गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

व्यंगशाला -टीका टिप्पणी -3

  जबलपुर मध्यप्रदेश से व्यंंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव ने पूछा है ____व्यंगशाला -


प्रश्न  - वर्मा जी कविता ,व्यंग्य, निबंध33333 या अन्य लेखन में से आपकी सर्वाधिक विधा कौन सी है ? इन दिनों ऐसा क्यों लगता है कि व्यंग्य लेखन अपने लक्ष्य से भटक गया है , केवल छपने के लिए लिखने वाले बढ़ गए हैं , पाठक भी महज मनोरंजन के लिए व्यंग्य पढ़ता लगता है । इस समस्या का निदान क्या हो सकता है ?

- विवेक रंजन श्रीवास्तव , जबलपुर


व्यंग्य को सत्ता विरोध की सर्जना मान लेना उसकी परिधि को छोटा कर लेना है।


: परसाई जी ने एक जगह कहा है कि व्यंग्य भजन-कीर्तन नहीं करता। व्यंग्यकार को अपनी प्रतिबद्धता तय करनी होती है। सत्ता में लोग बदलते रहते हैं, पर उसका चरित्र प्रायः नहीं बदलता। ऐसे में व्यंग्य लेखक सत्ता का समर्थक  कैसे हो सकता है? विसंगति को पहचानना और उस पर प्रहार करना व्यंग्यकार का दायित्व है। किसी ग़लत नीति का विरोध सत्ता-विरोध कहा जा सकता है, पर ऐसा है नहीं। व्यंग्यकार निष्पक्ष होता है। वैचारिक मतभेद तो ठीक है, पर दुराग्रह निष्पक्ष नहीं रहने देता। अतः व्यंग्यकार को सतर्क रहने की ज़रूरत है। वह खाये-अघाये लोगों के पक्ष में नहीं रह सकता।मैंने भटके हुए लेखक को प्रतिबद्धता के कोण से देखने की बात की है


प्रतिबद्धता प्रतिबुद्धता की मांग पहले करती है। पॉलिटिकल एक्टिविज्म जब छिपे तौर पर राह बनाता है तो प्रतिबद्धता भी संदेह के घेरे में आ जाती है।

फिर लोग व्यंंग्य की कसौटी पर नहीं अपनी कसौटी को प्रतिमू बना लेते हैं।

राजेन्द्र जी बहस अनंत है। बाणभट्ट ने हर्षवर्धन चरित लिखा।उन्हें शाप मिला।राजा का गुणगान करोगे तो एक हजार दिन में मर जाओगे। गुणगान वाला साहित्य मर जाता है,भजन कीर्तन वाला भी।पर सत्ता विरोध व्यंग्य की इकलौती कसौटी नहीं है।

मैं अपनी बात पूरी करता हूं।ये तो अनंत है,और कोई किसी को हाथ पकड़कर रोक नहीं सकता। धन्यवाद ,आपकी पहली के लिए।



 किसान यदि सम्पन्न हुआ है और संपन्नता के बावजूद आंदोलन कर रहा तो यह जरूरी भी है। जो फटेहाल है वे अपनी दारुण दशा को समझा पाने में असमर्थ हो सकते हैं। साधन और विचार से समर्थ ही विरोध और अपने और अपने साथियों के हक की लड़ाई लड़ने को सक्षम भी हो पाता है। व्यवस्था ही ऐसी है। 


लेखक गरीबों के हक की बात कभी किया करता था तब वह भी झोला उठाकर बहुत हद तक फटेहाल होता था। आजीविका का साधन भी लेखन ही होता था। आज फटेहाल व्यक्ति के लिए लेखक जीवन जीना कितना मुश्किल है यह सब जानते हैं। आजीविका के अन्य साधन वाला व्यक्ति ही लेखन भी करने की कोशिश करता है। कुछ हॉबी की तरह तो कुछ गरीबों, किसानों,मजदूरों के हक की आवाज भी उठाते हैं। क्या उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। 


कमजोर और शोषित व्यक्ति के समर्थन में आवाज उठाना सक्षम और समर्थ लोगों का ही कर्तव्य होता है। यह हर युग में हुआ है और होता रहेगा। होना भी चाहिए। 

