शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

संचार माध्यम और हिन्दी भाषा



संदीप कुमार श्रीवास्तव / संचार की सदियों से अनवरत यात्रा, आज ऐसे शिखर पर है, जहां उसने न केवल मानव जाति को अपनी भावनाओं को उद्भाषित करने की शक्ति प्रदान की, अपितु उसे नित-नवीन संचार साधनों से समृ़द्ध भी किया। ध्वनि ज्ञान से सफल संचार संप्रेषण के पश्चात जब मनुष्य का लिपि ज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा , तो पत्रकारिता का जन्म हुआ। आज यही पत्र विश्व में सर्वाधिक प्रभावशाली संप्रेषण के माध्यम बन चुके हैं।
नव संचार माध्यमों ने संचार की दुनिया में एक क्रांति उपस्थित कर दी है। नई प्रौद्योगिकी के साथ भाषा में भी बदलाव दिखायी दे रहा है। विशेष रुप से हिन्दी भाषा का स्वरुप बदला है। हिन्दी भाषा के क्षेत्र में विस्तार हुआ है वर्तमान युग में जो भाषा प्रौद्योगिकी के साथ नहीं चलेगी उसका विकास भी नहीं होगा। परिणामस्वरुप वह भाषा तो पिछड़ेगी ही उसका समाज भी पिछड़ जायेगा। ऐसे समय में हिन्दी भाषा की भावी रणनीति क्या होनी चाहिए? कुछ विद्वानों का विचार है कि अंग्रेजी में डिस्पैच और रिपोर्ट जैसे शब्द भाषा में किरकिरी पैदा करते हैं। कुछ विद्वानों का सुझाव है कि उर्दू के हर शब्द पर प्रतिबंध लगना चाहिए और हर नुक्ते को हिन्दी से हटा देना चाहिए। कुछ लोगों का मानना है कि एक दशक पहले के जनसंचार माध्यमों की हिन्दी कठिन और दुरुह थी। वहीं जब हिन्दी भाषा को सरल-सहज करने का प्रयास किया गया तो सुनने को मिला कि हमारी हिन्दी दूसरी भाषाओं की गोद में जा बैठी है पर शायद समस्या सिर्फ हिन्दी भाषा के प्रयोग की नहीं उसकी पहुंच की भी है।
हिन्दी भाषा का जो स्वरुप आज हमारे सामने है उसके निर्माण में तकरीबन एक हजार साल लगे हैं। और हम दावे के साथ यह कहने की स्थिति में अब भी नहीं है कि यह स्वरुप आखिरी है या कि स्थिर है या इसमें परिवर्तन की गुंजाइश एकदम खत्म हो चुकी है। यों तो हिन्दी के कुछ रुप पालि में ही मिलने लगते हैं लेकिन भाषा वैज्ञानिक हिन्दी भाषा की वास्तविक शुरुआत एक हजार इस्वी से मानते हैं। अपने प्रारम्भिक काल में थोड़े बहुत अंतरों के साथ हिन्दी अपभ्रंश के बहुत करीब थी और उसमें उन्हीं स्वरों और व्यंजनों का प्रयोग होता था जो अपभ्रंश में प्रयुक्त होते थें। शब्द समूह भी प्रायः अप्रभंश के ही थे। लेकिन भक्ति आन्दोलन को प्रारम्भ के साथ तत्सम शब्दों का वृद्धि हुई और मुसलमानों के आगमन के साथ पश्तों , फारसी तथा तुर्की भाषाओं से कुछ शब्द हिन्दी में आये। 1500 ई0 के बाद हिन्दी ने अपभ्रंश से पल्ला झाड़ लिया और व्याकरण के क्षेत्र में अपने पैरों पर खड़ी हो गयी। वाक्य-रचना फारसी से प्रभावित होने लगी और फारसी , पश्तों , तुर्की तथा अरबी भाषाओं से करीब 6 हजार शब्द हिन्दी में आये।
