शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

post card / nk singh

postcard / n. k. singh









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postcard an ordinary person seeking to improve self.View my complete profile Wednesday, 25 January 2012
क्यों नहीं बन पाता भ्रष्टाचार चुनाव का प्रमुख मुद्दा ?
विख्यात न्यायविद सॉलमण्ड ने कहा था- “ वह समाज जो कि गलत कार्यों को भोगने के बाद भी अपने अंदर क्रोध नहीं पैदा कर पाता उसे कानून की एक प्रभावी पद्धति कभी नहीं मिल सकती”। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में उत्तरप्रदेश में 8800 करोड़ में से 5000 करोड़ सरकारी अमला और मंत्री से लेकर संतरी तक, हजम कर गए लेकिन यह चुनावी मुद्दा नहीं बन सका। भ्रष्टाचार को लेकर पूरे देश में कुछ महीनों पहले लगा था कि एक जबर्दस्त जनाक्रोश फूट पड़ा है और अब यह आक्रोश ठंडा नहीं पड़ने जा रहा है। लेकिन उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड या अन्य तीन राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में शायद ही भ्रष्टाचार एक मुद्दा बन पाया है। ऊपर से तुर्रा यह कि राजनीतिक दलों ने फिर वही हिमाकत दिखाते हुए आपराधिक छवि के लोगों को टिकट दिया है। बड़ी पार्टियों द्वारा खड़ा किया गया हर तीसरा उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि का है।    ऐसा लगता है कि तुलसीदास के “कोउ नृप होहिं हमे का हानि” की अनमनस्कता ने हमारी विद्रोही रगों को कहीं गहरे तक खत्म कर दिया है। हमें उसकी चिंता नहीं रहती कि नृप कौन होगा क्योंकि हमने मान लिया है कि “चेरी छोड़ न होउब रानी” यानि सत्ता सत्ताधारियों की है, लूटना उनका काम है और हमें दासत्व भाव में इस त्रासदी को जीवनपर्यन्त झेलना है। वरना कोई कारण नहीं था कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में इतने बड़े घपले के बाद भी भ्रष्टाचार मुद्दा न बनता।    भ्रष्टाचारियों के हौसले और हिमाकत का यह आलम है कि जेल में जाकर हत्याएं की जा रही हैं ताकि राज न खुल सके। मंत्री पर आरोप लगता है तो सत्ताधारी दल मंत्री को निकालता है और अगले ही दिन देश की एक बड़ी पार्टी जो शुचिता का दावा करती है, उसके लिए लाल कालीन बिछाती है। अगर जनाक्रोश का डर होता तब कम से कम चुनाव के वक्त कोई पार्टी इस तरह की हिम्मत नहीं कर पाती। क्या वजह है कि आज भी इन तथाकथित मुख्य पार्टियों का हर तीसरा उम्मीदवार आपराधिक छवि का है ? क्या समाज में वह फैक्ट्री बंद हो गयी है जहां अपराधशून्य लोग पैदा होते हों ? या फिर क्या जो अपराध नहीं करता उसके लिए राजनीति में कोई जगह नहीं है ?   सभी राजनीतिक दलों ने अपना घोषणा-पत्र जारी किया लेकिन एक ने भी यह नहीं बताया कि भ्रष्टाचार से लड़ने का उनके पास कौन सा नुस्खा है ? किसी ने मुस्लिम आरक्षण की बात की तो किसी ने बेरोज़गारों को बैठे-बैठाए भत्ता देने का वादा किया। दरअसल हमाम में रहने का एक अलिखित कोड है कि कोई किसी को नंगा नहीं कहेगा। लिहाज़ा कमर के ऊपर तक कपड़ा न होने को लेकर भले ही एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हों लेकिन कमर के नीचे क्या है इसके बारे में कोई नहीं बोलता।     इटली की समसामयिक राजनीतिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करने से समझ में आता है कि किस तरह माफिया गैंग कानून-व्यवस्था व सरकारों पर भारी ही नहीं पड़ते बल्कि उनको जिस तरह चाहते हैं तोड़-मरोड़ लेते हैं। भारत में भी जिस तरह टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में सादिक बाचा जो कि ए.राजा का काफी करीबी माना जाता था, की लाश फांसी में लटकी हुयी उसके घर में पायी गयी, इस बात के संकेत हैं। इसी तरह चारा घोटाल के मामले में पशुपालन मंत्री भोलाराम तूफानी ने “खुद को चाकू घोपकर” आत्महत्या कर ली। वह भी घोटाले में आरोपी थे। इसी तरह  गाजियाबाद जिला न्यायालय के ट्रेजरी में एडमिनिस्ट्रेटिव आफिसर के पद पर तैनात आशुतोष अस्थाना की डासना जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गयी। पी.एफ घोटाले में उन पर भी आरोप लगे थे और साथ ही इस बात का भी डर था कि इस घोटाले में आशुतोष द्वारा कई अन्य जजों के नाम उजागर किए जा सकते हैं। इसी तरह झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शीबू सोरेन के निजी सचिव शशिनाथ झा की भी रांची के पिस्का नगरी गांव में हत्या कर दी गयी। माना जाता है कि झा को अपने बॉस के बारे में बहुत कुछ मालूम था। 65 साल से इतना सब होने के बाद भी “चेरी छोड़ न होउब रानी” के सिंड्रोम से हम बाहर नहीं निकल सके। धर्म तेजा से राजू तक कफन-घसोट हमारी लाश से चद्दर भी ले जाते रहे पर हमने मान लिया कि जनता राजा नहीं बनाती और राजा जो चाहता है वह कर लेता है।    70 लाख करोड़ की ब्लैकमनी की कोख से उपजा भ्रष्टतंत्र भीमकाय होता रहा और अब वह इतना ताकतवर हो गया है कि समूचे समाज को मुंह चिढ़ाकर राजफाश करने वालों की हत्याएं कर रहा है।    इसी बीच जो कुछ दासत्व भाव वाले गलती से शीर्ष पर पहुंच गए उन्होंने भी नृप का चोला पहन लिया और मौसेरे भाई बन गए। इनमें से अगर कभी किसी ने अन्नाभाव में आने की कोशिश की तब या तो वह अलग-थलग पड़ गया या तो चांदी के जूते खाकर चुप हो गया। आज खतरा यह है कि इस भ्रष्टतंत्र में लगे माफिया अब न तो उन्हे अलग-थलग करेंगे ना तो चांदी का जूता दिखाएंगे बल्कि सिर्फ यह संदेश देंगे कि मौत कब, कहां आ जाए कोई भरोसा नहीं।         आज से कुछ साल पहले तक अपराधी को यह डर रहता था कि भरी बाजार से लड़की उठाने पर लोगों का प्रतिरोध झेलना पड़ सकता है। लेकिन नए परिदृश्य में यह डर हो रहा है कि कहीं अपहर्ता गलती यह न समझ ले कि अमुक ने इस घटना को देखा भी है। हम नजरें मोड़ लेने के भाव में आ गए हैं। पुलिस वाला भी उस जगह से खिसक लेता है जहां अपराधी की हलचल दिखायी देती है। अमेरिका में इन्हीं स्थितियों से निपटने के लिए विटनेस प्रोटेक्शन लॉ(गवाह सुरक्षा अधिनियम) लाया गया ताकि हम अपराधी का प्रतिरोध न कर सकें तो कम से कम गवाही तो दे सकें। एफ.बी.आई को यहां तक शक्ति दी गयी है कि वह न सिर्फ अपने गवाहों की पहचान बदल देते हैं बल्कि अपने गवाहों को नए नाम से नए शहर में नए सिरे से जीने के लिए सारी सुविधाएं और धन मुहैया कराते हैं। इसके ठीक विपरीत आज भारत में इस बात का खतरा है कि पुलिस अपराधियों से अपनी जान बचा रही है।   नोनन ने अपनी किताब “ब्राइब” में लिखा था- “हमें जनजीवन में भ्रष्टाचार के बारे में अपना फैसला इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि हमने कितने कानून बनाए और कितने लोगों को सजा दी”। करप्शन की विभीषिका का अंदाज़ा तब मिल पाता है जबकि हम यह समझ पाएं कि समाज छोटे से छोटे भ्रष्टाचार या अनैतिकता को लेकर किस हद तक संवेदनशील हैं।                                                                                    Posted by at 20:12 0 comments
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जजों की नियुक्ति : विश्वसनीयता के लिए पारदर्शिता ज़रूरी
