मंगलवार, 29 मई 2012

media research / आचंलिक पत्रकारिता

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  हिंदी पत्रकारिता 2011-12
  भारतीय जनसंचार संस्थान












  आंचलिक (ग्रामीण) पत्रकारिता के पहलु
 देश की बहुसंख्यक  आम जनता को खुशहाल और शक्तिसंपन्न बनाने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, लेकिन दुख की बात यह है जब भी हम किसी न्यूज चैनल और अखबारों को देखते हैं तो काफी आश्चर्य होता है। ऐसा लगता है कि पत्रकारिता अभी तक मुख्य रूप से महानगरों और सत्ता के गलियारों में घूमता नजर आ रहा है। खासकर राजनेताओं के दौरों की कवरेज को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों को प्रमुखता मिल पाती है नहीं तो किसी बड़ी आपदा या व्यापक हिंसा के कारण मीडिया जगत को ग्रामीण क्षेत्रों की याद आती है। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार किसानों की बढ़ती आत्महत्या, गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मीडिया कवर नहीं मिल पाने से ग्रामीण लोग पत्रकारिता का लाभ नहीं उठा पाते है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली और केबल व्यवस्था नहीं होने के कारण लोगों के पास संचार का एक मात्र माध्यम रेडियो रह गया है
आज पत्रकारिता का मूल मकसद है, मुनाफा कमाना। मुनाफा शहरी लोगों के बीच से होकर जाता है, आज पत्रकारिता कॉरपोरेट और शहरी लोगों का बनकर रह गया है। भारतीय पत्रकारिता में किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं के लिए कोई जगह नहीं रह गया है। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार किसानों की बढ़ती आत्महत्या, गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मीडिया कवर नहीं मिल पाने से ग्रामीण लोग पत्रकारिता का लाभ नहीं उठा पाते है। टी.वी. चैनलों और बड़े अख़बारों की सीमा यह है कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में अपने संवाददाताओं को स्थायी रूप से तैनात नहीं कर पाते है। कुल मिलाकर, ग्रामीण पत्रकारिता की जो भी झलक विभिन्न समाचार माध्यमों में आज मिल पाती है, उसका श्रेय अधिकांशत: जिला मुख्यालयों में रहकर अंशकालिक रूप से काम करने वाले अप्रशिक्षित पत्रकारों को जाता है। आखिर देश की 80 प्रतिशत जनता जिनके बलबूते पर हमारे यहाँ सरकारें बनती हैं, जिनके नाम पर सारी राजनीति की जाती हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक योगदान करते हैं, उन्हें पत्रकारिता की मुख्य धारा में लाया ही जाना चाहिए। मीडिया को नेताओं, अभिनेताओं और बड़े खिलाड़ियों के पीछे भागने की बजाय उसे आम जनता की तरफ रुख़ करना चाहिए, जो गाँवों में रहती है, जिनके दम पर यह देश और उसकी सारी व्यवस्था चलती है। 

आजादी के बाद जो ह्रास  राजनीति का हुआ, वहीं पत्रकारिता का भी हुआ है। हम गाँव से आये लेकिन गाँव को भूलते चले गये। लेकिन जिस प्रकार 'ग्रामीण पत्रकारिता’ को उभर कर आना चाहिये, नहीं आया है। गाँव की समस्याओं को सुलझाने में क्या मिलने वाला  है। शहर में शान है, शोहरत है, पैसे हैं। लेकिन गाँव में खबरें हैं। यह बहुत दुखद घटना है।
गाँवों के देश  भारत में, जहाँ लगभग 80% आबादी ग्रामीण इलाक़ों में रहती है, देश की बहुसंख्यक आम जनता को खुशहाल और शक्तिसंपन्न बनाने में पत्रकारिता की निर्णायक भूमिका हो सकती है। लेकिन विडंबना की बात यह है कि अभी तक पत्रकारिता का मुख्य फोकस सत्ता की उठापठक वाली राजनीति और कारोबार जगत की ऐसी हलचलों की ओर रहा है, जिसका आम जनता के जीवन-स्तर में बेहतरी लाने से कोई वास्तविक सरोकार नहीं होता। पत्रकारिता अभी तक मुख्य रूप से महानगरों और सत्ता के गलियारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। ग्रामीण क्षेत्रों की ख़बरें समाचार माध्यमों में तभी स्थान पाती हैं जब किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा या व्यापक हिंसा के कारण बहुत से लोगों की जानें चली जाती हैं। ऐसे में कुछ दिनों के लिए राष्ट्रीय कहे जाने वाले समाचार पत्रों और मीडिया जगत की मानो नींद खुलती है और उन्हें ग्रामीण जनता की सुध आती जान पड़ती है। खासकर बड़े राजनेताओं के दौरों की कवरेज के दौरान ही ग्रामीण क्षेत्रों की ख़बरों को प्रमुखता से स्थान मिल पाता है। फिर मामला पहले की तरह ठंडा पड़ जाता है और किसी को यह सुनिश्चित करने की जरूरत नहीं होती कि ग्रामीण जनता की समस्याओं को स्थायी रूप से दूर करने और उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए किए गए वायदों को कब, कैसे और कौन पूरा करेगा।
सूचना में शक्ति  होती हैं। हाल ही में सूचना  का अधिकार अधिनियम, 2005 के जरिए नागरिकों को सूचना के अधिकार से लैस करके उन्हें शक्ति-संपन्न बनाने का प्रयास किया गया है। लेकिन जनता इस अधिकार का व्यापक और वास्तविक लाभ पत्रकारिता के माध्यम से ही उठा सकती है, क्योंकि आम जनता अपने दैनिक जीवन के संघर्षों और रोजी-रोटी का जुगाड़ करने में ही इस क़दर उलझी रहती है कि उसे संविधान और कानून द्वारा प्रदत्त अधिकारों का लाभ उठा सकने के उपायों को अमल में लाने की चेष्टा करने का अवसर ही नहीं मिल पाता।
ग्रामीण क्षेत्रों  में अशिक्षा, गरीबी और परिवहन व्यवस्था की बदहाली की वजह से समाचार पत्र-पत्रिकाओं का लाभ सुदूर गाँव-देहात की जनता नहीं उठा पाती। बिजली और केबल कनेक्शन के अभाव में टेलीविज़न भी ग्रामीण क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाता। ऐसे में रेडियो ही एक ऐसा सशक्त माध्यम है जो सुगमता से सुदूर गाँवों-देहातों में रहने वाले जन-जन तक बिना किसी बाधा के पहुँचता है। रेडियो आम जनता का माध्यम है और इसकी पहुँच हर जगह है, इसलिए ग्रामीण पत्रकारिता के ध्वजवाहक की भूमिका रेडियो को ही निभानी पड़ेगी। रेडियो के माध्यम से ग्रामीण पत्रकारिता को नई बुलंदियों तक पहुँचाया जा सकता है और पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए आयाम खोले जा सकते हैं। इसके लिए रेडियो को अपना मिशन महात्मा गाँधी के ग्राम स्वराज्य के स्वप्न को साकार करने को बनाना पड़ेगा और उसको ध्यान में रखते हुए अपने कार्यक्रमों के स्वरूप और सामग्री में अनुकूल परिवर्तन करने होंगे। निश्चित रूप से इस अभियान में रेडियो की भूमिका केवल एक उत्प्रेरक की ही होगी। रेडियो एवं अन्य जनसंचार माध्यम सूचना, ज्ञान और मनोरंजन के माध्यम से जनचेतना को जगाने और सक्रिय करने का ही काम कर सकते हैं। लेकिन वास्तविक सक्रियता तो ग्राम पंचायतों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले पढ़े-लिखे नौजवानों और विद्यार्थियों को दिखानी होगी। इसके लिए रेडियो को अपने कार्यक्रमों में दोतरफा संवाद को अधिक से अधिक बढ़ाना होगा ताकि ग्रामीण इलाक़ों की जनता पत्रों और टेलीफोन के माध्यम से अपनी बात, अपनी समस्या, अपने सुझाव और अपनी शिकायतें विशेषज्ञों तथा सरकार एवं जन-प्रतिनिधियों तक पहुँचा सके। खासकर खेती-बाड़ी, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार से जुड़े बहुत-से सवाल, बहुत सारी परेशानियाँ ग्रामीण लोगों के पास होती हैं, जिनका संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञ रेडियो के माध्यम से आसानी से समाधान कर सकते हैं। रेडियो को “इंटरेक्टिव” बनाकर ग्रामीण पत्रकारिता के क्षेत्र में वे मुकाम हासिल किए जा सकते हैं जिसे दिल्ली और मुम्बई से संचालित होने वाले टी.वी. चैनल और राजधानियों तथा महानगरों से निकलने वाले मुख्यधारा के अख़बार और नामी समाचार पत्रिकाएँ अभी तक हासिल नहीं कर पायी हैं।
टी.वी. चैनलों और बड़े अख़बारों की सीमा यह है कि वे ग्रामीण क्षेत्रों  में अपने संवाददाताओं और छायाकारों को स्थायी रूप  से तैनात नहीं कर पाते।  कैरियर की दृष्टि से कोई सुप्रशिक्षित पत्रकार ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र बनाने के लिए ग्रामीण इलाक़ों में लंबे समय तक कार्य करने के लिए तैयार नहीं होता। कुल मिलाकर, ग्रामीण पत्रकारिता की जो भी झलक विभिन्न समाचार माध्यमों में आज मिल पाती है, उसका श्रेय अधिकांशत: जिला मुख्यालयों में रहकर अंशकालिक रूप से काम करने वाले अप्रशिक्षित पत्रकारों को जाता है, जिन्हें अपनी मेहनत के बदले में समुचित पारिश्रमिक तक नहीं मिल पाता। इसलिए आवश्यक यह है कि नई ऊर्जा से लैस प्रतिभावान युवा पत्रकार अच्छे संसाधनों से प्रशिक्षण हासिल करने के बाद ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र बनाने के लिए उत्साह से आगे आएँ। इस क्षेत्र में काम करने और कैरियर बनाने की दृष्टि से भी अपार संभावनाएँ हैं। यह उनका नैतिक दायित्व भी बनता हैं।
आखिर देश  की 80 प्रतिशत जनता जिनके बलबूते पर हमारे यहाँ सरकारें बनती हैं, जिनके नाम पर सारी राजनीति की जाती हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक योगदान करते हैं, उन्हें पत्रकारिता के मुख्य फोकस में लाया ही जाना चाहिए। मीडिया को नेताओं, अभिनेताओं और बड़े खिलाड़ियों के पीछे भागने की बजाय उस आम जनता की तरफ रुख़ करना चाहिए, जो गाँवों में रहती है, जिनके दम पर यह देश और उसकी सारी व्यवस्था चलती है।
पत्रकारिता  जनता और सरकार के बीच, समस्या और समाधान के बीच, व्यक्ति और समाज के बीच, गाँव और शहर की बीच, देश और दुनिया के बीच, उपभोक्ता और बाजार के बीच सेतु का काम करती है। यदि यह अपनी भूमिका सही मायने में निभाए तो हमारे देश की तस्वीर वास्तव में बदल सकती है।
सरकार जनता के हितों के लिए तमाम कार्यक्रम  बनाती है; नीतियाँ तैयार करती है; कानून बनाती है; योजनाएँ शुरू करती है; सड़क, बिजली, स्कूल, अस्पताल, सामुदायिक भवन आदि जैसी मूलभूत अवसंरचनाओं के विकास के लिए फंड उपलब्ध कराती है, लेकिन उनका लाभ कैसे उठाना है, उसकी जानकारी ग्रामीण जनता को नहीं होती। इसलिए प्रशासन को लापरवाही और भ्रष्टाचार में लिप्त होने का मौका मिल जाता है। जन-प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद जनता के प्रति बेखबर हो जाते हैं और अपने किए हुए वायदे जान-बूझकर भूल जाते हैं।
ज्ञान-विज्ञान  के क्षेत्र में नई-नई ख़ोजें होती रहती हैं; शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में नए-नए द्वार खुलते रहते हैं; स्वास्थ्य, कृषि और ग्रामीण उद्योग के क्षेत्र की समस्याओं का समाधान निकलता है, जीवन में प्रगति करने की नई संभावनाओं का पता चलता है। इन नई जानकारियों को ग्रामीण जनता तक पहुँचाने के लिए तथा लगातार काम करने के लिए उन पर दबाव बढ़ाने, प्रशासन के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार को उजागर करने, जनता की सामूहिक चेतना को जगाने, उन्हें उनके अधिकारों और कर्त्तव्यों का बोध कराने के लिए पत्रकारिता को ही मुस्तैदी और निर्भीकता से आगे आना होगा। किसी प्राकृतिक आपदा की आशंका के प्रति समय रहते जनता को सावधान करने, उन्हें बचाव के उपायों की जानकारी देने और आपदा एवं महामारी से निपटने के लिए आवश्यक सूचना और जानकारी पहुँचाने में जनसंचार माध्यमों, खासकर रेडियो की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।
पत्रकारिता  आम तौर पर नकारात्मक विधा मानी जाती है, जिसकी नज़र हमेशा नकारात्मक पहलुओं पर रहती है, लेकिन ग्रामीण पत्रकारिता सकारात्मक और स्वस्थ पत्रकारिता का क्षेत्र है। भूमण्डलीकरण और सूचना-क्रांति ने जहाँ पूरे विश्व को एक गाँव के रूप में तबदील कर दिया है, वहीं ग्रामीण पत्रकारिता गाँवों को वैश्विक परिदृश्य पर स्थापित कर सकती है। गाँवों में हमारी प्राचीन संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान की विरासत, कला और शिल्प की निपुण कारीगरी आज भी जीवित है, उसे ग्रामीण पत्रकारिता राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर ला सकती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ यदि मीडिया के माध्यम से धीरे-धीरे ग्रामीण उपभोक्ताओं में अपनी पैठ जमाने का प्रयास कर रही हैं तो ग्रामीण पत्रकारिता के माध्यम से गाँवों की हस्तकला के लिए बाजार और रोजगार भी जुटाया जा सकता है। ग्रामीण किसानों, घरेलू महिलाओं और छात्रों के लिए बहुत-से उपयोगी कार्यक्रम भी शुरू किए जा सकते हैं जो उनकी शिक्षा और रोजगार को आगे बढ़ाने का माध्यम बन सकते हैं।
इसके लिए  ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी सृजनकारी भूमिका को पहचानने  की जरूरत है। अपनी अनन्त  संभावनाओं का विकास करने एवं नए-नए आयामों को खोलने  के लिए ग्रामीण पत्रकारिता को इस समय प्रयोगों और चुनौतियों  के दौर से गुजरना होगा।
 ईमानदारी से न्याय  प्रिय, कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारिता की बात कर स्वस्थ समाज के निर्माण के समर्थक हैं। समाज की हर समस्या पर लगभग रोज समाचार प्रकाशित होते हैं। फिर भी पत्रकारों की समस्याओं को छापने के लिए अखबारों में स्थान क्यों नहीं मिलता। ग्लैमर वाली इस पत्रकारिता की दुनिया पर चर्चा करें। तो इसमें ग्रामीण पत्रकारिता उसी तरह है जिस प्रकार शहरी जीवन और ग्रामीण जीवन है। यहाँ के पत्रकारों के लिए सुविधाओं और साधनों का टोटा है। जो पत्रकारिता जगत में थोड़ी भी पहचान बनाने में कामयाब रहा वह शहर जाकर ही अपना कैरियर बनाता है। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छे पत्रकार नहीं टिक सके।
वास्तविकता भी है कि ग्रामीण स्तर पर अगर कोई दिमाग से तेज और धन से कमजोर व्यक्ति पत्रकारिता करना चाहे तो उसकी ऐसी सोच शेखचिल्ली का सपना भर साबित होगी। अगर किसी सक्षम परिवार का विचारवान व्यक्ति पत्रकारिता करना चाहे तो उसको अपने आप या बाप की गाढ़ी कमाई गंवाने पर ही ईमानदारी से पत्रकारिता करने को मिलेगी। यह किसी किताब में नहीं पढ़ा बिल्कुल हकीकत है। ऐसा कोई नहीं जो यश, पद, मान, सम्मान, वैभव ना चाहता हो। हालाँकि आज के समाज में ऐसे लोगों की तादात बहुत है,  जो इन सब चीजों को सिर्फ पैसे की दम पर अर्जित कर रहे हैं। आज पत्रकारिता चाहे ग्रामीण स्तर पर हो चाहे शहरी स्तर पर मिशन से प्रोफेशन में तब्दील हो रही है। पत्रकारिता जगत में बता दें कि जो ग्रामीण स्तर के पत्रकार हैं उनको अखबार के दफ्तरों में हाकर की संज्ञा से नवाजा जाता है। वह अपने सम्पादक के दर्शन को तरसते हैं। जो सम्पादक हैं उनको भी ग्रामीण पत्रकारों के प्रति खास दिलचस्पी नहीं। वह भी सिर्फ जिला प्रतिनिधि तक ही सीमिति रहते हैं। अब जिला प्रतिनिधि सिर्फ समाचार नहीं अखबार के समाचार, प्रसार व विज्ञापन का जिम्मेदार माना जा रहा है।
बड़े अखबारों में बता  दें कि ग्रामीण संवाददाता  को परिचय पत्र तक नहीं दिया जाता, जिस अखबार के लिए वह काम कर रहे हैं। उसके अधिकृत व्यक्ति हैं भी या नहीं इसका पता लगाने के लिए ब्यूरोचीफ से सम्पर्क कर ही जाना जा सकता है। पत्रकारों पर उंगली उठाने वालों मुझे बताइये यह सब क्या है?  ग्रामीण पत्रकार हौंसले से इस पत्रकारिता जगत में प्रवेश करते हैं। निराश होकर वापस होते हैं। क्यों शहर के पत्रकार पत्रकारिता क्षेत्र में जाकर तरक्की करते हैं। मैं अपने आसपास इलाके के कई ऐसे पत्रकारों को जानता हूं, जो बड़े हौंसले से इस क्षेत्र में आकर अलविदा कह गए। ऐसों को भी जानता हूं,  जिनकी जवानी अखबार के लिए खबर में गारद हो गई,  उनको आखिरी में अखबार से धक्का देकर फिर एक नौजवान को दौड़ में शामिल कर लिया गया। क्या यह शोषण नहीं पोषण है। जीवन के अमूल्य समय को पत्रकारिता में लगाने से क्या हासिल किया महज पहचान और सम्मान। इससे भइया रोजी रोटी नहीं चलने वाली।
मीडिया संस्थानों के लिए  ग्रामीण पत्रकार 'यूज एण्ड थ्रो माने सिर्फ निरोध' हैं। पत्रकारों के प्रवेश का न कोई सर्टिफिकेट है न निकास का इस्तीफा। बस धड़ाधड़ पत्रकार बनाओ, अखबार बिकवाओ, विज्ञापन वसूली कराओ जो विज्ञापन से इनकार कर दे उसके पीछे पड़कर मिशनरी पत्रकारिता छेड़ दो। इससे ऐसा लगता है कि पत्रकारिता अपने सिद्वान्त से हटी नहीं बल्कि सिद्वान्तों के विपरीत उसकी स्थापना हो गई है। आप ध्यान से यहाँ तक लेख पढ़ चुके हैं तो आप इसको अनुभव भी करते जाइए। अगर आप किसी ग्रामीण पत्रकार को जानते हों तो उससे भली भाँति पूछ सकते हैं। आपका कोई सम्पर्की प्रधान, कोटेदार, ठेकेदार, थानेदार हो तो उससे ग्रामीण पत्रकारों की चर्चा करके देखना,  अगर आपको बहुत अदब करता हो तो शायद आपको छोड़ दे, नहीं तो आपको उनके साथ भला बुरा कह जाएगा। उसकी वजह मुख्य होगी विज्ञापन। अखबार के दप्तर से अब ग्रामीण पत्रकारों पर विज्ञापन और प्रसार के लिए बहुत दबाव है। जो गलत कार्यों में संलिप्त हैं, उनसे मित्रता कर अखबार बढ़ाओ, विज्ञापन लाओ तभी सच्चे पत्रकार कहलाओ।
बुद्विजीवियों को ग्रामीण  पत्रकारिता में बदलाव लाने के लिए एक सार्थक प्रयास की पहल की जाय,  जिससे इन बेपैसों के नौकरों को आजादी मिल सके। अखबार में समाचार, प्रसार और विज्ञापन का दर्द जितना सम्पादक को होता है उससे अधिक ग्रामीण पत्रकार को दर्द पैदा किया जाता है। समाचार के संकलन से लेकर उसको दप्तर तक पहुँचाने में बड़ी ही मशक्कत करनी पड़ती है। क्या मिलता है बस 15प्रतिशत कमीशन विज्ञापन पर । कोटेदार और प्रधान की क्या जरूरत पड़ी जो वह विज्ञापन दे बस भयवश उनको पोट फुसलाकर और अखबार का भौकाल दिखाकर विज्ञापन लिया जाता है। अखबार में विज्ञापन का पैसा जमा करने पर ग्रामीण पत्रकार को रशीद भी मुहैया नहीं होती। विज्ञापन छपवाने के लिए नकद रकम देनी पड़ती है। जिसकी कोई रशीद नहीं दी जाती,  जो जब छप आए बस ठीक है। अगर विज्ञापनदाता को लगा कि उसका विज्ञापन कम है तो इसकी शिकायत करता है, जिसमें उसका यह आरोप ग्रामीण पत्रकार को झेलना पड़ता है। इस तरह समाजसेवा के पथ पर विचरण कर रहे ग्रामीण पत्रकारों के पत्रकारिता की डगर बहुत कठिन है उसके बाद भी जैस- तैसे और कैसे भी इस क्षेत्र में ईमानदारी का परचम फहरा रहे हैं। वास्तव में वह हमारे आदर्श पत्रकारिता के शुभ चिन्तक हैं। रहस्यमयी ग्रामीण पत्रकारिता पर और भी तमाम अपने जीवन की कसौटी पर उतरने वाले कड़वे सच !!!!
पत्रकारिता का इतिहास
आज  जब हम हिन्दी पत्रकारिता की बात करते हैं तो यह जानकर  आश्चर्य होता है कि शुरूआती  दौर में यह ध्वज उन क्षेत्रों  में लहराया गया था जिन्हें  आज अहिन्दी भाषी कहा जाता है। कोलकाता का विश्वामित्र  ऐसा पहला ध्वज वाहक था।  उत्तर प्रदेश, बिहार और उन दिनों के सी.पी. बरार में भी अनेक हिन्दी अखबारों की शुरूआत हुई थी। लाहौर तो हिन्दी अखबारों का एक प्रकार से गढ बन गया था। इसका एक कारण शायद आर्यसमाज का प्रभाव भी रहा होगा। परंतु इन सभी अखबारों का कार्य क्षेत्र सीमित था या तो अपने प्रदेश तक या फिर कुछ जिलों तक। अंग्रेजी में जो अखबार उन दिनों निकलनी शुरू हुई उनको सरकारी इमदाद प्राप्त होती थी। वैसे भी यह अखबारें शासकों की भाषा में निकलती थीं इसलिए इनका रूतबा और रूआब जरूरत से ज्यादा था। चैन्नई का हिन्दू, कोलकाता का स्टेटसमैन मुम्बई का टाईम्स आफ इंडिया, लखनऊ का नेशनल हेराल्ड और पायोनियर, दिल्ली का हिन्दुस्तान टाईम्स और बाद में इंडियन एक्सप्रेस भी। ये सभी अखबार प्रभाव की दृष्टि से तो शायद इतने महत्वपूर्ण नहीं थे परंतु शासको की भाषा में होने के कारण इन अखबारों को राष्ट्रीय प्रेस का रूतबा प्रदान किया गया। जाहिर है यदि अंग्रेजी भाषा के अखबार राष्ट्रीय हैं तो हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के अखबार क्षेत्रीय ही कहलाएंगे। प्रभाव तो अंग्रजी अखबारों का भी कुछ कुछ क्षेत्रों में था परंतु आखिर अंग्रेजी भाषा का पूरे हिन्दुस्तान में नाम लेने के लिए भी अपना कोई क्षेत्र विशेष तो था नहीं। इसलिए अंग्रेजी अखबार छोटे होते हुए भी राष्ट्रीय कहलाए और हिन्दी के अखबार बड़े होते हुए भी क्षेत्रीयता का सुख-दुख भोगते रहे।

