गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

पृथ्वी दिवस



भारतीय परंपरा में पृथ्‍वी
#World_earth_day..
आज पृथ्‍वी दिवस है, हमें यह याद दिलाने का अवसर है कि हम इस पृथ्‍वी के प्रति अपना पुत्रभाव पूरी तरह दिखाएं और इसकी धारण शक्ति, सौन्‍दर्य की गंभीरता को बनाए रखें। पृथ्‍वी को हमारी माता कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण के बाद, पौराणिक मिथक रूप में वराहावतार का अाख्‍यान जाहिर करता है कि जलमग्‍न पृथ्‍वी का ब्रह्मा ने अवतार लेकर उद्धार, उत्‍थान किया और मनुष्‍यों को सौंपा कि वे इसकी गरिमा, स्थिति, पवित्रता को बनाए रखे। सभी दोहन मित् मित् हो अर्थात संयम को समझा जाए और पृथ्‍वी के सौंदर्य को बनाए रखा जाए।
वेद में पृथ्‍वीसूक्‍त में जो अवधारणा आई है, वह बड़ी ही प्रासंगिक हैं, उसमें पृथ्‍वी के प्रति अपने कर्तव्‍यों का निर्धारण हुआ है। यह भी कहा गया है कि यह भूमि सर्वेश्‍वर द्वारा हमें श्रेष्‍ठ, आर्योचित उद्देश्‍यों के लिए दी गई है-- अहं भूमिमददामार्यायाहं। (ऋग्‍वेद 4, 26, 2)
इस पर रहने वालों के लिए सर्वेश्‍वर ने सूर्य, चंद्रमा, गगन, जलादि सब समान बनाए हैं, इन संसाधनों का संतुलित उपयोग, उपभोग ही करना चाहिए अन्‍यथा यह रत्‍नगर्भा अपना स्‍वरूप खो बैठेगी और वह घातक होता है। पृथ्‍वी से बडी कोई हितकारी नहीं। महाभारत, विष्‍णुपुराण, वायुपुराण, समरांगण सूत्रधार आदि में पृथुराजा के द्वारा पृथ्‍वी के दोहन का जो आख्‍यान है, वह जाहिर करता है कि धरती ने बहुत दयालु होकर मानव को अपने संतान के रूप में सब कुछ देने का निश्‍चय किया... मगर मानव की लालसाएं धरती के लिए हमेशा घातक सिद्ध हुई, वह लालची ही होता गया। ब्रह्मवैवर्त के प्रकृतिखंड में भी ऐसी धारणा आई है। सुबह उठते ही पृथ्‍वी को प्रणाम करने की परंपरा हमारी संस्‍कृति में शामिल रही है। मनुस्‍मृति, देवीभागवत, पद्मपुराण आदि में ऐसे कई विचार हैं जो पृथ्‍वी के प्रति हमारे व्‍यवहार को निर्धारित करते हैं। पृथ्‍वी के प्रति नमस्‍कार का मंत्र भी हमसे कुछ कर्तव्‍य मांगता है।
विष्‍णुपुराण में पृथ्‍वी गीता आई है जिसमें पृथ्‍वी ने स्‍वयं अपनेे विचार रखें हैं कि हर कोई ये समझता है कि ये भूमि मेरी है और मेरे बाद मेरी औलाद की रहेगी। न जाने कितने राजा आए, चले गए, न राम रहे न रावण... सब समझते हैं कि वे ही राजा हैं, मगर अपने पास खडी मौत को नहीं देखते... मनोजय के मुकाबले मुक्ति है ही क्‍या। (विष्‍णुपुराण 4, 24) शिल्‍पग्रंथों में वराह मूर्तियों के साथ पृथ्‍वी को भी बनाने का निर्देश मिलता है जिसमें उसका रत्‍नगर्भा रूप प्रमुख है। पृथक से भूदेवी की मूर्ति के लक्षण भी मयमतम् आदि में मिलते हैं, उनके मूल में भाव ये है कि हम पृथ्‍वी को देवी की तरह स्‍वीकारें और उसके सौंदर्यमय स्‍वरूप को ऐसा बनाए रखें कि आने वाली पीढि़यां भी ये कहे कि हमारे बुजुर्गों ने हमें बेहतरीन धरती सौंपी हैं...।
यही पृथ्‍वी दिवस का संकल्‍प होना चाहिए।
Credit line by Shri Krishan Jugnu


राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए



राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे खंगालते हुए हमने अपने पाठकों के लिए तलाशी पुस्तकें जो विशुद्ध रूप से आन्तरिक सुरक्षा के ही विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करती हैं। संयोग या विडम्बना, राष्ट्रहित के इस अति महत्वपूर्ण पक्ष पर ज्यादातर कलम सिर्फ अंग्रेजी में ही चली परन्तु ज्ञान भाषा का गुलाम नहीं और प्रसार से बढ़ता ही है इसलिए जहां मिले, जिस भाषा में मिले इसका स्वागत कीजिए।

सन् 1947 से लेकर आज तक का भारत का आधुनिक राष्ट्र-राज्य का सफल पर एक नजर डालने से पता चलता है कि देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष आने वाली आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना ही कर रहा है। एक ओर जहां, बहुआयामी चुनौतियों रही है तो वहीं उसकी तुलना में हमारी प्रतिक्रिया लगातार सीमित रही है।

पाकिस्तानी घुसपैठ और उसके कारण कश्मीर घाटी में आतंकवादी गतिविधियां, देश के भीतरी क्षेत्रों में आतंकवाद, नक्सलवादी (वामपंथी उग्रवाद) समूहों की हिंसा और निर्दोषों की हत्याएं, देश में सांप्रदायिक स्थिति, पूर्वोत्तर के आठ राज्यों-असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, मेघालय और सिक्किम-में सुरक्षा की स्थिति आज मुख्य रूप से सतत चुनौती बनी हुई है।

गर है शुगर की लत

...गर है शुगर की लत,
इन दिनों है छुटकारे का बेहतरीन मौका
Get rid of Sugar Addiction during Lockdown

शुगर अडिक्शन के शिकार हम लोगों के लिए लॉकडाउन के ये दिन अच्छे नहीं चल रहे। मिठाई की दुकानें बंद हैं तो दिन बेचैनी में कट रहे हैं। हालांकि एक्सपर्ट का मानना है कि इस आदत से छुटकारा पाने का यह बेहतरीन मौका है और अगले कुछ दिनों में आप इससे मुक्ति के लिए पूरी कोशिश कर सकते हैं और संभव है कि आप इसमें सफल भी रहें। इस आदत को छोड़ने के बारे में एक्सपर्ट लोगों से बात कर पूरी जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

मीठा पसंद करने वालों की भी अपनी मजबूरी होती है। मिठाई न मिले तो ऐसे लोग परेशान हो जाते हैं। 'शुगर अडिक्शन' के शिकार ऐसे लोगों को अगर मीठा न मिले तो उन्हें लगता है कि कुछ खाया ही नहीं। कई लोग तो मिठाई देखते ही उस पर टूट पड़ते हैं और कितना भी खा लें, उनका मन नहीं भरता। बेशक ऐसे लोगों के लिए आजकल मिठाई के ऑप्शन काफी कम हैं। सारे होटल और रेस्तरां बंद हैं और घरों में इतनी मिठाइयां तो बन नहीं सकतीं। ऐसे में वे परेशान तो हैं, लेकिन अगर इस समय वे खुद को मिठाई से दूर कर लें और उसकी जगह फ्रूट्स जैसे ऑप्शन को आदत में शामिल कर लें तो इस लॉकडाउन में यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

क्या है शुगर अडिक्शन
खाना खाने के बाद मीठा खाने का मन लगभग सभी का करता है। अगर आपको लगता है कि मीठा नहीं खाया तो खाना पूरा नहीं हुआ और हर बार खाने के बाद कुछ मीठा होना ही चाहिए तो आप शुगर अडिक्ट हैं। लेकिन जिन लोगों को मीठा न मिलने पर इसकी जरूरत महसूस नहीं होती या जिन्हें मीठा खाना याद भी नहीं रहता, उन्हें शुगर अडिक्ट नहीं माना जा सकता।

क्यों होती है लोगों में यह समस्या
अगर किसी को शुगर अडिक्शन की परेशानी है तो इसका सीधा-सा मतलब है कि उसकी आंत में गुड और बैड बैक्टीरिया का अनुपात सही नहीं है। हमारे गलत खानपान (ज्यादा तेल मसाला, जंक फूड आदि) की वजह से अमूमन ऐसा होता है। इससे आंत सही तरीके से काम नहीं करती। पाचन ठीक तरीके से नहीं होता। इस समस्या से निपटना भी इस लॉकडाउन में मुमकिन है। हम अगर हर दिन सुबह में खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नीबू निचोड़ कर पिएं तो फर्क 10 दिनों में ही दिखने लगेगा। हमारी आंत में गुड बैक्टीरिया की संख्या बढ़ने लगेगी और पाचन क्रिया सही होने लगेगी। इसलिए शुगर की आदत को छोड़ने के लिए शरीर को नीबू पानी से डिटॉक्सिफाई करना भी जरूरी है।

