रविवार, 22 जनवरी 2012

ग्रामीण पत्रकार गाथा


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जागो ! ग्रामीण पत्रकारों

पोस्टेड ओन: 2 Nov, 2011 जनरल डब्बा में
जागो ! ग्रामीण पत्रकारों
दोस्तों ! ग्रामीण पत्रकारिता उसी तरह उपेक्षित है, जिस तरह शहर के आगे गाँव उपेक्षित है | सरकार की सुविधाएँ ग्रामीणों तक नहीं पहुंचतीं और अख़बार की सुविधाएँ ग्रामीण पत्रकारों तक नहीं पहुँचती | अगर पहुंची भी तो गाँव के मुखिया प्रधान के पास, पत्रकारों में उसके मुखिया बयूरोचीफ़ तक | आखिर लम्बे समय से यही खेल चल रहा है | विचार करने का विषय है कि आखिर यह तिलिस्म कब तक कायम रहेगा ?
साथियों ! अपने अधिकार की लड़ाई आखिर कब लड़ोगे ? बस या तो आप अख़बार की कार्यशैली से संतुष्ट हैं या फिर इस मिशन में कोई दिलचस्पी नहीं | फ़िलहाल मैं तो एक सिरफिरा ‘ग्रामीण पत्रकार’ हूँ जो ग्रामीण पत्रकारिता के बारे में ही सोचा करता हूँ | अरे मेरे प्यारे दोस्त ! मेरे पूज्य पिताजी ने खेती ना बनाई होती तो यह मेरे विचार ताख पर रखे रह जाते और जिस आदर्श को बघार रहा हूँ | उससे कोसों दूर होते | देखता हूँ कि आज समाचार के संकलन से लेकर प्रेषण तक का खर्च ‘ग्रामीण पत्रकारों’ को झेलना पड़ता है | अख़बारों के दप्तर में जाते हैं तो वहाँ के वरिष्ठ पत्रकार बड़ी ही हीन भावना से मुंह बिजलाकर ‘ग्रामीण पत्रकार’ से बात करते हैं | ब्यूरो चीफ तो इस कदर पेश आते हैं जैसे इन्ही के सहारे ‘ग्रामीण पत्रकार’ अपनी जिन्दगी काट रहा है | नजदीकी से देखा परखा और आपबीती से जुडी कुछ घटनाओं से प्रेरणा ली | सब का निचोड़ यही निकला कि ‘ग्रामीण पत्रकार’ उपेक्षित है | आज बस इतना लिखकर —————-हम यह जानना चाहते हैं कि हम जैसे पत्रकारों के विचारों से कितने लोग सहमत हैं ————-आपके मन में है कोई विचार तो हमारे हौंसलों को पस्त करने या फिर और बुलंद करने के लिए सम्पर्क करें सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’  email- graminptrkar@gmail.com
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santosh Kumar के द्वारा
November 2, 2011
आदरणीय सुधीर जी ,.नमस्कार
आपने अपनी व्यथा बहुत अच्छे से रखी है ,…मैं पत्रकार तो नहीं हूँ ,.लेकिन आपका दर्द महसूस कर सकता हूँ ,..दरअसल अब गाँव ही उपेक्षित हो गए हैं ,..सब शहरीकरण हो गया है ,..यह स्थिति हिन्दुस्तान के लिए बहुत नुकसानदेह लगती है ,….ग्रामीण पत्रकारों को पूरा सम्मान ,उचित मानदेय मिलाना ही चाहिए ,..मैं आपका समर्थन करता हूँ ,..साभार
November 3, 2011
आदरणीय संतोष जी सादर यथोचित अभिवादन | आप भी बड़े भाई छोटों की हरकतों को ऐसा सहेजते हैं जैसे कि एक माँ-बाप अपनी संतान की हरकत से हर्षित हो जाया करता है | अपने अस्तित्व और गरिमा का ध्यान नहीं रखता | शायद आपने बड़प्पन की भूमिका निभाते हुए अपने इस छोटे भाई की होंसला अफजाई में कसर नहीं छोड़ी | मुझ जैसे के लिए अमूल्य शब्दों को लिख उनकी गरिमा भले ही गिरी हो लेकिन होंसला बुलंद हुआ | आपका आभारी हूँ |
Santosh Kumar के द्वारा
November 3, 2011
आदरणीय सुधीर जी ,.सादर नमस्कार
मैं किसी भी कोण से आपसे बड़ा नहीं हूँ ,..आपका छोटा भाई ही हूँ ,.ग्रामीण परिवेश से हूँ ,..आपके हौसले को सलाम करता हूँ ,..जब मेरी कोई गरिमा ही नहीं तो कैसी परवाह भाई !…यथासंभव आपकी आवाज में अपनी आवाज मिलाता ही रहूँगा ,…आपकी कविता बहुत अच्छी लगी …आपके भाव स्पष्ट हुए ,…मंच पर आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ ,…साभार
November 3, 2011
आदरणीय संतोष जी यथोचित अभिवादन | हम तो बस इतना जानते हैं | जो छोटों की दशा और दिशा को संवारने के लिए उन पर अपना वरद हस्त रखकर उनको ऊंचा उठाने के लिए तरह तरह से प्रयास करते हैं | वह संस्कारवान आप जैसे लोग प्रेरणा के अनन्य श्रोत हैं | पूरे समाज को ऐसे लोगों से सीख लेनी चाहिए | अब तो स्वार्थवाद है छोटों की रचनाओं में बड़े लोगों को कोई रूचि नहीं होती | रूचि भी हुई तो कमेन्ट लिखने से क्रेज गिरता है | इसलिए हम जैसों के विचार और रचनाओं पर सिर्फ सन्नाटा………| कोई ही साहस कर अपना कमेन्ट दर्ज करता है | ऐसे साहसी लोगों का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ | भय इस बात का है कि छोटों के चक्कर में ………

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