सोमवार, 28 मार्च 2016

मैं अपने दोस्तों का रसिया / अनामी शरण बबल





( सर मॉर्क टली अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाले एक मशहूर पत्रकार है। बीबीसी हिन्दी न्यूज सर्विस के दक्षिण एशिया प्रमुख टली भारत में ही रहते थे और एक सप्ताह में केवल घूमना और घूमते हुए ही सबसे पहले बीबीसी के लिए न्यूज देना ही इनका काम होता था। लगातार बातचीत होने वाले इनकी मित्रमंडली मे तमाम देशों के प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से लेकर समाज की मुख्यधारा में सबसे पीछे रह गए भी लोग शामिल थे ( और आज भी है) सर मॉर्क टली जिस सहजता सरलता और स्नेहपूर्वक मुझसे मिले और बहुत सारी पारिवारिक बातें भी हुई। उसके मद्देनजर यह मेरी उच्चश्रृंखलता ही मानी जाएगी कि मैने जिस अंदाज में लेख लिख मारा मानो वे मेरे लंगोटिया यार हो। मगर यही खूबी ही तो सर मॉर्क टली की सबसे बड़ी खासियत और ताकत हैं कि वे एक पत्रकार से भी बड़े और सरल ह्रदय के एक भावुक इंसान है। और इसी छवि के साथ ही तो तो वे भारत में रह रहे है. अमूमन भारत में इसी तरह के लोगो को महान कहा और माा भी जाता है। जिनमें रत्तीभर भी घंमड़ ना हो एेसी ही शांति के दूत की तरह मेरे मन में अंकित सर मॉर्क टली पर मेरा एक छोटा सा संस्मरण । )
 