हिन्दी के विकास का यह मध्यकाल था जिसे पार करने के बाद यह भाषा तेजी से अंग्रेजी के प्रभाव में आई। न केवल ध्वनिया तथा विराम चिन्हों पर अंग्रेजी का असर पड़ा वरन् वाक्य-रचना , मुहावरे तथा लोकोक्तियों भी प्रभावित हुई। आधुनिक काल में हिन्दी भाषा के विकास पर यदि हम गौर करें तो पायेंगे कि सन् 1850 के बाद हिन्दी के शब्द-समूह तेजी से बदले हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम पाॅच दशकों में अंगे्रजी के शब्द तो जेती से आये ही , कुछ पुराने तद्भव शब्द निकल भी गये। सन् 1900 के बाद द्विवेदी युग तथा छायावादी युग में तत्सम शब्दों का प्रयोग बढ़ा जबकि प्रगतिवादी आंदोलन में तद्भव शब्दों का। वर्तमान समय में बोल-चाल के तथा लोक-प्रचलित शब्दों के प्रयोग के प्रति रुझान बढ़ रहा है।
किसी भी भाषा की जीवंतता की सबसे बड़ी शर्त है उसकी परिवर्तनशीलता। लगातार स्वरुप परिवर्तन के बावजूद अपनी आत्मा को सुरक्षित रखने का सामथ्र्य हिन्दी में है। हिन्दी ने दूसरी भाषाओं के शब्द लिये , आदिकाल से चलते आ रहे शब्दों के स्वरुप बदले और अपनी बोलियों , उप बोलियों से अपने भण्डार भरे। आजादी के समय की हिन्दी अंग्रेजी से प्रभावित थी। हिन्दी को 1953 में राजभाषा के रुप में स्वीकार किया गया। 1984 से 1992 तक दूरदर्शन एवं 1992 से 1995 तक केबिल टीवी के कारण संक्रमण काल रहा। 1992 के बाद आने वाले हिन्दी के विभिन्न निजी चैनलों ने अपने को द्रुतगामी बनाने के लिए प्रतियोगिता को गलाकाट प्रतिस्पर्धा बना दिया।
परिणामस्वरुप हिन्दी पुनः भौतिकवादी से प्रभावित हुई। वैश्वीकरण की दौड़ में सूचना क्रांति ने ऊॅची छलांग लगाकर पूरे विश्व को एक गांव बना दिया है। बाजारीकरण ने इसमें विकास के नाम पर धन लेकर सिर्फ तकनीकी विकास ही नहीं किया अपितु भाषा संस्कृति का भी विकास कर वैश्विक स्तर पर एक नवीन भाषा को जन्म दिया। निजी चैनल पर विदेशी पूंजी के अधिग्रहण करने से संस्कृति एवं भाषा भी अधिग्रहीत हो गयी। परिणामस्वरुप आज जो भाषा विभिन्न चैनलों के माध्यम से देखने-सुनने को मिल रही है , उसे किसी एक भाषा का नाम देना उचित नही होगा। साथ ही साथ विदेशी पूंजी भूमण्डलीकरण ने प्रिंट मीडिया को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
परिणामस्वरुप हिन्दी के समाचार पत्रों ने भी नये आयाम प्रस्तुत करने की ओढ़ लिया है। और हिन्दी भाषा के समाचार पत्रों की हिन्दी भी प्रभावित हो गयी है। साथ ही इलेक्ट्रानिक मीडिया ने पिछले एक दशक में नव आयाम के नाम पर भाषा- अपसंस्कृति का जो स्वरुप जनमानस के समक्ष रखा है , वह आवश्यकता है हिन्दी के ऐसे मानक स्वरुप की जिसका प्रयोग आम जन मानस आसानी से कर सके। यह बात सच है कि दूसरी भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करने से भाषा समृद्ध होती है परन्तु उन शब्दों को लेते समय इस बात का ध्यान रखना होगा कि हिन्दी भाषा की गरिमा बनी रहे।( ये लेखक के अपने विचार हैं )
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संदीप कुमार श्रीवास्तव
स्वतंत्र पत्रकार एवं अतिथि प्रवक्ता
स्कूल ऑफ़ फिल्म & मास कम्यूनिकेशन
शिआट्स , इलाहाबाद – यू . पी.
Contact No. +919454212538
Email- sandeepkumarsri@gmail.com

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