ढेला मारने और कालिख पोतने की सनक

  • -                                              आलोक कुमार
ढेलमारा गोसाईं की  परंपरा के बारे में  जब से पढा है  तब से बिहार के समस्तीपुर रेलवे जंक्शन के पास ढेल मारा गोसांई के मंदिर में दर्शन की इच्छा प्रबल है ।  मंदिर के गोसाईं यानी भगवान को मिट्टी के ढेला  मारकर पूजा की जाती है । किवंदती है कि पूजा के इस व्यवहारिक तरीके का इजाद सदियों पहले इलाके के चोर के किसी सरदार ने किया था । ढेला मारकर  जजमान के सोने या जागने का पता लगाने वाले चोर पंडितों का यह पांडित्य मुझे उन सनकियों के लिए सबक जान पडता है जो इनदिनों ख्यात लोगों के चेहरे पर स्याही उडेलकर , पोस्टर पर कालिख पोतकर ,जूता फेंककर या प्रतीकात्मक चांटा मारकर  रातों रात सुर्खियों में आ जाने का स्वांग भर रहे हैं ।  इन पागलों को मशहूरियत की कीमत में भीड़ के लत्तमजूते का शिकार बनना पडता है । बेहतर होता कि समाज के ये पागल किसी ढेलमारा गोसांई का इजाद कर लेते और समस्तीपुर के चोरों की तरह चौर्य कर्म पर जाने से जूतम पैजार के पैमाने की परख कर लेते ।
बताते हैं कि समस्तीपुर के ढेलमारा गोसाईं का मंदिर में अब पत्थर या ढेला मारकर सिर्फ चोर ही पूजा नहीं करते बल्कि के इस तरीके का चलन आम भक्तों ने अपना लिया हैं । खास मौकों पर ढेला मारकर पूजा करने वालों की इस मंदिर में भीड़ हुआ करता है । ढेला मारने की परंपरा को अब शगुन या अपशगुन की परख के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है । मतलब ढेल मारा गोसांई पर अब रात के घने अंधेरे में ही नहीं बल्कि भरी दोपहर में भी ढेला मारकर पूजा की जाने लगी है ।
पत्थर मारने यानी ढेलेबाजी से पूजा के इस दस्तूर के विस्तार ने बीते साल की शुरूआत में जम्मू-कश्मीर की सरकार को काफी परेशान कर रखा था । बाद में भीड को जब ये बात समझ में आ गई कि पत्थर फेंककर सुरक्षा बलों के हाथों कुटाई के अलावा कुछ हासिल नहीं होता है तो मामला खुद ब खुद शांत हो गया । मुमकिन है कि सोनिया गांधी के पोस्टर पर कालिख पोतने वालों के साथ 24 अकबर रोड पर हाथ सफाई का जो दौर चला उससे बाकी सनकियों को घबराएंगे ।
ढेलमारा गोसाईं की पूजा परंपरा की सोच को समझते हुए  साफ लग रहा है कि  जनार्दन द्विवेदी पर जूता फेंकने, शरद पवार को चांटा मारने, बाबा रामदेव पर स्याही उडेलने और  सोनिया गांधी के पोस्टर पर कालिख पोतने वाले सनकी लोग किसी ढेलमारा गोसांई का सहारा क्यों नहीं लेते। क्योंकि हर घटना के बाद वारदात करने वाले शख्स की लत्तम जुताई से जमकर ठुकाई हुई है । फिर भी सनकी समझने को तैयार नहीं है कि यह अभ्य विरोध न सिर्फ गैरवाजिब है बल्कि नन सांइटिफिक भी हैं । क्योंकि इन सबने  किसी ने ढेलमारा गोसाईं का चयन नहीं किया । ढेल मारा गोसाईं के अर्चकों से तुलना करने पर ऐसे  शख्स इस दलील के साथ नाराज हो सकते हैं कि उन्होंने कोई चोरी नहीं की है बल्कि समाज के एक तबके के गुस्से का प्रतीकात्मक इजहार करने का जांबाजी भरा काम किया हैं ।