करीब 12-13 साल पहले की बात । जब मैं एक बार बीबीसी न्यूज रेडियों के दक्षिण एशिया न्यूज ब्यूरो हेड सर मार्क टली से मिलने के लिए समय ले उनके घर जा ही धमका। क्या शाानदार हिन्दी हैं उनकी । फिर केवल सर टली की ही क्यों उनकी पत्नी जीलियस राईट (उनका नाम इस समय मैं भूल रहा हूं) की हिन्दी भी बहुत अच्छी है। खासकर बोलने का मीठा अंदाज से लगता मानो हर शब्द में गुड़ की सोंधी सी मिठास छलक रही हो। दोनों ने मेरा खिलखिलाकर स्वागत किया और एकदम घरेलू सदस्य सा सहज होकर बातें की। मैं हिन्दी बोलने में थोड़ा हिचक भी रहा था पर मेरी दुविधा भांपकर सर टली बोले मैं केवल हिन्दी में बात करूंगा यदि आपको हिन्दी नहीं आती है तो अंग्रेजी में बोल सकते हैं, मगर मेरा जवाब केवल हिन्दी में ही रहेगा। मुस्कुराते हुए सर टली ने कहा कि मुझे किसी हिन्दी जानने वाले भारतीय से अंग्रेजी में बात करने की तबियत ही नहीं करती। मेरे मन का झिझक और संकोच पूरी तरह से खत्म हो गयी थी और एक साथ हम तीनो खिलखिला कर बातचीत में लग गए।  करीब एक घंटे की मुलाकात में भारत, धर्म दर्शन भक्ति संतमत साहित्य कविता भारतीय सिनेमा से लेकर क्रिकेट और आतंकवाद आदि तमाम मुद्दो पर बातचीत से ज्यादा जिरह होती रही। खासकर दिवंगत प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी की हत्या पंजाब के खूनी मंजर समेत म्यांगमार में तानाशाह सत्ता और पाकिस्तान में दिवंगत राष्ट्रपति भुट्टो की फांसी देने की घटना का भी आंखो देखा हाल बयान करके सर टली ने मंत्र मुग्घ सा कर दिया। भारत के बारे में भी सर टली का ज्ञान अतुलनीय था। शायद बड़े बड़े फन्नेमार भारतीय ज्ञाता भी उनके सामने ज्यादा देर तक ना टिक पाए।
बीच में मैने उनसे पूछा कि टली साहब आप इंडिया में ही क्यों रह गए ? क्या आज कभी मन करता है कि काश आप वापस इंग्लैंड लौट ही जाते ?
 मेरे मन में मार्क टली के अलावा बीबीसी के तेजतर्रार संवाददाता  सतीश जैकब के प्रति भी बडी आस्था और सम्मान है। जब पंजाब जल रहा था ( उस समय भारत में तमाम खबरिया न्यूज चैनलों की पैदाइश भी नहीं हुई थी, और तब खबर माने जो बीबीसी बताए को ही सही और सच माना जाता था।) सर टली और सतीश जैकब ने मिलकर पंजाब संघर्ष पर प्रामाणिक किताब भी लिखी है। मेरे सवाल पर सर टली ने लंबी आह भरी, और बोले कि यार भारत छोड़कर जाऊंगा भी तो कहां ? एकदम मुठ्ठी ताने टली ने हंसकर कहा कि इंडिया जैसा देश पूरे संसार में नहीं है। आप यहां पर अकेला नहीं रह सकते, लोग आपके साथ जबरन संवाद करना चाहते हैं बोलना चाहते है, जुड़ना चाहते है। उन्होने कहा कि आप लोगों पर विश्वास करके तो देखिए अपना नुकसान सहकर भी वे लोग आपकी कसौटी पर खरा ही साबित होंगे। उन्होने कहा कि मेरे तो इंडिया में हजारों दोस्त हैं जो मेरे फोन नहीं करने पर या फोन नहीं आने पर शिकायत भी करते हैं। लोगों को पता लग जाए कि टली बीमार है तो घर में दर्जनों लोग हाल चाल लेने आ जाते है। कितना अपनापन प्यार और एक दूसरो को लेकर मन में चिंता रहती है। और यह सब केवल इंडिया में ही संभव है। अलबता पाकिस्तान में रह रहे अपने सैकड़ो मित्रों को भी वे इस मौके पर याद करना नहीं भूले। बकौल टली एक रेखा बना देने से भारत पाक अलग देश नहीं हो गए है, दोनो तरफ के लोगों में आपसी प्यार ललक और खैरियत की चिंता रहती है।. सर टली ने कहा कि मैं अपने दोस्तों के इस अनमोल खजाने को छोड़कर कहां जाउंगा। आज भारत ही मेरा मुल्क हैं, क्योंकि हम प्यार करना जानते है। बकौल टली भारत में रहने का केवल यही लालच है कि जब मेरी मौत भी आएगी तो मेरे चाहने वाले मुझे प्यार करते रहेंगे। मुझे भी एक भारतीय परिवार का हिस्सा माना जाएगा। यह भूमि ही इतनी सुदंर और प्यारी हैं कि इसको छोड़कर जाने की कहीं तबियत नहीं करती। 
इसी दौरान श्रीमती टली सामान्य शिष्टाचार वश हम तीनों के लिए चाय के संग कुछ नमकीन और मिठाईयां लेकर आती है। मै उनकी तरफ मुखातिब होते हुए पूछा कि आप अपने नाम के साथ टली क्यों नहीं जोड़ती? सवाल सुनते ही मानो उन्हें किसी बिच्छू ने काट खाया हो। एकदम सावधान मुद्रा में खड़ी होकर बोली नईईईईईईई। मैं क्यों टली को नाम के साथ लेकर चलूं। टली ही जब मेरा है,तो फिर नाम को बिगाड़ने की क्या जरूरत है। मैं उनसे और बाते करना चाह रहा था, मगर उन्होने कहा कि अभी आप टली से बात करे फिर कभी मेरे से बात करने आइए तो हमलोग बहुत सारी बातें करेंगे। फिर मुस्कुराते हुए वे चली गयी। ताकि बात में कोई खलल ना हो। 
सक्रिय पत्रकारिता से सर टली को अलग हुए करीब दो दशक से भी ज्यादा समय हो चुका है। बकौल टली  इसके बावजूद आज भी मेरे नंबर पर (जबकि नंबर तो कई बदल गये है फिर भी) दूर दराज इलाके से कोई फोन आता है तो सामने वाला बंदा बताता है टली साहेब आपको याद है न जब 1982 में आप खड़गपुर में आए थे या 1988 में जब अयोध्या में आए थे तो मैंने ही आपको अपनी मोटरसाईकिल पर ही बैठाकर फैजाबाद ले गया था। या फिर कोई फोन बनारस से कि टली साहब आपको याद है न जब आप गंगा में नहा रहे थे तो मैं ही आपके सामान की देखभाल कर रहा था। इसी तरह की अमूमन किसी घटना या शहर की याद दिलाते हुए ज्यादातर लोग एकाएक फोन करके यह मानते हैं कि टली को सब याद ही होगा। लाचारगी से हंसते हुए सर टली ने कहा कि एकाएक तो मुझे किसी घटने की याद नहीं आती, मगर सामने वाले का मन रखना पड़ता है। खड़े होकर फिर खिलखिला कर बोले कि जब वाकई में उसकी याद मेरे मन में घूमने लगती है तो इधर से मैं ही फोन करके उसका हाल चाल पूछ लेता हूं। 
ज्यादातर लोग तो मेरे फोन करने से ही इस कदर निहाल हो जाते हैं मानो उन्हें कोई खजाना मिल गया हो। संबंधों में इतनी उष्मा उर्जा इतनी तपिश और रिश्ते को बनाए रखने का इतना मोह केवल भारत में ही मुमकिन है और मुझे भारतवासी होने पर गर्व है।

