शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

‘विकास पत्रकारिता’ समय की मांग



डा. ब्रजेश पति त्रिपाठी/ 

विकास के क्षेत्र में सूचना का सबसे अधिक महत्व होता है। किसी क्षेत्र का विकास सूचना के बिना संभव नहीं है। कहां किसे क्या आवश्यकता है? कितनी आवश्यकता है? कैसे उस आवश्यकता की पूर्ति की जाय? विकास के लिए किन-किन बातों का जानना जरूरी है? कौन-कौन से सामान या तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता है। वे सभी चीजें सूचना के माध्यम से ही सोचा, समझा और जाना जा सकता है। विकास पत्रकारिता उसी प्रक्रिया को कहते हैं जो लोगों को सभी आवश्यक सूचना देकर विकास को गति प्रदान करते हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से पूरी दुनिया में आर्थिक-सामाजिक विकास की दिशा में चेतना बढ़ी है। 1950 से पहले विकास मुख्य रूप से आर्थिक बिन्दुओं के इर्द-गिर्द घूमते नजर आते थे लेकिन 1950 के बाद विकास में आर्थिक बिन्दु के साथ-साथ सामाजिक भी जुड़ गयी। इसी के साथ विकास का अर्थ आर्थिक विकास नहीं रहकर इसमें समाज के सामाजिक, भौतिक विकास संबंधी पक्षों को भी सम्मिलित किया गया। स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा आदि क्षेत्रों का महत्व भी धीरे-धीरे विकास के दायरे में आता चला गया। फिर भी सभी पक्षों की तुलना में आज भी आर्थिक पक्ष ही विकास प्रक्रिया पर अधिक हावी रहा है। विकास की गति को बढ़ाने की आवश्यकता का मुख्य कारण गरीबी, भूखमरी, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास संबंधी समस्याओं का होना है।
मनुष्य की आवश्यक आवश्यकताएं आखिर क्या है। इस पर अनेक बार अन्तरराष्ट्रीय स्तर के सम्मेलनों में विकसित व विकासशील देशों के बीच अच्छी खासी बहस हुई। आवश्यक आवश्यकताएं को ही हम मूल आवश्यकता भी कहते हैं। आवश्यक आवश्यकता वह है जो व्यक्ति में रचनात्मकता प्रदान करने के लिए स्वस्थ वातावरण पैदा करें, आत्मनिर्भर बनाये और व्यक्ति स्वयं को आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र महसूस करे। इसीलिए विकास ऐसा होना चाहिए जिससे व्यक्ति और समाज का सम्रग विकास हो।
विकास क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए गरीबी के अर्थशास्त्र के साथ-साथ गरीबी का भूगोल पढ़ना बहुत ही जरूरी है। इस दिशा में विकास पत्रकारिता का विशेष योगदान हो सकता है। अत्यंत गरीब किस क्षेत्र में है ? उनकी संख्या क्या है ?उनकी गरीबी का कारण क्या है ? प्रत्येक क्षेत्र के गरीबी के कारण अलग-अलग हो सकते हैं इसलिए जब तक उस स्थिति का सही ज्ञान नहीं होगा तब तक उससे निजात नहीं पाया जा सकता है। सामान्यतः अत्यंत गरीब लोग बहुत सुदूर क्षेत्रों में रहते हैं, लेकिन बहुत से गरीब लोग हमारे आसपास भी रहते हैं। जिनका प्रायः समाज के सम्पन्न लोगों द्वारा शोषण किया जाता रहा है। ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें गरीबी के कारण प्राकृतिक संसाध्नों से भी वंचित होना पड़ता है। इस प्रकार लोग प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों में पाये जाते हैं जिनकी जमीनें बिक चुकी है और उनके पास गुजर बसर के आवश्यक साधन भी नहीं बचे हैं। इस स्थिति के लिए अलग सोचने, विचारने और कार्य करने की आवश्यकता है। जिसमें विकास पत्रकारिता का विशेष योगदान संभव है।
