गुरुवार, 19 जनवरी 2012

पत्रकारिता /अ वधभूमि / मीडिया पर नहीं, मीडिया मुग़लों पर हो नियंत्रण


रामराज्य की परिकल्पना …..

“हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे”- भाजपा


भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घिरी माया सरकार ने पिछले दिनों अपने कई मंत्रियों की छुट्टी कर दी। माया सरकार ने चुनावी रणनीति को ध्यान में रखते हुए अपने दागी मंत्रियों को सरकार ही नहीं पार्टी से भी बाहर का रास्ता दिखाना शुरू किया है। बसपा सुप्रीमो ने अपने कुल 19 मंत्रियों को लोकायुक्त की सिफारिश पर अथवा चुनावी लिहाज से बर्खास्त किया। इनमें कई मंत्रियों को माया के पुराने सिपहसालारों में गिना जाता है, जिसमें प्रमुख हैं पूर्व परिवार कल्याण मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा। जाहिर, है मायावती के सिपहसालार की छुट्टी होती है तो यह बड़ी खबर अवश्य होगी। बड़ी खबर बनी भी, लेकिन बाबू सिंह की छुट्टी से ज्यादा बड़ी खबर बनी बाबूसिंह के भाजपा में शामिल होने की घटना।
वह मंत्री जिसके भ्रष्टाचार की गाथा भाजपा के लिए चुनावी मुद्दा थी, वही भ्रष्ट भाजपा में ही शामिल हो जाए तो बड़ी खबर तो बननी ही थी। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी जिसे पार्टी विद ए डिफरेंस भी कहा जाता है, लगता है वह डिफरेंट ही नहीं करप्ट भी हो गई है। ऐसे समय में जब पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। मुददा भ्रष्टाचार और सुशासन का हो तब बाबू जी जैसी छवि के लोगों को पार्टी में लाना समझ से परे है।
बाबू सिंह को भाजपा ने शामिल तो कर लिया लेकिन अब बाबू सिंह भाजपा के गले की हड्डी बन चुके हैं। जिसे न पार्टी उगल पा रही है और न ही निगल पा रही है। यह चुनाव ऐसे वक्त में हो रहे हैं जब सभी पार्टियां देश के माहौल को देखते हुए साफ-सुथरी छवि के नेताओं पर ही दांव खेल रही, तब भाजपा में भ्रष्टों का शामिल होना हतप्रभ करता है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश भर में कांग्रेस पार्टी के खिलाफ बने माहौल का फायदा उठाने से भाजपा चूक गई है, साथ ही पार्टी ने अपनी किरकिरी भी कराई है।
अन्ना फैक्टर और कांग्रेस के खिलाफ बने माहौल का फायदा उठाने की बजाय भाजपा ने अपने पैरों में ही कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। दरअसल, पार्टी ने हमेशा ही उस वक्त पर गलत निर्णय लिया है, जब सही फैसलों की दरकार पार्टी को सबसे ज्यादा थी। चाहे पूर्व में उत्तर प्रदेश में बसपा को समर्थन देने का मामला हो, झारखण्ड में जोड़-तोड़ की सरकार बनाना हो या येदियुरप्पा के मामले में देर से निर्णय पार्टी नेतृत्व ने अपरिपक्वता का ही परिचय दिया है।
भाजपा नेतृत्व द्वारा दागी छवि के नेताओं को शरण देने का निर्णय यूपी एवं अन्य चार राज्यों के चुनाव में पार्टी की करारी हार के रूप में फलीभूत हो सकता है।
भारतीय जनता पार्टी को आने वाले चुनावों के लिए शुभकामनायें…

वर्ष 2011 के आईने में अवधभूमि…

वर्ष 2011 में अवधभूमि को प्राप्त होने वाले पाठकों की संख्या जानने के लिए निचे दिए गये लिंक पर जाएँ. इस लिंक पर जाने पर इस ब्लॉग की 2011 की प्रगति रिपोर्ट आप जान सकते हैं.
सभी पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…
आपका मित्र,
सूर्य प्रकाश.
The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2011 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:
A San Francisco cable car holds 60 people. This blog was viewed about 1,600 times in 2011. If it were a cable car, it would take about 27 trips to carry that many people.
Click here to see the complete report.

पत्रकारिता में मानदंडों का अभाव- सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन अज्ञेय


