सोमवार, 31 अगस्त 2020

CDS/ अजीत डोभाल

 अजित_डोभाल  कौन  हैं? 

कौन है और क्या है जानें, असली जिंदगी के बारे में कुछ ख़ास बातें :


👉 1945 में एक गढ़वाली उत्तराखण्ड ब्राह्मण परिवार में जन्म, पिता आर्मी में ब्रिगेडियर थे। 

👉 1968 में IPS का एग्जाम टॉप किया, केरल Batch के IPS Officer बने।

👉 17 साल की Duty के बाद ही मिलने वाला Medal 6 साल की Duty के ही बाद मिला।

👉 पाकिस्तान में जासूस के तौर पर तैनाती, पाकिस्तान की आर्मी में मार्शल की पोस्ट तक पहुंचे और 6 साल भारत के लिए जासूसी करते रहे।

👉 1987 में खालिस्तानी आतंकवाद के समय पाकिस्तानी Agent बनकर दरबार साहिब के अंदर पहुंचे, 3 दिन आतंकवादियों के साथ रहे। आतंकवादियों की सारी Information लेकर Operation Black Thunder को सफलता पूर्वक अंजाम दिया।

👉 1988 में कीर्ति चक्र मिला, देश का एक मात्र Non Army Person जिसे यह Award मिला है।

असम गए, वहां उल्फा आतंकवाद को कुचला।

👉 1999 में Plane_Hijacking के समय आतंकवादियों से Dealing की !

👉 RSS के करीबी होने के कारण मोदी ने सत्ता में आते ही NSA (National Security Advisor) बनाया !

👉 बलोचिस्तान में Raw फिर से Active की, बलोचिस्तान का मुद्दा International बनाया।

👉 केरल की 45 ईसाई नर्सों का Iraq में Isis ने किडनैप किया। डोभाल खुद इराक़ गए, isis से पहली बार Hostages ज़िंदा_बिना_बलात्कार हुए (महिला) वापिस लौटे

👉 राष्ट्रपति_अवार्ड_मिला।

👉 2015 मई में भारत के पहले सर्जिकल Operation को अंजाम दिया। भारत की सेना Myanmar में 5 किमी तक घुसी । 50 आतंकवादी मारे।

👉 नागालैंड के आतंकवादियों से भारत की इतिहासिक Deal करवाई, आतंकवादी संगठनों ने हथियार डाले।

भारत की Defence Policy को Agressive बनाया। भारत की सीमा में घुस रहा पाकिस्तानी Ship बिना किसी Warning के उड़ाया,कहा बिरयानी खिलाने वाला काम नही कर सकता।

👉 कश्मीर में सेना को खुली छूट दी, Pallet_Gun सेना को दिलवाईं। पाकिस्तान को दुनिया के मुस्लिम देशों से ही तोड़ दिया।

👉 2016 September आज़ाद भारत के इतिहास का 1971 के बाद सबसे इतिहासिक दिन। डोभाल के बुने गए SurgicalOperation को सेना ने दिया अंजाम। PoK में 3 किलोमीटर घुसे। 40 आतंकी और 9 पाकिस्तानी फौजी मारे। दोनों Surgical Strikes में Zero Casuality 

Air Surgical Strike की सफलता को तो दुनिया ने सेटेलाइट द्वारा देखा ही है।

👉 कश्मीर से धारा 370 हटाने व शांति की स्थापना में विशेष योगदान 


👉 देशभक्त हिंदू_संगठन Vivekanand Youth Forum की स्थापना की।

👉 एक वो बाजीराव था जो कहा करता था मैं दिल्ली जीत सकता हूँ । एक डोभाल है जो कहते है की मैं इस्लामाबाद जीत सकता हूँ, हमें आप पर गर्व है।

रविवार, 30 अगस्त 2020

रवि अरोड़ा की नजर से .....

 शुक्रिया रिया चक्रवर्ती/ रवि अरोड़ा 


रवि अरोड़ा


आज सुबह एक मित्र का फ़ोन आया और उसने सुशांत सिंह राजपूत के मामले में मेरी राय जाननी चाही । दरअसल वह रिया चक्रवर्ती को लेकर बहुत उद्देलित था और जानना चाह रहा था कि क्या रिया की गिरफ़्तारी होगी ? बेहद पढ़े लिखे और सामाजिक रूप से जागरूक अपने इस मित्र के सवालों से मैं चौंका । दरअसल आज ही अख़बार में ख़बर थी कि दुनिया भर में सबसे तेज़ी से कोरोना संक्रमण के मामले भारत में बढ़ रहे हैं और वह दिन दूर नहीं कि कोरोना के मामले में हम दुनिया में नम्बर वन होंगे , बावजूद इसके मेरे मित्र के दिमाग़ में सुशांत और रिया ही क्यों चल रहे हैं ? पहले मैंने समझा कि यह सब ख़बरिया चैनलों का असर होगा मगर बातचीत लम्बी खिंचने पर स्पष्ट हो गया कि बात केवल इतनी भर ही नहीं है । इन हवा हवाई सवालों के स्रोत बेहद गहरे हैं । सवाल सुशांत अथवा रिया का नहीं होता तो और किसी काल्पनिक विषय का होता । दरअसल ये सवाल कोई सवाल नहीं वरन मूल सवालों के विकल्प होते हैं । आप कुछ और न सोचें इस लिए ही इस तरह के सवाल सृजित किये जाते है । हमारे देश को जो भी ताकते चला रही हैं , वे अपने इस काम में माहिर हैं और भारतीय मानस और उसके मनोविज्ञान को भली भाँति समझती हैं । उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि भारतीय मानस को कब क्या सोचवाना है और कब क्या सोचने से रोकना है । बेशक इस पूरी एक्सरसाइज़ में सारी गालियाँ मीडिया और सोशल मीडिया को पड़ें मगर वे तो इस पूरे क्रियाकलाप के छोटे से टूल भर हैं । असल खेल तो इन सर्वशक्तिमान ताक़तों का ही होता है । 


सवाल मौजू है कि सुशांत सिंह राजपूत और रिया चक्रवर्ती जैसे सवाल यदि हवा में नहीं दागे जाते तब भारतीय मानस किस विषय पर विमर्श करता ? इस संकटकाल में क्या वह एक दूसरे से पूछता कि तमाम दावों के बावजूद देश में कोरोना इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ा ? क्या वह सोचता कि नौकरियाँ कब और कैसे बहाल होंगीं और काम धंधे कब पटरी पर लौटेंगे ? प्रधानमंत्री ने झूठ क्यों बोला कि चीन ने हमारी ज़मीन नहीं क़ब्ज़ाई ?  क्या हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, रेल गाड़ियों और बेशक़ीमती सरकारी संस्थानों की बिक्री उसकी सोच के केंद्र में स्थान पाती ? पेट्रोल-डीज़ल के दाम क्यों बढ़े, भारतीय रुपया क्यों गिरा और माँग के बिना भी महँगाई क्यों बेक़ाबू है, क्या एसे सवाल दिमाग़ों में कौंधते ? आपका उत्तर आप जानें मगर मेरा जवाब तो न में ही है । आप स्वयं सोचिये देश चलाने वाली ताक़तें क्या दिमाग़ों को भला इतना खुला छोड़तीं कि आप कुछ भी सोच सकें ? 


ताली-थाली बजाने, मोमबत्ती-दीये जलाने, तबलीगी जमात, राफ़ेल, चीन-पाकिस्तान, राम मंदिर, ट्रम्प, मोर और बढ़ी दाढ़ी और न जाने कौन कौन से विषय ऊपर से नीचे भेजे ही इसलिए जाते हैं कि दिमाग़ों में असली सवाल न उगें। ये ताक़तें जानती हैं कि भारतीय मानस तार्किकता से नहीं वरन सहज भावनाओं से प्रेरित होता है और उसकी कोमल भावनाओं को कब कौन सी दिशा देनी है , वे जानते हैं । सच कहूँ तो मैं इस रिया चक्रवर्ती का शुक्रगुज़ार हूँ । यदि वह परिदृश्य में आकर रिक्त जगह नहीं भरती तो सर्वशक्तिमान ताक़तों को न जाने कौन कौन से नए विषय करने पड़ते । यह सोच कर भी मन डरता है कि ये विषय क्या हो सकते थे ? पुराना अनुभव तो यही कहता है कि कुछ न कुछ हिंदू-मुस्लिम अथवा मंदिर-मस्जिद मार्का ही होता । अब इस हिसाब से तो मेरा रिया चक्रव्रती को धन्यवाद कहना बनता है कि सारी मुसीबतें उसने ख़ुद झेल कर पूरे मुल्क को किसी बड़ी ख़ुराफ़ात से बचा लिया । शुक्रिया रिया चक्रवर्ती ।

शनिवार, 29 अगस्त 2020

GST यानी करप्ट god टैक्स

 कल हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में केंद्र सरकार ने राज्यो से किया गया जीएसटी मुआवजा देने का वादा तोड़ दिया है यह बहुत बड़ी खबर है लेकिन बिक चुका मीडिया इसे दूसरी तरह से पेश कर रहा है....


कल जो हुआ है उसे आप ऐसे समझिए कि किसी कर्जदार से आपको  रुपये लेने हो,..... उसने आपकी हर महीने की क़िस्त बांध दी हो....... दो साल तक वह आपको हीलेहवाले कर पैसा देता रहा अब तीसरे साल वो आपको लगातार चार महीने तक मासिक क़िस्त नही दे रहा ओर जब आप रोज तकाजा कर रहे है तो वो बोल रहा है कि पैसे तो मै नही दूँगा!...... तुमको जरूरत हो तो तुम्हे मैं एक बड़े आसामी से उधार दिला देता हूँ लेकिन ब्याज तो तुम्हे ही देना होगा... कल एग्जेक्टली यही हुआ है


साफ और सीधी बात यही है कि केंद्र ने राज्यों को मई, जून, जुलाई और अगस्त यानी चार महीने का मुआवजा देने से इनकार कर दिया है सरकार ने हाल में वित्त मामलों की स्थायी समिति को बताया है कि उसके पास राज्यों को मुआवजा देने के लिए पैसे नहीं हैं.


अब राज्यो को पैसे तो चाहिए इसलिए उसने दो विकल्प सुझाए है दोनों ही विकल्प मे केंद्र अपनी जिम्मेदारी उठाने से बच रहा है


पहला विकल्प यह है राज्य अपना पूरा GST मुआवजा जो कि 2.35 लाख करोड़ रुपये होता है, RBI से सलाह मशविरा के बाद बाजार से उठाएं (जैसे बाजार में रास्ते पर पड़ा है 2.35 लाख करोड़?)


दूसरा विकल्प यह है कि रिजर्व बैंक की सलाह से राज्यों को एक विशेष विंडो दिया जाए ताकि वो एक तय ब्याज दर पर 97,000 करोड़ रुपये रकम उधार हासिल ले सकें। इस पैसे को पांच साल बाद वापस करे 


दोनों ही विकल्प में राज्यो को फाँसी लगने की बात है यह साफ साफ धोखाधड़ी की जा रही है केंद्र के द्वारा ....अगर राज्यो को हो रहे नुकसान का 5 साल तक मुआवजा देने की बात की है तो मुआवजा देने की जिम्मेदारी आपकी है ?.....राज्य उसके लिए उधार क्यो ले ?


सच यह है कि इन्होने अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है पहले पूरा टैक्स सिस्टम अपने हाथ मे लेकर आपने सब गुड़ गोबर कर दिया अब जब संभल नही रहा है तो पीठ दिखाकर भाग गए और बोल रहे हैं कि उधार लेकर काम चलाओ 


अब वस्तुस्थिति क्या है राज्यो के सामने क्या दिक्कत है वो भी समझ लीजिए.........


एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है राज्यों को वैट और उत्पाद शुल्क में 53,000 करोड़ रुपए का घाटा हो रहा है। अगर राज्य जीएसटी (एसजीएसटी) में गिरावट को इसमें जोड़ दिया जाए, तो अप्रैल-जून तिमाही के दौरान राजस्व की कमी बढ़कर 1.2 लाख करोड़ रुपए हो जाती है। एसबीआई पेपर का अनुमान है कि 20 राज्यों के सर्वेक्षण में लगभग 3 लाख करोड़ रुपए के राजस्व कमी आई है और केंद्र के राजस्व कमी को जोड़ दिया जाए तो वर्ष 2021 में संयुक्त नुकसान करीब 4.5 लाख करोड़ रुपए का होगा। राज्यों को कोरोना महामारी से लड़ने और मुकाबला करने में अतिरिक्त 1.7 लाख करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। यदि यह राशि जोड़ी जाती है, तो राज्यों के लिए संचयी राशि लगभग 6.2 लाख करोड़ रुपए होगी। 


कोरोना के दौर में मोदी सरकार को  राज्यो की अतिरिक्त मदद करनी थीं लेकिन वो तो दूर रहा बल्कि जो रकम देना थी वो भी नही दी जा रही है.......


अब केंद्र ने पूरी तरह से अपने हाथ ऊंचे कर दिए है तो इस अनुमानित 6.2 लाख का भुगतान राज्यो को ही करना होगा तो अब किस आधार पर कहा जा रहा है कि RBI से या बाजार से राज्य ओर कर्ज ले ?.....जबकि राज्य पहले ही घाटे में चल रहे है......... यानी साफ साफ मुल्क की आर्थिक बर्बादी स्पष्ट रूप से दिख रही है .......

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

राष्ट्रपति भवन की परम्पराए / विवेक शुक्ला

 Navbharatimes 

फर्स्टलेडी की परंपरा

पूर्व राष्ट्रपति डा.शंकर दयाल शर्मा की पत्नी श्रीमती विमला शर्मा के हाल ही में हुए निधन से बहुत से लोगों को देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद की पत्नी श्रीमती राजवंशी देवी ( चित्र मेें )की याद आ गईं। विमला जी की तरह वह भी अति सरल और शालीन महिला थीं। उन्हें राष्ट्रपति भवन में सब मां जी ही कहते थे। 


राजवंशी देवी जी राष्ट्रपति भवन के अंदर चलने वाले स्कूल में होने वाले कार्यक्रमों में भाग लेते हुए मेधावी बच्चों को पुरस्कृत भी करती थीं।


 डा. राजेन्द्र प्रसाद ने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करने के बाद 1 फरवरी, 1950 को राष्ट्रपति भवन में सपरिवार रहना शुरू कर दिया था। इसी उपलक्ष्य में यहां हर वर्ष 1 फरवरी को राष्ट्रपति भवन दिवस मनाया जाता है। राजवंशी देवी जी इस दिन होने वाले  सांस्कृतिक कार्यक्रमों में राष्ट्पति भवन के स्टाफ और उनके परिवारजनों के साथ वक्त बिताया करती थी।  उनकी अपनी पौत्रियां कनॉट प्लेस के ऱघुमल कन्या विधालय में पढ़ती थीं।


देश के दूसरे राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन विधूर थे। उनकी पत्नी का निधन 1956 में हो गया था।


 डा. जाकिर हुसैन की पत्नी श्रीमती शाहजहां बेगम अपने परिवार के भीतर ही रहना पसंद करती थीं। वह अपने पति के साथ जामिया यूनिवर्सिटी के पास के कब्रिस्तान में चिर निद्रा में हैं। वी.वी.गिरी की पत्नी श्रीमती सरस्वती बाई भी राष्ट्रपति भवन तक सीमित थीं। वह धार्मिक प्रवृति की महिला थीं।  


फिर राष्ट्रपति डा. फ़ख़रुद्दीन अली अहमद बने। उनकी पत्नी बेगम आबिदा अहमद जी भारत की प्रथम महिला नागरिक थीं जो अपने पति के साथ देश-विदेश में होने वाले कार्यक्रमों में भाग लिया करती थीं। वह 1980 और 1984 में उत्तर प्रदेश के बरेली संसदीय क्षेत्र से लोक सभा की दो बार सदस्य थी। उनका बहुत सक्रिय सामाजिक जीवन था। उनकी शिक्षा   अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हुई थी।


एन.संजीव रेड्डी की पत्नी श्रीमती नागा रत्नम्मा मुगल गॉर्डन में आया-जाया करती थीं। 


उनके बाद बने राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की पत्नी प्रधान कौर जी अपने पति के साथ शायद ही कभी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में दिखीं। कहते है, प्रधान कौर जी अपने गांव के घर में रहना पसंद करती थीं। 


कमोबेश यही स्थिति आर.वेकटरामन की पत्नी श्रीमती जानकी वेंकटरामन की भी थी।  उनके बाद डा. शंकर दयाल शर्मा देश के राष्ट्पति बने। के.आर.नारायणन देश के  दसवें राष्ट्रपति थे। उनकी पत्नी उषा नारायणन अपने पति के साथ विदेश यात्राओं में जाती थीं।  वह मूल रूप से बर्मा से थीं। उषा जी पृथ्वीराज रोड स्थित  ईसाई कब्रिस्तान में अपने पति के साथ दफन हैं। 


फिर अविवाहित एपीजे अब्दुल कलाम देश के राष्ट्रपति बने।

 

देवीसिंह रणसिंह शेखावत भारत की पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल  के पति हैं। वे अपनी पत्नी और देश की राष्ट्रपति के साथ देश-विदेश भी आते-जाते थे। 


प्रणव कुमार मुखर्जी की पत्नी शुभ्रा मुखर्जी जी का अपने पति के सेवाकाल के दौरान 18 अगस्त 2015 को निधन हो गया था। वह शिक्षाविद्द थीं और लेडी इरविन स्कूल से जुड़ी हुई थीं।। वह मुगल गॉर्डन के मालियों से मिलती रहती थीं ताकि मुगल गॉर्डन में रंग-बिरंगे फूलों की छटा बिखरती रहे।

 

भारत की मौजूदा प्रथम महिला नागरिक श्रीमती सविता कोविन्द सरकारी नौकरी करती रही हैं। वह जमीन से जुड़ी हुई महिला हैं। पिछले दिनों मीडिया में खबरें छपी थीं कि सविता जी राष्ट्रपति भवन के भीतर कोविड-19 से बचाव के लिए जरूरी मास्क बना रही हैं। सविता जी भी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की तरह राष्ट्रपति भवन के मुलाजिमों के साथ मिलती-जुलती हैं। यानी राजवंशी देवी जी ने जिस परम्परा को शुरू किया था वह जारी है।


लेख 27 अगस्त को पब्लिश हुआ।

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

चेतन को भूलना मुमकिन नहीं /राकेश थपलियाल

 My Tribute to late Chetan Chauhan ji and Sir Don Bradman.