परंतु पिछले दो दशकों में ही हिन्दी अखबारों ने प्रसार और प्रभाव के क्षेत्र में जो छलांगे लगाई हैं वह आश्चर्यचकित कर देने वाली हैं। जालंधर से प्रारंभ हुई हिन्दी अखबार पंजाब केसरी पूरे उत्तरी भारत में अखबार न रहकर एक आंदोलन बन गई है। जालंधर के बाद पंजाब केसरी हरियाणा से छपने लगी उसके बाद धर्मशाला से और फिर दिल्ली से।

जहां तक पंजाब केसरी की मार का प्रश्न है उसने सीमांत राजस्थान और उत्तर प्रदेश को भी अपने शिकंजे में लिया है। दस लाख से भी ज्यादा संख्या में छपने वाला पंजाब केसरी आज पूरे उत्तरी भारत का प्रतिनिधि बनने की स्थिति में आ गया है ।

जागरण तभी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से छपता था और जाहिर है कि वह उसी में बिकता भी था परंतु पिछले 20 सालों में जागरण सही अर्थो में देश का राष्ट्रीय अखबार बनने की स्थिति में आ गया है। इसके अनेकों संस्करण दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, बिहार झारखंड, पंजाब, जम्मू कश्मीर, और हिमाचल से प्रकाशित होते हैं। यहां तक कि जागरण ने सिलीगुडी से भी अपना संस्करण प्रारंभ कर उत्तरी बंगाल, दार्जिलिंग, कालेबुंग और सिक्किम तक में अपनी पैठ बनाई है। 


अमर उजाला जो किसी वक्त उजाला से टूटा था, उसने पंजाब तक में अपनी पैठ बनाई । दैनिक भास्कर की कहानी पिछले कुछ सालों की कहानी है। पूरे उत्तरी और पश्चिमी भारत में अपनी जगह बनाता हुआ भास्कर गुजरात तक पहुंचा है। भास्कर ने एक नया प्रयोग हिन्दी भाषा के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशन शुरू कर किया है। भास्कर के गुजराती संस्करण ने तो अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। दैनिक भास्कर ने महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी नागपुर से अपना संस्करण प्रारंभ करके वहां के मराठी भाषा के समाचार पत्रों को भी बिक्री में मात दे दी है।

एक ऐसा ही प्रयोग जयपुर से प्रकाशित राजस्थान पत्रिका का कहा जा सकता है, पंजाब से पंजाब केसरी का प्रयोग और राजस्थान से राजस्थान पत्रिका का प्रयोग भारतीय भाषाओं की पत्रिकारिता में अपने समय का अभूतपूर्व प्रयोग है। राजस्थान पत्रिका राजस्थान के प्रमुख नगरों से एक साथ अपने संस्करण प्रकाशित करती है। लेकिन पिछले दिनों उन्होंने चेन्नई संस्करण प्रकाशित करके दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रयोग को लेकर चले आ रहे मिथको को तोड़ा है। पत्रिका अहमदाबाद सूरत कोलकाता, हुबली और बैंगलूरू से भी अपने संस्करण प्रकाशित करती है और यह सभी के सभी हिंदी भाषी क्षेत्र है। इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया मध्य भारत की सबसे बड़ा अखबार है जिसके संस्करण्ा अनेक हिंदी भाषी नगरों से प्रकाशित होते हैं।

यहां एक और तथ्य की ओर संकेत करना उचित रहेगा कि अहिंदी भाषी क्षेत्रों में जिन अखबारों का सर्वाधिक प्रचलन है वे अंग्रेजी भाषा के नहीं बल्कि वहां की स्थानीय भाषा के अखबार हैं। मलयालम भाषा में प्रकाशित मलयालम मनोरमा के आगे अंग्रेजी के सब अखबार बौने पड़ रहे हैं। तमिलनाडु में तांथी, उडिया का समाज, गुजराती का दिव्यभास्कर, गुजरात समाचार, संदेश, पंजाबी में अजीत, बंगला के आनंद बाजार पत्रिका और वर्तमान अंग्रेजी अखबार के भविष्य को चुनौती दे रहे हैं। यहां एक और बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड इत्यादि हिन्दी भाषी राज्यों में अंग्रेजी अखबारों की खपत हिंदी अखबारों के मुकाबले दयनीय स्थिति में है। अहिंदी भाषी क्षेत्रों की राजधानियों यथा गुवाहाटी भुवनेश्वर, अहमदाबाद, गांतोक इत्यादि में अंग्रेजी भाषा की खपत गिने चुने वर्गों तक सीमित है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि राजधानी में यह हालत है तो मुफसिल नगरों में अंग्रेजी अखबारों की क्या हालत होगी? इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। अंग्रेजी अखबार दिल्ली, चंडीगढ़, मुम्बई आदि उत्तर भारतीय नगरों के बलबूते पर खड़े हैं। इन अखबारों को दरअसल शासकीय सहायता और संरक्षण प्राप्त है। इसलिए इन्हें शासकीय प्रतिष्ठा प्राप्त है। ये प्रकृति में क्षेत्रिय हैं (टाइम्स ऑफ इंडिया के विभिन्न संस्करण इसके उदाहरण है।) मूल स्वभाव में भी ये समाचारोन्मुखी न होकर मनोरंजन करने में ही विश्वास करते हैं । लेकिन शासकीय व्यवस्था ने इनका नामकरण राष्ट्रीय किया हुआ है। जिस प्रकार अपने यहां गरीब आदमी का नाम कुबेरदास रखने की परंपरा है। जिसकी दोनों ऑंखें गायब हैं वह कमलनयन है। भारतीय भाषा का मीडिया जो सचमुच राष्ट्रीय है वह सरकारी रिकार्ड में क्षेत्रीय लिखा गया है। शायद इसलिए कि गोरे बच्चे को नजर न लग जाए माता पिता उसका नाम कालूराम रख देते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि इतिहास में क्रांतियाँ कालूरामों ने की हैं। गोरे लाल गोरों के पीछे ही भागते रहे हैं। अंग्रेजी मीडिया की नब्ज अब भी वहीं टिक-टिक कर रही है। रहा सवाल भारतीय पत्रकारिता के भविष्य का, उसका भविष्य तो भारत के भविष्य से ही जुड़ा हुआ है। भारत का भविष्य उज्जवल है तो भारतीय पत्रकारिता का भविष्य भी उज्ज्वल ही होगा। यहां भारतीय पत्रकारिता में हिंदी पत्रकारिता का समावेश भी हो जाता है।

बिहार की साहित्यिक पत्रकारिता साहित्य और साहित्यिकार 
पत्रकारिता शुरुआती दौर में एक मिशन के रूप में सामने आयी थी लेकिन आज बदलते बाजारवाद संस्कृति के बीच यह शुद्ध रूप से व्यवसाय बन चुका है। तब और अब की पत्रकारिता में काफी बदलाव आ चुका है। फिर भी पत्रकारिता की ताकत को कोई चुनौती नहीं दे सकता और भारतीय प्ररिपेक्ष में तो इसकी भूमिका को भुलायी नहीं जा सकती है। पत्रकार, साहित्यिकार, राजनेता, समाज सुधारक या यों कहे कि अभिव्यक्ति की लड़ाई में शरीक सभी ने इसे हथियार बना कर अपनी आवाज बुलंद की। पत्रकारिता में विविध आयाम शामिल हुये । हर विधा के पत्र-पत्रिकाओं का बड़े पैमाने पर प्रकाशन हुआ बल्कि आज भी हो रहा है।
राजनीतिक, सांस्कृतिक, भाषाई, जाति, धार्मिक, खेल, वैज्ञानिक पत्रकारिता एक ओर जहंा अपनी प्रखारता दिखा रही थी वहीं पर साहित्यक पत्रकारिता भी अछूती नहीं रही । शुरू से ही साहित्यिक पत्रकारिता पूरे तेवर के साथ निखरती रही। इस क्षेत्र में सर्वप्रथम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने 'कवि वचन सुधा`:१८६८: और 'हरिश्चन्द्र मैगजीन`:१८७३: पत्रों के माध्यम से जो यादगार काम किया वह बाद में विकसित होते- होते हिन्दी साहित्य के लिए यादगार क्षण बन गया। हांलाकि बाद में 'हरिश्चन्द्र मैगजीन` का नाम बदल कर 'हरिश्चन्द चन्द्रिका` कर दिया गया था, उन्हीं दिनों हरिश्चन्द्र के साहित्यिक अभियान को मेरठ के पंडित गौरीदत्त ने १८७४ में 'नागरी प्रकाश` पत्र संपादित कर आगे बढाया। बाद में उन्होंने ने 'देवनागरी गजट`:१८८८:, 'देवनागरी प्रचारक`:१८९२: और 'देवनागर`:१८१४: पत्रों का संपादन किया। प्रयाग के पंडित बालकृष्ण भट्ट ने १८७७ में 'हिन्दी प्रदीप` संपादित किया। इस पत्र ने भारतीय हिन्दी साहित्य के निमार्ण के क्षेत्र में अहम् भूमिका अदा की। इसबीच मिर्जापुर से पंडित बदरीनारायण चौधरी 'पे्रमघन` ने १८८१ में 'आनन्द कादम्बिनी` और कानपुर से पं. प्रतापनारायण मिश्र ने १८८३ में 'ब्राहमण` निकाल कर हिन्दी साहित्य की दिशा में ऐतिहासिक कार्य किया। एक ओर जहंा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी पत्रकारिता के लिये प्रयत्नशील थे वहीं पर, देश के अन्य भाग के साहित्यकार भी सक्रिय थे। कोलकत्ता के गोविंदनारायण मिश्र, दुर्गाप्रसाद मिश्र, छोटेलाल मिश्र, अमृत लाल चक्रवर्ती सरीखे कई साहित्यकार पत्रों के माध्यम से सक्रिय थे। 

जहंा तक साहित्यिक पत्रकारिता की यात्रा का सवाल है तो इसमें ''सरस्वती`` का स्थान अहम् है। नागरी प्रचारिणी सभा, काशी की ओर से यह १९०० में, राधाकृष्ण दास, कार्तिकप्रसाद खत्री, जगन्नाथ दास रत्नाकर, किशोरी लाल गोस्वामी और श्याम सुन्दर दास के संपादन में छपना शुरू हुआ। १९०३ में इसका संपादन आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के हाथों में चला गया। वहीं कोलकत्ता के शारदाचरण मित्र ने १९०७ में 'देवनागर` पत्र निकाल कर साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। जो शुरूआत 'सरस्वती` ने की वह निरंतर बढ़ता ही गया और देश भर में साहित्यिक पत्रकारिता के मद्देनजर पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। इनमें 'माधुरी`, 'सुधा`, :लखनउ:, 'श्रीशारदा`, पे्रमा` :जबलपुर:, 'लक्ष्मी` :गया:, 'प्रभा`:खण्डवा व कानपुर:,' प्रतिभा`:मुरादाबाद`,'मनोरमा`:प्रयाग`, 'ललिता`:मेरठ:, 'समालोचक`:जयपुर:, 'भारतोदय`:ज्वालापुर:, 'नवजीवन`:इन्दौर:, 'भारतेन्दु`:प्रयाग`, 'आर्यावर्त, हिन्दू पंच`, 'समन्वय`,'सरोज`:कोलकत्ता:,'चांद` :प्रयाग:, 'हंस`, 'हिमालय`, 'नई धारा`,'अवन्तिका`:पटना: आदि ने खासकर हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता को काफी आगे बढाया। हालांकि शुरूआती दौर में निकले पत्रों में भी साहित्यिक सामग्री को खास तरजीह दी जाती रही थी। इसकी वजह यह रही थी कि उस दौर के लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं के संपादक या फिर उसे निकालने वाले पत्रकार के साथ- साथ अच्छे साहित्यिकार भी थे।
जंहा तक बिहार का सवाल है तो यहंा पत्रकारिता की शुरुआत उर्दू पत्रों ने की। इसके साथ ही राज्य में अन्य भाषाई पत्रों के लिए रास्ते खुले, हालांकि इनका दौर काफी देर से शुरू हुआ। जहां १८१० में ही उर्दू का पहला पत्र ''साप्ताहिक उर्दू अखबार` मौलवी अकरम अली ने संपादित कर कोलकता से छपवाया, वहीं राज्य में अंग्रेजी और हिन्दी के पत्रों का दौर १८७२ में ''द बिहार हेराल्ड`` और ''बिहार बन्धु`` के प्रकाशन से शुरू हुआ। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पत्रकारिता के इस जन हथियार को जहां सामाजिक ,राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के मद्देनजर एक मिशन के तहत अंजाम दिया गया, वहीं भाषा, जाति और धर्म के पोषकों ने भी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन कर इसका इस्तेमाल किया है। हालांकि बहुत सारे पत्रों के संपादक विख्यात साहित्यकार तो रहे लेकिन राज्य में विशुद्ध साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का सिलसिला देर से चला। राज्य में हिन्दी पत्रकारिता हाथ से लिखी ''पाटलिपुत्र सौरभ`` से शुरू होने की बात कही तो जाती है, लेकिन इसकी प्रति उपलब्ध नहीं होने से बिहार का पहला हिन्दी पत्र कहना संभवत: उचित नहीं होगा। बिहार का पहला हिन्दी दैनिक 'सर्वहितैषी` पटना से बाबू महावीर प्रसाद के संपादन में शुरू हुआ। 

१८८० में पटना के बांकीपुर में खड़ग्विलास पे्रस की स्थापना के साथ ही राज्य में पत्रकारिता को एक दिशा मिली और साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में तेजी आयी। इसी क्रम में 'साहित्य`, 'लक्ष्मी`, 'श्रीशारदा`, 'कमला`, 'गंगा`, 'बिजली`, 'आरती`, 'अवंतिका`, 'हिमालय` और 'चित्रेतना` जैसी शुद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन बिहार से हुआ।
१९३४ में प्रफुल्लचंद ओझा 'मुक्त` के संपादन में साहित्यिक मासिक 'आरती` का प्रकाशन हुआ। 'आरती` के बंद होने पर मुक्त जी ने एक दूसरी पत्रिका १९३५ में पटना से 'बिजली` निकाली। हालांकि यह भी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पायी। हिन्दी साहित्य सम्मेलन की त्रैमासिक पत्रिका 'साहित्य` इसी समय निकली। इसमें गम्भीर लेख और आलोचनाएं छपती थीं। यह पूरी तरह से साहित्यिक पत्रिका थी। बिहारशरीफ से १९३६ में 'नालन्दा` और १९३८ में पटना से 'जन्मभूमि` प्रकाशित हुई जो शुद्ध रूप से साहित्य से जुड़ी थीं। 'नालन्दा` एकाध साल चली। वहीं 'जन्मभूमि दो-तीन माह ही चल पायी। बिहार से निकलने वाली साहित्यिक पत्रों में 'गंगा`, 'माधुरी`, 'जागरण`, 'हिमालय` का संपादन आचार्य शिवपूजन सहाय जी ने किया।
१९५२ में अखिल भारतीय शोध मंडल से शिवचंद्र शर्मा के संपादन में 'दृष्टिकोण` छपा। इसी वर्ष १९५२ में नरेश के संपादन में मासिक 'प्रकाश` आया, जिसने हिन्दी साहित्य में प्रपद्यवाद की आधारशिला रखी। १९५४ में 'कविता` प्रकाशित हुई। १९७३ में प्रो. केसरी कुमार के संपादन में मासिक 'चित्रेतना` छपी। 

बिहार से अब तक बहुत सारे साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो चुका है और हो रहा है। इनमें कई बंद हुए तो उनकी जगह दूसरों ने ली और ऐसे में यहंा साहित्यिक पत्रकारिता जारी रही है। बिहार की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास में पटना से प्रकाशित हो रही ''नई धारा`` का विशेष स्थान है। बिहार से सबसे लम्बे समय से लगातार प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका को एक अप्रैल १९५० में पटना से साहित्यिकार राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह के पुत्र उदय राज सिंह ने शुरू किया। तब इसका संपादन विख्यात साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने किया था। उसके बाद इसके संपादकों में उदयराज सिंह, गोविन्द मिश्र, कमलेश्वर, विजयमोहन सिंह आदि चर्चित साहित्यकार रहे। फिलवक्त, विगत १२-१३ वर्षों से कवि-समालोचक डॉ.शिवनारायण के संपादन में पूरे तेवर के साथ प्रकाशित हो रही है। अमूमन साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं कुछ साल तक छपने के बाद बंद हो जाती हैं। लेकिन 'नई धारा` के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ।
अशोक पे्रस और 'नई धारा` को स्थापित करवाने में शिवपूजन जी की अहम भूमिका रही। वे प्रख्यात साहित्यकार राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह के साहित्यकार पुत्र उदयराज जी के पास एक पे्रस खोलने का प्रस्ताव लेकर आए थे, जिसे उन्होंने मान लिया और १५ जनवरी १९४७ को पटना में 'अशोक पे्रस` का उद्घाटन हुआ। पे्रस की नींव राजा साहब की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए पड़ी थी। लेकिन बिहार के लेखकों की किताबें भी छपती रही। इसी बीच 'नई धारा` निकालने की योजना बनी और बेनीपुरी जी के संपादन में १९५० में 'नई धारा` शुरू हो गई। 

