा सवाल लगाना शुरू किया जिसे देखकर बर्नियर कि बुद्धि गोल हो गयी |फलस्वरूप उसका हल बिना जाने उसने यह स्वीकार कर लिया कि काशी बहुत प्राचीन है |इसका हिसाब सहज नही |अगर हजरत कुछ दिन यंहा और ठहर जाते टी सृष्टि कि प्राचीनता के सम्बन्ध में सिर्फ उन्हें ही नही ,बल्कि उनकी डायरी से सारे संसार को यह बात मालूम हो जाती |चूँकि पृथ्वी के जन्म के पूर्व काशी कि उत्पत्ति हो गयी थी इसलिए इसे 'अपुनभर्वभूमि ' कहा गया है |एक अर्से तक शंकर के त्रिशूल पर चक्कर काटने के कारण 'रुद्रावास 'कहा गया |प्राचीन काल में यंहा के जंगलो में भी मंगल था ,इसीलिए इसे 'आनंदवन 'और 'आनन्द-कानन ' कहा गया |इन्ही जंगलो में ऋषि -मुनि मौज -पानी लेते थे ,इसीलिए इसे 'तप: स्थली 'कहा गया | तपस्वियों की अधिकता के कारण यंहा की भूमि को 'अविमुक्त -क्षेत्र 'की मान्यता मिली |

इसका नतीजा यह हुआ की काफी तादाद में लोग यंहा आने लगे |उनके मरने पर उनके लिए एक बड़ा श्मशान बनाया गया | कहने का मतलब काशी का 'नाम 'महाश्मशान ' भी हो गया |

प्राचीन इतिहास के अध्ययन से यह पता चलता है कि काश्य नामक राजा ने काशी नगरी बसाई :अर्थात इसके पूर्व काशी नगरी का अस्तित्व नही था |जब काश्य के पूर्व यह नगर बसा नही था तब यह निश्चित है कि उन दिनों मनु कि सन्ताने नही रहती थी ,बल्कि शंकर के गण ही रहते थे |हमे प्रस्तरयुग ,ताम्रयुग ,और लौहयुग कि बातो का पता है |हमारे पूर्वज उत्तरी ध्रुव से आये या मध्य एशिया से आये ,इसका समाधान भी हो चुका है |पर काश्य के पूर्व काशी कहा थी ,पता नही लग सका |

काशी की स्थापना

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काश्य के पूर्वज राजा थे इसीलिए उन्हें राजा कहा गया है अथवा काशी नगरी बसाने के कारण उन्हें राजा कहा गया है ,यह बात विवादास्पद है |ऐसा लगता है की इन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा नही मिला ,फलस्वरूप ये नाराज होकर जंगल में चले गये |वहा जंगल आदि साफ़ कर एक फर्स्ट क्लास का बंगला बनवाकर रहने लगे |धीरे -धीरे खेती -बारी भी शुरू की |लेकिन इतना करने पर भी स्थान उदास ही रहा |नतीजा यह हुआ की कुछ और मकान बनवाये और उन्हें किराए पर दे दिया |इस प्रकार पहले -पहल मनु की संतानों की आबादी यहाँ बस गयी |आजकल जैसे मालवीय नगर ,लाला लाजपत नगर आदि बस रहे है ठीक उसी प्रकार काशी की स्थापना हो गयी |

ऐसा अनुमान किया जाता है की उन दिनों काशी की भूमि किसी राजा की अमलदारी में नही रही वरना काश्य को भूमि का पत्ता लिखवाना पड़ता ,मालगुजारी देनी पड़ती और लगान भी वसूल करते |चूँकि इस नगरी को आबाद करने का श्रेय इन्ही को प्राप्त हुआ था ,इसीलिए लोगो ने समझदारी से काम लेकर इसे काशी नगरी कहना शुरू किया |आगे चलकर इनके प्रपौत्र ने इसे अपनी राजधानी बनाया कहने का मतलब परपोते तक आते -आते काशी नगरी राज्य बन गयी थी और उस फर्स्ट क्लास के बंगले को महल कहा जाने लगा था |इन्ही काश्य राजा के वंशधर थे -दिवोदास |सिर्फ दिवोदास ही नही ,महाराज दिवोदास |कहा जाता है की एक बार इन पर हैहय वंश वाले चढ़ आये थे |लड़ाई के मैदान से रफूचक्कर होकर हजरत काशी से भाग गये | भागते -भागते गंगा -गोमती के संगम पर जाकर ठहरे |अगर वहा गोमती ने इनका रास्ता न रोका होता तो और भी आगे बढ़ जाते |जब उन्होंने यह अनुभव किया की अब पीछा करने वाले नही आ रहे है तब वे कुछ देर के लिए वही आराम करने लगे |जगह निछ्द्द्म थी |बनारसवाले हमेशा से निछ्द्द्म जगह जरा अधिक पसंद करते है |नतीजा यह हुआ की उन्होंने वही डेरा डाल दिया |कहने का मतलब वही एक नयी काशी बसा डाली | कुछ दिनों तक चवनप्रास का सेवन करते रहे ,दंड पेलते रहे और भांग छानते रहे |जब उनमे इतनी ताकत आ गयी की हैहय वंश वालो से मोर्चा ले सके ,तब सीधे पुरानी काशी पर चढ़ आये और बात की बात में उसे ले लिया |इस प्रकार फिर काशीराज बन बैठे |हैहय वालो के कारण काशी की भूमि अपवित्र हो गयी थी ,उसे दस अश्वमेघ यज्ञ से शुद्ध किया और शहर के चारो तरफ परकोटा बनवा दिया ताकि बाहरी शत्रु झटपट शहर पर कब्जा न कर सके |इसी सुरक्षा के कारण पूरे 500 वर्ष यानी 18 -20 पीढ़ी तक राज्य करने के पश्चात इना वंश शिवलोक वासी हो गया |