स्वर्गीय चेतन चौहान ने बताई थी राज की बात


सचिन को ब्रेडमैन के रिकॉर्ड सपना लगते हैं 

राकेश थपलियाल

भारत के पूर्व टेस्ट क्रिकेटर और उत्तर प्रदेश के खेल मंत्री रहे चेतन चौहान का कुछ दिन पूर्व कोरोना संक्रमण के कारण निधन हो गया। चेतन चौहान बड़े जीवट वाले खिलाड़ी रहे और कड़ी मेहनत से क्रिकेटर, चयनकर्ता, मैनेजर, प्रशासक, सांसद, विधायक और उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनट मंत्री बने। वह क्रीडा भरती के राष्टट्रीय अध्यक्ष भी थे। उनकी सफलता का राज मेहनत करना और जिम्मेदारी की भवना रखना रहा। मेरे उनके साथ बहुत अच्छे संबंध रहे थे। क्रिकेट के मैदान और फिरोजशाह कोटला स्थित उनके कमरे में क्रिकेट और क्रिकेटरों के बारे में उनके साथ काफी चर्चा होती थी।

चेतन अपने करियर में कभी टेस्ट शतक नहीं बना सके। एक बार मैं और चेतन चौहान क्रिकेट मैच की कमेंट्री के दौरान आॅल इंडिया रेडियो के एक शो में मौजूद थे। एंकर ने पूछा चेतन जी आप कभी टेस्ट मैचों में शतक क्यों नहीं बना पाए? इससे पहले कि चेतन कुछ बोलते मैंने कहा, ‘ये कभी टेस्ट शतक नहीं बना पाए इसलिए क्रिकेटर के रूप में रिटायर होने के वर्षों बाद भी ये आज तक इतने मशहूर हैं। अगर एक शतक बना दिए होते तो आज इस पर चर्चा नहीं हो रही होती। भारतीय क्रिकेट में एक टेस्ट शतक लगाने वाले अनेक क्रिकेटर हैं उन्हें कोई नहीं पूछता है।’ चेतन का टेस्ट क्रिकेट में सर्वश्रेष्ठ स्कोर 97 रन का रहा है।

 एक बार मैंने सचिन तेंदुलकर की खासियतों के बारे में पूछा तो चेतन चौहान ने बताया, ‘यह 2001 में भरतीय क्रिकेट टीम के जिम्बाब्वे के दौरे की बात है। मैं भारतीय टीम का मैनेजर था। एक दिन सचिन ब्रेडमैन के बारे मे लिखी एक किताब पढ़ रहे थे। सर डॉन के रिकॉर्ड पढ़ने के बाद सचिन तेंदुलकर ने मुझसे कहा, ‘यह रिकॉर्ड देख लगता है कि यह सपना है। ऐसा लगता ही नहीं कि वास्तव में ऐसा हुआ होगा। यह संभव ही नहीं लगता।’ उन दिनोंं सचिन के रन कुछ ज्यादा नहीं बन रहे थे। मैंने उनकी जुबान से ब्रेडमैन का जिक्र सुना तो मैंने सोचा उन्हे ब्रेडमैन का ही उदाहरण देता हूं। मैंने कहा, ‘सचिन आपको मैं पिछल कई वनडे और टेस्ट मैचों में देख रहा हूं और यह नोट किया है कि आप हवा में ज्याद शॉट खेल रहो। इस वजह से बार-बार कैच आउट हो रहे हो। आपकी तुलना ब्रेडमैन के साथ होती है, लेकिन मैंने जितनी भी रिकॉर्डिंग में उन्हें बल्लेबाजी करते देखा है, उनमें वह कभी हवा में ऊंचे शॉट खेलते नहीं दिखाई दिए हैं। वह यह तो लेट कट कर रहे होते हैं, कवर ड्राइव मार रहे होते हैं या फिर पुल शॉट मार रहे होते हैं। आपको मेरी सलाह है कि हवा में शॉट खेलना बंद कर दो इससे आपके रन 15 से 20 प्रतिशत बढ़ जाएंगे।’ मेरी बात सुनने के बाद सचिन ने कोई जवाब तो नहीं दिया, लेकिन सारी बात को बड़े ध्यान से सुना था। वह सीनियर क्रिकेटरों की बहुत इज्जत करने वाले खिलाड़ी हैं। उनका व्यवहार जूनियर और सीनियर सभी क्रिकेटरों के साथ बहुत ही अच्छा रहता है, इसलिए सभी उनका सम्मान करते हैं।

यहां एक बात बतानी जरूरी है कि ब्रैडमैन ने अपने 52 टेस्ट के करियर में केवल  छह छक्के जमाए।

चेतन ने एक और किस्सा सुनाते हुए कहा, ‘कई बार ऐसा होता है कि कोई खिलाड़ी रन बहुत बनाता है, अच्छा परफार्म करता है, लेकिन मिलनसार नहीं होता। इसलिए टीम में उन्हें ज्यादा सम्मान नहीं मिल पाता। मुझे याद है कि आस्ट्रेलिया के पर्थ में कुछ बच्चे एक स्टैंड में खड़े होकर बहुत सचिन-सचिन चिल्ला रहे थे। जब सचिन की पारी खत्म हो गई तो मैंने कहा, ‘सचिन अगर आप इन बच्चों से बात कर लोगे तो इन्हें अच्छा लगेगा और यह पब्लिक रिलेशन की अच्छी एक्सरसाइज रहेगी।’ सचिन तुरंत मान गए। काफी देर तक सचिन ने बच्चों को आटोग्राफ दिए, कुछ दर्शकों ने अपने मोबाइल से उनके फोटो भी खींचे। इसके बाद सभी ने तालियां बजाकर उनका स्वागत किया। ’

चेतन ने कहा, यह किस्सा बताने के पीछे मेरा मकसद यह दर्शाना है कि सचिन अपने सीनियरों की हर बात को बड़े ध्यान से सुनते हैं, इसीलिए वह इतने महान हैं। 

चेतन महान क्रिकेटर और शानदार व्यक्तित्व के धनी के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे।

(लेखक खेल टुडे पत्रिका के संपादक हैं)

रविवार, 23 अगस्त 2020

दिनमान की मीठ्ठी मीठ्ठी यादें / त्रिलोकदीप

 दिनमान के शुरू के दिनों की याद आ रही है . 


पहली जनवरी, 1966 को जब मैंने दिनमान जॉइन किया तो उसका ऑफ़िस 7, बहादुर शाह रोड स्थित टाइम्स हाउस की दूसरी मंजिल पर था .दरअसल सभी अखबारों यथा टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स और इकनोमिक टाइम्स के संपादकीय सहकर्मी उसी एक फ्लोर पर बैठा करते थे .महाराष्ट्र टाइम्स के एकमात्र संवाददाता इंदुरकरजी भी वहीं बैठते थे .

ब्यूरो सामान्य था .उसी जगह आपको इकनोमिक टाइम्स के सतिंदर सिंह , सुदर्शन भाटिया, सुषमा कपूर (बाद में रामचंद्रन), तो टाइम्स ऑफ इंडिया के सुभाष चक्रवर्ती और सुभाष किरपेकर के अलावा नवभारत टाइम्स के आनंद जैन, ललितेश्वर श्रीवास्तव, रघुवीर सहाय और डॉ नंदकिशोर त्रिखा दीख जायेंगे. ब्यूरो के दाहिनी तरफ चीफ रिपोर्टर जे.डी. सिंह और उनके रिपोर्टर,जिनमें प्रमुख थे बी.के.जोशी ( दोस्तों के लिये बल्ली),   के.एन . मलिक, योगेंद्र बाली, मोहम्मद शमीम,  पी.सी.गांधी, वी.के. देथे,ऊषा राव (बाद में राय), चांदनी सिंह (बाद में लूथरा), जनक सिंह आदि .उनके साथ ही समाचार संपादकों में श्रीकृष्ण, प्रकाश चंद्र, जे. एस.बुटालिया (दोस्तों में जग्गी) आदि,बायीं तरफ सत सोनी, रमेश प्रेम, माया शर्मा, प्रमुख संवाददाता रामावतार त्यागी, आर्थिक मामलों के जानकार वासुदेव झा और बीचोंबीच समाचार संपादक पंडित हरिदत्त शर्मा और धुर बायें दिनमान के सहयोगी . 

केबिन कुल जमा छह थे, शामलाल, गिरिलाल जैन (टाइम्स ऑफ इंडिया), अक्षय कुमार जैन और रामपाल सिंह (नवभारत टाइम्स) तथा मनोहर श्याम जोशी, जितेंद्र गुप्त तथा सच्चिदानंद वात्स्यायन का . दिनमान के अन्य लोग यानी श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्यामलाल शर्मा, योगराज थानी, रमेश वर्मा, रामसेवक श्रीवास्तव, श्रीमती शुक्ला रुद्र, जवाहरलाल कौल और मैं त्रिलोक दीप बाहर हाल में बैठते थे दूसरे अखबारों के साथियों के संग!

कहने को हम लोगों के बीच काम का बंटवारा था लेकिन हर किसी से हर काम करने की अपेक्षा रहती थी .श्रीकांत वर्मा अपनी रिपोर्ट लिखते थे, कला का कॉलम भी देखते थे जबकि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना साहित्य और रंगमंच का कॉलम देखते और चरचे चरखे भी लिखा करते थे, रमेश वर्मा विज्ञान औऱ विश्व देखते थे, रामसेवक श्रीवास्तव प्रदेश, योगराज थानी खेल और खिलाड़ी, श्यामलाल शर्मा पत्रकार संसद, श्रीमती शुक्ला रुद्र नारी जगत, जवाहरलाल कौल राष्ट्र .

मुझे शुरू में पिछले सप्ताह और ‘दुनिया भर की’ लिखने को दिया गया  यह शुरुआती दौर था .उसके बाद बहुत कुछ बदला .आज का विषय दिनमान का नहीं बल्कि उस समय के कामकाज के माहौल है जो बहुत ही खुशगवार और सुकून भरा हुआ करता था .मेरी सीट के पीछे बहुत अच्छी लाइब्रेरी थी जिसके इंचार्ज कश्मीरीलाल शर्मा थे .उनके दो साथियों एस.के. अग्रवाल और एम. एम.जैन (कवयित्री इंदु जैन के पति) के नाम याद हैं .

तीसरी मंज़िल पर जनरल मैनेजर जे. एम. डिसूजा, बिज़नेस मैनेजर रमेश चंद्र आदि प्रबंधकों का फ्लोर था . बेसमेंट में चीफ फोटोग्राफर रविब्रत बेदी,  गुरुदत्त और परमेश्वरी दयाल बैठते थे और वहीं उनका डार्करूम था .


उस समय साहू शांतिप्रसाद जैन और रमा जैन टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप का सारा बिज़नेस देखा करती थीं  उनकी संस्कृति और साहित्य में बहुत रुचि थी जिस के कारण वे विभिन्न विषयों की नयी नयी पत्रिकाएं निकाला करती थीं  .दिनमान निकालने का आइडिया भी उन्हीं का था और वात्स्यायन जी को उन्हीं की शर्तों पर रखने की मंजूरी भी उन्हीं की . 

उनकी निजी रुचि के चलते ही उन दिनों हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं की पत्रिकाओं ने खूब तरक्की की और नाम भी कमाया था . संपादक भी ओजस्वी और यशस्वी हुआ करते थे .

इस सुखद वातावरण का प्रभाव लोगों के सोच और मिज़ाज़ पर भी दीखता था. जिस के चलते अपने अपने काम के प्रति लोगों में समर्पण की भावना थी .हिंदी और अंग्रेज़ी के पत्रकारों में निकटता थी और कइयों के बीच गहरी दोस्ती भी थी .

वात्स्यायन जी और गिरिलाल जैन को अक्सर साथ साथ बातें करते देखा जाता था .अंग्रेज़ी और हिंदी के रिपोर्टरों में भी खूब छनती थी .

टाइम्स ऑफ इंडिया के विदेशों में तैनात विशेष संवाददाताओं से मैं विदेश जाने पर मिलता जैसे 1975 में  लंदन में मैं जे.डी.सिंह से, 1977 में बी.के.जोशी से और 1983 में के.एन. मलिक से मिला तो उन लोगों ने  मेरी भरपूर मदद की थी .मलिक ने तो मेरी मुलाकात उस समय वहां के रेडिंग में रह रहे तथाकथित खालिस्तान के प्रमुख जगजीत सिंह चौहान से तय की थी .

इस्लामाबाद में मेरी मुलाकात वी. के.देथे से हुई और हम लोग साथ साथ पेशावर भी गये थे . नवभारत टाइम्स के पंडित हरिदत्त शर्मा के साथ 1969 में लेह लद्दाख की यात्रा की थी  टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रकाश चंद्र और जे. एस. बुटालिया के साथ  डिप्लोमेटिक पार्टियों में हम लोग अक्सर एक साथ होते .

लेकिन मेरी सब से अधिक करीबी सुभाष किरपेकर से थी  हम दोनों  एक साथ मिलकर कई प्रेस कॉन्फ्रेन्स में गये, कई महत्वपूर्ण लोगों से मुलाक़ातें कीं और पंजाब में आतंकवाद कवर किया जिसमें शम्मी सरीन ने कई तरह के जोखिम उठाकर हमारी सहायता की थी .

एक बार  हरियाणा के अधिकारी बियर की फैक्ट्री दिखाने के लिये एक प्रेस पार्टी को मुरथल ले गये जिसमें मैं और सुभाष किरपेकर भी थे .उन्होंने बियर बनाने की विधि के बारे में बताया और फैक्ट्री का चक्कर भी लगवाया  .

उसके बाद बातचीत और बियर का दौर शुरू हुआ जो काफी देर तक चला  लंच करते करते काफी वक्त हो गया .चलते समय हमें दो बोतल बियर भेंट की गयीं  .

हम दोनों ऑफ़िस आ गये . सुभाष ऊपर चले गये, मुझे नीचे प्रयाग शुक्ल मिल गये  बियर की बोतलें मेरे हाथ में थीं  मैंने उनकी तरफ और उन्होंने मेरी तरफ औऱ बोतलें प्रयाग जी के झोले में .

एक बार मुझे एन.के. सिंह ने न्योता .उनसे मेरी पहली मुलाकात भिलाई स्टील प्लांट में हुई थी . वे तब वहां कार्मिक प्रबंधक थे   उनसे हुई बातचीत को दिनमान में सही ढंग से छापा गया था  . वे खासे प्रभावित हुए . दिल्ली में किसी नये काम में लग गये 

मुझे एक शाम मिलने का निमंत्रण दिया   मैंने कहा कि टाइम्स का मेरा दोस्त सुभाष किरपेकर भी आयेगा . एन. के. सिंह खुश हो गये . उन्होंने अपने नये काम के बाबत बताया .

उन्होंने बहुत सेवा की .डिनर करने के बाद वहां से हम दोनों निकले  बाद में एन. के.सिंह एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के चेयरमैन बन गये , बावजूद इसके हमारी दोस्ती में कोई फर्क नहीं आया  कभी कभी तो वे प्रेस क्लब में भी आ धमकते थे ।

पंजाब में आतंकवाद कवर करने के लिए दिनमान से मैं औऱ टाइम्स ऑफ इंडिया से सुभाष किरपेकर अमृतसर जाया करते थे   वहां हमारा एक सहयोगी थे शम्मी सरीन . वे दिनमान के लिये नियमित संवाद भेजा करते थे  वे हम दोनों को ऐसे ऐसे लोगों से मिलवाते जिनसे मिलना आम संवाददाता के लिये पहुंचना आसान नहीं होता था  .

एक दिन सुभाष ने कहा कि इस बार चंडीगढ़ से होकर अमृतसर चलते हैं, वहां प्रेम कुमार से मिलकर आतंकवाद बाबत सरकार की नीतियों का भी जायजा ले लेंगे .हम दोनों प्रेम कुमार के घर पहुंचे तो देखा चंदन मित्रा पहले से वहां मौजूद थे  .तब  वे स्टेट्समैन में असिस्टेंट एडिटर थे . 

प्रेम कुमार के ही घर हमने रात बितायी . उनसे फीडबैक लिया और अगले दिन सुबह की ट्रेन लेकर अमृतसर के लिए रवाना हो गये . बाद में प्रेम कुमार इंडियन एक्सप्रेस के चंडीगढ़ संस्करण के संपादक हो गये  .  

उन दिनों हम लोग अमृतसर इंटरनेशनल होटल में रुका करते थे.  शम्मी सरीन को सूचित कर दिया .उसने अकाल तख्त के जत्थेदार तथा और कई लोगों से मुलाक़ातें तय कर रखी थीं . स्वर्ण मंदिर के मुख्य ग्रंथी कृपाल सिंह से मुलाकात सुभाष के लिये एक्सक्लूसिव स्टोरी सिद्ध हुई जो टाइम्स ऑफ इंडिया की बैनर है हेडलाइन बनी थी .

इससे पहले 1984 में ब्लू स्टार ऑपरेशन स्वर्ण मंदिर के भीतर से कवर करने वाले चुनिंदा पत्रकारों में सुभाष किरपेकर भी थे .बाद में जब अकाल तख्त के पुनर्निर्माण का ज़िम्मा बाबा संता सिंह को सौंपा गया तो हम दोनोँ ने कई बार उनसे मुलाकात कर कार्य की प्रगति बाबत भी चर्चा की थी .

शम्मी सरीन के माध्यम से ये सभी काम हो रहे थे . यहा तक कि हम लोग संत जरनैल सिंह भिंडरावाले के मुख्यालय मेहता चौक भी गये  शम्मी की मदद से कुछ खाड़कूओं से भी भेंट हुई थी  .

पंजाब में आतंकवाद को हम दोनों ने बहुत विस्तार से  कवर किया था  एक बार हम लोग दिन भर की भागदौड़ करने के बाद होटल पहुंचे तो सोचा थकान मिटायी जाये .

अभी हम लोग मूड बना ही रहे थे कि हमने अपने कमरे में कंपन महसूस की. वह भूचाल था .दोनों ने हाथ जोड़ कर वाहेगुरु को याद किया   हम लोग गुरू की नगरी में जो बैठे हुए थे .शाम को होता यों था कि सभी साथी पत्रकार भाई एक कमरे में इकट्ठा होकर सुस्ताते थे और अपने अपने अनुभव शेयर किया करते थे .

अमृतसर में ही जाकर पता चला कि हमारे  कुछ भाई डर के मारे होटल से बाहर ही नहीं निकलते थे और साथियों से सुनकर अपनी स्टोरी फ़ाइल कर दिया करते थे .

भला हो शम्मी सरीन का कि वह हमें ऐसी ऐसी जगह ले जाता जहां आम पत्रकार जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा सकता था.

सकी वजह यह थी कि एक तो वह स्थानीय था और दूसरे उसका नेटवर्क बहुत ही पुख्ता था .


सुभाष किरपेकर एक ही संस्थान में काम करने वाला साथी नहीं रह गया था बल्कि अंतरंग मित्र बन गया था . एक दिन मैं अपनी बेटी को ईस्ट पटेल नगर स्थित कालिंदी कॉलेज छोड़ने के लिए गया . मैं कॉलेज के गेट पर पहुंचा ही था कि सुभाष ने मुझे देख लिया .


वह पास ही में रहता था . मैंने अपनी बेटी से उसका परिचय कराया  उसके बारे में हमारे घर में सबको पता था कि हम लोग एक साथ अमृतसर जाते हैं .


सुभाष ने छूटते ही मेरी बेटी से पूछा, अभी पीरियड में वक़्त है न .उसके हामी भरने पर वह हम दोनों को अपने घर ले गया जो कॉलेज के बिल्कुल पास था .


अपनी पत्नी से परिचय कराया और मेरी बेटी को आदेश दिया जब तुम्हारा पीरियड खाली हो यहां आ जाया करो, आंटी से गप्पें भी मारो और खाओ पियो भी .अपनी पत्नी को भी यथोचित निर्देश दे दिये . जब तक मेरी बेटी ने वहाँ से पढ़ाई पूरी नहीं कर ली वह समय मिलने पर सुभाष के घर चली जाती .उसकी आंटी से भी अच्छी ट्यूनिंग बैठ गयी थी  .


 ऐसा था मेरा अज़ीज़ दोस्त बनाम सहयोगी सुभाष किरपेकर . दिनमान 10, दरिया गंज शिफ्ट हो गया फिर भी बहुत बार हमलोग साथ साथ ही रिपोर्टिंग पर जाया करते थे .मैं दिनमान छोड़ ‘संडे मेल’ में आ गया, हमारी दोस्ती में रत्ती भर भी फर्क नहीं . मन उस दिन ज़ार ज़ार रोया था जब एक दिन उसके इस संसार से कूच कर जाने की खबर मिली . मेरे दोस्त जस्विन जस्सी के साथ भी उसकी दोस्ती का मियार हमारी दोस्ती जैसा था .हम लोगों ने अपने यार को अश्रुपूरित अलविदा कहा.