फिल्म माई लिटिल चिकेडी में जज ने फ्लावर बेली ली से पूछा- “ तुम्हारी बातों से लगता है कि तुम अदालत के प्रति अवमानना का प्रदर्शन कर रहे हो ” ? ली ने पूरी मासूमियत से कहा- “ नहीं महाशय मैं तो इसे छिपाने की कोशिश कर रहा हूं ”।    आज पूरे देश में अदालतों को लेकर भी एक ऐसा भाव उपजा है, गनीमत यह है कि अवमानना के डर से इसका उद्गगार उस तरह नहीं प्रकट हो रहा है जिस तरह खासकर निचली आदलतों के प्रति समाज का भाव है। आज यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है। अदालतों खासतौर से हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में नियुक्ति प्रक्रिया को एक बार फिर से परखा जाए। एक बार फिर से यह आवाज़ उठने लगी है कि कोलेजियम पद्धति से होने वाली नियुक्ति जिसमें न्यायपालिका का ही वर्चस्व है, अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पायी है। हाल ही में हुयी कुछ घटनाओं ने इसे और पुख्ता किया है। यह आरोप हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीमकोर्ट तक के जजों तक लगे। माना यह जा रहा है कि पांच सदस्यीय जजों के कोलेजियम के पास वह साधन नहीं हैं जिससे कि चुनाव के पहले अभ्यर्थियों के चरित्र को जांच-परख सके।   अभी हाल ही में केंद्रीय सूचना आयोग ने एक सूचना आयोग ने एक सख्त टिप्पणी में कहा है कि मुख्य न्यायाधीश कार्यालय को सभी सूचनाओं को न देने जैसी कोई व्यवस्था सूचना का अधिकार कानून में नहीं दी गयी है। टिप्पणी में कहा गया है कि सूचना अधिकार कानून से मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को पूरी तरह से बाहर करने संबंधी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है और साथ ही कानून की धारा 2(एफ) में जिन सूचनाओं को कानून की ज़द से बाहर रखा गया है उसमें इस कार्यालय का नाम शामिल नहीं है।    दरअसल आर.टी.आई एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल ने आर.टी.आई के तहत आयोग से यह जानकारी मागी थी कि जजों की नियुक्ति कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.जी बालकृष्णन और कानून मंत्री के बीच में क्या पत्राचार हुआ था। भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय ने वह पत्राचार आयोग को देने से मना कर दिया था। आयोग की टिप्पणी इसी संदर्भ में थी।   न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में बनाए जा रहे संवैधानिक प्रावधानों पर बोलते हुए डॉ. अंबेडकर ने कहा था “इस बात में कोई शक नहीं है कि भारत का मुख्य न्यायाधीश प्रसिद्ध व्यक्ति होगा लेकिन फिर भी वह एक हमारे आपकी तरह एक आदमी ही होगा और उसमें भी वही गुण-दोष होंगे जो हमारे आप में होते हैं लिहाजा हम भारत के मुख्य न्यायाधीश को ऐसी शक्ति नहीं दे सकते कि जो हमने राष्ट्रपति या तत्कालीन सरकार को नहीं दी है। लिहाजा मेरा मानना है ऐसा करना ख़तरनाक हो सकता है। साथ ही अंबेडकर ने यह भी कहा कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें नहीं लगता कि हमारे देश में अपनी जिम्मेदारियों के प्रति ऐसी संवेदनशीलता है जैसी कि अमेरिका में दिखायी देती है इसलिए राष्ट्रपति के हाथ में बगैर किसी सीमा-रेखा खींचे नियुक्ति की शक्ति देना खतरनाक हो सकता है। इसी तरह मुझे लगता है कि हर वह नियुक्ति जो कार्यपालिका करेगी उस पर विधायिका की अनुमति लेना भी उपयुक्त नहीं होगा”।    लेकिन हमने देखा कि जैसे-जैसे समय बदलता गया हर संस्था ने जजों के नियुक्ति के अधिकार को अपनी तरफ खींचना शुरू किया लेकिन हमने देखा कि सन् 1982 में एस.पी गुप्ता केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला था कि जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका का वर्चस्व होना चाहिए। नतीज़ा यह हुआ था कि ऐसे मामले सामने आए जिसमें मुख्यमंत्री और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एक समझौता करने लगे। उदाहरण के तौर पर अगर हाईकोर्ट के छ: पद खाली होते थे तब दो-दो पदों पर मुख्यमंत्री व केंद्र सरकार का उम्मीदवार लिया जाता था और दो न्यायपालिका का। नतीज़तन न्यायाधीशों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगने लगे। ऐसे मामले सामने आए जिसमें न्यायाधीशों पर राजनीतिक वफादारी का शक होने लगा। लेकिन 11 साल बाद एक नौ-सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने इस पूरे फैसले को उलट दिया।    सन् 1993 में एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत सरकार मामला सुप्रीमकोर्ट की नौ सदस्यीय बेंच के पास भेजा गया जिसने अपने 1982 के फैसले को पूरी तरह पलटते हुए कहा कि जजों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश का ही पूर्ण वर्चस्व रहना चाहिए। तब से आज तक लगभग 18 साल से जजों की नियुक्ति न्यायपालिका के ही कोलेजियम द्वारा की जाती है। अब जाकर इस पद्धति में भी दोष पाया गया।      ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 23 मई 1954 को सर विस्टन चर्चिल ने कहा था- शायद वही लोग जिन्होंने न्यायाधीश का जीवन जिया हो, यह समझ सकते हैं कि एक जज एकाकीपननिष्ठ ज़िम्मेदारी कैसे निभा पाता है। आज भारत में अगर कोई एक संस्था है जिसकी विश्वसनीयता अपेक्षाकृत सर्वाधिक है तो वह है भारत का सर्वोच्च न्यायालय। हाल में जिस तरह से कुछ मामलों में इस संस्था ने अपनी दृढ़ता व निष्पक्षता का परिचय दिया उसने न केवल पूरे सिस्टम को दुरुस्त करने में एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुयी है बल्कि भारतीय समाज के सोच में भ्रष्टाचार को लेकर क्रांतिकारी परिवर्तन भी आया है। बेचैन भारत सरकार के नुमाइंदे को सर्वोच्च न्यायालय में कहना पड़ा “अदालत अपनी लक्ष्मण रेखा समझे ”। यह अलग बात है कि अदालत ने भी उसी तत्परता और उससे बेहतर तर्कशक्ति दिखाते हुए उसी लाक्षणिक शैली में कहा- “अगर लक्ष्मण रेखा न लांघी गयी होती तब रावण का वध न होता ”।    संस्थाओं के कार्यकलापों का विश्लेषण करना समुन्नत प्रजातंत्र में अपरिहार्य क्रिया मानी जाती है लेकिन कई बार यह विश्लेषण अतिवादी स्वरूप ले लेता है और उन संस्थाओं को ढ़हाने का काम करने लगता है।    इसमें कोई दो राय नहीं है कि निचली अदालतों को लेकर जनता में एक आक्रोश है और उसे सुधारा जाना निहायत ज़रूरी है। यह भी उतना ही सही है कि अगर अवमानना के अधिकार अदालतों के पास न होते तब यह जनाक्रोश एक दूसरा ही रंग अब तक ले चुका होता। 1968 में लॉर्ड डेनिंग ने अपनी एक टिप्पणी में कहा था- “मुझे तत्काल यहां यह बताना है कि अवमानना का अधिकार हमें अपनी गरिमा को अक्षुण्ण रखने कि लिए कभी नहीं करना होगा क्योंकि गरिमा दूसरी पुख्ता बुनियादों पर खड़ी है और न ही हम इसे किसी की आवाज़ दबाने के लिए इस्तेमाल करेंगे ”। लॉर्ड एटकिन्स ने भी कहा था- “ न्याय को सामान्य आदमियों की आलोचना झेलना सीखना होगा ”।    आज भारत में न्यायिक प्रक्रिया कहीं अपनी पटरी से खिसक गयी है और हाल ही में सुप्रीमकोर्ट को यह पूछना पड़ा कि एल.एन मिश्रा की हत्या का 36 साल पुराना मामला आज तक अधर में क्यों लटका रहा। बेपटरी हुए इस न्याय-प्रक्रिया का एक चौकाने वाला उदाहरण लें। आज समूचे देश में ज़िला व सत्र अदालतों में करीब दो करोड़ फौजदारी मामले हैं जबकि 80 लाख दीवानी के मामले हैं। लेकिन हाईकोर्ट में जाते-जाते यह मामला उलटा हो जाता है और देश के उच्च न्यायालयों में जहां केवल सवा आठ लाख फौजदारी के मामले हैं वहीं 33 लाख दीवानी के मामले हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि चूंकि अधिकांश गरीब ही आपराधिक मामलों में फंसते है और उनकी हैसियत नहीं होती ऊपरी अदालतों में जाने की लिहाज़ा पैसे के अभाव में ऊपर नहीं जा पाते और जेल में सड़ते हैं जबकि पैसे वाला आदमी आराम से हाईकोर्ट से सुप्रीमकोर्ट तक अपनी ज़मीन-ज़ायदाद के मामले लेकर चला जाता है। उपरोक्त कारण शायद स्थिति की सबसे प्रबल व्याख्या करते हैं।   
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क्या हो गया है इन बीमारू राज्यों को ?