काशी से वाराणसी

इस पीढ़ी के पश्चात कुछ फुटकर राजा हुए | उन लोगो ने कुछ कमाल नही दिखाया ,अर्थात न मंदिर बनवाए ,न स्तूप खड़े किए और न खम्भे गाड़े |फलस्वरूप ,उनकी ख़ास चर्चा नही हुई |कम -से -कम उन भले मानुषो को एक -एक साइनबोर्ड जरुर गाढ़ देना चाहिए था | इससे इतिहासकारों को कुछ सुविधा होती |

ईसा पूर्व सातवी शताब्दी में ब्रम्हदत्त वंशीय राजाओं का कुछ हालचाल ,बौद्ध -साहित्य में है ,जिनके बारे में बुद्ध भगवान ने बहुत कुछ कहा है ,लेकिन उनमे से किसी राजा का ओरिजनल नाम कही नही मिलता |

पता नही किस्मे यह मौलिक सूझ उत्पन्न हुई की उसने काशी नाम को सेकेण्ड हैण्ड समझकर इसका नाम वाराणसी कर दिया | कुछ लोगो का मत है की वरुणा और अस्सी नदी के बीच उन दिनों काशी नगरी बसी हुई थी ,इसीलिए इन दोनों नदियों के नाम पर नगरी का नाम रख दिया गया ,ताकि भविष्य में कोई राजा अपने नाम का सदुपयोग इस नगरी के नाम पर न करे |इसमें संदेह नही की वह आदमी बहूदूरदर्शी था वरना इतिहासकारों को ,चिठ्ठीरसो को और बाहरी यात्रियों को बड़ी परेशानी होती |

लेकिन यह कहना की वरुणा और असी नदी के कारण इस नगरी का नाम वाराणसी रखा गया बिलकुल वाहियात है ,गलत है और अप्रमाणिक है | जब पद्रहवी शदाब्दी में यानी तुलसीदास जी के समय ,भदैनी का इलाका शहर का बाहरी क्षेत्र माना जाता था तब असी जैसे बाहरी क्षेत्र को वाराणसी में मान कैसे लिया गया ? दूसरे विद्वानों का मत है की असी नही ,नासी नामक एक नदी थी जो कालान्तर में सुख गयी ,इन दोनों नदियों के मध्य वाराणसी बसी हुई थी ,इसलिए इसका नाम वाराणसी रखा गया |यह बात कुछ हद तक काबिलेगौर है लिहाजा हम इसे तस्दीक कर लेते है |

भगवान बुद्ध के कारण काशी की ख्याति आधी दुनिया में फ़ैल गयी थी | इसलिए पड़ोसी राज्य के राजा हमेशा इसे हडपना चाहते थे | जिसे देखो वही लाठी लिए सर पर तैयार रहने लगा |नाग ,शुंग और कण्व वंश वाले हमेशा एक दूसरे के माथे पर सेंगरी बजाते रहे | इन लोगो की जघन्य कार्यवाही के प्रमाण -पत्र सारनाथ की खुदाई में प्राप्त हो चुके है |

