बुधवार, 25 जनवरी 2012

पांचवें खंभे से दूर होती जा रही पत्रकारिता



Indian(Date : 10-01-2011)
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सांस और संचार का अटूट रिश्‍ता है, इस रिश्‍ते को बनाने में पत्रकारिता की महती भूमिका है। पराडकरजी मराठी भाषी होते हुए भी उन्‍होंने "मी मराठी की बजाय मी भारतकर" की अलख जगाई। उन्‍होंने पत्रकारिता को वृति से नहीं अपितु व्रत से देश की दिशा तय करने में अपना अमूल्‍य योगदान दिया पर आज पत्रकारिता बाजारीकरण का अंग बन चुका है। लोकतंत्र का चौथा खंभा अगर मीडिया है तो आम आदमी लोकतंत्र का पांचवां खंभा है। इस पांचवें खंभे पर मीडिया के कैमरे की नजर नहीं जा पा रही है। हालांकि 50 फीट गढ्ढे में प्रिंस को बचाए जाने में मीडिया की भूमिका सराहनीय रही परन्‍तु प्रिंस एक प्रतीक मात्र है। लोकतंत्र में मीडिया के मिशन का तत्‍व जीवित रहेगा। उक्‍त विचार महामना पंडित मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता संस्‍थान, वाराणसी के प्रो.राममोहन पाठक ने व्‍यक्‍त किए।

वे महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के जनसंचार विभाग की ओर से पत्रकारिता के भीष्‍म पितामह कहे जाने वाले संपादकाचार्य बाबूराव विष्‍णु पराडकर की स्‍मृति पर्व पर "मिशनरी पत्रकारिता : संदर्भ और प्रासंगिकता" विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी के उद्घाटन अवसर पर "मीडिया : मिशन से व्‍यवसाय तक विशेष संदर्भ-पेड न्‍यूज" सत्र के दौरान बीज वक्‍तव्‍य देते हुए बोल रहे थे। हबीब तनवीर सभागार में आयोजित समारोह में विश्‍वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में कहा कि पराडकर जी का हिंदी भाषा के उन्‍नयन में अमूल्‍य योगदान है, उन्‍होंने ही मुद्रास्‍फीति, राष्‍ट्रपति जैसे कई शब्‍द दिए। उन्‍होंने कहा कि वृंदावन साहित्‍य सम्‍मेलन में पराडकर जी ने हिंदी पत्रकारिता की दुरावस्‍था के लिए तीन खतरे गिनाए यथा : समाज के साथ उसका तालमेल नहीं है, पूंजी का अभाव है, शिक्षा का अभाव है। बाद के दो खतरे तो समाप्‍त हो गए। अब इसमें बडे घराने उद्यमी पत्रकार भी पूंजी लगा रहे हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि हम अखबार को उस तरह से नहीं निकाल सकते हैं जैसे कि साबुन उद्योग या स्‍टील कंपनी अपना उत्‍पाद बनाती है। उन्‍होंने क‍हा कि जिस प्रकार वाराण्‍ासी में पराडकर जी के नाम पर पत्रकार भवन है उसी प्रकार जनसंचार विभाग में पराडकर भवन बनाएंगे।

कोलकाता विश्‍वविद्यालय की जनसंचार की विभागाध्‍यक्ष प्रो.ताप्‍ती बसु ने मीडिया के मिशनरी भावना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वाटरगेट कांड सहित आरूषि हत्‍याकांड, जेसिका लाल मर्डर केस, निठारी कांड को मीडिया ने ही उजागर किया। उन्‍होंने पत्रकारों को व्‍यवसाय नैतिकता के बीच सामंजस्‍य स्‍थापित करने पर बल देते हुए कहा कि पत्रकारों को सबसे बातचीत करके खबर बनानी चाहिए कि एकतरफा। जनमोर्चा के पूर्व संपादक भारतीय प्रेस परिषद के सदस्‍य शीतला सिंह ने प्रश्‍नांकित करते हुए कहा कि समाज का कौन सा काम मिशनरी ढंग से हो रहा है। शिक्षा का काम भी मिशनरी नहीं रहा। राजनीति का प्रयोग मिशनरी ढंग से होता तो 311 करोड़पति संसद में नहीं पहुंच पाते। उन्‍होंने कहा कि अखबार जगत में पूंजी ही भगवान हो गया है और मुनाफा ही मोक्ष हो गया है। आज संपादक की बजाय मैनेजर ही खबर का निर्धारक हो गया है। ऐसे में समाचार पत्रों की मिशनरी स्‍वरूप संभव नहीं है।