बस इतना ही है।


क्षमा करें आदरणीय 

आपका यह उत्तर न केवल आहत करने वाला है , बरन व्यंग्यकार के अस्तित्व को ही प्रश्नांकित करने वाला है ।

सत्ता का समर्थन करने वाले भाट कहलायेंगे व्यंग्यकार नहीं।

सत्ता का ऐसा खौफ पहले कभी किसी देश में नहीं देखा गया जब एक वरिष्ठ व्यंग्यकार अपने साथी व्यंग्यकारों से सत्ता के समर्थन में आने की सार्वजनिक अपील अपरोक्ष रूप से कर रहा हो ।

बहुत मर्मान्तक है जबाब ये किसी सम्वेदनशील लेखक के प्रश्न का।


सत्ता समर्थन से बेहतर तो लेखन छोड़ना ही होगा।

प्रणाम आपको

🙏🙏


काश कि अपने जीवन में यह दिन न देखना पड़ता ।


असहमत व्यंग्यकार हो लेखक उसे हमेशा मानवता के पक्ष में रहना चाहिए।सरकार कोई भी हो हमेशा उसे सत्य का दर्शन करना ही कलाकार का फर्ज है। चापलूसी करने वाला विद्वान नही और लेखक को विद्वान का दर्जा दिया गया है। उनका फ़र्ज़ है किसी सत्य को आप इतने सुंदर ढंग से कहे कि सामने वाला आपकी बात पर सोचने को मजबूर हो जाये। लेखक का पहला फर्ज है कि वो किसी पक्ष का पक्षधर न हो सत्ता को हमेशा टोके।


 सवाल बिल्कुल स्पष्ट है आदरणीय , पर जिनके बारे में है शायद यह जानकर आप उत्तर देने से बच रहे हैं , अगर प्रश्न स्पष्ट नहीं लग रहा तो पुनः प्रश्न भेजने के लिए कहा जाना चाहिए न कि टाला जाना चाहिए ।

सुनीता जी खुद वरिष्ठ लेखिका हैं उन्हें सवाल पूछना अच्छे से आता है


 दिल्ली से श्रीमती सुनीता शानू जी ने अपने प्रश्न को और स्पष्ट कर आदरणीय वर्मा जी से जबाव चाहा है।


सुनीता शानू--

जी मैं अपना प्रश्न फिर से रखती हूँ।🙏

कुछ लोग व्यंग्य में कविताओं का प्रयोग भी करते है। कभी दुष्यंत कुमार जी की कोई कविता तो कभी निदा फ़ाज़ली साहब की शायरी... यानि गद्य में पद्य का प्रयोग करते हैं। हाल ही में यह कहा गया कि गद्य के साथ कविताओं का प्रयोग व्यंग्य को कमजोर बनाता है। लेकिन यह भी कहा गया कि अपनी बात कहने के लिए गद्य की अपेक्षा पद्य अधिक सरल है। तो आपकी नजर में सही क्या है।



और भक्त बेचारे तबला बजाते रह गये 😃

आक्रोश तो स्थितियां पैदा करती हैं , बरना कौन चाहता है कि वह अपनी शांति गंवाए ।

सबसे अच्छा वक्त वह होगा जब व्यवस्था इतनी मानवीय हो जाएगी कि साहित्य से व्यंग्य  विदा हो जाएगा ।

केवल सृजनात्मक कलाएं ही शेष रहेंगी


: व्यंग्य का तो एक ही लक्ष्य है कि वह विसंगति या विद्रूपता पर प्रहार करे। यथास्थिति में सकारात्मक परिवर्तन की प्रेरणा दे।

2 वर्ग विशेष तो शोषक ही हो सकता है जिस पर व्यंग्य किया जाना चाहिए। यों, व्यंग्य जब किसी सामाजिक विसंगति अथवा भ्रष्ट आचरण पर होता है तो उसमें सभी वर्गों के लोग आ जाते हैं।

3 अवश्य, बल्कि स्वयं पर व्यंग्य लिखना कठिन होता है।


व्यंग्यकार की भूमिका सदैव एक ही रहती है और वह है हर प्रकार की असंगति, विसंगति या विद्रूप पर प्रहार करना। वर्तमान स्थिति से शायद आपका आशय आज के राजनीतिक परिदृश्य से है, तो व्यंग्यकार  सत्ता की कृषि-नीतियों के समर्थन में कैसे खड़ा रह सकता है?