मित्रों, अब कुछ मेरी बात भी।  मैं  सर मार्क टली का कोई किस्सा नहीं सुना रहा था, कि आपलोग दीवाने हुए जा रहे है। मै इसके बहाने यह बताना चाह रहा हूं कि भले ही मैं सर मार्क टली जैसा पत्रकारों का पत्रकार ना बन सकूं (क्योंकि यह अब मेरे हाथ में हैं भी नहीं) पर मैं भी एक नेकदिल निहायत शरीफ ( मगर, शरीफा जैसा पिलपिला भी नहीं) और मस्त आदमी जरूर बनना चाहता हूं। मैं खुद अपने सहित सबों से प्यार करता हूं। पेड़ पौधों से लेकर जीव जंतु पशु तक और मजदूर से लेकर अपंग और समाज के सबसे नीचले पायदान पर खडे रामू से लेकर काकू तक मेरे प्यार के सागर में समा जाते है। अपने तमाम सगे संबंधियों रिश्तेदारों नातेदारों सहित दूर दराज के सगों समेत अडोस पडोस के लोगों से भी मैं दिल (फेक कर नहीं)  खोलकर ही प्यार करता हूं। ( मैं नफरत भी करता हूं लोगों से मगर किससे  यह फिर कभी लिखा जाएगा) 
अपने बारे में मैं अपनी ही एक कविता का सहारा ले रहा हूं जिसे मैंने करीब 25-30 साल पहले ही कभी लिखी थी। 
मैं अकेला नहीं/

 मैं कभी अकेला नही होता /
 जो खामोश रह जाऊं /
 खामोशी से सह जाऊं सबकुछ /
 मेरे भीतर बसते हैं करोड़ो लोग / 
फिर भला, 
 मैं कैसे रह सकता हूं खामोश। 

तो मेरे तमाम मित्रगण मैं भी अपने दोस्तों का रसिक हूं, रसिया हूं, मगर,(छलिया नहीं)। मैं आदमी को आदमी की तरह प्यार करता हूं। और दोस्तों के बारे में मशहूर पत्रकार सर मार्क टली की ये अनमोल बाते मुझे सदैव प्रेरित करती है। 