हरि भूमि के प्रबंध संपादक हिमांशु द्विवेदी ने "हिम्‍मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग, डर-डर कर बात करना हमें आता नहीं" जैसे वक्‍तव्‍यों से शुरुआत करते हुए कहा कि अखबार स्‍वान्‍त सुखाय के लिए नहीं है, पाठकों को अखबारों के प्रति प्रतिबद्ध होने की जरूरत है। उन्‍होंने कहा कि देशहित का मुद्दा जब भी आया है समाचार पत्र चुप नहीं रहा है, यही कारण है कि राष्‍ट्रमंडल खेलों के घोटाले से लेकर 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले को घर-घर तक मीडिया ने ही पहुंचाया है। वरिष्‍ठ साहित्‍यकार विश्‍वविद्यालय के कार्य-परिषद के सदस्‍य डॉ. गंगाप्रसाद विमल ने कहा कि आज अखबारों की प्रसार संख्‍या बढी है, लेकिन यह सोचनीय सवाल है कि क्‍या वे पाठकों की परवाह कर रहे हैं, अखबारों के संपादक एक बिचौलिए की भूमिका निभाते हैं, वे कार्पोरेट हाउस के नुमाइंदे बनकर संसद में पहुंच जाते हैं। उन्‍होंने "क्रिश्चियन साइंस मॉनीटर" अखबार का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें मनुष्‍यता को बचाने के लिए जो तथ्‍य मिलते हैं वह भारतीय पत्रकारिता में नहीं दिखते हैं। उन्‍होंने कहा कि पत्रकारिता में पराडकर जी दिशास्‍तंभ की तरह हैं, उसे हमें जलाए रखना है। उन्‍होंने पत्रकारों को भाषा संस्‍कृति के इतिहास की भरपूर जानकारी देने की बात कहते हुए बताया कि आज हमें बाहर के लोगों से लडना पर्याप्‍त नहीं होगा अपितु अंदर के लोगों से लडना जरूरी है जो हमारे बीच रहकर हमें खोखला कर रहे हैं।

जनसंचार के विभागाध्‍यक्ष प्रो. अनिल के.राय "अंकित" ने स्‍वागत वक्‍तव्‍य में कहा कि हम मीडिया के विद्यार्थियों को उत्तरदायित्‍वों का बोध कराते हैं पर आज वह पत्रकार बनकर मीडिया जगत में जाएंगे तो वे अपने आपको कैसे बाजारीय नैतिक बोध से मनुष्‍यत्‍व को बचाए रख सकेंगे, इसी उद्देश्‍य से पराडकरजी की मिशनरी पत्रकारिता पर एक विमर्श के लिए दो दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया है। जनसंचार की असिस्‍टेंट प्रोफेसर रेणु सिंह ने मंच का संचालन किया तथा असिस्‍टेंट प्रोफेसर डॉ. अख्‍तर आलम ने आभार माना। शुरूआत दीप प्रज्‍वलन से हुई। इस दौरान प्रो. अनिल के.राय अंकित ने अंगवस्‍त्र, चरखा सूतमाला प्रदान कर मंचस्‍थ अतिथियों का स्‍वागत किया। कार्यक्रम के दौरान विश्‍वविद्यालय के जनसंचार के विद्यार्थियों ने मिशनरी पत्रकारिता के संदर्भ में गंभीर सवाल कर चर्चा को जीवंत बनाया।

क्षेत्रीय भाषायी पत्रकारिता : मिशन और वैश्‍वीकरण विषय पर आयोजित सत्र की अध्‍यक्षता जनमार्चा के संपादक शीलता सिंह ने की। प्रो. प्रदीप माथुर ने बीज वक्‍तव्‍य दिया। वरिष्‍ठ पत्रकार राजकिशोर, सोमनाथ पाटील, डॉ. गिरिजाशंकर शर्मा ने बतौर वक्‍ता के रूप में अपना वक्‍त्‍ाव्‍य दिया।
(सौ0 भड़ास4मीडिया)

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