महामानव बनेंगे हमारे बच्चें / कुमार नरेंद्र सिंह

 आज दिनांक 23.8.2020 को राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित मेरा लेख। यह लेख नयी शिक्षा नीति के विरोधाभाषों पर केंद्रित है।


महामानव बनेंगे हमारे बच्चे

कुमार नरेन्द्र सिंह


भारत की नयी शिक्षा नीति 2020 सरकार द्वारा स्वीकृत हो चुकी है और अब वह उड़ान भरने को तैयार है। वैसे इसकी तैयारी बहुत पहले से ही हो रही थी और पिछले साल इसे केवल इसलिए रोका गया था कि दक्षिण भारतीय राज्यों ने हिन्दी थोपे जाने की आशंका से इसका जबर्दस्त विरोध किया था। अब चूंकि नये ड्राफ्ट में राज्यों को शिक्षण की भाषा चुनने का विकल्प दे दिया गया है, इसलिए उनके विरोध का आधार खत्म हो गया। हमें बताया गया है कि इस नयी शिक्षा नीति से भारत शिक्षा का वैश्विक गढ़ बन जाएगा और एक बार फिर विश्वगुरू बनेगा। 

यदि 17 अगस्त को आयोजित वेबिनार में शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के भाषण पर गौर किया जाए, तो ऐसा लगता है, जैसे शिक्षा नीति का उद्देश्य लोगों को केवल शिक्षित करना नहीं है, बल्कि वैश्विक नागरिक और तत्पश्चात महामानव तैयार करना है। अपने भाषण में नयी शिक्षा नीति की वह भूरी-भूरी प्रशंसा करते हैं। वह हमें बताते हैं कि नयी शिक्षा नीति से देश का कायाकल्प हो जाएगा और जो भारत आज अपनी प्रगति के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है, वह इस नयी शिक्षा नीति के बल पर न केवल अपनी किस्मत संवारने में सक्षम होगा, बल्कि पूरी दुनिया को एक नयी राह दिखाएगा। इस शिक्षा के जरिए वैश्विक मानव तैयार होंगे। वह यहीं पर नहीं रुकते हैं, बल्कि बड़ी शान से बताते हैं कि इस नयी शिक्षा नीति के माध्यम से हम महामानव तैयार करेंगे। वह कहते हैं, ‘हम महामानव बनाने के लिए ही पैदा हुए हैं’। वेबिनार में शामिल दर्जनों विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर्स ने उनकी बातों का जमकर स्वागत किया। वेबिनार की बातों से ऐसा महसूस हुआ, जैसे अब भारत जल्दी ही शिक्षा के मामले में विश्व का पथप्रदर्शन करने लगेगा। हमारे कॉलेज और विश्वविद्यालय जल्दी ही अपनी घिसटती चाल को सदा के लिए तिलांजलि दे देंगे और शैक्षणिक विकास के पथ पर इतनी तेजी से दौड़ेंगे कि दुनिया देखती रह जाएगी। इसके अलावा वे यह भी बताते हैं कि इस शिक्षा नीति से स्वच्छ भारत, स्वस्थ्य भारत, आत्मनिर्भर भारत और अंतत: श्रेष्ठ भारत का निर्माण होगा।

नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रिडेशन के चैयरमैन के. के. अग्रवाल ने तो यह भी बताया कि हमारे देश के पास एक छठी इंद्रीय है, जिससे हम जान जाते हैं कि आगे क्या होनेवाला है। यह अलग बात है कि इस छठी इंद्रीय के जरिये आज तक हम यह नहीं जान सके कि देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों है। वह बताते हैं कि नयी शिक्षा नीति का उद्देश्य समाज में इक्वालिटी (समानता) लाना है। इक्वालिटी की व्याख्या करते हुए वह बताते हैं कि इसका मतलब ई+क्वालिटी है। इक्वालिटी की ऐसी व्याख्या क्या किसी ने सुनी है? शायद नहीं। इसी तरह यूजीसी के चेयरमैन सहस्त्रबुद्धे सभी छात्रों में 14 गुण विकसित करने की बात कहते हैं। इसके अलावा स्वायत्तता पर भी पूरा जोर दिया गया है। बहरहाल, पूरा वेबिनार कल्पना और संकल्पना की उड़ान लेते प्रतीत हो रहा था, जहां ठोस व्यवस्था के लिए कोई जगह नहीं दिखायी दे रही थी।

इसमें कोई शक नहीं कि स्वायत्तता और इंटर डिसिप्लीन की बात किसी भी उच्च शिक्षा संस्थान की गुणवत्ता और प्रसार में सहायक हो सकती है। लेकिन लगता है कि हमारी सरकार को जमीनी हकीकत का कोई भान नहीं है। दूसरी तरफ स्वयत्तता की बात भी भ्रामक लगती है, क्योंकि यह स्वायत्तता शिक्षण संस्थाओं को स्वाभाविक रूप से या स्वत: प्राप्त नहीं होगी, बल्कि आकलन के आधार पर स्वायत्तता प्रदान की जाएगी। जाहिर है कि इसमें केवल सरकार की चलेगी औऱ स्वायत्तता की बात बेमानी होकर रह जाएगी।

यहां इस बात का जिक्र करना जरूरी लगता है कि शिक्षा नीति को तैयार करने और उसे स्वीकृत किए जाने के क्रम में अनेक जरूरी मुद्दों को छोड़ दिया गया है। इसे तैयार करने में  न तो शिक्षा से जुड़े लोगों या संस्थाओं की राय ली गयी और न संसद में इस पर कोई बहस हुयी। कल्पना करना कठिन नहीं है कि बिना संसद की राय जाने और बिना बहस करने के पीछे सरकार का उद्देश्य क्या रहा होगा। जहां तक स्वयत्तता की बात है, तो यह स्पष्ट नहीं है कि इससे सरकार का क्या आशय है। कुल मिलाकर जो तस्वीर उभरती है, वह यही है कि संस्थाओं को वित्तीय स्वयत्तता प्रदान की जाएगी। इसका मतलब कोई यह न समझे कि शिक्षण संस्थाओं को अपने हिसाब और जरूरतों के हिसाब से सरकारी फंड खर्च करने की स्वायत्तता होगी। वास्तव में इसका अर्थ केवल यह है कि फंड जुटाने के लिए संस्थाएं स्वायत्त होंगी। ऐसे में जाहिर है कि हमारी शिक्षण संस्थाएं वंचित तबके का कोई खयाल नहीं रख पाएंगी, क्योंकि वे उन्हीं छात्रों का एडमिशन लेंगी, जो ज्यादा से ज्यादा पैसे दे सकें।

यह जानने के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं कि आज देश में शिक्षण संस्थाओं की क्या हालत है। देश के महाविद्यालयों औऱ विश्वविद्यालयों में हजारों पद खाली हैं। स्थायी शिक्षकों का तो अकाल-सा हो गया है। आप कल्पना कीजिए कि पटना विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र विभाग में केवल एक स्थायी शिक्षक है। यही हाल देश के अन्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का है। दिल्ली विश्वविद्यालय में हजारों शिक्षक अनुबंध पर काम करते हैं, जिन्हें समय पर वेतन तक नहीं मिलता। क्या ऐसे ही अनुबंध शिक्षकों के बल पर हम विश्वगुरू बनेंगे। पिछले एक दशक में देश के 179 पेशेवर शिक्षण संस्थान बंद हो चुके हैं, जबकि सैकड़ों संस्थानों ने नए एडमिशन लेने से इनकार कर दिया है।

स्कूली शिक्षा का हाल तो और भी बेहाल है। एक तो देश में तरह-तरह के विद्यालय हैं। बिहार औऱ उत्तर प्रदेश में तो सरकारी प्राइमरी स्कूलों का पूरी तरह दलीतीकरण हो चुका है। अब इन स्कूलों में केवल दलित और अत्यंत निर्धन घरों के बच्चे ही पढ़ने जाते हैं, वह भी इसलिए कि वहां उन्हें दोपहर का भोजन मिल जाता है। माना कि बच्चों के पास भाषा का विकल्प दिया गया है, लेकिन जिन बच्चों को भरपेट खाना भी नसीब नहीं होता, उन्हें तो इन्ही गए-गुजरो स्कूलों में पढ़ना होगा और हिन्दी में ही पढ़ना होगा। ऐसे में उनका शैक्षणिक विकास कैसा होगा औऱ वे पढ़कर कौन-सा नौकरी पाएंगे, समझना मुश्किल नहीं है। कहा जाए, तो इस नयी शिक्षा नीति में गरीबों, वंचितों के लिए कोई जगह नहीं है। इस तरह हम देखते हैं कि भाषा का विकल्प केवल एक साजिश है, वंचितों को शिक्षा से वंचित रखने की।

हमारे शिक्षा मंत्री निशंक और उनकी हां में हां मिलानेवाले तथाकथित शिक्षाविद, वाइस चांसलर्स और अन्य समर्थक जो कहें, लेकिन सच तो यही है कि यह शिक्षा नीति समाज के एक बड़े हिस्से को अशिक्षित रखने और एक खास यानी धनी तबके को लाभ पहुंचाने के लिए ही बनायी गयी है। यदि सरकार शिक्षा को बेहतर और सबके लिए सुलभ बनाना चाहती है, तो सबसे पहले उसे समान शिक्षा व्यवस्था बनाने की दिशा में काम करना होगा, वरना यह शिक्षा नीति केवल खयाली पुलाव बनकर रह जाएगी।

------------------------------------------------------------------------------------------

शनिवार, 22 अगस्त 2020

बाबूजी की कुश्ती कथा / नरेंद्र कुमार सिंह

 कुश्ती की कहानी, बाबूजी की जुबानी


मित्रो, मैं आपको बता दूं कि मेरे पिताजी राष्ट्रीय स्तर के पहलवान थे। बिहार पुलिस में थे। 1955-1964 तक बिहार में उनके कद के एकाध पहलवान ही थे। मैंने उनसे उनके अलावा अन्य पहलवानों की अनगिनत कहानियां सुनी हैं। आज उनकी कहानियों का मैं एक सिलसिला शुरू कर रहा हूं। इसके अंतर्गत मूल रूप से उन्हीं कुस्तीयों और पहलवानों की चर्चा करूंगा, जिनके साथ मेरे बाबूजी कुश्ती लड़े थे। मेरे मन में यह सिलसिला शुरू करने का विचार क्यों आया, यह भी एक दिलचस्प घटना है।

एक बार मैंने बाबूजी से पूछा कि आपकी नजर में आपकी सबसे कांटे की कुश्ती किसके साथ हुयी थी। बाबूजी थोड़ी देर सोचते रहे और फिर कहा कि रामधारी यादव के साथ हुयी कुस्ती को मैं सबसे कांटे की कुश्ती मानता हूं यानी सबसे कड़ा मुकाबला। हां, फिर यह भी बताया कि रामधारी यादव जी आजमगढ़ के रहनेवाले थे और हिन्द केसरी मंगला राय के सबसे काबिल शागीर्द रहे थे। हेवी वेट के पहलवान थे वे। जाहिर है कि मेरे बाबूजी भी हेवी वेट के ही पहलवान थे। इसके अलावा बाबूजी ने उनके दांव-पेंच और उनकी कुश्ती-शैली के बारे में भी बताया था। मेरे मन में रामधारी यादव के बारे में और जानने की इच्छा तो बनी रही, लेकिन उसके लिए मैंने विशेष प्रयास नहीं किया।

चंद दिनों पहले मैं फेसबुक देख रहा था, तो अचानक एक पेज दिखा, जो रामधारी यादव के नाम से था। पहले तो मुझे आश्चर्य हुआ कि वे तो कब के गुजर गये होंगे। लेकिन चूंकि पेज पर एक बहुत ही सुघर पहलवान की आईडी थी, इसलिए मैंने मैसेंजर पर मैंने मेसेज किया कि क्या ये उसी रामधारी यादव जी की तस्वीर हैं, जो मंगला राय के शागीर्द थे? यदि हां, तो इनके साथ मेरे पिताजी की कुश्ती हुई थी। वह कुश्ती मुंगेर में हुई थी. जिसमें मंगला राय स्वयं भी उपस्थित थे। मेरे पिताजी का नाम रामदेव सिंह था। जवाब आया कि मैं अपने चाचा जी से पूछकर कल बताउंगा। दो दिन बाद मेसेज आया कि हां, वही हैं और उनकी कुश्ती बाबू रामदेव सिंह पहलवान से हुयी थी। आगे यह भी बताया कि रामधारी यादव जी बताते थे कि रामदेव सिंह जैसा पहलवान इधर कोई नहीं था। जवाब देनेवाले का नाम अंकित यादव था। मैंने उनसे उनका फोन नंबर मांगा। उन्होंने मुझे अपना फोन नंबर भेज दिया। बातचीत से पता चला कि अंकित यादव महाबली रामधारी यादव के पौत्र हैं और 86 किलोग्राम कैटेगरी में उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में भाग ले चुके हैं। अभी उनकी उम्र केवल 23 वर्ष की है। अंकित उत्तर प्रदेश पुलिस में हैं औऱ अभी उनकी पोस्टिंग बरेली में है।

आइये, अब सुनाता हूं बाबूजी की जुबानी। पिताजी ने बताया –

तब मैं मुंगेर पुलिस में था औऱ मुंगेर शहर में ही पोस्टिंग थी। बाबूजी ने बताया कि मंगला राय साल में एक बार मुंगेर, बड़हिया जरूर जाते थे। (यह बात सन् 1960-61 की होगी) उस बार जब मंगला राय मुंगेर गये, तो रामधारी यादव को भी अपने साथ लेते गये थे। जाड़े के दिन थे। एक सुबह जब पिताजी अखाड़े पर दंड-बैठक लगा रहा थे, तभी तीन-चार लोग वहां आए। मंगला राय और रामधारी यादव को देखकर ही पहचाना जा सकता था कि वे पहलवान हैं, बाबूजी ने बताया। तब तक मेरे पिताजी इन दोनों लोगों से अपरिचित थे। हां, उन्होंने मंगला राय का नाम जरूर सुन रखा था।

दरअसल, वे लोग गिरी पहलवान से मिलना चाहते थे, जो मेरे पिताजी के उस्ताद थे। उनलोगों ने तब तक गिरी जी को देखा नहीं था, केवल उनके बारे में सुना था। वैसे गिरी जी कम वजन के पहलवान थे। वे 70 किलोग्राम भार वर्ग के पहलवान थे, लेकिन उनकी तैयारी ऐसी थी कि वजन उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखता था। जिस समय मंगला राय औऱ रामधारी यादव वहां पहुंचे, उस समय पिताजी कसरत कर रहे थे और गिरी जी अखाड़े के एक किनारे चादर ओढ़कर बैठे थे और खैनी बना रहे थे। वहां पहुंचकर मंगला राय ने अपना परिचय दिया और कहा कि वह गिरी पहलवान से मिलने आए हैं। गिरीजी ने मेरे पिता की ओर इशारा करते हुए कहा कि जो कसरत कर रहे हैं, वही गिरी जी हैं। मंगला राय और रामधारी ने मेरे पिता को भरपूर नजरों से देखा। देखने के बाद मंगला राय ने कहा – जैसा सुना था, वैसा ही देखा। फिर बातचीत होने लगी और तब भेद खुला कि जो कसरत कर रहे थे, वे गिरी जी नहीं, बल्कि उनके शागीर्द रामदेव सिंह पहलवान हैं।

बातों-बातों में कुश्ती लड़ने की बात होने लगी। तय हुआ कि रामधारी यादव जी से मेरे पिताजी की कुश्ती होगी। तैयारी के लि 15 दिनों का समय भी दिया गया। हमने पिताजी से पूछा कि आपने तैयारी कैसे की, तो उन्होंने बताया कि तब मैं रोज एक पाव घी, तीन किलो दूध, सौ बादाम और अन्य चीजें प्रतिदिन खाता था। लगभग तीन हजार दंड और इतना ही बैठक करता था। गिरी जी ने मेरे पिताजी को बताया कि रामधारी यादव टांग दांव का महारथी हैं। अगर उन्होंने टांग दांव लगा दिया, तो किसी भी पहलवान के लिए संभाल पाना मुश्किल होगा। पिताजी ने बताया कि रामधारी यादव के बारे में एक कहावत कही जाती थी कि उनके टांग दांव पर तो ताड़ का पेड़ भी झूक जाता है।

नियत तिथि को मेरे पिताजी औऱ रामधारी यादव जी अखाड़े में उतरे। पिताजी ने बताया कि मैं ढाक दांव लगाने का निश्चय कर चुका था। मेरे पिताजी के बारे में कहा जाता था कि यदि रामदेव सिंह ने ढाक दांव लगा दिया, तो आप बच तो सकते हैं, लेकिन तब, आपका कोई न कोई न कोई अंग जरूर भंग होगा। उस दिन कुश्ती देखनेवालों की अच्छी-खासी भीड़ जुटी हुयी थी। अखाड़े में उतरकर दोनों पहलवानों ने हाथ मिलाए। जब तक पिताजी सावधान होते, तब तक रामधारी यादव ने अपने दाहिने पैर से उनके ऊपर वही टांग दांव लगा दिया। बाबूजी ने बताया कि एक बार तो मैं सकते में ही आ गया, लेकिन गिरी जी ने कहा था कि यदि एक पांव पर अखाड़े का पूरा चक्कर लगा दोगे, तो टांग दांव विफल हो जाएगा। मैं एक पैर पर ही अखाड़े का एक चक्कर लगा दिया और रामधारी यादव का दांव विफल हो गया। जैसे ही रामधारी जी का दांव विफल हुआ, पिताजी ने बाएं पैर से वही टांग दांव रामधारी यादव पर कस दिया। लेकिन वाह रे पहलवान, उन्होंने भी अखाड़े का एक चक्कर एक पैर पर लगा दिया। अब दोनों पहलवान बाजुओं का जोर आजमाने लगे। दोनों एक-दूसरे को अपनी पहलवानी कला का परिचय देने लगे। इसी क्रम में जब एक बार पिताजी ने रामधारी यादव के कांधे पर अपना दाहिना हाथ रखा ही था कि रामधारी यादव ने एकहरी उतार लगा दिया। पिताजी जानते थे कि यदि रामधारी यादव उनके पीछे जाने में कामयाब रहे, तो मुश्किल हो सकती है। बस क्या था, पिताजी ने गदहलेट दांव का इस्तेमाल किया और रामधारी यादव जी कमर छोड़ने के लिए मजबूर हो गए। पिताजी ने बताया कि एक बार उन्हें निकास दांव लगाने का मौका मिल गया। दांव तो सही लगा, लेकिन रामधारी यादव गिरने के पहले ही पलट गए औऱ पिताजी का दांव बेकार गया। दोनों पहलवान एक-दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो रहे थे, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकल रहा था। मजे की बात यह कि दोनों पहलवान एक-दूसरे को कुश्ती के दौरान ही दाद दे रहे थे।

जब 12 मिनट बाद भी कुश्ती का फैसला नहीं हुआ, तो मंगला राय दर्शक दीर्घा से उठकर अखाड़े के पास आ गए। एकाध मिनट तक तो वे कुश्ती देखते रहे, फिर रामधारी को संबोधित करते हुए कहा – का रामधारी 15 मिनट होई गये, अबहीं कुश्ती फरियायल नाहीं। का बात हौ। रामधारी यादव ने कहा – गिरी जी इनके पक्का बना देले हउअन, बाते नइखन सुनत। सब आजमा लिहलीं, फरियाइल मुश्किल बा। 15 मिनट बीतते-बीतते दोनों पहलवान इतने थक गए थे कि अब एक-दूसरो का बांह पकड़े अखड़े में खड़े थे। कोई किसी पर दांव लगाने की कोशिश नहीं कर रहा था। तब मेरे पिताजी ने मंगला राय को कहा -  उस्ताद, अभी तो 15 मिनट ही कुश्ती हुई है, पंद्रह घंटा भी चलेगा, तो हम लड़ने के लिए तैयार हैं। इसके बाद रेफरी ने कुश्ती को बराबर की कुश्ती करार दे दिया। अखाड़ा से निकलने के बाद रामधारी यादव ने मेरे पिताजी से कहा – पहलवान, तुम ये कुश्ती गलत जगह पर लड़ गये। यदि यह कुश्ती बनारस या आसपास हुयी होती, तो आज तुम हीरो होते। उस इलाके में कोई ऐसा पहलवान नहीं, जो मुझसे बराबर की कुश्ती लड़ सके।

अब पता चला कि रामधारी यादव जी आजमगढ़ के देवपार के रहनेवाले हैं। उनके नाम पर वहां सड़क है और वहां उनकी एक खूबसूरत प्रतिमा लगायी गयी है। वहां जो भी राजनेता जाते हैं, वे रामधारी यादव जी की प्रतिमा पर फूल अवश्य चढ़ाते हैं। उनका पोता अंकित यादव उनकी इस महान विरासत का वारिस है। उसे मेरी अशेष शुभकामनाएं।

मित्रों, यह कहानी आपको कैसी लगी, यदि बताएंगे तो मुझे संतोष मिलेगा और आगे की कहानी भी लिखुंगा। अगली किश्त का इंतजार करें।

अमृता प्रीतम की वसीयत

  वसीयत


अपने पूरे होश-ओ-हवास में

लिख रही हूँ आज... मैं

वसीयत ..अपनी

मेरे मरने के बाद

खंगालना.. मेरा कमरा

टटोलना.. हर एक चीज़

घर भर में ..बिन ताले के

मेरा सामान.. बिखरा पड़ा है


दे देना... मेरे खवाब

उन तमाम.. स्त्रियों को

जो किचेन से बेडरूम

तक सिमट गयी ..अपनी दुनिया में

गुम गयी हैं

वे भूल चुकी हैं सालों पहले

खवाब देखना


बाँट देना.. मेरे ठहाके

वृद्धाश्रम के.. उन बूढों में

जिनके बच्चे

अमरीका के जगमगाते शहरों में

लापता हो गए हैं


टेबल पर.. मेरे देखना

कुछ रंग पड़े होंगे

इस रंग से ..रंग देना उस बेवा की साड़ी

जिसके आदमी के खून से

बोर्डर... रंगा हुआ है

तिरंगे में लिपटकर

वो कल शाम सो गया है


आंसू मेरे दे देना

तमाम शायरों को

हर बूँद से

होगी ग़ज़ल पैदा

मेरा वादा है


मेरा मान , मेरी आबरु

उस वैश्या के नाम है

बेचती है जिस्म जो

बेटी को पढ़ाने के लिए


इस देश के एक-एक युवक को

पकड़ के

लगा देना इंजेक्शन

मेरे आक्रोश का

पड़ेगी इसकी ज़रुरत

क्रांति के दिन उन्हें


दीवानगी मेरी

हिस्से में है

उस सूफी के

निकला है जो

सब छोड़कर

खुदा की तलाश में


बस !

बाक़ी बची

मेरी ईर्ष्या

मेरा लालच

मेरा क्रोध

मेरा झूठ

मेरा स्वार्थ

तो

ऐसा करना

उन्हें मेरे संग ही जला देना...

A tribute to Amrita Pritam

रवि अरोड़ा की नजर से...

 दुआ देने वालों का टोटा

रवि अरोड़ा

पाकिस्तान की मशहूर फ़िल्म है- बोल । इस फ़िल्म में एक हकीम के यहाँ पाँच बेटियों के बाद एक और बच्चा पैदा होता है मगर दुर्भाग्य से वह हिजड़ा यानि किन्नर है । यह बात हिजड़ों के गुरु को पता चलती है और वह उस बच्चे को लेने हकीम के पास आता है और बेहद ख़ूबसूरती से कहता है कि जनाब ग़लती से हमारी एक चिट्ठी आपके पते पर आ गई है , बराए मेहरबानी आप हमें वह लौटा दें । हकीम बच्चा गुरु को नहीं देता और डाँट कर भगा देता है । हकीम उस बच्चे को बेटे की तरह पालता है मगर क़ुदरत अपना काम करती है । बच्चा बड़ा होता है और उसकी शारीरिक संरचना और हाव भाव से ज़ाहिर होने लगता है कि वह पुरुष नहीं ट्रांस जेंडर है । इस पर लोक लाज के चलते हकीम अपने उस बेटे का क़त्ल कर देता है और बाद में हकीम की ही बड़ी बेटी उसकी भी हत्या कर देती है । हालाँकि यह फ़िल्म किन्नरों पर न होकर समाज में महिलाओं की विषम परिस्थितियों पर है मगर किन्नर वाला विषय भी इस फ़िल्म में बेहद संजीदगी से चला आता है । मेरा दावा है कि इस फ़िल्म को देखने के बाद आपको किन्नरों से प्यार हो जाएगा और यदि नहीं भी हुआ तब भी किन्नरों को लेकर आपके मन में जमी बर्फ़ ज़रूर कुछ पिघलेगा । आज अख़बार में एक अच्छी पढ़ी कि प्रदेश की योगी सरकार ने राजस्व सहिंता विधेयक के ज़रिये ट्रांस जेंडर को भी परिवार का सदस्य माना है और पारिवारिक सम्पत्ति में भी उनको अधिकार दे दिया है । इस ख़बर को पढ़ने के बाद आज बोल फ़िल्म बहुत याद आई । 


यह बात समझ में नहीं आती कि जिन तीसरे लिंग वाले लोगों का ज़िक्र रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में बड़े सम्मान से किया गया हो , बाद में उनका यह हश्र कैसे हो गया कि सदियों तक उनकी ख़ैर-ख़बर भी किसी ने नहीं ली ?  एसा कैसे हुआ कि राजा-महाराजा, बादशाह और नवाबों के हरम की रखवाली जैसा महत्वपूर्ण काम जिन्हें मिला हुआ था उन्हें अब नाच-गाकर अथवा सड़कों पर भीख माँग कर गुज़ारा करना पड़ता है ? शायद यह कुरीति भी अंग्रेज़ों की देन हो । वही तो इन्हें अपराधी, समलैंगिक, भिखारी और अप्राकृतिक वेश्याओं के रूप में चिन्हित करते थे । पुलिस के मन में किन्नरों के प्रति नफ़रत का बीज भी शायद अंग्रेज़ ही बो गए थे । शुक्र है कि अब पिछले कुछ दशकों में तमाम सरकारें और अदालतें किन्नरों के प्रति संवेदनशील हो गई हैं और एक के बाद एक किन्नरों के हित में आदेश पारित हो रहे हैं । अवसर मिलना शुरू हुआ है तो किन्नरों ने भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करके दिखाया है । आज किन्नर जज, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, लेखक, शास्त्रीय गायक और लेखक भी बन रहे हैं । कई किन्नर उच्च पदों तक भी पहुँच गये हैं । अन्य सरकारी नौकरियों के साथ साथ बीएसएफ, सीआरपीएफ और आईटीबीटी जैसे सुरक्षा बलों में भी अब केंद्र सरकार इनकी भर्ती शुरू करने जा रही है । ज़ाहिर है कि समाज का थोड़ा बहुत नज़रिया बदलने भर से ही यह सम्भव हुआ है । 


कहते हैं कि भारतीय समाज में सुधारों की गति सदा से ही बेहद धीमी रही है । अब देखिये न कि सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में ही किन्नरों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता देते हुए उनके लिये देश भर में अलग से वॉश रूप बनाने के आदेश दिए थे मगर आज तक केवल एक एसा पेशाब घर मैसूर में ही बन सका है । किन्नरों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा देने का आदेश बेशक अब पारित हो गया है मगर भारतीय समाज में जब आज तक महिलाओं को ही बराबर की हिस्सेदारी नहीं मिली तो एसे में किन्नरों को उनका हक़ मिलेगा , यह उम्मीद कैसे की जा सकती है । साल 2011 की जनगणना के अनुरूप देश में मात्र 4 लाख 88 हज़ार किन्नर थे । उनमे से भी 28 फ़ीसदी केवल उत्तर प्रदेश के निवासी हैं । एक सर्वे के अनुसार एक छोटे से आपरेशन के बाद इनमे से आधे किन्नरों को स्त्री अथवा पुरुष बनाया जा सकता है । छत्तीसगढ़ के समाज कल्याण विभाग ने एसा प्रयोग शुरू भी किया है । यह काम अन्य राज्य भी करें तो न जाने कितने परिवार बोल फ़िल्म की तरह बिखरने से बच जायें । कैसी विडम्बना है कि दूसरों को जम कर दुआएँ देने वालों को ख़ुद दुआ देने वालों का बेहद टोटा है ।


: एनिमल चैनल


रवि अरोड़ा 

टीवी पर अक्सर एनिमल चैनल देखता हूँ । वहाँ जानवरों के जीवन के अतिरिक्त अनेक कार्यक्रम शिकार सम्बंधी भी होते हैं । शेर अथवा कोई हिंसक जानवर जब अपने किसी शिकार पर हमला करता है तो उस समय शिकार के साथी और सगे सम्बंधी दूर खड़े चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं । हिंसक जानवर जब अपने शिकार को नोंच रहा होता है , आश्चर्यजनक रूप से उस समय स्वयं शिकार भी ख़ामोशी से अपनी हत्या होते देखता रहता है और मुँह से कोई आवाज़ नहीं करता । कहावत है कि क़ुदरत की लाठी बेआवाज़ है । शायद यह बात सही भी हो मगर यह बात तो यक़ीनन दुरुस्त है कि निरीह की चीत्कार अवश्य ही बेआवाज़ है । उसके रुदन की कोई गूँज नहीं होती । उसकी आह भी ध्वनि रहित होती है । तथाकथित हमारे समाज के जंगल में विचरण कर रहे निम्न मध्यम और मध्यम मध्यम वर्ग के लोग भी मुझे उसी निरीह जैसे ही लगते हैं , जिनकी आह में कोई आवाज़ नहीं होती और बुरी तरह नुँच जाने के बावजूद वे ख़ामोश ही रहते हैं । 


एक पुराने कर्मचारी का सुबह फ़ोन आया । उसे अपने बैंक का एक मैसेज मिला था और उसी संदर्भ में वह जानना चाह रहा था कि क्या वाक़ई पिछले छः महीने से मिल रही किश्त जमा करने की बैंकों की छूट अब ख़त्म हो रही है ? बैंक का मैसेज तो हालाँकि यही है कि सभी प्रकार के लोन सम्बंधी मोरेटोरियम सुविधा अगस्त में ख़त्म हो रही है और पहली सितम्बर से सभी को बैंक की किश्त देनी पड़ेगी मगर फिर भी मैंने उसे तसल्ली दी कि अभी सरकार ने एसा कोई आदेश नहीं दिया है । हालाँकि मैं जानता हूँ कि अब मोरेटोरियम की सीमा बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं है । सरकार और आरबीआई ने बड़े उद्योगपतियों के साथ सलाह मशविरा कर लगभग एसा मन बना लिया है । वैसे यह बात मेरी समझ में नहीं आई कि देश में जिन दो करोड़ लोगों की नौकरी गई और जिन पाँच करोड़ से अधिक लोगों की तनख़्वाह अथवा काम धंधे की कमाई आधी रह गई , इस फ़ैसले में उनकी बजाय राय उद्योगपतियों से क्यों नहीं ली गई ? कोरोना संकट में बेशक करोड़ों लोगों की माली हालत पतली थी मगर फिर भी मकान की किश्त, कार-स्कूटर की किश्त, एजूकेशन लोन, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड के भुगतान का कम से कम दबाव नहीं था अतः गाड़ी जैसे तैसे खिंच ही रही थी । बच्चों की स्कूल की फ़ीस और बिजली के बिलों को लेकर भी कोई विशेष संकट नहीं था मगर अब चहुँओर से दबाव शुरू हो गया है । करोड़ों लोगों की तीन चौथाई कमाई तो बच्चों की स्कूल फ़ीस और मकान-वाहन की किश्त में ही खप जाती है । क़ायदे से तो कोरोना का असली आर्थिक संकट अब पहली सितम्बर से उन्हें झेलना पड़ेगा । एविएशन, टूरिज़्म, हॉस्पिटैलिटी और ट्रांसपोर्ट जैसे सेक्टर से जुड़े लाखों लोग तो शायद धराशायी ही हो जाएँगे । 


वर्ल्ड बैंक कह रहा है कि भारत में गम्भीर आर्थिक संकट है । आरबीआई कह रही है 2020-21 में जीडीपी नेगेटिव में रहेगी । सरकार ने अनेक योजनाओं की घोषणा भी की मगर बैंकों ने उसे पलीता दिखा दिया । बैंकों ने अपनी तरफ़ से इतनी शर्तें लगा दीं कि बीस फ़ीसदी सरकारी घोषणाओं पर भी अभी तक अमल नहीं हुआ । सरकार ने जो मोरेटोरियम की सुविधा दी उसे भी अब ब्याज सहित लोगों को चुकाना है । इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट भी तीखी प्रतिक्रिया दे चुका है । उधर अर्थशास्त्री बार बार एक ही बात कह रहे हैं कि इकोनोमी को बचाना है तो ग़रीब आदमी में हाथ में पैसा देना होगा मगर ग़रीब को पैसा मिलना तो दूर अब एक सितम्बर से उसकी जेब और ख़ाली करने की तैयारी है । उम्मीद थी कि कम से कम दिसम्बर तक किश्त जमा करने की छूट मिलेगी मगर एसा होता नहीं दिख रहा । कमाल की बात यह है कि इतना बड़ा फ़ैसला हो रहा है मगर कहीं कोई आवाज़ नहीं हो रही । किसी ग़रीब, किसी मध्यम वर्गीय आदमी की कोई आह सुनाई नहीं दे रही जबकि करोड़ों लोग अब इस परिस्थिति का शिकार होंगे । आइये आप भी इस एनिमल चैनल को देखिये और निरीह लोगों के यूँ ख़ामोशी से शिकार होने के गवाह बनिए ।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

कांग्रेस के नवरत्नों में एक....

 कांग्रेस के सबसे बेईमान नेता की ईमानदार लीला


*चिदंबरम की ₹ 120 लाख करोड़ की काली कमाई गांधी परिवार से भी ज्यादा!*

【】 चेन्नई में 12 घर, 40 मॉल, 16 सिनेमा थिएटर, 3 कार्यालय हैं

【】तमिलनाडु में 3000 एकड़ जमीन

【】देश भर में 500 वासन आई हॉस्पिटल्स

【】राजस्थान मे 2000 एम्बुलेंस

【】ब्रिटेन में 8800 एकड़ जमीन

【】अफ्रीका में 30 वाइन यार्ड + घोड़े का फार्म

【】श्रीलंका में 37 रिसॉर्ट्स श्रीलंका में प्रसिद्ध पर्यटक आकर्षण

【】कार्ति चिदंबरम की कंपनी ने 'लंका बर्डसन रेजिडेंस' के अधिकांश शेयरों का अधिग्रहण कर लिया है

【】सिंगापुर, मलेशिया और थाईलैंड में संपत्ति

【】बार्सिलोना (स्पेन) में 400 एकड़ में 11 टेनिस कोर्ट के साथ 🎾 टेनिस अकादमी

【】इसी तरह, कार्ति चिदंबरम की सिंगापुर की फ्रेंचाइजी फिलीपींस की एक कंपनी के साथ शामिल है। एक टीम भी खरीदी जो अंतर्राष्ट्रीय प्रीमियर टेनिस लीग में भाग लेती है।

【】दुबई और फ्रांस में, कई लाख करोड़ रुपये के आकर्षक निवेश

【】उन्होंने लंदन, दुबई, दक्षिण अफ्रीका, फिलीपींस, थाईलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, श्रीलंका, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, फ्रांस, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, ग्रीस और स्पेन में कुल 140 करोड़ रुपये का निवेश किया है।

【】ये सभी निवेश 2006 के बाद एयरसेल-मैक्सिस में हुए

【】2011 में, ब्रिटेन में एक मिलियन पाउंड की संपत्ति ...

【】कार्ति चिदंबरम ने सिंगापुर की कंपनी का अधिग्रहण किया गया है।

【】इसी तरह, टश के प्रमुख का नेतृत्व 'डेजर्ट ट्यून्स लिमिटेड', 'फेल दुबई एफएक्स' द्वारा किया जाता है। एलएलसी की कंपनियां

【】कार्ति चिदंबरम का सिंगापुर की कंपनी में निवेश।

【】कार्ति चिदंबरम की सिंगापुर की कंपनी एक और रियल एस्टेट कंपनी के साथ साझेदारी कर रही है

【】मलेशिया में कंपनी में निवेश 

【】थाईलैंड में 16 जमीन खरीदना

प्रवर्तन विभाग को सूत्रों से पता चला है

【】कार्ति चिदंबरम का 'एडवांटेज स्ट्रक्चरल कंसल्टिंग'

एयरसेल-मैक्सिस के पैसे के लेनदेन का खुलासा हुआ है।

पी. चिदंबरम 2006 और 2014 के बीच चिदंबरम ने केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्य किया, इस अवधि के दौरान कार्ति चिदंबरम ने विदेशों में संपत्ति अर्जित की था।

*पी.चिदंबरम को लगता है कि सफेद धोती और कुर्ता पहनकर वोह लोगो को कामराज के रूप में दिखता है। और उसको लोगो को लूटना जन्मसिद्ध हक है।*

बुधवार, 19 अगस्त 2020

वर्णमाला का वैज्ञानिक आधार

 *

आज के छात्रों को भी नहीं पता होगा कि भारतीय भाषाओं की वर्णमाला विज्ञान से भरी है। वर्णमाला का प्रत्येक अक्षर तार्किक है और सटीक गणना के साथ क्रमिक रूप से रखा गया है। इस तरह का वैज्ञानिक दृष्टिकोण अन्य विदेशी भाषाओं की वर्णमाला में शामिल नहीं है। जैसे देखे*


 *क ख ग घ ड़* - पांच के इस समूह को "कण्ठव्य" *कंठवय* कहा जाता है क्योंकि इस का उच्चारण करते समय कंठ से ध्वनि निकलती है। उच्चारण का प्रयास करें।


 *च छ ज झ ञ* - इन पाँचों को "तालव्य" *तालु* कहा जाता है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय जीभ तालू महसूस करेगी। उच्चारण का प्रयास करें।


 *ट ठ ड ढ ण*  - इन पांचों को "मूर्धन्य" *मुर्धन्य* कहा जाता है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय जीभ मुर्धन्य (ऊपर उठी हुई) महसूस करेगी। उच्चारण का प्रयास करें।


 *त थ द ध न* - पांच के इस समूह को *दन्तवय* कहा जाता है क्योंकि यह उच्चारण करते समय जीभ दांतों को छूती है। उच्चारण का प्रयास करें।


 *प फ ब भ म* - पांच के इस समूह को कहा जाता है *ओष्ठव्य* क्योंकि दोनों होठ इस उच्चारण के लिए मिलते हैं। उच्चारण का प्रयास करें।


 दुनिया की किसी भी अन्य भाषा में ऐसा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है? हमें अपनी भारतीय भाषा के लिए गर्व की आवश्यकता है, लेकिन साथ ही हमें यह भी बताना चाहिए कि दुनिया को क्यों और कैसे बताएं।


 *दूसरों को भेजे और हमारी भाषा का गौरव बढ़ाएँ* ... 

      🙏

लजीज दक्षिण भारतीय थाली का आनंद / विवेक shukla

खाते रहोआंध्र भवन की थाली 


आप कभी खुद आजमा के देख लें कि थ्रीव्हीलर ड्राइवर आपको आंध्र भवन चलने के लिए मना नहीं करेंगे। पर, वे हां करने से पहले प्यार से पूछ सकते हैं, “जहां की थाली मशहूर है।“ हर समय स्वादिष्ट भोजन करने या उसकी योजना बनाने वाली दिल्ली के लिए आंध्र भवन में बार-बार जाकर भरपेट सुस्वादु भोजन करना कमजोऱी बन चुका है। 

इसकी मोटा-मोटी दो वजहें हैं। पहली, आंध्र भवन की वेज या नान वेज थाली जेब पर भारी नहीं पड़ती है। दूसरी, यहां पर आप जितना चाहें भोजन कर सकते हैं। आपको बढ़ते बिल का डर परेशान नहीं करेगा। एक बार थाली ले ली तो खाते रहिए। कौन सा दिल्ली वाला होगा जो यहां पर कम से कम एक बार पेट पूजा के लिए नहीं आया होगा।


दरअसल आंध्र भवन कैंटीन को दिल्ली वालों के लिए शुरू करने का श्रेय जाता है एनटी रामाराव को। आंध्र प्रदेश का 1983 में मुख्यमंत्री बनने के बाद वे इधर आकर ठहरने लगे। तब तक इधर की कैंटीन से यहां आने वाले सांसदों, विधायकों और दूसरे अफसरों के लिए भोजन परोसा जाता था। जब रामाराव ने इधर के शेफ के हाथों के बनी इडली, वड़ा,डोसा, दम चिकन बिरयानी,गर्मा-गर्म पूड़ी, गाढ़ी पीली दाल,दो सब्जियों को मिलाकर बनी डिश का भोग लगाया तो उन्होंने तुरंत आदेश जारी कर दिया कि इस लजीज भोजन से दिल्ली वालों को वंचित ना रखा जाए। उसके बाद आंध्र भवन कैंटीन के दरवाजे खुल गए।


 आजकल के मनहूस कोरोना काल की बात ना करें तो सामान्य दिनों में इधर असंख्य भोजन भट्ट लजीज थाली पर रोज टूट पड़ते हैं। एक बार आपको इधर बैठने की जगह मिल जाए तो फिर आप तबीयत से खाते रहिए।


 सच में यहां पर भोजन बड़े ही प्यार से खिलाया जाता है। अगर आप जल्दी भोजन खाकर उठ गए तो खिलाने वाला कर्मी अपराध बोध की स्थिति में आ जाता है। वह एक बार आपसे पूछ लेता है, “ सर,इतनी जल्दी क्यों उठ गए?“ अगर सामान्य दिनों में यहां पर नौकरी पेशा लोगों से लेकर कॉलेजों में पढ़ने वाले और दूसरे चटोरे आते हैं, तो रविवार को आंध्र भवन में दिल्ली सपरिवार आती हैं। 


उस दिन यहां पर खास तौर पर उपलब्ध रहता है दिव्य हैदराबादी दम चिकन। हालांकि इसमें थोड़ी सी मिर्च की मात्रा अधिक रहती है। पर अपनी प्लेट को कोई नहीं छोड़ता। आखिर यहां दिल्ली आती हैं। दिल्ली वालों ने स्वादिष्ट और रुचिकर भोजन छोड़ना नहीं सीखा है। आंध्र भवन में फ्राई मटन का जायका भी लिया सकता है। इधर कस कर भोजन करने के बाद आपकी मिष्ठान खाए बिना तृप्ति नहीं होगी।


 इधर मिष्ठान रोज बदलता है। कभी खीर, कभी हलवा। पर  हलवे का स्वाद अपने हलवे से उन्नीस ही माना जाएगा।   

अगर आप सुबह का नाश्ता करना चाहते है, तो आप यहां आकर चाय-कॉफी के साथ इडली, वड़ा और डोसा खाइये। सुबह से ही यहां खाना खाने वाले टूटने लगते हैं।


 कनॉट प्लेस के मद्रास होटल के असमय बंद होने के बाद लगा था कि अब दिल्ली में उत्तम दक्षिण भारतीय भोजन कहां नसीब होगा। पर आंध्र भवन ने उस कमी को खलने नहीं दिया।

ये लेख कुछ हफ्ते पहले NBT के मेरे कॉलम S addi  Dilli में पब्लिश हुआ था।


मंगलवार, 18 अगस्त 2020

धोनी की धमक बनी रहेगी हमेशा/ उदय वर्मा

 स्वतंत्रता दिवस पर जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर देश को कठिन से कठिन चुनौतियों पर विजय पाने का मंत्र दे रहे थे, तब भारत को क्रिकेट में सबसे ज्यादा विजय दिलाने वाले कप्तान महेन्द्र सिंह धौनी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह रहे रहे थे। प्रधानमंत्री के भाषण में अगर ओज और भविष्य के सपने थे तो धौनी की घोषणा में संवेदनाओं की ऐसी नमी थी, जिसे देशवासियों ने भरे मन से स्वीकार किया। वैसे अनुमान लगाया गया था कि धौनी विश्व कप के बाद कभी भी अपने सन्यास की घोषणा कर कर सकते हैं, लेकिन संभवत: वह इस वर्ष विश्व कप टी 20 खेलना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने सन्यास की घोषणा रोक रखी थी । कोरोना के कारण जब यह टूर्नामेंट स्थगित कर दिया तब उन्होंने अपना बल्ला और गलब्स टांगने में ज्यादा देर नहीं की। धौनी की घोषणा के बाद धाकड़ बल्लेबाज सुरेश रैना ने भी उनका अनुसरण किया और अपने सन्यास का ऐलान कर दिया। वैसे दोनों आईपीएल खेलेंगे और क्रिकेट प्रेमी उनके खेल का लुत्फ उठा सकेंगे।

   महेन्द्र सिंह धौनी का अवतरण ऐसे समय में हुआ था, जब भारतीय टीम में स्टार खिलाड़यों की भरमार थी। सौरव गांगुली और सचिन तेन्दुलकर टीम को जीतने की कला में पारंगत बनाने में जुटे थे और भरतीय टीम एक नये रूप में ढल रही थी। ऐसे में धौनी का भारतीय टीम में आगमन जितना रोमांचक था उतनी ही उपलब्धियां से भरा उनकी कप्तानी का दौर रहा। उनके नेतृत्व में भारतीय टीम न केवल टेस्ट में नम्बर वन बनी, बल्कि टी-20 और वन-डे विश्व कप जीत कर विश्व क्रिकेट की दुनिया दे।को चकाचौंध कर दिया।अपने चौदह वर्षों के अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट जीवन में धौनी एक अच्छे नेतृत्वकर्ता, बेहतर बल्लेबाज, श्रेष्ठ विकेटकीपर और विनम्र इंसान के रूप में अपनी अलग छवि गढ़ने में भी सफल रहे ।

   लीक से हट कर सोचने, खेलने और फैसले लेने के हौसलों के कारण ही उन्होंने अपने खेल सफर में सफलताओं के एक के बाद एक कई कीर्तिमान स्थापित किये। टी - 20 , वन डे विश्व कप और चैम्पियन ट्राफी विजय उनकी बड़ी उपलब्धियों की कहानी खुद कहती है। पिछले एक दशक में भारतीय टीम एक नये आत्म विश्वास से लैस हुयी है और इसमें धौनी का बड़ा योगदान रहा है। धौनी क्रिकेट की परम्परा में नहीं बंधते, वह उन्मुक्त रहना चाहते हैं, जिसकी इजाजत क्रिकेट नहीं देता। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वह सम्पूर्ण क्रिकेटर नहीं हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा संगत होगा कि उनसे एकाकार हो कर ही क्रिकेट सम्पूर्ण होता है। वस्तुतः भारत की नयी युवा टीम को गढ़ने में और टीम इंडिया को बुलन्दियों तक पहुंचाने में धौनी की उल्लेखनीय भूमिका और योगदान उन्हें भारत के सफल क्रिकेट कप्तानों और खिलाड़ियों की कतार में सबसे आगे खड़ा करने के लिए पर्याप्त है। 

 धौनी को अपने अन्य समकलीनों से अलग इस लिये कहा जा सकता है क्योंकि वह प्रतिकूल परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने में कुछ ज्यादा ही उस्ताद हैं। उन्हें रन बना कर मैच जीताने वाले खिलाड़ियों की  श्रेणी में रखा जाता है। यही कारण है कि उन्हें भारत के सर्वोत्तम फिनिशर के रूप में भी पहचाना जाता है और कहा जाता है कि धौनी जैसा कोई नहीं। धौनी जिस कालखंड के खिलाड़ी हैं, उसे क्रिकेट के इतिहास में धौनी युग के नाम से जरूर जाना जायेगा।

जसराज का फिल्मी राज.../ Ratan Bhushan's

 यादें / पंडित जसराज



पण्डित जसराज भारत के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायकों में से एक थे। उनका संबंध मेवाती घराने से था। 28 जनवरी 1930 को तब के हिसार, हरियाणा में जन्मे जसराज जब चार वर्ष उम्र में थे, तभी उनके पिता पंडित मोतीराम का देहान्त हो गया। उनका पालन पोषण बड़े चाचा पंडित मणीराम के संरक्षण में हुआ। उनका पालन पोषण बड़े चाचा पंडित मणीराम के संरक्षण में हुआ। बाद में उनके भाई पंडित प्रताप नारायण ने उन्हें तबला संगतकार में प्रशिक्षित किया। वह अपने सबसे बड़े चाचा पंडित मणिराम के साथ अपने एकल गायन प्रदर्शन में अक्सर शामिल होते थे, लेकिन बेमन से। जब एक बार बेगम अख्तर को सुना, तो उनसे प्रेरित होकर उन्होने शास्त्रीय संगीत को अपनाया। दरअसल एक दिन एक दुकान पर खड़े-खड़े उन्होंने बेगम अख्तर की ग़ज़ल दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे... सुना। तभी ठान लिया कि अब गायकी ही करनी है। फिर वे ऐसे रमे कि गायकी के सिरमौर बन गए। पंडित जसराज ने संगीत दुनिया में अधिक समय बिताया और देश के तीनों पद्म पुरस्कार प्राप्त किया। शास्त्रीय और अर्धशास्त्रीय स्वरों के उनके प्रदर्शनों को एल्बम और फिल्म साउंडट्रैक के रूप में भी इस्तेमाल किया गया। जसराज ने देश विदेश में लोगों को संगीत सिखाया। उनके कुछ शिष्य उल्लेखनीय संगीतकार भी बने। आज पंडित जसराज की मृत्यु अमेरिका के न्यू जर्सी में हो गई।

जसराज के परिवार में उनकी पत्नी मधुरा जसराज, पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा हैं। 1962 में जसराज ने फिल्म के मशहूर निर्देशक वी. शांताराम की बेटी मधुरा शांताराम से विवाह किया था। मधुरा से उनकी पहली मुलाकात 1960 में मुंबई में हुई थी। 

जसराज ने हिंदी फिल्मों के लिये बाद मुद्दत रोमांटिक गीत 78 साल की उम्र में गाया था। फिल्म थी 1920 और गीत था वादा तुमसे है वादा...। इस फिल्म के निर्देशक विक्रम भट्ट थे, जबकि गीत को संगीत में ढाला था अदनान सामी ने। इससे पहले 2004 में श्रीराम राघवन निर्देशित फिल्म एक हसीना थी में उन्होंने गीत चाह भंवर तृष्णा नींद न आवे... गाया था। फिर 1973 में आई फिल्म बीरबल माय ब्रदर के लिए वे भीमसेन जोशी के साथ एक जुगलबंदी में शामिल हुए थे, लेकिन फिल्मों पहला गीत उन्होंने वी. शांताराम की फ़िल्म के लिए गाया था। गीत के बोल थे वंदना करो... और यह 1966 में आई फिल्म लड़की शहयाद्री की में रखा गया था। यह सही में एक भजन था। इस फिल्म को वी. शांताराम ने निर्देशित किया था, जिसमें संगीत उनके चहेते संगीतकार वसंत देसाई ने दिया था।

जसराज अपने जमाने के दिग्गज फिल्ममेकर वी. शांताराम के दामाद थे यह हम बता चुके हैं, लेकिन वे कैसे बने वी. शांताराम के दामाद ? यह किस्सा दिलचस्प है। वी. शांताराम की बेटी मधुरा का जन्म 1937 में हुआ था। उनके पिता स्वयं बड़े कलाकार थे और उनकी कला उनकी फिल्मों में साफ झलकती थी। शास्त्रीय गायन और नृत्यों का सफल प्रयोग उन्होंने अपनी सभी फिल्मों में किया। अपने सभी बच्चों को उन्होंने बचपन में ही कला के प्रति सम्मान करना सिखाया। मधुरा ने साल 1952 से गाना सीखना शुरू कर दिया। गुरु विपिन सिंह से मणिपुरी और भरतनाट्यम सीखने के बाद फ़िल्म झनक-झनक पायल बाजे बनने के समय गोपीकिशन से कथक की भी शिक्षा मधुरा ने ली। 1960 में मधुरा और पंडित जसराज के बीच पत्र-व्यवहार शुरू हुआ। पत्र जसराज की भतीजी योगाई लिखती थीं, लेकिन उन पर हस्ताक्षर जसराज करते थे। ये पत्र छोटे और औपचारिक होते थे कि मैं अमुक तारीख को आने वाला हूं या फिर आपका रियाज कैसा चल रहा है?

 मधुरा ने एक बार जसराज को भी अपना गाना सुनाया था, जो उन्हें अच्छा लगा था। शांताराम जी को भी जसराज अच्छे लगे। वे समझ गए थे कि मधुरा का रुझान उनकी ओर है। तब शांताराम की फिल्म स्त्री पूरी होने वाली थी। उन्होंने सोचा कि पहले फ़िल्म रिलीज हो जाए, उसके बाद इस मामले को देखेंगे।

एक बार वी. शांताराम ने जसराज से उनकी कमाई के बारे में पूछा, तो पता चला कि 200-300 रुपए महीना कमा लेते हैं, लेकिन तभी मधुरा ने पापा से कह दिया कि मैं शादी करूंगी तो जसराज से वरना नहीं करूंगी।

वी. शांताराम बहुत बड़े निर्माता-निर्देशक थे। उन्हें लगा कि लड़का पंजाबी है। उस समय हरियाणा पंजाब का हिस्सा था। उन्होंने तहकीकात के तौर पर उनके चाचा मणिराम से पूछा कि जसराज कितना कमा लेते हैं, तो वहां से भी यही उत्तर मिला 200-300 रुपए महीना। फिर अगला प्रश्न हुआ, आय बढ़ेगी? उत्तर मिला, कम भी हो सकती है। बस शांताराम को यह उत्तर सही लगा और उन्होंने मधुरा के साथ पंडित जसराज की सगाई कर दी और 19 मार्च, 1962 को मधुरा शांताराम, मधुरा जसराज बन गईं। वी. शांताराम की बेटी की शादी जिस धूमधाम से होनी चाहिए थी, उसी धूमधाम से हुई। शांताराम के पास एक हाथी था। नवरंग फिल्म में एक गाना अरे जा रे अरे नटखट... उसी हाथी पर फिल्माया गया था। मधुरा-जसराज के विवाह पर मेहमानों का स्वागत करने के लिए वही हाथी सजधज कर खड़ा था...

-रतन ratan

Ravi Aroda ji njr se .....

 सुख दे स्नान


रवि अरोड़ा

नई पीढ़ी के लिये बेशक यह हैरान करने वाली बात हो मगर उत्तरी भारत के लगभग सभी तीर्थ स्थानों पर हर एक जाति के लिये ख़ास पुरोहित मौजूद होता है । आप हरिद्वार, गया, बदरीनाथ, केदार नाथ अथवा पेहवे जैसे स्थानों पर जायें और कोई धार्मिक कार्य करना चाहें तो आपको अपनी बिरादरी के पुरोहित से ही सम्पर्क करना पड़ेगा । अव्वल तो पुरोहितों के चेले ही एसे स्थानों पर मँडराते रहते हैं और आपकी बिरादरी और पैतृक स्थान के आधार पर आपको स्वयं ही बता देंगे कि आपका पुरोहित फ़लाँ है और उस पुरोहित तक आपको पहुँचा भी देंगे । चलिये हरिद्वार की एक बात बताता हूँ । मेरा एक मित्र गंगा स्नान के लिए वहाँ गया और अपनी जाति के पुरोहित के बाबत पता कर उसके पास पहुँचा । पुरोहित ने अपनी पोथी खोल कर मित्र को बता दिया कि उसका कौन कौन सा बुज़ुर्ग कब कब और क्यों हरिद्वार आया था । ज़ाहिर है कि पुराने दौर में पर्यटन के नाम पर आम भारतीय तीर्थ स्थानों पर ही जाता था और धार्मिक आस्थाओं के चलते अपनी जाति के पुरोहित के सम्पर्क में भी आ ही जाता होगा । ख़ैर मित्र के आगमन पर पुरोहित ने उसका और उसके परिवार में जुड़े नये सदस्यों के नाम भी अपने रिकार्ड में दर्ज कर लिये । चूँकि आम तौर पर अपने परिजनों की अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित करने के लिए ही अब लोग बाग़ हरिद्वार जाते हैं अतः पुरोहित ने हरिद्वार आने का कारण भी पूछा। मित्र ने बताया कि यूँ ही बस घूमने-फिरने और गंगा में डुबकी लगाने आया हूँ । इस पर पुरोहित ने अपने पोथे में आने का कारण लिखा- सुख दे स्नान । यानि ख़ुशी ख़ुशी स्नान करने आयें और कहीं कोई गमी आदि नहीं है । यह ‘ सुख दे स्नान ‘ शब्द मित्र को बहुत भाया और यह उसकी ज़बान पर एसा चढ़ा कि सब कुछ ठीक ठाक है कहने की बजाय वह अक्सर यही कहता है- सुख दे स्नान । 


इत्तेफ़ाक से कल शहर के विभिन्न इलाक़ों और बाज़ारों में जाना हुआ । हर जगह एक ख़ास बात दिखी और वह यह कि बड़े बड़े बाज़ारों में भी ‘टू लेट ‘ के बोर्ड लगे दिखे । कवि नगर, राज नगर, गांधी नगर, नवयुग मार्केट और अम्बेडकर रोड जैसे बाज़ारों में ही नहीं आरडीसी जैसे क्षेत्रों में भी थोक के भाव एसे बोर्ड दिखे जिन पर लिखा था- दुकान किराये के लिये ख़ाली है । केवल चार महीने में सब कुछ बदल गया ?  नौकरी वाले सड़कों पर आ गये और व्यापारी क़र्ज़ में डूब गये । छोटी पूँजी वाला व्यापारी दुकान-गोदाम बंद करके घर बैठ गया है । जो दुकान-दफ़्तर खोल कर बैठे हैं वो भी कह रहे हैं कि इस से अच्छा तो लॉक़डाउन था, कम से कम राशन के अलावा और कोई चिंता नहीं थी । नब्बे फ़ीसदी छोटा व्यापारी एक ही बात कहता है कि दुकान खोलने में ज़्यादा नुक़सान है , बजाय बंद रखने के । जो किराया नहीं दे पा रहे वे दुकानें ख़ाली कर रहे हैं और जगह जगह टू लेट के बोर्ड नज़र आ रहे हैं । 


लॉक़डाउन के इतने बुरे परिणाम होंगे यह तो शायद किसी ने सोचा भी न होगा । राशन, दवाई और अस्पताल वालों के अलावा सब लुट गये । सरकार कह रही है कि उसने बहुत कुछ किया है । किया भी होगा और करना भी चाहिये था मगर नतीजे नज़र क्यों नहीं आ रहे ? इकोनोमी के जानकार तो कह रहे हैं कि हालात अभी और बिगड़ेंगे । बड़े बड़े उद्योगपतियों का भी यही आकलन है । ईश्वर करे कि ये सारे आकलन ग़लत साबित हों और यह गमी का माहौल जल्द ख़त्म हो । यही नहीं  फिर से मेरे मित्र की तरह हम सभी कह सकें- सुख दे स्नान हैं और सब ठीक है ।

रविवार, 16 अगस्त 2020

सोना सुनार का

 #क्या_है_एक्साइज_ड्यूटी

.

