शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

मीडिया को पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले


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मुकुल श्रीवास्तव, एसोसिएट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
सीबीएसई ने अपने पाठ्यक्रम में 11 वीं और 12 वीं के छात्रों के लिए मीडिया का पाठ पढ़ाने की बात कही है। पाठ्यक्रम अगले सत्र से शुरू हो जाएगा। वैसे इसे पढ़ाया तो आम पाठ्यक्रम की तरह ही जायेगा पर जरा गौर करने पर इसके बड़े निहितार्थ निकलते हैं। भारत में मीडिया शिक्षण का विकास ऊपर से नीचे की ओर हुआ है। यानी यह पाठ्यक्रम विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों से होते हुए स्कूल तक पहुंचा है। इसके पीछे समय की मांग ही है और शायद शिक्षा को बाजारोन्मुखी बनाने का दबाव भी ।
फिलहाल मीडिया पाठ्यक्रम भारत के लगभग हर विश्वविधालय में चलाए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त सैंकड़ों की तादाद में निजी संस्थान भी देश के भावी पत्रकारों की पौध को तैयार करने में लगे हैं। वह भी उस दौर में जब यह कहा जाता है कि जन माध्यमों ने अपनी विश्वसनीयता खोयी है। हालांकि प्रशिक्षित पत्रकारों की यह फौज और जनसंचार माध्यमों की विश्वसनीयता खोयी है। हालांकि प्रशिक्षित पत्रकारों की यह फौज और जनसंचार माध्यमों की विश्वसनीयता का संकट ये दो अलग लग विषय हो सकते हैं, लेकिन ये ऐसी दो घटनाएं तो हैं ही जो एक ही समय में घट रही हैं। विभिन्न संस्थानों से डिग्री धारी पत्रकार तो निकल रहे हैं पर जब वे नौकरी की तलाश में मीडिया संस्थानों में पहुंचते है तो अपने आपको एक अलग ही दुनिया में पाते हैं, जहां उस ज्ञान का कोई महत्व नहीं है जो उन्होंने अपने संस्थानों में सीखा है। सीबीएसई द्वारा शुरू किये गए इस पाठ्यक्रम के बहाने ही सही पर अब वक्त आ चुका है कि हम अपनी मीडिया शिक्षा प्रणाली पर एक बार फिर गौर करें।
स्कूल स्तार पर मीडिया शिक्षण की शुरुआत के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि इस से संचार कौशल और जनमाध्यमों के प्रति छात्रों की समझ बढ़ेगी। इसमें कोई शक नहीं कि मीडिया शिक्षण का फैलाव होने से मीडिया के प्रति फैले हुए दुराग्रहों को दूर करने में मदद मिलेगी। फिर हमारी शिक्षा प्रणाली में संचार कौशल सिखाने के लिए कहीं कोई जगह ही नहीं थी। यह प्रयास शायद इस खालीपन को भर पाने में सहायक होगा। पत्रकारिता, फिल्म, रेडियो, मल्टीमीडिया, विज्ञापन और जनसंपर्क जैसे विषयों के रूप में उन्हें नए क्षेत्रों का ज्ञान होने से वे अपने भविष्य की रूप रेखा बेहतर तरीके से बना पायेंगे। वे मीडिय की ओर किसी ग्लैमर या रोजगार के महज क साधन के तौर पर नहीं, बल्कि अपने रचनात्मक रुझान के हिसाब से आकर्षित होंगे। पर सिद्धांत और व्यवहार में अक्सर अंतर आ जाता है। स्नातक और स्नाकोत्तर स्तर पर मीडिया शिक्षा योग्य शिक्षकों के अभाव के लिए जूझ रही है। विश्वविधालय अनुदान आयोग मीडिया शिक्षा को अन्य पारंपरिक पाठ्यक्रमों की तरह ही देखता है। कोई भी छात्र जब मीडिया विषय का चुनाव करता है तो उसके दिमाग में एक मात्र लक्ष्य पत्रकारिता या इससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में रोजगार पाना होता है पर विश्वविधालय अनुदान आयोग की गाईड लाइन मीडिया शिक्षकों से ये अपेक्षा करती है कि वे शोधपत्र  लिखेंगे तथा मीडिया शोध को बढ़ावा देंगे। जैसा कि अन्य विषयों में होता है। अधिकारिक तौर पर किसी भी विश्वविद्यालय में मीडिया शिक्षक बनने की योग्यता का आधार यूजीसी की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा है। इस परीक्षा में चयन का आधार किताबी ज्ञान और विश्लेषण शक्ति होती है इस स्थिती में ज्यादातर शिक्षक व्यावहारिक ज्ञान में दक्ष नहीं होते। उनकी शिक्षा में सिद्धांत और प्रयोग का सही मिश्रण नहीं होता और इसीलिए हमारे मीडिया संस्थान मीडिया बाजार की मांग के अनुरूप प्रोफेशनल तैयार नहीं कर पा रहे हैं।
भारत के भावी पत्रकारों की पौध तैयार करने वाले संस्थानों केज्यादातर शिक्षक मीडिया को अपना सक्रिय योगदान नहीं दे पाते। सिद्धांत और व्यवहार का यह अंतर छात्रों की गुणवता पर असर डालता है। मीडिया अपने आप में एक व्यापक शब्द और विषय है। इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों से सिर्फ तकनीकि ज्ञान की अपेक्षा नहीं की जाती। उनसे यह उम्मीद भी की जाती है कि उनमें देश दुनिया की बेहतर समझ भी हो, जिसके लिए अन्य विषयों का ज्ञान भी आवश्यक है। समाज, राजनीति, अर्थशास्त्र, संस्कृति को समझे बगैर कोई भी अच्छा जनसंचारक नहीं हो सकता। यह आवश्यक है कि पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में बौद्धिक विषयों और अन्य सामयिक मुद्दों को ज्यादा जगह दी जानी चाहिए। भारत में मीडिया शिक्षण अभी भी दोराहे पर है जिससे शोध और व्यवसायिकता का संतुलन नहीं कायम हो पाया है दूसरी ओर लगातार बदलती तकनीक ने इस विषय में बदलाव की गती को बहुत तेज कर दिया है। स्कूल स्तर पर इस पाठ्यक्रम की शुरुआत बस एक अच्छा संकेत भर है। (हिंदुस्तान दैनिक से साभार)
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  • 17/01/2012
    प्रमोद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