पत्रकारिता की विधा को साहित्य के अंतर्गत माना जाता है। पत्रकारिता को तात्कालिक साहित्य की भी संज्ञा दी गई है। यही कारण है कि समय-समय पर विभिन्न साहित्यकारों ने पत्रकारिता में अपना योगदान और पत्रकारों को मार्गदर्शन देने का कार्य किया। ऐसे ही व्यक्तित्व थे, सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन अज्ञेय जिन्होंने साहित्य और पत्रकारिता दोनों में ही समान रूप से अपना योगदान दिया। अज्ञेय ने ‘दिनमान‘ पत्रिका के संपादक के रूप में पत्रकारिता में नए मानदंड स्थापित किए। शायद यही कारण था कि अज्ञेय पत्रकारों एवं संपादकों के कार्य एवं उत्तरदायित्व को लेकर चिंतित रहे। अज्ञेय ने संपादकों की कम होती प्रतिष्ठा के लिए संपादकों को ही जिम्मेदार ठहराया था। अपनी चिंता को अज्ञेय ने इन शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा कि-
‘‘हिन्दी पत्रकारिता के आरंभ के युग में हमारे पत्रकारों की जो प्रतिष्ठा थी, वह आज नहीं है। साधारण रूप से तो यह बात कही जा सकती है, अपवाद खोजने चलें तो भी यही पावेंगे कि आज का एक भी पत्रकार या संपादक वह सम्मान नहीं पाता जो कि पचास-पचहत्तर वर्ष पहले के अधिकतर पत्रकारों को प्राप्त था। आज के संपादक पत्रकार अगर इस अंतर पर विचार करें तो स्वीकार करने को बाध्य होंगे कि वे न केवल कम सम्मान पाते हैं, बल्कि कम सम्मान के पात्र हैं- या कदाचित सम्मान के पात्र बिल्कुल नहीं हैं, जो पाते हैं पात्रता से नहीं इतर कारणों से।‘‘ (‘आत्मपरक‘ से साभार उद्धृत)
अज्ञेय ने संपादक के रूप में बहुत ख्याति प्राप्त की थी, उनके अपने निश्चित मानदंड थे, जिससे उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। अज्ञेय ने अपने पत्रकार जीवन की शुरूआत ‘‘सैनिक‘‘ से की थी अज्ञेय 1 वर्ष तक ‘‘सैनिक‘‘ के संपादक मंडल में रहे। जिसके पश्चात वे ‘‘विशाल भारत‘‘ में डेढ़ वर्ष तक रहे। सन् 1947 में अज्ञेय ने साहित्यिक त्रैमासिक ‘‘प्रतीक‘‘ निकाला। इस पत्र में उन्होंने उदीयमान साहित्यकारों को स्थान दिया। अज्ञेय के उत्कृष्ट संपादन का ही परिणाम था कि ‘‘प्रतीक‘‘ का स्तर कभी गिरा नहीं। सन् 1965 में अज्ञेय जी ने साप्ताहिक ‘‘दिनमान‘‘ का संपादन आरंभ किया। यह कार्य उन्होंने उस समय में प्रारंभ किया जब उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं चल रहा था, परंतु उनका पत्रकार मन ‘‘दिनमान‘‘ को सफलता की ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए व्याकुल था। उनके संपादन में ‘‘दिनमान‘‘ ने राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की। इसका कारण शायद अज्ञेय जी की संपादन नीति ही थी जिससे उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। उनके अपने निश्चित मानदंड थे जिन पर वे कार्य करते थे। उन्होंने संपादकों एवं पत्रकारों को भी मानदंडों पर चलने को प्रेरित किया। नीतिविहीन कार्य को ही उन्होंने पत्रकारों एवं संपादको की घटती प्रतिष्ठा का कारण बताया था। उन्होंने कहा कि-
‘‘अप्रतिष्ठा का प्रमुख कारण यह है कि उनके पास मानदंड नहीं है। वहीं हरिशचन्द्रकालीन संपादक-पत्रकार या उतनी दूर ना भी जावें तो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का समकालीन भी हमसे अच्छा था। उसके पास मानदंड थे, नैतिक आधार थे और स्पष्ट नैतिक उद्देश्य भी। उनमें से कोई ऐसे भी थे जिनके विचारों को हम दकियानूसी कहते, तो भी उनका सम्मान करने को हम बाध्य होते थे। क्योंकि स्पष्ट नैतिक आधार पाकर वे उन पर अमल भी करते थे- वे चरित्रवान थे।‘‘ (‘आत्मपरक‘ से साभार उद्धृत)
अज्ञेय जी का मानना था कि पत्रकार अथवा संपादक को केवल विचार क्षेत्र में ही बल्कि कर्म के नैतिक आधार के मामले में भी अग्रणी रहना चाहिए। भारतीय लोगों पर उन व्यक्तियों का प्रभाव अधिक पड़ा है जिन्होंने जैसा कहा वैसा ही किया। ‘‘पर उपदेष कुशल बहुतेरे‘‘ की परंपरा पर चलने वाले लोगों को भारत में अपेक्षाकृत कम ही सम्मान मिल पाया है। संपादकों एवं पत्रकारों से कर्म क्षेत्र में अग्रणी रहने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि-
‘‘आज विचार क्षेत्र में हम अग्रगामी भी कहला लें, तो कर्म के नैतिक आधारों की अनुपस्थिति में निजी रूप से हम चरित्रहीन ही हैं और सम्मान के पात्र नहीं हैं।‘‘ (‘आत्मपरक‘ से साभार उद्धृत)
सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन अज्ञेय उन पत्रकारों में से थे जिन्होंने पत्रकारिता में साहित्य के कलेवर को स्थान दिया। उन्होंने साहित्यिक और गैर-साहित्यिक पत्रकारिता में भी सक्रिय महत्वपूर्ण योगदान दिया। हिन्दी पत्रकारिता में साहित्यिक पत्रकारिता की कम होती भूमिका के प्रति वे सदैव चिंतित रहे। उन्होंने कहा था-
‘‘हिंदी पत्रकारिता में बहुत प्रगति हुई है, परंतु साहित्यिक पत्रकारिता में उतनी नहीं हुई है।‘‘
अज्ञेय पत्रकारिता को विश्वविद्यालय से भी महत्वपूर्ण और ज्ञानपरक मानते थे। इसका एक उदाहरण है जब योगराज थानी पीएचडी करने में लगे हुए थे, तब अज्ञेय जी ने उनसे कहा कि-
‘‘पत्रकारिता का क्षेत्र विश्वविद्यालय के क्षेत्र से बड़ा है, आप पीएचडी का मोह त्यागिए और इसी क्षेत्र में आगे बढि़ए।‘‘
अज्ञेय ने पत्रकारिता और साहित्य में विभिन्न मानदंड स्थापित किए। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना द्वारा लिए गए साक्षात्कार का हवाला देना यहां प्रासंगिक होगा, जिसमें उन्होंने कहा-
‘‘मैं समझता रहा हूं कि साहित्यकार को समय-समय पर अपना महत्वपूर्ण अभिमत प्रकट करना चाहिए, परंतु अपने साहित्यिक व्यक्तित्व का ऐसा सामाजिक उपयोग होने देने में उसे दलबंदी से बचना चाहिए क्योंकि बिना इसके वह अपने निजी उत्तरदायित्व से स्खलित हो जाता है।‘‘
अज्ञेय जी वे पत्रकार थे जिन्होंने पत्रकारिता में साहित्य के सरोकारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया। अज्ञेय ने पत्रकारिता में जो पदचिन्ह् स्थापित किए वे आज भी पत्रकार समाज के लिए मार्गदर्शन स्वरूप हैं। आज जब पत्रकारिता के आत्मावलोकन का मुद्दा एक बार फिर खड़ा हो गया है, ऐसे समय में अज्ञेय की पत्रकारिता और उनके मूल्य पत्रकारिता को नैतिक राह दिखाने का कार्य करते हैं।