इन सनकी शख्सों से सीधा और सरल सवाल है कि आपको गुस्से का प्रतीकात्मक इजहार करने को किसने कहा है ?  जब समाज निश्चित धीरज का परिचय दे रहा है । नकारात्मकता से हरसंभव गुरेज बरत रहा है । सहनशीलता का बेमिसाल परिचय दे रहा है., तो आपके अधैर्य का इजहार समाज के गुस्से का प्रतिबिंब कैसे बन सकता हैं ? जाहिर तौर पर हाल की घटनाएं व्यक्तिगत सनक या किसी की व्यक्तिगत समस्या से ज्यादा कुछ नहीं है । यह उस किस्म की चोरी है जिसमें चौर्य कला में अनाडी चोर भीड की पकड में आ जाता है और भीड उसके विरोध के तरीके के साथ होने के बजाय उसपर ही हाथ आजमाने का काम करता है । हमारे समाज की सहनशीलता को समझने के लिए ढेलमारा गोसाईं के प्रति आमजन में बढती आस्था को देखकर समझा जा सकता है । चोर के सुगम चोरी के लिए ईजाद किए गए तरीके का इस्तेमाल आम श्रद्धालू ढेलमारा गोसाईं पर शायद इस मकसद से ढेला मारता है कि हे गोसाईं तुम जगे रहो ताकि चोर हमारे घर के दरवाजे पर नहीं फटके ।
एक बात और टीवी शो “बिग बॉस ” के घर बंटी चोर की पेशी और उससे जुडी सिनेमाई कहानी ने महानगर के लोगों को धुअंधर चोरों की कहानी के प्रति लुभा रखा है । भोपाल में बंटी चोर की गिरफ्तारी के बाद से दिल्ली पुलिस की आंखें चमक रही है कि अब बरसों से अनसुलझे चोरी के कई मामलों का पेंच खुल सकता है । लेकिन बता दूं कि शहरी हुनरमंद चोरों से बेहतर गांव-गांव प्रचलित चोरों की कहानियां है । ज्यादातर गांव वालों के पास पुऱखों के जमाने से प्रचलित कई शंटी -बंटी चोरों की कहानियों से भरा पूरा पिटारा हुआ करता है ।  उस्ताद चोरों की कहानी सुनाते वक्त सीधे सरल ग्रामीणों के आंखों की चमक में आप पढ सकते हैं कि उन्होंने चोरों की चोरी से नहीं बच पाने को  नियति मान लिया है । कई तो विश्वास के साथ बताते हैं कि चौर्य कर्म अठारह कलाओं में से एक कला है । इसलिए इसे पाप मानने के बजाय आजीविका का साधन मानना चाहिए । चोरी को कला मानकर सम्मान देने की मजबूरी देश के ग्रामीण इलाकों के खोखली सुरक्षा तंत्र की गवाही हैं ।  साथ ही यह मजबूरी ही बडी से बडी चोरी पर गांव वालों को धैर्य बनाए रखने की ताकत और सबक देते हैं ।  हमारे समाज ने चोरी के बाद धैर्य बनाए रखने और तनिक भी विचलित नहीं होने का ठोस संस्कार ऐसे ही प़ष्ठभूमि से हासिल किया है । चोरों के खिलाफ इरातन विद्रोह और चोरी की सूचना पर धैर्य को जवाब देने से रोकने के लिए ही मेरे मन में ढेलमारा गोसाईं के दर्शन की  ललक बढती जा रही है ।
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क्यों विवादों में है खाद्य सुरक्षा कानून

आलोक कुमार
खाद्य सुरक्षा बिल को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नाक का सवाल बना लिया है। आका के इरादे पर नतमस्तक केंद्रीय मंत्रिमंडल रविवार को इस पर दोबारा विचार करने वाली है। अध्यक्ष का मान रखने की अदावत है कि किसी भी सूरत में सरकार इसे संसद के मौजूदा सत्र में पेश कर देना चाहती है। सहकारिता क्षेत्र के विरोध और कृषि मंत्री शरद पवार समेत कांग्रेस के ही कई सांसदों के व्यवहारिक एतराज पर इस बिल को पिछले हफ्ते ही रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया था। अब शरद पवार के एतराज को कम करने की पहल कर लिए जाने की बात कही जा रही है। मुमकिन है कि कैबिनेट से खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद के मौजूदा सत्र में ही पेश करने के लिए मंजूरी ले ली जाए।