कुछ माह पहले हेडमास्टरों की एक बैठक में एक सरकारी अधिकारी ने कहा “ सभी बच्चों का दाखिला लें ; उनके साथ मारपीट न करें ; उन्हें पास करके अगली कक्षा में भेजें और सुनिश्चित करें कि वे अगले साल भी दाखिला लें और अगर आप ऐसा कर लेते हैं तो आप यह तय मानिए कि आपने शिक्षा के अधिकार के तहत मिले अपने टारगेट को प्राप्त कर लिया है ”। अधिकारी के इस आदेश के पीछे छिपा संदेश स्पष्ट था। संकेत यह था कि बच्चा पढ़ने आए न आए, रजिस्टर में नाम होना चाहिए; पढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं है; और अगले साल भी यही काम करना है ताकि येन-केन-प्रकारेण ‘ लक्ष्य ’ हासिल हो सके।    एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट(असर)-2011 की ताज़ा रिपोर्ट में यह किस्सा बयां किया गया है। व्यापक रूप से किए गए इस सर्वेक्षण में सरकार के तमाम दावों के खोखलेपन को उजागर किया गया है। अध्ययन में इस बात को भी दर्शाया गया है कि किस तरह से बीमारू राज्य(बिहार, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और साथ ही साथ उत्तराखण्ड व छत्तीसगढ़) शिक्षा के क्षेत्र में लगातार पिछड़ रहे हैं। भारत सरकार ने प्राथमिक शिक्षा के बजट को बढ़ाते हुए 68,710 (सन् 2007-08) से बढ़ाकर 97,255 करोड़ (सन् 2009-10) कर दिया लेकिन ऐसा लग रहा है कि इन सारे प्रयासों पर संबंधित राज्य सरकारों के भ्रष्ट-तंत्र ने पानी फेर दिया है। दरअसल शिक्षा देने की ज़िम्मेदारी संवैधानिक रूप से ही नहीं व्यावहारिक रूप से भी राज्य सरकारों की ही है।    असर की रिपोर्ट देखने के बाद यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या इसी किस्म के प्रयासों से हम चीन जैसे राष्ट्रों से मुकाबला कर सकेंगे। आज भारत में जहां उच्च-शिक्षा के लिए  केवल 13.5 प्रतिशत छात्र दाखिला(जी.ई.आर) ले रहे हैं  वहीं चीन व मलेशिया जो हमसे काफी पीछे रहा करते थे, के 22.1 व 24 प्रतिशत छात्र आज उच्च शिक्षा में दाखिला लेते हैं। जबकि अमेरिका में उच्च-शिक्षा में 81.6 प्रतिशत छात्र प्रवेश लेते हैं। एक और उदाहरण देखिए। आज से 18 साल पहले जहां चीन में केवल 1900 पी.एच.डी हुआ करते थे (जबकि भारत में करीब 3000 पी.एच.डी होते थे) आज 22 हजार पी.एच.डी हर साल निकलते हैं। भारत में केवल छ: हजार पी.एच.डी निकल रहे हैं जबकि अमेरिका में 40 हज़ार। अगर यही स्थिति रही तब भारत “पॉवर इज़ नॉलेज” (ज्ञान ही शक्ति है) की दौड़ में कितना पीछे रहेगा इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।    असर की रिपोर्ट के अनुसार यू.पी, बिहार, मध्यप्रदेश में कक्षा पांच में आधे से ज्यादा छात्रों को कक्ष दो का ज्ञान नहीं रहता, वह गणित से घबड़ाया हुआ है।  दाखिले के जो आंकड़े राज्य सरकारों के है खासकर उत्तरप्रदेश और बिहार के वे असर के आंकड़ों के मुताबिक फर्जी हैं।    उत्तरप्रदेश के ज़िला आजमगढ़ में जब एक युवा ग्राम-प्रधान ने वजीफा देने के लिए कक्षा पांच के छात्रों को बुलाया और अध्यापकों से कहा कि जो-जो बच्चे छात्रवृत्ति ले रहे हैं उनसे रजिस्टर में हस्ताक्षर करवाएं तो बमुश्किल-तमाम चार बच्चों ने हस्ताक्षर किया जबकि अन्य 70 बच्चों ने अंगूठा लगाया। अचंभित प्रधान ने अध्यापकों से जब अंगूठा लगाने का कारण पूछा तब अध्यापकों ने बताया कि ये छात्र लिख नहीं सकते। गहराई में जाने पर पता चला कि राज्य के अफसरों और मंत्री की हिदायत है कि अगर उपस्थिति पूरी नहीं हुयी या छात्र कक्षा में फेल हुए तो अध्यापक का तबादला कर दिया जाएगा। लिहाज़ा उत्तरप्रदेश के अधिकांश भाग में शिक्षक, छात्र आए न आए उपस्थिति दर्ज करते हैं, छात्र को पढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं होती और अगले क्लास में उनका दाखिला हो जाता है।   चूंकि शिक्षा के क्षेत्र में राज्य सरकार की भूमिका बहुत बड़ी है और अभी तक शिक्षा को लेकर जनमत इतना प्रबल नहीं हुआ है कि कि सरकारें उससे प्रभावित हों लिहाज़ा लगातार शिक्षा को लेकर सरकारी उदासीनता बनी हुयी है। यहां तक कि उत्तरप्रदेश और बिहार ऐसे राज्य हैं जो कि अभावग्रस्त के मतों से सरकार में आते हैं, उनके यहां भी यह उदासीनता विकराल रूप से है। असर के सर्वेक्षण में पाया गया कि जहां दक्षिण के तमाम राज्य और उत्तर में बिहार और छत्तीसगढ़ ने कुछ क्षेत्रों में अच्छी प्रगति दिखायी है वहीं उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश बुरी तरह पिछड़े हैं। 11 से लेकर 14 वर्ष की आयु के बच्चों का स्कूल में दाखिला प्रतिशत उत्तरप्रदेश में सबसे खराब रहा है। उसी तरह से उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में अभिभावकों का भरोसा सरकारी स्कूलों से इतना उठ चुका है कि वो ग़रीबी के बावजूद बड़े पैमाने पर महंगे प्राइवेट स्कूलों की तरफ भाग रहे हैं।    बीमारू राज्यों में राजस्थान और नए राज्य छत्तीसगढ़ को छोड़कर बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश क्रमश: सबसे नीचे हैं। मानव विकास सूचकांक 2011 की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार बिहार, मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश सबसे नीचे क्रमश: 35, 33 व 32वें स्थान पर हैं। 