मंगलवार, 31 जनवरी 2012

अंधेरी सुरंग से निकलने का इंतजार

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समय सरगम/
राजेश बादल

कुछ साल पहले की बात है। मैं पत्रकारिता के एक बड़े संस्थान मे छात्रों से बातचीत के लिए गया । इस दौरान मैने उनसे राजेन्द्र माथुर और सुरेन्द्र प्रताप सिंह के बारे में पूछा। अफसोस! ज्यादातर छात्रों को पत्रकारिता के दोनों शिखर-पुरूषों की कोई जानकारी नहीं थी। प्रिंट और टेलीविजन पत्रकारिता में भाषा को लेकर उनके योगदान की बात तो बहुत दूर थी।राजेंन्द्र माथुर के नेतृत्व में नईदुनिया इंदौर में करीब बीस साल और नवभारत टाइम्स में उनके प्रधान संपादक पद पर रहते हुए करीब दस साल तक जो भाषा प्रयोग हुए वे बेजोड़ और अद्भुत हैं। सरल भाषा और उसमें बोलचाल के मुहावरों का इस्तेमाल पहली बार इन्हीं दोनों अखबारों में देखा गया।हालांकि इसी दौरान जनसत्ता ने भी कुछ शानदार प्रयोग किये थे।
आजादी का साल अगर आधार साल माना जाए तो कहना चाहूँगा कि 1947 से 1970 तक अखबारों की भाषा कठिन शब्दों से भरपूर थी। लंबे-लंबे संयुक्त वाक्य संप्रेषण की धारा को रोकते थे। भाषाई शब्दों को लेकर पूर्वाग्रह भी नजर आता था। लेकिन पत्रकारिता के प्रति सर्मपण में कहीं कोई कमी नहीं थी। यानी उस दौर में पत्रकारों के लिए यह सिर्फ पेशा नहीं था। मेरे ख्याल से यह भाव 1990 तक बना रहा।राजेन्द्र माथुर ने इसी भाव की रक्षा करते हुए अखबारी भाषा में खामोशी से जो क्रांति कर डाली, वह बेमिसाल है। कमोबेश यही काम सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने किया। रविवार के पन्नों पर। रविवार की भाषा उस दौर की पत्रकारिता में ताजा हवा का झोंका थी। इसके बाद एसपी ने दूसरी पारी खेली, आजतक के साथ। बताने की जरूरत नहीं कि भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता से आजतक की भाषा को अलग नहीं देखा जा सकता। ठेठ देसी अंदाज में खबरिया-दृष्यों को पकड़ने, सूँघने और व्यक्त करने की कला एसपी ने आजतक को दी। ध्यान देने की बात है कि एसपी सिंह ने आजतक से पहले कभी टेलीविजन के साथ काम नहीं किया था।
लेकिन आज प्रिंट और टेलीविजन दोनों ही माध्यमों में भाषाई अराजकता का दौर है। इसकी वजह इतिहास के कुछ उदाहरण समझा सकते हैं। इस देश में कई उद्योग सदियों पुराने हैं।उद्योग की शक्ल लेने में उन्हें चार-छह साल नहीं, बल्कि सौ-पचास साल लगे हैं। कपड़ा, चमड़ा, काँच, हीरा-जवाहारात, इस्पात और इसी तरह के कई उद्योग सैकड़ों साल में हमारे यहाँ पनपे हैं। अगर मैं टेलीविजन की बात करूँ तो सौ करोड़ की आबादी वाले मुल्क में केवल दस साल के दरम्यान चैनल-उद्योग खड़ा हो जाने का चमत्कार सिर्फ भारत में हुआ है। अमेरिका की तुलना में यह उद्योग भारत में साठ साल देर से आया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान टेलीविजन अमेरिका में बेहद लोकप्रिय था। पंद्रह साल पहले अमेरिका के घर-घर में टेलीविजन था और पैंसठ फीसदी घरों में तो दो या उससे अधिक टी.