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 व्यंग्य लेख में यदि कोई सटीक काव्यांश आता है जो लेखक की अभव्यक्ति को धार देने में सक्षम है, तो मैं उसे ठीक मानता हूँ। पर ऐसे काव्यांशों की भरमार लेख को अपने लक्ष्य से भटका सकती है। रवींद्र त्यागी जी के व्यंग्यों में सटीक काव्यांश मिलते हैं। पर कहीं-कहीं वे ललित निबंध जैसे लगने लगते हैं।


 राजनीति से परे है, आधे से ज़्यादा व्यंग्य कैनवास । राजनीतिक व्यंग्य तो कल गतकाल हो जाता है जी ।



 कवि हो या लेखक उसे राजनीति पर बोलना ही पड़ता है क्योकि इतिहास एक कलम से ही लिखी जाती हैं और कलम पर राजनीति और राजनीति में कलम हमेशा हावी रहने के चक्कर मे रहता है

आंगन में बैंगन" की चर्चा हुई... इस रचना में रूपक के माध्यम से बहुत जगह राजनीतिक रुख अपनाया है..  एक उदाहरण इसी रचना से 

"मैंने इस एक ही अनुभव से सीख लिया कि प्‍लांट रोपना हो तो उसकी रखवाली का इंतजाम पहले करना। भारत सरकार से पूछता हूँ कि मेरी सरकार आप कब सीखेंगी? मैं तो अब प्‍लांट लगाऊँगा, तो पहले रखवाली के लिए कुत्‍ते पालूँगा। सरकार की मुश्किल यह है कि उसके कुत्‍ते वफादार नहीं हैं। उनमें कुछ आवारा ढोरों पर लपकने के बदले, उनके आस-पास दुम हिलाने लगते हैं।"



 सत्ता के पक्ष में लेखन करने के प्रति इतना आग्रही भी नहीं होना चाहिए।

जो सीधी राजनीति नहीं करते वे बड़ी खतरनाक राजनीति करते हैं ।

राजनीति से परहेज की राजनीति  भी अब सभी समझते ही हैं ।



 यह आपकी समझ का संकरापन है।मेरे लिए व्यंंग्य की परिधि व्यापक है। आग्रह दुराग्रह मेरे नहीं।और समझ भी इतनी भोली नहीं।

मैं भी जानता हूं कि पिछली सरकारों में समर्थन देने वाले कौन थे।और आक्रोश की खेती से पुरस्कार वाले कौन थे।मैं इसीलिए आंगन में बैंगन के इसी प्लांट को लाना चाहता था।पर इन प्लांटों के पुरस्कार किसने हथियाये।


गद्य की लघुकथा विधा में व्यंग्य काफ़ी प्रभावशाली है। बिम्बात्मक पंचयुक्त व्यंगात्मक लघुकथा आज के समय में पाठकों के लिए उपयुक्त है।

सत्ता या राजनीति या लोकतंत्र पर व्यंगात्मक कटाक्षपूर्ण विचारोत्तेजक लघुकथा सृजन के बहुआयामी अवसर हैं, सृजन हुए भी हैं।


सवाल :

1- व्यंग्यात्मक लघुकथा में शब्द सीमा हो या न हो? न्यूनतम दो पंक्तियों से अधिकतम कितनी हो? 


2- व्यंग्यात्मक लघुकथा में बीच में काव्य पंक्तियां (किसी भी काव्य विधा में) हों या न हों?