अनामी शरण बबल 

50 साल से निकल रही है त्रैमासिक पत्रिका संबोधन








कमर मेवाडी जी के संबोधन को सलाम  

अनामी शरण बबल

राजस्थान के वरिष्ठ साहित्यकार और संबोधन त्रैमासिक पत्रिका के संपादक कमर मेवाड़ी को मैं नहीं जानता हूं अलबत्ता साहित्यिक पत्रिका हंस में अक्सर संबोधन पत्रिका का एक विज्ञापन जरूर देख लेता था.। दर्जनों दफा संबोधन के विज्ञापन को देखने के बावजूद इसको लेकर मन में कोई दिलचस्पी नहीं जगी। एकाएक हंस के ही किसी अंक में जब इसके 50 साल से लगातार प्रकाशित होने वाली पत्रिका संबोधन के विज्ञापन पर जब मेरी नजर गयी तो मेरा माथा ठनका कि संबोधन और 50 साल । मैं पहले तो अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं पाया कि कमाल है एक साहित्यिक पत्रिका के 50 साल हो गए और मेरे पास इसका कोई एक भी अंक नहीं है। मैं खुद को थोडा शर्मसार और अबोध सा पा रहा था। मेरे भीतर इस कमर मेवाड़ी नामक साहित्यकार संपादक को लेकर बड़ी जिज्ञासा जगी कि आखिरकार यह हैं कौन जो इतनी शांति और एक तपस्वी की तरह किसी पत्रिका को 50 साल तक प्रकाशित करने के बाद भी खुद को पर्दे के पीछे ही रखते हैं। संबोधन पत्रिका के प्रेम विशेषांक को देखने और अपने पास होने की लालसा बढ़ गयी और मैं किसी भी कीमत पर संबोधन से जुड़ने के लिए लालयित सा हो गया। मेरी उत्कंठा को हवा दी मातृभारती ईबुक लाईव करने वाले डिजिटल प्रकाशक महेन्द्र शर्मा जी ने। वे तमाम प्रेम कहानियों को पुस्तिका के रूप में लाईव करना चाहते थे। हालांकि यह अभी तक तो तय था कि राजसमंद में जाकर इस आयोजन का साक्षी बनू, पर यह मुमकिन नहीं हो सका अलबत्ता मेरे और महेन्द्र शर्मा के मन में अभी भी यह लालसा जीवित है कि संबोधन परिवार से एक बार मिलना बहुत जरूरी सा है। यह कभी भी हो सकता है कि एकाएक  कभी भी मेवाड़ी जी से मिलने मैं राजसमंद पहुंच कर ही दम लूं।
किसी भी जगह से किसी पत्रिका या अखबार को निकालना सरल नहीं होता । बड़ी मेहनत और दिन रात की मेहनत के बाद 10-15 अंक निकलना भी कठिन नहीं होता, क्योंकि मन में लगन जेब में धन और  विज्ञापनों से मिलने वाले धन का आश्वासन जीवित रहता है। मगर चार से आठ माह गुजरते- 2 उत्साह चूकने लगता है, पत्रिका के साथ जुड़े संगी साथी भी छिटकने लगते हैं। यानी तम मन और धन के साथ जुड़ने वाले लोगों की टीम बिखरने लगती है और उस पर पूरे उत्साह और बढ़ चढ़कर धन की मदद और विज्ञापन देने वाले तमाम सज्जन लोग भी कन्नी काटने लगते है। यानी चार छह माह पहले तक कुछ कर गुजरने की सारी योजनें धीरे धीरे खंडित होने लगती है। छोटे शहर मे कम लोगो और सीमित संकुचित साधन संसाधनो के बीच पत्रिका को चलाना नाको चने चबाने से भी कठिन है, फिर कांकरटोली राजसमंद से संबोधन के भविष्य को लेकर सपने देखना भी मुंगेरीलाल के हसीन सपनो जैसा ही था।  मगर कमाल के आप हो कमर मेवाड़ी जी, फिर आप और आपकी पूरी टीम ही वंदनीय है जो किसी न किसी तरह 50 सालो मे कम होने की बजाय कारवां बढ़ता ही चला जा रहा है। यहां पर मैं संबोधन से ज्यादा इस परिवार के महत्व पर ज्यादा जोर दूंगा कि सारे लोग भले ही संबोधन के सूत्र में बंधे है। पर इनके कारण ही संबोधन को यह गौरव प्रतिष्ठा और मान सम्मान मिला। निजी प्रयासों से अपने बूते संबोधन भारतकी पहली पत्रिका है जिसके जीवन में 50 वसंत आए। भले ही संबोधन को नहीं देखा था पर मैं इससे एक सहोदर  देख रहा था। भले ही मेरा सही जन्म वर्ष नवम्बर 1965 की हो ,मगर सरकारी जन्म तो फरवरी 1966 की ही है । इस लिहाज से मैं और संबोधन की आयु करीब करीब एक समान ही है। संबोधन को देखने की ललक को पूरा करने के लिए कमर मेवाड़ी जी से बात करने के सिवा और कोई दूसरा रास्ता जो न था (क्योंकि लघु पत्रिकाओं के प्रकाशन के बाद सभी जगह वितरण की व्यवस्था करना भी तारे तोड़ने के बराबर है। हंस में ही कमर जी का मोबाइल नंबर था और मैने फटाक से फोन करके संबोधन को देखने और इसकी कहानियों को ईबुक में करने की बात रखी। मैने इनसे कहा कि 25 कहानी हैं तो संबोधन को मातृभारती 25 हजार रूपए बतौर पारिश्रमिक भी देगी। मेरी बात सुनते ही कमर जी ने दो टूक कहा कि आप मुझे क्यों देंगे जो लेखक है पारिश्रमिकत आप सीधे उसको दीजिए। इस पर मैने कहा कि मैं कहा कि 25 लोगों के ईमेल और बैंक खाते मंगवाना जटिल काम है  इससे ज्यादा भला है कि सीधे संबोधन के खाते में राशि डाल दी जाए। , मगर पैसे के भुगतान को लेकर कमर जी ने खुद को अलग कर लिया। एक साधनहीन पत्रिका के संपादक की धन को लेकर यह ईमानदारी चकित करती है । खैर अंतत मेवाड़ी जी ने मुझे भी इस मौके पर बुलाया कि खुद आकर इस पत्रिका के परिवार को देखिए, मगर यह संभव ना हो सका।( शायद दो एक माह में कांकरटोली जाना मुमकिन हो)
मेवाड़ी जी से बात करके अपना नाम बताया और संबोधन पत्रिका की एक प्रति की मांग रखी। बिना किसी हिल हुज्जत के उन्होने मेरा पता नोट किया और नौ मार्च को पत्रिका और अपनी कहानियों की एक किताब जिजीविषा और अन्य कहानियां पंजीकृत डाक से भेज दी। मगर हाय री मोदी जी कि भारतीय डाक (Indian post) कि 18 मार्च को पता करने पर ज्ञात हुआ कि अभी तक तो कोई पंजीकृत डाक आयी ही नहीं है, मगर 19 मार्च को डाकिया एक चेकबुक को लेकर घर पर आकर बताया कि आपकी किताब आ गयी है, पर पत्ता गलत लिखा है। मैने उससे बकझक भी की। खैर सोमवार 21 मार्च को आखिरकार कल्याणपुरी डाकघर में जाकर संबोधन पत्रिका को अपने हाथों में लिया। मै बता नहीं सकता कि संबोधन को देखकर कितनी खुशी हुई।  यह महज एक पत्रिका नहीं थी बल्कि एक इतनी दुर्लभ पत्रिका का एक खास अंक है जिसके लिए संबोधन और इसके सदस्यों को 50 साल तक श्रम करनी पड़ी थी। सरकारी खर्चे पर तो आजकल समेत प्रकाशन विभाग की कई पत्रिकाएं 65-70 साल से निकल रही है , मगर 1966 में एक पत्रिका का स्वप्न देखने वाले युवा लेखक कमर मेवाड़ी की जिस लगन समर्पण और संबोधन को भी अपने बच्चों की तरह ही देखभाल करने की अदम्य लालसा का ही यह फल है कि आज भले ही श्री कमर मेवाड़ी 78 साल के बुजुर्ग हो गए , मगर इनकी देखरेख और संरक्षण में पचासा का हो गया संबोधन तमाम साहित्यकारों लेखको को हैरत में डाल देता है। अपने बूते किसी पत्र- पत्रिका को जीवित रखने का दो उदाहरण मेरे मन को हमेशा रोमांचित करता है। फैजाबाद से प्रकासित जनमोर्चा अखबार निकालने वाले श्री शीतला सिंह जी ने इस अखबार को करीब 40 साल से अपने बूते अपने कंधे का आसरा दे चला रहे हैं तो औरंगाबाद बिहार के बारून से नवबिहार टाईम्स नामक एक साप्ताहिक अखबार निकालने वाले कमल किशोर ही वह दूसर उदाहरण हैं जिन्होने धन्ना सेठों पूंजीपतियों की मदद के बगैर ही अपने बूते चलाया। साधन संसाधन जुटाकर नवबिहार टाईम्स की उम्र को 25 साल करने वाले कमल किशोर की यह एक बडी उपलब्धि है।
पत्रिकाओं की बात करे तो अपने बूते   (हालांकि पर्दे के पीछे कई अमीर लेखकों का सहारा था) हंस पत्रिका को जाने माने साहित्यकार राजेन्द्र यादव जी ने 25 साल तक निकाला (अब हमारे बीच यादव जी नहीं हैं तो पत्रिका के संपादन का जिम्मा गया बिहार के धन्ना करोड़पति लेखक रंगकर्मी  और कथाकार संजय सहाय संभाल रहे हैं। श्री संजय के हाथों निसंदेह हंस का भविष्य सुरक्षित है। जब बात हंस की निकल ही गयी है तो यहां पर मैं बता दूं कि जिस हंस पत्रिका को हमलोग प्रेमचंद की पत्रिका हंस मानकर इसको पुर्नजीवित करने का जो श्रेय और गौरव राजेन्द्र यादव एंड पार्टी आज तक देते रहे है, वह केवल एक पक्ष है,  सच कुछ और है। 2005-06  के दौरान मैं अमर उजाला अखबार में दिल्ली का मुख्य संवाददाता था। संयोग से अमर उजाला और हंस पत्रिका का दफ्तर एकदम पास में ही था। इस दौरान यादव जी से मेरी ठीकठाक दोस्ती हो गयी थी। वे हमेशा मुझसे कहते तुम अपनी कहानी दो मैं अगले ही अंक में छापता हूं, जिसे मैं अक्सर यह कहकर टाल देता कि आपको लड़कियों और महिला लेखको के उद्धार से मौका मिले तब ना।
 हां तो मैं हंस पत्रिका के बारे में बता दूं कि हंस का नाम प्रेमचंद के परिजनों से लेने की बजाय राजेन्द्र यादव जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज की वार्षिक पत्रिका हंस के नाम को साभार किया था। यह मेरे लिए बड़ी खबर थी लिहाजा मेरा पत्रकार मन इसको न्यूज बनाने के लिए आतुर हो उठा और राजेन्द्र यादव की सहमति के बाद अमर उजाला के सभी एडिशन में यह खबर छपी कि प्रेमचंद का नहीं हंसराज कॉलेज की पत्रिका है राजेन्द्र यादव का हंस  इस खबर को लेकर बड़ी चर्चा भी रही तो वहीं मैने यादव जी की कॉफी के साथ करीब एक घंटे तक खूब मस्ती की।