अभी न जाओ छोड़कर, दिल अभी भरा नहीं…


मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।
जिंदादिली से जिंदगी का साथ निभाने वाले सदाबहार अभिनेता देव आनंद का जिंदगी ने साथ छोड़ दिया। सदाबहार अभिनेता, फिल्म निर्माता और निर्देशक देव आनंद का शनिवार रात लंदन में हृदय गति रूकने से निधन हो गया। वे 88 वर्ष के थे। रविवार की सुबह उनके देहांत की खबर सुनते ही बॉलीवुड और उनके प्रशंसकों के बीच शोक की लहर दौड़ गई।
पद्मभूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित देव आनंद ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरूआत सन 1946 में प्रभात टॉकीज की फिल्म हम एक हैं से की। यह फिल्म बहुत सफल नहीं हो पाई। इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान उनकी दोस्ती अपने जमाने के सुपर स्टार गुरूदत्त से हो गई। देव साहब को फिल्मी दुनिया में कामयाबी के लिए बहुत इंतजार नहीं करना पड़ा। बॉम्बे टॉकीज की 1947 में रिलीज  फिल्म जिद्दी में उन्हें मुख्य भूमिका प्राप्त हुई यह फिल्म एक सफल फिल्म साबित हुई। जिद्दी की सफलता के बाद देव साहब ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
सन 1949 में देव आनंद ने नवकेतन के नाम से अपनी एक फिल्म कंपनी बनाई और देव साहब फिल्म निर्माता बन गए। देव आनंद साहब ने अपने मित्र गुरूदत्त का डायरेक्टर के रूप में सहयोग लिया और बाजी फिल्म बनाई जो सन 1951 में रिलीज हुई। इस फिल्म को अपार सफलता प्राप्त हुई, बाजी देव साहब के फिल्मी कैरियर में मील का पत्थर साबित हुई जिसकी सफलता ने उन्हें हिंदी सिनेमा का सुपरस्टार बना दिया।
इसके बाद उनकी कुछ और सफल फिल्में आईं जिनमें राही और आंधियां प्रमुख फिल्में थीं। इसके बाद आई टैक्सी ड्राइवर जो बहुत सफल फिल्म साबित हुई, इस फिल्म में उनके साथ मुख्य भूमिका में थीं कल्पना कार्तिक जिनसे आगे चलकर उनका विवाह हो गया। यह वह समय था जब फिल्मी दुनिया के शोमैन कहे जाने वाले राजकपूर अपने कैरियर की ऊंचाईयों पर थे। राजकपूर के सामने अपने को स्थापित कर पाना बहुत मुश्किल था, लेकिन देव आनंद ने एक अभिनेता रूप में खुद को स्थापित ही नहीं किया बल्कि सुपर स्टार बन गए।
इसके बाद उनकी लगातार कई हिट फिल्में रिलीज हुईं जैसे- मुनीम जी, सीआईडी, पेइंग गेस्ट, इंसानियत औरकाला पानी जिनको उस समय की सफलतम फिल्मों में शुमार किया जाता है। फिल्म काला पानी के लिए देव साहब को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजा गया। इसके बाद उनके जीवन में उस समय की मशहूर अभिनेत्री सुरैय्या का आगमन हुआ जो देव साहब से विवाह करना चाहती थीं। सुरैय्या की दादी धार्मिक कारणों से इस रिश्ते के खिलाफ थीं, कहा जाता है कि देव साहब से शादी न हो पाने के कारण सुरैय्या आजीवन अविवाहित ही रहीं। देव साहब ने सुरैय्या और अपने रिश्ते के बारे में सन 2007 में लोकार्पित हुई अपनी आत्मकथा रोमासिंग विद लाइफ में भी स्वीकार किया है।
रंगीन फिल्मों की बात की जाए तो देव साहब की पहली रंगीन फिल्म सन 1965 में रिलीज हुई गाइड थी, जिसने सफलता के नए आयाम स्थापित किए। आर. के. नारायणन के उपन्यास पर आधारित फिल्म गाइड के बारे में कहा जाता है कि अब दुबारा गाइड कभी नहीं बन सकती, ऐसी फिल्में एक बार ही बनती हैं। इसके बाद उनकी कई सफल फिल्में आईं जो हिंदी सिनेमा की सफल फिल्मों में शुमार की जाती हैं जैसे- ज्वेल थीफ, जॉनी मेरा नाम, हरे राम हरे कृष्णा, देस परदेस आदि।
देव आनंद साहब की फिल्मों को उनके बेहतरीन संगीत की वजह से भी याद किया जाता है। उनकी सभी फिल्मों का संगीत अपने समय में हिट साबित हुआ। उनकी हिट फिल्में और बेहतरीन संगीत सदा हमारे बीच उनकी यादों के रूप में रहेगा। भारतीय सिनेमा में अभिनेता के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने वाले सुपरस्टार अभिनेता और एक जिंदादिल इंसान देव साहब का देहांत सिनेप्रमियों को आहत करने वाला है। उनकी ही फिल्म हम दो के सदाबहार गाने के इन शब्दों के साथ देव साहब को श्रद्धांजलि।
अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं…

एफडीआई बढ़ाने का आत्मघाती कदम


भारत विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। भारत की युवा आबादी विश्व में सबसे अधिक है। इसी कारण से भारत में अन्य देशों के मुकाबले रोजगार सृजन की अधिक आवश्यकता है। हमारे देश में वे उद्योग जो उपयुक्त पूंजी और श्रम के माध्यम से संचालित हो सकते हैं, वे हमारी जनसंख्या को रोजगार के भी अधिक अवसर देते हैं। बजाय उन उद्योगों और व्यवसाय के जो पूर्णतया मशीनों और पूंजी पर आधारित उद्योग हैं। पूंजी और मशीन आधारित उद्योगों में श्रम शक्ति के बजाय पूंजी की प्रधानता हो जाती है।
वर्तमान में जहां यूरोपीय देशों और अमेरिका में आर्थिक मंदी का प्रभाव बढ़ रहा है, जिसका कुछ असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। भारत सरकार ने भी देश की अनुमानित विकास दर में कमी रहने की आशंका जताई है। शायद इस आर्थिक गतिरोध से उबरने के लिए ही सरकार ने खुदरा बाजार में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश का पैंतरा चला है। सरकार अपने इस कदम से चैतरफा आलोचनाओं के घेरे में आ गई है। सरकार के सहयोगी तथा विपक्षी दलों ने इस मामले में सड़क से लेकर संसद तक आंदोलन किए जाने की चेतावनी दी है।
सवाल यह है कि क्या खुदरा बाजार में विदेशी निवेश से भारतीय अर्थव्यवस्था को गति मिल पाएगी और क्या भारत में बेरोजगारी में कमी आ पाएगी? इसका जवाब सकारात्मक नहीं मिलता है। भारत का 3,82,000 करोड़ का खुदरा बाजार जो सकल घरेलू उत्पाद में 14 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है और 8 प्रतिशत लोगों को आजीविका प्रदान करता है। इस खुदरा बाजार में यदि विदेशी  निवेश को 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 51 प्रतिशत कर दिया गया तो खुदरा बाजार के वैश्विक खिलाड़ी देशी लोगों को बेरोजगारी की ओर धकेलने का कार्य करेंगे।
भारतीय खुदरा बाजार में संगठित क्षेत्र की 2 प्रतिशत हिस्सेदारी है, वहीं असंगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी 98 प्रतिशत है। असंगठित क्षेत्र में अधिकतर वही लोग कार्यरत हैं, जिन्हें संगठित क्षेत्र में रोजगार का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। इसके अलावा वे लोग जो अकुशल श्रमिक की श्रेणी में आते हैं, वे भी खुदरा बाजार में ही कार्य कर रहे हैं। रोजगार के मामले में हताश युवा कम पूंजी के माध्यम से चल सकने वाली कोई छोटी सी दुकान अथवा पान-बीड़ी खोखे के माध्यम से स्वरोजगार को अपनाता है। यही छोटा सा धंधा उसकी आजीविका का साधन बनता है, जिसे सरकार विदेशी निवेश के माध्यम से छीन लेना चाहती है।
फिक्की के अनुसार खुदरा बाजार का संगठित क्षेत्र 5 लाख लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करता है। वहीं असंगठित क्षेत्र के माध्यम से 3.95 करोड़ लोग खुदरा बाजार में कार्यरत हैं। विदेशी निवेश का अर्थ है इतनी बड़ी आबादी का बेरोजगार हो जाना। सरकारी तर्क है कि विदेशी निवेश के बाद रोजगार के अवसरों में और बढ़ोत्तरी होगी, लेकिन वालमार्ट जैसी विशालकाय खुदरा कंपनियों का स्वभाव रोजगार सृजन का नहीं है। इन विशालकाय रिटेल स्टोरों में वही लोग कार्य कर पाएंगे जो मार्केटिंग के फॉर्मूले में प्रशिक्षित होंगे। अर्थात वहां उन अकुशल श्रमिकों के लिए कोई स्थान नहीं होगा, जो खुदरा बाजार में असंगठित क्षेत्र के माध्यम से स्वरोजगार कर रहे थे। गौरतलब है कि भारतीय खुदरा बाजार में 98 प्रतिशत हिस्सेदारी असंगठित क्षेत्र की है।
यदि असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लोग बेकार हो जाते हैं तो उनको सरकार कहां खपाएगी इसका कोई एजेंडा सरकार के पास नहीं है। लगता है सरकार आम आदमी को खुशहाल एवं स्वरोजगार में कार्यरत नहीं देखना चाहती, बल्कि उन्हें मनरेगा का मजदूर बनाना चाहती है। विदेशी कंपनियों में कार्यरत कुछ लोग जहां बेहतर पैकेज से खुशहाल होंगे, वहीं देश का बहुजन और आमजन बेरोजगारी और गरीबी से त्रस्त। देश के आम आदमी को मनरेगा का मजदूर और विदेशी कंपनियों को मालामाल करने की आत्मघाती नीति से सरकार को अपने कदम वापस खींच लेने चाहिए।