वी. सेट्स थे। आप कह सकते है कि पचास साठ साल पहले अमेरिका में चैनल उद्योग का मजबूत तंत्र था और ज्यादा पेशेवर तरीके से काम कर रहा था। इसकी वजह वहाँ मीडिया शिक्षा या पत्रकारिता की पढ़ाई बहुत व्यवस्थित ढ़ंग से हो रही थी। मिसूरी स्कूल ऑफ जर्नलिज्म और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में सौ साल पहले पत्रकारिता के तमाम पाठ्यक्रम पढ़ाए जा रहे थे। सन 1975 में जब मैने पत्रकारिता शुरु की, तो अक्सर लोग पूछा करते थे कि और तो सब ठीक है- महीने भर गुजारने का क्या साधन है। पच्चीस- तीस बरस पहले जिस देश में पत्रकारिता को पूर्णकालिक आमदनी का जरिया न माना जाता हो, वहाँ अचानक इतना बड़ा उद्योग खड़ा हो जाना चमत्कार ही है।
चैनल इंडस्ट्री खड़ी हो गई। आजतक देश का पहला खबरिया हिंदी चैनल बन गया। पहले ही साल उसने लोकप्रियता के कीर्तिमान गढ़े, अप्रत्याशित आमदनी हुई और देखा-देखी एक के बाद एक चैनल देश में आने लगे। तकनालॉजी में रोज हो रहे आविष्कारों ने छोटे पर्दे को सम्मोहन मंत्र दे दिया। दर्शकों में खबरों की भूख जगी। ढेर सारे मनोरंजन चैनल भी आए। विदेशी चैनलों ने अपने कार्यक्रमों का हिंदी अनुवाद परोसा और भारतीय चैनल-बाजार में दस्तक दी। ऐसे माहौल में चैनलों को पेशेवर, हुनरमंदों की जरूरत थी। आजतक कई साल दूरदर्शन के मैट्रो चैनल पर प्रसारित हुआ। जब टी0वी0 टुडे समूह ने उसे चैनल की शक्ल देने का फैसला किया, तो सारी टीम को महीने भर दिल्ली में खास प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण देने वाले ज्यादातर विदेशी थे। उन दिनों भारतीय टेलीविजन में पेशेवर लोग कम ही थे। चूँकि चैनलों की संख्या कम थी इसलिए लोगों का रूझान भी इस ओर कम ही था। इसके समर्थन में बताना चाहूँगा कि बाईस बरस पहले मैने दूरदर्शन के कैमरे का पहली बार सामना किया था। तब टेलीविजन पत्रकारिता और उसके चौबीस घंटों वाले रूप में विकसित होने की कल्पना तक नहीं थी। देश भर में मुश्किल से दस-पंद्रह पत्रकार थे, जो टेलीविजन से रूबरू हुए थे। उसके बाद मैने कई साल दूरदर्शन पर खबरें पढ़ीं। परख जैसी लोकप्रिय समाचार पत्रिका के साथ काम किया। अपना समाचार कार्यक्रम प्रस्तुत किया और खबरों की दुनिया से जुडे़ तमाम कार्यक्रम बनाए। इसके बाद भी मुझे अंदर से भरोसा नहीं था कि टी0वी0 पत्रकारिता कभी पूर्णकालिक आमदनी का जरिया बन सकती है। इसलिए मैने अखबारों से रिश्ता बनाए रखा। मैं सोचता था कि आखिरकार काम तो अखबारों के साथ ही करना है। तो इस ऊहापोह की स्थिति में भारतीय टेलीविजन से जुडे़ पत्रकार दस साल पहले तक काम करते रहे। जब एक के बाद एक धड़ाधड़ चैनलों की बरसात होने लगी तो उसमें काम करने वालों की माँग भी होने लगी। सारे चैनल समूहों को आजतक एक बडे़ स्त्रोत के तौर पर उपलब्ध था। एन0डी0 टीवी और ज़ी जैसे कुछ पुराने समूह भी थे। लेकिन ड्राईविंग सीट पर आजतक ही था। लेकिन आजतक