ईसा की प्रथम शताब्दी में प्रथम विदेशी आक्रामक बनारस आया | यह था -कुषाण सम्राट कनिष्क | लेकिन था बेचारा भला आदमी | उसने पड़ोसियों के बमचख में फायदा जरुर उठाया पर बनारस के बहरी अलंग सारनाथ को खूब सवारा भी | कनिष्क के पश्चात भारशिवो और गुप्त सम्राटो का रोब एक अरसे तक बनारस वालो पर ग़ालिब होता रहा | इस बीच इतने उपद्रव बनारस को लेकर हुए की इतिहास के अनेक पृष्ठ इनके काले कारनामो से भर गये है |मौखरी वंश वाले भी मणिकर्णिका घाट पर नहाने आये तो यहाँ राजा बन बैठे | इसी प्रकार हर्षवर्द्धन के अन्तर में बौद्ध धर्म के प्रति प्रेम उमड़ा तो उन्होंने भी बनारस को धर दबाया | आठवी शताब्दी में इधर के इलाके में कोई तगड़ा राजा नही था ,इसीलिए बंगाल से लपके हुए पाल नृपति चले आये | लेकिन कुछ ही दिनों बाद प्रतिहारो ने उन्हें खदेड़ दिया और स्वंय 150 वर्ष के लिए यहा जम गये | कन्नौज से इत्र की दूकान लेकर गाह्डवाले भी एक बार आये थे | मध्य प्रदेश से दुधिया छानने के लिए कलचुरीवाले भी आये थे |कलचुरियो का एक साइनबोर्ड कर्दमेश्वर मंदिर में है | यह मंदिर यंहा 'कनवा 'ग्राम में है | यही बनारस का सबसे पुराना मंदिर है | इसके अलावा जितने मंदिर है सब तीन सौ वर्ष के भीतर बने हुए है |

वाराणसी से बनारस

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अब तक विदेशी आक्रमक के रूप में वाराणसी में कनिष्क आया था | जिस समय कलचुरी वंश के राजा गांगेय कुम्भ नहाने प्रतिष्ठान गये हुए थे ,ठीक उसी समय नियालतगिन चुपके से आया और यहा से कुछ रकम चुराकर भाग गया | नियालतगिन के बाद जितने विदेशी आक्रमक आये उन सबकी अधिक कृपा मंदिरों पर ही हुई | लगता है इन लोगो ने इसके पूर्व इतना उंचा मकान नही देखा था | देखते भी कैसे ? सराय में ही अधिकतर ठरते थे जो एक मंजिल से ऊँची नही होती थी | यहा के मंदिर उनके लिए आश्चर्य की वस्तु रहे | उनका ख्याल था की इतने बड़े महल में शहर के सबसे बड़े रईस रहते है ,इसलिए उन्हें गिराकर लूटना अपना कर्तव्य समझा | नियालतगिन के बाद सबसे जबर्दस्त लुटेरा मुहम्मद गौरी सन 1914 ई. में बनारस आया | उसकी मरम्मत पृथ्वीराज पांच -छ बार कर चुके थे ,पर जयचंद के कारण उसका शुभागमन बनारस में हुआ | नतीजा यह हुआ की उस खानदान का नामोनिशान हमेशा के लिए मिट गया | सन 1300 ई ,में अलाउद्धीन खिलजी आया | उसके बाद उसका दामाद बाबर्कशाह आया ,जिसे 'काला पहाड़ ' भी कहा गया है |सन 1494 ई. में सिकन्दर लोदी साहब आये और बहुत कुछ लाद ले गये | जहागीर ,शाहजहा और औरंगजेब की कृपा इस शहर पर हो चूकि है | फरुखासियर और ईस्ट इंडिया कम्पनी की याद अभी ताजा है | पता नही ,इन लोगो ने बनारस को लुटने का ठेका क्यों ले रखा था ? लगता है ,उन्हें लुटने की यह प्रेरणा स्वनामधन्य लुटेरे महमूद गजनबी से प्राप्त हुई थी | संभव है, उन दिनों बनारस में काफी मालदार लोग रहा करते थे अथवा ये लोग बहुत उत्पाती और खतरनाक रहे हो |इसके अलावा यह संभव है की बनारस वाले इतने कमजोर रहे की जिसके में आया वही दो धौल जमाता गया | खैर कारण चाहे जो कुछ भी रहे हो बनारस को लुटा खूब गया है ,इसे धार्मिक और इतिहास के पंडित दोनों ही मानते है | बनारस को लुटने की यह परम्परा फरुखसियर के शासनकाल तक बराबर चलती रही |इन आक्रमणों में कुछ लोग यहा बस गये | उन्हें वाराणसी नाम श्रुतिकटु लगा ,फलस्वरूप वाराणसी नाम घिसते -घिसते बनारस बन गया |जिस प्रकार रामनगर को आज भी लोग नामनगर कहते है | मुगलकाल में इसका नाम बनारस ही रहा |


बनारस बनाम मुहम्मदाबाद

औरंगजेब जरा ओरिजनल टाइप शासक था | सबसे अधिक कृपा उसकी इस नगर पर हुई | उसे बनारस नाम बड़ा विचित्र लगा | कारण बनारस में न तो कोई रस बनता था और न यहा के लोग रसिक रह गये थे | औरंगजेब के शासनकाल में इसकी हालत अत्यंत खराब हो गयी थी | फलस्वरूप उसने इसका नाम मुहम्मदाबाद रख दिया |

