बुधवार, 25 जनवरी 2012

प्रभात यात्रा /पत्रकारों का प्रशिक्षणः विकास का एजेंडा तय करने में सहायक




माखनलाल चतुर्वेदी ने एक स्थान पर कहा है, अखबार प्रजा के प्रतिनिधि है और राजा के मंत्री वे धनवानों के सलाहकार है, गरीबों के मददगार. देखने में यह बात सिर्फ़ अखबारों के लिए कही गयी हो सकती है मगर इसके पीछे संवाददाता या स्ट्रींगर की भूमिका के बारे में पता चल पाता है. अखबार को सूचनाएं देनेवाले पत्रकार की कितनी स्तरों पर कितनी भूमिकाएं हो सकती हैं, इसका भी संकेत माखन लाल की इस परिभाषा में निहित है. और पत्रकार अथवा दूर-दराज गांवों-कस्बों के संवाददाता, स्ट्रींगर इस भूमिका का निर्वहन तभी कर सकते हैं, जब उनको उचित प्रशिक्षण दिया जाये. यह कई अन्य कारणों से भी आवश्यक है.
मूलपरक रिपोर्टिंग की बात हो या किसी क्षेत्र विशेष की किसी समस्या की जड़ तक पहुंचने की ललक, इसे अपेक्षाकृत उसी क्षेत्र के संवाददाता के जरिये बेहतर ढंग से कराया जा सकता है. और अखबारी दुनिया के बदलते परिदृश्य में जब राष्ट्रीय अखबार भी कस्बाई हो रहे हैं, तब इन कस्बे के रिपोर्टरों को प्रशिषण की सर्वाधिक आवश्यकता है. क्‍योंकि वहां किसी पत्रकारिता विद्यालय से आये और प्रशिक्षित पत्रकार का मिलना कठिन है. और संसाधन कम हों तो यह काम असंभव ही हो जाता है. इसलिए अखबारों को लिखने या पत्रकारिता में थोड़ी बहुत रुचि रखनेवाले लोगों को ही प्रतिनिधि बनाना एक तरह से बाध्यता है. इन पत्रकारों के प्रशिक्षण से पत्रकारिता के मूल, विकास के मुद्दे, समस्याओं का निदान और अखबारों के सर्कुलेशन तक जैसे बडे मुद्दे जुड़े हुए हैं. इन साधारण पत्रकारों को सोच और समझ से लैस करने का दायित्व भी अंततः अखबारों का बनता है. मगर त्रासदी यह है कि आज अखबार कस्बाई अथवा क्षेत्रीय तो होना चाहते है, लेकिन कस्बे से जुड़े इस दायित्व को नहीं समझते या समझना नहीं चाहते.
प्रभात खबर ने शुरुआती दिनों से ही इस दायित्व को निभाया है. दरअसल कस्बाई होने की जिस अनिवार्यता को बड़े अखबार आज समझ रहे हैं, उसे प्रभात खबर ने अपने आरंभिक दिनों (हरिवंश जी के आने बाद, 1989) से ही समझ लिया था, जान लिया था, ठान लिया था. मगर यहां भी एक बडा अंतर है. जहां बड़े अखबार के कस्बाई होने के पीछे उनके आर्थि‍क सरोकार प्रधान हैं, वहीं प्रभात खबर के लिए यह कर्म पत्रकारिता के मूल्यों और मापदंडों की रक्षा के निहितार्थ रहा है. इसके पीछे संपादक और उसकी टीम की व्यापक दृष्टि रही है. प्रभात खबर ने पत्रकारों और कस्बाई पत्रकारों को प्रशिक्षण देने का कार्य तब आरंभ किया, जब यह कल्पना मानी जाती थी. बल्कि हिंदी पट्टी में यह पहला अखबार था, जिसने बड़े पैमाने पर शैक्षणिक और सामाजिक दृष्टि से एक पिछड़े राज्य में ग्रामीण पत्रकारों की एक अलग कतार तैयार की. आदि‍वासी समुदाय में पत्रकारिता की चेतना जागृत करने के लिए अलग से अभियान चलाया गया. वासवी, दयामनी बरला, रतन तिर्की, जेरोम जेराल्ड, सुनील मिंज आदि‍ ऐसे ओदवासी पत्रकार हैं, जिनकी अब राष्‍ट्रीय पहचान बन चुकी है.