सवाल है कि आखिर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी खाद्य सुरक्षा बिल को लेकर इतना बेताब क्यों हैं ? टका सा जवाब है कि यह उनके ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल है। सोनिया गांधी की अध्यक्षता में बनी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने गरीबों को दो जून की रोटी मुहैया कराने की गारंटी देने वाले इस विधेयक के प्रस्ताव पर 2009 में ही सहमति प्रकट कर दी थी। इसे सूचना का अधिकार देने वाला आरटीआई कानून , ग्रामीणों को रोजगार की गारंटी देने वाले मनरेगा कानून और सबको शिक्षा प्राप्ति का अधिकार देने वाली शिक्षा का अधिकार कानून की तर्ज पर बनाया जाना है। लेकिन तीन सालों से ऐन केन प्रकारेण यह कैबिनेट तक नहीं पहुंच पाया। संसद के शीतकालीन सत्र से पहले इसे कैबिनेट तक लाया गया। लेकिन जब कैबिनेट में ही इसपर विवाद मच गया तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का धैर्य जवाब दे गया। बताते हैं कि उन्होंने इसे लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आगे नाराजगी तक दर्ज कराई है। अब घबराहट से भर कर प्रधानमंत्री ने रूस के दौरे से वापस आते ही इसपर दोबारा कैबिनेट की सहमति बनाने का विचार बनाया है। इसके लिए कृषि मंत्री शरद पवार की आपत्ति के निपटारे की कोशिश की जा रही है।
सवाल है कि आखिर शरद पवार या किसी और को हर भारतीय को खाद्यान्न मुहैया कराने की गारंटी देने वाले इस पवित्र मकसद पर आपत्ति क्यों हो रही है ? इस प्रति सवाल का जवाब थोडा पेचीदा और जटिल है। दरसल कांग्रेस अध्यक्ष के इस प्रस्तावित ड्रीम प्रोजेक्ट को किसानों के लिए अहितकर माना जा रहा है। इसलिए किसान राजनीति के पृष्ठभूमि वाले तमाम नेता इसका विरोध कर रहे हैं। साथ में विरोध  बजट में तकरीबन एक लाख दस हजार करोड रूपए के प्रावधान को लेकर है। विशुद्ध तौर पर कल्याण या सब्सिडी के मद में हो रहे बजटीय प्रावधान पर मनमोहन सरकार की खुली अर्थनीति के नियंताओं का वैसे भी विरोध रहा है। लेकिन प्रणब मुखर्जी ने धन के प्रावधान की समस्या ज्यादा जटिल नहीं बनने दी है। कांग्रेस अध्यक्ष की इच्छा के अनुपालन के लिए वित्त मंत्रालय ने बजटीय प्रावधान की अनुशंसा को मंजूरी दे दी है।
अब विरोध का वाजिब कारण इस आशंका को लेकर है कि इससे देश के किसानों में गुस्सा बढेगा। किसानों का गुस्सा गरीबों को खाद्यान्न मुहैया कराने के प्रावधान से नहीं बल्कि कानून के रास्ते खाद्यान्न के लिए विशालकाय बजटीय प्रावधान से है जिससे आने वाले दिनों में अन्न आयात का रास्ता खुल जाएगा। सहकारिता आंदोलन के अगुआ इस विधेयक पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहते हैं कि एक ओर अन्न उत्पादन में देश को स्वावलंबी बनने का गर्व देने वालों किसानों को किसानी के कारोबार से विमुख होता देख सरकार मौन है। दूसरी तरफ विदेशों से अन्न आयात का रास्ता खोलकर सरकार रही सही कसर पूरा करने जा रही है कि किसानी भारतीयों के हक की बात ही नहीं रहे। सहकारिता आंदोलन और किसान नेताओं की तरफ से निकले इसी बात ने कैबिनेट की पिछली बैठक में कृषि मंत्री शरद पवार समेत कांग्रेस के ही कई मंत्रियों ने खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक के विरोध में खडा कर दिया। कैबिनेट की बैठक में सहकारिता क्षेत्र के अगुआ नेताओं के विरोध का हवाला दिया गया। जो खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक का इस बिनाह पर विरोध कर रहे हैं कि इसकी केंद्र में किसान के हित को शामिल नहीं किया गया है। एक तरफ किसानी के नुकसान से गरीबों की संख्या बढ रही है वहीं बढी संख्या के गरीबों को खाद्य सब्सिडी देने का व्यवसायिक रास्ता तैयार किया जा रहा है। इस रास्ते से देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कृषि खपत में पैठ बनाने का मौका मिल जाएगा।