34वें स्थान पर ओडिशा है। दरअसल छत्तीसगढ़ और झारखण्ड तीसवें और इकतीसवें स्थान पर हैं क्योंकि यहां प्राकृतिक संसाधनों को जमकर बेचा जा रहा है जिससे प्रतिव्यक्ति-आय सरकारी दस्तावेजों में बढ़ गयी है। हालांकि इन सभी पांच राज्यों में स्वास्थ्य और शिक्षा बेहद खराब है। उत्तरप्रदेश की सरकार जो कि अपने को गरीबों की मसीहा मानती है उसने पांच साल वर्ष के शासनकाल में मानव विकास लगभग हर मानदण्ड पर राष्ट्रीय औसत से नीचे रहा है चाहे वह प्रतिव्यक्ति आय हो, साक्षरता हो या स्वास्थ्य संबंधी कारक हों। ऐसा लगता है कि इन राज्यों में केंद्र द्वारा दिए गए फंड का इस्तेमाल सरकारी अमला अपनी जेब भरने में कर रहा है।    हाल ही में सी.ए.जी की एक रिपोर्ट में पता चला है कि बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में मरे हुए लोगों को रोज़गार दिया गया है। विश्व भूख सूचकांक की एक अन्य ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश बेहद गरीब अफ्रीकी देशों से भी बदतर स्थिति में हैं और इसको बेहद चिंतनीय वर्ग में रखा गया है।    अभी हाल ही में बिहार में लड़कियों को साइकिल देने की योजना का राज खुला और पाया गया कि कटिहार, शिवहर, रोहतास सरीखे ज़िलों में एक-एक लड़की के नाम पर दो से तीन साइकिलों की धनराशि निकाली जा चुकी है और जांच में उनके पिता और घर का पता नहीं मिल रहा है। मिड-डे मील योजना की जांच करने पर पता चला कि  माननीय गुरू जी लोगों ने उपस्थिति रजिस्टर में छात्रों की उपस्थिति शत-प्रतिशत दिखायी है जबकि बच्चों की वास्तविक उपस्थिति एक-चौथाई ही है वहीं मिड-डे मील का तीन-चौथाई खुद खा गए हैं। केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित सर्वशिक्षा अभियान के तहत बिहार के 380 प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों का तीसरी पार्टियों से निरीक्षण कराया गया जिसमें 350 में गड़बड़ियां पायी गयीं। असर व अन्य संस्थाओं की जांच में उत्तरप्रदेश में भी कमोबेश इसी तरह की स्थिति पायी गयी। ध्यान रहे कि बिहार में नीतीश कुमार को जबर्दस्त वोट इन्ही योजनाओं के आधार पर मिले थे।   ‘बीमारू’ राज्यों खास करके यू.पी, बिहार व मध्यप्रदेश में अगर कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठाया गया तो अगले दस साल बाद जो नयी पीढ़ी आएगी व न तो रोज़गार की होड़ में आगे होगी न स्वास्थ्य के स्तर पर बेहतर होगी। इन राज्यों में भ्रष्टाचार भी अपने चरम पर है। दुष्यन्त कुमार का शेर याद आता है-सिर से सीने में कहीं, पेट से पांवों में कभी,एक जगह हो तो कहें, दर्द इधर होता है। Posted by at 20:12 2 comments
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पत्रकारिता में गुणात्मक बदलाव ज़रूरी
नए साल में मीडिया की चुनौती
नोबल पुरस्कार विजेता एवं विख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने इस साल के प्रथम सप्ताह में ही मीडिया की खराब गुणवत्ता की दो घटनाएं झेलीं। लोकपाल से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने जवाब दिया। अगले दिन जब उन्होंने देश के एक बड़े अंग्रेज़ी अख़बार और कई टी.वी चैनलों को देखा तब उसमें शीर्षक पाया “ लोकपाल विधेयक सूझ-बूझ से लाया गया बिल – अमर्त्य सेन ”। जबकि कुछ अखबारों ने शीर्षक दिया था-       “ लोकपाल विधेयक बगैर सोचे-समझे लाया गया बिल- सेन ”। एक अन्य आर्थिक समाचार पत्र ने एक दिन पहला शीर्षक दिया और दूसरे दिन दूसरा शीर्षक।     एक अन्य बैठक में उसी दिन सेन ने कैंसर पर भाषण दिया। एक अखबार की हेडलाइन थी- “ धूम्रपान एक निजी मामला है – सेन ” जबकि दूसरे अखबार ने- “ धूम्रपान करने वालों की आज़ादी पर रोक लगनी चाहिए- अमर्त्य सेन ”। तीसरी घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश के एक बड़े अंग्रेज़ी अखबार ने 15 दिसंबर को एक शीर्षक दिया- “ भ्रष्टाचार से जनता सड़क पर नहीं निपट सकती- अमर्त्य सेन ”। अमर्त्य सेन का कहना था कि उन्होंने एक भी ऐसा स्टेटमेंट नहीं दिया और ऑडियो-टेप इसके गवाह हैं।    अपनी इस वेदना को व्यक्त करते हुए इस नोबल पुरस्कार विजेता ने हालांकि प्रजातंत्र को मज़बूत करने में भारतीय मीडिया की भूमिका को सराहा भी है लेकिन उनकी यह अपेक्षा कि मीडिया को कम से कम तथ्यों के मामले में सचेत होना चाहिए, हमें यह सोचने को मजबूर करता है कि पत्रकारिता के पेशे में हमें और बेहतर करने की ज़रूरत है। तथ्य को पेश करने में इतना बड़ा विरोधाभास हमारी व्यावसायिक कुशलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। ऐसे समय में जबकि तकनीकि विकास के बाद से हर वक्तव्य रिकॉर्ड पर होता है, ऐसा विरोधाभास विषय को लेकर हमारी समझ पर प्रश्नचिह्न लगाता है और साथ ही साथ यह भी प्रदर्शित करता है कि हम तथ्य देने में कहीं गैरज़िम्मेदार हैं।    दरअसल इस पूरी समस्या के मूल में जाना होगा। पत्रकारिता में कौन सा वर्ग आ रहा है  ? उसके प्रशिक्षण के उपादान व संस्थाएं कैसी हैं ? पत्रकारों की नियुक्ति में किन चीज़ों पर ध्यान देने की ज़रूरत है ? यह भी देखना उतना ही ज़रूरी होगा कि एक बार पत्रकारिता में आने के बाद अखबार या चैनल उन्हे किस तरह से “ऑन-जॉब” ट्रेनिंग देते हैं।   जैसे-जैसे समाज प्रबुद्ध होता है और उसकी तार्किक क्षमता बढ़ती है वैसे-वैसे संस्थाओं से उसकी अपेक्षाएं भी बढ़ती जाती है। अंतर्संस्था-अंतर्क्रियाओं की गुणवत्ता बदलने लगती है। उन सब के प्रति सुग्राह्य होना एक पत्रकार का शाश्वत भाव होना चाहिए। आज रिपोर्टरों का एक बड़ा वर्ग है जो सीधे देश की सर्वोच्च प्रजातांत्रिक संस्था संसद की रिपोर्टिंग के लिए भेज दिया जाता है जबकि उसे यह नहीं मालूम होता कि अन्य निचली संस्थाएं कैसे काम करती हैं या संविधान में संघीय ढ़ाचे के तहत किन संस्थाओं के क्या कर्तव्य और जिम्मेदारियां हैं ? उदाहरण के तौर पर अगर एक पॉलिटिकल रिपोर्टर को, जो कि संसद की रिपोर्टिंग करता है, ज़िला परिषद नाम की संस्था के कर्तव्य या अधिकार नहीं मालूम हैं तब वह प्रजातांत्रिक पद्धति को पूरी तरह न तो समक्ष पाएगा और न हि उसकी रिपोर्टिंग परिपक्व होगी।    