झारखंड में जनजातीय समस्या पर यह लोग निरंतर लेखन और फ़ील्ड वर्ककर रहे हैं. आदि‍वासी युवक-युवतियों में यह चेतना का यह अलख जलाने के लिए प्रभात खबर और हरिवंशजी को हमेशा याद किया जायेगा. इसलिए मुसलिम समुदाय से जुड़ने की कोशिश की गयी. इस श्रेणी में यूमअहमद अब्दाली, हुसैन कच्छी, डॉ जाकिर, हसन रजा, शाहिद हसन, एम जेड खान जैसे नाम हैं. कुल मिलाकर यह कि इस दिशा में एक पूरी पीढ़ी तैयार की गयी. और यह बिना किसी अतिरेक के कहा जा सकता है कि झारखंड में अब आनेवाले बड़े अखबार बौद्धिक सामगी के साथ क्षेत्रीय और ग्रामीण खबरों के लिए भी प्रभात खबर द्वारा तैयार की गयी इसी पीढ़ी पर आश्रि‍त हैं.
बहरहाल 17 वर्ष पहले शुरु किया यह प्रशिक्षण कार्यक्रम आज तक जारी है. पत्रकारों के लिए सालाना कैंप आयोजन का दिन यादगार दिन होता है, जब किसी एक स्थान पर प्रभात खबर से जुड़े छोटे-छोटे कस्बों गांवों से आये सैंकड़ों पत्रकार इसमें शिरकत करते हैं. गैर जरूरी दिखनेवाले इस कार्य के बारे में प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश जी बिल्कुल साफ़ दृष्टि रखते हैं, झारखंड में विकास की बाते सिर्फ़ जुबान पर हैं. शासन तंत्र के एजेंडे में नहीं. सत्ता के लिए पक्ष विपक्ष इस कदर उलझा है कि विकास या इस पर सार्थक बहस के भी स्पेस नहीं है. ऐसे में मीडिया अगर सार्थक हस्तक्षेप करके विकास को एजेंडा बनाये तो, एक सकारात्मक पृष्ट भूमि बन सकती है, पर ऐसा नहीं हो रहा है. राजनीति बांझ हो गयी है. देश और प्रदेश दोनों, में जिस तरह बीमारूराज्य (इसमें झारखंड भी शामिल है) आगे नहीं बढ़ रहे, इसमें नये विचार नहीं पनप रहे, मीडिया की भी कमोबेश यही स्थिति है. सही अर्थों में मीडिया को प्रोफ़ेशनल होने की जरूरत है.
आज अपने काम में, नीतियों में प्रतिबद्ध कर्मी चाहिये, जो पेशे के कौशल, हुनर को समृद्ध कर सकें. झारखंड के संदर्भ में कहा जा सकता है कि यही कौशल, हुनर बढ़ाने का काम सचेत ढंग से नहीं हो रहा. इसकी जरूरत क्‍यों है ? 91 में उदारीकरण के दरवाजे खुले. टेक्‍नॉलाजी की दृष्टि से भी दुनिया तेजी से बदली. सूचना क्रांति, ग्लोबल दुनिया के नये मापदंड के साथ पूरी दुनिया में मानव विकास (ह्मूमन रिसोर्स डेवलपमेंट) की चर्चा होने लगी. कल-कारखानों में एचआरडी विभाग (ह्मूमन रिसोर्स डेवलपमेंट, मानव संसाधन विकास) खुलने लगे, पर अखबारों में ऐसा कोई सृजनात्मक प्रयास नहीं हुआ, अखबारों में काम करनेवालों को सबसे अधिक प्रशिक्षण की जरूरत है. तथ्य यह है कि इस मद में शायद ही अखबार अलग बजट बनाते हों या ऐसे कार्यक्रम आयोजित करते हों. पत्रकारों के प्रशिक्षण की चर्चा हम झारखंड के संदर्भ में कर रहे हैं, पर देश स्तर पर के अखबारों में भी इसके लिए अलग विभाग नहीं है. होना यह चाहिए कि अखबार के अंदर रोज काम में डूबे लोगों का भी लगातार प्रशिक्षण होना चाहिए, बदलती दुनिया, अखबारों की बदलती सामग्री (कंटेंट में हो रहे बदलाव) और नयी तकनीक पर लगातार अखबार के कामकाजी लोगों का प्रशिक्षण होना चाहिए. हर अखबार संस्थान अपने यहां एक ह्मूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट (मानव संसाधन विभाग) खोले. क्‍लास रूम से सीधे बाहर निकल कर काम कर रहे पत्रकारों के प्रशिक्षण की जरूरत है. वर्षों से काम कर रहे पत्रकारों के लिए भी अपनी विधा, पेशे में आ रहे बदलावों को जानना जरूरी है.