विकास प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक जैसा संभव नहीं हो सकता है। किसी क्षेत्र विशेष के विकास कार्य करने से पहले वहां के लोगों के मानस को जानना जरूरी है। लोग क्या सोचते हैं? उनकी मानसिक दशा क्या ऐसी है जो विकास के प्रति झुकायी जा सकती है? पूरी तरह से अविकसित क्षेत्र में मुख्यतः आदिवासी क्षेत्र आते हैं। जो विकास के प्रति उत्साही नहीं होते हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि मानसिक स्थिति के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक दशा के संबंध में भरपूर जानकारी प्राप्त किये बिना विकास के कदम को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। इस दायित्व को पत्रकारिता के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है। पत्र पत्रिकाओं के सम्पादक, संवाददाता वैसे अविकसित क्षेत्रों में जाये जहां विकास की शुरूआत ही नहीं हुई है अथवा अभी-अभी शुरू हुई है और वहां की सभी पक्षों का अध्ययन करके समाज और सरकार को बतायें कि वहां के लोगों की मूलभूत आवश्यकताएं क्या हैं? विकास कैसे किया जा सकता है।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसीलिए लोकतंत्र में पत्रकारिता को चैथा स्तम्भ के रूप में जाना जाता है। वस्तुतः लोकतन्त्र की सफलता बहुत हद तक पत्रकारिता की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आजादी के बाद देश में पत्रकारिता के हर विधा में तेजी से प्रगति हुई है। साथ ही साथ इसकी गुणवत्ता में भी काफी वृद्धि हुई है। पत्रकारिता के फैलाव के साथ ही साथ इनके कई क्षेत्रों में ऐसी समस्यायें पैदा हुई जिसका विश्लेषण करना आवश्यक है। वर्तमान समय में इसकी जरूरत और भी बढ़ गयी है। इस समय सरकार का उदेश्य भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना है। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि भारत एक गरीब देश है। 18वीं शताब्दी से पहले भारत की गणना तत्कालीन विश्व के उन्नत देशों में होती थी। तीन सौ वर्ष बाद इक्कीसवीं सदी की प्रथम दशक में पहुंचते-पहुंचते इसका आर्थिक विकास इतना अधिक पिछड़ गया कि इसकी पहचान एक बेहद गरीब देश के रूप में होने लगी।
एक अकाट्य सत्य यह है कि भारत की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। एक तिहाई आबादी को दो जून का सन्तुलित भोजन भी उपलब्ध नहीं है। गरीबी का प्रश्न सही अर्थो में बेरोजगारी से जुड़ा हुआ है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि देश के सामने सबसे बड़ी समस्या गरीबी व बेरेाजगारी है। अगर समय रहते इसका समाधान नहीं हुआ तो विकास की सारी उपलब्धियां बेकार साबित होंगी। यह समस्या जितना सरकार के लिए महत्वपूर्ण है उतना ही पत्रकारिता के लिए। पत्रकारिता देश में व्याप्त गरीबी और बेरोजगारी केा किस रूप में देखती है और जनता के समक्ष इसका विश्लेषण किस रूप में करती है। गरीबी और बेरोजगारी की समस्या के साथ सामाजिक-आर्थिक विकास के सारे महत्वपूर्ण सवाल जुड़े हुए हैं। इसका बेवाक विश्लेषण इस रूप में करना चाहिए कि जनता इसके मर्म को आसानी से समझ सके। वैसे भी जब हम विकास की बात करते हैं तो इस बात पर जोर देते हैं कि इसकी सफलता के लिए जनता की जागरूकता व विकास की प्रक्रिया में इसकी भागीदारी सबसे बड़ी शक्ति होती है जो विकास के मार्ग में सही दिशा में प्रशस्त करती है। वस्तुतः विकास की समस्याओं को राजनीतिक नारों से नहीं सुलझाया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि सरकार और पत्रकारिता जगत को अधिक से अधिक संवेदनशील होना चाहिए। तभी जाकर सामाजिक-आर्थिक विकास में गुणात्मक परिवर्तन सम्भव हो सकता है। जनता की भागीदारी और सरकार की नीतियों की पारदर्शिता की समस्या का हल भी विकास पत्रकारिता के रणनीति में शामिल करना होगा। जिसके माध्यम से हम विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं।