'नई धारा` के जरिये कई नये रचनाकार सामने आये। हिन्दी के विख्यात साहित्यकारों के अलावे विदेशी लेखकों की रचनाएं भी प्रमुखता से छपती रहीं। नई धारा में ''बर्नांर्ड शॉ अंक`` छपा तो मैक्सिम गोर्की की रचनाओं को भी प्राथमिकता दी गयी। नये पुराने कवियों को इसमें उचित स्थान मिला।
नई धारा के कई चर्चित अंक निकले जिनमें ''बर्नांर्ड शॉ अंक`` जनवरी१९५१, ''रंगमंच अंक`` अपैल-मई १९५२, ''स्वतन्त्रता दिवस विषेशंाक`` अगस्त १९५८, ''नलिन अंक`` नवम्बर-दिसम्बर १९६१, ''शिवपूजन सहाय स्मृति अंक`` अपै्रल-जुलाई १९६३, ''नई कहानी अंक``, समांतर कहानी अंक, ''समकालीन कहानी विशेषांक`` फरवरी-मार्च १९६६, '' बेनीपुरी स्मृति अंक`` अप्रैल-अगस्त १९६९ ,''राजा राधिकारमण स्मृति अंक`` जून-अक्टूबर १९७०, ''आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा स्मृति अंक`` दिसम्बर १९९२-जनवरी १९९३, ''अर्द्ध्रशती विशेषांक`` दिसम्बर १९९९-मार्च२०००, ''स्मृति शेष उदयराज सिंह -श्रद्धांजलि अंक`` जून-सितम्बर २००४,''उदयराज स्मृति अंक`` अक्टूबर-नवम्बर २००४, ''सुभद्रा कुमारी चौहान जन्मशती अंक`` फरवरी-मार्च २००५, ''व्यंग्य विशेषांक`` अगस्त-सितम्बर २००५ प्रमुख हैं।
विशेषांकों को लेकर नई धारा शुरू से ही चर्चित रहा है। इसका पहला विशेषांक जनवरी १९५१ में प्रख्यात नाटककार बर्नाड शॉ पर निकला था। जिसमें शॉ की लेखनी से कई आलेख तो छपे ही थे, शॉ के नाटक और नाट्य शिल्प के तमाम पहलू पर उनके विचारों को भी समेटा गया। आलेखों में डा. विश्वनाथ प्रसाद ने शॉ की कला, गोपीकृष्ण प्रसाद ने शॉ औेर समाजवाद और जगन्नाथ प्रसाद मिश्र ने शॉ के नाटकों पर प्रकाश डाला। अगले वर्ष अप्रैल-मई १९५२ में 'रंग मंच विशेषांक निकला। इसमें भारतीय रंगमंच की दशा और दिशा पर दो दर्जन से ज्यादा आलेख प्रकाशित हुए। इसमें मराठी, तेलगु, राजस्थानी, बंगला, गुजराती रंगमंच के अलावा भरत मुनि के नाट्यशास्त्र और शेक्सपीयर पर रोचक आलेखों को समावेशित किया गया। अगस्त १९५८ में नई धारा का ''स्वतन्त्रता दिवस विशेषांक`` निकला, जिसमें देश के जाने माने लेखकों समेत पूर्व राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद व पूर्व प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू ने देशभक्ति का अलख जगाते हुए लेख लिखे। 

प्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य नलिन विलोचन शर्मा जी पर विशेष ''नलिन स्मृति अंक``, नवम्बर-दिसम्बर १९६१ में निकला। इसमें नलिन जी की साहित्य साधना व यात्रा और उनके व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुए उस दौर के करीब अस्सी चर्चित साहित्यकारांे द्वारा नलिन जी पर लिखे आलेख को प्राथमिकता दी गई। १९६३ में आचार्य शिवपूजन सहाय को लेकर ''शिवपूजन स्मृति अंक`` निकला। इस अंक में शिवपूजन जी पर करीब सौ रचनाएं छपीं। फरवरी-मार्च १९६६ का अंक अतिथि संपादक गोविंद मिश्र के संपादन में '' समकालीन कहानी विशेषांक`` के रूप में आया। राजेन्द्र यादव, रघुवीर सहाय, हरिशंकर परसाई, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती समेत कई चर्चित साहित्यकारों की रचनाओं को प्रमुखता से स्थान दिया गया। यह अंक काफी चर्चित हुआ, इसी के जवाब में नई धारा का 'समानान्तर कहानी` पर एक अंक ,कमलेश्वर के संपादन में आया। प्रख्यात साहित्यकार-पत्रकार रामवृक्ष बेनीपुरी जी पर नई धारा ने अपै्रल-अगस्त १९६९ में ''बेनीपुरी स्मृति अंक`` निकाला। इसमें 'बेनीपुरी जी की लेखनी से` के अलावे उनकी साहित्य-पत्रकारिता के योगदान को करीब एक सौ आलेखोें के माध्यम से समेटा गया। इनके अलावा नई धारा ने जून-अक्टूबर १९७० में ''राजा राधिकारमण स्मृति अंक``, दिसम्बर-जनवरी १९९३ में आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा स्मृति, जून-सितम्बर २००४ में 'उदयराज सिंह स्मृति शेष-श्रद्धांजलि अंक`, अक्टूबर-नवम्बर २००४ में ''उदयराज स्मृति अंक``, फरवरी-मार्च २००५ में सुभद्रा कुमारी चौहान-जन्मशती अंक`` और फरवरी-मार्च २००५ में ''भारतीय व्यंग्य विशेषांक`` प्रकाशित हुआ।
नई धारा ने जहां पुराने लेखकों को सम्मान दिया, वहीं नवलेखकों को भी वह प्रमुखता से स्थान देता रहा है। 'नई धारा` में प्रकाशित होने वाले प्रख्यात साहित्यकारों में महाकवि निराला, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर`, कविवर आरसी प्रसाद सिंह, जनार्दन झा द्विज, केदारनाथ मिश्र प्रभात, कविवर रामगोपाल रूद्र, जनकवि कन्हैया, कविवर श्याम नन्दन किशोर, धर्मवीर भारती, शैलेश मटियानी, ब्रजकिशोर नारायण, पोद्दार रामावतार अरूण, व्योहार राजेन्द्र सिंह, अवधेन्द्र देव नारायण, मुरलीधर श्रीवास्तव, भूपेन्द्र अवोध, कविवर हरिवंश राय बच्चन, डा. वचनदेव कुमार, मोहन लाल महतो वियोगी, राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, डा. प्रभाकर माचवे, आचार्य देवेंद्र नाथ शर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य शिवपूजन सहाय, प्रो. कपिल, महादेवी वर्मा, माखन लाल चदुवेर्दी, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, सुमित्रानन्दन पंत, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, जगदीश चन्द्र माथुर, उपेन्द्रनाथ अश्क, उदय शंकर भटृट, शांतिप्रिय द्विवेदी, सेठ कन्हैया लाल पोद्दार, मदन वात्स्यायन, डा.सत्येन्द्र, कामेश्वर शर्मा, रोमां रोलां, आयार्च चन्द्रबली पाण्डेय, राजेन्द्र यादव, रघुवीर सहाय, हरिशंकर परसाई, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती आदि प्रमुख हैं।
नई धारा के संपादक रामवृक्ष बेनीपुरी समय-समय पर अपनी रचनाओं से पाठकांे को अवगत कराते रहे। उनका स्थायी स्तम्भ 'डायरी` काफी चर्चित हुआ था। बेनीपुरी जी के बाद संपादक उदयराज सिंह ने 'नई धारा` के तेवर को बरकरार रखा। उदयराज जी सन् २००४ तक 'नई धारा` का संपादक रहे।
'नई धारा` साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी ऐतिहासिक उपलब्धियों को समेटते हुए आज जो भूमिका अदा कर रही है उसे नजरअंदाज नही किया जा सकता। वजह साफ है कि साहित्यक पत्रिकाएं छप तो रही हैं लेकिन वे लम्बे समय तक अपने को जिंदा रख पाने में सफल नहीं हो पाती हैं। कई कारणों से कुछ अंकों के प्रकाशन के बाद बंद हो जाती है। 

स्वतंत्र लेखन और सृजनात्मक साहित्य को लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य को लेकर छपने वाला, नई धारा आज भी अपने उद्देश्य के साथ अनवरत प्रवाहित हो रही है। पुराने नये लेखकों का सहयोग इसे निरंतर मिल रहा है। इसके पीछे प्रसिद्ध साहित्यकार रामदरश मिश्र मानते है कि राजपरिवार से होने के बावजूद संपादक उदयराज सिंह में आभिजात्य होने का दंभ नहीं था। साथ ही एक यशस्वी साहित्यकार का पुत्र एवं स्वयं एक सशक्त लेखक होने के बाद भी लेखकों के प्रति उनके मन में बड़ा सौहार्द्ध और स्नेह भाव रहता था। संपादक की ऐंठ के साथ नहीं बल्कि लेखकीय विनम्रता के साथ वे लेखकों से रचनाएं मांगते थे। लगातार ५६ वर्षों के प्रकाशन काल में हिन्दी के जितने भी साहित्यकार हुए लगभग सभी का सक्रिय सारस्वत योगदान इस पत्रिका को मिलता रहा है। बेनीपुरी जी १९६८ तक जुड़े रहे। मृत्यु ने ही उन्हें नई धारा से अलग किया, लेकिन उनकी आत्मा अभी भी इसमें है। उनके कायल रहे उदयराज जी ने लिखा है 'बेनीपुरी जी ने अपने संपादन में नई धारा को हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के शिखर पर ला दिया`।
'नई धारा` हर कोटि के रचनाकारों का स्वागत करती रही है। इसके पुराने और नये अंकों का अध्ययन करने से साफ लगता है कि यह राजनीति से दूर है और वामपक्ष- दक्षिणपक्ष का अंतर इसमें नहीं हैं। इसमें जयप्रकाश नारायण पर भी लेख छपे और डॉ. विश्वंभरनाथ उपाध्याय की कविता भी। इसकी सादगी गजब की है। बिना तामझाम और अश्लील कहानियों से कोसों दूर नई धारा शुरू से अविवादित रहा है। नई धारा ने सभी भाषा को लेकर एक योजना चलाई, जिसके तहत हिन्दीतर भाषियों की प्रमुख रचनाओं को हिन्दी में अनुवाद कर प्रकाशित किया। पत्रिका ने कई स्तम्भों के माध्यम से ख्यातिलब्ध लेखकों के आलेख प्रकाशित किये। शुरुआती दौर में नई धारा में पारिश्रमिक प्रत्येक आलेख पर दस रूपये दिया जाता था।
नई धारा के स्वरूप को लेकर हमेशा से उहा-पोह की स्थिति बनी रही। उदयराज जी के जाने के बाद साहित्यिक गलियारे में इसके स्वरूप को लेकर चर्चा होने लगी कि कहीं यह किसी खास गुट के हाथ में न चला जाये या फिर पत्रिका का भविष्य क्या होगा? कई तरह की आशंकाएं उठी। इसके वर्तमान सौजन्य संपादक डा. शिवनारायण ने बताया कि उदयराज जी को इसकी काफी चिंता थी। उन्होंने नई धारा के फरवरी-मार्च २००३ के अंक में लिखा भी ''जाने कितने उतार चढ़ाव इस पत्रिका ने देखे लेकिन इसके पाठक जानते हैं कि राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह की उसी भावना के अनुरूप अब तक मैं इस पत्रिका को निकालता रहा हूं``। सच भी है राजा साहब, शिवपूजन सहाय और बेनीपुरी जी साहित्य में समन्वय का जो मार्ग 'नई धारा` के साथ लेकर आये थे वह आज भी कायम है। इसकी वजह है उदयराज जी के बाद उनके पुत्र और 'नई धारा` के प्रधान संपादक प्रमथ राज सिंह की सोच, जो पुराने तेवर के साथ कायम है। तभी तो 'नई धारा` आज भी किसी खास विचारधारा के चुंगल में नहीं पड़ कर निरंतर सभी सोच / विचारधारा के साहित्यिकारों को एक साथ लेकर चल रही हैं। यही नहीं इसकी शुरूआत के समय ही कहा गया था कि ''नई धारा किसी गुट, किसी वाद और किसी दल की न हो कर अकेली कला की होगी, साहित्य की आंखों की पुतली ! भाव और भाषा के महल की नवेली ! वह चेतना; नया उद्दपीन लेकर आई है``।
'नई धारा` बिहार की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास में मील का पत्थर है। यह इकलौती पत्रिका है, जो लम्बे समय से लगातार प्रकाशित हो रही हैं। १९५० से मासिक के तौर पर छपने वाली 'नई धारा` बीच-बीच में द्विमासिक या मासिक छपी और १९७६ से द्विमासिक ही छपती आ रही है। इसने अपने प्रकाशन काल में साहित्यिक आंदोलनों के कई उतार-चढ़ाव देखे और साहित्य पर अपनी पैनी नजर रखी। हालांकि बिहार से कई पत्रिका प्रकाशित हो रही है। इनमें पूर्णिया से 'वर्तिका`, अररिया से 'संबदिया`, पटना से 'भाषा-भारती संवाद`, 'जनमत`, 'सनद` आदि शामिल हैं।
बिहार के यशस्वी पत्रकार, जो प्र्रख्यात साहित्यकार भी थे उनकी भूमिका बिहार की पत्रकारिता को दिशा देने मेें अहम् रही है। और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। बिहार की साहित्यिक पत्रकारिता को अपने बलबूते पर पहचान दिलाने वालों मेंं ईश्वरी प्रसाद शर्मा :१८९३-१९२७:, आचार्य शिवपूजन सहाय:१८९३-१९६८:, केशवराम भट्ट: १८५२-१८८३:, रामवृक्ष बेनीपुरी:१९०१-१९६८:, रामदीन सिंह, देवव्रत शास्त्री, शिवचंद्र शर्मा, गंगा शरण सिंह, रामदयाल पांडेय, केसरी कुमार, पारसनाथ तिवारी, रामदयाल पाण्डेय आदि कई नाम हैं। डालते है उन पर एक नजर :-
ईश्वरी प्रसाद शर्मा; 

प्रसिद्ध साहित्यिकार-पत्रकार ईश्वरी प्रसाद शर्मा ने दर्जनों पत्रों का संपादन किया। इनमें 'धर्माभ्युदय`:आगरा:, 'पाटलिपुत्र`:पटना:, मनोरंजन`:आरा:,'लक्ष्मी`:गया:, 'श्रीविद्या`, और 'हिन्दू पंच`:कोलकत्ता: प्रमुख है। बिहार के आरा शहर में १८९३ में जन्में श्री शर्मा ने जीवन के अंतिम क्षण तक पत्रकारिता से जुडे रहे। आरा के कायस्त जुबली कालेज से शिक्षा प्रारम्भ करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय गए।लेकिन बीमारी की वजह से बीच में ही पढ़ाई छोड़ कर आरा वापस आ गये और बाद में शिक्षक के रूप में सक्रिय हो गये । १९०६ से उन्होंने लेख लिखना शुरू किया।उनका लेख 'भारत जीवन में छपा जिससे पे्ररित होकर वे १९१२ में आरा से मनोरंजन हिन्दी मासिक निकाला जो थोडे ही दिनों में लोकप्रिय हो गया।बाद में वे पटना से छपने वाले 'पाटलिपुत्र` पत्र के संपादक बने।उसके बाद गया से प्रकाशित 'लक्ष्मी` और 'श्रीविद्या` के संपादक बन गये । शर्मा जी ने पटना से छपने वाले 'शिक्षा` और आगरा से प्रकाशित होने वाले त्रैमासिक पत्र 'धर्माभ्युदय` का संपादन किया। बाद में वे कोलकत्ता से छपने वाले 'हिन्दू पंच` का संपादन किया और अंतिम दम तक संपादन करते रहे। शर्मा जी एक बेहतर पत्रकार के साथ साथ विषयों पर पकड़ रखने वाले प्रतिभाशाली लेखक भी थे। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी है। २२ जुलाई १९२७ को बीमारी की वजह से निधन हो गया। 

आचार्य शिवपूजन सहाय;
बिहार ही नहीं बल्कि देश-विदेश में अपनी पहचान रखने वाले बिहार के शाहाबाद जिले के उनवास गांव में ९ अगस्त १८९३ में जन्में आचार्य शिवपूजन सहाय ने हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता को खास तौर से एक दिशा प्रदान की।अनेकों पत्र-पत्रिकाओं का संपादन करने वाले शिवपूजन सहाय के अनेकों लेख छात्रजीवन में ही 'शिक्षा`,'मनोरंजन` ओर 'पाटलिपुत्र` जैसे प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे थे।महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के शुरू होने पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ कर आरा में एक स्कूल में शिक्षक हो गये ।पत्रकारिता से खास लगाव रखने वाले सहाय जी ने १९२१ में आरा से प्रकाशित होने वाले 'मारवाड़ी सुधार` मासिक का संपादन किया।बाद में वे १९२३ में कोलकत्ता से प्रकाशित होने वाले 'मतवाला` से जुड़ गये ।'मतवाला` के संपादन के अलावा उन्होंने 'मौजी`,'आर्दश`,'गोलमाल`,उपन्यास तरंग` ओर 'समन्वय` आदि पत्रों के भी संपादन में महत्वपूर्ण सहयोग किया।कुछ समय के लिए १९२५ में 'माधुरी` का भी संपादन किया।बाद में पुन: १९२६ में वापस 'मतवाला` से जुड़ गये । सहाय जी ने भागलपुर के सुलतानगंज से छपने वाली साहित्यिक पत्रिका 'गंगा` का संपादन किया।'गंगा` के बाद आचार्य रामलोचनशरण 'बिहारी` के बुलाने पर दरभंगा में उनके 'पुस्तक भण्डार` से जुड़ गए।यहंा से प्रकाशित होंने वाली मासिक 'बालक` का संपादन किया। १९४६ में सहाय जी ने 'पुस्तक भण्डार` पटना की साहित्यिक पत्र 'हिमालय` का संपादन किया। साथ ही १९५० में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की शोध त्रैमासिक पत्रिका 'साहित्य` का भी संपादन किया। साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में सहाय जी ने जो सराहनीय कार्य किया वह मील का पत्थर के रूप में आज भी मौजूद है। १९५० में बिहार सरकार द्वारा गठित बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के पहले निदेशक सहाय जी को ही बनाया गया। उन्होंने अपने कार्यकाल में 'बिहार का साहित्यिक इतिहास` को एक जगह समेटा। चार खण्डों में दो उनके कार्यकाल में पूरे हो गये थे। सहाय जी को 'पद्मभूषण`, 'वयोवृद्ध साहित्यिक सम्मान पुरस्कार` सहित कई सम्मानों से नवाजा गया। एक पत्रकार के रूप में सहाय जी ने साहित्यि की जो सेवा की वह काबिले तारीफ है। पत्रकारिता के साथ उनहोंने कई कृतियों की रचना की । बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने उनकी रचनाओं को 'शिवपूजन रचनावली` में समेटा और चार खण्डों प्रकाशित किया। हिन्दी के दधीचि कहे जाने वाले सहाय जी का २१ जनवरी १९६३ को निधन हो गया।
केशवराम भट्ट;
बिहार में हिन्दी पत्रकारिता के जन्मदाता और खड़ी बोली को इससे जोडने वाले पं.भट्ट का जन्म नालंदा के बिहारशरीफ में १८५२ में हुआ था। इनके भाई मदनमोहन भट्ट जब कोलकत्ता गये और १८७२ में अपना पे्रस खोला तो उन्होंने केशवराम जी को इससे जोड़ दिया। बाद में वे १८७४ में अपना पे्रस बिहार ले आये। पं. भट्ट एक बेहतर पत्रकार के साथ बेहतर लेखक भी थे।''बिहार बंधु `` से जुड़ कर भट्ट जी ने बिहार की हिन्दी पत्रकारिता को एक दिशा दी। उन्होंने दो नाटक '' शमशाद सौसन`` और सज्जाद सुंबंल`` लिखा। साथ ही उनकी कई और रचनाएं हैं जो काफी चर्चित हुई। 

