बुधवार, 25 जनवरी 2012

मीडिया के लिए प्रभावशाली आचार संहिता बनाने की ज़रुरत




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13 नवम्बर I टेलीविज़न समाचार चैनलों को अंधविश्वास , अवैज्ञानिक और फूहड़ कार्यक्रम पेश करने से कौन रोकेगा
यह खबर राहत देने वाली है कि भारत के टीवी समाचार चैनलों ने अन्धविश्वास को बढ़ावा देने और मसालेदार ख़बरों के प्रसारण को नियंत्रित करने का निर्णय लिया है I न्यूज़ ब्रोड कास्तार्स एसोसियशन ने दो साल पहले कुछ गाईड लाइंस तय की थी I इसके तहत कई मामलों में आत्मानुशासन लागू करने का निश्चय किया गया था I अगले कदम के तौर पर भविष्यवाणी करने वालों और साधुओं ,बाबाओं से परहेज किया जाएगा I यह भी खबर है कि फिल्म अभिनेत्री ऐश्वर्या राय के पहले बच्चे के  जन्म से जुड़े घटनाक्रम को जरूरत से ज्यादा महत्व नहीं दिया जाए I आने वाले दिनों में पता लग जाएगा कि चैनलों ने अपने संकल्प का कितना पालन किया है I वैसे कई  न्यूज़ चैनलों की मौजूदा भूमिका संतोषजनक नहीं है I वे दर्शकों की संख्या (टीआरपी) बढ़ाने के लिए वह सब दिखाते हैं जो उन्हें नहीं दिखाना चाहिए I 24 घंटे चैनल चलाने के चक्कर में ऐसे कार्यक्रम परोसे जा रहे हैं जिनका समाचारों से कोई संबंध  नहीं है I देश और समाज से सरोकार रखने वाले विषयों ,मुद्दों ,समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता है I भारत जैसे देश में अच्छी समाचार कथाएं बनाने के लिए विषयों की कमी नहीं है I फिर भी अनेक न्यूज़ चैनल अन्धविश्वास , अतिरंजना और काल्पनिकता पर आधारित सामग्री पेश करते हैं I अपराध कथाओं को अनावश्यक महत्व दिया जा रहा है I राइ को पहाड़ बनाने और सनसनी फैलाने पर अधिक जोर है I इसकी कारण क्या है I इधर पिछले कुछ वर्षों में मीडिया (प्रिंट ,इलैक्ट्रानिक) में ऐसे खिलाडियों ने प्रवेश किया है जो निहित स्वार्थों से अधिक प्रेरित हैं I वे अखबार ,न्यूज़ चैनल के दम पर अपने वैध ,अवैध कारोबार में अनुचित फायदा उठाना चाहते हैं I ऐसे खिलाडी मीडिया के मार्फ़त सत्ता के गलियारों में पहुँच बनाकर नियम - कायदों की धज्जियाँ उड़ाते हैं I 
गलत इरादों को लेकर मीडिया में आये उद्यमियों को पेशेवर उत्क्रष्ट्ता, साधनों की पवित्रता जैसी बातों से कोई लेना -देना नहीं रहता है i उनका लक्ष्य अखबार ,न्यूज़ चैनल चलाने में लगाई गई लागत की अनाप -शनाप तरीके से वसूली करना होता है I सवाल है इस स्थिति पर कैसे नियंत्रण किया जाय I अभी हाल में इस मुद्दे पर गर्म बहस छिड़ी है I प्रेस काउन्सिल के प्रमुख मार्कंडेय काटजू ने मीडया के  तौर - तरीकों पर गंभीर सवाल उठाये हैं I सरकार भी इलैक्ट्रानिक मीडिया पर किसी तरह का अंकुश लगाने के पक्ष में हैं I मीडिया की नाक में नकेल डालने के लिए नए कानूनों की फिलहाल जरूरत नहीं है I इसके बावजूद कोई आचार संहिता होनी चाहिए जो मीडिया को अनुशासन के दायरे में बाँध सके I प्रेस काउन्सिल को प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया को काबू में रखने के लिए कुछ दंडात्मक अधिकार दिए जाएँ I काउन्सिल में मीडिया और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल करना होगा I इस संस्था को चुनाव आयोग ,लोकपाल जैसा स्वरुप देने पर गंभीरता से गौर करना होगा I

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