मान लीजिये आप सुनार के पास गए आपने 10 ग्राम प्योर सोना 30000 रुपये का खरीदा। उसका लेकर आप सुनार के पास हार बनबाने गए। सुनार ने आपसे 10 ग्राम सोना लिया और कहा की 2000 रुपये बनबाई लगेगी। आपने कहा ठीक है। उसके बाद सुनार ने 1 ग्राम सोना निकाल लिया और 1 ग्राम का टाका लगा दिया। क्यों विना टाके के आपका हार नही बन सकता। यानी की 1 ग्राम सोना 3000 रुपये का निकाल लिया । और 2000 रुपये आपसे बनबाई अलग से लेली। यानी आपको 5000 रुपये का झटका लग गया। अब आपके 30 हजार रुपये सोने की कीमत मात्र 25 हजार रुपये बची। और सोना भी 1 ग्राम कम कम हो कर 9 ग्राम शेष बचा। बात यही खत्म नही हुई। उसके बाद अगर आप पुन: अपने सोने के हार को बेचने या कोई और आभूषण बनबाने पुन: उसी सुनार के पास जाते है तो वह पहले टाका काटने की बात करता है। और सफाई करने के नाम पर 0.5 ग्राम सोना और कम हो जाता है। अब आपके पास मात्र 8.5 ग्राम सोना बचता है। यानी की 30 हजार का सोना मात्र 25500 रुपये का बचा।

आप जानते होंगे

30000 रुपये का सोना + 2000 रुपये बनबाई = 32000 रुपये

1 ग्राम का टाका कटा 3000 रुपए + 0.5 पुन: बेचने या तुड़वाने पर कटा = सफाई के नाम पर = 1500

शेष बचा सोना 8.5 ग्राम

यानी कीमत 32000 - 6500 का घाटा = 25500 रुपये

सरकार की मंशा

एक्साइज ड्यूटी लगने पर सुनार को रशीद के आधार पर उपभोक्ता को पूरा सोना देना होगा। और जितने ग्राम का टाका लगेगा । उसका सोने के तोल पर कोई फर्क नही पड़ेगा। जैसा की आपके सोने की तोल 10 ग्राम है और टाका 1 ग्राम का लगा तो सुनार को रशीद के आधार पर 11 ग्राम बजन करके उपभोक्ता को देना होगा। इसी लिए सुनार हड़ताल पर हे। भेद खुल जायगा।

कृपया इस मेसेज को ज्यादा से ज्यादा शेयर करे । जागो ग्राहक जागो।

ये तो एक बार की बात है अगर आप इसी सोने को लेकर 4 बार सुनार के पास गए तो सोना सुनार का हो गया।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

राइफल man की वीरता की अद्भुत गाथा /संजय सिंह

 जहां अकेले राइफलमैन ने 72 घंटे तक चीनी सैनिकों से लोहा लिया


संजय सिंह 

चीन द्वारा भारत पर 20 अक्टूबर, 1962 को किए गए आक्रमण में देश की शर्मनाक पराजर हुई थी। भारतीय सेना के पास उस वक्त कारगर हथियार तो दूर की कौड़ी थी, जवानों के पैरों में जूते तक नहीं थे। फिर भी तकरीबन एक माह तक (21 नवम्बर, 1962 को लड़ाई खत्म हुई थी) चले इस युद्ध में कई स्थानों पर भारतीय सैनिकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद अदम्य साहस, देशभक्ति और जज्बे की शानदार इबारत लिखी और दुश्मन का मुंहतोड़ जवाब दिया।

वर्ष 1962 की लड़ाई देश के दो सेक्टरों में लड़ी गई। चीनी सैनिकों ने सबसे पहले पूर्वोत्तर सेक्टर में तवांग (उत्तरांचल) की तरफ से आक्रमण किया। फिर उनका निशाना पश्चिमी सेक्टर का चुसूल और लेह बना। अरुणाचल की तरफ से जब चीन की लाल सेना ने आक्रमण किया, तो वहां 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित सीमांत क्षेत्र की नूरानांग पहाड़ी (तेजपुर से तवांग रोड पर लगभग 425 किलोमीटर दूर) और आसपास के इलाकों का सुरक्षा दायित्व तब गढ़वाल रेजीमेंट की चौथी बटालियन पर था। इस स्थान तक पहुंचने के लिए तवांग-चू नदी को पार करना पड़ता है।

इस इलाके में जब सर्दियां अपने चरम पर थीं, तो ठीक उसी वक्त चीनी सेना ने 17 नवम्बर, 1962 को  पौ फटते ही छह से अधिक बार हमला कर दिया था। वहां तैनात लांस नायक गोपाल सिंह गुसाई, लांस नायक त्रिलोकी सिंह और रायफल मैन जसवंत सिंह अपनी सूझबूझ, बहादुरी और युद्ध कौशल का परिचय देते हुए भारत माता की रक्षा के लिए साथी जवानों के साथ आगे बढ़े और चीनी आक्रमणकारियों को ललकारा, लेकिन चीनी सैनिकों की संख्या बहुत ज्यादा थी और वह अचानक भारी झुंड में टूट पड़ते। एक चीनी सैनिक मरता तो दूसरा उनके स्थान पर तेजी के साथ नमूंदार हो जाता और हमला जारी रखता। नतीजा यह हुआ कि हमारे जवान एक-एक कर देश के लिए शहीद होते रहे। भारतीय सेना की सपोर्टिग लाइन पूरी तरह से कटी हुई थी। लिहाजा चीनी सैनिकों से लोहा ले रहे भारतीय जांबाजों को पीछे से कोई सपोर्ट भी नहीं मिल पा रही थी। लांस नायक त्रिलोक शहीद हो गए। लायंस नायक गोपाल सिंह गुसाई के हाथ में गोलियां लग गई और वे जख्मी हो गए। 

अब अकेले रायफलमैन जसवंत सिंह रावत ने मोर्चा संभाल लिया। वहां पर पांच बंकरों पर मशीनगन लगाई गई थी। रायफलमैन जसवंत छिपकर और पेट के बल लेटकर दौड़ लगाते और पांचों बंकरों से दुश्मन पर फायर करते। जसवंत ने दुश्मन को अपनी बहादुरी, चतुराई, फुर्ती और सूझबूझ से खूब छकाया। चीनी सेना समझती रही कि पांचों बंकरों में भारतीय सैनिक मौजूद हैं और जीवित हैं। गोलियां खत्म होने लगीं तो जसवंत सिंह को मौत आसन्न लगने लगी। फिर भी उन्होंने बचे-खुचे हथियारों और अग्नेयास्त्रों से आखिरी सांस तक भारत माता की रक्षा का जज्बा ठंडा नहीं होने दिया। वह भूखे-प्यासे 72 घंटे तक यानी कि तीन दिन तीन रात तक अकेले दम चीनी सैनिकों से लड़ते रहे और उन्हें रोके रखा। उन्होंने तिरंगे की शान रखी और शहीद हो गए। लांस नायक गोपाल सिंह गुसाई तीन महीने तक चीन की कैद में रहे।

भारत सरकार ने बाद में जसवंत सिंह रावत को मरणोपरांत महावीर चक्र और गोपाल सिंह गुसाई को वीर चक्र से सम्मानित किया। नूरानांग की पहाड़ियों में अभी भी गढ़वाल रेजीमेंट की बहादुरी के किस्से गूंजते हैं। नूरानांग की लड़ाई में कुल 162 जवान शहीद हुए, 264 कैद कर लिए गए और 256 जवान प्रतिकूल मौसम में तितर-बितर हो गए।

(लांस नायक गोपाल सिंह से संजय सिंह की बातचीत पर आधारित)

रवि अरोड़ा की नजर से ......


 ख़ूनी डिबेट / रवि अरोड़ा


वैसे ही ख़ाली बैठा सोच रहा हूँ कि टीवी पर लाइव डिबेट में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने जो शब्द बाण कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी पर चलाये, यही काम अगर राजीव ने किया होता और भगवान न करे उसके बाद संबित पात्रा का हार्ट फ़ेल हो जाता तब क्या होता ? क्या तब राजीव त्यागी के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 304 के तहत ग़ैरइरादतन हत्या का मुक़दमा दर्ज नहीं होता ? इस धारा के तहत तो हर वह कार्य जो सामने वाले की मृत्यु का कारण बने ग़ैर इरादतन हत्या है । राजीव त्यागी की पत्नी बता रही हैं कि लाइव डिबेट में संबित पात्रा जिस तरह से राजीव को बार बार जयचंदों-जयचंदों कह रहे थे और उनके माथे पर लगे टीके पर उन्हें धिक्कार रहे थे, उससे वे असहज महसूस कर रहे थे और उनकी तबीयत तभी से बिगड़नी शुरू हो गई थी । राजीव के आख़िरी शब्द भी यही थे कि उन्होंने मुझे मार डाला । एसे में क्या यह ग़ैर इरादतन हत्या नहीं हुई ? यह ठीक है कि संबित पात्रा सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेता हैं और उनकी पार्टी की केंद्र और राज्य दोनो जगह सरकार है अतः उनका बाल भी बाँका नहीं होगा मगर फिर भी इस मामले में कांग्रेस पार्टी को तो आगे आकर न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना ही चाहिये । आख़िर कांग्रेस की विचारधारा का बचाव करते हुए ही तो राजीव की जान गई । अब दुख और संकट की इस वेला में राजीव त्यागी के परिवार में तो शायद ही एसा कोई है जो यह लम्बी लड़ाई लड़ सके । 


राजीव त्यागी से मेरे उस ज़माने के सम्बंध थे जब वे लोकदल में राजनीति का ककहरा सीख रहे थे । बेशक वे बेहद बहादुर व्यक्ति थे मगर मैंने उन्हें कभी अपशब्द बोलते नहीं देखा । सिखेड़ा गाँव में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सभा में उन्हें काले झंडे दिखाने पर राजीव को जब गिरफ़्तार किया गया , उस समय भी उनकी भाषा शैली बेहद शालीन थी । हालाँकि तत्कालीन एसएसपी और अन्य पुलिस अधिकारी उनसे बेहद गाली गलौज कर रहे थे मगर राजीव त्यागी ने पूरे संयम का परिचय दिया । एसी एक नहीं अनेक घटनाओं का मैं गवाह हूँ जब राजीव उत्तेजित हो सकते थे मगर वे नहीं हुए । साहिबाबाद के गाँव प्रह्लाद गढ़ी से राजीव त्यागी का गहरा नाता था और वहाँ के अनेक संस्मरण मुझे याद हैं जब उत्तेजित करने वाली परिस्थिति में भी उन्होंने आपा नहीं खोया । उनकी पत्नी स्कूल शिक्षिका हैं और बच्चों की शिक्षा भी अच्छे स्कूल-कालेजों में हुई है । कुछ मिला कर बेहद संस्कारी माहौल था राजीव त्यागी के इर्द गिर्द और यही वजह रही कि संबित पात्रा जब उन्हें बार बार जयचंदों-जयचंदों कर कर ललकार रहे थे तब भी उन्होंने एक अनुभवी, संस्कारी और शालीन प्रवक्ता की तरह केवल उँगली उठा कर जवाब देने की अनुमति भर माँगी और पात्रा को उन्ही की भाषा में अपशब्द नहीं कहे । डिबेट के घटिया स्तर, उत्तेजना के माहौल और अनर्गल आरोपों के बीच शालीनता का यही दामन थामना राजीव के हृदय पर भारी पड़ा और हृदय रोगी न होने के बावजूद उनका हृदय साथ छोड़ गया । 


वैसे राजीव त्यागी की ही यह हिम्मत ही थी कि वर्षों से टीवी की बेहद घटिया और स्तर हीन बहसों का वे सामना कर रहे थे। यक़ीनन यह डिबेट उन जैसे संस्कारी व्यक्ति के लिए नहीं थीं । राजीव त्यागी ही क्या किसी भी विचारवान, संस्कारी और शालीन व्यक्ति के लिये ये टीवी की डिबेट नहीं होतीं । पता नहीं लोग अब इन्हें देखते भी है अथवा नहीं । कम से कम मेरे जैसे लोग तो बिलकुल नहीं देखते । ड्रामेबाज़ी, फूहड़ता और घटिया स्तर की ये डिबेट होती ही दर्शक को उत्तेजित करने के लिए हैं । कल्पना कीजिये कि जिस डिबेट का काम ही दर्शक को उत्तेजित करना है तो एसे में उस व्यक्ति का क्या हाल होता होगा जिसका लाइव चीर हरण किया जा रहा हो । ठीक है ढीठ और बेशर्म की खाल तो मोटी होती है मगर शर्म वाला आदमी क्या करे ? उसे तो ये ख़ूनी डिबेट बीच में छोड़ कर उठना ही पड़ेगा वरना ये डिबेटर तैयार बैठे हैं राजीव त्यागी की उसे दुनिया से उठा देंगे ।

शोले के 45 साल / विवेक शुक्ला

 Navbharatimes / 

शोले, इमरजेंसी, 15 अगस्त, 1975

साउथ एक्सटेंशन,अजमेरी गेट,मोती नगर वगैरह में शोले के बड़े-बडे पोस्टर 15 अगस्त 1975 से पहले लग चुके थे। ये एक जैसे नहीं थे। कहीं पर अमिताभ बच्चन और धर्मेन्द्र के हाथों में बंदूक थी और साथ में अमजद खान यानी गब्बर भी थे। अमजद की फोटो बड़ी थी इन दोनों से। एकाध जगह पर शोले के सभी प्रमुख कलाकारों की फोटो थी और बड़ा सा लिखा था शोले। 


इन्हें दिल्ली दायें से बायें और बायें से दायें बड़े चाव से देख रही थी। शोले की संभावित कहानी दिल्ली रीलिज होने से पहले डिस्कस कर रही थी। वह इमरजेंसी का दौर था। इमरजेंसी जून में लगी थी। माहौल में एक डर का भाव था। बहुत सारे विपक्षी दलों के नेता जेल में थे। उन हालातों में शोले के आने से माहौल थोड़ा सहज जरूर हुआ था।

देश और दिल्ली इमरजेंसी से इतर भी बातें करने लगी थी।

तब तक दिल्ली का इतना विस्तार नहीं हुआ था। मयूर विहार, वसंत कुंज, द्वरका, रोहिणी और एनसीआर को बनने में भी काफी वक्त था।


दिल्ली में शोले के प्लाजा और अम्बा में रीलिज होने से पहले टिकट लेने वालों की लंबी-लंबी लाइनें लगने लगीं। प्लाजा की भीड़ पर पुलिस नजर रख रही थी। प्लाजा में शोले 70 एमएम के प्रिंट पर दिखाई जानी थी इसलिए यहां पर अम्बा की तुलना में भीड़ ज्यादा थी। अम्बा में 35 एमएम का प्रिंट था।


शोले का जादू रीलिज होते ही दिल्ली वालों पर सिर चढ़कर बोलने लगा। ‘कितने आदमी थे’,‘ बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना’, ‘यहां से पचास-पचास कोस दूर जब बच्चा रात को रोता है तो मां कहती है सो जा बेटे नहीं तो गब्बर आ जाएगा’,‘ इतना सन्नाटा क्यों है भाई’,‘सरदार मैंने आपका नमक खाया है’,‘हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं’,‘जेल में चक्की पीसिंग, एंड पीसिंग, एंड पीसिंग’जैसे डॉयलाग दिल्ली बोलने लगी।


 प्लाजा में शोले को देखने वालों की भीड़ कम नहीं हो रही थी, तो अम्बा में बढ़ती जा रही थी। अम्बा चूंकि दिल्ली यूनिवर्सिटी मेन कैंपस से सटा है, इसलिए वहां डीयू बिरादरी और नॉर्थ दिल्ली वाले  मुख्य रूप से आ रहे हैं। प्लाजा और अम्बा के बाद नवंबर में मोरी गेट पर स्थित नोवल्टी ने शोले को रीलिज किया। तीनों में शोले सिल्वर और फिर गोल्डन जुबली मनाती रही।


 कहते हैं कि 1935 में शुरू हुए नोवल्टी में दिल्ली की बदनाम बस्ती जी.बी.रोड की बेटियां भी शोले 12 बजे का शो देखने आ रही थीं। 


दिल्ली के फिल्मी सीन पर नजर रखने वाले जिया उस सलाम Ziya Us Salam कहते हैं सोहराब मोदी के मिनर्वा में शोले काफी कोशिशों के बाद भी रीलिज नहीं हुई। वितरकों ने शोले को इधर रीलिज नहीं किया। 


तो शोले यमुनापार और साउथ दिल्ली के किसी भी सिनेमाघर में रीलिज नहीं हुई। इन दोनों जगहों के फिल्मों के चाहने वाले अपने-अपने घरों से काफी दूर जाकर शोले देख रहे थे। 


हां, शोले के निर्माता जी.पी. सिप्पी ने आगे चलकर साउथ एक्सटेंशन से कुछ आगे सिंधियों की कॉलोनी मेयफेयर गॉर्डन में शानदार बंगला बनवाया। हालांकि वह उजाड़ ही रहा।

ये लेख 13 अगस्त 2020 को पब्लिश हुआ। उसके अंश।

देश में राहुल गाँधी नहीं मोदी की सरकार है?

 मान लेते हैं कि राहुल गांधी पप्पू है,


राहुल गांधी मंदबुद्धि है,


परंतु हे मस्तिष्क विहीन, विवेकहीन और बुद्धिविहीन 


क्या देश में कांग्रेस की सरकार है?


क्या राहुल गांधी देश का प्रधानमंत्री है? देश का वित्त मंत्री है? देश का स्वास्थ्य मंत्री है? या फिर देश का रक्षा मंत्री है?


बताइए इनमें से क्या है राहुल गांधी?


जो आप बात बात में राहुल गांधी का मजाक उड़ाते हैं, या फिर उससे सवाल करते हैं?


क्या ₹25 वाला पेट्रोल इसीलिए ₹90 में बिक रहा है कि राहुल गांधी पप्पू हैं?


क्या 10 करोड़ लोगों की नौकरी इसीलिए चली गई कि राहुल गांधी पप्पू हैं?


क्या देश की अर्थव्यवस्था इसीलिए डूब गई कि राहुल गांधी पप्पू है?


क्या कोरोना केसेस की संख्या 21 लाख इसलिए पहुंच गई कि राहुल गांधी घोंचू है?


क्या देश की सीमाओं पर चीन ने जो घुसपैठ की है, और नेपाल भूटान और पाकिस्तान इसीलिए देश को आंख दिखा रहे हैं क्योंकि राहुल गांधी मंदबुद्धि है।


क्या देश इसीलिए तबाही की कगार पर खड़ा है क्योंकि देश की सबसे बड़ी समस्या राहुल गांधी है?


क्या देश की संपत्तियों को राहुल गांधी बेच रहा है?


हे मूर्खभक्तों,


देश में भाजपा की सरकार है,


और बीते 6 सालों से नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, 


और देश की अर्थव्यवस्था, लोगों के लिए रोजगार, लोगों के स्वास्थ्य की चिंता, और देश की सीमाओं की रक्षा की जिम्मेदारी मोदी जी की सरकार की है,


देश में किसी भी समस्या के लिए सरकार से गुहार लगाई जाती है।


देश के लोगों के लिए बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के इंतजाम की जिम्मेदारी सरकार की होती है।


बाहरी शत्रुओं से देश को बचाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है।


सरकार सिर्फ अम्बानी-अडानी जैसे अपने दो चार मित्रों को फायदा पहुंचाने के लिए नहीं होती।


सरकार BPCL और LIC जैसी भारी कमाई देने वाली दर्जनों कंपनियां बेचने के लिए नहीं होती।


चीनी घुसपैठ जैसे गंभीर मामले में देश से झूठ बोलने के लिए नहीं होती।


सरकार सिर्फ जनता को लूटने और खून चूसने के लिए नहीं होती।


किसी भी नाकामी के लिए सरकार से सवाल पूछे जाते हैं।


अगर राहुल गांधी देश की सबसे बड़ी समस्या है तो सत्ता में बैठी सरकार से कहिए कि उसे फांसी पर चढ़वा दे।


लेकिन देश को बर्बाद होने से बचाईये।


अन्यथा सत्ता पर काबिज देश के नाकारे, निकम्म्मे असली पप्पू, घोंचू और मंदबुद्धि को पहचानिए।


अगर हिम्मत है तो उस असली पप्पू से सवाल पूछिए।


उसके अंधभक्त बनकर अपनी शिक्षा, डिग्री और समझ पर प्रश्नचिन्ह मत लगाइए।


सिर्फ वन्दे मातरम और भारत माता की जय के नारे लगाना देशभक्ति नहीं है।


सरकार के हर निकम्म्मेपन और मूर्खता का बचाव करना देशभक्ति नहीं है। 


सत्ता पर काबिज असली पप्पू की अंधभक्ति करना और राहुल गांधी का मजाक उड़ाना देश भक्ति नहीं है।


देश भक्ति है सरकार में बैठे लोगों से सवाल पूछ कर उन्हें जवाबदेह बनाना।


देशभक्ति है हर जनविरोधी निर्णय पर सरकार का विरोध करना।


देशभक्ति है देश की किसी भी तरह की बर्बादी के खिलाफ मुखर होना।


देशभक्ति है संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को नष्ट करने के खिलाफ आवाज उठाना।


समझ गए या नहीं।


Courtesy Rahul Singh Baghel

संकट, संयम , औऱ स्वावलंबन का पर्व / मनोज कुमार

 15 अगस्त के लिए खास /मनोज कुमार 


संकट, संयम और स्वावलंबन का पर्व

मनोज कुमार

15 अगस्त, 1947 से लेकर 2019 तक हम आजादी का पर्व उत्साहपूर्वक मनाते आए हैं. इन वर्षों में ऐसा भी नहीं है कि कोई संकट नहीं उपजा हो लेकिन साल 2020 में जहां इस वक्त हम खड़े हैं, वह संकट, संयम और स्वावलंबन का पर्व बन गया है. कोविड-19 ने ना केवल भारत वर्ष के समक्ष चुनौतियों और संकटों का पहाड़ खड़ा किया है बल्कि पूरी दुनिया की मानवता के समक्ष भयावह संकट के रूप में उपस्थित है. जानकारों का कहना है कि हर सौ साल में ऐसी त्रासदी दुनिया में एक बार कयामत बन कर टूटती है. भारत की आजादी के बाद संभवत: यह पहला अवसर होगा जब हम इन चुनौतियों का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार कर रहे हैं. हालांकि बीते सालों में कई किस्म की महामारी के शिकार हमारी सोसायटी होती रही है लेकिन कोविड-19 पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है.

कोविड-19 का यह संकट हमारे लिए कुछ अधिक पीड़ादायक है. यह पीड़ा है उस तारीख के लिए जिस दिन हम गर्व के साथ अपना तिरंगा फहराते हैं. अपने भीतर देशभक्ति और स्वाभिमान से भर उठते हैं. यह हमारा राष्ट्रीय उत्सव होता है लेकिन इस बार हमारा राष्ट्रीय उत्सव रस्मी होगा. यह जरूरी भी है क्योंकि मौत की बांहें पसारे कोविड-19 को यह ज्ञात नहीं है कि हम अपना राष्ट्रीय पर्व मना रहे हैं या कोई उत्सव का आयोजन कर रहे हैं. एक कशिश मन में रह जाएगी लेकिन ऐसा नहीं है कि जैसे पहले महामारी एक समय के बाद विलुप्त हुइ्र्र तो यह नहीं होगी. इस बार ना सही, अगले साल हम दुगुने उत्साह के साथ हमारा अपना राष्ट्रीय पर्व का आयोजन करेंगे. देश हमारा है.

कोविड-19 संकट का भयावह समय है. यह संयम और स्वावलंबन का समय भी है. संकट से समाधान का रास्ता भी निकलता है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है. सोना भी तभी दमकता है, जब वह आग में तपकर निखरता है. एक पत्थर भी तभी मूर्ति के रूप में आकार ग्रहण करती है जब शिल्पकार अपने औजार से उसे छलनी करता है. ऐसे में मनुष्य भी संकट से स्वयं को और आत्मविश्वासी बनाता है. जीने के नए राह तलाशता है. सोने का आग में निखरना या पत्थर का मूर्ति का आकार लेने में शिल्पी का संयम काम करता है लेकिन संकट में मनुष्य का संयम उसे सोने की तरह निखारता है. यकिन ना हो तो कोई 6 माह का अनुभव स्वयं कर लीजिए. रोग से बचाव के लिए लॉकडाउन जैसे कठिन उपाय सरकार ने किए. बाजार बंद, रोजगार पर संकट और सीमित बचत के बीच जिंदगी को बचाये रखने की चुनौती. थोड़े से लोगों को अपवाद स्वरूप छोड़ भी दें तो अधिकांश लोगों ने इस स्थिति में भी संयम से काम लिया. स्वयं के हाथों में ऐसे काम करने लगे जिससे खर्च में कमी आए. जो बचत की राशि है, उसका अधिकतम और जरूरी खर्च किए जा सकें. साधनसम्पन्न परिवारों की चर्चा बेमानी है लेकिन मध्यम और निम्र मध्यमवर्ग की चर्चा करें तो उन्होंने संयम के साथ इस समय को गुजारा है और आने वाले समय में जिंदगी आहिस्ता आहिस्ता पटरी पर आ जाएगी, यह यकिन करना नामुमकिन नहीं है. 

कोविड-19 ने समाज को बाजार से भी परे किया है. हम सब बाजार के शिकार हो चले थे. हमारी जिंदगी में बाजार का हस्तक्षेप इतना अधिक हो गया था कि स्वावलंबन को हम भूल चुके थे. दाम चुकाओ और आराम करो हमारी नियती बन रही थी लेकिन इस महामारी ने हमें स्वावलंबी बना दिया. बहुतेरे काम जो हम कभी स्वयं करते थे, उसे छोड़ दिया था. आज हम उन्हीं काम को फिर से कर ना केवल स्वावलंबी बन रहे हैं बल्कि आत्मसंतुष्टि का भाव भी महसूस कर रहे हैं. परिवार के बीच में जो खालीपन आ गया था, इस महामारी के कारण आपस में आत्मीयता का भाव बढ़ा है. यह कड़ुआ सच है कि कई घरों में पालकों को अपने ही बच्चों के बारे में यह ज्ञात नहीं था कि वह क्या पढ़ता है, उसकी जीवनशैली क्या है, उन्हें इस दौरान बच्चों को समझने का अवसर मिला. दूसरी तरफ जिन बच्चों ने मां-बाप को एटीएम मशीन समझ लिया था, उन्हें भी इस बात का अहसास हुआ कि मां-बाप एटीएम मशीन नहीं बल्कि ममता की वो मशीन है जिनके सिर पर हाथ फेरते ही मीठी नींद आ जाती है. पति-पत्नी ने एक-दूसरे की भावना को समझा. ये जो बदलाव आया है, उससे बाजार भौंचक है. उसे डर है कि यह बदलाव पूरे बाजार को बदल देगा. कोविड-19 को तो एक दिन विदा होना ही है लेकिन बाजार के प्रति लोगों का जो अनुराग विदा होगा, वह डर बाजार को बैठ गया है. 

संकट, संयम और स्वावलंबन ने जहां भारतीय समाज को एक नए ढंग से परिभाषित किया है, वह हमारी कई पीढिय़ों का मार्गदर्शन करता रहेगा. जिस भारतीय परम्परा की हम केवल चर्चा करते रहे हैं, मुझे निजी तौर पर लगता है कि उस रास्ते पर हम लौटने लगे हैं. हमारे रिवाज में था कि पहले जूते-चप्पल घर से बाहर उतारें और बाहर ही रखे बर्तन के पानी में हाथ-मुंह धोकर घर में प्रवेश करें. यह चेतावनी थी कि किसी किस्म की बीमारी घर के भीतर लेकर नहीं आएं. लेकिन बदलते दौर में हम यह भूल गए थे लेकिन कोरोना ने याद दिला दिया है कि वही ठीक था, जिसे छोड़ आए हो. हालांकि यह भी कपोल कल्पना होगी कि हम उन पुराने दिनों में चले जाएंगे लेकिन यह सत्य है कि हम नए जमाने में होंगे. हाथ में मोबाइल और लेपटॉप होगा लेकिन संस्कार से हम भारतीय होंगे. दर्शन और संस्कृति की नई जड़ें इस संकटकालीन स्थितियों में हमारे और हमारी नवीन पीढ़ी के भीतर जमने लगी है, वह कालजयी होगी. एक बार घर लौटने की देर थी लेकिन इस संकट ने मजबूरी में ही सही, हमें, आपको घर की तरफ लौटा दिया है. इसे सहेज कर रखना और आगे बढ़ाने की जवाबदारी हमारी और आपकी है. 

हम यह मान लें कि इस बार का हमारा स्वाधीनता पर्व संकट, संयम और स्वावलंबन का घर-घर मनाया जाने वाला उत्सव है. एक कमी, एक दुख तो होगा लेकिन हम बचेंगे तो समाज बचेगा, समाज से राज्य और राष्ट्र सुरक्षित होगा. इसलिए आवश्यक है कि हम उन तमाम किस्म की सावधानी को बरतें जिससे यह महामारी आपको, हमें और हमारे लोगों तक ना फटके. मास्क लगाना उतना ही आवश्यक है जितना की आपस में शारीरिक दूरी कायम रखना. स्वच्छता का एक सबक इस महामारी ने सिखाया है. जान है तो जहान है, यह सच है लेकिन यह भी सच है कि हमारी परम्परा रही है कि साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा मिलकर भोज उठाना. यानि एक संदेश इस पर्व पर यह भी है कि हम आज भी वसुधैव कुंटुंबकंम के साथ जीते हैं. इसीलिए तो सबसे प्यारा, हिन्दुस्तान हमारा.


गुरुवार, 13 अगस्त 2020

विवेक सुन रहे है खब्बुओं की पीड़ा / विवेक शुक्ला

 कौन सुनेगा खब्बू का दर्द/ विवेक शुक्ला 


यूं अल्पसंख्यकों के हक में बड़ी- बात होती हैं, पर इन अल्पफसंख्यकों के दर्द को सुनने वाला कोई नहीं है। बात हो रही है खब्बुओं की, जिन्हें वामहस्त भी कहते हैं। यानी लेफ्टहैंडरर्स की। इनका दर्द सुनने या समझने वाला कोई नहीं है। तो फिऱ इनके मन और सुविधानुसार घर कौन बनाएगा?

यकीन मानिए कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति पूर्व बराक ओबामा, अमिताभ बच्चन, राहुल बजाज, चार्ली चेपलिन जैसी प्रख्यात शख्सियतों को कभी अपने घरों में चैन से रहने का मौका नहीं मिला होगा। हम सच कह रहे हैं। हालांकि इऩके घरों में जाने का तो हमें कभी मौका नहीं मिला पर इनके घर चाहे व्हाइट हाउस हों या प्रतीक्षा, इनके हिसाब से तो नहीं बने होंगे।  वजह इनका खब्बू होना है।खब्बू अपने आप में एक वो मिनोरिटी समूह है,जो वोट बैंक नहीं है। महत्वपूर्ण है कि हर साल 13 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय खब्बू दिवस ( World Left handers day) के तौर पर मनाया जाता है। पहली बार यह 13 अगस्त 1992 को मनाया गया था| तब इसकी पहल इंग्लैंड के खब्बू क्लब ने की थी| 

 

सदियों से लोग उन्हें बाएँ हाथ के बजाए दाएँ हाथ से लिखने और दूसरे काम करना सिखाते आए हैं| लेकिन इस सब से ऐसे लोगों को मानसिक चोट पहुंचती है| इस समस्या की ओर ध्यान दिलाने के लिए ही अब यह दिन मनाया जाता है| इस दिन का एक दूसरा पहलू है रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीजें बनाने वालों का ध्यान इधर खींचना ताकि वे ऐसी चीजें बनायें, जिन्हें इस्तेमाल करने में वामहस्त लोगों को कठिनाई न हो| माना जाता है कि वर्तमान  में संसार में लगभग 50 करोड़ खब्बू  हैं|

कौन-कौन खब्बू

इतिहास में जो जाने-माने वामहस्त हस्तियाँ हुई हैं उनमें जूलियस सीज़र, नेपोलियन, सिकंदर, लेओनार्दो दे विन्ची, माइकल एंजेलो,  मोज़ार्ट, आइंस्टीन और न्यूटन शामिल हैं| देश की आर्किटेक्ट बिरादरी भी खब्बुओं को लेकर संवेदनहीन है। उनके हितों का ख्याल नहीं रखती। रीयल एस्टेट कंपनियों को आर्किटेक्ट बिरादरी के साथ मिलकर खब्बुओं के पक्ष में सोचना चाहिए। कम से कम कुछ पहल तो हो। आर्किटेक्ट अपनी तरफ से कुछ नहीं कर सकते। उन्हें तो जो कहा जाता है अपने बिल्डर की तरफ से, वो उसी तरह से आवासीय और कमर्शियल इमारतों के डिजाइन तैयार कर देते हैं।

 

पुणे में एक संस्था खब्बुओं के हितों के लिए संघर्षशील है। उसके सदस्य पुणे और महाराष्ट्र के दूसरे बड़े शहरों में रीयलएस्टेटफर्म के शिखर लोगों से मिलते हैं। उनसे आग्रह करते हैं कि वो अपने खब्बू कस्टमर्स का ख्याल करें। कहते हैं कि  अगर बिल्डर बिरादरी खब्बुओं को लेकर थोड़ा बहुत सोचने लगे तो वे उनका जीवन बेहतर बना सकते हैं।  समाज उनके साथ जाने-अनजाने नाइंसाफी कर रहा है।


 इस बीच, पेशे से खब्बू बैंकर  सुरेखा भसीन ने एक रोचक किस्सा सुनाया। हुआ यूं कि वो  एक बिल्डर के दफ्तर में बैठकर एक फॉर्म भर रही थी। फॉर्म उसे बिल्डर के दफ्तर ने दिया था। सुरेखा ने एक फ्लैट को खरीदने का फैसला कर लिया था। चूंकि वो खब्बू है, तो  कि वो फॉर्म अपने बाएं हाथ से ही भर रही थी।  जब वोफॉर्म भर रही थीं तब उस कंपनी के एक आला अफसर ने उसे देखकर पूछा,  ‘चूंकि आप लेफ्टहैंडर हैं तो क्या आप अपने फ्लैट में कुछ अलग तरह की फीटिंग चाहेंगी ताकि आपको सुविधा हो ?’  उसने कहा कि मैंने इससे पहले कभी किसी कस्टमर को इस तरह की पेशकश नहीं की थी। शायद इसलिए कि मैंने कभी सोचा ही नहीं अपने लेफ्ट हैंडर कस्टमर्स के बारे में।

 तब सुरेखा ने कहा कि ‘अगर आप मेरे किचन में सिलेंडर रखने की जगह बायीं तरफ करें तो मुझे सुविधा होगी। उस स्थिति में मुझे सिलेंडर को रखने या हटाने में सुविधा होगी। किचन में मसाले रखने वाली बोतलों के लिए जगह भी बार्यी तरफ ही रखेँ। दीवार से सटी लकड़ी की अल्मारियों को इस तरह से बनाएं ताकि उन्हें बाएं हाथ से खोला जा सके।’ उसकी ये सब बातें मान ली गईं।


 दरअसल किसी खब्बू को अपने बायें हाथ से अल्मारी खोलने से लेकर घर का दरवाजा खोलने होता है। ये  कोई बहुत आसान नहीं होता। कारण ये है कि आमतौर पर ये सब दायें हाथ से काम करने वालों के हिसाब से बनाए जाते है। 20-25 साल पहले तो ज्यादातर इमारतें विकलांगों की सुविधा के अनुसार नहीं बनती थीं। जागृति आई तो आर्किटेक्ट भी विकलांगों के मन की इमारतों के डिजाइन तैयार करने लगे।इसलिए इमारतें और घर भी लेफ्टहैंडरफ्रैंडली बनने चाहिए। इसी तरह से वामहस्तों के घरों की किचन की सिंक को बायींतरफ बनाया जा सकता है। उन दरवाजों के हैंडिल भी बायींतरफ किए जा सकते हैं,जिन्हें घर की गृहिणि को बार-बार खोलना होता है। इन कदमों को उठाने से खब्बुओं को बहुत राहत दी जा सकती है।

आमतौर पर तो बिल्डर अपने लेफ्ट हैंडर कस्टमर के हितों को नहीं देखते। कुछ रीयल एस्टेट कंपनियों के आला अफसर कहते हैं था कि अगर उन्हें कोई कस्टमर अपने फ्लैट में कुछ अलग से बदलाव करने के लिए कहता है तो वे उसका ख्याल रखते हैं। आखिर हम बाजार में तब तक ही रह सकते हैं,जब तक अपने कस्टमर्स को लेकर सेंसटिव हों।

 

ये सच है कि  पूरी तरह से खब्बुओंके हिसाब से कोई बिल्डिंग का निर्माण करना नामुमकिन है। क्योंकि किसी भी इमारत का जब निर्माण होता है तो बहुसंख्यकों का ख्याल रखा जाता है।  पर अब वक्त आ गया है कि लेफ्टहैंडर्स और विकलांगों के हितों का ध्यान रखा जाए।अक्सर हम सुनते हैं , यह तो मेरे बाएं हाथ का खेल है। पर खब्बू होना आसान नहीं है खासकर खब्बू बच्चे घर और स्कूल में खब्बूपन के बारे में फैले मिथ्या प्रचार के कारण कई समस्याओं का सामना करते हैं।


खब्बू होना आनुवंशिक है इसलिए इसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन अभिभावक तथा शिक्षक अक्सर बच्चों को दाहिने हाथ के इस्तेमाल के लिए दबाव डालते हैं जिससे बच्चे के स्वाभाविक विकास पर बुरा असर पड़ता है। खब्बू बच्चों पर दाहिने हाथ के इस्तेमाल के लिए दबाव डालने से उनमें हीनभावना पैदा होती है और उनकी प्रगति धीमी होती है। इससे उन्हें अंक कम मिलते हैं।

तो सवाल उठता है कि खब्बुओं के लिए कैसे बने घर? उनकी सुविधा के हिसाब से बने इमारतें?


   इंस्टीच्यूटआफटाउनप्लानिंग से जुड़े हुए प्रो. बी.एस.मेशराम कहते हैं कि खब्बुओं के लिए घर बनाने की सोच तो बहुत अच्छी है। पर ये सोच प्रेक्टिल नहीं मानी जा सकती। क्यों ? वे कहते हैं कि हरेक परिवार में बमुश्किल से एक खब्बू होता है। जाहिर है,इन हालातों में आप लेफ्टहैंडर के मन से किस तरह से घर बनाएंगे। हालांकि वो कहते हैं कि ये संभव है कि कोई इंसान अपने घर को जितना संभव हो लेफ्टहैंडरफ्रैडली बन ले।

कुल मिलाकर बात ये है कि हालांकि लेफ्टहैंडर घर या इमारतें बनना तो दूर की संभावना है, पर इस लिहाज से ठोस पहल होनी चाहिए।


ये लेख आज हरिभूमि में पब्लिश हुआ है ।

भंडारा आरती के समय सुबह वचन

 12/08 आरती के समय पढा गया बचन


          (सारबचन नसर, भाग 2)


        92. गुरु की पूजा गोया मालिक की पूजा है, क्योंकि मालिक कहता है कि जो गुरु द्वारे मुझको पूजेगा, उसकी पूजा क़बूल करूँगा और जो गुरू को छोड़कर और और पूजा करते हैं, उनसे मैं नहीं मिलूँगा। जो कोई यह कहे कि गुरू की पहचान बताओ तो हमको यक़ीन आवे, तब हम गुरू की पूजा करें, तो उससे यह सवाल है कि तुम जो मालिक की पूजा करते हो उसकी पहचान बताओ कि तुमने उसकी पहचान कैसे करी है। जो मालिक की पहचान है वही गुरू की पहचान है, क्योंकि हरि गुरू एक हैं, उनमें भेद नहीं। पर हरि की पूजा करने से हरि नहीं मिलेगा और सतगुरु की पूजा और सेवा करने से हरि मिल जावेगा, इतना ग़ौर कर लेना चाहिए। और जो कोई यह कहे कि जब हरि गुरू एक हैं तो हम हरि की ही पूजा न करें, गुरू की पूजा क्या ज़रूर है, सो यह बात नहीं हो सकती है। पहले भक्ति सतगुरु की करनी पड़ेगी, तब वह मिलेगा। यह क़ायदा उसने आप मुक़र्रर किया है कि जो गुरू द्वारे मुझसे मिलेगा उससे मैं मिलूँगा, निगुरे को मेरे यहाँ दख़ल नहीं है। और गुरू पूरा चाहिये।       

राधास्वामी

बुधवार, 12 अगस्त 2020

रवि अरोड़ा की नजर से......