सरकार का यह प्रयास रहा है कि विकास-पत्रकारिता का क्षेत्र व्यापक हो। इसी लक्ष्य को सामने रखकर पंचवर्षीय योजनाओं को प्रसारित और प्रचारित करने की दिशा में सरकार ने सक्रिय रूप से कार्य करना शुरू किया। विकास कार्यों की ओर प्रेरित करने की सबसे बड़ी आवश्यकता क्षेत्रा के नवयुवकों के लिए होनी चाहिए। जिसको विकास पत्रकारिता के माध्यम से आसानी से किया जा सकता है। समाचार पत्रों के पाठक सर्वेक्षणों से यह ज्ञात हुआ है कि 21-35 आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक समाचार पत्रों केा पढ़ते हैं। महिलाएं ज्यादातर क्षेत्रीय भाषाई पत्रिकाओं को पढ़ती है। ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय भाषाई समाचार पत्रों के सम्पादकों का परम पुनीत कार्य राष्ट्रीय स्तर की विकास संबंधी लेखों को प्रकाशित करना होना चाहिए तथा विकास के कार्यो में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने हेतु आलेखों पर वक्त देना चाहिए। सर्वेक्षणों से यह भी पता चला है कि शहरी पाठकों की संख्या में तेजी से वृद्धि होती जा रही है। लेकिन सबसे दुखद पहलू यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों के पाठकों की स्थिति क्या है। इसकी सही तस्वीर अभी उभरकर सामने नहीं आयी है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है।
विकास पत्रकारिता को हमारे देश में उचित महत्व नहीं मिलने के लिए एक सीमा तक स्वयं नेता जिम्मेदार हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शुरूआती दौर में हमारे नेताओं ने विकास को महत्व दिया लेकिन बाद में नेता अपने आपको बड़े नगरों तक सीमित कर लिया। वे जनता के सेवक के बजाय जनता के मालिक की भूमिका में आ गये जिसका कुपरिणाम यह हुआ कि अधिकांश पत्रकार भी गांवों से विमुख हो गये।
आकाशवाणी ने सही अर्थो में अपनी अन्य जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए विकास पत्रकारिता की कमी को पूरा करने में अपना विशष्ट योगदान किया है। देशवासियों को स्वस्थ मनोरंजन उपलब्ध कराने तथा देश विदेश की महत्वपूर्ण जानकारियों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत विकास परियोजनाओं की विकास गति और उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाने में अग्रणी भूमिका निभायी है। आकाशवाणी के साथ-साथ दूरदर्शन की भूमिका भी सराहनीय रही है। केन्द्रीय सरकार के अन्य विभागों प्रेस, इन्फारमेशन ब्यूरो, पब्लिकेशन, डिवीजन, कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास विभाग, सांख्यिकीय व मूल्यांकन इत्यादि ने भी विकास क्षेत्र की गतिविधियों को आम जनता तक पहुंचाते रहे हैं।
पिछले दशक में दूरदर्शन का तेजी से प्रसार हुआ है फिर जितना व्यापक क्षेत्र आकाशवाणी का है उतना किसी माध्यम का नहीं है। आकाशवाणी ने व्यापक स्तर पर सामाजिक आर्थिक विकास की दिशा में योगदान किया है। लोगों को नीत नयी जानकारी देकर उन्हें विकास कार्यो की ओर आकृष्ट किया है जो निश्चय ही भारत जैसे विकासशील देश के लिए वरदान है।
आकाशवाणी ने विकास संबंधी गतिविधियों को जहां एक तरफ समाचार बुलेटिनों में महत्व दिया वहीं अलग से विकास संबंधी कार्यक्रमों को नियमित रूप से प्रसारित भी किया। जिससे इसको प्रोत्साहन भी मिलेगा। गरीबी उन्मूलन, लिंग समानता, शुद्ध पेयजल, परिवार नियेाजन आदि सामाजिक आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समाचारों को विशेष रूप से अधिक समय दिया।