चूंकि सामाजिक विकास एक सतत प्रक्रिया है लिहाज़ा बेहतर यह होगा कि पत्रकारों को सबसे निचली संस्थाओं व प्रक्रियाओं से गुज़ारा जाए। जैसे- थाना, शव-विच्छेदन गृह, नगरपालिका, विकासखण्ड, निचली अदालतें आदि। इसके बाद इन्हे राज्य के बड़े शहरों या राजधानी में बड़ी समस्याओं की रिपोर्टिंग के लिए एक नए रिफ्रेशर कोर्स के बाद भेजा जाए। यहां कहने का अभिप्राय यह नहीं है कि निचली संस्थाओं की रिपोर्टिंग कोई निम्न किस्म की पत्रकारिता है बल्कि यह कि इन संस्थाओं के कार्यकलापों व उपादेयता को जाने बगैर पूरी प्रजातांत्रिक व्यवस्था या संसदीय प्रणाली को समझना मुश्किल होता है। ऐसे तमाम वरिष्ठ पत्रकार मिलते हैं जो बगैर उत्तरप्रदेश गए पूरे चुनाव का विश्लेषण कर देते हैं जबकि उन्हें यह भी नहीं मालूम होता कि उत्तरप्रदेश में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत कितना है, या बुंदेलखण्ड प्रदेश के पश्चिम में है या पूर्व में या मानव विकास सूचकांक क्या होता है और किन आधार पर बनाया जाता है।   अभी हाल ही में चंडीगढ़ हाईवे के पास दो सांड़ों की जबर्दस्त लड़ाई हुयी। कई गाड़ियां क्षतिग्रस्त हुयी। ऑन जॉब ट्रेनिंग न होने की वजह से ही एंकर ने स्पॉट पर पहुंचे रिपोर्टर से लाइव चैट में पूछा – दोनो सांड़ किस बात पर लड़े थे ?  जाहिर है कि एंकर को समुचित ट्रेनिंग नहीं दी गयी है।     यहां यह भी बताना ज़रूरी है कि भारतीय पत्रकारिता की बुराई करने वालों का एक बड़ा वर्ग है जो स्वयं सुविधाभोगी रहा है और पत्रकारिता की बुराई वह इंटलेक्चुअल जिमनास्टिक्स(बुद्धि-विलास) के रूप में करता है। पी.सांईनाथ के लेखों से कुछ आंकड़े निकालकर पत्रकारिता पर आरोप लगाता है कि इन्हे गरीबों की चिंता नहीं है। यूरोप का थोड़ा-बहुत इतिहास जानकर वह यह बताना चाहता है कि भारत का पत्रकार अशिक्षित है और ग़ालिब के कुछ शेर उद्धृत करके वह अपने को धर्मनिरपेक्ष बताना चाहता है। भारतीय पत्रकारिता की ऐसे लोगों को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है लेकिन जब समाज का एक वर्ग या अमर्त्य सेन जैसे लोग पत्रकारिता पर प्रश्नचिह्न लगाएं तब यह सोचना पड़ता है कि गलती कहां हुयी है।   गरीबी के प्रति संवेदनशील होने के लिए हमें गरीबी जीना होगा। दिल्ली से उड़कर पटना के फाइव-स्टार होटल में पड़ाव डालकर स्कॉर्पियो से बिहार की गरीबी देखकर कोई पत्रकार गरीबी की विभीषिका पर लिखना चाहता है तब उसके समझ में नहीं आएगा। एक किस्सा याद आता है। किसी धनी व्यक्ति की बेटी से एक गरीब पर निबंध लिखने को कहा गया। उसने लिखा- गरीब आदमी इतना गरीब होता है कि उसका बंगला भी गरीब होता है, उसकी गाड़ी भी गरीब होती है, उसका ड्राइवर भी गरीब होता है, उसका माली भी गरीब होता है, सब कुछ गरीब होता है।        पत्रकारों की संस्थाओं को और वरिष्ठ संपादकों को इस ओर ध्यान देना होगा। एक सामूहिक फैसले के तहत पत्रकारिता के पेशे में गुणात्मक सुधार एक सतत प्रक्रिया है। लोकपाल बिल की सूक्ष्मताओं से लेकर यूरिया खाद की अनुपलब्धता तक सभी पक्षों पर एक सम्यक ज्ञान के बिना पत्रकारिता की पूरी उपादेयता नहीं बन पाएगी। Posted by at 20:24 1 comments
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मानव विकास कार्यक्रम में गरीब कहाँ? भारत की अर्थव्यवस्था का जो सबसे बड़ा विरोधाभास है वह यह कि जहाँ सकल घरेलू उत्पाद के स्तर पर भारत दुनिया के दस देशों में से एक है वहीं इस विकास को जब सामान्य व्यक्ति तक पहुँचाने की बात आती है तब वह महज ऊपर के वर्ग तक सिमट कर रह जा रही है। एक अन्य अध्ययन के अनुसार भारत दुनिया के उन २० भूखे देशों में है जिनमें गृह युद्ध की आशंका है।
विश्व प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री व चिली के भूतपूर्व शिक्षा मंत्री अरनेस्टो शिफेलबेन ने कहा था- एक सजग व संपन्ना अभिभावक का बच्चा जब पहली बार स्कूल जाता है तब उसके पास लगभग ६०० से १५०० शब्दों का ज्ञान होता है जबकि एक गरीब और गैरजिम्मेदार अभिभावक का बच्चा स्कूल जाता है तब उसे मात्र २५० से ५०० शब्दों का ज्ञान होता है और यहीं से शुरू होती है शिक्षा में असमानता।


इस विषमता को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी), जो कि दुनियाभर के देशों का मानव सूचकांक जारी करता है, ने गत वर्ष से एक नया अध्ययन शुरू किया है जिसके तहत असमानता समायोजित मानव विकास सूचकांक जारी किया जाता है। हाल ही में जारी संबंधित अध्ययन में पता चला है कि मानव विकास कार्यक्रम का लाभ भी ऊपरी वर्ग को ज्यादा मिल रहा है जबकि नीचे का वर्ग इस विकास से अछूता बना है। अध्ययन के अनुसार सबसे ज्यादा विषमता उत्तर भारत के नौ राज्यों में है और इसमें अग्रणी है मध्यप्रदेश।


यूएनडीपी के इस अध्ययन में मानव विकास सूचकांक के तीन मानकों-प्रतिव्यक्ति आय, शिक्षा और स्वास्थ्य को लिया गया है और पाया गया कि भारत जहाँ मानव विकास सूचकांक में १६९ देशों में ११९वें स्थान पर है वहीं विषमता आधारित मानव विकास सूचकांक में यह ३२ प्रतिशत और नीचे गिर गया है। इसके ठीक विपरीत ऊपर के वर्ग के बारे में एक अन्य अध्ययन में बताया गया है कि इसकी संपत्ति अगले पाँच साल में तीन गुना होने जा रही है। अगर भारत के अपने ही राज्यों के बीच तुलना की जाए तो जहाँ केरल विश्व के तमाम बड़े देशों से मुकाबला कर रहा है वहीं उड़ीसा जैसा राज्य म्यांमार और यमन जैसे देशों के बीच लटका हुआ है।


