शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

रामा टाइम्स/ सिरसा का प्रथम सांध्य दैनिक / asb jan20012012



सिरसा का प्रथम सांध्य दैनिक
Friday January 20th 2012

मीडिया उद्योग की जरूरतों के अनुसार नहीं है विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम -सिंह

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सिरसा । भारतीय विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग मीडिया उद्योग की जरूरतों के अनुसार अपने पाठ्यक्रमों को ढ़ालने में कमोबेश नाकाम रहे हैं। नतीजतन उनके द्वारा तैयार किए जा रहे जनसंचार के स्नातक विश्वविद्यालयों से निकलने के बाद जब उद्योग में पदार्पण करते हैं तो उन्हें उद्योग की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में खासी परेशानी आती है। यह कहना है दिल्ली के गुरू गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालयों के स्कूल आफ जर्नलिज्म एंड मॉस कम्युनिकेशन के प्रभारी प्रो. सी.पी. सिंह का। भारतीय जनसंचार संस्थान समेत कई जाने-माने संस्थानों से सबंद्ध रह चुके प्रो. सिंह ने यह टिप्पणी चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालयों के सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम हैलो सिरसा के तहत एक साक्षात्कार में की। सामुदायिक रेडियो के केंद्र निदेशक व पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह चौहान के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयी विभागों को अपनी कार्यशैली को अधिक लचीला व उद्योगोन्मुख बनाने की दिशा में पहलकदमी करनी होगी।, प्रो. सिंह ने कहा कि पश्चिमी देशों के मीडिया विभागों के पास अपने टेलीविजन व रेडियो स्टेशन हैं और उनके अपने समाचार पत्र है जिनमें काम कर विद्यार्थी पढ़ाई के दौरान ही व्यावहारिक प्रशिक्षण भी पा लेते हैं। हिंदुस्तान में ऐसी सुविधाएं चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता विभाग सरीखे गिने चुने विभागों के पास हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और मीडिया उद्योग का एक दूसरे के और करीब आने की आवश्यकता है और इसमें पहल विश्वविद्यालयों को करनी होगी चूंकि यह उनके अपने अस्तित्व और विद्यार्थियों के भविष्य का मामला है।, एक प्रश्न के उत्तर में प्रो. सिंह ने कहा कि भारत में कालेजों व विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे अधिकांश विषयों में अच्छी पाठ्यपुस्तकों की खासी कमी है। पत्रकारिता व जनसंचार का विषय में इससे अछूता नहीं हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए मीडिया के विशेषज्ञों और शिक्षकों को विश्ेाष प्रयास करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और कुछ राज्यों के शिक्षा बोर्ड स्कूल स्तर पर जनंचार को एक विषय के रूप में पढ़ाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। जाहिर है कि आने वाले समय में स्नातक व परास्नातक स्तर पर इस विषय की ओर विद्यार्थियों का रूझान बढऩे वाला है। इसलिए अच्छी पाठ्यपुस्तकों की मांग और बढ़ेगी। एनसीईआरटी द्वारा जनसंचार की स्कूली पाठ्यपुस्तकें तैयार करने वाली समिति के सदस्य डा. सीपी सिंह ने कहा कि राज्य सरकारों को भी इस दिशा में काम करना चाहिए।, डा. सिंह ने कहा कि जिस प्रकार दंत चिकित्सा की शिक्षा की गुणवत्ता पर निगरानी के लिए डेंटल कौसिल है और बार कौंसिल ऑफ इंडिया विधि की शिक्षा की गुणवत्ता की संभाल करती है, उसी तर्ज पर भारत में मीडिया शिक्षा की गुणवत्ता नियंित्रत करने के लिए भी कोई परिषद होनी चाहिए। ऐसा होने पर केवल उन्हीं विभागों व संस्थानों को मान्यता मिल सकेगी जो अपने यहां पाठ्यक्रम और व्यवाहारिक प्रशिक्षण की सुविधाओं के मामले में एक न्यूनतम स्तर कायम करेंगे।, प्रो. सिंह ने कहा कि जनसंचार के पाठ्यक्रमों में समाज विज्ञान के विभिन्न विषयों को भी शामिल किया जाना चाहिए। बकौल प्रो. सिंह यूनेस्को ने जो मॉडल पाठ्यक्रम तैयार किया है वह इस पक्ष की अहमियत को रेखांकित करता है। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी मुक्त विवि और आईपी विश्वविद्यालयों ने अपने कोर्स कंटेंट को यूनेस्को के पाठ्यक्रम की भावनाओं के अनुरूप ढाला है। उन्होंने कहा कि यूजीसी द्वारा एक दशक पूर्व तैयार किया गया पाठ्यक्रम खासा पुराना पड़ गया है और इस मोर्चे पर नए सिरे से काम करने की जरूरत है।, उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मीडिया शोध पर विभागों को अधिक फोकस करना चाहिए और इस मामले में उद्योग के साथ तालमेल भी समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह खेद की बात है कि आज तक भारत से एक भी स्तरीय मीडिया शोध जर्नल प्रकाशित नहीं हो रहा है।


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