आकाशवाणी का विदेशी भाषा विभाग एक प्रशंसनीय कार्य कर रहा है कि विकसित तथा विकासशील देशों में विकास के क्षेत्र में जो नयी-नयी बातें हो रही है, उसे भारतीय भाषाओं में अनुवादित कर लोगों के पास पहुंचा रही है। जिससे हमारे देश की जनता वहां के विकास कार्यो के ज्ञान से लाभान्वित होकर अपना सामाजिक आर्थिक उत्थान करने में सफल हो रहे हैं।
विकास के लिए कृषि और उद्योग ही मुख्य आधार है। आकाशवाणी ने समाचार पत्रों से कहीं अधिक ध्यान कृषि क्षेत्रों पर दिया है जहां से दिन में अनेक बार ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करायी जाती है जो पढ़े लिखे किसानों के साथ-साथ भोले-भाले किसानों के लिए भी उपयोगी सिुद्ध हो रही है। आकाशवाणी द्वारा ऐसे बुलेटिनें जारी हो रही है। जिनमें विज्ञान के नये-नये प्रयोगों की जानकारी ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को उपलब्ध करायी जाती है। कृषि के अलावा मुर्गीपालन, पशुपालन, सहकारिता, जनस्वास्थ्य बाल विकास, पोषण संबंधी जानकारी के साथ-साथ अन्न की वैज्ञानिक ढंग से पैदा करने की महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करायी जाती है जो विकास के लिए आवश्यक है।
आकाशवाणी के बाद सरकारी माध्यमों में दूरदर्शन का दूसरा स्थान आता है। दूरदर्शन ने माध्यम विकास को गति प्रदान करने के लक्ष्य से ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष बल दिया है। कृषि तथा उससे संबंधित अन्य विषयों को प्राथमिकता देकर दूरदर्शन ने विकास को गति प्रदान करने के उदेश्य से विकास संबंधी कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान दिया है। मुख्य रूप से कृषि दर्शन कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक लोकप्रिय हुआ। विकास और संचार एक दूसरे के पूरक हैं। विकास की दिशा में हमारे यहां सरकारी माध्यमों का भरपूर लाभ नहीं उठाया जा रहा है।
विकास पत्रकारिता के लिए संकेत और सत्य दोनों पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए। आम तौर पर अधिकांश समाचार सांकेतिक होते हैं। उन्हें पढ़ने से घटनाओं के बारे में संकेत मिल सकते हैं। लेकिन सत्य शब्द विशेष ध्यान देकर छिपी हुई बातों को भी प्रकाश में लाना होगा। जो संबद्ध विषय की पूरी तस्वीर पेश करे।
विकास पत्रकारिता का क्षेत्र अभी भी काफी पिछड़ा हुआ है। आई.आई.एम. के निदेशक प्रो. एन.एम. रामास्वामी का मानना है कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने में मीडिया की उल्लेखनीय योगदान नहीं है। जिम्मेदारी तथा संबंद्धता दोनों अलग-अलग शब्द हैं लेकिन दोनों एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता जब समाज से अपने आपको सम्बद्ध कर लेती है। तब ऐसी स्थिति में पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी भी पूरी कर लेती है। राष्ट्रीय लक्ष्य तक पहुंचने में पत्रकार एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। राष्ट्रीय विकास में देश के करोड़ों लागों को जोड़ने का कार्य विकास पत्रकारिता के माध्यम से आसानी से हो सकता है। मीडिया के बिना करोड़ों लोगों तक पहुंचना मुश्किल ही नहीं असंभव है। आर्थिक, सामाजिक विकास के क्षेत्रा में मीडिया का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन विकास पत्रकारिता का जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था उतना ध्यान नहीं दिया गया। इस कुपरिणाम भी हमारे सामने आया कि समाज में ऐसा वातावरण नहीं बन पाया कि विकास को उच्च प्राथमिकता मिल सके।