हिंदी पत्रकारिता के उन्नायक मदन मोहन मालवीय


पंडित मदन मोहन मालवीय। एक देशभक्त, लोकप्रिय शिक्षक, विद्वान राजनीतिज्ञ, प्रखर वक्ता, उच्च कोटि के वकील और हिंदी पत्रकारिता के उन्नायक। जिनका नाम भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। महामना के नाम से लोकप्रिय रहे मालवीय जी ने देश की स्वतंत्रता के आंदोलन को गति प्रदान की। देश में अंग्रेजों के अत्याचारी शासन के विरूद्ध जनता को जागृत करने का कार्य मालवीय जी ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से किया। जनता की जागरूकता ही आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार करने का कार्य करती है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मालवीय जी ने पत्रकारिता के माध्यम से जनचेतना और जनशिक्षण का कार्य किया था।
पंडित मदन मोहन मालवीय का जन्म 25 दिसंबर, 1861 को इलाहाबाद में हुआ था। पिता पंडित ब्रजनाथ संस्कृत के प्रकांड विद्वान और कथावाचक थे। मदन मोहन मालवीय को पिता से विद्वता और माता से सच्चरित्रता जैसे गुण विरासत में मिले थे, जिनका प्रभाव उनके जीवन पर पड़ा। महामना ने अनेक कार्यों के माध्यम से राष्ट्र सेवा की, जिसमें पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान है।

पंडित मदन मोहन मालवीय
 को हिंदी पत्रकारिता का उन्नायक माना जाता है। जिन्होंने भारतेंदु हरिशचन्द्र के जाने के बाद हिंदी पत्रकारिता में उपजे शून्य को समाप्त किया। सन् 1887 में प्रयाग के निकट कालाकांकर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र ‘हिंदोस्थान‘ के वे संपादक बने। संपादक का दायित्व उन्होंने हनुमत प्रेस के संस्थापक राजा रामपाल के आग्रह पर संभाला था।

उन्होंने अपने स्वाभिमान और पत्रकारिता के कर्तव्यों के साथ कभी भी समझौता नहीं किया। राजा रामपाल द्वारा संपादक बनने के आग्रह पर उन्होंने राजा साहब के समक्ष दो शर्तें रखीं। वे शर्तें इस प्रकार थीं, कि आप कभी भी मेरे कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और नशे की हालत में मुझे कभी मिलने के लिए नहीं बुलाएंगे। राजा रामपाल ने मालवीय जी की इन शर्तों को सहर्ष मान लिया, जिसके बाद ही महामना ने संपादक का दायित्व संभालने की स्वीकृति दी। महामना ने‘हिंदोस्थान‘ समाचार पत्र को नई ऊंचाईयां प्रदान कीं।
मालवीय जी के संपादकीय सहयोगी तत्कालीन समय के प्रतिष्ठित विद्वान और भाषाविद् थे। जिनमें प्रताप नारायण मिश्र, बाबू शशिभूषण, बालमुकुंद गुप्त आदि प्रमुख थे। महामना के संपादन में ‘हिंदोस्थान‘ समाचार पत्र देश का लोकप्रिय पत्र बन गया। तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक स्थितियों पर उनके लेख व संपादकीय टिप्पणियां लोगों को बहुत भाती थीं। मालवीय जी ने समाचार पत्रों की पत्रकारिता में एक नवीन प्रयोग किया, उन्होंने ‘हिंदोस्थान‘में गांवों की समस्याओं और समाचारों को भी स्थान दिया। ग्रामीण समस्याओं और विकास के समाचारों को पत्रों में स्थान देने का आरंभ मालवीय जी ने ही किया था। इसके बाद से यह विषयहिंदी समाचार पत्रों के महत्वपूर्ण अंग बन गए।
मालवीय जी ने ढाई वर्षों तक निरंतर ‘हिंदोस्थान‘ के संपादक का दायित्व संभाला। लेकिन एक दिन राजा रामपाल ने महामना को नशे की हालत में किसी विषय पर परामर्श के लिए बुलवाया। राजा साहब से मिलते ही मालवीय जी ने नशे में उनको न बुलाने की शर्त याद दिलाते हुए कहा कि अब मैं एक पल भी यहां नहीं ठहर सकता। राजा साहब ने उनको बहुत मनाया लेकिन वे अपने निर्णय से नहीं डिगे। 1889 में मालवीय जी ने ‘हिंदोस्थान‘ समाचार पत्र को छोड़ दिया।
‘हिंदोस्थान‘ छोड़ने के बाद महामना प्रयाग आ गए और उस समय के प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्र ‘इंडियन ओपीनियन‘ से जुड़े। कुछ समय पश्चात् ‘इंडियन ओपीनियन‘ का लखनऊ से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘एडवोकेट‘ में विलय हो गया। विलय के पश्चात् भी मालवीय जी ‘एडवोकेट‘ से जुड़े रहे, इसी दौरान उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू कर दी। मालवीयजी ने सन् 1891 में एल.एल.बी की परीक्षा उत्तीर्ण की और जिला न्यायालय में वकालत करने लगे। सन् 1893 में उन्हें उच्च न्यायालय में वकालत करने का मौका मिला। उच्च न्यायालय में वकालत करते हुए भी मालवीय जी लेखन के माध्यम से समाचार पत्रों से जुड़े रहे। मालवीय जी की सदैव ही यह आकांक्षा रही थी कि अपने प्रयास से समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया जाए।
सन् 1907 में बसंत पंचमी के दिन हिंदी पत्रकारिता ने नया उदय देखा। यह उदय मालवीय जी के समाचार पत्र ‘अभ्युदय‘ के रूप में हुआ था, यह पत्र साप्ताहिक था। मालवीय जी ने ‘अभ्युदय‘ के लिए लिए जो संपादकीय नीति तैयार की थी, उसका मूल तत्व था स्वराज। महामना ने ‘अभ्युदय‘में ग्रामीण लोगों की समस्याओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया था। जिसका उदाहरण ‘अभ्युदय‘ के पृष्ठों पर लिखा यह वाक्य था- ‘कृपा कर पढ़ने के बाद अभ्युदय किसी किसान भाई को दे दीजिए‘।
मालवीय जी की पत्रकारिता का ध्येय ही राष्ट्र की स्वतंत्रता था, जिसके लिए वे जीवनपर्यंत प्रयासरत रहे। उन्होंने ‘अभ्युदय‘ में कई क्रांतिकारी विशेषांक प्रकाशित किए। इनमें ‘भगत सिंह अंक‘ व‘सुभाष चंद्र बोस‘ विशेषांक भी शामिल हैं। जिसके कारण ‘अभ्युदय‘ के संपादक कृष्णकांत मालवीय को जेल तक जाना पड़ा, ‘अभ्युदय‘ के क्रांतिकारी लेखों में मालवीय जी की छाप दिखाई पड़ती थी।
गांवों से संबंधित विषयों को समाचार पत्र में स्थान देने के अलावा लेखकों को मानदेय देने का प्रचलन भी मालवीय जी ने ही प्रारंभ किया था। ‘अभ्युदय‘ में प्रकाशित पं महावीर प्रसाद द्विवेदी के लेख के साथ ही उन्होंने लेखकों को मानदेय देने की शुरूआत की थी। उनका यह कार्य इसलिए भी प्रशंसनीय था क्योंकि उस समय ‘अभ्युदय‘ की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी।
मालवीय जीने‘अभ्युदय‘के पश्चात् 24 अक्टूबर, 1910 को अंग्रेजी पत्र ‘लीडर‘ का प्रारंभ किया।मालवीय जी ‘लीडर‘ के प्रति सदा संवेदनशील रहे, डेढ़ वर्ष बीतते-बीतते ‘लीडर‘ घाटे की स्थिति में जा पहुंचा। महामना उस दौरान काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए धन एकत्र करने में लगे हुए थे, जब ‘लीडर‘ के संचालकों ने मालवीय जी को घाटे की स्थिति से अवगत कराया तो वे विचलित हो उठे। उन्होंने कहा कि, ‘‘मैं लीडर को मरने नहीं दूंगा।‘‘ काशी विश्वविद्यालय की स्थापना का कार्य बीच में ही रोककर मालवीय जी ‘लीडर‘ के लिए आर्थिक व्यवस्था के कार्य में जुट गए। पहली झोली उन्होंने अपनी पत्नी के आगे यह कहते हुए फैलाई कि ‘‘यह मत समझो कि तुम्हारे चार ही पुत्र हैं। दैनिक लीडर तुम्हारा पांचवां पुत्र है। अर्थहीनता के कारण यह संकट में पड़ गया है। तो क्या मैं पिता के नाते उसे मरते हुए देख सकता हूं।‘‘ मालवीय जी के अथक प्रयासों से लीडर बच गया।मालवीय जी ने पत्रकारिता में नए प्रयोग किए और पत्रकारिता को नए आयामों पर पहुचाया। 12 नवंबर, 1946 को महामना मदन मोहन मालवीय को मालवीय जी ने अपने प्राण त्याग दिए, परंतु उनकी स्मृतियां और उनके आदर्श सदैव पत्रकारिता जगत में विद्यमान रहेंगे।