मुहम्मदाबाद से बनारस

मुगलिया सल्तनत भी 1857 के पहले उखड़ गयी | नतीजा यह हुआ की सात समुन्द्र सत्तर नदी और सत्ताईस देश पार कर एक हकीम शाहजहा के शासनकाल में आया था ,उसके वंशधरो ने इस भूमि को लावारिस समझकर अपनी सम्पत्ति बना ली | पहले कम्पनी आई ,फिर यहा की मालिकन रानी बनी | रानी के बारे में कुछ रामायण प्रेमियों को कहते सुना गया है की वह पूर्व जन्म में त्रिजटा थी | संभव है उनका विश्वास ठीक हो |ऐसी हालत में यह मानना पडेगा की ये लोग पूर्व जन्म में लंका में रहते थे अथवा बजरंगबली की सेना में लेफ्ट -राईट करते रहे होंगे | गौरांग प्रभुओ की 'कृपा से ' हमने रेल ,हवाई जहाज ,स्टीमर ,मोटर ,साइकिल देखा | डाक -तार ,कचहरी और जमीदारी के झगड़े देखे | यहा से विदेशो में कच्चा माल भेजकर विदेशो से हजारो अपूर्व सुन्दरिया मंगवाकर अपनी नस्ल बदल डाली |

ये लोग जब बनारस आये तब इन्होने देखा --यहा के लोग बड़े अजीब हैं | हर वक्त गहरे में छानते है ,गहरेबाजी करते है और बातचीत भी फराटे के साथ करते है | कहने का मतलब हर वक्त रेस करते है |नतीजा यह हुआ की उन्होंने इस शहर का नाम 'बेनारेस' रख दिया |

बनारस से पुन:वाराणसी

ब्राह्मणों को सावधान करने वाले आर्यों की आदि भूमि का पता लगानेवाले डाक्टर सम्पूर्णानन्द को यह टेढा नाम पसंद नही था | बहुत दिनों से इसमें परिवर्तन करना चाहते थे पर मौक़ा नही मिल रहा था |लगे हाथ बुद्ध की 2500 वी. जयंती पर इसे वाराणसी कर दिया | यद्धपि इस नाम पर काफी बमचख मची ,पर जिस प्रकार संयुक्त प्रांत से उत्तर प्रदेश बन गया ,उसी प्रकार अब बनारस से वाराणसी बनता जा रहा है |

भविष्य में क्या होगा ?

भविष्य में वाराणसी रहेगा या नही ,कौन जाने | प्राचीनकाल की तरह पुन:वाराणसी नाम पर साफा -पानी होता रहे तो बनारस बन ही जाएगा इसमें कोई संदेह नही | जिन्हें वाराणसी बुरा लगता हो उन्हें यह श्लोक याद रखना चाहिए ---------

ख़ाक भी जिस जमी का पारस है ,

शहर मशहूर यही बनारस है |

पांचवी शताब्दी में बनारस की लम्बाई आठ मील और चौड़ाई तीन मील के लगभग थी | सातवी शताब्दी आते -आते नौ -साढे नौ मील लम्बाई और तीन -साढे तीन मील चौड़ाई हो गयी |

ग्यारहवी शताब्दी में ,न जाने क्यों इसका क्षेत्रफल पांच मील में हो गया | इसके बाद 1881 ई. में पूरा जिला एक हजार वर्ग मील में हो गया | अब तो वरुणा -अस्सी की सीमा तोडकर यह आगे बढती जा रही है ; पता नही रबड़ की भाति इसका घेरा कहा तक फ़ैल जाएगा | आज भी यह माना जाता है की गंगा के उस पार मरने वाला गधा योनी में जन्म लेते है ,जिसके चश्मदीद गवाह शरच्चन्द्र चटर्जी थे | लेकिन अब उधर की सीमा को यानी मुगलसराय को भी शहर बनारस में कर लेने की योजना बन रही है | अब हम मरने पर किस योनी में जन्म लेंगे ,इसका निर्णय शीघ्र होना चाहिए ,वरना इसके लिए आन्दोलन -सत्याग्रह छिड़ सकता है | बनारस में शहरी क्षेत्र उतना ही माना जाता है जहा की नुक्कड़ पर उसके गण अर्थात चुंगी अधिकारी बैठकर आने -जाने वालो की गठरी टटोला करते है | इस प्रकार अब बनारस शीघ्र ही मेयर के अधिकार में आ जाएगा |

सुनील दत्ता ... कबीर......

.साभार विश्वनाथ मुखर्जी की पुस्तक ""बना रहे बनारस से ""