समाचार पत्रों में विकास संबंधी समाचारों को उतना स्थान नहीं दिया जितना विदेशी व अन्य समाचारों को दिया। जबकि भारत जैसे विकासशील देश के लिए इसकी आवश्यकता है। सामाजिक उत्थान के प्रति समाचार पत्रों की जिम्मेदारी है। लेकिन अधिकांश समाचार पत्रों का मुख्य कार्यक्षेत्र नगरों तक ही सीमित हो गया है। सम्पादक विकास पत्रकारिता से अपने आपको नहीं जोड़ पाये हैं। ग्रामीण समाज को विकास व ज्ञान की अधिक आवश्यकता है। जबकि सम्पादक इनसे काफी दूर बैठे हुए हैं और उनकी दृष्टि उन पिछड़े हुए क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पा रही है।
आर्थिक सम्पन्नता प्रायः लोगों को पतन की गर्त के तरफ ले जाती है। भारतीय समाचार पत्र भी इससे विमुख नहीं हैं, क्योंकि अधिकांश समाचार पत्रों के मालिक ‘लक्ष्मी पुत्र’ उद्योगपति हैं और वे अपने स्वार्थ सिद्धि अधिक से अधिक विज्ञापन बटोरना तथा सनसनी खबरों के माध्यम से समाचार पत्र का सरकुलेशन को बढ़ाना उनका लक्ष्य है। उनको सामाजिक जिम्मेदारी व विकास पत्रकारिता से कोई मतलब नहीं है।
विकास पत्रकारिता के लिए राष्ट्र की ओर से जो सौंपी जानी चाहिए थी व सोची समझी होनी चाहिए थी। विकास पत्रकारिता के माध्यम से देशवासियों को यह बताने का प्रयास किया गया कि भारत एक कल्याणकारी राज्य है। भारत एक प्रभुता सम्पन्न धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। भारतवासियों को न्याय, स्वतंत्रता तथा समानता का वचन दिया गया है। संविधन में कमजोर वर्ग के लोगों के कल्याण के लिए विशेष व्यवस्था की गयी है। समाज कल्याण क्षेत्र में सभी विकासशील नीतियों और दृष्टिकोणों की सम्पूर्ण मानव संसाधन के लिए तेज करने की आवश्यकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बहुसंख्य लोगों के जीविका का आधार खेती-बारी है। जबकि गांवों में खेती योग्य जमीन सीमित लोगों के पास है। अधिकांश लोग खेतिहर मजदूर हैं। लेकिन विकास-पत्रकारिता से जुड़े हुए लोग ऐसे पिछड़े व कमजोर वर्ग के लोगों पर कम कलम चलाते हैं। उनकी कलम गांव के सम्पन्न किसान या सेठ साहुकारों की तरफदारी करते नजर आते हैं। विकास पत्रकारिता ने जहां-जहां प्रवेश किया है वहां की समस्याओं पर सरकार और समाज का ध्यान गया और उनका निराकरण हेतु प्रयास भी हुए हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों का तेजी से विकास नहीं होने के पीछे केवल गरीबी ही कारण नहीं है। गरीबी के अलावे अज्ञानता विकास को अवरूद्ध करने में महती भूमिका अदा करता है। ग्रामीण क्षेत्र के लेाग गरीबी और अज्ञानता के चलते जिस चीज को पाने के हकदार हैं उसे प्राप्त नहीं कर पाये हैं। ऐसे पत्रकार और साहित्यकारों का यह दायित्व है कि वे उनके बीच जाकर उनके कष्ट और अनुभवों को प्रकाश में लाने का प्रयास करना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में अज्ञानता के कारण विकास तो दूर उनका जीवन भी बहुत कष्टमय है और लोग अपने आपको कुचक्र से नहीं बचा पाते हैं। ऐसे में विकास पत्रकारिता को इन कुचक्रों से मुक्ति का वीणा उठाना चाहिए।
(लेखक अर्थशास्त्र विभाग, श्री गुरूगोविन्द सिंह कालेज, पटना सिटी, बिहार में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)
ईमेल- bpatitripathi@gmail.com

3 टिप्‍पणियां:

  1. श्रीमान जी आपके द्वारा लिखा गया लेख उत्कृष्ट कोटि का है । मैं पत्रकारिता से परास्नातक का विद्यार्थी हूं और हमारा विशेष प्रश्नपत्र विकास पत्रकारिता है । हमें आपके लेख से काफी सीखने को मिला है । आपका कोटिश: धन्यवाद !

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  2. आपके द्वारा लिखा गया लेख बहुत ही अच्‍छा है

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