अडिक्शन को क्यों करें नमस्ते
आजकल हर शख्स को मिठाई और नमक से दूरी बनाने की सलाह डॉक्टर और डायटिशन देते हैं क्योंकि इनसे शुगर, मोटापा और बीपी जैसी परेशानी पैदा होती हैं।
-अगर कोई नियमित रूप से मिठाई खाए तो यह मोटापा और डायबीटीज का कारण बन सकता है।
- कई लोगों को दिन में खाने के बाद अगर मिठाई न मिले तो काम में मन नहीं लगता है।
- रात में खाना के बाद मीठा खाने को न मिले तो अच्छी नींद नहीं आती।

लॉकडाउन में छोड़ना आसान
आजकल हम लोगों के पास वक्त की कोई कमी नहीं है। ऐसे में किसी भी आदत को छोड़ना दूसरे दिनों की तुलना में अभी आसान है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि चीजों की उपलब्धता ही नहीं है। फिर घर से बाहर निकलना ही मुश्किल है। अगर कोई बाहर निकल भी गया तो शराब और सिगरेट की दुकानें बंद हैं। इसलिए ऑप्शन बहुत कम हैं। सिर्फ शुगर ही क्यों, शराब, सिगरेट जैसी बुरी आदतों को भी इस लॉकडाउन के दौरान छोड़ा जा सकता है।
यहां एक सवाल उठना लाजमी है कि अगर कोई घर में ही मीठा बनवाकर खाए तो फिर उसका क्या? हां, यह मुमकिन है लेकिन किसी रेस्तरां से या होटल से खरीदकर खाने की तुलना में इतनी तरह के व्यंजन घर बनाना बहुत मुश्किल है।

चीनी की लत छोड़ने के 5 बेहतरीन तरीके

 1.
खाने के बाद ब्रश करें

यह सच है कि जब हम कुछ नमकीन खाते हैं तो हमें मीठा खाने की तलब ज्यादा होती है। ऐसे में इससे बचने का सबसे बेहतरीन तरीका है कि खाने के बाद फौरन ही ब्रश कर लें। इससे एकतरफ जहां दांतों की सफाई हो जाएगी, वहीं मुंह का स्वाद भी बदल जाएगा। एक बार जब स्वाद बदल जाता है तो मीठा खाने की तलब भी काफी कम हो जाती है। खाने के फौरन बाद ब्रश करना वैसे अच्छा नहीं होता क्योंकि हमारी लार पाचन में मदद करती है। इसलिए ऐसा शुरू के 5-10 दिन ही करें। यानी जब तक आदत छूट न जाए तब ब्रश के ऑप्शन को आजमा सकते हैं।

 2.
नींद कुछ खराब होने दें

डिनर के बाद मीठा अगर नहीं खाएंगे तो मुमकिन है कि नींद कुछ देर में आए। पर, आजकल यह चल सकता है। जब ऑफिस जाना होता था तो एक रात नींद न आने से अगले दिन ऑफिस जाना मुश्किल हो जाता था। चूंकि आजकल ऑफिस नहीं जाना है तो सुबह में सफर के एक-दो घंटे बचते ही हैं। ऐसे में अगर रात में नींद नहीं आएगी तो सुबह में नींद पूरी कर सकते हैं और थोड़ा लेट भी उठ सकते हैं।

 3.
खा सकते हैं ड्राई फ्रूट्स भी

किशमिश हो या फिर खजूर, मिठाई की जगह हम इन्हें ले सकते हैं। 10 से 12 किशमिश या फिर 2 से 3 खजूर दिनभर में लेना सही रहता है। एक बार खाने के बाद 5 से 6 किशमिश और एक खजूर पर्याप्त है। ऐसे में इन ड्राई फ्रूट्स को घर पर जरूर रखना चाहिए। अच्छी बात यह है कि इनकी लाइफ भी काफी लंबी होती है और इन्हें खाने से सेहत पर भी कोई समस्या नहीं आती।

 4.
फ्रूट्स की आदत डालें

किसी को बार-बार मीठा खाने की आदत है तो उसे छोड़ने के लिए वह फल का सहारा ले सकता है। मौसमी फल (अंगूर, पपीता, सेब, शहतूत, संतरा आदि) के एक-दो पीस ही मीठा खाने की आपकी इच्छा को खत्म कर सकते हैं। ऐसे में घर में फल रखें। इन्हें अच्छी तरह धोकर और ढककर रखें। जब भी मीठा खाने का मन करे, फल खा लें। ध्यान दें कि अगर आपको जुकाम या बुखार है तो रात में फल कम खाएं, केले तो न ही खाएं। कारण, केला बलगम पैदा कर सकता है। और हां, कोशिश हो कि खाने के फौरन बाद ही फ्रूट्स नहीं खाएं। कम से 2 घंटे का गैप दें। अगर 2 घंटा नहीं बर्दाश्त कर सकते तो 1 घंटा जरूर रूकें।

 5.
सौंफ भी है अच्छा विकल्प

खाना खाने के बाद मीठा खाने का मन करे तो सौंफ खाना एक अच्छा ऑप्शन है। यह हल्की मीठी होती है और इससे सांस की बदबू भी दूर होती है। हकीकत यह है कि होटल और रेस्तरां में भी खाना खत्म होने के बाद सौंफ और मिश्री दी जाती है। इसकी सबसे बड़ी वजह सौंफ की खासियत ही है। दरअसल, सौंफ सांस की बदबू को पूरी तरह खत्म कर देती है। लेकिन यहां इस बात का ध्यान रखें कि सौंफ के साथ मिश्री न हो।
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ऐसा सोचना नहीं है सही
मिथ: मिठाई या चीनी की जगह गुड़ खाना ठीक रहता है।
सचाई: यह सही नहीं है। अगर हमने मिठाई की जगह गुड़ का सेवन किया तो भले ही कैलरी कम हो जाए, लेकिन मीठे की आदत नहीं जाएगी। हां, चीनी की तुलना में बेहतर ऑप्शन जरूर है, लेकिन शुगर अडिक्शन छोड़ने के लिए सही नहीं है।

मिथ: मिठाइयों का शौक अडिक्शन नहीं है।
सचाई: खुद की आदतों पर अगर गौर करेंगे तो संदेह कहीं रह नहीं जाता कि आप अडिक्ट हैं। एक सिंपल फंडा है: अगर कोई शख्स बिना मिठाई के 10 दिन रह ले और इस दौरान उसे मीठा खाने की जरूरत महसूस न हो तो वह शुगर अडिक्ट नहीं है। इस फंडे पर आदतों को देखें और तय करें कि अडिक्शन है या नहीं।

मिथ: रोटी-चावल का ज्यादा सेवन शुगर अडिक्शन में नहीं आता।
सचाई: हां, यह सच है कि कार्बो यानी रोटी या चावल का स्वाद मीठा नहीं होता, लेकिन पचने के बाद ये भी ग्लूकोज ही बनाते हैं और फैट के रूप में बदलकर शरीर में जमा हो जाते हैं। यही कारण है कि शुगर पेशंट या फिर जिन्हें अपना वजन कम करना होता है, उन्हें रोटी-चावल से दूरी बनाकर रखने के लिए कहा जाता है। सच तो यह है कि हम इन्हें सीधे तौर पर तो मिठाई नहीं कह सकते, लेकिन जब हम शुगर अडिक्शन को छोड़ने की बात करते हैं तो इन पर निर्भरता कम जरूर करनी चाहिए। दिन में अगर 3 चपाती या 2 कटोरी चावल खाते हैं तो रात में 1 चपाती और आधी कटोरी चावल से ज्यादा नहीं खाना चाहिए।

मिथ: चाय या कॉफी में चीनी से दिक्कत नहीं है।
सचाई: कई लोगों को खाने के बाद मीठे के रूप में चाय या कॉफी पीना अच्छा लगता है। उन्हें यह सेहत के लिहाज से सही लगता है क्योंकि इसमें कैलरी की मात्रा मिठाई की तुलना में काफी कम होती है। 1 कप चाय या कॉफी में 50 से 70 कैलरी तक होती है, जबकि 1 गुलाब जामुन में 300 से 350 कैलरी होती है। यह सच है कि चाय या कॉफी में कैलरी कम है, लेकिन खाने के बाद इन्हें पीने पर दूसरे नुकसान बहुत ज्यादा हैं:
- खाने के फौरन बाद इन्हें पीने पर खाना पचने में परेशानी होती है, इसलिए पेट में गैस की समस्या हो सकती है।
- ये डाययूरेटिक (ज्यादा यूरिन बनाने वाले) होती हैं यानी शरीर से ज्यादा मात्रा में पानी को यूरिन बनाकर निकालते हैं। ऐसे में शरीर की कोशिकाओं में पानी की कमी होती रहती है।
- भले ही इसमें कैलरी कम हो, लेकिन चाय या कॉफी में भी चीनी ही ली जा रही है। यह भी उसी तरह है, जैसे एक मिठाई। मिठाई में भी चीनी तो सीधे तौर पर कोई खाता नहीं है।