सहकारिता क्षेत्र से जुडे नेताओं का सुझाव है कि इतने बजटीय प्रावधान को अगर किसानी को ताकतवर बनाने में लगाया जाएगा तो हैरान परेशान किसान देश के गरीबों को खुद ब खुद खाद्यान्न की गारंटी दे देगा। किसानों की राय से खाद्यान्न सुरक्षा कानून से अन्न के आयात का रास्ता खुलेगा जो अन्न के मामले में हमारे स्वावलंबन की अहसास पर चोट करता है। यह चोट इसलिए भी खतरनाक है कि दिन प्रतिदिन किसानों में उपेक्षा का भाव गहराता जा रहा है। किसानी के नुकसान ने पिछले दस सालों में बीस करोड से ज्यादा लोगों को किसानी का काम छोडकर सडक और भवन निर्माण का मजदूर बन जाने को मजबूर किया है। “पीपली लाइव” फिल्म की कथानक सच साबित हुआ जा रहा है। किसानी का काम नुकसान का सौदा बना जा रहा है। प्रमाणिक आंकडे के मुताबिक दस सालों दो लाख दस हजार किसानों ने किसानी के चौपट हो जाने से खुदकशी कर ली है। किसानों के लिए सप्लाई की गई बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बीस फीसदी बीज फूट ही नहीं पा रही। मौसम पर बीज नहीं फूटने से किसान परेशान है। फिर भी मेहनत करके अगर वह बंपर उत्पाद करता है तो फिर उसके लिए उचित मूल्य देने वाले खरीदार के तलाश का संकट है।
किसानी के हालात की विकटता को देखकर ही खाद्य सुरक्षा कानून का विरोध हो रहा है। एक ओर जहां फसल उत्पादों की समुचित मूल्य हासिल करने के लिए पंजाब, विदर्भ और झारखंड में किसान बुरी तरह से आंदोलनरत है। पंजाब और विदर्भ में किसानों ने तो मायूसी की हद पार कर दी है। विरोध पर उतरे किसान हजारों क्विंटल आलू सडक पर फेंक कर टैक्टर से रौंदवाना मुनासिब समझ रहे है। मुफ्त में बिचौलियों को सुपुर्द करने के बजाय किसान धान की बोरियां आग के हवाले कर देना ठीक समझ रहे हैं। उस वक्त खाद्यान्न गारंटी कानून की पैरवी करना सरकार में बैठे लोगों के लिए मुसीबत का कारण बन गया है। किसानों के आसरे राजनीति करने वालों के लिए इसका समर्थन खतरनाक है। ऐसी विपरीत हालत में खाद्य सुरक्षा बिल का विरोध शरद पवार जैसों ने किसानों की असुरक्षा के खतरे को देखते हुए कर रहे हैं।
लेकिन सत्ता शीर्ष की जिद देखिए कि गरीबों के लिए मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने के नाम पर विशालकाय बजटीय प्रावधान के लिए केंद्र सरकार को मजबूर किया जा रहा है। भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ के अध्यक्ष डॉ चंद्रपॉल सिंह यादव का बिल का विरोध में दलील देते हुए कहना है कि इसका विरोध इसलिए नहीं हो रहा है कि कोई वंचितों तक खाद्यान्न पहुंचने के रास्ते में बाधक बनना चाहता है। बल्कि विरोध इस खतरे को भांपते हुए हो रहा है कि खाद्य सुरक्षा गारंटी के नाम में विदेशों से अन्न आयात का पिटारा खुल जाएगा। आयात का रास्ता खुलने से व्यापारियों और बिचौलियों की चांदी कटेगी। रही सही कसर पूरी होने लगेगी। कीमत की प्रतिद्वंदिता में फंसकर किसान और ज्यादा संख्या में दम तोडने लगेंगे। खाद्यान्न आयात का यह रास्ता तबाही के कगार पर खडे किसानों को औऱ बर्बाद करके रख देगा।