पर सिर्फ़ अखबारों के स्टाफ़ लगातार प्रशिक्षित हों, तब भी अखबारों की क्‍वालिटी (गुणवत्ता) पर आंशिक असर ही पड़ेगा. अखबारों के नियमित (हालाकि अब कांट्रेक्‍ट और ऑफ़ लोड का जमाना है) स्टाफ़ से अधिकसंख्या में स्ट्रिंगर, आंशिक संवाददाता और फ़्रीलांसर अखबारों से जुड़े हैं. इनके प्रशिक्षण की न कोई व्यवस्था है, न इस काम के लिए कोई पूंजी लगाने के लिए तैयार है.
जमीनी हकीकत क्‍या है? छोटा या बड़ा, हर अखबार या टेलीविजन चैनल दूर देहात तक अपने अपने प्रतिनिधि (स्ट्रिंगर) रख रहे हैं. इन स्ट्रिंगरों को इनके काम के अनुपात में मामूली पैसे मिलते हैं. फ़्रीलांसर भी ऐसे क्षेत्रों में अखबारों की जरूरतें पूरी करते हैं. इनका सर्वे हो तो कई महत्वपूर्ण चीजें पता चलेंगी. कुछ स्ट्रिंगर, दक्ष और कुशल हैं, पर अधिकतर को अपने पेशे का कौशल हुनर नहीं मालूम. बुनियादी चीजें नहीं पता, गांवों कस्बों, ब्लॉकों की महत्वपूर्ण घटनाओं की सूचना स्ट्रिंगरों की यही फ़ौज देती है. इन स्ट्रिंगरों की सामाजिक हैसियत, खबर देने या अखबारों से जुड़ जाने के कारण बन जाती है, वे स्थानीय रूलिंग इलीट (शासकीय वर्ग) से जुड़ जाते हैं. उनका प्रभाव क्षेत्र बढ़ जाता है. उनकी खबरों से स्थानीय राजनीति, समाज, जीवन प्रभावित होता है. उनके हाथ में कलम की ताकत आ जाती है. कम स्ट्रिंगर ऐसे होंगे, जिन्हें अपने दायित्व, सामाजिक भूमिका और अपने लिखे के परिणामों का एहसास होता है. स्ट्रिंगरों की फ़ौज में बडी संख्या उनलोगों की है, जो जीवन में कोई दूसरा काम नहीं कर सके. विवश होकर पत्रकारिता में आ गये, जिसके लिए न कोई योग्यता है, न मापदंड. अब तो स्ट्रिंगर बनने के लिए दबाव डाल कर, ब्लैकमेल कर विज्ञापन जुटा लेने की क्षमता भी योग्यता मानी जाती है, लिखना न आये, यह स्वीकार्य है, पर विज्ञापन वसूलने की कला में आधुनिक दक्षता सबसे बड़ी योग्यता है.