भारत में सबसे बड़ी विषमता शिक्षा को लेकर है जबकि बाद में स्वास्थ्य और आय का नंबर आता है। अध्ययन में बताया गया है कि राज्यों की उपलब्धियाँ गलत साबित होती हैं जब उन राज्यों के विकास मानकों को इस नए तराजू पर तौला गया। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि उत्तर भारत के राज्यों में विषमताजनित अभाव ज्यादा प्रखर है जिसकी वजह है मानव विकास का लाभ निम्न वर्ग को नहीं मिल पाना। इस विषमता के कारण उत्तरप्रदेश, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसग़ढ़, बिहार, उत्तराखंड, कर्नाटक और हरियाणा में नीचे के वर्ग में शिक्षा संबंधी योजनाओं का लाभ उस तरह नहीं मिल पाया है जिस तरह केरल के लोगों को मिला है। सबसे बुरी स्थिति छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश की है जहाँ स्वास्थ्य संबंधी सेवाएँ ग्रामीण अंचलों या निम्न वर्ग तक बिल्कुल भी नहीं पहुँच पाई हैं।


अध्ययन में यह भी पाया गया कि विश्व के अन्य देशों की तुलना में भारत में सबसे ज्यादा विषमता जनित अभाव की स्थिति है जिसके तहत तमाम विकास कार्यक्रम बेमानी साबित हो रहे हैं।


उधर विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस रिपोर्ट के हिसाब से जहाँ भारत अपने बालमृत्यु की ५० की दर के साथ अब भी घाना, बांग्लादेश, सलोमन आईलैंड, गुआना जैसे देशों से खराब स्थिति में है वहीं २३० की मातृमृत्यु दर के साथ यह जमैका, श्रीलंका, ट्रिनिदाद, टोबैको, यूक्रेन और सउदी अरब देशों से बदतर स्थिति में है।


भारत की अर्थव्यवस्था का जो सबसे बड़ा विरोधाभास है वह यह कि जहाँ सकल घरेलू उत्पाद के स्तर पर भारत दुनिया के दस देशों में से एक है वहीं इस विकास को जब सामान्य व्यक्ति तक पहुँचाने की बात आती है तब वह महज ऊपर के वर्ग तक सिमट कर रह जा रही है। एक अन्य अध्ययन के अनुसार भारत दुनिया के उन २० भूखे देशों में है जिनमें गृह युद्ध की आशंका है। सबसे ताज्जुब की चीज यह है कि नेपाल जो कि तमाम उपद्रव व सत्ता परिवर्तन से ग्रस्त है, वहाँ गैर-आय मानव विकास काफी अच्छा माना जा रहा है। इस क्षेत्र में ब्राजील एक अच्छा उदाहरण है जहाँ विकास को सीधी डिलिवरी के सिद्धांत के तहत सामान्य जनता को पहुँचाया गया। नतीजा यह हुआ कि गिनिकॉफिसेंट पर, जो कि आर्थिक विषमता को बताता है, ब्राजील लगातार बेहतर करता रहा और इसके ठीक विपरीत भारत इस पैमाने पर नीचे गिरता रहा। गरीब-अमीर की खाई बढ़ती रही। अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि अगर समाज में आर्थिक विषमता बढ़ती है तब विकास के लाभ को नीचे तक ले जाने में कई गुना खर्च बढ़ जाता है। भारत में तथाकथित आर्थिक सुधार से पहले जहाँ विकास दर चार प्रतिशत थी वहीं रोजगार के अवसर दो प्रतिशत की दर से बढ़ रहे थे जबकि वर्तमान में आठ से नौ प्रतिशत की विकास दर के बावजूद रोजगार विकास की दर महज एक प्रतिशत रह गई है(यानी हर साल जनसंख्या वृद्धि के मद्देनजर करीब एक करोड़ अतिरिक्त लोग बेरोजगार हो रहे हैं)।


इसका दूसरा पहलू यह है कि लगभग छः से आठ प्रतिशत आर्थिक विकास नए रोजगार सृजन से नहीं हो रहा है बल्कि पूँजी निवेश तकनीक व पहले से ही रोजगार में रहे लोगों की क्षमता की वजह से हो रहा है। नतीजा यह हुआ कि एक बड़ा वर्ग लगातार अभावग्रस्त होता जा रहा है। इसका एक उदाहरण है जमशेदपुर स्टील प्लांट का जिसमें कि १९९१ में ८५ हजार कर्मचारी दस लाख टन स्टील पैदा करते थे जबकि २००५ में ४४ हजार कर्मचारी ५० लाख टन स्टील पैदा करने लगे। उसी तरह पुणे स्थित टाटा मोटर्स में १९९९ में ३५ हजार कर्मचारी एक लाख उनतीस हजार वाहन बनाते थे जबकि २००४ में २१ हजार कर्मचारी तीन लाख ग्यारह हजार पाँच सौ वाहन बनाने लगे। कहना न होगा जो कर्मचारी बच गए उनका समुचित नियोजन नहीं हो पाया।


यही वजह है कि जो राज्य मानव विकास सूचकांक पर एकदम फिसड्डी है उनकी भी आर्थिक विकास दर १० से १४.५ फीसद तक बताई जा रही है। छत्तीसगढ़ (१४.५%), मध्यप्रदेश (११%), उत्तराखंड (१२%), बिहार (१२%) विकास दर की सनद लिए हुए दुनिया भर में गाल बजा रहे हैं कि उनके मुख्यमंत्री ने कमाल कर दिया है जबकि हकीकत यह है कि यह वही राज्य हैं जो कि मानव विकास सूचकांक पर फिसड्डी साबित हुए हैं और विषमता समायोजित मानव विकास सूचकांक के मानदंडों पर तो बिल्कुल जमीन पर आ गए हैं। Posted by at 21:12 1 comments
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यह क्या हो गया है यू.पी.ए सरकार को