रामवृक्ष बेनीपुरी;
रामवृक्ष बेनीपुरी जी हिन्दी के जाने माने पत्रकार-लेखक थे। अपनी लेखन शैली को लेकर चर्चित रहने वाले बेनीपुरी का जन्म जनवरी १९०१ में बिहार के मुजफ्फरपुर के बेनीपुरी गांव में हुआ था। मैटिक तक पहंुचने के समय ही वे असहयोग आंदोलन में कूद पड़े जिससे उनकी शिक्षा बीच में ही रह गई। वहीं बचपन से ही उनका झुकाव साहित्य की ओर थी । छोटी सी उम्र में ही उनकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थी। हालांकि उन्होंने अपने को पत्रकार के रूप में ही सामने लाया और दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया जिनमें ''तरूण भारत``::१९२१::, ''किसान मित्र``::१९२२::, ''गोलमाल``::१९२४::, ''योगी``::१९३५::, ''जनता``::१९३७::,''लोक संग्रह`` और कर्मवीर`` सभी साप्तसहिक , '' बालक``::१९२६::, ''युवक``::१९२९::, ''हिमालय``::१९४६::, ''जनवाणी``:१९४८, ''नई धारा`` और ''चुन्नू-मुन्न्ूा``:१९५०:: सभी मासिक आदि शामिल हैं। इसके अलावे हजारीबाग जेल से 'कैदी` और 'तूफान` हस्तलिखित मासिक पत्र के निकालने की भी सूचना है। रामवृक्ष बेनीपुरी जी पत्रकारिता के क्षेत्र में जितने चर्चित हैं उतने ही साहित्यि के क्षेत्र में । साहित्य की अनेक विधाओं मसलन नाटक, निबंध, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण, एकांकी , बाल साहित्य आदि में उनकी उपलब्धियां आज भी यादगार हैं। बेनीपुरी जी की रचनाओं का प्रकाशन ''बेनीपुरी ग्रंथावली`` के तहत दो भागों में १९५५-५६ में की गई । बेनीपुरी जी ने उस सोच को तोड़ा था कि पत्रकारिता से जुड़े लोग अच्छे साहित्यकार नहीं हो सकते ,लेकिन उन्होंने दोनों विधा में जो तालमेल स्थापित किया वह देखने को कम ही मिलता है। वे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन से भी जुड़े। उनका निधन ७ सितम्बर १९६८ में हुआ।
रामदीन सिंह; यूं तो रामदीन जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया में हुआ था। लेकिन उनके नाना उन्हें पटना ले आये । शुरू से साहित्य के प्रति उनकी रूचि रही है। छपरा में अध्यापन कार्य छोड़ने के बाद उन्होंने १८८०-८१ में प्रसिद्ध खड्गविलास पे्रस की स्थापना की । पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशन की दिशा में भी उन्होंने बढ़- चढ कर हिस्सा लिया और दर्जनों पत्रिकाएं निकाली। उनके संपदन में क्षत्रिय पत्रिका,हरिश्चन्द्र कला और ब्राह्मण प्रमुख है। हिन्दी की वे जी जान से सेवा करते हुए वे १९३० में दुनिया से विदा हो गये।
देवव्रत शास्त्री बिहार की हिन्दी पत्रकरिता में देवव्रत शास्त्री जी भूमिका काफी मायने रखती है। १९०२ में चंपारण जिले के गोरे गांव में जन्में शास्त्री जी ने पत्रकारिता की शुरूआत कानपुर से प्रकाशित ''प्रताप`` के संपादकीय विभाग से जुड़ कर की। बाद में वे बिहार आ गये। और १९३४ में उन्होंने ''नवशक्ति`` को निकाल कर की। उन्होंने १९३६ में साप्ताहकि ''नवशक्ति`` का दैनिक संस्करण निकाला। १९४१ में शास्त्री जी ने दैनिक ''राष्ट्रवाणी`` का प्रकाशन शुरू किया । १९४२ में उनके जेल जाने से पत्र पर असर पड़ा । बाद में उन्होंने नवराष्ट्र पे्रस खोला और वहीं से ''नवराष्ट्र`` का प्रकाशन १९४७ में शुरू किया । शास्त्री जी वर्तमान रूस, गणेश शंकर विद्यार्थी, हिन्दी की उत्कृष्ट कहानियां आदि कई पुस्तकें भी लिखी।
शिवचंद्र शर्मा छपरा में जन्में शिवचंद्र शर्मा ने 'दृष्टिकोण` १९४८, 'पाटल` १९६३-५३, 'प्रपंच` और 'स्थापना` पत्रिकाओं का संपादन किया था। बिहार के हिन्दी पत्रकारिता में शर्मा जी का विशिष्ट स्थान है। कविता से विशेष लगाव रखने वाले शर्मा जी ने 'प्रगतिवाद की रूपरेखा`, 'दिनकर और उनकी काव्यकृतियां`, 'मेखला`, 'कूल किनारा` आदि साहित्यिक रचनाओं को रच कर अपनी साहित्यिक पहचान भी बनायी।
गंगा शरण सिंह, बिहार के हिन्दी पत्रकारिता में गंगा शरण सिंह की चर्चा न हो ऐसा हो ही नहीं सकता है। खासतौर से साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में। १९०५ में पटना जिले में जन्में गंगा जी आजादी के दौर में जहंा देश के चर्चित राजनेताओं के संपर्क में रहे वहीं साहित्यिक क्षेत्र में महादेवी वर्मा, पे्रमचंद, निराला के साथ भी रहे। उन्होंने चर्चित साहित्यिक पत्रिका 'गंगा` का संपादन किया और कई पत्रों के साथ किसी न किसी रूप से जुडे रहे।
रामदयाल पांडेय; 
 रामदयाल पांडेय की भूमिका बिहार की हिन्दी और साहित्यिक पत्रकारिता में विशेष स्थान रखता है। पत्रकारिता से जुड़ाव उनका पत्रिका 'बालक` से हुआ । १९४७ में वे साप्ताहिक 'स्वदेश` के संपादक बने। १९५३ में उन्होंने मासिक साहित्यिक पत्रिका 'पाटल` का संपादन शुरू किया। १९५८ में वे दैनिक ' नवराष्ट्र` के संपादक बने। १९६२ में पांडेय जी दैनिक 'विश्वमित्र` के पटना संस्करण के संपादक बने । लेकिन इससे वे ज्यादा दिनों तक जुड़ नहीं रह पाये और बाद में वे 'नवीन बिहार` से जुडे।़ १९७३ में वे भागलपुर से प्रकाशित साप्ताहिक 'बिहार जीवन` के संपादक बने। संपादन के अलावा वे निरंतर पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे।
केसरी कुमार; पटना के सैदनपुर गांव में १९१९ में जन्में केसरी कुमार ने कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया । खासकर साहित्यिक पत्रकारिता से वे जुड़े रहे। उनके द्वारा संपादित पत्र-पत्रिकाओं में 'साहित्य`, 'कविता`, 'चित्रेतना` आदि शामिल हैं।
हालांकि बिहार की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास में कई ऐसे हस्ताक्षर हैं जिनके योगदान को भूला पाना मुमकिन है। सुनहरे अक्षरों में उनके नाम पन्नों में दर्ज हैं वहीं कई ऐसे भी नाम है जिन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता को एक मुकाम दिलाया। मसलन, ईश्वरी प्रसाद शर्मा, डा क़ाशी प्रसाद जयसवाल, पारसनाथ त्रिपाठी, प्रभुल्लचंद्र ओझा आदि कई नाम है जिनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। बहरहाल आज भी बिहार में साहित्यिक पत्रकारिता गतिमान है। 
आंचलिक पत्रकारिता का सच
आज भी पत्रकारिता ’मिशनरी पत्रकारिता’ या ’लोककल्याणी’ पत्रकारिता’ तो शायद नहीं रही है। गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा, व्यवसायीकरण, अखबारों पर उद्योगपतियों का कब्जा, पत्रकारिता के पीछे के छिपे निहित स्वार्थ, अखबारों व पत्रिकाओं को रोब गालिब करने, फायदा उठाने, आर्थिक संसाधनों की तरह प्रयोग करने, राजनीति की दिशा व राजनेताओं को मनमाफिक तरीके से साधने-बांधने की आकांक्षा रखने, अखबार को माध्यम बनाकर अपने ग्रुप के लिए आर्थिक लाभ लेने, ठेके, आबकारी, खनन, मिल जैसे लाइसेंस हासिल करने जैसे कृत्य अब आम हो चले हैं।
 कही-सुनी

बात उन दिनों की है जब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ’सरस्वती’ का संपादन करते थे। एक सज्जन उन्हें अपनी एक रचना थमा गए, आशय था उसे ’सरस्वती’ में स्थान मिले। साथ में अपने गांव से कुछ गुड़ भी लेकर आए थे वे सज्जन। आचार्य को गांव व गुड़ दोनों से ही बेहद लगाव था। उक्त सज्जन के द्वारा दी गई सामग्री सरस्वती के कलेवर में व स्तर पर खरी नहीं उतरती थी सो उसे छापा नहीं गया।
कुछ दिनों बाद उक्त सज्जन  ने आचार्य द्विवेदी से पूछा कि उन्हें गुड़ कैसा लगा और उनकी सामग्री क्यों नहीं छपी। हजारी प्रसाद अपनी कोठरी  में अन्दर गए और जिस थैले में सज्जन गुड़ देकर गए थे, उसे बाहर लाए और सज्जन को थमाकर बोले-’’आपका गुड़ तो अच्छा ही होगा पर इस गुड़ या संबंधों के आधार पर मैं सरस्वती में रचनाएं नहीं छाप सकता।’’ सज्जन लौट गए।
उक्त प्रकरण बहुत ही आम और चर्चित है, पर उसे यहां देने का आशय उस समय पत्रकारिता के उच्च आदर्शों का याद दिलाना है जिनकी वजह से ’उद्दंत मात्र्तण्ड’ से शुरु हुआ पत्राकारिता का आंदोलन न केवल फला-फूला वरन् आकाश की ऊँचाईयों तक पहंुचा है। हो सकता है आज भी कुछ लोग आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी या गणेश शंकर विद्यार्थी के उच्च आदर्शों एवम् मानकों तथा संकल्पों के साथ पत्राकारिता कर रहे हो पर हिंदी पत्रकारिता का आम परिदृश्य क्या है, यह बताने की जरूरत नहीं है।
आज बेशक परिस्थितियां, मानक, आदर्श, आवश्यकताएं और माहौल यानी वातावरण में भारी बदलाव आया है और सब कुछ आज पैसे, पद व परिसंपत्तियों के आधार पर आंका जाने लगा है। अब उस समय के पत्रकारों या पत्रकारिता का वर्चस्व बनाए रखना शायद बहुत आसान तो नहीं ही रह गया है मगर जो हालात, खास तौर पर क्षेत्राीय एवं स्थानीय पत्रकारिता व पत्रकारों में देखने को मिलते हैं, उन्हें देखकर इस से लगाव व उम्मीद रखने वाले लोगों को निराशा व दुःख दोनों ही हो रहे हैं।
आज भी पत्रकारिता ’मिशनरी पत्रकारिता’ या ’लोककल्याणी’ पत्रकारिता तो शायद नहीं रही है। गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा, व्यवसायीकरण, अखबारों पर उद्योगपतियों का कब्जा, पत्राकारिता के पीछे के छिपे निहित स्वार्थ, अखबारों व पत्रिकाओं को रोब गालिब करने, फायदा उठाने, आर्थिक संसाधनों की तरह प्रयोग करने, राजनीति की दिशा व राजनेताओं को मनमाफिक तरीके से साधने-बांधने की आकांक्षा रखने, अखबार को माध्यम बनाकर अपने ग्रुप के लिए आर्थिक लाभ लेने, ठेके, आबकारी, खनन, मिल जैसे लाइसेंस हासिल करने जैसे कृत्य अब आम हो चले हैं।
कमोबेश इन तथ्यों को जानते  तो सब हैं पर अपने-अपने निहित  उद्देश्यों के चलते चारों  तरफ चुप्पी पसरी पड़ी है तो इस पत्राकारिता के सुधरने की उम्मीद करना भी खुद को धोखा देने जैसा ही लगता है।
यथार्थ के चश्मे से देखने  पर पैसा, पावर, पोलिटिक्स, पजेशन और पत्रकारिता का चोली दामन का साथ ही नहीं वरन् इनका गठबंधन और घालमेल भी साफ नजर आता है।
पत्रकारिता के साथ राजनीति और राजनेताओं की दुरभिसंधि के चलते एक ’कनवर्जन’ गेम भी नजर में आ रहा दिखता है। एक खास मीडिया ग्रुप के मंच पर ’खास’ किस्म के नेताओं को आप ’स्तम्भ लेखक’ के रूप में ’लीडिंग राइटर्स’ के रूप देख सकते हैं। वहीं प्रभावशाली प्रकाशनों के खास प्रभाव वाले लोग पत्रकारिता के कोटे से राज्यसभा, प्रवर समितियों, संसदीय समितियों और यदाकदा तो मंत्रिमंडलों की शोभा बढ़ाते भी देख रहे होगें।
अपने पैसों से अपने अखबार  में खुद को संपादक, प्रधान संपादक लिखने वाले ये पैसा-पावर-पाॅलिटिक्स के धुरंधर खिलाड़ी नाम, दाम तो कमाते ही हैं, वहीं किसी दूसरे को पी.आर.बी. एक्ट के अधीन समस्त सामग्री के लिए उत्तरदायी की लाइन छाप कर जिम्मेदारी से भी साफ बच निकलते हैं यानी ’पैसा फेंक, तमाशा देख’ का खेल पत्राकारिता में भी खूब चल-दौड़ रहा है।
25 से अधिक वर्षो से क्षेत्रा से जुड़ा होने के नाते यह लिखते शर्म और संकोच तो होता है पर यह सच है कि आज के युग में एक बड़े प्रतिशत में संबंध जोड़-जुगाड़, इधर की सामग्री उधर करने वाले लेखक अधिक छप रहे हैं, ज्यादा कमा रहे हैं जबकि प्रतिभाशाली और बेलाग लपट के लिखने वालों को कोने में लगा दिया गया है।
यदि डेस्क प्रभारियों व  प्रभावशाली तत्त्वों से आप का अच्छा सम्पर्क व लेन-देन  है तो आपका छपना तय है। बिना संबंध, संपर्क व पहचान के आपकी डाक, फैक्स, ई-मेल पढ़ भी ली जाए तो बड़ी बात है, छपना व मानदेय मिलना तो दूर की बात है। हां, बड़े-बड़े प्रकाशन गृहों तक में मामूली फेर बदल के साथ छोटे लेखक की सामग्री बड़े नाम के साथ छप जाती है और वह बेचारा कुछ भी नहीं कर पाता।
समाचारों व संपादकीय लेखों  की गुणवत्ता की बात कैसे की जाए। इंटरनेट, एजेंसियों के तनखैये यानी वेतनभोगी कर्मचारियों के लेख बिना फेरबदल तक के क्षेत्राीय समाचार पत्रों में जस के तस छपते दिखते हैं। समाचारों का 60ः से ज्यादा हिस्सा ’टेबल न्यूज’ या ’विज्ञप्तियों’ के आधार पर छप रहा है। घटनाओं की कवरेज में संवाददाता तुरंत फुरत के ढर्रे में जाते हैं, रेडीमेड विज्ञप्ति और छपासरोगी खास लोगों के फोटो ले ’मय गिफ्ट’ या ’विज्ञापन’ अथवा कृपा राशि ले लौटते हैं तो उस समाचार की विश्वसनीयता क्या रहेगी, सार्थकता कहां बचेगी। सोचने का विषय है।
संवेदना व सृजनशीलता सदैव ही पत्राकारिता की प्राण  वायु रहे हैं पर उनकी जगह  अब सनसनी और मशीनीकरण ने ले ली है। बलात्कार या ’आॅनर किलिंग’ की शिकार युवतियों, बच्चियों का बस नाम छोड़कर इस तरह चटकारे ले कर छाप दिया जाता है कि समाज में उसके भविष्य पर एक फुलस्टाॅप भी लग जाए तो संवाददाता या संपादक की आत्मा कहीं उसे नहीं कचोटती। वह तो अगली ’बाइलाइन’, अगली सनसनी के पीछे दौड़ लेता है, संवेदना से परे, सहानुभूति से कोसों दूर।
ऐसा नहीं है कि पत्रकारिता में कुछ भी सकारात्मक  बचा ही न हो। सजे-धजे, सुंदर, रंग-बिरंगे अखबार अच्छे लग रहे हैं, कुछ प्रकाशन गृह नए-नए प्रयोग कर रहे हैं, सात परदों के पीछे की खबर भी बाहर आ रही है। बड़े-बड़े खलीफा भी मीडिया के लपेटे से बाहर नहीं रहे है।
लोकतंत्रा में मतदाता का जागरण मीडिया कर रहा है।  साहित्य परिशिष्टों के माध्यम से फिर लौट रहा है। मरती हुई कविताएं बस अखबारों  व पत्रिकाओं के सहारे  सांस ले रही हैं, यानी पत्रकारिता में अभी काफी कुछ बचा भी है पर यदि संवेदना के साथ मीडिया निस्पृह हो कर आगे आए तो ’मिशनरी पत्रकारिता’ का युग भी मरने से बच सकता है।
30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस है। कम से कम ये बहस ज़रूर होनी चाहिए कि आज हिंदी पत्रकारिता किस मोड़ पर है। ज़रूरी नहीं कि इस विषय पर चर्चा के लिए सुनामधन्य पत्रकार अपने न्यूज़ चैनलों पर आदर्श पैकेजिंग ड्यूरेशन के तहत 90 सेकेंड की स्टोरी ही दिखाते या  अधपके बालों वालों धुरंधरों को बुलाकर बौद्धिक जुगाली करते या फिर हिंदी पत्रकारिता की आड़ में अंग्रेज़ी पत्रकारिता को कम और पत्रकारों को ज़्यादो कोसते। टीवी वालों को क्या दोष दें।
बौद्धिक संपदा पर जन्मजात स्वयंसिद्ध अधिकार रखनेवाले प्रिंट के पत्रकारों  ने भी डीसी, टीसी तो छोड़िए, सिंगल कॉलम भी इस दिवस की नहीं समझा।  कहीं कोई चर्चा नहीं कि क्या सोचकर पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी और आज हम कर क्या रहे हैं।
ग्लोबलाइज़ेशन के इस दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी, तकवी शकंर पिल्ले, राजेंद्र माथुर, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय की ज़माने की पत्रकारिता की कल्पना करना मूर्खता होगी। लेकिन इतना तो ज़रूर सोचा जा सकता है कि हम जो कर रहे हैं , वो वाकई पत्रकारिता है क्या। सब जानते हैं कि भारत में देश की आज़ादी के लिए पत्रकारिता की शुरुआत हुई। पत्रकारिता तब भी हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा कई भाषाओं में होती थी। लेकिन भाषाओं के बीच में दीवार नहीं थी। वो मिशन की पत्रकारिता थी। आज प्रोफोशन की पत्रकारिता हो रही है। पहले हाथों से अख़बार लिखे जाते थे। लेकिन उसमें इतनी ताक़त ज़रूर होती थी कि गोरी चमड़ी भी काली पड़ जाती थी। आज आधुनिकता का दौर है। तकनीक की लड़ाई लड़ी जा रही है। फोर कलर से लेकर न जाने कितने कलर तक की प्रिटिंग मशीनें आ गई हैं। टीवी पत्रकारिता भी सेल्युलायड, लो बैंड, हाई बैंड और बीटा के रास्ते होते हुए इनपीएस, विज़आरटी, आक्टोपस जैसी तकनीक से हो रही है। लेकिन आज किसी की भी चमड़ी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। शायद चमड़ी मोटी हो गई है।
आख़िर क्यों अख़बारों और समाचार चैनलों से ख़बरों की संख्या कम होती जा रही है। इसका जवाब देने में ज़्यादातर कथित पत्रकार घबराते हैं। क्योंकि सत्तर –अस्सी के दशक से कलम घिसते –घिसते कलम के सिपाही संस्थान के सबसे बड़े पद पर बैठ तो गए लेकिन कलम धन्ना सेछ के यहां गिरवी रखनी पड़ी। कम उम्र का छोरा ब्रैंड मैनेजर बनकर आता है और संपादक प्रजाति के प्राणियों को ख़बरों की तमीज़ सिखाता है। ज़रूरी नहीं कि ब्रैंड मैनेजर पत्रकार हो या इससे वास्ता रखता हो। वो मैनेजमैंट पढ़कर आया हुआ नया खिलाड़ी होता है। हो सकता है कि इससे पहले वो किसी बड़ी कंपनी के जूते बेचता हो। तेल, शैंपू बेचता हो। वो ख़बर बेचने के धंधे में है। इसलिए उसके लिए ख़बर और अख़बार तेल , साबुन से ज़्यादा अहमियत नहीं रखते। वो सिखाता है कि किस ख़बर को किस तरह से प्ले अप करना है। सब बेबस होते हैं। क्योंकि सैलरी का सवाल है। ब्रैंड मैनेजर सेठ का नुमाइंदा होता है। उसे ख़बरों से नहीं, कमाई से मतलब होता है। अब कौन पत्रकार ख़्वामखाह भगत सिंह बनने जाए।
कुछ यही हाल टीवी चैनलों का भी है। ईमानदारी से किसी न्यूज़ चैनल में न्यूज़ देखने जाइए तो न्यूज़ के अलावा सब कुछ देखने को मिल जाएगा। कोई बता रहा होगा कि धोना का पहले डेढ़ फुट का था अब बारह इंच का हो गया है। ये क्या माज़रा है – समझने के लिए देखिए ..... बजे स्पेशल रिपोर्ट। कोई ख़बरों की आड़ में दो हीरोइनों को लेकर बैठ जाता है और दर्शकों को बताता है कि देखिए ये पब्लिसिटी के लिए लड़ रही हैं। ये लेस्बियन हैं। ये लड़ाई इस उम्मीद से दिखाई जाती है ताकि दर्शक मिल जाए और टीआरपी के दिन ग्राफ देकर लाला शाबाशी दे। कोई किसी ख़ान को लेकर घंटो आफिस में जम जाता है। सबको पता है कि उसकी फिल्म रिलीज़ होने वाली है। ये सब पब्लिसिटी का हिस्सा है। लेकिन वो अपने धुरंधरों के साथ जन सरोकार वाले पवित्र पत्रकारिता की मिशन में लगा होता है।
इसमें कोई शक़ नहीं कि हिंदी पत्रकारिता समृद्ध हुई है। इसकी ताक़त का दुनिया ने लोहा माना है। अंग्रेज़ी के पत्रकार भी थक हार कर हिंदी के मैदान में कूद गए। भले ही उनके लिए हिंदी पत्रकारिता ठीक वैसे ही हो, जैसा कहावत है- खाए के भतार के और गाए के यार के। लेकिन ये हिंदी की ताक़त है। लेकिन इस ताक़त की गुमान में हमने सोचने समझने की शक्ति को खो दिया। एक साथ, एक ही समय पर अलग अलग चैनलों पर कोई भी हस्ती लाइव दिख सकता है। धरती ख़त्म होनेवाली है- ये डरानेवाली लाल- लाल पट्टी कभी भी आ सकती है।
ये सच है कि एक दौर था जब अंग्रेजी की ताक़त के सामने हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की मानी जाती थी। मूर्धन्य लोग पराक्रमी अंदाज़ में ये दावा करते थे- आई डोंट नो क , ख ग आफ हिंदी बट आई एम एडिटर आफ..... मैगज़िन। लेकिन तब के हिंदी के पत्रकार डरते नहीं थे। डटकर खड़े होते थे और ताल ठोककर कहते थे- आई फील प्राउड दैट आई रिप्रजेंट द क्लास आफ कुलीज़ , नॉट द बाबूज़। आई एम ए हिंदी जर्नलिस्ट। व्हाट वी राइट, द पीपुल आफ इंडिया रीड एंड रूलर्स कंपेल्स टू रीड आवर न्यूज़। आज इस तरह के दावे करनेवाले पत्रकारों के चेहरे नहीं दिखते। लालाओं को अप्वाइनमेंट लेकर आने को कहनेवाले संपादक नहीं दिखते। नेताओं को ठेंगे पर रखनेवाले पत्रकार नहीं मिलते। कलम को धार देनेवाले पत्रकार नहीं मिलते । आज बड़ी आसानी से मिल जाते हैं न्यूज़रूम में राजनीति करते कई पत्रकार। मिल जाते हैं उद्योगपतियों के दलाली माफ कीजिएगा संभ्रात शब्दों में लाइजिंनिंग करनेवाले पत्रकार। नेताओं के पीआर करते पत्रकार। चुनाव में टिकट मांगनेवाले पत्रकार। ख़बर खोजनेवाले पत्रकारों को खोजना आज उतना ही मुश्किल है, जितना कि जीते जी ईश्वर से मिल पाना। इसलिए आज 30 मई के दिन हिंदी पत्रकारिता के मौक़े पर ऐसे पत्रकारों को नमन करें , जिन्होने हिंदी को इतनी ताक़त दी कि आज हम अपनी दुकान चला पा रहे हैं। बेशक़ इसके लिए हमें रोज़ी रोटी और पापी पेट की दुहाई देनी पड़ी। लेकिन आज भी शायद हिंदी पत्रकारिता को बचाए रखने का रास्ता बचा हुआ है। खांटी पत्रकारिता करनेवालों को हम आदर सहित हिंदी पत्रकार कहें और दूसरे लंद फंद में लगे सज्जनों को मीडियाकर्मी कहकर पहचानें और पुकारें।
वर्तमान स्थिति :कारण और निदान

'खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो जब तोप मुक़ाबिल हो, अख़बार निकालो'। ये पंक्तियां आज भले ही बेमानी प्रतीत होती हों पर एक समय था जब यह पत्रकारिता की बाइबिल समझी जाती थीं। तब पत्रकारिता को एक प्रोफ़ेशन नहीं मिशन समझा जाता था और जिसके उद्वेग से उद्वेलित हो संपूर्ण देश व समाज एक दिशा में बहता चला जाता था। जैसे-जैसे तकनीकी विकास होते गए, नित्य नए आयाम बनते-बिगड़ते रहे और धीरे-धीरे पत्रकारिता का स्वरूप परिवर्तित होता चला गया। आज हम सूचना क्रांति के दौर से गुज़र रहे हैं. एक ऐसे वैश्विक समाज में अपना अस्तित्व गढ़ने और तराशने का मिथक प्रयास कर रहे हैं जहां सूचना ही शक्ति है. बल्कि यूं कहें कि जो सूचना का जल्दी-से-जल्दी अधिकारी होता है वही सही मायने में शक्ति संपन्न है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. पीठिका प्रारंभ में पत्रकारिता के रूप में केवल और केवल लेखन माध्यम का वर्चस्व था, फिर श्रव्य माध्यम और दृश्य-श्रव्य माध्यमों का आगमन हुआ और उसके बाद तकनीकी विकास के सापेक्ष इंटरनेट पत्रकारिता पुष्पित-पल्लवित होती हुई सफलता के सोपान चढ़ती चली गई. पत्रकारिता का प्रकाशन के साथ शुरू हुआ सफ़र, प्रसारण के चरम पर पहुंचा. आज 'ब्रॉडकास्टिंग' की दुनिया 'वेबकास्टिंग' के दौर में पहुंच गई है. यह सारी उपलब्धियां नई तकनीकों के आविष्कार और उनके अनुप्रयोगों का परिणाम ही तो हैं. नई तकनीक के विकास और विस्तार ने पत्रकारिता के क्षेत्र में जहां एक ओर कई सहज व सुलभ साधन उपलब्ध कराए, जिनसे ख़बरों के द्रुतगामी एवं विश्वसनीय प्रकाशन-प्रसारण का मार्ग प्रशस्त हुआ, वहीं दूसरी ओर पत्रकारिता के समक्ष कई नई चुनौतियों को भी खड़ा कर दिया. तकनीकी क्षमता के सापेक्ष ख़बरों को सटीक रूप से समग्रता के साथ पाठकों-दर्शकों अथवा श्रोताओं के समक्ष रख पाना आज पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा समाचार पत्र हों या समाचार चैनल या कोई अन्य माध्यम, सभी अपने पाठकों तक एक नई और एक्सक्लूसिव ख़बर के साथ अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं और यही कारण है कि आज की पत्रकारिता सनसनीखेज पत्रकारिता का पर्याय बनकर रह गई है. समाचार माध्यम ऊल-जलूल ख़बरें परोस रहे हैं. एक ही ख़बर को बार-बार प्रसारित करना समाचार चैनलों की मजबूरी बन चुकी है. समाचार पत्रों की प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए और चैनलों की टीआरपी रेटिंग में बढ़ोत्तरी के लिए स्टिंग ऑपरेशन जैसे प्रयास भी किए जा रहे हैं. वर्तमान में पत्रकारिता की चुनौतियां उसकी स्वयं की समस्याएं बन चुकी हैं जिसका निदान यदि जल्द ही न किया गया तो पत्रकारिता एक ऐसी व्यूह रचना में उलझ कर रह जाएगी जिसे भेद पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव होगा. इससे पहले कि तकनीकी दक्षता के बल पर सफलता के मिथ्या अभिमान से ग्रसित पत्रकारिता, व्यावसायिक व्योम में कहीं खो जाए, आवश्यकता है एक ऐसे तारे की जो इस तिमिर में उसे उचित मार्ग का ज्ञान करा पाए. इन दिनों भारत में 1857 के गदर की 150वीं सालगिरह मनाई जा रही है. संयोग है इसी मौक़े पर एक किताब आई जो उसी क्रांति के इलाके में एक और क्राँति की आहट सुना रही है. इस इलाक़े को हिंदी में गंगा घाटी और अंग्रेज़ी में काउबेल्ट या हिंदी हार्टलैंड कहा जाता है. नक्शे पर हम इसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान मान सकते हैं. ‘हेडलाइंस फ्राम हिंदी हार्टलैंड’ नाम की इस किताब की लेखिका शैवंती नाइनन ने पाँच साल तक खोजबीन करके इस क्राँति के बीजों को चुना है. पिछले दिनों दिल्ली के हैबीटाट सेंटर में नेताओं और पत्रकारों ने इन किताब पर चर्चा की. जाने-माने चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने संचालक की भूमिका में क्राँति के कारणों और परिणामों को रेखांकित किया. उन्होंने किताब और अपने हवाले से बताया कि हिंदी भाषी राज्यों में पिछले 10 वर्षों में हिंदी अख़बारों का वर्चस्व कायम हो गया है. देश के पहले पाँच अख़बारों में हर साल 2-3 अख़बार हिंदी के होते हैं. इनमें दैनिक भास्कर, जागरण, अमर उजाला और पंजाब केसरी का नाम लिया जा सकता है. इन अख़बारों ने दिल्ली से निकलने वाले तथाकथित राष्ट्रीय समाचार पत्रों को उन्हीं के किले में ध्वस्त कर दिया है. यह काम सीधे हमले से नहीं सेंध लगाकर किया गया है. यह सेंध मध्य युगीन इतिहास की तर्ज़ पर राजधानी को चारों तरफ से घेरकर कमजोर चौकियों को भेदकर किया गया है. 'प्रेस और नोट' बताया गया कि दैनिक भास्कर ने बिना दिल्ली में संस्करण निकाले हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के चुनींदा ज़िलों से कुल मिलाकर 37 संस्करणों के ज़रिए इस काम को सरअंजाम दिया है. अख़बार के समूह संपादक श्रवण गर्ग के मुताबिक इन संस्करणों की कुल दैनिक बिक्री 40 लाख प्रतियाँ और जिनके तीन करोड़ पाठक हैं. इससे मिलते जुलते दावे अन्य दैनिकों के भी हैं. अख़बारों ने ख़बरों का इतना स्थानीयकरण कर दिया है कि उसमें निहित स्वार्थों की बू आती है दिग्विजय सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री इसी मंच पर बैठे दो नेता सचिन पायलट और दिग्विजय सिंह इन आंकड़ों से प्रभावित नहीं थे. उनका कहना था कि एक ही ज़िले से निकलने वाले तीन समाचार पत्र एक ही ज़िले की तीन भिन्न तस्वीरें पेश करते हैं. इससे नेता और प्रशासन भ्रमित हो जाता है. दिग्विजय सिंह ने शिकायत की, "अख़बारों ने ख़बरों का इतना स्थानीयकरण कर दिया है कि उसमें निहित स्वार्थों की बू आती है." नेताओं ने राजनीति का स्थानीकरण कर दिया है. पत्रकार तो उसी तस्वीर को प्रस्तुत करेगा जो नज़र आएगी जवाब में भास्कर के श्रवण गर्ग बोले, "नेताओं ने राजनीति का स्थानीकरण कर दिया है. पत्रकार तो उसी तस्वीर को प्रस्तुत करेगा जो नज़र आएगी." दिग्विजय सिंह ने हाल के उत्तरप्रदेश चुनाव अभियान के अपने अनुभवों के आधार पर बताया कि अब ख़बरें पत्रकारों की जेब गर्म करके छपती हैं. सचिन पायलट ने हामी भरी कि स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं की छपास इतनी बढ़ गई है कि उसने अख़बार वालों की भूख बढ़ा दी है. संचालक योगेंद्र यादव भी उससे सहमत थे कि अब प्रेस नोट का अर्थ प्रेस और साथ में नोट हो गया है. हिंदी ऑनलुकर की भाषा सिंह ने दर्शकों के बीच से पूछा कि स्ट्रिंगर के नोट देखने वालों को अख़बार मालिकों के सौदों के नोट दिखाई नहीं देते? शैवंती नाइनन ने अपनी किताब में इन सब बातों को विस्तार से खोला है. उनका कहना है कि हिंदी अख़बारों ने राष्ट्रीय मिथक को तोड़कर समाचारों को बेहद स्थानीय बना दिया है. इसके चलते आंचलिकता बाईपास हो गई है. योगेंद्र यादव ने समापन करते हुए कहा कि यही तो क्राँति है जिसे सुरेंद्र प्रताप सिंह ने 1995 में हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णिम काल कहा था. हालाँकि जनसत्ता के सलाहकार संपादक प्रभाष जोशी इसे लुगदी पत्रकारिता कहते हैं. चिंता कुछ भी कहिए बुद्धिजीवियों की चिंता स्वाभाविक है. आज मीडिया की भाषा हिंदी हो गई है. अंग्रेज़ी के शीर्ष दैनिक अपने शीर्षक में हिंदी का छौंक लगाते हैं. विज्ञापनों की भाषा हिंदी है. अंग्रेज़ी टीवी चैनलों के मुकाबले हिंदी चैनलों के दर्शक कई गुना ज़्यादा है. जनसंपर्क एजेंसियों को अपनी विज्ञप्ति हिंदी में देनी पड़ रही है. हिंदी का अख़बार भास्कर हिंदी के चैनल ज़ी के साथ मिलकर मुंबई से अंग्रेज़ी दैनिक डीएनए निकाल कर टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स को चुनौती दे रहा है. बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियाँ अपने उपभोक्ता उत्पादों को लेकर छह लाख 78 हज़ार गाँवों को अपना निशाना बना रही है. ऐसे में अख़बार को गाँव तक पहुँचने से कौन रोक सकता है. और वह अख़बार अंग्रेज़ी का अख़बार नहीं हो सकता. रही बात विश्वसनीयता और भ्रष्टाचार की. पत्रकार समाज का उतना ही हिस्सा है जितना कि डॉक्टर, वकील या इंजिनियर. वह उतना ही ईमानदार या भ्रष्ट है जितना कोई और वर्ग. उसे भी जीवन में वही सब चाहिए जो किसी और पेशेवर को. यदि देश का सबसे बड़ा अख़बार अपने को उत्पाद और अपने पाठक को उपभोक्ता घोषित करता है तो बेचारा पत्रकार भी तो उसी बाजार समीकरण का हिस्सा हुआ ना. पत्रकारिता की कालजयी परंपरा हिंदी की समाचार पत्रकारिता का शुभारंभ 19वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में माना जाता है जब आज के कोलकाता और तबके कलकत्ता नगर से ‘उदंत मार्तण्ड’ नामक साप्ताहिक पत्र निकाला गया था. इस पत्र के शीर्षक का ही अर्थ था-चढ़ता हुआ सूर्य! लेकिन इसके प्रकाशन से पत्रकारिता की परंपरा की विधिवत शुरूआत नहीं हो सकी. यह हिंदी भाषा के निर्माण और संक्रमण का काल था. वाक्य विन्यास में क्रिया पदों के इस्तेमाल का स्थान तो तब तक तय हो चुका था पर भाषा का स्वरूप सुनिश्चित नहीं हुआ था. उत्तर भारत में तब मूल रूप से चार बोलियाँ जिन्हें मातृभाषा कहना चाहिए, प्रचलित थीं. वे थीं, हरियाणी, राजस्थानी, कौरवी (खड़ी बोली का क्षेत्र) और ब्रज (और सेनी का क्षेत्र). भाषा का स्वरूप सुनिश्चित तो कभी नहीं हो पाता पर जन समागम और स्थानीय काम धंधों तथा क्षेत्रीय व्यापार के साथ ही उसके शब्दों का स्थिरीकरण होने लगता है. भरतेंदु युग हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की गौरवपूर्ण अध्याय है. इसकी पीठिका में ही हिंदी पत्रकारिता के प्राणतत्व को पहचाना जा सकता है. भाषा की इसी स्थिति के कारण लेखन और पत्रकारिता की विधाएँ प्रतीक्षारत रहती हैं. यही हिंदी पत्रकारिता के साथ भी हुआ. पर यह पत्रकारिता का शून्य काल नहीं है. सन् 1880 से लेकर, सदी के अंत तक लखनऊ, प्रयाग, मिर्जापुर, वृंदावन, मुंबई, कोलकाता जैसे दूरदराज क्षेत्रों से पत्र निकलते रहे. भारतेंदु युग 19वीं सदी के उत्तरकाल में इतिहास प्रसिद्ध भारतेंदु युग का समारंभ हुआ. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का शुभारंभ ‘हरिश्चंद्र पत्रिका’ और ‘कवि वचन सुधा’ से किया. यह हमारी हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की गौरवपूर्ण अध्याय है. इसकी पीठिका में ही हिंदी पत्रकारिता के प्राणतत्व को पहचाना जा सकता है. हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में हुई क्रांति की दृष्टि से यदि देखा जाए तो वर्ष 1900 सबसे महत्वपूर्ण वर्ष है. 20वीं सदी का आगाज़ ही पत्रकारिता से होता है. यह हिंदी पत्रकारिता के स्वर्णिम युग का उद्घाटन वर्ष है. सन्1900 में इंडियन प्रेस इलाहाबाद से ‘सरस्वती’ का और उसी वर्ष छत्तीसगढ़ प्रदेश के बिलासपुर-रायपुर से ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन शुरू होता है. ‘सरस्वती’ के ख्यात संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के संपादक पंडित माधवराव सप्रे थे. कभी-कभी प्रवृति की विशिष्टता के कारण इस नए दौर को मात्र साहित्यिक पत्रकारिता पर केंद्रित मान लिया जाता है, पर सच्चाई यह है कि बहुमुखी सांस्कृतिक नवजागरण का यह समुन्नत काल है. इसमें सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक और राजनीतिक लेखन की परंपरा का श्रीगणेश होता है. इस दौर में साहित्यिक लेखन और पत्रकारिता के सरोकारों को अलगाया नहीं जा सकता. अंग़्रेजों की दासता में बरबादी और अपमान झेलते भारत की दुर्दशा के कारणों की पहचान भारतेंदु काल से ही शुरू हो गई थी, इसे राजनीतिक और सांस्कृतिक सरोकारों से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गहराई से जोड़ दिया. भूमिगत पत्रकारिता सांस्कृतिक जागरण, राजनीतिक चेतना, साहित्यिक सरोकार और दमन का प्रतिकार इन चार पहियों के रथ पर हिंदी पत्रकारिता अग्रसर हुईं. माधवराव सप्रे ने लोकमान्य तिलक के मराठी केसरी को ‘हिंद केसरी’ के रूप में छापना शुरू किया. अंग़्रेजों की दासता में बरबादी और अपमान झेलते भारत की दुर्दशा के कारणों की पहचान भारतेंदु काल से ही शुरू हो गई थी, इसे राजनीतिक और सांस्कृतिक सरोकारों से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गहराई से जोड़ दिया. यहां बंगाल और पंजाब के क्रांतिकारियों के प्रयासों को अनदेखा नहीं किया जा सकता. उनकी पत्रकारिता का रूप अख़बारों या पत्रिका का नहीं था. वे भूमिगत रहकर पर्चे, पैंफलेट और पत्रक निकालते थे. दिल्ली असेंबली में गिरफ्तार होने से पहले अमर शहीद भगत सिंह ने जो पर्चा फेंका था, वह किस अख़बार से कम था! भूमिगत पत्रकारिता की इस अनियतकालीन परंपरा को इतिहास में शामिल किया जाना ज़रूरी है. भूमिगत परंपरा के क्रम में भूमिपर पत्रकारिता के सबसे सशक्त उदाहरण के रूप में मध्यप्रदेश क्षेत्र से ‘कर्मवीर’ सामने आया. इसके यशस्वी संपादक थे स्वतंतत्रता सेनानी और हिंदी के राष्ट्र कवि माखनलाल चतुर्वेदी. भूमिपर जो पत्रकारिता शुरू हुई उसे दमन, तथाकथित क़ानून, मुचलकों, जब्ती, जमानतों का सामना करना पड़ा. गाँधी जी की राजनीतिक प्रणाली ने कुछ भी भूमिगत नहीं रहने दिया. पत्रकारिता ने इस साहस को अपने प्राणतत्व के रूप में मंजूर किया. इसका ज्वलंत उदाहरण बना गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’अख़बार. यह कानपुर से छपता था. इसी परंपरा में वाराणसी से बाबूराव विष्णु पराड़कर ने ‘दैनिक आज’ निकाला और आगरा से पालीवाल जी ने ‘सैनिक’. हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रेमचंद, निराला, बनारसीदास चतुर्वेदी, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, शिवपूजन सहाय आदि की उपस्थिति ‘जागरण’, ‘हंस’, ‘माधुरी’, ‘अभ्युदय’, ‘मतवाला’, ‘विशाल भारत’ आदि के रूप में दर्ज है. और फिर है ‘चाँद’ की पत्रकारिता और उसका फाँसी अंक, जो सन् 1947 की आज़ादी के साथ संबद्ध है. 15 अगस्त 1947 को आज़ाद होते ही पूरे भारत की सोच का पूरा परिदृश्य ही बदल गया, जो होना ही था. आज़ादी के समाप्त हुए संघर्ष ने नव-जागरण और नव-निर्माण की दिशा पकड़ी. ज़ाहिर है कि पत्रकारिता को ही यह चुनौती स्वीकार करनी थी. हिंदी पत्रकारिता ने इस दायित्व को बखूबी संभाला और स्वतंत्रता संग्राम के समय जो सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आदि तमाम सवाल उठे थे, उन्हें अपनी सभ्यता, परंपरा और आधुनिकता के परिप्रेक्ष में चिंतन का केंद्र बनाया. दैनिक पत्रकारिता के क्षेत्र में तो क्रांति हुई. सदियों पहले मनु का वर्णवादी संविधान सामने आया था. स्वतंत्र भारत की संविधान सभा ने भारतीय सभ्यता के इतिहास में जो दूसरा संविधान बनाया और जो विधिवत रूप से सन् 1951 में पारित हुआ, वह हिंदी पत्रकारिता की आधारशिला बना. विभिन्न प्रदेशों से निकले अख़बार छोटे और व्यक्तिगत प्रयासों से लेकर बड़े संस्थागत और संस्थान केंद्रित अख़बारों ने जन्म लिया. सबके नाम गिनाने की जगह तो यहाँ नहीं है पर भारतीय भाषाओं के साथ ही हिंदी में भारत, अमृत पत्रिका, आज, अभ्युदय, चेतना, जनसत्ता, भास्कर, जागरण, हिंदुस्तान, नवजीवन, नवभारत टाइम्स, लोकसत्ता, प्रहरी, जनचेतना आदि-आदि लगभग 50 महत्वपूर्ण दैनिक पत्र हिंदी के विभिन्न प्रदेशों से निकलने लगे. इनके अलावा साप्ताहिक और पाक्षिक टेबलॉइड समाचारपत्रों ने भी अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की. भारतीय गणतंत्र ने जो मूल्य और आदर्श अपने लिए अंगीकार किए थे, पत्रकारिता ने उन्हें ही उठाया और प्रस्थापित किया. हिंदी पत्रकारिता के एक सबसे उज्ज्वल पक्ष का आकलन अभी तक नहीं हुआ है. वह है भारत के 556 स्वतंत्र सामंती राज्यों और रियासतों के भारतीय गणतंत्र में विलीन होने का प्रकरण. इनमें से अधिकांश रियासतें उत्तर भारत में थीं. आज़ादी के तत्काल बाद उनके विलीनीकरण का जो जनसंघर्ष चला था. उस संघर्षशील हिंदी पत्रकारिता के अध्याय की अवधि चाहे कितनी ही कम क्यों न हो पर पत्रकारिता के इतिहास में जनाकांक्षी लोकतांत्रिक दायित्व को निभाने की ऐसी ज्वलंत मिसाल और किसी भाषा में कम ही मिलेगी. भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों, पद्धति और प्रणाली को पुख्ता करने में प्रजामंडलों की प्रारंभिक दौर की पत्रकारिता ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है. सांस्कृतिक पत्रकारिता साहित्यिक और सांस्कृतिक पत्रकारिता का एक बिल्कुल नया युग आज़ादी के बाद ही शुरू हुआ. अब परतंत्रता के दौर की बाधाएं नहीं थीं और इस तरह की पत्रकारिता की पुष्ट परंपरा मौजूद थी ही पर वह विरलता अब समाप्त हुई थी. ‘दिनमान’ जैसी समाचार-संस्कृति की सप्ताहिकी ने तो नया इतिहास ही रच दिया. इसके यशस्वी संपादक हिंदी साहित्य के पुरोधा अज्ञेय जी थे और यह आकास्मिक नहीं था कि इसमें श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय, मनोहरश्याम जोशी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, नंदन आदि जैसे साहित्यकार शामिल थे. उधर जोशी बंधुओं के बाद डॉ धर्मवीर भारती ने ‘धर्मयुग’, मनोहर श्याम जोशी और हिमांशु जोशी ने बाँकेबिहारी भटनागर के बाद ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के ज़रिए पत्रकारिता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए थे. प्रेमचंद्र के पुत्र श्रीपतराय ने ‘कहानी’ और छोटे पुत्र अमृतराय ने ‘हंस’ का पुनर्प्रकाशनन शुरू किया और दक्षिण भारत के हैदराबाद से बद्री विशाल पित्ती ने ‘कल्पना’ निकाली. कोलकाता से भारतीय ज्ञानपीठ के लक्ष्मीचंद्र जैन, शरद देवड़ा का ‘ज्ञानोदय’ आया. पटना के ‘पाटल’ और उदयराज सिंह-रामवृक्ष बेनीपुरी की ‘नई धारा’ निकली. मध्य प्रदेश जबलपुर से हरिशंकर परसाई ने ‘वसुधा’ का और राजस्थान अजमेर से प्रकाश जैन और मनमोहिनी ने ‘लहर’ का प्रकाशन शुरू किया. ‘नई कहानियाँ’ और ‘सारिका’, ‘सर्वोत्तम’, ‘नवयुग’, ‘हिंदी ब्लिट्ज’ और डॉ महावीर अधिकारी के ‘करंट साप्ताहिक’ जैसे पत्रकारिता के नए प्रतिमान स्थापित हुए. पूरा हिंदी प्रदेश पत्रकारिता की प्रयोगशीलता का पर्याय बन गया. पत्रकारिता की नई पीढ़ी इसी का नतीजा था कि हिंदी पत्रकारिता की एकदम नई पीढ़ी के सुरेंद्र प्रताप सिंह, सुदीप, उदयन शर्मा जैसे युवा पत्रकारों ने कोलकाता से ‘रविवार’जैसे प्रखर समाचार साप्ताहिक की शुरुआत की थी. और आगे चलकर इन्हीं युवाओं में से सुरेंद्र प्रताप सिंह ने चैनल पत्रकारिता ‘आज तक’ की कंप्यूटरीकृत नींव रखी थी. सरकारी संस्थानों की पत्रिकाओं ने विशेषतः अपने-अपने वैज्ञानिक विषयों को अपना लक्ष्य बनाया. चंदामामा जैसी प्रख्यात बाल पत्रिका का संपादन बालशौरि रेड्डी ने चेन्नई से शुरू किया और सिनेमा पर केंद्रित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की बाढ़ आ गई. लघु पत्रिकाओं का तो आंदोलन ही चल पडा. इनके बिना वैचारिक और परिवर्तनकामी पत्रकारिता की कल्पना ही नहीं की जा सकती. ज्ञान रंजन की ‘पहल’ पत्रिका इसमें अग्रणी है और सार्थक वैचारिक जनवादी पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘तदभव’, ‘उदभावना’, ‘अभिनव कदम’, ‘वर्तमान साहित्य’, ‘शेष’ जैसी 300 पत्रिकाएं मौजूद हैं और फिर कंप्यूटरीकृत तकनीकों से लैस ‘इंडिया टुडे’ और ‘आउटलुक’ जैसे समाचार साप्ताहिक तो हैं ही. और फिर राजेंद्र यादव के ‘हंस’ के अलावा ‘कथादेश’, वागार्थ’, ‘नया ज्ञानोदय’ आदि ने वैचारिक लोकतंत्र के उन्नायक और संरक्षण की शर्ते पूरी की हैं. समाचारों का फ़ुटपाथीकरण भारत में पिछले एक वर्ष में समाचार चैनलों ने समाचार का रंग ही बदल दिया है जब हिंदी में पत्रिकाएँ खत्म हो रही थीं, तब अचानक ऐसी पत्रिकाओं की बाढ़ आई जिनकी शुरूआत 'मनोहर कहानियाँ' ने की थी.'मनोहर कहानियाँ', 'सच्ची कहानियाँ' जैसी पत्रिकाओ से फुटपाथ अटे पड़े रहते थे, अभी भी शायद यह थोड़ा बहुत चल रहा है. लेकिन ऐसा लग रहा है कि उन्हें निकालने वाले बेरोज़गार नहीं हुए, वे सारे टीवी समाचार चैनलों में चले गए, या यह कहें कि वह जज़्बा ख़त्म नहीं हुआ, वह फ़ुटपाथ से उठकर तमाम अपने भोंडे रंगो, बदबू आदि के साथ टीवी समाचार चैनलों में चला गया. अब अगर हम कोई भी टीवी समाचार चैनल खोले तो ऐसा लगता है जैसे 'मनोहर कहानियाँ' और 'सच्ची कहानियाँ' खोल कर बैठे हैं. अपराध और सेक्स की सनसनीखेज़ दस्तावेज सारे समाचार चैनल 'एफ़आईआर', 'क्राइम फाइल',' क्राइम रिपोर्टर' और न जाने क्या-क्या नामों के कार्यक्रम पेश करते हैं. ये सभी अपनी भाषा और प्रस्तुति में फ़ुटपाथी साहित्य को मात करते हैं, बल्कि सुना जा रहा है कि इस सफलता से खुश होकर एक दृश्य मीडिया समूह अपराध समाचारों का एक पूरा अलग चैनल ही शुरू करने जा रही है. प्रिंट मीडिया एक बुढ़ाते बड़े भाई की तरह पीछे-पीछे घिसट रहा है. मीडिया और अपराध अगर अपराध न हों तो मीडिया वाले ऐसा शून्य महसूस करेंगे जैसा पहली प्रेमिका के जाने के बाद होता है हम लोग राजनीति, फ़िल्म, व्यापार आदि से अपराध के संबंधों पर बड़ी चर्चा करते रहते हैं लेकिन मीडिया और अपराध के हम-संबंध पर चर्चा नहीं होती. अगर अपराध न हों तो मीडिया वाले ऐसा शून्य महसूस करेंगे जैसा पहली प्रेमिका के जाने के बाद होता है और अगर सेक्स परोसने पर पाबंदी लग जाए तो कई चैनलों और पत्र पत्रिकाओं को उस तरह कोरे पन्ने छोड़ने पड़ेंगे जैसे आपातकाल में सेंसरशिप के ख़िलाफ़ कुछ पत्र-पत्रिकाओं ने किया था. अपराध और सैक्स परोसने के कई फायदे हैं. एक तो ख़ुद को भी मजा आता है सनसनी और गुदगुदाहट से. हमारे मार्केटिंग वाले भी खुश रहते हैं क्योंकि आपराधिक मार्केंटिंग वालों का विश्वास है कि जितना घटिया माल, उतना बेचना आसान. मार्केटिंग वालों की खुशी में पत्रकारों की खुशी हैं क्योंकि आजकल वे ही माई बाप है. आसानी सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि अपराध और सेक्स परोसने में अक़्ल का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करना पड़ता है और सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि अपराध और सेक्स परोसने में अक़्ल का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करना पड़ता है, जिसकी बेहद कमी मीडिया में खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में है. सुना है कि कई चैनल 30-40 आई क्यू से ज़्यादा वाले लोगों को नौकरी नहीं देते. अपराध और सेक्स बेचने पर जब कोई आ जाए तो इसका मतलब है कि उसका दिमाग़ दिवालिया हो का है, उसके पास सोचने को कुछ नहीं बचा है, इसीलिए वह सबसे आसान विकल्प पर आ चुका है. फिर सेक्स और अपराध बेचकर नैतिक दिखा जा सकता है, क्योंकि बेचने का एंगल तो वहीं होता है -छी-छी देखिए कितना गंदा है. फ़िलहाल मामला फुटपाथ के स्तर पर चल रहा है. और ज़ीने पर जाएगा तब क्या होगा पता नहीं, लेकिन वहाँ भी कुछ तो भाई लोग तलाश ही लेंगे. क्या टीवी से सुकून आया? समाचार और मनोरंजन का यह माध्यम अब स्थाई रूप से हमारी ज़िंदगी में आ चुका है. टीवी पर आई बड़ी से बड़ी ख़बर भी वैसी सूचना नहीं दे पाती, जो अख़बारों के ज़रिए मिलती है अब इसे अपने जीवन से निकालना और हटाना तो दूर की बात, इसे कुछ घंटों तक 'ऑफ़' रखना भी असंभव होता जा रहा है. टीवी पर चलती-फिरती तस्वीरों का नशा ऐसा चढ़ता है कि इसके 'ऑफ़' होते ही कुछ छूट जाने का ख़तरा होता है. दुनिया भर की अच्छी-बुरी ख़बरें बस एक बटन दबाते ही हमारी आँखों के सामने नाचने लगती हैं. लेकिन क्या इससे हमारी ज़िंदगी में सुकून आया है? मेरा जवाब होगा – नहीं आया है. टीवी देखते हुए हम उत्तेजित और प्रभावित होते हैं. इस उत्तेजना और प्रभाव की अप्रत्यक्ष मानसिक प्रतिक्रिया को हम समझ नहीं पाते. धीरे-धीरे हम टीवी से चिपक जाते हैं. मनोरंजन, समाचार और ज्ञान देने में टीवी की भूमिका फ़िल्म, अख़बार और पुस्तकों से कम है. सतही समाचार यह एक ऐसा माध्यम है, जिसे पलटकर या दोबारा नहीं देखा जा सकता. इसमें आँखों के सामने से जो एक बार निकल गया, वह कुछ बिंबों में थोड़ी देर के लिए दिमाग़ में टिकता हैं. जैसे ही दूसेर दृश्य आँखों के सामने से गुज़रते हैं, वैसे ही पुराने बिंब धूमिल हो जाते हैं. यही कारण है कि टीवी पर आई बड़ी से बड़ी ख़बर भी वैसी सूचना नहीं दे पाती, जो अख़बारों के ज़रिए मिलती है. मुझे लगता है कि टीवी पर तात्कालिकता अधिक महत्वपूर्ण होती है. सबसे पहले और तुरंत आने की होड़ में ख़बरों की सतह पर ही टीवी के कैमरे पैन होते हैं और टीवी रिपोर्टर समाचार की सतह ही दिखाते और बताते रहते हैं. न तो ख़बरों की गहराई में वे हमें ले जाते हैं और न उसके आगे-पीछे के कारण और प्रभाव के बारे में बताते हैं. छोटी ख़बरों तक में 'लाइव' या आँखों देखा हाल की सनसनी तो रहती है, पर अगले दिन तक उसका असर ग़ायब हो जाता है. कहते हैं कि भरोसे पर ही दुनिया टिकी है और समाचार माध्यम भी. दरअसल पाठकगण, श्रोतागण, दर्शकगण किसी सूचना या समाचार के लिए समाचार माध्यम की ओर लपकते हैं. लाजिमी है कि वे भरोसे का समाचार या सूचना चाहते हैं. ज़्यादा दिन नहीं हुए जब भारत के राष्ट्रपति रहे केआर नारायणन की मौत की ख़बर को टीवी चैनलों ने उनके देहावसान के पूर्व ही प्रसारित कर दिया. ऐसी घटनाओं से इन समाचार माध्यमों के प्रति लोगों का भरोसा डिगता है. आज की दुनिया ग्लोबल हो चुकी है. किसी भी सूचना या समाचार को ज़्यादा देर तक लोगों के सामने आने से रोका नहीं जा सकता और ग़लत समाचार तो प्रसारित किया ही नहीं जा सकता. अगर करते हैं तो उसकी पोल-पट्टी तुरंत खुल जाएगी. इराक युद्ध के समय यह कहा गया था कि वहां ऐसा हो रहा है, वैसा हो रहा है पर बाद में ये समाचार आए कि वो सच नहीं था. इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मीडिया लोगों की आँखों में धूल नहीं झोंक सकता. ग़लतियां स्टोरी प्लांट करना भी ख़तरे से खाली नहीं होता. आपको याद होगा कि अरसे पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में सैकड़ों लोगों(एक समुदाय विशेष के) के मारे जाने की ख़बर कुछेक अख़बारों ने प्रमुखता से लगा दी थी पर ख़बर सही नहीं थी. इस ख़बर ने कुछ ऐसा असर किया कि अलीगढ़ से रांची तक दसियों जगह दंगे भड़क उठे. दरअसल, मीडिया से दर्शकों-पाठकों-श्रोताओं की पहली अपेक्षा सूचना पाने की होती है, सनसनी पाने की नहीं. सिनेमा आदि के कुछेक हवा-हवाई गॉसिप को वह भले पचा लें पर गंभीरता और विश्वसनीयता के दायरे से बाहर जाने वाली सूचनाओं को वह समझ लेता है. ऐसे में मीडिया की विश्वसनीयता गिरती है. गुजरात दंगों के समय भी कुछेक अख़बारों की भूमिका ने पाठकों और लाखों लोगों के भरोसे और विश्वास का कत्ल किया था. भरोसा सवाल सिर्फ़ एक या दो अख़बारों या चैनलों द्वारा ऐसा किये जाने का नहीं है, सवाल है समूचे मीडिया की विश्वसनीयता का. आज लोगों को आप बेवकूफ़ न तो समझ सकते हैं और न ही बना सकते हैं. टीआरपी या व्यवसायिकता चाहे जो नाच नचावे पर अपनी विश्वसनीयता का ख़्याल रखना चाहिए. ऐसा भी नहीं है कि मीडिया ने भरोसा नहीं दिया या दिखाया है. हालिया चर्चित जेसिका लाल का प्रसंग लें. मीडिया ने जिस तरह की एक्टिविज़्म इस मामले में दिखाई और जनता ने भी जितनी सक्रियता दिखाई, उससे लगता है कि भरोसे नाम की कोई चीज़ भी होती है और मीडिया इसे स्थापित करने में लगा हुआ है.