अब आप गौर करें, ऐसे अनगढ़ लोग खबरें लिखते हैं, जिन्हें खबर लिखने के बारे में कोई प्रशिक्षण नहीं है. यह ऐसा ही है कि बम बनानेवाला, बम विस्फ़ोट के परिणाम न जाने. खबरें, बमों से ज्यादा ताकतवर होती हैं. मनुष्य के मन, मस्तिष्क और चेतना को अपरोक्ष रूप से प्रभावित करनेवाली, सबसे ताकतवर जो चीज है, वह खबर. यही खबर अगर गलत, आंशिक सच, नियोजित हो (प्लांटेड) या ब्लैकमेल के उद्देश्य से लिखी जाती हो, तो कैसा मानस बनेगा? कैसा समाज होगा? किसी खास उद्देश्य से लिखी गयी खबर से जो समाज बनेगा, उसमें कलह, हिंसा, तनाव और स्पर्धा अनिवार्य है. अज्ञानता अलग चीज है पर अखबार की कलम हाथ में आ जाने से जो ताकत स्थानीय स्तर पर स्ट्रिंगर (आंशिक संवाददाताओं) को मिलती है, उसका दुरुपयोग समाज के लिए अत्यंत नुकसानदेह है. समाज को गंभीर दीर्घकालीन लाइलाज रोग देनेवाला स्रोत. खबरें, मनुष्य के मनचिंतन और अपरोक्ष मानस को प्रभावित करती हैं. गलत तथ्य होंगे, तो लोगों के मस्तिष्क प्रदूषित होंगे, लोगों के सोचने का मानस रुग्ण होगा, तो समाज का सामूहिक चिंतन, जीवन और सोच प्रभावित होगा. इस समस्या की गहराई में उतरें, तो इसकी गंभीरता समझ में आयेगी. नौकरशाही कैसे काम करती है? सरकारी फ़ाइलें कैसे मूव करती हैं? क्‍यों सरकारी पैसा, वित्तीय वर्ष बीतते बीतते खर्च होने केलिए रिलीज होता है? मार्च लूट का बिहार, झारखंड में क्‍या अर्थ है? क्‍यों हर सरकार इस पर पाबंदी की घोषणा करती है, पर नहीं रोक पाती? इस जटिल प्रशासनिक व्यवस्था की बुनियादी जानकारी पत्रकारों के लिए जरूरी है, ताकि वे अपनी रपटों को और समृद्ध, अकाट्य और प्रामाणिक बना सकें.
विभिन्न पत्रकारिता पाठयक्रमों में फ़िलहाल इन चीजों को नजर अंदाज किया गया है. हर साल हजारों की तादाद में निकल रहे नये, भावी, प्रशिक्षु पत्रकारों को विकास पत्रकारिता की महज किताबी अवधारणा से आगे, असल चुनौतियों को समझने और उस अनुरूप समाचार संकलन व लेखन के लिए तैयार करना होगा. फ़िर, जो हजारों कार्यरत स्ट्रिंगर पत्रकार बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के या विगत वर्षों के प्रशिक्षण के आधार पर, अब अपने अनुभव और कौशल के सहारे पत्रकारिता की मुख्यधारा का दायित्व संभाल रहे हैं, उनके लिए भी सस्पेशलाइज्ड तथा रिफ़्रेशर कोर्स बनाये जाने चाहिए.
नये राज्यों में अखबारों की बढ़ती प्रसार संख्या के बारे में मीडिया की गंभीर अध्येता शेवांती निनान ने उल्लेखनीय काम किया है. उनके अध्ययन निष्कर्ष प्रामाणिक हैं. छत्तीसगढ़, झारखंड में नये अखबार बढ़े हैं. अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ी है. अखबार सुदूर गांवों तक पहुंच रहे हैं. ब्लॉक, गांव तक अखबार अपना नेटवर्क बना रहे हैं. पर ऐसी जगहों पर स्किल्ड (दक्ष) स्ट्रिंगर नहीं मिलते, पर उनकी खबरें गांवो ब्लॉक या जिले के जन जीवन को प्रभावित करती हैं. इन स्ट्रिंगर पत्रकारों के प्रशिक्षण की व्यवस्था सरकार, प्रेस परिषद और ऐसी चीजो में रूचि रखनेवाली संस्थाएं कर सकती हैं. क्‍योंकि अखबार अब तक इसकी जरूरत महसूस नहीं कर सके हैं. इन स्ट्रिंगर पत्रकारों के लिए चार चार दिन का वर्कशॉप आयोजित किया जा सकता है. पर आयोजित करने के पूर्व, ऐसे वर्कशॉपों के लिए पाठन सामग्री (रिसोर्स मैटेरिएल) अनुभवी लोगों को तैयार करनी चाहिए. सामग्री तैयार करनेवालों की टीम में अनुभवी पत्रकार, नौकरशाह और आर्थि‍क मामले के विशेषज्ञ हो सकते हैं.