किसानों को उपज पर महज पंद्रह प्रतिशत मुनाफा सुनिश्चित करने की स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट पर बरसों से गौर नहीं किया जा रहा है। हंगामे के डर से नतमस्तक हुई सरकार ने एफडीआई के जरिए वॉल मार्ट को न्यौतने का काम बंद डब्बे में रख दिया। अब छवि नुकसान की भरपाई के लिए खाद्य सुरक्षा कानून की बात को ढोल नगाडे के साथ पेश करने की तैयारी कर रही है। लेकिन इस प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून को लेकर भी समाज के सबसे बडे तबके यानी किसानों में विष भरा है और सरकार की नियत पर गंभीरता से शक किया जा रहा।
खाद्यान्न गारंटी विधेयक के प्रारूप के तहत मौजूदा स्थिति में सरकार को छह करोड़ बीस लाख टन खाद्यान्न हर साल खरीदना होगा। इससे एक लाख करोड़ से ज्यादा की सब्सिडी का एलान होगा। कानून की भरपाई के लिए सब्सिडी की इस रकम से बडे खरीद के इस खेल से घोटाले की साजिश का रास्ता खुलता है।
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मोदी-आ़़डवाणी में मनभेद के निहितार्थ

आलोक कुमार : नरेन्द्र मोदी ने लालकृष्ण आडवाणी से मतभेद से इंकार किया है। मोदी के इंकार की सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। सब जानते हैं चौरस पर बिसात बिछ गई है। बीजेपी के दो धाराओं में फिर से सियासी जंग शुरू हो गया है। खुलकर तलवारबाजी हो रही है। बस अब इंतजार जंग के अंजाम तक लहुलुहान होने वाले सियासत दानों की गिनती करने का है। गुजरात में आडवाणी के जनचेतना रथ यात्रा के पहले दिन वापी के सभामंच का दृष्टांत को मोदी की कोई भी सफाई झुठला नहीं सकती। नजरों से दिखे सच को जुबानी सफाई से भला कैसे झुठलाया जा सकता है। बीजेपी के दोनों शख्सियतों के बीच का मतभेद ही नहीं मनभेद तक पैदा हो गया है। सब जानते हैं कि कुर्सी के दरम्यान का दिखा फासला महज टीआरपी के लिए नहीं था। Continue reading
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संस्थानों की प्रतिष्ठा ध्वस्त करने का दौर

एक, दिल्ली पुलिस ने वोट के लिए कैश मामले की जांच में अदालत से कहा है कि आरोपी अमर सिंह के खाते में कोई अनियमितता नहीं है। यह वहीं दिल्ली पुलिस है,जो किसी को पकड़ ले तो अपराध कबूल करवाने के लिए कुख्यात रही है। इसका चार्जशीट इतना ठोस होता है कि अदालत के सामने पकड़े गए शख्स को बेकसूर साबित करने का गुंजाईश नहीं के बराबर रहती है। Continue reading

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जनाब ! नीतिश बनाम मोदी की है जंग

राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी। ना जाने कहां से इस सियासी जुमले का प्रादुर्भाव हो गया। जबकि साफ दिख रहा है कि भावी प्रधानमंत्री के लिए असली लडाई तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के बीच छिड़ी है। फिर न जाने क्यों नकली भूत बनाकर राहुल गांधी को खडा कर दिया गया। नरेन्द्र मोदी और नीतिश कुमार अखाडा में ये मानकर आमने सामने हैं कि अगला प्रधानमंत्री अंग्रेजी के एन नामाक्षर वाले एनडीए से होगा और बनने वाले प्रधानमंत्री का नाम भी एन नामाक्षर राशि से शुरू होगा। ऐसी कोई भवष्यवाणी करने वाले प्रकांड ज्योतिषाचार्य को यह गणना करने में मुश्किल आ रही है कि एन नाम का यह भावी प्रधानमंत्री पश्चिम के गुजरात से चलकर दिल्ली आएगा या पूरब के बिहार से। Continue reading
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