Reference:
1.History OF Journalism in india
2.regional journalism by Anurag Faisal
3.history of hindi journalism
4.www.pib.nic.in
5.blog of different reporters & media critique
6.journalism in Bihar by sri sanjay singh(IIS)
7.media vimars
Special thanks to:-
Prof. Nandkishor Tiwary ,sasaram,Kumar Bindu Reporter Hindustan,
Dr. Shyamsunder Tiwari (AIR) sasaram,

मंगलवार, 22 मई 2012

'2040 तक दुनिया से नदारद हो जाएंगे न्यूज पेपर'

  • न्यूज पेपर के भविष्य को लेकर एक खराब और दिल दहला देने वाला आकलन,जरा सोचिए कैसा होगा वो दिन जब घर में कारी सुख सुविधाएं और संचार के तमाम साधन तो होंगे, मगर रोजाना छपने वाला पेपर नहीं होगा। पेपर के बगैर चाय का कैसा होगा या रहेगा स्वाद । ओह
जेनेवा। संयुक्त राष्ट्र संगठन के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि वर्ष 2040 तक छपाई वाले अखबार दुनिया से नदारद हो जाएंगे और इनकी जगह डिजिटल अखबार ले लेंगें।
प्रांसीसी दैनिक ला ट्रिब्यून डे जेनेवे ने संयुक्त राष्ट्र बौद्धिक संपदा संगठन के प्रमुख प्रैंसिस गुरी के हवाले से बताया है कि कुछ वर्षों बाद मुद्रित अखबार बीते जमाने की बात हो जाएंगे । गुरी ने कहा कि यह विकास की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसमें अच्छा या बुरा जैसी कोई बात नहीं है। हमारे पास इस तरह के अध्ययन हैं जिनके निष्कर्षों के आधार पर पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि 2040 तक अखबार नदारद हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिका इस मायने में सबसे आगे होगा और वहां 2017 में यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। गुरी ने कहा कि अमेरिका में इस समय डिजिटल अखबार कागज के अखबारों से कहीं ज्यादा बिक रहे हैं और शहरों में तो किताबों की दुकानें भी बहुत कम हैं।
यह पूछे जाने पर कि ऐसी स्थिति में अखबारों के लिए लेख लिखने वालों को मेहनताना देने के लिए संपादकों को राजस्व कहां से मिलेगा गुरी ने कहा कि लेखकों को भुगतान के लिए कापीराइट प्रणाली को मजबूत करना होगा।

प्रभाष जोशी

प्रभाष जोशी
जन्म
१५ जुलाई, १९३६
इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत
मृत्यु
५ नवंबर, २००९
पेशा
धर्म

प्रभाष जोशी (जन्म १५ जुलाई १९३६- निधन ५ नवंबर २००९)हिन्दी पत्रकारिता के आधार स्तंभों में से एक थे। वे राजनीति तथाक्रिकेट पत्रकारिता के विशेषज्ञ भी माने जाते थे। दिल का दौरा पड़ने के कारण गुरुवार, ५ नवंबर, २००९ मध्यरात्रि के आसपासगाजियाबाद की वसुंधरा कॉलोनी स्थित उनके निवास पर उनकी मृत्यु हो गई।
अनुक्रम
·         देहांत
·         संदर्भ