यादव जी से मेरा कोई प्यार भरा नाता नहीं था कई बार मैने जमकर आलोचना भी कि मगर हर बार खिलखिला कर हर बात को मस्ती में उड़ा देने की आदत मेरे को हमेशा अचंभित करती थी। जब हंस के 25 साल पूरे हे तो मैने अपना सिर यादव जी के चरणों पर रख दिया और निवेदन किया कि मेरी अब तक की गलतियों  नादानियों को माफ कर देंगे आपने एक पत्रिका को 25 साल तक निकाल कर तमाम पूंजीपतियों को शर्मसार कर दिया।  आपने तो यादव जी एक इतिहास ही रच डाला है। मेरी बात सुनकर वे खुश हुए और गले से लगाते हुए कहा कि चलो तुम खुश हुए तो मोगैंबों भी खुश हुआ।. यह सुनते ही आस पास के लोग ठठाकर हंसने लगे।  
मगर यहां पर संबोधन के संपादक श्री कमर मेवाड़ी जी तो अपने मित्र राजेन्द्र यादव से भी चार कदम आगे निकले। दिल्ली मे रहते हुए जाने अनजाने में हंस दफ्तर एक मठ बन गया था, जहां पर अपनी कहानियों के प्रकाशन के लिए बेताब लेखक लेखिकाओं की फौज यादव के इर्दगिर्द रहती थी। वे इस ग्लैमर को जानते मानते और पहचानते हुए भी अपनाते थे। लिटरेचर ग्लैमर के बीच भी यादव जी ने इतनी आजादी दे रखी थी कि कोई भी आकर सीधे अपनी बात (चाहे कैसी भी हो ) रख और कर सकता था।
 अजीब संयोग है कि मैं अपनी बात संबोधन पर केंद्रित करने के बाद भी हमेशा भटक सा ही जा रहा हूं। पत्रिका की अन्य अंकों तो देखने का सुयोग मुझे नहीं मिला है मगर एक ही अंक में जिस नियोजित तरीके से प्रेम कहानियों का चयन किया है और उसमें एक ही साथ तीन तीन पीढ़ियो के लेखको को एक ही साथ एक ही कवर में देखना ही इस अंक की सबसे बड़ी खासियत बन जाती है।  किसी भी आदमी के जीवन के 50 साल का बहुत महत्व होता है। लगभग 70 प्रतिशत जीवन गुजारने के बाद ही उम्र के 50 वे बसंत का सुयोग हासिल होता है। इस दौरान बाल्यावस्था, किशोरावस्था, यौवनकाल के उपरांत आदमी 45 बसंत के बाद ढलान पर आ जाता है। पच्चास को तो अधेडावस्था कहना ही होगा। इस दौरान एक आदमी को रोजाना नाना प्रकार की दिक्कतों संकटो विपतियों संघर्षो उपलब्धियों से लेकर अपने मंसूबों को पूरा करता है। ठीक संबोधन भी आज अपनी तमाम हसरतो के साथ 50 वें बंसत पर इतरा रहा होगा।
संबोधन के यौवन को देखकर वाकई बहुतों के दिल में छूरी भी चल गयी हो तो हैरानी नहीं क्योंकि इसको मंजिल से भी आगे ले जाने वाले मेवाड़ी जी का नाम आज भी बिना ग्लैमर के अनजान सा ही है। अपनो को फोकस करने की बजाय संबोधन को ही लगातार सर्वोच्च प्राथमिकता देना और अपने साथ जुड़े लोगों की टोली को कांकरटोली में एक साथ रखना भी  हैरान करता है। लगता है कि कांकरटोली नाम के साथ ही इसको यह वरदान भी हासिल है कि जमाना भले ही कितना  आगे क्यों ना चला जाए, लोग भले ही अपने आप को भूल जाए,संयुक्त परिवार के टूटन का असर भले ही आदमी और आदमी तथा रिश्तों को केवल घर और बिस्तर तक ही समेट दे। लोग खून के रंग को भूलने की दुहाई देने लगे मगर कांकरटोली से प्रकाशित संबोधन परिवार की टोली सदैव एकसूत्र में ही बंधी और जुड़ी रहेगी ।  
 यह संबोधन पत्रिका  अब किसी एक कमर मेवाडी जी की अपनी पत्रिका नहीं  रह गयी है। इसे अब पूरे शहर की पत्रिकाकी तरह देखा जाना ही सही होगा।  जिसे टीवी पर अपनी दुकान के विज्ञापन की तरह कांकरटोली राजसमंद के हर घर की यह अपनी पत्रिका की तरह मान्य और स्वीकार्य होने की जरूरत है। पूरे शहर को अब सोचना होगा कि संबोधन  बगैर कमर मेवाड़ी जी के संरक्षण के बाद भी किस तरह और कैसे चलेगी ?  मेवाड़ी जी तो एक योद्धा की तरह मैदान फतह कर ली है। उन्होने अपनी पारी खेल दी है।  मगर अब संबोधन के मार्फत इस कांकरटोली राजसमंद शहर के लोगों को संबोधन की मान प्रतिष्ठा रखनी होगी। बात दूर तलक जाएगी कि तरह ही संबोधन को संबोधित मेरा पत्र भी काफी लंबा हो गया है। खुद को विराम देते हुए मैं चचा गालिब के कुछ शेर के साथ श्री कमर मेवाडी को सलाम करना पसंद करूंगा। .
बकौल गालिब
मुहब्बत में नहीं है फर्क , जीने और मरने का ।   
उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफिर पे दम निकले।।
जरा कर जोर सीने पर कि तीरे-पुर-सितम निकले।
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले ।।.
हजारों ख्वाहिशे ऐसी, कि हर ख्वाहिश पे दम निकले ।
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले ।।


