मंगलवार, 31 जनवरी 2012

टीवी मीडिया की मर्यादा


Mar 01, 11:11 pm
शिक्षा, सूचना व मनोरंजन की संकल्पना पर 1959 में स्थापित दूरदर्शन, मनोरंजन को एकमात्र ध्येय मानने वाले प्राइवेट चैनल एवं निष्पक्ष व त्वरित समाचार प्रसारण का डंका बजाने वाले न्यूज चैनल आज दर्शकों को क्या परोस रहे हैं, इसका मूल्यांकन भारतीय सामाजिक-संास्कृतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता, मीडिया की मर्यादा व आचार संहिता के पालन की कसौटी पर किया जाना चाहिए। मीडिया की स्वतंत्रता एवं स्वायत्ताता के नाम पर टीवी अपने सामाजिक उत्तारदायित्वों को भूलकर पारिवारिक द्वेष, षड्यंत्र, बदले की भावना के ताने-बाने पर बुने गए कभी न खत्म होने वाले धारावाहिक, रहस्य-रोमांच, आत्मा का प्रतिशोध, यौन स्वच्छंदता, उन्मुक्त व्यवहार आदि दिखाकर भारतीयता की मूल भावना पर कुठाराघात कर रहा है। इससे हमारी पीढ़ी, विशेषकर युवा पीढ़ी की भाषा, वेशभूषा, खान-पान, आचार-व्यवहार, सोच-विचार और आदर्श विकृत हो रहे हैं। समाज में एक प्रकार की मूल्यहीनता घर करती जा रही है। शुरुआती दौर में आए कुछ पारिवारिक धारावाहिक हमारे जनजीवन का यथार्थ चित्रण करने के कारण लोकप्रिय हुए थे। इसके बाद 'महाभारत' और 'रामायण' ने लोगों को अपनी संस्कृति से परिचित कराने के साथ-साथ उनका स्तरीय स्वस्थ मनोरंजन भी किया, किंतु नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण व वैश्वीकरण की बयार में कारपोरेट एवं मीडिया के गठबंधन से जन्मे प्राइवेट टीवी चैनलों ने उपभोक्तावादी संस्कृति को प्रश्रय देने के लिए टीवी को इस्तेमाल किया। इनका भारतीय मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं था। इस नवधनाढ्य वर्ग ने 'वह दिखाओ जो लुभाए', 'वह दिखाओ जो बिके' की बाजारवादी प्रवृत्तिका पोषण किया। यह घातक प्रवृत्तिउत्तारोत्तार बढ़ती गई। मीडिया पर सरकारी अंकुश की कमी, चैनलों की गलाकाट प्रतियोगिता ने कुछ भी दिखाया जा सकता है की प्रवृत्तिको बढ़ावा दिया। आक्रामक मार्केटिंग रणनीति के तहत तेजी से चैनलों की टीआरपी बढ़ाने के लिए समस्त व्यापारिक हथकंडे अपनाने की होड़ ने कार्यक्रमों की गुणवत्ता को प्रभावित किया है।
भारतीय सामाजिक पर्यावरण के संरक्षण एवं संवर्धन, आदर्श व्यवहार व चरित्र वाले कथानकों का समावेश, स्वस्थ मनोरंजन प्रधान कार्यक्रमों को प्रोत्साहन, वैज्ञानिक सोच का प्रतिपादन, टोने-टोटके का विरोध, खल पात्रों के महिमामंडन पर रोक, कुरीतियों व कुप्रथाओं के प्रदर्शन पर अंकुश, आचार संहिता एवं मर्यादा के पालन के मानदंडों पर टीवी के वर्तमान स्वरूप का 'सोशल आडिट' किया जाना चाहिए। टीवी को समाज के प्रति और जवाबदेह बनाने के लिए 'सोशल आडिट' के अन्य सकारात्मक बिंदुओं पर विचार करना प्रासंगिक होगा। इनमें धारावाहिक प्रसारण के लिए एपीसोड की अधिकतम संख्या निर्धारित करना, प्रत्येक तीस मिनट की प्रसारण अवधि में विज्ञापन की अधिकतम सीमा निर्धारण करना, 24 घंटे प्रसारण अवधि के स्थान पर 17 घंटे प्रसारण अवधि करना आदि शामिल हैं।
आज बहुत से न्यूज चैनल मीडिया की आचार संहिता व मर्यादा का खुला उल्लंघन करते नजर आ रहे हैं। 'स्टिंग आपरेशन' द्वारा जहां सत्य उद्घाटित करना लोकतंत्रात्मक गणराज्य में स्वच्छ प्रशासन के लिए आवश्यक एवं प्रशंसनीय कार्य है वहीं अन्य प्रतिद्वंद्वी चैनलों की देखा-देखी टीआरपी बढ़ाने के उद्देश्य से किसी विषय पर सनसनी फैलाना निंदनीय है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने हाल ही में समाज से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए 'स्टिंग आपरेशन' की उपयोगिता पर बल दिया है। आजकल चैनलों पर हिंसा, अपहरण, लूटमार, दुष्कर्म आदि जघन्य घटनाओं को लीड स्टोरी बनाकर दिन में कई बार और कई दिनों तक दिखाकर अपराधियों को अप्रत्यक्ष रूप से महिमामंडित किया जा रहा है। मनोरंजन के नाम पर समाचार चैनल फूहड़ कामेडी शो और फिल्मी गपशप दर्शकों के समक्ष परोस रहे हैं। प्रसारण अवधि के निर्धारण से समाचारों की गंभीरता बढ़ेगी, समाचार पुनरावृत्तिमें कमी आएगी एवं समाचार में 'फिलर' डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
भारतीय मीडिया उद्योग आज 51 हजार करोड़ रुपये पर पहुंच चुका है, जिसमें टीवी की हिस्सेदारी 22 हजार करोड़ रुपये है। अनुमान है कि 2012 तक मीडिया उद्योग 1 लाख, 57 हजार करोड़ रुपये का हो जाएगा, जिसमें टीवी का हिस्सा 60 हजार करोड़ रुपये का होगा। उद्योग की प्रगति के रूप में निश्चित रूप से यह स्वस्थ संकेत है, किंतु खतरा यह है कि इससे मीडिया कुबेर सामाजिक सरोकारों के करीब आने के बजाए इनसे और दूर हो जाएंगे। बेहतर हो कि प्रजातंत्र का चौथा खंभा स्वयं के प्रति उत्तारदायी होकर मीडिया की आचार संहिता एवं मर्यादा का स्वेच्छा से पालन करना शुरू करे।
[चंचल भट्टाचार्य: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

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