मिथ: आर्टिफिशल स्वीटनर से नुकसान नहीं।
सचाई: इस तरह की सोच ज्यादातर लोग रखते हैं कि आर्टिफिशल स्वीटनर में कैलरी नहीं होती, इसलिए चाय या कॉफी में मिलाकर पीने से समस्या नहीं है। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि यह कोई नेचरल चीज नहीं है। शुगर-फ्री चीजों (चॉकलेट, डाइट कोक, बेकरी आइटम आदि) में शुगर अल्कोहल, फ्रक्टोस, सैक्रीन, मैल्टोडेक्सट्रिन आदि होते हैं जोकि शुगर नहीं हैं, लेकिन इनमें कार्बोहाइड्रेट काफी ज्यादा होते हैं, जिससे ब्लड ग्लूकोज़ लेवल पर असर पड़ता है। प्रेग्नेंट महिलाएं, बच्चे को दूध पिलाने वाली मांएं और बच्चे आर्टिफिशल स्वीटनर का इस्तेमाल न करें। यह बात कोरी अफवाह है कि आर्टिफिशल स्वीटनर्स से कैंसर, सदमा, दौरा, मेमरी लॉस जैसे समस्याएं हो सकती हैं। किसी भी रिसर्च में यह साबित नहीं हुआ है। हालांकि एक स्टडी में कहा गया है कि जिन लोगों को डायबीटीज नहीं है और उन्हें वजन कम करने में मदद नहीं मिलती, उलटे डायबीटीज जैसी मेटाबॉलिक बीमारियां होने का खतरा होता है। बेहतर है कि इन स्वीटनर्स को कम मात्रा में ही इस्तेमाल किया जाए।

एक्सपर्ट पैनल
डॉ. समीर पारिख, सीनियर साइकाइट्रिस्ट
रेखा शर्मा, पूर्व चीफ डाइटिशन,एम्स
परमीत कौर, चीफ, डाइटिशन, एम्स
डॉ. शिखा शर्मा, न्यूट्री-डायट एक्सपर्ट
ईशी खोसला, सीनियर डायट एक्सपर्ट
प्रेरणा कोहली, सीनियर क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट
रामरोशन शर्मा, प्रिंसिपल साइंटिस्ट, पूसा इंस्टिट्यूट

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित 19.04.2020


गांधीजी की चिटठी की नीलामी /नलिन चौहान




अमेरिका में गांधी की चिठ्ठी की नीलामी

कभी अमेरिका नहीं गए महात्मा गांधी के एक सार्वजनिक चिठ्ठी की बोस्टन शहर में नीलामी है। गाँधी ने नव स्थापित हरिजन सेवक संघ के लिए धन जुटाने के हिसाब से एक चिठ्ठी लिखी थी। पुणे की यरवदा जेल से लिखी सार्वजनिक अपील यही चिठ्ठी अमेरिका में बिक्री के लिए उपलब्ध है।

बोस्टन की 'आर. आर. ऑक्शन' नामक कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर यह चिठ्ठी नीलामी के लिए डाली है। इस चिठ्ठी की बिक्री का न्यूनतम मूल्य पन्द्रह हजार डाॅलर रखा गया है। जबकि नीलामी में भाग लेने की आखिरी तारीख 13 मई है।

नौ अक्तूबर 1932 को एक पेज की आकार (4 X 6.5) वाली अंग्रेजी में गांधी की हस्तलिखित इस चिठ्ठी में एम के गांधी के नाम से हस्ताक्षर हैं।

गांधी इस चिठ्ठी में अपील करते हुए कहते हैं, “प्रिय मित्रों, मैं आपको आपके सहानुभूति वाले पत्र के लिए धन्यवाद देता हूं। इन विषयों को आगे बढ़ाने के हिसाब से घनश्याम दास बिरला की अध्यक्षता में गठित अस्पृश्यता विरोधी संघ को पैसे भेजे जा सकते हैं।”

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1932 में, गांधी ने भारत की जाति व्यवस्था से अस्पृश्यता की अवधारणा को मिटाने के अपने प्रयासों के तहत अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी लीग स्थापित किया था। यह अब हरिजन सेवक संघ के नाम से जाना जाता है।


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कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी जब पत्रकार बन गये