अनामी शरण बबल
पॉकेट- ए-3/154 एच
मयूर विहार फेज 3
दिल्ली- 110096
asb.deo@gmail.com
011-22615150 08882080458








  

रविवार, 13 मार्च 2016

टेलीविजन पत्रकारिता के रोचक तथ्य


Interesting facts about Television (in Hindi)


टीवी की कहानी 1830 से अब
तक...
http://khirodhar.heck.in

1. 1830 में थाम्स एडिसन और ग्राहम
बेल ने आवाज और फोटो ट्रांसफर करके
दिखाया।
2. 1907 में पहली बार 'टेलिविजन'
शब्द आस्तित्व में आया। और
डिक्शनरी में जोड़ा गया।
3. 1924 में जाॅन ब्रेड ने पहली बार
छायाचित्रो को मूव किया।
4. 1933 में हफ्ते में 2 बार प्रोग्राम
टीवी पर आना शुरू हुआ।
5. 1936 तक दुनिया में लगभग 200
टेलिविजन सेट इस्तेमाल होने लगे।
तब 12 इंच की टीवी स्क्रीन के साथ
बड़े-बड़े उपकरण आते थे।
6. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान टेलिविजन
का इस्तेमाल बढ़ गया। इस समय
टीवी प्रचार करने वाली मशीन की
तरह इस्तेमाल होने लगी। टेबलटाॅप
और कंसोल दो तरह के माॅडल प्रचलन
में आए।
7. पूरी तरह से कलर टीवी प्रसारण
1953 में अमेरिका में ही शुरू हुआ।
8. 1956 में राबर्ट एडलर ने पहला
रिमोट कंट्रोल बनाया।
9. 1962 में AT&T कंपनी ने
टेलीस्टार लाॅन्च किया।
0. 1967 के आसपास अधिकतर
प्रोग्राम कलरफुल आने लगे।
1. 1969 में 'अपोलो 11' पहला
प्रोग्राम ब्राॅडकास्ट हुआ। जिसे
600 मिलियन लोगो ने देखा।
2. 1973 में टीवी की स्क्रीन को और
बड़ा कर दिया गया। इस समय टीवी
का वजन काफी ज्यादा हुआ करता
था।
3. वर्ष 1976 में भारत में टीवी
प्रसारण को ऑल इंडिया रेडियो से
अलग किया गया।
4. 1980 में टीवी के साथ वीसीआर,
गेम्स आदि आने लगे। इसे टीवी की
पॉपुलैरिटी और बढ़ती गई। रिमोट
वाले टीवी ने दस्तक दी और
लोकप्रिय हुए।
5. 1990 के बाद टेलिविजन में कई
बदलाव आए। टीवी का साइज और
क्वालिटी बेहतर हुई। इसी समय
LCD और प्लाज्मा जैसी टेक्नोलाॅजी
के साथ भी एक्सपेरिमेंट चल रहा था।
6. 2000 के बाद VCR की जगह DVD
प्लेयर इस्तेमाल होने लगा। कई
कमर्शियल चैनल आए और टीवी का
स्वरुप बदल गया। अब इडियट बॉक्स
से टीवी स्मार्ट बन गया।
7. 2000 के बाद अब जमाना स्मार्ट
टीवी का है। अल्ट्रा UHD,
बेन्डेवल, 4K, 3D, LCD/LED टीवी
अब ना सिर्फ मनोरंजन का काम कर
रहे है, बल्कि कम्पयूटिंग और
कनेक्टिविटी के लिए भी इस्तेमाल
किए जा रहे है।
8. भारत में टेलीविजन प्रसारण की
शुरुआत दिल्ली से 15 सितंबर,
1959 को हुई थी। 1972 तक
टेलीविजन की सेवाएं अमृतसर और
मुंबई के लिए बढ़ाई गईं। 1975 तक
भारत के केवल सात शहरों में ही
टेलीविजन की सेवा शुरू हो पाई थी।
भारत में कलर टीवी और राष्ट्रीय
प्रसारण की शुरुआत 1982 में हुई।
http://khirodhar.heck.in
Share on Facebook Share on Twitter

Comments

No comments yet. Why not make the first one!

