बुधवार, 25 जनवरी 2012

सरकार बनाम मीडिया लंबा संघर्ष/

जन अधिकार

clip
समय-समय पर मीडिया पर अंकुश लगाने की बात होती है तथा सरकारी तंत्र मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर भयभीत नजर आता है। सरकार तथा मीडिया के बीच अधिकारों को लेकर एक रस्सा कस्सी का दौर चलता रहता है। भारत में सरकारी तंत्र तथा मीडिया के बीच ख़बरों की सीमा तथा ख़बरियों के अधिकारों को लेकर खींचतान का इतिहास काफी पुराना रहा है। कम्युनिस्ट या फासीवाद वाले तंत्र में मीडिया की जगह जूते के बराबर रही है, क्योंकि वहां सरकारी तंत्र अपने ख़िलाफ़ एक भी वाक्य सुनना पसंद नहीं करता। यही हाल अरब देशों का है जहां सल्तनत के खिलाफ़ बोलने की सज़ा  फांसी तक हो सकती है।
भारत में मीडिया कानून का इतिहास अंग्रेजी हुकूमत के ज़माने से ही शुरु होता है। सन 1795 में तत्कालीन वायसराय लार्ड वेलेस्ले ने प्रेस रेग्यूलेशन की उद्घोषणा की थी, जिसके तहत किसी भी नए समाचार पत्र को सरकारी नियमों को सख्ती से पालन करने की हिदायत दी गई थी। उसके बाद सन 1855 में दूसरा प्रेस कानून पास हुआ, जिसके तहत समाचार पत्र पर लगाए जाने वाले पाबंदियों की फेहरिस्त थोड़ी और लंबी कर दी गई। उसके बाद आया 18 जून 1857 का एक्ट जिसके तहत हर नए समाचार पत्र निकालने वाले को सरकार से लाइसेंस प्राप्त करने का प्रावधान जोड़ दिया गया। इस अधिनियम ने सरकार को मीडिया प्रकाशन से लेकर प्रबंधन तक में हस्तक्षेप करने की छूट दे दी। अर्थात सेंसरशिप से लेकर प्रकाशन को स्थगित तथा बंद करने का भी अधिकार दे दिया।
उसके बाद आया ‘प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट’ (पीआरबी एक्ट)। सन 1867 में अस्तित्व में आया ये एक्ट आज भी हमारे मीडिया कानून के साथ जुड़ा हुआ है। इसी कानून के तहत सरकार ने हर  पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशक को लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया। साथ ही सरकार को किसी भी प्रकाशन के बंद करने, उस पर पाबंदी लगाने से लेकर समाचार के चयन तक का अधिकार दे दिया। इस प्रकार प्रकाशकों तथा समाचार पत्र के मालिकों ने काफी विरोध जताया।
सन 1878 में वाइसराय लार्ड ल्यूटन ने ‘वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट’ की घोषणा की जिसके तहत किसी भी समाचार पत्र में छपे राजद्रोही समाचार के खिलाफ़ सरकार को मीडिया के विरुद्ध सख्ती से कार्रवाई करने का अधिकार दे दिया गया। फिर आया लार्ड मिंटो द्वारा प्रतिपादित न्यूज़पेपर एक्ट 1901। इस एक्ट के द्वारा स्थानीय प्रशासन को किसी भी संपादक के खिलाफ़ कार्रवाई करने की छूट थी। अगर उसके द्वारा छपे समाचार या संपादकीय से ब्रिटिश राज के ख़िलाफ बगावत की बू आ रही हो।
स्वाधीनता के बाद 26 जनवरी 1950 को प्रतिपादित ‘मीडिया रिवोल्यूशन एक्ट’ अब तक का सबसे अहम प्रेस कानून है। फिर आए 1980 और 90 के दशक जिसने सूचना प्रौद्योगिकी के नए क्षितिज और आविष्कारों के ज़रिए ख़बरों की परिधि और परिभाषा ही नहीं बदली, बल्कि उसे एक विश्वव्यापी क्रांति की तरह नई दशा और दिशा भी दे दी। बीबीसी और सीएनएन जैसे न्यूज़ चैनलों द्वारा ईरान-इराक युद्ध के सीधे प्रसारण से लेकर अब तक मीडिया की पहुंच और ख़बरों की तेज़ी में बढ़ोतरी हुई, वो अपने आप में बेमिसाल है। आज भारत में 56 से ज़्यादा 24 घंटे के ख़बरिया चैनल हैं, जिसकी बदोलत छोटी से छोटी ख़बर भी पल भर में पूरे देश में फैल जाती है।
भारत में सन 1992 में सुभाष चंद्रा के चैनल ज़ी टीवी ने दूरदर्शन का वर्चस्व और एकाधिकार तोड़ा और उसके बाद सोनी, एशिया नेट और सन टीवी जैसे निजी चैनलों का प्रादुर्भाव हुआ। तबसे लेकर अब तक के सफ़र में ख़बरिया चैनलों की तादाद में इज़ाफा हुआ है। उनमें दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों की संख्या तो बढ़ी ही है साथ ही मौलिकता और परिपक्वता के अभाव में कई सारी ख़ामियां भी शामिल हो गई हैं। पिछले पांच बरसों में कई ख़बरिया चैनलों द्वारा दिखाई जाने वाली ख़बरों के चयन से संपादन और प्रबंधन की दृष्टि से भी ये लगने लगा कि कहीं न कहीं और कभी-कभार मीडिया पर नियंत्रण की आवश्यकता है।
इसमें को दो राय नहीं कि भारत में मीडिया कानून में कई किस्म के संशोधनों की आवश्यकता है और ये भी उतना ही बड़ा काम है जितना कई बेलगाम ख़बरिया चैनलों को उनकी अपनी सही ज़िम्मेदारियों का एहसास कराना। आज मीडिया को अपनी जिम्मेदारियों का फिर से एहसास करने की आवश्यकता है। उसे समझना होगा की सामाजिक सरोकारों की बात तथा हाशिए पर रह रहे लोगो की तरफ ध्यान दिए बिना वह अपनी विश्वसनीयता साबित नहीं कर सकता। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें