रविवार, 22 जनवरी 2012

ग्रामीण पत्रकारिता को भूल गई है भारतीय मीडिया - हरिवंश





harivansh
समाचार4मीडिया.कॉम
देश की बहुसंख्यक आम जनता को खुशहाल और शक्तिसंपन्न बनाने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, लेकिन दुख की बात यह है जब भी हम किसी न्यूज चैनल और अखबारों को देखते हैं तो काफी आश्चर्य होता है। ऐसा लगता है कि पत्रकारिता अभी तक मुख्य रूप से महानगरों और सत्ता के गलियारों में घूमता नजर आ रहा है। खासकर राजनेताओं के दौरों की कवरेज को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों को प्रमुखता मिल पाती है नहीं तो किसी बड़ी आपदा या व्यापक हिंसा के कारण मीडिया जगत को ग्रामीण क्षेत्रों की याद आती है। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार किसानों की बढ़ती आत्महत्या, गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मीडिया कवर नहीं मिल पाने से ग्रामीण लोग पत्रकारिता का लाभ नहीं उठा पाते है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली और केबल व्यवस्था नहीं होने के कारण लोगों के पास संचार का एक मात्र माध्यम रेडियो रह गया है। समाचार4मीडिया के संवाददाता कन्हैया कुमार ने कुछ मीडिया दिग्गजों से इस बारे में उनकी राय जानने की कोशिश की।
हरिवंश, मुख्य संपादक, प्रभात खबर
आज पत्रकारिता का मूल मकसद है, मुनाफा कमाना। मुनाफा शहरी लोगों के बीच से होकर जाता है, आज पत्रकारिता कॉरपोरेट और शहरी लोगों का बनकर रह गया है। भारतीय पत्रकारिता में किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं के लिए कोई जगह नहीं रह गया है। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार किसानों की बढ़ती आत्महत्या, गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मीडिया कवर नहीं मिल पाने से ग्रामीण लोग पत्रकारिता का लाभ नहीं उठा पाते है। टी.वी. चैनलों और बड़े अख़बारों की सीमा यह है कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में अपने संवाददाताओं को स्थायी रूप से तैनात नहीं कर पाते है। कुल मिलाकर, ग्रामीण पत्रकारिता की जो भी झलक विभिन्न समाचार माध्यमों में आज मिल पाती है, उसका श्रेय अधिकांशत: जिला मुख्यालयों में रहकर अंशकालिक रूप से काम करने वाले अप्रशिक्षित पत्रकारों को जाता है। आखिर देश की 80 प्रतिशत जनता जिनके बलबूते पर हमारे यहाँ सरकारें बनती हैं, जिनके नाम पर सारी राजनीति की जाती हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक योगदान करते हैं, उन्हें पत्रकारिता की मुख्य धारा में लाया ही जाना चाहिए। मीडिया को नेताओं, अभिनेताओं और बड़े खिलाड़ियों के पीछे भागने की बजाय उसे आम जनता की तरफ रुख़ करना चाहिए, जो गाँवों में रहती है, जिनके दम पर यह देश और उसकी सारी व्यवस्था चलती है।
आजादी के बाद जो ह्रास राजनीति का हुआ, वहीं पत्रकारिता का भी हुआ है। हम गाँव से आये लेकिन गाँव को भूलते चले गये। लेकिन जिस प्रकार 'ग्रामीण पत्रकारिता’ को उभर कर आना चाहिये, नहीं आया है। गाँव की समस्याओं को सुलझाने में क्या मिलने वाला  है। शहर में शान है, शोहरत है, पैसे हैं। लेकिन गाँव में खबरें हैं। यह बहुत दुखद घटना है।
चंदन मित्रा, प्रबंध निदेशक, द पायनियर
 अंग्रेजी अखबारों की बात करें तो उनको पढ़ने वालों की संख्या बड़े शहरों में ही है न कि ग्रामीण क्षेत्रों में। हिन्दी अखबारों की बात करें तो धीरे-धीरे उनका रूझान ग्रामीण पत्रकारिता की ओर हो रहा है। इस बाबत उन्होंने बताया कि ‘ द- पायनियर ’ के संवाददाता हरेक ग्रामीण क्षेत्रों को कवर करने की कोशिश करते है, और हम ग्रामीण समस्याओं को अपने राष्ट्रीय संस्करण में जगह देते है। पत्रकारिता जनता और सरकार के बीच, समस्या और समाधान के बीच, व्यक्ति और समाज के बीच, गाँव और शहर के बीच, देश और दुनिया के बीच, उपभोक्ता और बाजार के बीच सेतु का काम करती है। यदि यह अपनी भूमिका सही मायने में निभाए तो हमारे देश की तस्वीर वास्तव में बदल सकती है। इसके लिए ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी सृजनकारी भूमिका को पहचानने की जरूरत है।
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