स्ट्रिंगरों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में अभ्यास (प्रैक्टिकल) का लंबा सेशन होना चाहिए. खबरों की पुरानी अवधारणा और उनकी प्रासंगिकता पर चर्चा होंनी चाहिए. अखबार लगातार स्थानीय (ग्लोबलाइजेशन के दौर में लोकलाइजेशन की प्रक्रिया तेज है) होते जा रहे हैं, पर गांवों ब्लॉकों की अपराध और राजनीति से ज़ुडी खबरें ही अधिक जगह पाती हैं. गांवों के स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं के उत्थान और विकास पर हो रहे कामों और इनकी जरूरत पर नया मानस बनाना है, तो स्ट्रिंगरों को इन विषयों को मान्यता देनी होगी. राजनीति, अपराध और सेक्‍स को चटपटा, प्रमुख बनाने से बचना होगा. यह काम स्ट्रिंगरों के मानस में परिवर्तन से ही आसान बन सकता है. यह मानस परिवर्तन बगैर प्रशिक्षण संभव नहीं है. यह प्रशिक्षण संस्थागत स्तर पर ही संभव है. इसके लिए पूंजी की जरूरत है. सारे अखबार अपनी प्रतिद्वंदिता भुला कर अपने अपने क्षेत्रों में इसे संसस्थागत रूप दे सकते हैं. इससे समाज देश का भला होगा या प्रेस परिषद या अन्य संस्थाएं यह काम करा सकती हैं.
हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में एक और बात पर विचार करना जरूरी है. हिंदी पत्रकारिता में इस भीड के बावजूद ऐसे कम लोग है, जिन्होंने बदलती दुनिया के साथ चीजों को समस्याओं को समझने की कोशिश की है. वर्तमान समय और दुनिया अपने तरीके से बन रही है, बदल रही है. इसमें शक्ति है. दुनिया की प्रसिद्ध पत्रिकाद इकोनोमिक्‍स की एक महिला पत्रकार की एक पुस्तक आयी थी, द डेथ आफ़ डिस्टेंस. इसमें बताया गया है कि किस तरह से दुनिया तकनीक और संचार माध्यमों के विकास की वजह से बदल रही हैं. इस बदलाव केबहुत साफ़ मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थि‍क प्रभाव देखे जा सकते हैं.
ग्लोबाइजेशन ने हमारे समाज और दिनचर्या तक को बदल कर रख दिया है. इन चीजों को कितने पत्रकार है, जो गहराई से जानते समझते हैं. इस समय को आर्थि‍क समृद्धि से संचालित दौर रहा गया हैं, लेकिन जिस तरह की नयी अर्थव्यवस्था उभर रही है इसकी जानकारी पत्रकारिता से जुड़े कितने लोगों को हैं? इन बदलावों पर लगातार पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं.छोटे पत्रकारों, कस्बों, गांव के पत्रकारों को अगर छोड़ भी दें, तो शहर में रहनेवाले ऐसे कितने पत्रकार और डेस्क के काम करनेवाले संपादक इन पुस्तकों को पढ़ते हैं. ऐसे वातावरण में प्रशिक्षण के महत्व को समझा जा सकता है. लेकिन सच यह है कि प्रशिक्षण की पहल (अखबारों की ओर से) गिने-चुने ही होते हैं. और पढ़ने की प्रवृति का तो सर्वाधिक क्षय हुआ है. दरअसल इलेट्रोनिक मीडिया के विस्तार ने पत्रकारिता के पेशे को चरम पर पहुंचा दिया है. न्यूज चैनल के एंकर और पत्रकार की प्रसिद्धि (लोकप्रियता नहीं) आज किसी भी फ़िल्मस्टारों जैसी हो गयी. नयी पीढ़ी के पत्रकारों को एक बहुत बड़ा वर्ग इस ग्लैमर से प्रभावित होकर भी पत्रकारिता में आ रहा है. और जहां ग्लैमर होगा वहां स्वावाभिक रूप से मिशन, वैचारिकता, विभिन्न सरोकार कुंठित होंगे. 1980 तक हाल दूसरे थे. पत्रकारिता, विशेषकर हिंदी पत्रकारिता में बडे पैमाने पर ऐसे पत्रकार आते थे, जो अलग-अलग राजनीतिक आग्रहों के बावजूद एक वैचारिकता से समृद्ध होते थे. इसीलिए उनकी पत्रकारिता और संपादन, सामग्री के चयन व प्रस्तुति में भी एक दृष्टि होती थी. इस परंपरा का लोप हुआ है. इस बदले माहौल में पत्रकारों का प्रशिक्षण नितांत जारी हो जाता है. प्रभात खबर इस दिशा में इसी सोच के साथ आरंभ से ही सचेत रहा है.

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