कोरोना से करीब 10 करोड़ लोग होंगे बेरोजगार – रघुराम राजन

राहुल गांधी पत्रकार की भूमिका में, रघुराम राजन से किया साक्षात्कार

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कोरोना वायरस के कारण पूरे देश में लॉकडाउन जारी है। गंभीर संकट के इस दौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आज एक पत्रकार की भूमिका निभायी। उन्होंने लोगों के मन में देश के आर्थिक हालात को लेकर उठ रहे सवाल रघुराम राजन से किये। देश में  क्या हो रहा है, क्या होने वाला है, खासतौर से अर्थव्यवस्था को लेकर। इन सवालों के जवाब के लिए राहुल ने एक रोचक तरीका अपनाया। उन्होंने  इस बारे में रघुराम राजन से बात की,  ताकि आम लोगों को भी मालूम हो सके कि वे इस सब पर क्या सोचते हैं। 
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे रघुराम गोविंद राजन जाने माने अर्थशास्त्री हैं। मनमोहन सिंह की सरकार में प्रधानमन्त्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार बनने से पहले रघुराम राजन शिकागो विश्वविद्यालय के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में एरिक॰ जे॰ ग्लीचर फाईनेंस के गणमान्य सर्विस प्रोफेसर थे। सन 2003 से 2006 तक वे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख अर्थशास्त्री व अनुसंधान निदेशक रहे और भारत में वित्तीय सुधार के लिये योजना आयोग द्वारा नियुक्त समिति का नेतृत्व भी किया। राजन मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी के अर्थशास्त्र विभाग और स्लोन स्कूल ऑफ मैनेजमेण्ट; नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के केलौग स्कूल ऑफ मैनेजमेण्ट और स्टॉकहोम स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में अतिथि प्रोफेसर भी रहे हैं। उन्होंने भारतीय वित्त मन्त्रालय, विश्व बैंक, फेडरल रिजर्व बोर्ड और स्वीडिश संसदीय आयोग के सलाहकार के रूप में भी काम किया है।
पढ़िए कोरोना संकट के बीच भारत के भविष्य की आर्थिक चुनौतियों पर राहुल गांधी और रघुराम राजन के बीच हुई महत्वपूर्ण बातचीत के असंपादित अंश – 
  • भारत की आबादी के हिसाब से चार गुना टेस्ट करने की जरूरत
  • हमें 20 लाख टेस्ट हर रोज करने होंगे।
  • कोरोना के चलते भारत में 10 करोड़ नौकरियों पर छाएगा संकट
  • 65,000 करोड़ निकालना होगा गरीबों की मदद के लिए
राहुल गांधी – हेलो
रघुराम राजन – गुड मॉर्निंग, आप कैसे हैं?
राहुल गांधी – मैं अच्छा हूं, अच्छा लगा आपको देखकर
रघुराम राजन – मुझे भी
राहुल गांधी – कोरोना  वायरस के दौर में लोगों के मन में बहुत सारे सवाल हैं कि क्या हो रहा है, क्या होने वाला है, खासतौर से अर्थव्यवस्था को लेकर। मैंने इन सवालों के जवाब के लिए एक रोचक तरीका सोचा कि आपसे इस बारे में बात की जाए ताकि मुझे भी और आम लोगों को भी मालूम हो सके कि आप इस सब पर क्या सोचते हैं।
रघुराम राजन – थैंक्स मुझसे बात करने के लिए और इस संवाद के लिए। मेरा मानना है कि इस महत्वपूर्ण समय में ऐसे मुद्दों पर जितनी भी जानकारी मिल सकती है लेनी चाहिए और लोगों को भी जहाँ तक संभव हो, अवगत रहना चाहिए।
राहुल गांधी – मुझे इस समय एक बड़ा मुद्दा जो लगता है वह है कि हमें अपनी अर्थव्यवस्था को कैसे खोलने पर विचार करना चाहिए? अर्थव्यवस्था के कौन से वो हिस्से हैं, जो आपको लगता है जिन्हें खोलना बहुत जरूरी है और उन्हें किस क्रम में खोला जाना चाहिए?
रघुराम राजन – यह एक अहम सवाल है। हम संक्रमण का ग्राफ कम करने और अस्पतालों/मेडिकल सुविधाओं पर अत्यधिक बोझ न डालने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन साथ ही अब हमें यह भी सोचना होगा कि लोगों की रोजी-रोटी फिर से कैसे शुरू की जाए। लॉकडाऊन हमेशा बनाकर रखना बहुत आसान है, लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए यह नहीं चल सकता। इसे क्रमवार करना होगा। पहले वो स्थान, जहां पर आप सोशल डिस्टैंसिंग बनाकर रख सकते हैं। डिस्टैंसिंग केवल कार्यस्थलों पर ही नहीं, बल्कि कार्यस्थल के आवागमन में भी डिस्टैंसिंग जरूरी है।परिवहन का तरीका। क्या लोगों के पास परिवहन का निजी साधन हैं, साईकल, स्कूटर या कार है? या वो सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं? आप सार्वजनिक परिवहन में डिस्टैंसिंग कैसे बनाएंगे?
यह सारी व्यवस्था करने में बहुत काम और मेहनत करनी पडेगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कार्यस्थल अपेक्षाकृत सुरक्षित हों। इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यदि कहीं दुर्घटनावश कोई ताजा मामले तो सामने आये, तो हम कितनी तेजी से प्रभावित लोगों को आइसोलेट कर सकें, वो भी तीसरे या चौथे लॉडाउन को लागू किए बिना, अगर ऐसा होता है तो विनाशकारी होगा।
राहुल गांधी – यही बात बहुत सारे लोग कह रहे हैं कि यदि आप बार-बार लॉकडाऊन में जाते हैं, यदि आप लॉकडाऊन खोलते हैं और आपको वापस लॉकडाऊन लगाना पड़ता है, तो आर्थिक गतिविधि पर इसका बहुत विनाशकारी प्रभाव होगा क्योंकि इससे विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं?
रघुराम राजन – हां, मुझे लगता है कि यह सोचना सही है। दूसरे लॉकडाऊन को ही लगाने का मतलब है कि आप गतिविधि (आर्थिक) को सही से शुरू करने में आप सफल नहीं हुए। इसी से सवाल उठता है कि अगर इस बार खोल दिया तो क्या आप तीसरे लॉकडाउन की जरूरत न पड़ जाए और इससे विश्वसनीयता पर आंच आएगी। ठीक कहा। मैं नहीं मानता कि हमें 100 प्रतिशत सफलता की ओर भागना चाहिए, यानी कहीं भी कोई केस न हो। फिलहाल ऐसा नहीं हो सकता। हमें केवल फिर से गतिविधि शुरू करने का प्रबंधन करना होगा, यानि जहाँ कहीं मामले सामने आएं, तो हम उन्हें आईसोलेट कर दें।
राहुल गांधी – लेकिन इस पूरे प्रबंध में यह जानना बेहद जरूरी होगा कि कहां ज्यादा संक्रमण है, और इसके लिए टेस्टिंग ही एकमात्र जरिया है। इस वक्त भारत में यह भाव है कि हमारी टेस्टिंग क्षमता सीमित है। एक बड़े देश होते हुए, अमेरिका और यूरोपीय देशों के तुलना में हमारी टेस्टिंग क्षमता सीमित है। कम संख्या में टेस्ट होने को आप कैसे देखते हैं?
रघुराम राजन – अच्छा सवाल है यह, अमेरिकी की मिसाल लें। वहां एक दिन में डेढ़ लाख तक टेस्ट हो रहे हैं। लेकिन वहां विशेषज्ञों, खासकर एपिडीमियोलॉजिस्ट्स की एकमत राय है कि गतिविधि खोलने की शुरुआत करने के लिए इन टेस्टों की संख्या को तीन गुना कर यानी हर रोज कम से कम 5 लाख टेस्ट करने चाहिए और कुछ लोग तो कई मिलियन टेस्ट करने की बात कर रहे हैं।  भारत की आबादी को देखते हुए हमें इसके साढ़े चार गुना टेस्ट करने चाहिए। अगर आपको अमेरिका जितना आत्मविश्वास चाहिए तो हमें 20 लाख टेस्ट हर रोज करने होंगे। साफ है कि हम उनके नजदीक भी नहीं, क्योंकि हम रोज 25,000 से 30,000 टेस्ट ही कर पा रहे हैं।
लेकिन गतिविधि शुरू करने के मामले में हमें समझदारी बरतनी होगी। शायद हमें आम जनता की व्यापक स्तर पर टेस्टिंग करनी पड़े। उदाहरण के तौर पर आम जनता के 1000 सैंपल लें और व्यापक स्तर पर चेक करें, यदि इनमें आपको वायरस का कोई भी चिन्ह मिले, तो सैंपल की गहराई में जाएं और देखें कि कहां से यह आया है। इस तरीके से हमारे टेस्टिंग के ढांचे पर भार कम पड़ेगा और कुछ मामले में कम गहन टेस्टिंग के बावजूद हम ज्यादा बेहतर काम कर पाएंगे। हमें ज्यादा समझदारी से काम करना होगा क्योंकि हम तब तक इंतजार नहीं कर सकते, जब तक हम अमेरिका जैसी टेस्टिंग क्षमता प्राप्त न कर पाएं। 
राहुल गांधी – पहले तो वायरस का प्रभाव गहरा होने वाला है और फिर अर्थव्यवस्था पर उसका प्रभाव गहरा होगा। कुछ महीनों बाद अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लगने वाला है।फिलहाल आप वायरस से लड़ने और 3-4 महीने बाद वायरस के विनाशकारी प्रभावों से लड़ने के बीच संतुलन कैसे बिठाएंगे?
रघुराम राजन – मेरा मानना है कि हमें प्राथमिकता निर्धारित करनी होंगी। हमारी क्षमताएँ व संसाधन सीमित हैं। हमारे वित्तीय संसाधन पश्चिमी देशों के मुकाबले ज्यादा सीमित हैं। हमें यह निर्णय लेना होगा कि हम तय करें कि हम वायरस से लड़ाई और अर्थव्यवस्था दोनों को एक साथ कैसे सँभालें। जब हम अर्थव्यवस्था खोलें, तो यह इस प्रकार हो कि आप बीमारी से उठ पाएं, न की मौत के सामने खड़े हों। 
सबसे पहले तो लोगों को स्वस्थ और जीवित रखना है। भोजन बहुत ही अहम इसके लिए। ऐसी जगहें हैं जहां पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम पहुंचा ही नहीं है, अमर्त्य सेन, अभिजीत बनर्जी और मैंने इस विषय पर अस्थाई राशन कार्ड की बात की थी। लेकिन आपको इस महामारी का सामना एक अप्रत्याशित संकट की भाँति करना होगा। हमें जरूरतों के आधार पर लीक से हटकर सोचना होगा। सभी बजटीय सीमाओं को ध्यान में रखते हुए फैसले करने होंगे। हमारे पास संसाधन सीमित हैं।