[संपादित करें]व्यक्तिगत जीवन
प्रभाष जोशी का जन्म भारतीय राज्य मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के निकट स्थित बड़वाहा में हुआ था। उनके परिवार में उनकी पत्नी उषा, माँ लीलाबाई, दो बेटे संदीप और सोपान तथा एक बेटी पुत्री सोनल है। उनके पुत्र सोपान जोशी, डाउन टू अर्थ नामक पर्यावरण विषयक अंग्रेजी पत्रिका के प्रबन्ध सम्पादक हैं।[1] प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था[2]
[संपादित करें]कार्य जीवन
इंदौर से निकलने वाले हिन्दी दैनिक नई दुनिया से अपनी पत्रकारिता शुरू करने वाले प्रभाष जोशी, राजेन्द्र माथुर और शरद जोशी के समकक्ष थे। देशज संस्कारों और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित प्रभाष जोशी सर्वोदय और गांधीवादी विचारधारा में रचे बसे थे। जब १९७२ में जयप्रकाश नारायण ने मुंगावली की खुली जेल में माधो सिंह जैसे दुर्दान्त दस्युओं का आत्मसमर्पण कराया तब प्रभाष जोशी भी इस अभियान से जुड़े सेनानियों में से एक थे। बाद में दिल्ली आने पर उन्होंने १९७४-१९७५ में एक्सप्रेस समूह के हिन्दी साप्ताहिक प्रजानीति का संपादन किया।[3] आपातकाल में साप्ताहिक के बंद होने के बाद इसी समूह की पत्रिका आसपास उन्होंने निकाली। बाद में वे इंडियन एक्सप्रेस के अहमदाबाद, चंडीगढ़ और दिल्ली में स्थानीय संपादक रहे। प्रभाष जोशी और जनसत्ता एक दूसरे के पर्याय रहे। वर्ष १९८३ में एक्सप्रेस समूह के इस हिन्दी दैनिक की शुरुआत करने वाले प्रभाष जोशी ने हिन्दी पत्रकारिता को नई दशा और दिशा दी। उन्होंने सरोकारों के साथ ही शब्दों को भी आम जन की संवेदनाओं और सूचनाओं का संवाद बनाया। प्रभाष जी के लेखन में विविधता और भाषा में लालित्य का अद्भुत समागम रहा। उनकी कलम सत्ता को सलाम करने की जगह सरोकार बताती रही और जनाकांक्षाओं पर चोट करने वालों को निशाना बनाती रही। उन्होंने संपादकीय श्रेष्ठता पर प्रबंधकीय वर्चस्व कभी नहीं होने दिया। १९९५ में जनसत्ता के प्रधान संपादक पद से निवृत्त होने के बाद वे कुछ वर्ष पूर्व तक प्रधान सलाहकार संपादक के पद पर बने रहे। उनका साप्ताहिक स्तंभ कागद कारे उनके रचना संसार और शब्द संस्कार की मिसाल है। प्रभाष जोशी ने जनसत्ता को आम आदमी का अखबारबनाया। उन्होंने उस भाषा में लिखना-लिखवाना शुरू किया जो आम आदमी बोलता है। देखते ही देखते जनसत्ता आम आदमी की भाषा में बोलनेवाला अखबार हो गया। इससे न केवल भाषा समृद्ध हुई बल्कि बोलियों का भाषा के साथ एक सेतु निर्मित हुआ जिससे नये तरह के मुहावरे और अर्थ समाज में प्रचलित हुए।
अब तक उनकी प्रमुख पुस्तकें जो राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं वे हैं- हिन्दू होने का धर्म, मसि कागद और कागद कारे। उन्हें हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में योगदान के लिए साल २००७-०८ का शलाका सम्मान भी प्रदान किया गया था।[4]
जोशी जी अनुकरणीय क्यों है और उन्हें पत्रकार क्यों माना जाए ? इन दो सवालों के जबाव उनके जीवनकर्म में समाहित हैं .प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे [2] अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था
अपनी धारदार लेखनी और बेबाक टिप्पणियों के लिए मशहूर प्रभाष जोशी अपने क्रिकेट प्रेम के लिए भी चर्चित थे। गुरुवार, 5 नवंबर, 2009 को टीवी पर प्रसारित हो रहे क्रिकेट मैच के रोमांचक क्षणों में तेंडुलकर के आउट होने के बाद उन्होंने कहा कि उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं है। इसके कुछ समय बाद उनकी तबियत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। रात करीब 11:30 बजे जोशी को नरेंद्र मोहन अस्पताल ले जाया गया , जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।[5] उनकी पार्थिव देह को विमान से शुक्रवार दोपहर बाद उनके गृह नगर इंदौर ले जाया जाएगा जहां उनकी इच्छा के अनुसार, नर्मदा के किनारे अंतिम संस्कार होगा।[6] सुबह जैसे ही उनके दोस्तों, प्रशंसकों और उनका अनुसरण करने वाले लोगों को उनकी मृत्यु की जानकारी मिली तो सभी स्तब्ध रह गए। समूचा पत्रकारिता जगत उनके इस तरह से दुनिया छोड़कर चले जाने से शोक संतप्त है। हर पत्रकार उन्हें अपने अपने अंदाज में श्रद्धांजलि दे रहा है।[7] प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे [2] अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था
[संपादित करें]बाहरी कड़ियाँ
§  लुटियन के टीले का भूगोल  (गूगल पुस्तक ; लेखक - प्रभाष जोशी)
§  धन्न नरमदा मइया हो  (गूगल पुस्तक ; लेखक - प्रभाष जोशी)
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सच, साहस और सरोकार, यानी प्रभाष जोशी
विद्रोही तेवर और वैचारिक गहनता के लिए जाने जाने वाले प्रभाष जोशी ने नए पत्रकारों के साथ जनसत्ता शुरू किया और उसे भारतीय पत्रकारिता के सबसे लोकप्रिय, पठनीय एवं प्रबल प्रतीकों में बदल दिया।
- बालेन्दु शर्मा दाधीच
English Summary:
Indian political class is facing a historic challenge
As civil society and opposition leaders take the government to task on the issue of corruption, Indian politicians are finding it increasingly difficult to avoid the limelight.
मैंने राजस्थान पत्रिका में अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की थी। मेरे लिए वह सीखने का समय था और 'पत्रिका' के दफ्तर में आने वाले प्रांतीय एवं राष्ट्रीय अखबारों को पढ़ने के लिए हम युवा मित्रों में होड़ लगी रहती थी। लेकिन अखबारों के गट्ठर में से जिसे उठाने के लिए हम सबसे पहले लपकते थे, वह था. 'जनसत्ता।' दर्जन भर अखबारों के बीच वह अलग ही दिखाई देता। बहुत प्रबल उपस्थिति थी उसकी। प्रभाषजी के संपादन में निकले इस नए अखबार ने कुछ ही महीनों में देश भर में युवकों को आकर्िषत कर लिया था। जहां हिंदी पत्रकारिता में हम सब एक सी लीक पीटने में लगे हुए थे और रोजमर्रा की खबरों को किसी तरह आकर्षक ले.आउट (अखबार का डिजाइन) में चिपका देने को ही बहुत बड़ी सफलता माने बैठे थे वहीं जनसत्ता ने हम सबको बड़ा झटका दिया था। सिर्फ पाठकों को ही नहीं, प्रबंधकों को भी, पत्रकारों को भी, संपादकों को भी, नेताओं को भी। हिंदी पत्रकारिता के लिए लगभग ठहराव के से उस जमाने में स्व॰ प्रभाष जोशी ने हमें झकझोर कर बताया कि सब कुछ ठहरा हुआ नहीं है। हिंदी में भी नया करने के लिए असीमित गुंजाइश मौजूद है। 'जनसत्ता' से हमने जाना कि अखबार क्या होता है, छपे हुए शब्दों की ताकत क्या होती है, इनोवेशन (नवीनता) क्या होता है। ऐसा लगता था जैसे हर खबर किसी भट्टी में तप कर खरा सोना बनकर निकली है। एक.एक शब्द का महत्व था। सामान्य सी खबरें जब जनसत्ता में छपती थीं तो दिलचस्प हो जाती थीं। रोजमर्रा की घटनाओं के पीछे व्यापक अर्थ दिखाई देने लगते थे। कितनी सरल, देसज, किंतु दमदार भाषा! कितना चुस्त संपादन! खबरों का कितना सटीक चयन! कितनी निष्पक्षता और कितनी निडरता!
प्रभाषजी के जनसत्ता को हम लगभग उतनी ही तल्लीनता के साथ पढ़ते थे जैसे जेम्स बांड का कोई उपन्यास पढ़ रहे हों। रोज उसके आगमन का वैसे ही इंतजार करते थे जैसे कि छुट्टी पर घर लौटने वाला नया.नवेला रंगरूट विलंब से चल रही रेलगाड़ी का करता है। यह एक चमत्कार था। लगता था, स्वाधीनता आंदोलन के लंबे अरसे बाद पत्रकारिता का गौरवशाली युग लौट आया था। इस सबके पीछे जादू था प्रभाष जोशी का, जो योजनाकार, प्रबंधक, संपादक, भाषा.शास्त्री, एक्टिविस्ट, डिजाइनर और टीम.लीडर जैसी कितनी ही भूमिकाएं एक साथ, एक जैसी कुशलता के साथ निभा रहे थे। पत्रकारिता की जनसत्ता शैली आज प्रिंट से लेकर टेलीविजन और ऑनलाइन मीडिया तक फैल चुकी है। उस शैली के शिल्पकार प्रभाष जोशी ही थे। राजस्थान पत्रिका के बीकानेर संस्करण में बतौर डेस्क इंचार्ज काम करते हुए मैंने इंडियन एक्सप्रेस समूह पर सीबीआई के छापे की खबर पढ़ी। यह देखकर मैं भौंचक्का रह गया कि 'जनसत्ता' ने अपने प्रभात संस्करण में यह खबर एजेंसी के माध्यम से दी थी। प्रभाषजी निष्पक्षता के लिए इस हद तक जा सकते हैं कि खुद अपने ही प्रतिष्ठान पर हुए हमले की खबर दूसरे स्रोतों के जरिए छापें! ऐसा उदाहरण मैंने कोई और नहीं देखा जब किसी संस्थान ने खुद अपने बारे में भी तटस्थ माध्यम से खबर दी हो। रिलायंस और बोफर्स जैसे मुद्दों पर केंद्र सरकार के विरुद्ध खड़े होने का परिणाम एक्सप्रेस समूह ने लंबे समय तक भोगा था। लेकिन प्रभाषजी का 'जनसत्ता' दमन का सामना करते हुए भी सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता के पत्रकारीय मानदंडों को नहीं भूला।
मैंने इसी घटना से प्रभावित होकर, प्रभाषजी की टीम का हिस्सा बनने का सपना देखा था। सच की लड़ाई में मेरे जैसे कई युवक उनके साथ खड़े होना चाहते थे। संयोगवश, कुछ महीने बाद मुझे इसका अवसर भी मिला जब 'जनसत्ता' ने नए लोगों की भर्ती का विज्ञापन निकाला। अखबार में चयनित होने के बाद हर दिन प्रभाषजी से कुछ न कुछ सीखा. कभी सीधे, तो कभी परोक्ष रूप में।
कमाल का आदर्शवाद था उनका. जनसत्ता को आम आदमी की आवाज बनना है। सिर्फ उसी के प्रति जवाबदेह हैं हम। हमें प्रतिष्ठान पर अंकुश लगाने वाले जन.माध्यम की भूमिका निभानी है। व्यक्तिवाद के लिए कहीं जगह नहीं थी। निदेर्श था कि प्रभाषजी से जुड़े आयोजनों की खबरें 'जनसत्ता' में नहीं छपेंगी। वह भी क्या जमाना था! रामनाथ गोयनका जैसे प्रबल अखबार मालिक और उनके अधीन प्रभाष जोशी तथा अरुण शौरी (इंडियन एक्सप्रेस) जैसे संपादक। अरुण शौरी भले ही कई मायनों में बड़े पत्रकार, राजनीतिज्ञ और लेखक रहे हों लेकिन प्रभाष जी की बात कुछ और थी। उनकी सोच, ज्ञान, प्रतिभा और क्षमताओं का दायरा कहीं बड़ा और विस्तृत था।

'
जनसत्ता' जो भी लिखता, बड़े अधिकार एवं प्रामाणिकता के साथ लिखता। खबर किसके पक्ष में है और किसके खिलाफ, यह कभी किसी ने नहीं सोचा। अगर कुछ गलत है तो उसका प्रबलता से विरोध करना है। भले ही परिणाम जो भी हो। और अगर कोई सही है तो उसके साथ खड़े होने में संकोच एक किस्म का अपराध है। मुझ जैसे पत्रकारों, जिन्हें जनसत्ता की सफलता के दौर में वहां प्रशिक्षण पाने का मौका मिला, को प्रभाषजी के दिए संस्कारों, उनके सिखाए मूल्यों और आदशर्ों से इतना कुछ मिला है कि वह जीवन भर हमारे मार्ग को निदेर्शित करेगा। नए.नवेले पत्रकारों की टीम को सिर्फ पत्रकारिता, भाषा और प्रयोगवाद की दीक्षा ही नहीं दी, सार्थक जीवन के मायने भी सिखाए। वे सिर्फ सुयोग्य ही नहीं थे। वे सिर्फ प्रतिबद्ध मात्र भी नहीं थे। वे समाज और राजनीति में बदलाव लाने के लिए बेचैन एक्टिविस्ट भी थे। वे समाज में बड़ा बदलाव लाना चाहते थे. उसे सकारात्मक, समावेशी, उदार, जीवंत बनाने के लिए योगदान देना चाहते थे। उन्हें अखबार की दुनिया से बाहर आकर कोई बड़ी भूमिका निभाने का मौका नहीं मिला। यदि मिलता तो शायद वह एक अलग अध्याय होता। उनकी विचारधारा पर गांधी का गहरा असर था। लेकिन प्रभाषजी में ऐसा बहुत कुछ था जो उनका अपना था। बहुत मौलिक, गहन मंथन और अनुभवों के बाद निकला हुआ। 'जनसत्ता' के पन्नों पर कभी यह उनके खून खौला देने वाले विशेष मुखपृष्ठ संपादकीय में दिखता था (ऐसे संपादकीय स्व॰ इंदिरा गांधी और स्व॰ राजीव गांधी सरकारों की ज्यादतियों के प्रति एक्सप्रेस समूह के प्रबल प्रतिरोध की अभिव्यक्ति होते थे), तो कभी साहित्यिक गहराई एवं शिल्प.कौशल्य से परिमार्जित उनके स्तंभों 'मसि.कागद' एवं 'कागद.कारे' में। उनकी लेखन क्षमता को देखकर हैरानी होती थी। साफ.सुंदर, जमा.जमा कर लिखे गए शब्द, जिनकी शिरोरेखाएं घुमावदार होती थीं। एक के बाद एक कितने ही पन्ने लिखते चले जाते थे। जब वे क्रिकेट विश्व कप का कवरेज करने गए तो इतना कुछ लिखा कि दो.तीन किताबें छप जाएं। और सब का सब बेहद दिलचस्प, एक्सक्लूजिव और तेज! लगभग साठ साल की उम्र में उन्होंने ऐसी रिपोर्टिंग की जिसकी उम्मीद पच्चीस के नौजवान से भी नहीं की जा सकती।
हिंदी पत्रकारिता के प्रति उनका योगदान इतना अधिक है कि उन्हें आधुनिक हिंदी पत्रकारिता का पयरय समझा जाने लगा था। लोकप्रियता का आलम ऐसा था कि 'जनसत्ता' हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी अखबारों से भी होड़ लेता था। शायद ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी हिंदी अखबार के संपादक को विशेष संपादकीय लिखकर अपने पाठकों से अनुरोध करना पड़ा हो कि अब वे अखबार को मिल.बांटकर पढ़ें क्योंकि हमारी मशीनों में इतनी क्षमता नहीं कि वे छपाई की और अधिक मांग पूरी कर सकें।
विद्रोही तेवर और वैचारिक गहनता का प्रतीक जनसत्ता धीरे.धीरे भारतीय पत्रकारिता के सबसे लोकप्रिय, पठनीय एवं प्रबल प्रतीकों में बदल गया था। वहां सनसनीखेज पत्रकारिता नहीं थी, जन.सरोकारों को आगे बढ़ाने वाली पत्रकारिता थी। यह प्रभाषजी के नेतृत्व का ही परिणाम था कि दिल्ली के सिख विरोधी दंगों के दौरान जनसत्ता ने सवर्त्र व्यापी उन्माद के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाया और दंगापीङ़ितों के पक्ष में पत्रकारिता की। सब जगह से निराश, हारे.थके व्यक्ति के लिए उन दिनों एक ठिकाना जरूर था, और वह था. जनसत्ता। अब वह सब हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का हिस्सा है। प्रभाषजी ने दिखाया कि पत्रकारिता के उद्देश्यों और सार्थकता के बारे में जो कुछ हमने पढ़ा था वह सिर्फ किताबी नहीं था।
प्रभाषजी नहीं रहे। लेकिन उनके संस्कार तो हैं! उनके जीवन.मूल्य तो हैं! प्रभाषजी की तराशी हुई टीम तो है, भले ही अलग.अलग स्थानों पर और अलग.अलग भूमिकाओं में। वह उनके सिखाए को आगे बढ़ाएगी। अपने विचारों और मूल्यों के रूप में प्रभाषजी सदा हमारे बीच रहेंगे. एक मार्गदर्शक बनकर।
Posted On: 06/11/09
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Friday, 03 April 2009 04:27 अशोक कुमारभड़ास4मीडिया इंटरव्यू
हमारा हीरो - प्रभाष जोशी
प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी का इंटरव्यू करनेभड़ास4मीडिया की टीम उनके वसुंधरा स्थित निवास पहुंची तो शुरुआती दुआ-सलाम के बाद जब उनसे बातचीत शुरू करने का अनुरोध किया गया, तो उन्होंने हंसते हुए कहा- भई अपन के अंदर 'भड़ास' नाम की कोई चीज है ही नहीं। हालांकि जब प्रभाष जी से बात शुरू हुई तो बिना रूके दो घंटे से अधिक समय तक चली। इंटरव्यू में प्रभाष जी नए-पुराने सभी मुद्दों पर बोले।
प्रभाष जी का कहना है कि उन्होंने 'हंस' पत्रिका को कभी नहीं पढ़ा। एक ब्लाग पर खुद को दंभीऔर क्रूरकहे जाने का भी जवाब दिया। राकेश कोहरवाल और आलोक तोमर को जनसत्ता से निकाले जाने पर बोले- 'मैं गुडी-गुडी वाला संपादक नहीं रहा। जनसत्ता के  हितों का जो भी मामला हुआ, उसमें जो आड़े आया, उसे अपन ने बर्दाश्त नहीं किया। चाहे वो आलोक तोमर रहे हों या उमेश जोशी।'' पेश हैप्रभाष जोशी सेभड़ास4मीडिया के रिपोर्टरअशोक कुमार की बातचीत के अंश-