इस वर्ष की दो बड़ी विशेषताएं रही हैं। पहला, जनता की सामूहिक चेतना में व्यापक बदलाव जो कि आने वाले दिनों में काफी सकारात्मक भूमिका निभाएगा और दूसरा वर्ष के उत्तरार्ध में सरकार की लगातार गिरती साख। साख गिरने का कुछ कारण तो कुछ घटनाओं को लेकर था लेकिन जो बची-कुची इज़्जत थी वह सरकार के अदूरदर्शी नेताओं ने गलत संदेश देकर ख़त्म कर दी।   खाद्य सुरक्षा बिल 64 वर्ष के शासनकाल का शायद सबसे बड़ा जनोपयोगी कानून बनने जा रहा है। बल्कि यूं कहें कि समूचे विश्व में सीधी डिलीवरी का इतना बड़ा कोई प्रयास नहीं हुआ है। लेकिन यू.पी.ए सरकार और इसके “ समझदार मैनेजरों ”  में सरकार के अच्छे कार्यों का भी श्रेय लेने की समझ नहीं है। यह बिल भी संसद में ठीक उसी दिन लाया गया जिस दिन विवादास्पद लोकपाल बिल सदन के पटल पर रखा गया लिहाज़ा मीडिया में और संपूर्ण देश में लोकपाल बिल पर जम कर चर्चा हुयी। खाद्य सुरक्षा बिल जिसमें कि एक रुपए से तीन रुपए तक या रियायती दरों पर लगभग 70 करोड़ लोगों को अनाज देने की सरकारी प्रतिबद्धता थी, चर्चा में नहीं रही। यू.पी.ए-2 के अब तक के शासनकाल में शीर्ष पर बैठे लोगों में राजनीतिक सूझ-बूझ की बेहद कमी नज़र आती है। विश्वास नहीं होता कि यह वही कांग्रेस का नेतृत्व है जिसे कई दशकों तक शासन चलाने का अनुभव रहा है।    उदाहरण के तौर पर सत्ता में बैठे लोग लगातार जनभावनाओं को समझने में चूक करते रहे, भ्रष्टाचार के खिलाफ उभरे जनांदोलन को भांप नहीं पाए और प्रारम्भ से ही एक “ एडवरसेरियल ”(विरोधात्मक भाव) अख़्तियार कर लिया। पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए घोटाले में कलमाड़ी को बचाने की कवायद करते रहे। दूसरी ओर जब टूजी स्पेक्ट्रम के राज़ का पर्दाफाश सी.ए.जी नाम की एक बहुत ही विश्वसनीय संस्था के द्वारा किया गया तब प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक और कपिल सिब्बल से लेकर दिग्विजय सिंह तक सभी ने उस संस्था की निंदा करनी शुरू कर दी, उनके अधिकारों को ही चुनौती दे डाली। हौसला यहां तक बढ़ा कि सुप्रीम कोर्ट में एटॉर्नी जनरल ने कह डाला कि सर्वोच्च अदालत अपनी सीमा में रहे। कुल मिलाकर जो भ्रष्टाचार की बात करे वह सरकार के ख़िलाफ।    इस बीच अन्ना हज़ारे आते हैं, एक विश्वसनीय गांधीवादी व अराजनीतिक चेहरे के रूप में जनता के लिए, सरकार को यह रास नहीं आया। जिन रामदेव का सजदा करने के लिए सरकार के चार बड़े मंत्री एयरपोर्ट पहुंचे थे उन्ही की चौकड़ी ने पलटी मारी और अन्ना को जेल भेज दिया। सोच में निरंतरता न होने का ही दोष था कि रामदेव को पहले सजदा करते हैं और उन्हीं रामदेव को धरना स्थल से उठा फेंकने के लिए पुलिस भेजते हैं।   दरअसल समस्या जनभावनाओं को न समझने वाले नेताओं की है। “जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई” चिदंबरम, कपिल सिब्बल से मनमोहन सिंह तक दरअसल कभी भी उस नीचे के वर्ग की भावनाओं, तकलीफों व अपेक्षाओं  से बाबस्ता नहीं रहे हैं। इनकी योग्यता अंग्रेज़ी बोलकर दूसरे के तर्कवाक्यों को काटने से अधिक कुछ नहीं रही है लिहाज़ा उनके हाथ में नीति-निर्धारण दिया जाना ही अपने-आप में एक जोखिम भरा फैसला था। नतीज़ा यह हुआ कि सरकार जाने-अनजाने में ही जनभावनाओं से दूर होती गयी और अंत में यह भाव वहां तक पहुंच गया कि जो भ्रष्टाचार उन्मूलन आंदोलन व अन्ना के साथ, वह सरकार का दुश्मन।    अगर गहराई से विश्लेषण करें तब पाएंगे कि मनरेगा अभी तक सीधी डिलीवरी का, जिसमें कि सरकार सीधे रोज़गार का सृजन करके पैसा ग्रामीण बेरोज़गारों को देती है, एक बेहद जनोपयोगी योजना रही है। लेकिन भ्रष्ट राज्य सरकारों के हाथ इसका क्रियान्वयन न होने की वजह से अपयश भी केंद्र सरकार के खाते में चला गया। सूचना का अधिकार जनसशक्तिकरण का एक क्रांतिकारी कदम है लेकिन सरकार में बैठे अंग्रेज़ीदान नेता इसे भी भुना नहीं पाए।     जहां भ्रष्टाचार को लेकर तापमान बढ़ता रहा वहीं महंगाई ने इस जनाक्रोश को और हवा दी। जिस सरकार के पास रिकॉर्ड 241 मिलियन टन अनाज़ पैदा हुआ हो, जिस सरकार के पास 65 मिलियन टन का खाद्यान्न रिज़र्व हो(जो कि समान्य से तीन गुना ज्यादा है) और जिस सरकार को अभावग्रस्त किसानों के आत्महत्या की खबरें लगातार आती रही हो, उस सरकार के कार्यकाल में महंगाई आसमान छू जाए, इसका सीधा मतलब था कि रायसीना शक्तिपीठ पर काबिज़ मनमोहन-चिदंबरम-कपिल सिब्बल की तिकड़ी को बदलते जनमत को समझने की क्षमता नहीं थी।   लोकपाल बिल को भी लेकर यही हुआ। प्रधानमंत्री अगर लोकपाल में शामिल हो जाते हैं तो कोई क़यामत-वरपा नहीं होगी लेकिन आज़ादी से ही नेहरू के आभामण्डल से प्रभावित कांग्रेसियों को यह बात गले नहीं उतरती कि प्रधानमंत्री की भी कोई जांच कर सकता है। लिहाज़ा 1968 से 1988 तक के पहले जो चार लोकपाल विधेयक आए उनमें प्रधानमंत्री को लोकपाल की जद में नहीं रखा गया। 1988 के बाद चार अन्य लोकपाल बिल गैर-कांग्रेसी सरकारों ने दिए और उन सभी में प्रधानमंत्री को शामिल किया गया। यह अलग बात है कि लोकपाल न तब पास हुआ न उसके बाद के चार बिलों में पास हुआ। कहने का मतलब, राजनीतिक वर्ग 43 साल से भ्रष्टाचार के ख़िलाफ एक निर्णायक लड़ाई के मूड में कभी नहीं रहा।   आज भी सत्ता पक्ष और राजनीतिक वर्ग द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि क़ानून सड़क पर नहीं बनता। यह सही है कि क़ानून सड़क पर नहीं बनता लेकिन जनता के पास रास्ता क्या था ? अगर क़ानून सड़क पर नहीं बनता तब क़ानून बनाने वाले को तो सड़क पर लाया जा सकता है। जनता वही करने की चेतावनी दे रही है।   खाद्य सुरक्षा बिल देश में बढ़ती अमीरी-गरीबी की खांई को कुछ कम करने का एक बड़ा ज़रिया हो सकता है। भारत जैसे देश में जहां कि जितनी अमेरिका की पूरी आबादी है उतने लोग रोज़ शाम को भूखे सोते हैं, सस्ते दाम पर अनाज उपलब्ध कराना किसी भी सरकार की नेक-नियति को उसकी स्थायी राजनीतिक सुग्राह्यता के रूप में जनता में पेश किया जा सकता था लेकिन आज संदेश यह जा रहा है कि सोनिया न होतीं तब मनमोहन एण्ड कंपनी इस बिल को कभी पास ही न होने देती। क्या संभव है कि सोनिया के मैनेजर कम से कम पार्टी के इस गिरते ग्राफ को रोक सकें ?    