भी कब तक पेशेवर लोगों की फसल पैदा करता? यही वो बिदुं है, जहाँ से भारतीय खबरिया उद्योग में भाषाई अराजकता की शुरूआत हुई। लोग कम थे माँग ज्यादा। चैनल समूहों में मुनाफे की लार टपक रही थी। प्रशिक्षित लोग मिले तो ठीक नहीं तो जो भी मिले, उनसे चैनल चलाना शुरू कर दिया। ताबड़तोड़ भरती ने चैनलों के भीतर बंदर के हाथ में उस्तरे जैसी स्थिति बना दी। नतीजा यह कि 2003 आते-आते चैनलों में भाषाई अराजकता नजर आने लगी।
जब कोई उद्योग खड़ा होता है तो उसके साथ छोटे-छोटे उद्योग भी पनपते हैं। चैनल-उद्योग में पेशेवरों की माँग के मद्देनजर टीवी तकनीक और पत्रकारिता सिखाने वाले स्कूलों की जैसे बाढ़ आ गई। जगह-जगह छोटे-छोटे क़स्बों तक में कुकुरमुत्तों की तरह ये टीवी स्कूल या इंस्टीट्यूट उग आए। इन स्कूलों के पास न तो अपने स्टूडियों थे, न उपकरण, न क्लासरूम और न प्रयोगशालाएं। अध्यापन से वे लोग जुडे़, जिन्होंने कभी टीवी में काम तक नहीं किया था। मैं देश के अनेक नामी गिरामी पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थानों को जानता हूँ जहाँ टीवी पत्रकारिता का क, ख, ग, नहीं जानने वाले लोग पढा़ रहे हैं।
मेरा अनुभव है कि टीवी चैनल के साथ जैसे ही आधा अधूरा ज्ञान प्राप्त ये नौजवान काम शुरू करते हैं, उनके हाथ पैर फूल जाते हैं। उन्होंने अपने संस्थानों में जो सीखा, समझा और पढ़ा होता है, उसका चैनल के कामकाज से रिश्ता कम ही होता हैं। लेकिन दर्शक को इस बात से मतलब नहीं होता कि कोई खबर या कार्यक्रम अनाड़ी हाथों से निकला है या हुनरमंद के हाथों। वह सिर्फ गुणवत्ता के आधार पर अच्छे बुरे की पहचान करता है। आज चैनलों मे यही हो रहा है।
सवाल यह है कि अब क्या हो? मैं निराशावादी नहीं हॅू, लेकिन जब देह पर दवा रिएक्ट कर जाती है तो इन्फेक्शन का असर एकदम से नहीं जाता। लंबे समय तक हमें उपचार करना होता है। यही रास्ता अब हमारे सामने है। चैनल मंडी के मालिकों को समझना होगा कि अधकचरे जानकारों से उन्हें आखिरकार नुकसान ही होगा। चैनल नियंताओं को नियुक्तियों में संवेदनशील, सतर्क और जिम्मेदार होना होगा और सबसे बड़ी बात मंडी के लिए माल भेजने वालों को अपना घर ठीक करना होगा। यानी पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थानों को बिना तैयारी के टीवी पाठ्यक्रम शुरू करने का जुआ नहीं खेलना चाहिए। बेशक- ऐसे संस्थान कम खुलें, लेकिन पूरी तैयारी के साथ आएं।
लोकतंत्र में आप किसी को इस तरह का प्रषिक्षण संस्थान खोलने से रोक नहीं सकते, लेकिन अगर चैनलों ने भरती में ईमानदारी और परिपक्वता दिखाई तो कुकुरमुत्ता संस्थान अपने आप दफन हो जाएंगे। लेकिन यह प्रक्रिया लंबी हैं । जाहिर हैं इंतजार के अलावा कोई विकल्प नहीं हैं।


-राजेश बादल वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे कई बड़े प्रकाशन समूहों एवं न्यूज़ चैनलों में काम कर चुके हैं।

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