-अपने बारे में शुरू से बताइए, जन्म से लेकर पढ़ाई-लिखाई तक के बारे में।
--मां का कहना है कि 15 जुलाई 1937 को जिस दिन मैं जन्मा, (मध्य प्रदेश के सिहोर जिले के आस्टा गांव में) दो-तीन दिन पहले से ही खूब बारिश हो रही थी। मेरे प्रसव के लिए मां मौसी के घर गई थीं। आस्टा गांव के किनारे पार्वती नदी बहती है। नदी लबालब थी, बाढ़ की स्थिति थी। मुश्किल इतनी थी कि मुझे और मेरी मां को खटिया पर डालकर जिनिंग फैक्ट्री (कपास के बीज की फैक्ट्री), जो सबसे ऊंची जगह थी, वहां लाया गया। तब जाकर हम बचे। उसके बाद भी बारिश दो दिन तक होती रही। हम 12 भाई बहन थे, जिसमें दो नहीं रहे। तीन बहनों के बाद मैं पहला बेटा था। गरीब परिवार था। मगर अभाव के बावजूद गदगद वातावरण था। मां पढ़ी-लिखी  नहीं थी। सिर्फ गीता पढ़ पाती थी।
मेरे पिताजी होल्कर स्टेट में फौजदारी में थे। राव साहब कहलाते थे। दुनिया भर के अपराधी जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे, अक्सर आया करते थे। एक दिन कोई अपराधी केस जीत गया। घर आया। पिताजी घर पर नहीं थे। उनने पिताजी जहां बैठते थे, वहां माला रखा, मिठाई रखी और चला गया। बड़ी बहनों की शादी हो गई तो मैं मां की मदद के लिए घर के सारे काम करता था। बहनों से भी बड़ा स्नेह था। जब बड़ी बहन का निधन हुआ तो मैने मालवा के लोकगीत म्हारी बेन्या बाई जोवे बाटके शीर्षक से कागद कारेमें लिखा।
पढ़ने में रुचि नहीं थी। हाई स्कूल तक की शिक्षा महाराजा शिवाजी राव प्राइमरी और मिडिल स्कूल में हुई। बहुत तेज नहीं था, बस पास हो जाता था। एक बार फेल हो गया था तो शिक्षकों के पीछे लग कर सपलमेंटरी ले लिया। घुमक्कड़ी का शौक था। मित्र कैलाश मालवीयऔर मैं साइकिल से जंगल निकल जाते। मां घर से कसार बना कर देती थी। भूख लगती तो जंगल में ही मैं चूल्हा बनाता और मालवीय छाना (पशुओं के सूखे हुए गोबर) लाते। फिर दूध में कसार डालकर दोनों आधा-आधा खाते। कालेज में आकर थोड़ा ठीक हुआ।
सन् 51 या 52 में मैट्रिक के बाद इंदौर में ही होल्कर कालेज में दाखिला लिया, मगर पिताजी चाहते थे कि मैं साइंस और मैथ पढ़ूं तो गुजराती कॉलेज चला आया। नौकरी- करियर जैसी चीजों मे कभी मन नहीं लगा। क्रिश्चियन कॉलेज के समाजशास्त्र के प्रो. पाटिल लड़कों को गांव ले जाते थे। उनसे संबंध निकाल मैं भी साथ जाने लगा। तब देश आजाद हुआ था और देश को नए सिरे से बनाने का सपना था। सन् 1955 में इंटर की परीक्षा छोड़ दी और सुनवानी महाकाल गांव में लोगों के बीच काम करने चला गया।
-उसके बाद?
--पिताजी इससे काफी दुखी रहते थे। एक दिन बस से घर लौट रहा था तो पास में एक सज्जन बैठे थे। तब दाढ़ी उग आई थी और मैं खादी पहनता था। मुझे देखते रहे, फिर पूछा, किसके बेटे हो? मैने बताया। वो पिताजी के दोस्त थे। वे बोले, तुम्हारे पिता इसीलिए दुखी रहते हैं। फिर उन्होंने सुनवानी महाकाल में मुझे प्राइमरी स्कूल में मास्टरी पर लगवा दिया। सुबह बच्चों को इकठ्ठा कर पूरे गांव में झाड़ू देता था। अपना अनाज खुद पीसता था। गांव की महिलाएं मुझे छेड़ने के लिए अपने घर का अनाज मेरे दरवाजे पर रख जाया करती थीं। वहां गांव के हर घर में, चाहे वह किसी जाति का हो, मैंने खाना खाया। तब रसोई में महिलाएं और लड़कियां मेरे झाड़ू लगाने और अनाज पीसने को लेकर खूब मजाक किया करती। गांव का जब भी कोई बीमार होता तो उसे लेकर पास के शहर देवास जाता था। वहीं 55-56 में कुमार गंधर्व से मुलाकात हुई। दुनिया भर के क्लासिकल किताबों को यहीं पढ़ा। जिस लेखक को शुरू करता उसकी आखिरी किताब तक पढ़ जाता। चाहे वो तोल्सताय हों, शेक्सपीयर या चेखव। गांव वाले भी खूब मानते थे। जब वे अनाज बेचने इंदौर जाते तो मेरे घर पूरे साल का अनाज दे आते थे। 1960 तक मैं यहीं रहा। 60 में मुझे लगा कि या तो  मुझे राजनीति में जाना पड़ेगा या मैं भ्रष्ट हो जाऊंगा, क्योंकि सारा गांव मुझे लिजेंड मानता था। उधर कांग्रेस वालों को लगता था कि मैं कांस्टीट्यूएन्सी बना रहा हूं, जबकि मैं तो देश के नव-निर्माण में लगा था।
-पत्रकारिता में कैसे आए? किन-किन मीडिया हाउसों से जुड़े रहे।
--जब मैंने वहां से हटने का फैसला किया तभी मैने सोचा कि पत्रकारिता में क्यों नहीं आऊं। बिल्ली के भाग से छीका फूटा वाली बात हुई। उसी दौरान विनोबा जी इंदौर आए। वो क्या कह रहे हैं, तब उन्हें समझने वाला कोई नहीं था। नई दुनिया, इंदौर के संपादक राहुल बारपुते ने कहा कि तुम करो। तब मैंने इसे एक महीने तक कवर किया। मैं सिर्फ हथेली पर नोट लेता था और उसी से पूरा पेज भर देता था। (बीच में विषय से हटकर उत्साहित होते हुए कहते हैं- मैनें हंस आज तक नहीं पढ़ा, मगर गंगा प्रसाद विमल  ने फोन कर बताया कि उन्होंनेआपके बारे में लिखा है कि उनकी स्मृति से हर्ष होता है।) विनोबा जी सुबह तीन बजे से काम शुरू कर देते थे। मैं 2.45 में ही उनके पास पहुंच जाता। सारा दिन कवर कर वहां से नई दुनिया जाता। इसने पत्रकारिता के दरवाजे खोल दिये। मैं वहां काम करने लगा।
एक दिन कोई भी आफिस नही आया। तब मैने अकेले चार पन्नों का अखबार निकाला। दूसरे दिन मैं नाराज हुआ तो सभी ने कहा कि हम तो टेस्ट ले रहे थे। राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर और शरद जोशी के साथ वो जो ट्रेनिंग हुई, वो हमेशा काम आई। यहां 60 से 66 तक छह साल तक काम करते हुए मजे में बीता। इसी बीच एक बार प्रेस इंस्टीट्यूट में माइकल हाइट्स, जो लीड्स के किसी अखबार के संपादक थे, से मुलाकात हुई। वह हर क्षेत्र में मेरी रुचि से बेहद खुश थे। उन्होंने इंग्लैंड के प्रतिष्ठित वीकली न्यू स्टेट्समैनके संपादक जॉन फ्रीमन  से कहा। इस तरह मैं 1965 में इंग्लैंड गया। वहां इंग्लैंड से निकलने वाले मैनचेस्टर गार्डियनऔर लीड्स के टेलीग्राफ आर्गसमें कुछ महीनों तक काम किया। फिर लौट आया।
वापस आने के बाद मैं कुछ नया करना चाहता था। नई दुनिया ट्रेडिशनल अखबार था और वहां प्रयोग की गुंजाइश नहीं थी। तभी शरद जोशी  के पास भोपाल से मध्यदेशनाम से अखबार निकालने का प्रस्ताव आया। मुझसे भी बात की गई तो मैने हामी भर दी। हम दोनों ने मिलकर इसे निकाला। बाद में अखबार आर्थिक संकट का शिकार हो गया। पत्नी का जेवर गिरवी रखकर अखबार चलाना पड़ा। रद्दी बेच कर मोटरसाइकिल में पेट्रोल डलवाया। सन् 66-68 तक चलने के बाद इसे बंद करना पड़ा। 68 में ही गांधी शताब्दी समिति में पब्लिकेशन का सचिव होकर दिल्ली आ गया। तब से दिल्ली में धूल फांक रहा हूं।
-आपने कहा कि 'हंस' कभी नहीं पढ़ा, आखिर क्यों?
--बस ऐसे ही। अपन को जंचा नहीं। राजेंद्र यादव ने मेरे बारे में काफी बुरा लिखा है। अच्छा भी लिखा है।
-जनसत्ता में कैसे आए?
--दिल्ली आने के बाद सन् 70 से 74 तक 'सर्वोदय' निकाला। यह वीकली था और मैं उसका संपादक था। सर्वोदय में श्रवण गर्ग (वर्तमान में दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर) और अनुपम मिश्रा (फिलवक्त, गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े हुए) मेरे साथ थे। रामनाथ गोयनका ने मुझे 'सर्वोदय' में पढ़ा था। उन्हें मेरी भाषा बहुत अच्छी लगी थी। इसी बीच सन् 72 में जयप्रकाश नारायण को चंबल के डाकुओं का समर्पण कराने के लिए कुछ युवाओं की मदद चाहिए थी, जो उनके बीच जाकर उनसे बात कर सके। अनुपम, श्रवण और मैं फरवरी से उनके साथ काम करने लगे। डाकुओं ने अप्रैल में आत्मसमर्पण कर दिया था। इस पर जेपी और मैने पंद्रह दिनों में एक किताब तैयार कर दी थी। इससे जेपी को मुझसे प्रेम था। तभी एवरीमैंसनाम से वीकली पत्रिका शुरू हुई। इसके संपादक अज्ञेय जी  थे। हम उसमें मदद करते थे। फिर हिंदी में अखबार निकालने की बात हुई। रामनाथ गोयनका ने पहले से ही प्रजानीतिनाम ले रखा था। तब पहली बार मैं गोयनका जी से मिला। मुलाकात काफी डिजास्टर थी। वह जिस तरह से लोगों के बारे में खुल कर गालियों से बात कर रहे थे, मैने सोचा कैसे काम करूंगा। मैने लौटकर जेपी को पांच पन्नों की चिठ्ठी लिखी। जेपी ने वह गोयनका को दे दी।
एक दिन राधाकृष्ण और गोयनका (74 की शुरुआत में) गांधी नीति, राजघाट कालोनी स्थित मेरे घर पहुंच गए। घर में एक खाट थी औऱ टूटी हुई कुर्सी। राधाकृष्ण काफी मोटे थे। कुर्सी पर उन्हें बैठाने से वह टूट न जाए इसलिए मैने उन्हें खाट पर और गोयनका जी को कुर्सी पर बैठाया। जाते समय मैं और मेरी पत्नी उन्हें छोड़ने आए। मैने हाथ जोड़कर कहा कि बैठने की जगह ठीक नहीं थी। मैंने माफी मांगी। उन्होंने छेड़ते हुए कहा- महावत से दोस्ती, दरवाजो साकलो। (बड़े-बड़े लोगों से दोस्ती रखते हो और घर ऐसा)। इस पर मेरी पत्नी हंस पड़ी थीं। जाते-जाते कहा कि भले ही काम करना या न करना, कल शाम को आना।
मैं दूसरे दिन गया। वह रोज शाम कनाट प्लेस के हनुमान मंदिर और गोल मार्केट के काली मंदिर जाते थे। गाड़ी से वो मुझे लेकर निकले। दर्शन करने के बाद पूछा- क्या दिक्कत है? क्यों नहीं आते? मैने कहा- मेरी आत्मा में एक टोमस पैकेट है। गोयनका ने कहा- वह कौन होता है? फिर मैने उन्हें वह कहानी सुनाई कि राजा का एक दोस्त था। राजा ने उसे चर्च का मुखिया बना दिया। दोस्त ने जिस दिन चर्च संभाला, विद्रोह कर दिया।उन्होंने कहा, कोई बात नहीं, लड़ लूंगा तेरे से। फिर मैने मंजूर कर लिया। तब 'प्रजानीति' निकाली गई। यह सन् 74 से शुरू हुआ मगर इमरजेंसी के कारण 75 जून में इसे बंद करना पड़ा।
तब कहा जाता था कि इंदिरा जी और संजय दो लोगों से नाराज हैं। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक मुलगांवकर से और प्रजानीति के संपादक प्रभाष जोशी से। हमने इंडियन एक्सप्रेस छोड़ दिया। फिल्म और स्पोर्ट्स का वीकली आस-पासनिकाला। इसे भी छह महीने बाद बंद करना पड़ा। काफी मुश्किल दिन थे, हम घर से बाहर निकलते तो पुलिस वाला बैठा मिलता। इंडियन एक्सप्रेस का घर छोड़ कर गांधी पीस फाउंडेशन के उसी घर में आ गए थे, जहां से बाद में जेपी को पकड़ा गया।
-यह तो 'प्रजानीति' की बात हुई, 'जनसत्ता' कैसे शुरू किया?
--जब चुनाव की घोषणा हुई मैं पटना में जेपी के यहां था। मैं वापस लौट आया। रामनाथ गोयनका घर आए। कहा कि अब अखबार निकाल सकते हैं। तब देश भर में चुनाव को लेकर क्या चल रहा है, इसको लेकर अखबार निकालने की योजना बनी। सभी प्रांतों से सभी भाषाओं के अखबार रोज हवाई जहाज से आते थे। सभी भाषाओं के जानकार को बुलाया जाता था। अनुवाद के बाद उसका जिस्ट तैयार होता। वह इंडियन एक्सप्रेस में छपता था। यह पूरे चुनाव चला। एक दिन रामनाथ जी ने कहा कि संपादकीय तो सभी लिख रहे हैं हमें न्यूज स्टोरी पर ध्यान देना चाहिए। हमने खबर छापनी शुरू कर दी। मजबूरीवश टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स सबको हमें फॉलो करना पड़ा। लोग इंडियन एक्सप्रेस को जनता एक्सप्रेसकहने लगे।
फिर चंडीगढ़ से इंडियन एक्सप्रेस निकालना तय हुआ। दिल्ली का मोह छोड़ कर कोई जाना नहीं चाहता था। मैं वहां गया। सन् 77-78 से 81 तक वहां इंडियन एक्सप्रेस निकाला। सन् 81-83 तक इंडियन एक्सप्रेस, दिल्ली का आरई रहा। यहीं रहते हुए जनसत्ता की सारी योजना बनी।
-आपने राकेश कोहरवाल और आलोक तोमर को क्यों निकाला?
--(दिवंगत राकेश कोहरवाल के बारे में बचते हुए) मैने कागद कारे में लिखा है उनके बारे में। जहां तक आलोक की बात है, एक आर्टिकल था, गिरिराज किशोर का था। लेख छपने के लिए पूरी तरह तैयार था। उसमें कंप्यूटर पर सब उल्टा-पुल्टा कर दिया था। वह कंप्यूटर आलोक का था। उसे जाना पड़ा।
-आपने लिखा है कि महादेव चौहान, आलोक तोमर और राकेश कोहरवाल आपको अपराध बोध देते हैं। क्या है वह अपराध बोध?
--ये जब आए थे तो कुछ नहीं थे। जनसत्ता में नाम कमाया था। अखबार ने उन्हें कीर्ति दी थी। इनको उठाया था। सभी के टैलेंट को जनसत्ता ने उभारा था। हिट होने के बाद इनके तौर-तरीके बदल गए, जीवन में ऐसा होता है जब आपकी प्रतिभा को एक बार निखरने का मौका मिल जाता है, तब। आपमें जो प्रतिभा है उसे संभाल कर रोज तराशना और उसे रचनात्मक कार्य में लगाए रखना भी एक प्रतिभा है, वरना जिनमें अधिक प्रतिभा होती है वो विस्फोट करके नष्ट हो जाते हैं। ऐसे कई लोग थे जो जनसत्ता से जाने के बाद फिर कभी नहीं बढ़े।
जब मेरी पांच किताबों का एक साथ विमोचन था, तब अमर-उजाला के समूह संपादक (अब ग्रुप प्रेसीडेंट, न्यूज) शशि शेखर  ने कहा था 'हम जनसत्ता में आलोक तोमर का नाम सुनते थे। अब वो कहां हैं, किसी को नहीं पता।'
जब अखबार शुरू हुआ था तभी मैने सबको बुला कर कहा था कि हमें मिलकर एक परिवार बनाना है और यह परिवार अखबार बनाएगा। पांच साल तक पूरे 22 लोगों की टीम थी। इस टीम ने कैसा अखबार निकाला, आप जानते हैं।
-आज जनसत्ता अपने निम्न स्तर पर है, जबकि आपका नाम इससे जुड़ा हुआ है। इसे सुधारने के लिए आप खुद क्या कर रहे हैं?
--अभी भी खबर पढ़ने वालों का अखबार जनसत्ता ही है। यह एक अखबार के लिए बड़ा सम्मान है। इंडियन एक्सप्रेस के विभाजन के बाद हालात गड़बड़ हो गए। गोयनका की मृत्यु हुई और तभी मनमोहन सिंह के कारण भारत का खुले बाजार में प्रवेश हुआ। तब एड और सर्कुलेशन हावी हो गया। संपादकीय पीछे छूट गया। अब अखबार नो प्राफिट नो लॉस पर चल रहा है। विज्ञापन पाने के लिए हम ऐसा-वैसा कुछ नहीं करते। इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता में संपादक आज भी संपादक हैं। यह दिवंगत रामनाथ गोयनका की परंपरा है। मुझसे 99 में सीईओ बनने के लिए कहा गया था, मैने मना कर दिया।
-उमेश जोशी ने अपने ब्लॉग पर आपको दंभीऔर क्रूरकहा है। क्या अदावत है उनसे?
--कोई अदावत नहीं। वो हमारे यहां रहते हुए टीवी पर काम करने लगे। हमारे यहां ऐसा नहीं होता था। इसलिए हमने उन्हें कभी प्रमोट नहीं किया। अभय कुमार दुबे ने भी ऐसा ही किया था। हमने उन्हें कई बार समझाया कि क्यों करते हो। टीवी पर काम करना चाहते हो तो अखबार छोड़ दो भाई। जनसत्ता के हितों का जो भी मामला हुआ, उसमें जो भी आड़े आया हो, उसे अपन ने कभी बर्दाश्त नहीं किया। चाहे वो आलोक तोमर हों या जोशी। मैं गुडी-गुडी वाला संपादक कभी नहीं था। अच्छा एडमिनिस्ट्रेटर था।
-अभय छजलानी के सम्मान समारोह में आप नहीं थे, क्या आपको नहीं बुलाया गया था?
--बुलाया था। प्रेस क्लब वालों ने, जिन्होंने समारोह रखा था, मुझे बुलाया था। मगर मुझे हिंदी विद्यापीठ के वार्षिक बैठक में जाना था। मैं वहां का कुलाधिपति हूं। तारीख मुझसे पूछ कर ही तय की गई थी। कैसे जाता, मैने मना कर दिया।
-टीवी न्यूज का स्तर इतना घटिया क्यों हो गया है?
--दुनिया में हर जगह टीवी इंटरटेनमेंट का माध्यम है। अपना इंटरटेनमेंट का आदर्श बालीवुड है। वैसे ही वहां फोर सीसे मामला चलता है, जिसमें सिनेमा, क्राइम, क्रिकेट और चौथा कॉमेडी भी शामिल है। मैने एक बार बीबीसी पर कहा था कि टीवी सभी चीजों को नाकुछकिए बिना नहीं दिखा सकता।
-आपको कौन-कौन से सम्मान मिल चुके हैं?
--कई मिल चुके हैं भई। साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित शलाका पुरस्कार’ (07-08) मिल चुका है। उत्तर प्रदेश का लोहिया विशिष्ट सम्मानभी मिला है। बिहार में भी सम्मानित हुआ हूं। मध्य प्रदेश जो अपना राज्य है, उसे छोड़कर बाकी लगभग सभी राज्य मुझे सम्मानित कर चुके हैं।
-किन-किन पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं?
--'प्रथम प्रवक्ता' और 'तहलका' में। जनसत्ता में लिखना जारी ही है। कई बार लोग पीछे पड़ जाते हैं तो लिखना पड़ता है। कभी-कभी भाषण भी लिखने पड़ते हैं।
-कौन-कौन सी किताबें लिखी हैं, आगे क्या लिख रहे हैं?
--अब तक नौ किताबें लिखी है। चंबल की बंदूक गांधी के चरणों में, हिंदू होने का धर्म, मसि कागद, कागद कारे। पांच किताबें एक साथ आई थी। जीने के बहाने, धन्न नर्वदा मैय्या हो, लुटियन के टीले का भूगोल, खेल सिर्फ खेल नहीं है और जब तोप मुकाबिल हो। इन दिनों मैं हिंसा-दान के ऊपर लिख रहा हूं, ‘अटका कहां स्वराज। एक किताब रामनाथ गोयनका, कुमार गंधर्व और गांधी के ऊपर लिखने की योजना है।
मैं अपना आत्म-वृतांत भी लिखना चाहता हूं। फिलहाल शीर्षक दिया है ओटत रहे कपास5 अप्रैल सन् 1992 को पहली बार कागद कारे लिखा था। इसे 2012 तक लिखूंगा, पूरे बीस साल हो जाएंगे तब। 75 की उम्र तक सब निपटा दूंगा। 75 के बाद कोई लिखना नहीं। 20-25 साल की उम्र में जैसा सोचा करता था वैसा हो गया हूं।
-परिवार में कौन-कौन है?
पत्नी, दो बेटे और एक बेटी। पत्नी का नाम ऊषा है। बेटी सोनाल की शादी हो चुकी है। वह एनडीटीवी इमेजिन की मुखिया है। बेटा संदीप जोशी क्रिकेट खिलाड़ी रह चुका है। फिलहाल दिल्ली में एयर इंडिया अकादमी में क्रिकेट और हॉकी की कोचिंग देता है। एक बेटा सोपान जोशी देश की प्रमुख विज्ञान एवं पर्यावरण पत्रिका डाउन टू अर्थमें मैनेजिंग एडिटर है।
--प्रभाष जोशी को वर्तमान में कोई दूसरा प्रभाष जोशी नजर आता है?
--कोई आदमी दूसरे जैसा नहीं बन सकता। हां, अखबार में हरिवंश को अच्छा मानता हूं, क्योंकि वह हर तरह की जिम्मेदारी लेने को तैयार रहते हैं। पूरा अखबार अपने माथे पर लेता है। टीवी में रवीश कुमार  अच्छी पत्रकारिता कर रहा है। वैसे ही 'तलहका' में प्रतिष्ठान विरोधी स्वर हैं।
-शुक्रिया सर
- धन्यवाद।