शनिवार, 19 दिसंबर 2020

आर्ट आफ टेलिंग लाई😊😊/ विमल विनोद यादव

 ☺☺ आर्ट आफ टेलिंग लाई😊😊

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क्या झूठ बोलना भी एक कला है?(इज टेलिंग लाई अ नैचुरल आर्ट)-

माँ कसम, सच्च में, तेरी कसम , विद्या कसम ,दोस्ती कसम,विश्वास नही है, जबान का पक्का हूँ, वादा रहा, झुकने नही दूंगा या अपने सबसे प्रिय के सिर पर हाथ रखना ,भारत माँ की कसम आदि-आदि। शायद झूठ के पर्यायवाची ही हो सकते है क्योकि जब भी हम इस विशेषण का प्रयोग करते है अनायास ही इन उपरोक्त में से अपनी सुविधा या समायानुकूलता के आधार पर किन्ही एक शब्द का चयन कर अपने स्वार्थ सिद्धि की पूर्ति हेतु सामने वाले को विश्वास में लेने का प्रयत्न करते है या ले लेते है चाहे यह प्रयत्न बाद में सामने वाले के आशाओं के अनुरूप न हो को ही झूठ कहा जा सकता है 


ये कोई सामान्य कला नहीं है जिसमे हर कोई पारंगत हो इसके लिए भी तजुर्बे और अद्भुत आत्मविश्वाश की आवश्यकता होती है क्योंकि निश्चित तौर पर ही जिसे विश्वास में लिया जा रहा है और उसके ऊपर यह कला सिद्ध करना है उसे आंतरिक और वाह्य रूप से परखने ,पढ़ने,अपने अनुरूप ढालने की कला का होना आवश्यक है अन्यथा आपका भेद कब खुल जाए हमेशा संसय बना रहता है इस कला से किसी का प्राण भी बच सकता है तो किसी का जा भी सकता है कोई तोअपने इस कला में पारंगत होने के कारण राज्य का उत्तराधिकारी बन जाता है तो किसी के हाथ आयी सत्ता उसके हाथ से निकल जाती है।


ऐसा नहीं है कि यह कला किसी विद्यालय या अन्य माध्यम से दी जाती है यह प्रायोगिक और समय के अनुरूप प्रयोगकर्ता के स्वविवेक और उसकी अपनी परिस्थितियों के कारण उसे इस कला में परिपक्व व निपुणता प्रदान करती है और उसे झूठ बोलने में महारत दिलाती है ।शैशवावस्था में -

"जॉनी जॉनी यस पापा इटिंग शुगर नो पापा" 

वाले में महारत दिलाता है तो स्कूल समय मे गृहकार्य न पूर्ण होने के कारण अध्यापक से पीटने से बचने के लिए प्रयोग किये गए विशेषण भी इस कला को मजबूती दिलाता है।फिर पिताजी से कॉपी किताब के नाम पर पैसे लेकर अपने बाल्यावस्था के आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया प्रयास भी इस कला के प्राइमरी स्तर पर तो सिनेमा घरों में चलचित्र देखने का प्रयास माध्यमिक स्तर पर इस कला में निपुणता दिलाने में सहायक होता है। आगे तो जिसका जितना प्रयास उसको उतनी सफलता।झूठ के भी अपने प्रकार होते है जिनका निर्धारण भी हो सकता है तभी तो किसी ने कहा है -

"झूठ बोले कौआ काटे"

तो किसी ने कहा है

"सजन रे झूट मत बोलो पिया के पास जाना है" 

जैसी जरूरत वैसा झूठ- 

"पल भर के लिए कोई प्यार कर ले झूठा ही सही" 


आदि विभिन्न झूठ समाज मे अहम जिम्मेदारी के साथ समाननन्तर रूप से अपने उपस्थिति को दर्शता है और बताता है कि नहीं झूट बोलना भी एक कला है जिसका ऊपयोग एक मानसिक रूप से मजबूत इंसान ही बखूबी कर सकता है अन्यथा यदि आप अपने किसी महिला मित्र के साथ किसी रेस्तराँ में बैठे है और आपका फोन बज जाता है आपके फोन रिसीव करते ही श्रीमती जी कड़क आवाज में पूछती है कि कहाँ हो और आप समयानुकूल झूठा प्रत्युत्तर नही दे पाते है तो आपके पास सबकुछ होते हुए भी पप्पू बन जाते है और यदि उपरोक्त विशेषणों में से किसी एक विशेषण का प्रयोग करते हुए बच निकलते है तो चाचा चौधरी बन जाते है।


अब आप यदि यह सोच रहे होंगे कि अब तो मैं भी उपरोक्त विशेषणों को याद कर अपने आप को चाचा चौधरी घोषित कर लें तो ये इतना आसान भी नही है उसके लिए आपको उच्चतम दर्जे का झूठा बनना पड़ेगा। ये तो अभी माध्यमिक स्तर के झूठे बनने की योग्यता है। जब आप ग्रामीण स्तर फिर जिला स्तर और प्रेदेश स्तर से होते हुए राष्ट्रीय स्तर पर अपने अनुभवों को प्रदर्षित करना होगा तब जा कर अपने को कही चाचा चौधरी स्तर का झूठा बना पाएंगे। मसलन आपको इतना तो हस्तसिद्ध होना ही पड़ेगा कि लोगो को यह समझा सको कि-

मेरे पास एक ऐसी तकनीकी है कि मैं एक अरहर के पौधे से अस्सी मन दाल पैदा कर दूंगा जब पुरवाई हवा बहेगी तो पश्चिम में चालीस मन और पछुआ हवा बहाने पर पूरब में चालीस मन दाल गिरेगा।

अन्यथा आप अपने को झूठ बोलने में पप्पू ही समझे तो बेहतर होगा। चाचा चौधरी बनाना इतना आसान नहीं है इसके लिए सफेद झूठ (झूठ में पी एच डी) में महारत हासिल करना होगा तब जा कर आप अपने को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कराते हुए अपना जयकारा लगवाने में सफल हो पाएंगे।

 


                                 विनोद विमल बलिया।.

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