व्यंग्यात्मक लघुकथा में शब्दसीमा तय तो नहीं कि सकती, पर यह अगर पाँच-छह सौ शब्दों की हो तो, उसमें कसावट रहती है। देखने में उसका कलेवर एक-सवा पृष्ठ का हो तो बेहतर है। 

2- व्यंग्यात्मक लघुकथा में अगर कोई शेर या दोहा आए तो उसको रचना के लक्षित कथ्य की ओर उन्मुख होना चाहिए, अन्यथा लघुकथा अपनी  मारक क्षमता खो देगी। लघुकथाकार को अपनी बात तीक्ष्णता से कहने के लिए काव्यांश का उपयोग मुझे ठीक नहीं लगता।



दोस्तो, आज की चर्चा बहुत हंगामेदार रही, इस अर्थ में कि बहुत लोगों ने इसमें भाग लिया और अपनी-अपनी समझ के अनुसार अपने विचार रखे. यह दर्शाता है कि व्यंग्य के संबंध में अभी भी बहुत सारी बातें अनुत्तरित हैं, लोग उनके बारे में जानना भी चाहते हैं और बताना भी. यही इस व्यंग्यशाला का उद्देश्य है और यही इसकी कामयाबी है. 

बस, मैं एक अनुरोध आप सभी से करूँगा कि हम इसमें खुले मन से आएँ और एक-दूसरे के विचारों से आहत होने या एक-दूसरे को आहत करने के बजाय उनसे समृद्ध हों. इस बात को हमेशा ध्यान में रखें कि अगर दो व्यक्तियों के पास एक-एक रुपया है और वे उनकी अदला-बदली करते हैं, तो अंतत: उनके पास एक-एक ही रुपया रहता है, किंतु यदि उन दोनों के पास एक-एक विचार है और वे उनकी अदला-बदली करते हैं, तो इस विचार-विनिमय से उन दोनों के पास दो-दो विचार हो जाते हैं. यह है विचार की ताकत, जो न केवल कभी मरता नहीं, बल्कि विनिमय करने पर द्विगुणित होता जाता है. 

हम और कुछ नहीं, बल्कि वही होते हैं जो हमारे विचार होते हैं; हम अपने विचारों के ही मूर्त रूप हैं. इतना ही नहीं, हमारा लेखन भी हमारे विचारों का ही मूर्त रूप होता है. अपने लेखन में हम अपने को ही अभिव्यक्त करते हैं, अपने विचारों को ही आकार देते हैं. एक ही विषय पर लिखी गई विभिन्न कृतियों के भिन्न होने का यही कारण होता है. 

इससे एक बात बिना कहे सिद्ध हो जाती है कि जैसे हमारे विचार होंगे, वैसी हमारी रचना होगी. यदि हमारे विचार दोषपूर्ण होंगे, तो हमारी रचना भी निर्दोष नहीं होगी. यदि हमारे विचार परिपक्व नहीं होंगे, तो हमारी रचना भी अधकचरी होगी. और इसके विपरीत भी उतना ही सत्य है. 

विचार परिवेश से निर्मित होते हैं. व्यक्ति का जैसा परिवेश होता है, उसके वैसे ही विचार हो जाते हैं. आज हम अपने जिस धर्म, समाज, देश के लिए लड़ने-मरने को तैयार हो जाते हैं, सोचिए, क्या हमने वे स्वयं या स्वेच्छा से अर्जित किए थे? अगर हम उस धर्म, जाति, देश में पैदा न हुए होते, तो क्या तब भी हम उसके लिए वैसे ही लड़ने-मरने को तैयार रहते? या तब हम किसी दूसरे धर्म, जाति या देश के लिए लड़ने-मरने को तैयार होते? 

तो हमारे विचार हमारे परिवेश से उत्पन्न होते हैं, और चूँकि हम अपने विचारों के ही प्रतिरूप होते हैं, इसलिए हम भी अपने परिवेश की ही पैदाइश होते हैं. जैसे ही यह परिवेश बदलता है, हमारे विचार भी बदल जाते हैं, हम भी बदल जाते हैं. हमें पता भी नहीं चलता, और वे बदल जाते हैं. 

अच्छा परिवेश, अच्छे विचार, अच्छे हम.


व्यंग्यशाला का यही उद्देश्य है और आप सबके सहयोग से वह उसी दिशा में बढ़ रही है.