    इस बार पेड न्यूज़ पर भी आयोग की नज़र है। पर आयोग इसे प्रत्याशी के खर्च का मामला मानता है। उसके आगे उसकी दिलचस्पी नहीं। एक पत्रकार और पाठक के लिए यह साख को बेचने का मामला है। इसलिए पेड न्यूज की तमाम उन शक्लों पर भी विचार करने की ज़रूरत है जो चुनाव की परिधि से बाहर हैं।
  • 02/01/2012
    अरविन्द विद्रोही, वरिष्ठ पत्रकार  
    वर्ष २०११ के विदाई और वर्ष २०१२ के आगमन की बेला में सप्ताह भर चले रात के उत्सवो ने जहां लाखो नागरिको को आनंदित कर के ऐश्वर्य के रसा स्वादन का अवसर दिया वही दूसरी तरफ करोडो-करोड़ आम जन ,मेहनत कश तबका पूंजी वाद के, ऐश्वर्य व भोग विलास के इस अदभुत नज़ारे को देख कर ,सुनकर हतप्रभ से है |
  • 21/12/2011
    उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
    1999  की तीखी गर्मियों के बीच देश के तमाम नेता आमचुनाव के प्रचार में धूल फांक रहे थे...तब दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में कपिल सिब्बल ने अपनी पार्टी का पक्ष रखने और तत्कालीन वाजपेयी सरकार की बखिया उधेड़ने की कमान संभाल रखी थी। इन्हीं दिनों बतौर रिपोर्टर उनसे मिलने का मौका मिला
  • 19/12/2011
    शेष नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार  
    हिन्दी के नामी कवि और संगीत मर्मज्ञ कुलदीप कुमार को इस साल का मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड दिया जाएगा. २१ दिसंबर को मुंबई के एन सी पी ए सभागार में रोल आफ मीडिया इन द प्रमोशन ऑफ़ म्यूजिक इन इण्डिया नाम का  सेमिनार आयोजित किया गया है . इसी अवसर पर इस पुरस्कार को देने का  कार्यक्रम है
  • 12/12/2011
    एनके सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
    पिछले जनवरी से जून महीने तक भारत ने गूगल से 358 विषय-सामग्रियां हटाने की “अपील” की। इनमें से 255 यानि 75 प्रतिशत ऐसी सामग्री थी जिनमें सरकार की आलोचना की गयी थी। भारत के अलावा दुनिया में सिर्फ तीन अन्य देश हैं जिन्होंने इस तरह की अपील गूगल से की थी। जरा सोचें प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भी अगर कोई सरकार अपनी आलोचना के प्रति इतनी असहनशील हो तो उस प्रजातंत्र की गुणवत्ता कैसी होगी

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