 फिर छिड़ी बात वैक्सीन की


रवि अरोड़ा

आप सभी को बहुत बहुत बधाई । दुनिया में कोरोना की पहली वैक्सीन बन गई और हमारे पुराने मित्र देश रशिया ने ही इसे बनाया है । क्या कहा कि इस वैक्सीन को लेकर अभी आपके मन में संशय है ? अच्छा ! तो आप भी उस खेल का शिकार हो गए जो दुनिया भर में कोरोना की वैक्सीन को लेकर कल से खेला जा रहा है । आपने भी आप अख़बारों और टीवी में वैक्सीन की खोज से बड़ी ख़बरें उस पर उठे सवालों की देखी होंगी । डब्ल्यूएचओ ने क्या कहा और दुनिया भर के बड़े वैज्ञानिकों की इस पर क्या राय है, यह सवाल आपके दिमाग़ में भी ज़रूर डाले गए होंगे । अरे जनाब ये बड़े लोगों के खेल हैं और आपकी हमारी समझ से ऊपर हैं । बाज़ी रशिया ने कैसे मार ली, सारी खिसियाहट उसी की है । अरबों रुपये की कमाई का मामला है जी । बाक़ी लोग देखते ही रह गए और रशिया को बीस देशों से एक अरब डोज़ का ओर्डर भी मिलने जा रहा है । अब एसे में प्रतिद्वंदियों को डब्ल्यूएचओ, सरकारें, मीडिया और विशेषज्ञ सभी मैनेज तो करने ही पड़ेंगे न । अज़ी आप इस विवाद में मत पड़िए और बधाई लीजिये बस । शुक्र कीजिये कि इस ख़तरनाक महामारी का तोड़ तो आख़िरकार निकला । 


वैसे शय मात तो हर खेल का नियम है जनाब । नौ महीने से दुनिया भर में 165 वैक्सीन पर काम चल रहा था । छः वैक्सीन तो तीसरे चरण में भी पहुँच गई थीं। दो वैक्सीन को विकसित करने में बिल गेट्स की संस्था भी अच्छा ख़ासा पैसा लगाए बैठी है । इन सभी वैक्सीन निर्माता फ़ार्मा कम्पनियों के शेयर आसमान छू रहे थे मगर रशिया ने सभी को ज़ोर का झटका धीरे से दे दिया । सीधा सा हिसाब है कि दुनिया भर में जिस कम्पनी की वैक्सीन लगेगी वह अरबों डालर में खेलेगी । इस धरती पर फ़ार्मा उद्योग सवा लाख करोड़ डालर का है और उसमें भी तीस फ़ीसदी अकेला वैक्सीन का बाज़ार है । वैक्सीन का अस्सी फ़ीसदी धंधा दो अमेरिकी कम्पनी के पास है जो कोरोना की वैक्सीन भी विकसित कर रही हैं । अब आप स्वयं अंदाज़ा लगाइये कि फ़ार्मा उद्योग में इस वैक्सीन को लेकर किस हद तक मार काट मची होगी । 


वैसे सवाल यह भी है रशिया की वैक्सीन स्पूतनिक-वी सम्बंधी डब्ल्यूएचओ के आरोपों को गम्भीरता से क्यों लिया जाए ? उस डब्ल्यूएचओ को, जिसके ख़िलाफ़ आरोप है कि चीन से मिली भगत के चलते उसने कोरोना की चेतावनी देर से जारी की ? वही डब्ल्यूएचओ जिसने सार्स जैसी ख़तरनाक बीमारी को लेकर दुनिया को गुमराह किया और इबोला महामारी को लेकर सुस्त रवैया अपनाया ? उसकी संदिग्ध कार्यशैली के चलते ही हाल ही में दुनिया के 62 देशों ने मिल कर उसके ख़िलाफ़ मोर्चा खोला और उसके ख़िलाफ़ निष्पक्ष जाँच की माँग की ? उस प्रस्ताव पर स्वयं भारत ने भी हस्ताक्षर किये । यह ठीक है कि रशिया ने वैक्सीन सम्बंधी अन्तर्राष्ट्रीय दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया और अपनी वैक्सीन के ट्रायल सम्बंधी जानकरियाँ भी सार्वजनिक नहीं कीं मगर अब जब रशिया के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतीन स्वयं इस वैक्सीन की घोषणा कर अपनी बेटी से इसके टीकाकरण की शुरुआत कर रहे हैं तो तमाम संशय समाप्त हो ही जाने चाहिये न । यूँ भी रशिया अपनी अधिकांश जानकरियाँ अंतराष्ट्रीय पटल पर रखता ही कहा है ? हो सकता है कि इस बार भी उसने यही नीति अपनाई हो । 


ख़ैर इस पूरे पचड़े से इतर अपने दिमाग़ में तो बस एक सवाल है कि इस मामले में भारत का स्टैंड क्या होगा ? क्या वह अमेरिका का पिछलग्गू बन कर किसी अमेरिकी कम्पनी की वैक्सीन का इंतज़ार करेगा या अपने ही देश में बायोटेक ,जायडस कैडिला और अरविंदो फ़ार्मा जैसी कम्पनियों की वैक्सीन बनने तक हाथ पर हाथ धरे बैठेगा ? या फिर दुनिया के बीस अन्य देशों की तरह तुरंत रशिया के गामालेया शोध संस्थान व रूसी रक्षा मंत्रालय के संयुक्त प्रयासों से बनी इस राशियन वैक्सीन मँगवा कर अपने नागरिकों की तुरंत जान बचाएगा ? आपको क्या लगता है ?

धर्म के नाम पे अधर्म (कठमुल्लापन) /वीरेंद्र सेंगर

  धार्मिक कठमुल्लापन बहुत भयानक रूप लेता जा रहा है। चाहे वो इस्लाम के नाम पर हो या अंध हिंदुत्ववाद के नाम पर। धर्म की आड़ में बहुत अधर्म हो रहा है।पिछले दशकों से ये पागलपन पूरे देश में फैला।दुनिया के विकसित देश वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं।जबकि हम तालिबानी तत्वों को जाने, अनजाने बढ़ावा दे रहे हैं।ये तालिबानी थोड़े बहुत अंतर से दोनों छोरों पर हैं।ये एक दूसरे को रसद पानी भी देते हैं                    धर्म के नाम धर्मांदता फैलाते हैं।इससे असिहष्णुता और जाहिलपन बढ़ता जा रहा है।

हिंदुत्व वीरों ने पिछले वर्षों में राम मंदिर के नाम खूब हिंसा का ताड़व किया।इसके चलते जगह जगह हिंसा हुई थी।हिंसक दंगों में तीन हजार से ज्यादा लोग मारे गये थे।अरबों रू.की संपत्ति नष्ट हुई।इसमें मुस्लिम कठमुल्लों ने भी मुस्लिम संप्रदाय में जमकर नफरती जहर भरा।यह अलग बात है कि सांप्रदायिक हिंसा का शिकार दोनों समुदायों के गरीब ही बने।शुक्र है, उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या प्रकरण का निपटारा कर दिया है।उम्मीद करनी चाहिए कि अब हिंदुत्व वीरों को कुछ ठंड़ आयेगी।भगवान राम जी का मंदिर ठीक से बनना भी शुरू नहीं हो पाया है, लेकिन हिंदुत्व के नाम पर मथुरा और काशी में टंटा खड़ा करने की हुंकारें शुरू हो गयी हैं।

स्वनामधन्य बाबा रामदेव और विनय कटियार जैसों ने मथुरा के कृष्ण मंदिर को मुक्त करने एलान किया है।संदेश साफ है कि ये जमात के स्वम्भू धर्म के नाम पर हिंदू मुस्लिम सियासत का कुत्सित खेल ही जारी रखेंगे।ताकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की तिकड़म  बरकरार रहे।चाहे देश भले बर्बर युग की तरफ लौट जाए!                             

ताजा मामला बेंगलुरु का है।मंगलवार की शाम यहां एक फेसबुक पोस्ट से सांप्रदायिक हिंसा फैल गयी।इस्लामी कठमुल्लों ने छोटी सी बात को हिंसक तूफान बना दिया।आरोप है कि कांग्रेसी दलित विधायक अखंड़ मूर्ति के एक रिश्तेदार ने एक पोस्ट साझा की थी,जिसमें पैगंबर के बारे में कोई आपत्तिजनक टिप्पणी थी।इससे धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं।कानून में इसके लिए सजा का प्रावधान है।आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई जा सकती थी।लेकिन धर्म के ठेकेदार कानून सम्मत काम करना तो जैसे अपनी तौहीन ही समझते हैं ।          

   इन्होंने ने ईश निंदा के नाम पर गरीब बस्तियों में मुसलमानों को जमकर भड़काया।रात में उन्मादी भीड़ को जुटाया।फिर विधायक के निवास पर धावा बोल दिया।जमकर तोड़फोड़ की।पूरे घर को जला दिया।घंटों ये हिंसक उन्माद चला।पुलिस ने हस्तक्षेप किया तो उन पर भी हमला बोला।साठ पुलिस वाले भी घायल बताए जा रहे हैं।पुलिस ने तीन दंगाइयों को गोलियों से मार डाला।               

  इस हादसे के बाद पूरे इलाके में सांप्रदायिक सियासत की हवा गर्म हो गयी है।कर्नाटक में भाजपा की सरकार है।राज्य के मुख्यमंत्री जी खुद हिंदुत्व सियासत के जानेमाने  चैंपियन हैं।अब सरकार को मौका मिल गया है ,वह अपनी पूरी सांप्रदायिक खुंदक निकाल लेगी।


जाहिर है ,इससे मुसलमानों का गरीब तबका और उत्पीड़ित होगा।इस तरह ये धर्मांद कठमुल्ले अपनी कौम के सबसे बड़े खलनायक बन गये हैं।समाज के समझदार लोग अब आगे आएं !इन सभी रंगों के पाखंडी कठमुल्लों का खुलकर विरोध करें।मेरी अपील है कि सेक्यूलर सोच वालों सभी से है,वे मुस्लिम कठमुल्लों की भी जमकर निंदा करें।मैं तो यहां इनकी निंदा कर ही रहा हूं।बिडंबना है कि दोनों तरफ तालिबानी ताकतें मजबूत हो रही हैं।क्योंकि हम अपने को समझदार मानने वाले भी सही मौकों पर चुप्पी साध जाते हैं।


जब तक समाज में उन्मादी तालिबानी ताकतें बढ़ती रहेंगी ,तब तक देश का सही मायने में उत्थान नहीं हो सकता।अब नागरिक समाज को बड़े बदलाव की पहल करनी होगी।ये काम कांग्रेस और भाजपा जैसे दल कतई नहीं कर सकते।भाजपा तो सांप्रदायिक सियासत से ही सत्ता की मलाई खा रही है। कांग्रेस भी दशकों तक बेशर्म तुष्टीकरण की नीति से मुस्लिम समाज को ठगती रही है।

इनकी स्थिति कांशीराम जी के शब्दों में कहें ,तो सांपनाथ और नागनाथ वाली रही है।दूसरे क्षेत्रीय क्षत्रप भी कोई अच्छी उम्मीद नहीं जगाते।वे तो दो कदम आगे बढ़कर जाति और गोत्र की राजनीति करते नजर आ रहे हैं।ऐसे में जरूरी है कि नागरिक समाज इन मगरूर नेताओं को कान पकड़कर सही रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करे।क्योंकि वोट का ब्रह्मास्त्र तो उसी के पास है।इसे चलाने का मौका है, दोस्तो!वर्ना फिर बहुत देर हो जाएगी!बहुत देर!........... 


कुमकुम की यादें / रतन भूषण

 कुमकुम भी चली गईं सबको करके पार 


अभी कुछ दिनों पहले ही अभिनेता धर्मेन्द्र ने एक हीरोइन के साथ वाली अपनी फोटो सोशल मीडिया पर डालकर यह खुलासा किया कि उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म की हीरोइन से ही कह दिया था कि मुझसे शादी करोगी? फ़िल्म का हश्र क्या हुआ और आगे की कहानी जानते हैं विस्तार से। बहुत कोशिश के बाद धर्मेन्द्र को 1960 में एक फ़िल्म मिली अर्जुन हिंगोरानी निर्देशित दिल भी तेरा हम भी तेरे। इसी से उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी, मगर फिल्म फ्लॉप रही। फिल्म की रिलीज के 58 साल बाद धर्मेंद्र ने फिल्म की लीड ऐक्ट्रेस कुमकुम को इस फ़िल्म के फ्लॉप होने के लिए जिम्मेदार ठहराया था। धर्मेंद्र ने अपना और हीरोइन कुमकुम का फोटो शेयर करते हुए ट्वीट किया और उस पर उन्होंने कैप्शन लिखा, मेरी मुख्तसर सी प्यारी सी हीरोइन कुमकुम। अपनी पहली ही फिल्म में मैं इनसे कह बैठा था दिल भी तेरा हम भी तेरे, लेकिन इनसे कुबूल न हुआ, शायद इसी वजह से यह फिल्म फ्लॉप हो गई।

धर्मेन्द्र की यह पहली फ़िल्म जरूर थी, लेकिन कुमकुम ने कई फिल्मों में काम किया था। वो बहुत सीनियर तो थी ही, संभव है, वे इस वजह से भी शादी के लिए राज़ी नहीं हुई हों। यह भी वजह हो सकती है कि तब उनकी स्थिति अच्छी नहीं थी, क्योंकि उनका अभिनय की दुनिया में आना मजबूरी था। वे तब मुसीबत की मारी थीं, परिवार का बोझ था, जिम्मेदारी थी। आइए जानते हैं, हमसे देर रात जुदा होने वाली अभिनेत्री कुमकुम के बारे में, जिन्होंने तमाम बड़े अभिनेताओं के साथ बहुत सी बड़ी और हिट फिल्मों में काम किया, लेकिन उनकी किस्मत में बड़ी हीरोइन कहलाना नसीब नहीं हुआ। बस उनका अभिनय सफर चलता रहा और वे फिल्में करती गईं।

अच्छा होगा कि कुमकुम पर फिल्माए गए कुछ गीतों को हम जान लेते हैं। इसके जरिये उन्हें याद करना आसान होगा। मेरा नाम है चमेली में हूं मालिन अलबेली..., घूंघट नहीं खोलूंगी सइयां तोरे आगे..., तेरा जलवा जिसने देखा वो तेरा हो गया..., दिल तोड़ने वाले तुझे दिल ढूंढ रहा है..., मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो..., कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र..., मधुबन में राधिका नाचे रे गिरिधर की..., मचलती हुई हवा के संग संग हमारे संग संग चले गंगा की लहरें... आदि।

अपने अभिनय सफर में कुमकुम ने कुल 112 फिल्मों में काम किया। यह नाम उन्हें कुछ फिल्मों में आने के बाद 1954 में मिला और वह फ़िल्म थी सोहराब मोदी की मिर्ज़ा ग़ालिब, जिसमें मुख्य भूमिका भारत भूषण और सुरैया की थी। कुमकुम का असली नाम है जेबुनिस्सा। उनका जन्म 22 अप्रैल 1934 को हुसेनाबाद, बिहार में हुआ था, जो अब शेखपुरा जिला में है। उनके पिता नवाब थे, उनकी काफी जायदाद थी। नाम था सैयद नवाब मंसूर हसन। कुमकुम की मां का नाम था ख़ुर्शीद बानो। कुमकुम को इस बात के लिए अक्सर डांट पड़ती थी कि उनका नाच गाने में मन लगता था, पढ़ने में नहीं। कुछ साल बाद वक़्त बदला और सरकार ने नवाबी खत्म कर दी और सारी जायदाद अपने कब्जे में ले ली। अब परिवार पर मुसीबत आ गयी। उनके कुछ परिजन कलकत्ता में रहते थे, तो वे भी वहां गए और वहां एक जायदाद थी, जिसे बेचकर कुछ वक्त गुज़ारा। यहीं नवाब साहब की एक महिला से संगत हो गयी, जिससे उन्होंने शादी कर ली और एक दिन कुमकुम और उनकी मां को छोड़ पाकिस्तान चले गए।

बचपन में किये शौकिया डांस को करियर बनाने के उद्देश्य से कुमकुम ने मां के साथ इरादा किया और रिश्तेदारों से कुछ पैसे लेकर बम्बई के लिए चल दीं।

बम्बई आने के बाद कुमकुम को कुछ लोगों ने यह सुझाव दिया कि फ़िल्म में काम करने के लिए सही से नाचना आना चाहिए, तो उन्होंने पंडित शम्भू महराज से कथक की ट्रेनिंग ली। 

कुछ समय बाद कुमकुम को पहली फ़िल्म मिली 1947 में शहनाई, जिसमें उनका बहुत छोटा काम था। चार और फिल्मों में छोटी भूमिकाएं करने के बाद उन्हें गुरुदत्त की फ़िल्म आर पार में टाइटल सांग करने को मिला, लेकिन इसमें क्रेडिट नहीं मिला। यह गीत पहले यह तय हुआ था कि हास्य कलाकार जगदीप पर फिल्माया जाएगा, पर गुरुदत्त ने कहा कि हम इसे किसी लड़की पर फिल्माएंगे। पर इस छोटी भूमिका को कोई हीरोइन करने को तैयार नहीं हुई, तो कुमकुम को लिया गया। इस गीत से वे चर्चा में आ गईं और इसी साल आयी मिर्ज़ा ग़ालिब से उन्हें नाम मिलना शुरू हो गया। कुमकुम ने मिस्टर एंड मिसेज 55, प्यासा, मिस्टर एक्स इन बॉम्बे, उजाला, फंटूश, सीआईडी, बसंत बहार, नया दौर, मदर इंडिया, शरारत, काली टोपी लाल रुमाल, कोहिनूर, दिल भी तेरा हम भी तेरे, सन ऑफ इंडिया, गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो, लगी नहीं छूटे राम, गंगा की लहरें, गीत, आंखें, ललकार, एक सपेरा एक लुटेरा, राजा और रंक आदि फिल्मों में काम किया और खूब नाम कमाया। उनके अभिनय और डांस को लोग आज भी याद करते हैं, जिसका क्रेडिट वे अपने गुरु पंडित शम्भू महराज को देती रहीं। भोजपुरी फ़िल्मों में भी उन्होंने काम किया और अच्छी चर्चा पाई।

1973 में कुमकुम ने सज्जाद अकबर खान से शादी कर ली, जो बिजनेसमैन थे और फिल्मों में काम करना पूरी तरह बंद कर दिया और सउदी अरब चली गईं। उनका मानना था, पैसा उतना ही कमाओ जितना खर्च कर सको और ज़िन्दगी जीने के लिए मुनासिब हो। पैसा हो और खर्च करने के लिये वक़्त ही न हो, तो ऐसे पैसे का क्या फायदा? काफी समय वहां रहने के बाद वे मुम्बई रहने आ गई थीं। उनकी एक बेटी हैं अंदलीब। तमाम हिट गीतों पर ठुमकने वाली अभनेत्री कुमकुम अब हमारे बीच नहीं हैं। वे कुछ दिनों से बीमार थीं। कल देर रात उनका निधन हो गया। 

-रतन भूषण