आज व्यंग्य से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर बात हुई. जयप्रकाश पांडेय जी ने सदस्यों के प्रश्न दक्षतापूर्वक पटल पर रखे और राजेंद्र वर्मा जी ने लगभग उतनी ही दक्षतापूर्वक उनका उत्तर दिया. समयाभाव के कारण मैं उनमें से केवल व्यंग्य और सत्ता के संबंध पर बात करूँगा. बेशक ये मेरे विचार हैं और कोई भी उनसे असहमत हो सकता है. लेकिन सहमत हों या असहमत, थोड़ा गौर जरूर करें.

व्यंग्यकार सत्ता के समर्थन में क्यों नहीं लिखता, या व्यंग्य सत्ता के विरोध में ही क्यों रहता है, यह प्रश्न ही मेरी दृष्टि में व्यर्थ है. व्यंग्य विरोध की विधा है, और अगर देश और समाज में सब-कुछ ठीक हो जाए, तो उसकी आवश्यकता ही नहीं होगी, वह होगा ही नहीं, वह लुप्त हो जाएगा. लेकिन काश, ऐसा होता. 

तलवार से आप काटने का ही काम ले सकते हैं, तलुए सहलाने का नहीं. युद्ध न हो रहा हो, तो आप योद्धा से यह नहीं कह सकते कि अब चूँकि युद्ध नहीं हो रहा है, इसलिए जाओ, घास खोदो.


व्यंग्य मतलब गलत का विरोध.


देखा जाए, तो ऐसा करके वह गलती करने वाले का हित ही करता है, उसे सुधारना ही उसका हित है, समर्थन है. ‘निंदक नियरे राखिये’ का यही अर्थ है. व्यंग्य ऐसा निंदक है, जो बिना पानी और साबुन के दूसरे का स्वभाव निर्मल कर देता है. वह बिना सैनेटाइजर के विसंगतियो के कोरोना को दूर रखता है.

जहाँ तक राजनीति की बात है, तो चूँकि हमारा पूरा जीवन राजनीति से प्रभावित होता है, इसलिए हम राजनीति से बच नहीं सकते. आँख बंद करके बचने का भ्रम जरूर पाल सकते हैं, लेकिन बच नहीं सकते. 

न केवल राजनीति में राजनीति है, बल्कि जीवन-जगत की हर चीज में राजनीति है. इसलिए राजनीति की बात न करना, या न करने के लिए कहना, अपने आप में एक राजनीति है. 

कोई नहीं कहता कि आप राजनीति पर ही लिखें. जिस पर लिख सकते हैं, उस पर लिखें, लेकिन वहाँ की भी राजनीति तो आपको उघाड़नी ही होगी. राजनीति हर जगह है, आप उससे बच नहीं सकते.

सत्ता और सरकार को एक समझ लेना भी गलत है. सरकार तो आती-जाती रहती है, सत्ता बनी रहती है और हर आने वाली सरकार को जाने वाली सरकार की तरह बना डालती है, अपने अनुकूल ढाल लेती है. यह वह काजर की कोठरी है, जिसमें कैसो हू सयानो जाय, एक रेख काजर की लागि है पै लागि है. इसलिए सरकार की भ्रष्टता से भी ज्यादा सत्ता की भ्रष्टता को समझने की जरूरत है. 

साहित्य में राजनीत है और व्यंग्य में भी. हम व्यंग्यकारों के बीच भी ऐसे लोग मौजूद हैं. वरना व्यंग्य के नाम पर तमाम इनाम और सम्मान ले जाने वाले लोग ज्वलंत मुद्दों के उठते ही कहाँ दुबक जाते हैं? वे ही आच्छा जी जैसे लोगों को शिकायत का मौका देते हैं. उनके “मैं भी जानता हूं कि पिछली सरकारों में समर्थन देने वाले कौन थे और आक्रोश की खेती से पुरस्कार (पाने) वाले कौन थे” कहने के पीछे यही दर्द है, जिसे समझने की जरूरत है.

दोस्तो, आप सबके विचार इस अर्थ में बहुमूल्य हैं कि वे चर्चा को आगे बढ़ाते हैं. इसलिए आप सभी का धन्यवाद और आप सभी को साधुवाद. हमारी इसी चर्चा से एक दिन कोई महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलेगा.

इसलिए कृपया मिलकर व्यंग्य की मशाल को आगे बढ़ाते रहें.