New Comment

[Sign In]
Name:

Comment:
(Some BBCode tags are allowed)
Posted by Khirodhar Choudhary on 12:24 PM, 20-Aug-15 • Under: Interesting facts
टीवी की कहानी 1830 से अब
तक...
http://khirodhar.heck.in

1. 1830 में थाम्स एडिसन और ग्राहम
बेल ने आवाज और फोटो ट्रांसफर करके
दिखाया।
2. 1907 में पहली बार 'टेलिविजन'
शब्द आस्तित्व में आया। और
डिक्शनरी में जोड़ा गया।
3. 1924 में जाॅन ब्रेड ने पहली बार
छायाचित्रो को मूव किया।
4. 1933 में हफ्ते में 2 बार प्रोग्राम
टीवी पर आना शुरू हुआ।
5. 1936 तक दुनिया में लगभग 200
टेलिविजन सेट इस्तेमाल होने लगे।
तब 12 इंच की टीवी स्क्रीन के साथ
बड़े-बड़े उपकरण आते थे।
6. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान टेलिविजन
का इस्तेमाल बढ़ गया। इस समय
टीवी प्रचार करने वाली मशीन की
तरह इस्तेमाल होने लगी। टेबलटाॅप
और कंसोल दो तरह के माॅडल प्रचलन
में आए।
7. पूरी तरह से कलर टीवी प्रसारण
1953 में अमेरिका में ही शुरू हुआ।
8. 1956 में राबर्ट एडलर ने पहला
रिमोट कंट्रोल बनाया।
9. 1962 में AT&T कंपनी ने
टेलीस्टार लाॅन्च किया।
0. 1967 के आसपास अधिकतर
प्रोग्राम कलरफुल आने लगे।
1. 1969 में 'अपोलो 11' पहला
प्रोग्राम ब्राॅडकास्ट हुआ। जिसे
600 मिलियन लोगो ने देखा।
2. 1973 में टीवी की स्क्रीन को और
बड़ा कर दिया गया। इस समय टीवी
का वजन काफी ज्यादा हुआ करता
था।
3. वर्ष 1976 में भारत में टीवी
प्रसारण को ऑल इंडिया रेडियो से
अलग किया गया।
4. 1980 में टीवी के साथ वीसीआर,
गेम्स आदि आने लगे। इसे टीवी की
पॉपुलैरिटी और बढ़ती गई। रिमोट
वाले टीवी ने दस्तक दी और
लोकप्रिय हुए।
5. 1990 के बाद टेलिविजन में कई
बदलाव आए। टीवी का साइज और
क्वालिटी बेहतर हुई। इसी समय
LCD और प्लाज्मा जैसी टेक्नोलाॅजी
के साथ भी एक्सपेरिमेंट चल रहा था।
6. 2000 के बाद VCR की जगह DVD
प्लेयर इस्तेमाल होने लगा। कई
कमर्शियल चैनल आए और टीवी का
स्वरुप बदल गया। अब इडियट बॉक्स
से टीवी स्मार्ट बन गया।
7. 2000 के बाद अब जमाना स्मार्ट
टीवी का है। अल्ट्रा UHD,
बेन्डेवल, 4K, 3D, LCD/LED टीवी
अब ना सिर्फ मनोरंजन का काम कर
रहे है, बल्कि कम्पयूटिंग और
कनेक्टिविटी के लिए भी इस्तेमाल
किए जा रहे है।
8. भारत में टेलीविजन प्रसारण की
शुरुआत दिल्ली से 15 सितंबर,
1959 को हुई थी। 1972 तक
टेलीविजन की सेवाएं अमृतसर और
मुंबई के लिए बढ़ाई गईं। 1975 तक
भारत के केवल सात शहरों में ही
टेलीविजन की सेवा शुरू हो पाई थी।
भारत में कलर टीवी और राष्ट्रीय
प्रसारण की शुरुआत 1982 में हुई।
http://khirodhar.heck.in
Share on Facebook Share on Twitter

Comments

No comments yet. Why not make the first one!

New Comment

[Sign In]
Name:

Comment:
(Some BBCode tags are allowed)