मीडिया पर नहीं, मीडिया मुग़लों पर हो नियंत्रण



पूर्व न्यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद के वर्तमान अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाए जाने की राय व्यक्त की है। काटजू के इस बयान को लेकर मीडिया में हलचल है, लोकपाल के दायरे में लाए जाने का कुछ लोग विरोध कर रहे हैं तो कुछ समर्थन। मार्कंडेय काटजू की टिप्पणी मीडिया की स्वनियंत्रण की दलील के परिप्रेक्ष्य में है। काटजू ने कहा कि ‘‘सेल्फ रेगुलेशन कोई रेगुलेशन नहीं है और न्यूज ऑर्गनाईजेशन प्राइवेट संस्थान हैं जिनके काम का लोगों पर गहरा असर होता है, उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।“
इससे पहले काटजू पत्र के माध्यम से (ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन) के सचिव एन.के सिंह से भी यह सवाल कर चुके हैं कि क्या न्यूज ब्राडकास्टर लोकपाल के दायरे में आना चाहते हैं। उन्होंने कहा- ‘‘मैं जानना चाहता हूं कि ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन, जिसके आप सचिव हैं लोकपाल के दायरे में आना चाहते हैं, जिसके संसद के अगले सत्र में पारित होने की संभावना है? ऐसा लगता है कि आप प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के दायरे में आने से कतरा रहे हैं तो क्या आप लोकपाल के दायरे में भी नहीं आना चाहते हैं।‘‘ काटजू ने मीडिया की स्वनियंत्रण के अधिकार पर हमला करते हुए कहा कि ‘‘आप स्वनियंत्रण के अधिकार की मांग करते हैं। क्या आपको याद दिलाना पडे़गा कि इस तरह का निरंकुश अधिकार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी हासिल नहीं है।
काटजू ने लिखा कि ‘‘वकील बार काउंसिल के नियंत्रण में हैं और किसी भी पेशेवर कदाचार के लिए उनके लाइसेंस को रद्द किया जा सकता है। इसी तरह, डाक्टरों पर मेडिकल काउंसिल की नजर होती है और चार्टर्ड अकाउंटेंट पर चार्टर्ड की… इत्यादि। फिर क्यों आपको लोकपाल या किसी भी दूसरी रेगुलेटरी अथारिटी के नियंत्रण में आने से एतराज है।“
काटजू ने लिखा कि ‘‘हाल ही में मीडिया ने अन्ना के आंदोलन का व्यापक प्रचार किया। अन्ना हजारे की भी यही तो मांग थी कि नेता, नौकरशाही एवं जजों सभी को जनलोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए। आखिर किस आधार पर लोकपाल के दायरे में आने से छूट पाना चाहते हैं?‘‘
काटजू ने कड़ी टिप्पणी करते हुए लिखा कि ‘‘स्वनियंत्रण की दलील तो नेता और नौकरशाह आदि भी देंगे। कहीं आप खुद को ‘दूध के धुले‘ होने का दावा तो नहीं करते कि आप पर खुद के अलावा किसी का भी नियंत्रण न हो? यदि ऐसा है तो पेड न्यूज और राडिया टेप क्या था?‘‘
भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष की यह टिप्पणी कठोर जरूर है परंतु विचारपूर्ण भी है। हालांकि मीडिया जगत में उनकी इस टिप्पणी की कड़ी आलोचना भी हुई है, जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने उनकी टिप्पणी को ‘‘मीडिया पर नियंत्रण की अनियंत्रित सलाह‘‘ करार दिया। काटजू की यह सलाह व्यावहारिक रूप से मीडिया पर लागू करना उस पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण कहा जा सकता है, परंतु मीडिया में भी एक ऐसा वर्ग उभर कर आया है जिस पर लोकपाल जैसी ही निगरानी किए जाने की आवश्यकता है।
मीडिया का वह वर्ग जो पैसे के आधार पर समाचार का समय और सामग्री तय करने का कार्य करता है। वह समाचारपत्र और समाचार चैनल जहां प्रशिक्षण के नाम पर नवोदित पत्रकारों का शोषण और उनसे पैसे लेकर पत्रकार बनाने का दावा किया जाता है, उन पर भी लोकपाल अथवा ऐसे ही किसी व्यवस्था की आवश्यकता जान पड़ती है। दरअसल, मीडिया में नियामक व्यवस्था लागू करने में मीडिया के विभिन्न पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है।
मीडिया में समाचारों के प्रसारण के संबंध में हस्तक्षेप करना उचित नहीं जान पड़ता है परंतु मीडिया संगठनों के आर्थिक स्त्रोतों और उसकी कार्यप्रणाली की निगरानी की व्यवस्था करना आवश्यक प्रतीत होता है। जिससे मीडिया के कार्यव्यवहार में स्वतः ही सुधार दिखाई देने लगेगा परंतु मीडिया के समाचार प्रसारण पर नियंत्रण से अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता का ही हनन होगा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि दर्शकों एवं पाठकों ने भी अब जागरूकता प्रदर्शित करनी शुरू की है, सनसनीखेज और टीआरपी की पत्रकारिता को जनता ने नकारना शुरू कर दिया है।
अगर बात रही पत्रकारों को प्राप्त किसी विशेषाधिकार की तो उसे व्यक्तिगत तौर पर  कोई भी विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है, उसके ऊपर वो सभी कानून लागू होते हैं जो किसी आम आदमी पर। फिर भी मीडिया में बढ़ते भ्रष्टाचार और अनैतिक पत्रकारिता के जिम्मेदार लोगों के लिए काटजू की टिप्पणी सटीक जान पड़ती है।