व्यंग्य शाला में आज का सत्र व्यापक अर्थों के साथ सार्थक सत्र माना जा सकता है। सटीक, सवाल जबाव के साथ रोचक विचार विमर्श लगातार चलता रहा। सवालों के पोस्टमार्टम कर तथ्यपरक जबाव देने में वरिष्ठ व्यंंग्यकार श्री राजेन्द्र वर्मा जी का जवाब नहीं, वे दस बजे से लगातार फुल ऊर्जा के साथ डटे रहे। अपने धांसू वक्तव्यों से उन्होंने जता दिया कि जिनके जीवन के "पब्लिक सेक्टर" और "प्राइवेट सेक्टर" में असंगति और विरोध होता है व्यंंग्यकार उनकी खबर जरूर लेता है। समसामयिक विषय 'सत्ता और किसान आन्दोलन' पर अपने अपने तरह से चर्चा में सबने भाग लिया,पर आज के हेडमास्टर जी ने संक्षेप में सबको समझा दिया कि व्यंंग्यकार जब व्यंग्य करता है तो वह उस किसान की तरह होता है जो फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कौए को मारकर अपने खेत में उल्टा टांग देता है जिससे दूसरे कौवे डरें और फसल का नुकसान न करें।

             आज के सत्र में महत्वपूर्ण प्रश्नों की झड़ी लगाने वाले आदरणीयों में श्री प्रभाशंकर उपाध्याय, श्री यशवंत कोठारी, श्री बुलाकी शर्मा, श्रीमती वीना सिंह, श्रीमती सुनीता शानू, श्री अभिजित दुबे, श्री रामस्वरूप दीक्षित, श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव, श्री एम एम चन्द्रा, श्री जैनेन्द्र कुमार जी, श्री ब्रजेश कानूनगो,जय प्रकाश पाण्डेय, श्री अशोक प्रकाश, आरिफा एविस जी, श्री उस्मानी जी के साथ विमर्श में श्रीमती स्नेहलता पाठक, श्री बीएल अच्छा, श्री सुरेश कांत जी, श्री जगदीश जी, ममता नायक जी, अनिता दवे जी जैसे प्रबुद्ध जनों की सहभागिता रही। आदरणीय सुरेश कांत जी ने अपनी टिप्पणी से व्यंग्य की मशाल जला दी, उनका हृदय से आभार।सभी आदरणीयों का हृदय से आभार। वरिष्ठ व्यंंग्यकार श्री राजेन्द्र वर्मा जी का हार्दिक अभिनन्दन और धन्यवाद।



 अगर आम आदमी के पक्ष में लेखन करना और किसान मजदूर के पक्ष में खड़े होना समझ का सकरापन है तो शायद ही मैं कभी इस सकरेपन से मुक्त होना चाहूँ  ।

यदि सरकार और उसके मुखिया का गुणगान समझ का विस्तार है तो मैं इस विस्तारवाद के खिलाफ हूँ ।

पिछली सरकार के समर्थन में लिखा गया किसी के व्यंग्य का सन्दर्भ दीजिये।

परसाई जी तो सदा सत्ता से ही संघर्ष करते रहे ।

हाँ ठीक पिछली सरकार ने जरूर एक व्यंग्यकार को उसके सत्ता समर्थक लेखन का बड़ा इनाम दिया था ।

बहुत आदर के साथ कहना चाहूंगा कि आपकी व्यंग्य की व्यापक परिधि का विस्तार सत्ता के गलियारों तक ही क्यों है और सत्ता विरोधी कवि लेखक आपके निशाने पर क्यों हैं ?

यद्यपि जानता हूँ कि आप दूसरों से कहीं अधिक उदार , सहृदय और लेखन को श्रेष्ठता के हिमायती हैं और इसीलिए निजी तौर पर मेरे बहुत आदर के पात्र हैं।


 पूरी चर्चा तो नहीं पढ़ पाया लेकिन प्रिय सुरेश कांत जी का वक्तव्य कई अस्पष्ट व उलझी बातों को अपनी साफगोई व सुलझी दृष्टि से पूरी चर्चा को। समझने में कारगर लगा।सभी सुधिजनों की खुले मन से अपनी बात रखना बेहतर लगा।शुभकामनाएं

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