राहुल गांधी – कृषि क्षेत्र और मजदूरों के बारे में आप क्या सोचते हैं। प्रवासी मजदूरों के बारे में क्या सोचते हैं। इनकी वित्तीय स्थिति के बारे में क्या किया जाना चाहिए?
रघुराम राजन – इस मामले में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर में किये गए हमारे प्रयासों का लाभ उठाने का समय है। हम उन सभी व्यवस्थाओं के बारे में विचार होना चाहिए जिनसे हम अपेक्षाकृत गरीबों तक पैसा पहुंचाते हैं। हमारे पास विधवा पेंशन और मनरेगा जैसे कई तरीके उपलब्ध हैं। हमें कहना चाहिए कि देखो ये वे लोग हैं जिनके पास रोजगार नहीं है, जिनके पास आजीविका चलाने का साधन नहीं है और अगले तीन-चार महीने जब तक यह संकट है, हम इनकी मदद करेंगे। लेकिन लोगों को जीवित रखना और उन्हें विरोध के लिए या फिर काम की तलाश में लॉकडाउन के बीच ही बाहर निकलने के लिए मजबूर न होने से रोकना लाभप्रद होगा और ये हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। हमें ऐसे रास्ते तलाशने होंगे जिससे हम ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पैसा भी पहुंचा पाएं और उन्हें पीडीएस के जरिए भोजन भी मुहैया करा पाएं।
राहुल गांधी – डॉ राजन कितना पैसा लगेगा गरीबों की मदद करने के लिए, गरीबों को राहत देने के लिए?
रघुराम राजन – तकरीबन 65,000 करोड़। हमारी जीडीपी 200 लाख करोड़ की है, इसमें से 65,000 करोड़ निकालना, बहुत बड़ी रकम नहीं है। हम ऐसा कर सकते हैं। अगर ये गरीब के लिए है, उनकी जिंदगी बचाने के लिए हमें यह करना चाहिए।
राहुल गांधी – अभी तो देश संकट में है, पर कोविड के बाद क्या हिंदुस्तान को इस घटना से कोई फ़ायदा/बढ़त होगी? कोई स्ट्रेटेजिक फ़ायदा होगा? दुनिया में कोई बदलाव होंगे, जिससे हिंदुस्तान को फ़ायदा हो या जिनका हिंदुस्तान एडवांटेज ले सके? किस प्रकार से दुनिया बदलेगी आपके मुताबिक़?
रघुराम राजन – सामान्यतः, इस तरह की स्थितियां मुश्किल ही किसी देश के लिए अच्छे हालात लेकर आती हैं। फिर भी कुछ तरीके हैं जिनसे देश फायदा उठा सकते हैं। मेरा मानना है कि इस संकट से बाहर आने के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था के हर पहलु पर एकदम नए तरीके से सोचने की जरूरत होगी। अगर भारत के लिए कोई मौका है, तो वह है हम संवाद को किस तरह मोड़ें। इस संवाद में हम एक नेता की तरह सोचें क्योंकि यह दो विरोधी पार्टियों के बीच की बात नहीं है। लेकिन भारत इतना बड़ा देश तो है ही कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में हमारी बात को अच्छे से सुना जाए। ऐसे हालात में भारत अपने उद्योगों और सप्लाई चेन के लिए अवसर तलाश सकता है। लेकिन सबसे अहम है कि हम संवाद को उस दिशा में मोड़ें जिसमें ज्यादा देशों के लिए वैश्विक व्यवस्था में स्थान हो, बहु ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था हो न कि एक-ध्रुवीय या द्विध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था।
राहुल गांधी – क्या आपको नहीं लगता है कि केंद्रीकरण का संकट है। सत्ता का बेहद केंद्रीकरण हो गया है कि बातचीत ही लगभग बंद हो गई है। बातचीत और संवाद से उन बहुत सारी समस्याओं का समाधान निकलता है, जिनका आपने जिक्र किया है, लेकिन कुछ कारणों से यह संवाद टूट रहा है।
रघुराम राजन – मेरा मानना है कि विकेंद्रीरण न सिर्फ स्थानीय सूचनाओं को सामने लाने के लिए जरूरी है बल्कि लोगों को सशक्त बनाने के लिए भी अहम है। इस समय पूरी दुनिया में अशक्तिकरण कि यह स्थिति है फैसले मेरे द्वारा नहीं, कहीं और से किए जा रहे हैं। मेरे पास एक वोट तो है दूरदराज के किसी व्यक्ति को चुनने का। मेरी पंचायत और राज्य सरकार के पास ताक़त नहीं है। लोगों में यह भावना है कि किसी भी मामले में उनकी आवाज नहीं सुनी जाती। ऐसे में वे विभिन्न शक्तियों का शिकार बन जाते हैं।
रघुराम राजन – मैं आपसे ही यही सवाल पूछूंगा। राजीव गांधी जी जिस पंचायती राज को एक बार फिर लेकर आए, उसका कितना प्रभाव पड़ा और कितना फायदेमंद साबित हुआ।
राहुल गांधी – इसका जबरदस्त असर हुआ था, लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि यह अब कम हो रहा है। पंचायती राज के मोर्चे पर जितना आगे बढ़ने का काम हुआ था, हम उससे वापस लौट रहे हैं, और जिलाधिकारी और अधिकारी आधारित व्यवस्था में जा रहे हैं। अगर आप दक्षिण भारतीय राज्यों को देखें, तो वहां इस मोर्चे पर अच्छा काम हो रहा है, व्यवस्थाओं का विकेंद्रीकरण हो रहा है। लेकिन उत्तर भारतीय राज्यों में सत्ता का केंद्रीकरण हो रहा है और पंचायतों और जमीन से जुड़े संगठनों की शक्तियां कम हो रही हैं। 
रघुराम राजन – फैसले जितना लोगों को साथ में शामिल करके लिए जाएंगे, वे फैसलों पर नजर रखने के लिए उतने ही सक्षम होंगे। मेरा मानना है कि यह ऐसा प्रयोग है जिसे करना चाहिए।
राहुल गांधी –  लेकिन वैश्विक स्तर पर ऐसा क्यों हो रहा है? आप क्या सोचते हैं कि क्या कारण है जो इतने बड़े पैमाने पर केंद्रीकरण हो रहा है और संवाद खत्म हो रहा है? क्या आपको लगता है कि इसके केंद्र में कुछ है या फिर कई कारण हैं इसके पीछे?
रघुराम राजन – मैं मानता हूं कि इसके पीछे एक कारण है और वह है वैश्विक बाजार। ऐसी धारणा बन गई है कि बाजारों के वैश्वीकरण के साथ इसमें हिस्सा लेने वाले यानी फर्म्स भी हर जगह एक ही तरह के नियम लागू करवाना चाहती हैं, वे हर जगह एक ही तरह की समन्वय व्यवस्था चाहते हैं, एक ही तरह की सरकार चाहते हैं, क्योंकि इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। एकसमानता लाने की कोशिश ने स्थानीय और राष्ट्रीय सरकारों के अधिकार और शक्तियां छीन ली हैं। इसके अलावा नौकरशाही में केन्द्रीकरण की लालसा भी है, अगर मुझे शक्ति मिल सकती है तो क्यों न हासिल करूं। यह लगातार चलने वाली लालसा है। अगर आप राज्यों को पैसा दे रहे हैं, तो उन्हें इन नियमों का पालन करना ही होगा, न कि बिना किसी सवाल के उन्हें पैसा मिल जाए, जबकि मुझे पता है कि आप भी चुनकर आए हो और आपको इसका आभास होना ही चाहिए कि आपके लिए क्या सही है।
राहुल गांधी – इन दिनों एक नया मॉडल आ गया है, वह है सत्तावादी या अधिनायकवादी मॉडल, जोकि उदार मॉडल पर सवाल उठा रहा है। काम करने का यह एकदम अलग तरीका है और यह ज्यादा जगहों पर फल-फूलता जा रहा है। क्या आपको लगता है कि यह खत्म होगा?
रघुराम राजन – मुझे नहीं पता। सत्तावादी मॉडल, एक मजबूत व्यक्तित्व, एक ऐसी दुनिया जिसमें आप शक्तिहीन हैं, कभी-कभी ये अपील करता है, खासतौर से अगर आप उस व्यक्तित्व के साथ कोई संबंध रखते हैं, जब आपको लगता है कि उन्हें मुझ पर विश्वास है, उन्हें लोगों की परवाह है। इसके साथ समस्या यह है कि अधिनायकवादी व्यक्तित्व अपने आप में एक ऐसी धारणा बना लेता है कि , ‘मैं ही जनशक्ति हूं’ इसलिए मैं जो कुछ भी कहूंगा, वही सही होगा। मेरे ही नियम लागू होंगे और इनमें कोई जांच-पड़ताल नहीं होगी, संस्थानों के नहीं होंगे, कोई विकेंद्रीकृत व्यवस्था नहीं होगी। सब कुछ मेरे जानकारी के अनुसार होना चाहिए। इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि जब-जब इस हद तक केंद्रीकरण हुआ है, व्यवस्थाएं धराशायी हो गई हैं।
राहुल गांधी – लेकिन वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में कुछ तो गड़बड़ हुई है। यह तो साफ है, यह नहीं काम कर रहा। क्या ऐसा कहना सही होगा?
रघुराम राजन – मुझे लगता है कि यह बिल्कुल सही है कि बहुत से लोगों के लिए यह काम नहीं कर रहा। विकसित देशों में दौलत और आमदनी का असमान वितरण निश्चित रूप से चिंता का एक कारण है। नौकरियों की अनिश्चितता, परायत्तता चिंता का दूसरा स्रोत है।आज यदि आपके पास कोई अच्छी नौकरी है तो यह नहीं पता कि कल आपके पास आमदनी का जरिया होगा या नहीं। हमने इस महामारी के दौर में देखा है कि बहुत से ऐसे लोगों के पास कोई रोजगार ही नहीं है, उनकी आमदनी और सुरक्षा दोनों ही छिन गई हैं।
इसलिए आज सिर्फ विकास दर धीमी होने की समस्या नहीं है। हम बाजारों के बगैर नहीं रह सकते, हमें विकास चाहिए। हम नाकाफी वितरण की समस्या से भी दोचार हैं। जो भी विकास हुआ उसका पूरा फल सब लोगों को समान रूप से नहीं मिल रहा है, बहुत से लोग छूट गए। तो हमें दोनों पहलुओं के बारे में सोचना होगा। इसीलिए मुझे लगता है कि हमें वितरण व्यवस्था के साथ-साथ अवसरों के वितरण के बारे में भी सोचना होगा।