विकिलीक्स को बचा लो…


हमारी लड़ाई महत्वपूर्ण है। हमें आपके सहयोग की बहुत आवश्यकता है। यह अपील है विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे की। जिन्होंने दूतावासों के गुप्त दस्तावेजों को उजागर कर समस्त विश्व को अमेरिकी कूटनीति का परिचय कराया था। विकिलीक्स ने वैसे तो इससे पहले सन् 2007 में ग्वांटनामो बे जेल की बर्बरता की आधिकारिक रिपोर्ट को लीक करके ही सनसनी फैला दी थी। विकिलीक्स की सनसनीखेज पत्रकारिता का दौर तो तब शुरू भी नहीं हुआ था। यह दौर तो नवंबर 2010 में शुरू हुआ जब विकिलीक्स ने अमेरिकी कूटनीति से संबंधित डाटा केबलों का प्रकाशन प्रारंभ किया। इसके साथ ही विकिलीक्स के लिए मुसीबतों की भी शुरूआत हो गई, अमेरिकी सरकार की नाराजगी के कारण  असांजे को बहुत दिनों तक गुप्त स्थानों पर रहना पड़ा और विभिन्न मुकदमों का भी सामना करना पड़ा।
इस सबके बावजूद जूलियन असांजे अपने कार्य को लगातार अंजाम देते रहे, लेकिन अब उनकी वेबसाइट गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रही है। दरअसल जब अमेरिकी सरकार असांजे को कानूनी शिकंजे में नहीं फंसा पाई तो उसने उसके अस्तित्व को मिटाने के लिए उसके आर्थिक स्त्रोतों पर लगाम लगानी प्रारंभ की। अमेरिकी दबाव के फलस्वरूपविकिलीक्स की आय के प्रमुख स्त्रोत वीजा, मास्टरकार्ड और एप्पल ने उसके हाथ से छीन लिया। गौरतलब है कि वीजा और मास्टरकार्ड का यूरोप के 97 प्रतिशत कार्ड बाजार पर कब्जा है, इन कंपनियों के हाथ खींच लेने के कारणविकिलीक्स आर्थिक संकट से घिर गई।
विकिलीक्स ने अपनी वेबसाइट में जानकारी दी है कि अमेरिकी सरकार ने उसके विज्ञापनदाताओं पर ही शिकंजा नहीं कसा, बल्कि जिन समाचारपत्रों ने विकिलीक्स के केबलों को प्रकाशित किया था उनको मिलने वाले विज्ञापनों पर भी रोक लगा दी। विकिलीक्स के आर्थिक स्त्रोतों पर अमेरिकी दबाव के कारण विकिलीक्स की आय में 95 प्रतिशत तक कमी आई है।
विकिलीक्स के मुताबिक ‘‘विज्ञापनदाता कंपनियों के हाथ खींच लेने के कारण हमारी आय में 95 प्रतिशत  तक की कमी आई है, आर्थिक मदद न मिलने के कारण हम पिछले 11 माह से पूर्व में प्राप्त आय से ही वेबसाइट का संचालन कर रहे हैं। यदि इसी तरह चलता रहा तो हमें 2011 के अंत तक विकिलीक्स को बंद करना पड़ सकता है।”
हालांकि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायोग ने विकिलीक्स के प्रति अमेरिकी रवैये की निंदा की है, परंतु अमेरिका को उसकी फिक्र कहां है। विकिलीक्स के प्रति अमेरिकी रवैया यह सवाल खड़ा करता है कि क्या अमेरिका मीडिया का भी वैश्विक नियंता बन चुका है। विकिलीक्स के खुलासों को बेशक कुछ पत्रकार पत्रकारिता के आदर्शों से परे मानते हों, लेकिन उसने खोजी पत्रकारिता को एक नया आयाम अवश्य दिया है।
विकिलीक्स ने पत्रकारिता में एक नई पहल की विकिलीक्स से पहले खोजी पत्रकारिता का स्तर राष्ट्र से परे नहीं था, जिसे जूलियन असांजे ने वैश्विक रूप प्रदान किया। जूलियन असांजे ने अपनी अपील में कहा है कि यदि आप लोगों की मदद नहीं मिली और आर्थिक संकट बरकरार रहा तो हमें साल के अंत तक विकिलीक्स का प्रकाशन बंद करना पड़ेगा। यानि विकिलीक्स पत्रकारिता जगत से जल्द ही विदाई ले सकती है।
विकिलीक्स जो प्रकाशन के दौरान विवादों और सवालों के घेरे में रही जाते-जाते भी कई सवाल खड़े कर जाएगी। जैसे क्या दान के बल पर चलने वाले पत्रकारिता संस्थान कभी भी कुछ लोगों की नाराजगी के कारण बंद हो सकते हैं? इसके साथ मीडिया के लिए यह भी एक संदेश है कि पूरी तरह विज्ञापनदाताओं पर ही आधारित होकर पत्रकारिता के मिशन को पूरा नहीं किया जा सकता है।
विकिलीक्स को जनता से कितना सहयोग मिलता है और कब तक उसका संचालन हो पाता है यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन विकिलीक्स जैसी मुसीबतों का सामना कोई और पत्रकारिता संस्थान करे। उससे पहले मीडिया जगत को आत्मावलोकन अवश्य करना चाहिए।