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मीडिया निंदा परपीड़क भाव से ना करें परपीड़कों का मीडिया निंदा और प्रजातंत्रकेन्द्रीय मंत्री शरद पवार को चाटा पड़ा, 24×7 इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने घंटो नॉन स्टॉप दिखाया। चाटा एक बार पड़ा और ऐसे दिखाया गया जैसे एक लंबे समय से शरद पवार चाटा ही खा रहे हैं। तीन घंटे बाद वैल्यू एडिशन करते हुए मीडिया ने कहा “महंगाई का चाटा”। तर्कशास्त्र में माना जाता है कि इन्डीविजुअल घटना को अगर जर्नलाइज्ड फॉर्मेट में डाल दिया जाए तब वज़न और विश्वसनीयता बढ़ती है। जैसे ही हेडलाइन में “महंगाई का चाटा” रूपी वैल्यू एडिशन दिया गया राजनीतिक वर्ग गुस्से में आ गया। सत्ता में बैठे लोगों से लेकर विपक्ष के धुर समाजवादी नेता तक एक बार फिर संसद में मीडिया को कोसने लगे।    यही काम मीडिया ने टीम अन्ना के सदस्य व सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण को मारे-पीटे जाने पर भी किया, यही काम चिदंबरम पर चप्पल फेंके जाने पर भी किया और यही काम राहुल गांधी को खुश करने के लिए जब उत्तर प्रदेश के दो वरिष्ठ नेताओं ने काला झंडा लहराने वाले एक व्यक्ति को लात और जूतों से मारा, तब भी किया लेकिन तब राजनीतिक वर्ग को ऐतराज नहीं था। डर तब लगा जब मीडिया ने इसे महंगाई जनित आक्रोश के रूप में बताना शुरू किया। राजनीतिक वर्ग का डर यह था कि तब तो सड़क पर निकलना ही मुश्किल होगा। अब इन स्थितियों को जरा उल्टा करके देखें। अगर मीडिया पवार की घटना को ना दिखाए या कम करके दिखाए तब यह आरोप लगता कि मीडिया अज्ञात ताकतों के हाथों में खेल रही है।    अन्ना का धरना जब मीडिया ने कवर किया तब इन्ही लाल-बुझक्कड़ों ने कान के पास मुंह ले जाते हुए बताया “ मीडिया को टाटा का पैसा मिला है ”। बात हल्की न जाए तो आगे तर्क दिया- दरअसल टाटा भी भ्रष्टाचार के शिकंजे में फसने जा रहे थे तब जनता का ध्यान हटाने के लिए मीडिया को अन्ना की तरफ लगा दिया। ये लाल-बुझक्कड़ अपनी मानसिक भड़ास में तर्क का छौंका मारने के लिए अक्सर टाटा, अंबानी या अदृश्य कॉर्पोरेट घराना टाइप शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। बात को ज़्यादा पुख्ता करना हो तब अमेरिका का भी नाम रख लेते हैं। ऐसा लगता है मानो टाटा, अंबानी ना हो गए, सर्वशक्तिमान अदृश्य हाथ हो गए।   मीडिया पर पेशेवराना ढ़ंग से आरोप लगाने वाले कुंठित वर्ग तीन तरह के हैं। पहला वह जो कि हर प्रतिष्ठापित संस्था को ध्वस्त करने के लिए चाय की दुकान से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर तक के सेमिनार में अंग्रेज़ी बोलकर चुनिंदा तर्कवाक्यों का इस्तेमाल करता है, अंग्रेज़ी के अच्छे जुमले इस्तेमाल करता है और लगता है कि कोई दूर की कौड़ी लाया है। यह वो वर्ग है जो अद्वैतवाद से अवमूल्यन तक किसी भी विषय पर पक्ष में या विपक्ष में उसी शिद्दत से बोल सकता है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुए ऐसे सेमिनार-कम-डिनर-कम-दारू पार्टी में दो पेग के बाद यह चेहरे पर गंभीरता लाते हुए कहता है “यू नो पॉवरटी इज़ अ सीरियस प्रॉब्लम इन दिस कंट्री” और फिर पलट कर आयोजकों से कहता है- कल वापसी का टिकट मॉर्निंग फ्लाइट से कराया है ? यह वो वर्ग है जो सरकारी इमदाद के रूप में पदों को हासिल करता है, सत्ता सुख का भोग करता है और जब तक सत्ता सुख तब तक जिस संस्था को चाहे गाली दिलवा ले।    दूसरा वर्ग है उन लोगों का जो मीडिया को कुछ नज़दीक से देखे हैं, विश्वविद्यालयों में मुदर्रिस हैं और लोकप्रियता के लिए गाहे-बगाहे मीडिया की धज्जी उड़ाते हैं। टी.वी चैनलों में भी जाकर क्रांतिकारी भाव से मीडिया के खिलाफ बोलते हैं। चूंकि भ्रष्टाचार कर नहीं सकते इसलिए पहचान के लिए एक विरोधी भाव अख्तियार कर लेते हैं।   एक तीसरा वर्ग है जो सबसे ज़्यादा घातक है। घातक इसलिए है कि अगर आप किसी संस्था में रहते हुए उस संस्था की नैतिक आधार पर बुराई करते हैं तब आम धारणा यह बनती है कि आप वह नहीं हैं जो अन्य हैं। यह वो वर्ग है जो कि मीडिया से न केवल आजीविका हासिल करता है बल्कि लाखों रुपए की तनख्वाह महीने में खींचता है लेकिन समाजवादी चेहरा बनाए हुए अपने को बाकी सबसे अलग बताता है। पूंजीपति की खाता है, बिरादरी के सभी लोगों को समाजवादी मूल्यों से विरत होने के लिए गाली देता है।   मुद्दों पर वाद-विवाद का आशय सुधार होना चाहिए न कि दुकानदारी खड़ी करना। जनता ने जब मीडिया की बुराई की तब मीडिया के एक बड़े वर्ग ने इसे सार्थक भाव से देखा और सुधार के लिए कोशिश करने लगे। चूंकि मीडिया खास करके 24×7 चैनल्स का कंटेंट डिलीवरी सिस्टम एक जटिल प्रक्रिया से गुजरता है इसलिए मानदंड बनाने में समय लगता है। शरद पवार को चाटा मारना, दिखाया जाना इस बात का संदेश दे सकता है कि एक पागलपन की घटना को बार-बार दिखाकर मीडिया बिना वजह तूल दे रहा है और एक मंत्री का अपमान कर रहा है। लेकिन ज़रा दूसरा पहलू देखें। अगर इसे हम न दिखाएं या कम दिखाएं तब हम अपने उस कर्तव्य से विमुख होते हे जिसके तहत यह बताना ज़रूरी है कि देश के केंद्रीय मंत्री को भी व्यक्ति चाटा मार सकता है और वह भी उस माहौल में जहां आतंकवाद जबर्दस्त पैर पसार चुका है। एक अन्य मजबूरी समझें। हर क्षण कुछ नए दर्शक खबरिया चैनल से जुड़ते हैं, क्या इस खबर से उन्हें वंचित किया जा सकता है ? अखबार तो 24 घंटे में एक बार निकलता है लेकिन चैनल आपको हर क्षण खबर अपडेट करने के भाव में रहता है। यह भी संभव नहीं है कि बगैर चाटा दिखाए चाटा मारने वाले को गिरफ्तार होना दिखाएं क्योंकि तब हम खबर का मूल बगैर दिखाए, प्रभाव दिखाने लगेंगे जो तकनीकि रूप से गलत होगा।    आज भारत में दंगे या तो होते नहीं हैं या होते हैं तो व्यापक रूप नहीं ले पाते और न ही ज्यादा दिनों तक ठहर पाते हैं। इसकी वजह यह है कि अगर घटना हुयी तो 15 मिनट के अंदर मीडिया वहां पहुंच जाती है और चार घंटे के अंदर देश के किसी भी कोने में ओ.बी वैन तैनात हो जाती हैं लिहाज़ा उपद्रवी यह जान जाता है कि शुरूआती दंगों के क्षणों को छोड़ दें तो कैमरे से बचना मुश्किल है। 1984 में सिखों के खिलाफ हुए दंगों के ज़माने में यह संभव नहीं था। आज़मगढ़ में एक बाहुबली के लोगों ने ऐसे दंगे कराने की कोशिश की लेकिन कैमरे देख कर भाग खड़े हुए। लेकिन इसी के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की एक और समस्या है कि कई बार उपद्रवी अपने नेता को खुश करने के लिए बढ़-चढ़ कर उपद्रव करता है अगर कैमरा सामने हो। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा एक अन्य पार्टी के कार्यकर्ता को मारा जाना भी इसी श्रेणी में आता है।   इस तरह की घटनाओं पर अंकुश के लिए ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन ने फैसला लिया कि किसी भी पूर्वनियोजित उपद्रव को कवर नहीं किया जाएगा, कैमरे नहीं लगाए जाएंगे।   मीडिया विरोधियों को यह समझना चाहिए कि मीडिया की सामाजिक उपादेयता और प्रजातंत्र में इसके स्थान के मद्देनज़र इसकी निंदा तो की जा सकती है पर इसे नियंत्रित करने की अवधारणा अनुचित होगी।      
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