राहुल गांधी – यह दिलचस्प है जब आप कहते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर से लोग जुड़ते हैं और उन्हें अवसर मिलते हैं। लेकिन अगर विभाजन और नफरत हो, तो लोग में अलगाव होता है, यह भी तो एक तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर है। इस वक्त विभाजन और नफरत का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर दिया गया है, और यह बड़ी समस्या है।
रघुराम राजन – सामाजिक समरसता से ही लोगों का फायदा होता है। लोगों को यह लगना आवश्यक है कि वे महसूस करें कि वे व्यवस्था का हिस्सा हैं, बराबर भागीदार हैं। खासतौर से ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में हम घर को बाँट कर नहीं रख सकते। तो मैं कहना चाहूंगा कि हमारे पुरखों ने, राष्ट्र निर्माताओं ने जो संविधान लिखा और शुरु में जो शासन दिया, उन्हें नए सिरे से पढ़ने-सीखने की जरूरत है, मैं भी आजकल उसे दोबारा सीखने में समय व्यतीत कर रहा हूं। लोगों को अब लगता है कि कुछ मुद्दे थे, जिन्हें उस समय दरकिनार किया गया, लेकिन उन्हें जानना चाहिये की वे ऐसे मुद्दे थे जिन्हें यदि छेड़ा जाता तो हमारा सारा समय एक-दूसरे से लड़ने में ही चला जाता।
राहुल गांधी – इसके अलावा, जब आपके पास भविष्य के बारे में विज़न न हो तो आप विभाजन करते हो और पीछे मुड़कर इतिहास को देखने लगते हो। आप जो कह रहे हैं मुझे सही लगता है कि भारत को एक नए विजन की जरूरत है। आपकी नजर में वह क्या विचार होना चाहिए। निश्चित रूप से आपने इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की बात की। ये सब बीते 30 साल से अलग या भिन्न कैसे होगा। वह कौन सा स्तंभ होगा जो अलग होगा?
रघुराम राजन – मुझे लगता है कि आपको हमारी क्षमताएं विकसित करनी होंगी। इसके लिए बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है। याद रखिए, जब हम इन क्षमताओं की बात करें तो इन पर अमल भी होना चाहिए। लेकिन हमें यह भी सोचना होगा कि हमारे औद्योगिक और बाजार व्यवस्था कैसे हैं। आज भी हमारे यहां पुराने लाइसेंस राज के अवशेष है। हमें सोचना होगा कि हम कैसे ऐसी व्यवस्था बनाएं जिसमें ढेर सारी अच्छी नौकरियां सृजित हों। ज्यादा स्वतंत्रता हो, ज्यादा विश्वास और भरोसा हो, लेकिन इसकी पुष्टि करना एक अच्छा विचार है।
श्री राहुल गांधी – मैं यह देखकर हैरान हूं कि माहौल और भरोसा अर्थव्यवस्था के लिए कितना अहम है। कोरोना महासंकट के बीच जो चीज मैं देख रहा हूं वह यह कि विश्वास का मुद्दा असली समस्या है। लोगों को समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर आगे क्या होने वाला है। इससे एक डर है पूरे सिस्टम में। बेरोजगारी की बात करें तो, बहुत बड़ी समस्या है, बड़े स्तर पर बेरोजगारी है, जो अब और भयंकर होने वाली है। इस संकट से मुक्ति के बाद, जब अगले 2-3 महीने में बेरोजगारी बढ़ेगी, तो बेरोजगारी को दूर करने के लिए हम आगे कैसे बढ़ें?
रघुराम राजन – आंकड़े बहुत ही चिंतित करने वाले हैं। सीएमआईई के आंकड़े देखो तो पता चलता है कि कोरोना संकट के कारण करीब 10 करोड़ लोग और बेरोजगार हो जाएंगे। 5 करोड़ लोगों की तो नौकरी जाएगी, करीब 6 करोड़ लोग श्रम बाजार से बाहर हो जाएंगे। आप किसी सर्वे पर सवाल उठा सकते हो, लेकिन हमारे सामने तो यही एक आंकड़े हैं। और यह आंकड़ें बहुत चिंताजनक हैं। मुझे लगता है की हमें जितना तेजी से हो सके, उतना तेजी से अर्थव्यवस्था को ध्यानपूर्वक खोलना चाहिए, ताकि लोगों को नौकरियां मिलना शुरु हों। हमारे पास सभी वर्गों को ज्यादा समय तक मदद करने की क्षमता नहीं है। हम तुलनात्मक तौर पर एक गरीब देश हैं, लोगों के पास ज्यादा बचत नहीं है।
रघुराम राजन – लेकिन मैं आपसे एक सवाल पूछता हूं। हमने जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए अमेरिका और यूरोप को बहुत सारे उपाय उठाते देखा । भारत सरकार के सामने एकदम अलग हकीकत है जिसका वह सामना कर रही है। आपकी नजर में पश्चिम के शासन और भारत की जमीनी हकीकत से निपटने में क्या अंतर है।
राहुल गांधी – सबसे पहले स्केल, समस्या की विशालता और इसके मूल में वित्तीय समस्या का परिमाण है। असमानता और असमानता की प्रकृति। जाति जैसी समस्या, क्योंकि आप जानते हैं की भारतीय समाज जिस व्यवस्था वाला है वह अमेरिकी समाज से एकदम अलग है। भारत को जो विचार पीछे धकेल रहे हैं वह समाज में गहरे पैठ बनाए हुए हैं और अक्सर छिपे हुए हैं। ऐसे में मुझे लगता है कि बहुत सारे सामाजिक बदलाव की भारत को जरूरत है, और यह समस्या हर राज्य में अलग है। तमिलनाडु की राजनीति, वहां की संस्कृति, वहां की भाषा, वहां के लोगों की सोच उत्तर प्रदेश से एकदम अलग है। ऐसे में आपको इसके आसपास ही व्यवस्थाएँ विकसित करनी होंगी। 
पूरे भारत के लिए एक ही फार्मूला काम नहीं करेगा, काम कर ही नहीं सकता। इसके अलावा, हमारी सरकार अमेरिका से एकदम अलग है, हमारी शासन पद्धति में, हमारे प्रशासन में नियंत्रण की एक सोच है। एक प्रोडूसर के मुकाबले हमारे पास एक डीएम है। हम सिर्फ नियंत्रण के बारे में सोचते हैं, लोग कहते हैं कि अंग्रेजो के जमाने से ऐसा है, मेरा ऐसा मानना है कि यह अंग्रेजों से भी पहले की व्यवस्था है। भारत में शासन का तरीका हमेशा से नियंत्रण का रहा है और मुझे लगता है कि आज हमारे सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। कोरोना बीमारी को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, इसलिए जैसा कि आपने कहा, इसे प्रबंधित करना होगा।
एक और चीज है जो मुझे परेशान करती है, वह है असमानता। भारत में बीते अनेक दशकों से ऐसा है। जैसी असमानता भारत में है, अमेरिका में नहीं दिखेगी। तो मैं जब भी सोचता हूं तो यही सोचता हूं कि असमानता कैसे कम हो क्योंकि जब कोई सिस्टम में असमानता अपने उच्च स्तर पर पहुंच जाती है तो वह सिस्टम काम करना बंद कर देता है। आपको गांधी जी का यह वाक्य याद होगा कि कतार के आखिर में जाओ और देखो कि वहां क्या हो रहा है। एक नेता के लिए यह बहुत बड़ी सीख है, इसे इसके पूरे महत्व से कम आँका जाता है, लेकिन मुझे लगता है कि यहीं से काफी चीजें निकलेंगी।
राहुल गांधी – आपकी नजर में असमानता से कैसे निपटें। कोरोना संकट में भी यह दिख रही है, यानी जिस तरह से भारत गरीबों के साथ व्यवहार कर रहा है, किस तरह हम अपने लोगों के साथ रवैया अपना रहे हैं. प्रवासी बनाम संपन्न की बात है, दो अलग-अलग विचार हैं। दो अलग-अलग भारत हैं। आप इन दोनों को एक साथ कैसे जोड़ेंगे।
रघुराम राजन – देखिए आप पिरामिड की तली, गरीबों के जीवन को बेहतर करने के कुछ तरीके जानते हैं, लेकिन हमें एहतियात से सोचना होगा जिससे हम हर किसी तक पहुंच सकें। मेरा मानना है कि सभी सरकारों ने भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए काम किया है, और बिना किसी शक के हम बेहतर काम कर सकते हैं। लेकिन चुनौतियों के बारे में मुझे लगता है कि सब तक पहुंचने में और उनका जीवन स्तर सुधारने में प्रशासनिक चुनौतियां हैं। लेकिन मेरी नजर में बड़ी चुनौती निम्न मध्य वर्ग और मध्य वर्ग के बीच फ़र्क़ की है, जिसके लिए हमें अच्छी नौकरियां बढ़ाने की जरूरत है ताकि लोग सरकारी नौकरी और उससे मिलने वाले आराम पर आश्रित न रहें। मेरा मानना है कि इस मोर्चे पर काम करने की जरूरत है और इसी के मद्देनजर अर्थव्यवस्था का विस्तार करना जरूरी है। हमारे पास युवा कामगारों की फौज होने के बावजूद हमने बीते कुछ सालों में हमारी आर्थिक विकास दर को गिरते हुए देखा है।
इसलिए मैं कहूंगा कि सिर्फ संभावनाओं पर न जाएं, बल्कि अवसर सृजित करें ताकि हर क्षेत्र फले फूलें। अगर बीते सालों में कुछ गलतियां भी हुईं हों तो यही रास्ता है आगे बढ़ने का।सॉफ्टवेयर और ऑउटसोर्सिंग सेवाओं के बारे में सोचें, जिसमें हम कामयाबी से बढ़ते रहे हैं, कौन सोच सकता था कि ये सब भारत की ताकत बनेंगी, और यह हो गया। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि यह इसलिए हुआ क्योंकि सरकारों ने इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया, हालांकि मैं ऐसा नहीं मानता। लेकिन हमें हर बढ़ने की संभावना को अवसर देना चाहिए, लोगों की उद्यमिता को मौका देना चाहिए।
राहुल गांधी – थैंक्यू, थैंक्यू, डॉ राजन
रघुराम राजन – थैंक्यू वेरी मच, आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा।
राहुल गांधी – आप सुरक्षित तो हैं न ?
रघुराम राजन – मैं सुरक्षित हूं, आपको शुभकामनाएँ 
राहुल गांधी – थैंक्यू, बाय।
Shri Rahul Gandhi’s Conversation