“वॉल स्ट्रीट घेरो आंदोलन” के निहितार्थ

अमेरिका और यूरोपीय देशों सहित विश्व भर के 82 देशों में पूंजीवाद विरोधी आंदोलन चल रहे हैं। इस आंदोलन को‘आक्यूपाइ वाल स्ट्रीट जनरल‘ नाम दिया गया है। 82 देशों के विभिन्न शहरों और स्टॉक एक्सचेंजों के आसपास जमा भीड़ वर्तमान आर्थिक ढांचे के लिए एक चेतावनी के रूप में दिखाई दे रही है। न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर में और अन्य देशों के प्रमुख शहरों में जमा आंदोलनकारी अपनी आजीविका छीनने और रोजगार के कम अवसरों के कारण हताश हैं। यूरोपीय संघ में कर्ज संकट गहराने और अमेरिका में आई मंदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे से प्रभावित किया है। समस्त विश्व के लिए अनुकरणीय आर्थिक मॉडल और सुपर पॉवर बने अमेरिका की असली तस्वीर अब सबके सामने है।
गौरतलब है कि वह अमेरिका जो दुनिया की आर्थिक ग्रोथ का इंजन था, अब उसमें ठहराव आने लगा है। रीयल एस्टेट के कारोबार और उपभोक्ता संस्कृति पर आधारित अर्थव्यवस्था अब ढलान की ओर है। इसी समय में  पूंजीवादियों के द्वारा आम लोगों के पोषण और भ्रष्टाचार ने व्यवस्था के प्रति आम अमेरिकियों के गुस्से को और बढ़ा दिया है। तानाशाही शासन के विरोध में खाड़ी देशों और भारत में हुए आंदोलन के बाद अमेरिका में भ्रष्टाचार को लेकर उपजे गुस्से ने आंदोलनों का वैश्वीकरण कर दिया है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के देश आर्थिक रूप से समृद्ध देशों की श्रेणी में आते हैं। आंदोलन इन  देशों  में कम ही देखने को मिलते हैं, ऐसे में इन  देशों  में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों का एकत्रीकरण समस्या की जटिलता को उजागर करता है। प्रदर्शनकारी ‘‘हमारा पैसा वापस करो” और “परमाणु परियोजनाएं बंद करो” जैसे नारे लगा रहे हैं। फिलीपिंस में तो  प्रदर्शनकारियों  ने अमेरिकी दूतावास के सामने प्रदर्शन किया और ‘‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद‘‘ के नारे लगाए, और अमेरिका को चेताते हुए ‘‘फिलीपिंस बिकाऊ नहीं है‘‘ का उद्घोष किया।
विश्व के 82  देशों  में चल रहे इस प्रकार के आंदोलन अमेरिकी आर्थिक मॉडल के अवसान की घोषणा कर रहे हैं। सन् 2008 में 117 वर्ष पुराने बैंक ‘‘लेहमन ब्रदर्स‘‘ के डूबने के साथ ही अमेरिका और उससे व्यापारिक तौर पर जुड़े राष्ट्रों में मंदी की आहट सुनाई पड़ी थी। उसके बाद अमेरिका ने अपने बैंको के डूबने के सिलसिले को रोकने के लिए और बाजार में मांग बढ़ाने के लिए राहत पैकेजों की घोषणाएं की थीं। इन राहत पैकेजों के माध्यम से जब तक अर्थव्यवस्था संभलती उससे पहले ही कर्ज संकट ने एक बार फिर अमेरिकी व्यवस्था को हिला दिया।
बाजार में मांग कम होने के कारण अमेरिकी कंपनियां वहां के श्रमिकों को अधिक वेतन पर रखने की बजाय एशियाई मूल के लोगों को रोजगार दे रही हैं। जिससे उनके उत्पादों में लगने वाले लागत मूल्य में कमी आ जाती है। हालांकि राष्ट्रपति ओबामा ने आउटसोर्सिंग पर रोक लगाने का ऐलान किया था, परंतु कंपनियों के दबाव के कारण उनको अपने रवैये में बदलाव करना पड़ा। जिसके परिणामस्वरूप अमेरिकी नागरिकों की बेरोजगारी का प्रतिशत एक बार फिर बढ़ गया। बाजार में मंदी और आउटसोर्सिंग ने अमेरिकी नागरिकों के सामने दोहरी समस्या खड़ी कर दी है।
अमेरिका में आने वाली कोई भी समस्या विश्व भर की समस्या बन जाती है और अमेरिका की कामयाबी को भी वैश्विक सफलता के रूप में प्रचारित किया जाता है। इसका कारण यह है कि विश्व की अर्थव्यवस्था डॉलर आधारित अर्थव्यवस्था है, ऐसे में अमेरिका से व्यापारिक तौर पर जुड़े देशों पर इसका प्रभाव पड़ना लाजिमी है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आ रहा ठहराव हमारे सामने भी कुछ प्रश्न खड़े करता है। जिनमें से प्रमुख हैं-
- क्या उपभोक्ता आधारित संस्कृति के भरोसे भारत एक मजबूत और स्थिर महाशक्ति बन सकता है?
- क्या जीडीपी हमारी आर्थिक संवृद्धि को मापने का सही पैमाना है?
- सबसे बड़ा प्रश्न  इस आर्थिक मॉडल के तहत है, आय का असमान वितरण। गरीब और अमीर के बीच चौड़ी होती खाई, और चंद लोगों की उन्नति होने से क्या कोई राष्ट्र विकसित राष्ट्र हो सकता है?
ऐसे कुछ सवालों के जवाब हमें तलाशने चाहिए और अपनी आर्थिक नीतियों की एक बार फिर से समीक्षा करनी चाहिए। जिस अमेरिकी मॉडल का अनुकरण करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं, वह अमेरिका में ही सफल नहीं हो पाया है। ऐसे में अमेरिकी मॉडल के अंधानुकरण करने की नीतियों की एक बार हमें समीक्षा करते हुए, इन आंदोलनों से सबक लेना चाहिए।

मिशनरी पत्रकार थे महात्मा गांधी

भारत में पत्रकारिता का प्रादुर्भाव पुनर्जागरण के समय में हुआ था। यही वह समय था जब भारत की राष्ट्रीय चेतना जागृत हो रही थी। राष्ट्र की चेतना को जागृत करने वाले सभी प्रमुख लोगों ने इस कार्य के लिए पत्रकारिता को अपना सशक्त माध्यम बनाया। पत्रकारिता उस दौर में ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध जनमत निर्माण के माध्यम के रूप में सामने आई थी। इस माध्यम का उपयोग स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नायक महात्मा गांधी ने भी किया था। 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी ने स्वाधीनता आंदोलन को पत्रकारिता के माध्यम से मजबूती प्रदान की। महात्मा गांधी ने अपनी पत्रकारिता की शुरूआत सन 1888 में लंदन से ही कर दी थी। गांधी जी ने पत्रकारिता का उपयोग दो प्रकार से किया- इंग्लैण्ड में प्रवास काल (जुलाई, 1888-जून,1891) तथा दक्षिण अफ्रीका में देशी-विदेशी समाचारपत्रों के माध्यम से गांधी ने अपने कार्यों एवं विचारों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य किया और उन्हें वहां के समाचारपत्रों में विशेष स्थान मिलता गया। गांधी जी ने पत्रकारिता के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक में भारत और भारतीयों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई। सन् 1888 से 1896 तक का समय गांधी जी के पत्रकारिता के संपर्क में आने का समय कहा जा सकता है।
महात्मा गांधी जब सन् 1888 में लंदन पहुंचे तब तक वे समाचारपत्रों की दुनिया से अधिक परिचित नहीं थे, दलपतराम शुक्ल के सुझाव पर उन्होंने प्रतिदिन एक घंटे का समय विभिन्न अखबारों को पढ़ने में लगाना शुरू किया। तब उनके मन में यह विचार आया भी न होगा कि वे एक दिन समाचार पत्रों की दुनिया के महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में स्थापित होंगे। गांधी जी अपनी माता के प्रभाव के कारण अन्नाहारी थे, वे इंग्लैण्ड में अन्नाहार आंदोलन से भी जुड़े रहे थे। अन्नाहार को लेकर गांधी जी ने ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार ‘‘वेजिटेरियन‘‘ में लेख लिखना शुरू किया। ब्रिटेन के बाद दक्षिण अफ्रीका पहुंचने पर महात्मा गांधी ने ‘‘इंडियन ओपीनियन‘‘ समाचार पत्र का संपादन किया। उन्होंने इंडियन ओपीनियन के माध्यम से दक्षिण अफ्रीकी और भारतीय लोगों को ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति जागृत करने का कार्य किया। ‘‘इंडियन ओपीनियन‘‘ का प्रथम अंक 4 जून, 1903 को निकला, जिसमें महात्मा गांधी ने पत्रकारिता के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए लिखा-
1- ‘‘पत्रकारिता का पहला काम जनभावनाओं को समझना और उन्हें अभिव्यक्ति देना है।
2- ‘‘पत्रकारिता का दूसरा उद्देश्य लोगों में जरूरी भावनाओं को जागृत करना है।
3- ‘‘पत्रकारिता का तीसरा उद्देश्य निर्भीक तरीके से गड़बड़ियों को उजागर करना है।
गाँधी जी ने आर्थिक समस्या और सरकारी दबाव के बाद भी इंडियन ओपीनियन का प्रकाषन जारी रखा। गोपाल कृष्ण गोखले को 25 अप्रैल, 1909 को प्रेषित पत्र में उन्होंने लिखा-
‘‘20 अप्रैल तक ‘इंडियन ओपीनियन‘ पर 2500 पौंड का कर्ज था। पर संघर्ष की खातिर मैं उसे चलाए जा रहा हूं।‘‘
महात्मा गांधी अल्पायु में ही समाचार पत्रों के लिए महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए। समाचार पत्रों में लेखन के माध्यम से महात्मा गांधी समूचे दक्षिण अफ्रीका में लोकप्रिय हो गए थे। गांधी जी ने पत्रकारिता को अपने संघर्ष का सशक्त माध्यम बना लिया और पत्रकारिता जगत के आवश्यक अंग बन गए। महात्मा गांधी ने भारत लौटकर भी पत्रकारिता के अपने सफर को जारी रखा। भारत लौटने पर उन्होंने ‘‘बॉम्बे क्रॉनिकल‘‘ और सत्याग्रही समाचार पत्र निकाले, किंतु वे 10-15 दिनों तक ही इनका दायित्व संभाल सके। इन समाचार पत्रों के बंद होने के बाद महात्मा गांधी ने ‘‘नवजीवन‘‘ और ‘‘यंग इंडिया‘‘ दो समाचार पत्र सितंबर 1919 में निकाले, जिनका प्रकाशन सन् 1932 में गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद बंद हो गए। इसके बाद भी महात्मा गांधी के पत्रकार जीवन की यात्रा जारी रही। जेल से छूटने के पश्चात् गांधी जी ने ‘‘हरिजन‘‘ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र निकाला, जिसका प्रकाशन 11 फरवरी, 1933 से प्रारंभ होकर महात्मा गांधी के जीवन-पर्यंत तक जारी रहा। गांधी जी के अपने समाचार पत्रों का प्रकाशन कई बार बंद करना पड़ा, लेकिन वे ब्रिटिश सरकार की कुटिल नीतियों के आगे न कभी झुके, न थके। गिरफ्तारी और सेंसरशिप लगने से उनके पत्र बंद अवश्य हुए, लेकिन मौका मिलते ही गांधी जी पुनः पत्रों के प्रकाशन के कार्य में जुट जाते थे। गांधी जी ने कई दशकों तक पत्रकार के रूप में कार्य किया, कई समाचारपत्रों का संपादन किया। महात्मा गांधी ने उस समय में जब भारत में पत्रकारिता अपने शैशव काल में थी, उन्होंने पत्रकारिता की नैतिक अवधारणा प्रस्तुत की। महात्मा गांधी ने जिन समाचार पत्रों का प्रकाशन अथवा संपादन किया वे पत्र अपने समय में सर्वाधिक लोकप्रिय पत्रों में माने गए। गांधी जी के पत्रकारिता की प्रशंसा करते हुए चेलापतिराव ने कहा कि- ‘‘गांधी जी शायद सबसे महान पत्रकार हुए हैं और उन्होंने जिन साप्ताहिकों को चलाया और संपादित किया वे संभवतः संसार के सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक हैं।‘‘
महात्मा गांधी समाचार पत्रों को किसी भी आंदोलन अथवा सत्याग्रह का आधार मानते थे, उन्होंने कहा था- ‘‘मेरा ख्याल है कि ऐसी कोई भी लड़ाई जिसका आधार आत्मबल हो, अखबार की सहायता के बिना नहीं चलायी जा सकती। अगर मैंने अखबार निकालकर दक्षिण अफ्रीका में बसी हुई भारतीय जमात को उसकी स्थिति न समझाई होती और सारी दुनिया में फैले हुए भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका में कया कुछ हो रहा है, इसे इंडियन ओपीनियन के सहारे अवगत न कराया होता तो मैं अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता था। इस तरह मुझे भरोसा हो गया है कि अहिंसक उपायों से सत्य की विजय के लिए अखबार एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन है।‘‘
महात्मा गांधी ने पत्रकारिता के माध्यम से सूचना ही नहीं बल्कि जनशिक्षण और जनमत निर्माण का भी कार्य किया। गांधी जी की पत्रकारिता पराधीन भारत की आवाज थी, उन्होंने समाचार पत्रों के माध्यम से अपनी आवाज को जन-जन तक पहुंचाया और अंग्रेजों के विरूद्ध जनजागरण का कार्य किया।

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