नामवर सिंह के साथ यादें / अनामी शरण बबल






हिन्दी के मशहूर आलोचक डॉ. 

नामवर सिंह की याद में

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अनामी शरण बबल 
हिन्दी के  विख्यात साहित्यकार आलोचक  डा. नामवर सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। पार्थिव शरीर आज़ शाम तक पंचतत्व में विलीन भी हो  जाएगा, मगर हिन्दी के इस सुपर स्टार लेखक साहित्यकार की तूती कम नही होगी। नामवर अपने नाम से ज्यादा कुख्यात विवादों में घिरे रहते थे। नामवर जी हिन्दी के संभवतः पहले लेखक आलोचक हैं जो पिछले दो दशक से लेखन की बजाय जो बोला कहा वही आलोचना की कसौटी पर खरा और सही माना गया। हिन्दी में नामवर सिंह के नाम की ऐसी धूम कि हिन्दी में कोई भी कार्यक्रम हो कोई योजना हो या किसी खंड महाखंड की रूपरेखा हो, सब नामवर की राय सलाह के बिना अपूर्ण सा लगता है। कद से ज्यादा बड़ा कद हो या अत्यधिक मान्यता दे देना भी एक विवादास्पद प्रसंग है। जिसपर टिप्पणी करना व्यर्थ है। मगर यह  आलोचना की तरह ही सही और कट्टु सत्य है कि उनके जितने प्रशंसक हैं, उससे कही अधिक निंदक आलोचक और विरोधी आज भी सक्रिय हैं और हमेशा रहेंगे। शायद नामवर सिंह की यही सबसे बड़ी ताकत भी रही है कि वे अपने निंदकों आलोचकों को भी जीवन भर एक चुनौती की तरह ही लेते रहे। मगर, नामवर सिंह भी एक गुट जिसे महागुट भी कहें तो कोई हर्ज नही होगा। एक समर्थक लेखकों का दल बल साथ रहता था। वे अपनी टोली के लेखन पर सहानुभूति भी रखते थे। आलोचना में भी मित्रमंडल संस्कार को पुष्पित किया। तो यह भी सच है कि लेखकों की अपार भीड़ उनकी झलक पाने या अपनी किताब पर दो लाईन की टिप्पणी पाने के लिए लालयित रहता था। लगता था जैसे नामवर जी कि एक टिप्पणी उसे अमर या कालजयी बना दे। एक तरफ नाम काम  की महिमा गौरव ग्लैमर और चकाचौंध छवि बहुतों को नागवार लगता था। एक बड़े या जिसे विरोधी वर्ग का मानना है कि लेखक समाज को नामवर सिंह के काम से हिन्दी का भला कम अहित ज्यादा हुआ है। समाज का यह लोकचरित्र होता है कि किसी के नही रहने पर महिमा मंडन के साथ छवि हनन करने से बाज नहीं आते।
: हिन्दी के इस विशिष्ट प्रोसेसर, लेखक, पत्रकार और संपादक डॉक्टर नामवर सिंह के साथ कुछ प्रसंग अपने संग भी ऐसे हैं जिन्हें आज़ उनके उपर लिखना ज़रूरी लगा। नामवर जी को देखने सुनने के कोई डेढ़ दो दर्जन मौके आएं, मगर दुआ सलाम नमस्कार से अपन रिश्ता कभी आगे नहीं बढ़ा। एक खांटी पत्रकार होने के चलते रिश्ता तोडने या बिगाड़ने का शौक कभी नहीं रहा, मगर संबंधों को मजबूत करने के लिए किसी के चरणों में लिपटने का भी कभी न शौक रहा है और ना ही आत्मसमर्पण करने का पागलपन भी नहीं रहा।  नामवर जी से मेरी आखिरी मुलाकात भी कोई 15-16 साल पहले की है। पर इस घटना के उल्लेख से ज्यादा जरुरी यह बताना है कि मैं नामवर सिंह को कब से जानता हूं? बिहार के एक छोटे से कस्बा देव में रहते हुए मुझे 1981 तक नामवर सिंह के नाम का पता नहीं था। नामवर सिंह जी के नाम को कब कैसे सुना या जाना इसका भी कोई आधिकारिक संदर्भ याद नहीं है। पर भारत के सबसे चकमक यूनिवर्सिटी जेएनयू के हिन्दी प्रोसेसर और लेखक के रूप में जानने लगा था। दिल्ली में कोई मित्रमंडली नही होने के कारण मैं नामवर सिंह की नामवरी से अनजान था। हालांकि पापाजी की रुचि के चलते घर में हंस रविवार दिनमान धर्मयुग सारिका गंगा अवकाश, साप्ताहिक हिन्दुस्तान नंदन पराग कादम्बिनी नवनीत जैसी पत्रिकाएं नियमित रूप से आती थी, मगर इसको पढ़ने से अधिक अपने कमरे में सजाकर रखने का शौक ज्यादा था। हां 1983-84 में गया के लेखकों से परिचित होने के बाद प्रवीण परिमल सुरंजन प्यासा रुपक सरीखे दोस्तों और दिल्ली के अखिल अनूप से संपर्क गहराने के बाद नामवर सिंह को लेकर साहित्य पर बातें होने लगी।  बनारसी रंग रुप में जीवन भर रंगे पुते नामवर जी दिल्ली वासी होकर भी जीवन भर छोरा गंगा किनारे वाला ही गंगा की तरह प्रवाहमान बने रहे। 1987 में नामवर जी को करीब से देखने सुनने का मौका तब आया,जब भारतीय जनसंचार संस्थान के पहले हिन्दी पत्रकारिता स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में दाखिला मिला, और किसी दिन हमारे विभागाध्यक्ष डॅाक्टर रामजी लाल जांगिड़ ने बताया कि कल क्लास लेने जेएनयू से नामवर सिंह आएंगे। हालांकि जेएनयू के पड़ोस ने अपने इंस्टीट्यूट कैम्पस के होने से जेएनयू का ग्लैमर मिट गया था। जेएनयू के मीनी जंगल नुमा वातावरण और उसके पूर्वांचल छात्रावास का डीटीसी बस स्टॉप हम लोगों के दिल्ली घूमने के लिए बस पकड़ने का एकल अड्डा था। देर रात तक जेएनयू में घुमना-घुमाना और अलग अलग छवि मुद्रा में लडके लडकियों को देखना भी रोमांचक मैच देखने सा होता। इन हालातो और माहौल में मन के भीतर के देहाती गंवारपन की झिझक पर शहरी हवा की नयी  कहानी को जानने सुनने का मौका सामने था।  हां तो नामवर सिंह से पढ़ने के इस नायाब मौके को सामने देख कर मन खिल उठा। करीब डेढ़ घंटे के सरस मोहक सरल और  सटीक सारगर्भित संवाद के बीच पूरा क्लास मंत्रमुग्ध सा रहा। नामवर जी की छायावाद और दूसरी परम्परा की खोज को पढा था,पर सच्चाई यह है कि समझा कम ही था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के सबसे चर्चित शिष्यों में एक रहे डॉ नामवर ने कभी बतौर एक स्टूडेंट अपने गुरुदेव से एक सवाल पूछा था जिसका उतर उस समय हजारी प्रसाद द्विवेदी जी नही दिए थे।  सवाल पूछने के लिए आरंभ से ही बदनाम रहईद मै क्लास खत्म होते ही वही सवाल नामवर सिंह जी से पूछा डाला कि कल एक छात्र के रूप में जो आपका सवाल था उसका उतर प्रोफेसर नामवर सिंह जी का क्या होगा? हालांकि कोई जवाब देने की बजाय मेरे पास आकर मेरा नाम पूछा और र नाम सुनते ही ठठाकर खिलखिला उठे। यह परिचय का पहला सूत्र था। मेरे कंधे पर हाथ फेरकर स्नेह जताया। यह संस्मरण लिखते समय जब आज मैं अपने कंधे को छूकर देख रहा हूं तो कोई 32 साल पहले के उस स्नेहिल स्पर्श को जीवंत सा महसूस कर रहा हूं।
: दिल्ली में रहते हुए उनसे करीब होने की लालसा मन मेह कभी नही जागी। हर दो चार माह में यदा कदा मुलाकात होती रही। यों कहें कि चेहरे से परिचित थे। जब भी मिलता तो उनके चेहरे पर आत्मीय मुस्कान आ जाती थी।  इसी क्रम में बात 2001 की है, जब फोन करके विख्यात लेखक पंकज बिष्ट ने मुझे यह बताया कि शैलेश मटियानी जी का दिल्ली के पागलखाने में गुमनाम सी मौत हो गयी है।  इसकी सूचना मिलते ही मैंने कुछ लेखकों से बातचीत करके एक रिपोर्ट बनाने की पहल की और फट से नामवर जी को फोन करके बताया कि किस तरह किस प्रकार शैलेश मटियानी की मौत हो चुकी है और इस पर आप कोई टिप्पणी करें। मेरी बात सुनते ही हिंदी के सबसे बड़े वरिष्ठ आलोचक नामवर जी ने यह कहा इस समय मैं दूरदर्शन पर समाचार देख रहा हूं।  और यह कहते हुए नामवर जी ने फोन काट दी। एकाएक फोन कटने से मै चौंका और तत्काल दोबारा फोन कर डाला। मगर इस बार फोन उठाते ही उन्होंने गरम लहजे में कहा अभी  बताया था न कि मैं इस समय दूरदर्शन पर समाचार देख रहा हूं। यह कहकर एक बार फिर उन्होंने फोन रख दिया।
हालांकि शैलेश मटियानी जी को मैंने भी बहुत अधिक नहीं पढ़ा और जानता था, पर एक इतने बड़े नामी लेखक की मौत पर नामवर सिंह जी की यह संवेदनहीनता और  भावहीन बेरूखी अटपटा सा लगा।  औरों से बातचीत करके ख़बर बनाने की बजाय मैंने तत्काल नामवर सिंह की टिप्पणी पर ही एक न्यूज बना दी। जिसका मजमून इस तरह का रखा। ।। संघर्षों के पर्याय रहे संघर्ष जीवी शैलेश मटियानी की कल रात दिल्ली के एक पागलखाने में गुमनाम सी मौत हो गयी है, जिसकी ख़बर जगजाहिर होते ही  लेखकों पाठकों का एक बडा वर्ग शोकाकुल होगा, मगर  हिंदी के सबसे बड़े आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने यह कहते हुए टिप्पणी करने से इंकार कर दिया कि मैं इस समय दूरदर्शन पर समाचार देख रहा हूं।। । राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस समाचार के बाद लेखक समुदाय में बडी तीखी प्रतिक्रिया हुई। पंकजा बिष्ट ने अपनी पत्रिका समयांतर में पूरी खबर डाल दी। और भी दर्जनों लेखकों ने इस खबर पर लेख लिख। जिसमें रांची के श्रवण कुमार गोस्वामी का लेख काफी चर्चित था, जिसे मैं देख नही सका। इस प्रसंग के कोई 13 साल बाद जब रांची में जब रांची एक्सप्रेस के बतौर संपादक काम करने और रहने का मौका मिला तो वहां के वरिष्ठ लेखक अशोक प्रियदर्शी जी से दफ्तर में भेंट हुई तब यह बताने पर वे चहक उठे कि नामवर जी के खिलाफ आपकी ही वह खबर थी जिसके   चलते यहां के साहित्यकारों ने भी काफी निंदा की थी।
: यह घटना भी आईं गई हो जाती, तभी 2002 में नामवर सिंह जी राष्ट्रीय सहारा में बतौर प्रधान संपादक बनकर  आए। कई माह तक मुलाकात नहीं हुई। मेरे कई मित्रों ने चेताया भी कि  अब नामवर बाबू आ गए हैं तो अनामी तेरी छुट्टी पक्की है। मैने इन खबरों को किनारा करते हुए कहा कि वे मेरी सराहना करेंगे भाई। मेरी निष्पक्षता नीडरता को पसंद करेंगे। बिना मुलाकात कई माह तक  पहले की तरह काम जारी रहा। इसी दौरान सहारा टीवी के बाद सहारा की साप्ताहिक पत्रिका की योजना बनी। किसी एक दिन नोएडा मुख्यालय से फरमान आया कि नयी पत्रिका की योजना पर बात विचार में शामिल होने के लिए रिपोर्टिंग टीम को रात में नोएडा पहुंचना है। मेरा घर पास में होने के चलते देर रात भी कोई परेशानी का सबब नहीं बनता।  वीकली पेपर कैसा हो इस पर किसी ने रविवार किसी ने माया किसी ने दिनमान किसी ने धर्मयुग किसी ने साप्ताहिक हिन्दुस्तान तो किसी ने चौथी दुनिया के स्वरुप को साकार करने पर जोर दिया। दर्जन भर सलाह मशविरा के बाद बोलने के लिए बदनाम मैं भला क्यों ख़ामोश रहता? कुछ बोलने के लिए जब मै खडा हुआ तो सहारा के ढेरों सहकर्मी खिलखिला पड़े। अरे बबल जी आ गए भाई। खैर बिना औपचारिक संबोधन के मै चालू हो गया तब नामवर जी ने मुझे रोका। अपना परिचय देकर बोलिए। जब मैं अपने नाम का उल्लेख कर आगे बढ़ा ही था कि एक बार फिर नामवर जी बोले, अरे अनामी शरण बबल तुम हो। इस मीटिंग के बाद मिलना। इसके बाद मै फिर चालू हो गया, कि एक नयी    वीकली के आरंभ होने से पहले पहले की और समकालीन पत्रिकाओं पर बात करने का यह सिलसिला तो बेहतर है। मगर इससे सबसे अधिक खतरा  यह होता और रहता है कि 48 पेजी सहारा वीकली को देखते हुए कही पर पाठकों को इसमें रविवार, दिनमान, कहीं धर्मयुग कहीं माया तो कहीं चौथी दुनिया नजर आ जाएगा मगर समग्र तौर पर सहारा कईब कोई पहचान सामने नहीं प्रकट होगी। हमलोग एक खिचड़ी वीकली के लिए बैठे हैं तो सबकी चर्चा जायज है। नहीं तो एक नये बेहतरीन और सबसे अलग वईकलईब के लिए टीम को इससे हटकर सोचने की जरूरत है। जब मैंने अपनी बात ख़त्म कर दी तो हमारे प्रधान संपादक डा. नामवर सिंह जी ने ताली बजाकर मेरी बातों का समर्थन किया और इसे सबसे महत्वपूर्ण सलाह कहकर दोबारा मीटिंग करने की बात कहकर रात 12 बजे के आसपास सभा विसर्जित कर दी। तब मैं उनके समक्ष पेश हुआ। मेरा हाथ पकड़ कर वे बोले तुमने बहुत गालियां मुझे खिलवाई अनामी बहुत लोगों ने भला बुरा कहा। तुमने तो मेरे खिलाफ लोगों को खड़ा होने का मौका ही दे दिया।  मैंने पूरी विनम्रता से कहा कि मेरे लिए भी यह सदमा सा था कि एक दिवंगत लेखक के बारे में आपने कुछ नहीं कहा। मैंने तो एक खबर बना दी पर इसको लोगो ने किस तरह लिया या आप तक निंदा पहुंची। यह तो मैं जानता नहीं। आप ही बता रहे हैं।  मेरे कहने पर वे ठठाकर हंस पड़े। कोई बात नहीं, मेरे मन में तुम्हें देखने की इच्छा थी। कई बार तुमसे मिला पर नाम नहीं जानता था। मैंने फ़ौरन 1987 में भारतीय जनसंचार संस्थान के हिंदी क्लास की याद दिलाई। तो वे फिर खिलखिला पड़े। ओह। अनामी शरण बबल। रामजी लाल जांगिड़ के स्टूडेंट्स रहे हो। उनकी बातों को तुरंत काटा केवल जांगिड़ साहब नहीं सर आपका भी स्टूडेंट्स रहा हूं।  इस पर मेरी पीठ पर एक धौल जमाते हुए कहा इसीलिए अपने गुरु की तुमने मलहम पट्टी कर करा दी। उनके सामने जब मैंने अपने हाथ जोड दिए तो मेरे करीब आते हुए कहा शाबाश अनामी। एक पत्रकार के लिए खबर प्रमुख होता है और तुमने उसको प्रमुखता दी। यही तुम्हारा कर्तव्य था, जिसका तुमने पालन किया।  राष्ट्रीय सहारा में रहते हुए उनसे दो तीन बार मिला। और सहारा छोड़ने के बाद भी दो एक मुलाकात हुई। लंबी बीमारी के बाद कल देर रात हिन्दी के सुपर स्टार लेखक साहित्यकार आलोचक डा. नामवर का ना रहना एक युग के अंत सा तो है ही। हिंदी के समर्पित लेखक ने साहित्य आलोचना शोध और अध्यापन में अनूठी मिसाल कायम की है। मैं खुद को आज़ सौभाग्यशाली मान रहा हूं कि नामवर सिंह जी से यदा कदा ही सही पर कुछ पल के साथ का सुखद क्षण मेरे पास भी है। इनसे पढ़ने का भी मौका मिलना मेरे लिए दुर्लभ है। विनम्र श्रद्धांजलि प्रणाम ।।
अनामी शरण बबल 
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