शनिवार, 28 जनवरी 2012

अन्ना के बहाने मीडिया की: तानाशाही ? / अमिताभ

भयानक शोर है कि जनता की जीत हुई है. मैं इससे पूरी तरह इनकार नहीं करता और मेरे इनकार करने से भी कुछ नहीं होता है. क्योंकि यह तो सच है कि जनता के लोग अन्ना हजारे के आंदोलन को अच्छी संख्या में समर्थन दे रहे थे. समर्थन मिलने का जो सबसे बड़ा कारण मैं समझ पा रहा हूँ वह यह था कि  मीडिया और प्रेस के लोग उसे एक भयानक मुद्दा बना रहे थे. जिस तरह से सारे टीवी चैनलों पर दिन-रात चौबीस घंटे मात्र यही खबर दिखाई गयी उससे स्वाभाविक तौर पर इस आंदोलन से लोगों का जुडाव और आकर्षण बढ़ता गया. फिर उसका साथ देने के लिए सारे हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषों के अखबार थे जिनमे मात्र यही खबर लग रही थी जिससे लोग स्वतः ही अन्ना के आंदोलन की तरफ आकर्षित होते जा रहे थे.
इस तरह से मीडिया ने इस मामले को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया. टीवी पर लगातार बहसें होती रहीं, उन बहसों में मात्र एक पक्ष को प्रकट किया गया, दूसरे पक्ष या संतुलित बात कहने वालों को डपटा गया. जिसने इस आंदोलन को बेमतलब या उद्देश्यहीन बताने की कोशिश की उसे स्वयं में भ्रष्ट, चोर और गलत किस्म का आदमी कहा गया. यानि कि एक अघोषित आपातस्थिति पूरे देश में लागू कर दी गयी. आदमी के पास सबसे बड़ी आवाज़ मीडिया ही होती है पर जब मीडिया खुद ही पार्टी बन जाए, तब आदमी कहाँ जाए?
जो अन्ना के साथ नहीं, वह आदमी नहीं, वह देशभक्त नहीं, वह सच्चा इंसान नहीं जैसी बातें इतनी बारे, इतने तरह से कही गयीं कि स्वाभाविक रूप से यह फैशन चल ही पड़ा और फिर देखते ही देखते हर शहर, हर गली में अन्ना ही अन्ना हो गए. इस रूप में मैं पहली बात यह कहना चाहता हूँ कि यह जनता की नहीं, मीडिया की जीत है, मीडिया की पूर्ण फतह- जहां उसने साबित कर दिया है कि उसके आगे कोई नहीं टिक सकता. अब मीडिया ने ऐसा क्यों किया, क्यों हर शहर की मोमबत्ती यात्रा को तवज्जो दिया, क्यों इस आंदोलन को आसमान पर चढाया यह अपने आप में गहन शोध का विषय हो सकता है और मैं इस बारे में कुछ भी अलग से नहीं जानता अतः बिना जाने कोई भी टिप्पणी करना उचित नहीं मानता.
एक कारण तो यह हो सकता है कि यह पूरा कार्यक्रम नए किस्म का और रोचक था, जिसमे एक टटकापन और नयापन था जिसे मीडिया हाथों-हाथ लेना चाहती थी. दूसरा कारण यह हो कि भ्रष्टाचार की इस कथित लड़ाई को समर्थन दे कर वे लोग अपनी जनपक्षधरता को प्रकट करना चाहते थे जिसमे यह जाहिर हो पाता कि वे भी इस देश के लिए कितने जागरूक और गंभीर हैं. यह एक ऐसा मुद्दा था जिस पर आम तैर पर आदमी दो तरह की बातें नहीं बोल सकता था अथवा अलग किस्म की राय व्यक्त करने में सामान्यतया असहज होता. लिहाजा यह एकतरफा मामला था जिसमे अन्ना के आंदोलन को केन्द्र में रख कर एक अनवरत चित्रण आराम से प्रस्तुत किया जा सकता था.
इस तरह से अन्ना के आंदोलन की छोटी-छोटी बात भी राष्ट्रीय महत्व का विषय-वस्तु बनती चलती गयी- इन्होने क्या कहा, उनके शिष्यों ने क्या कहा, उनके शिष्य किनसे मिले, उनके जन लोकपाल में कौन सी बातें हैं, सरकार के लोकपाल में क्या है, जन लोकपाल क्यों बेहतर है, अन्ना का वजन कितना है, उनकी शारीरिक स्थिति कैसी है और समस्त बातें जो उन्हें देखते ही देखते मनुष्य से किम्वदंती में बदलती चली गयी.
मैं इस रूप में बहुत दावे के साथ कह सकता हूँ कि यह अन्ना की जीत तो है, उनकी टीम की भी जीत है पर जनता की जीत मामूली और मीडिया की पूरी जीत है- खास कर बड़े मीडिया की, जिसका व्यापक प्रभाव और असर होता है. इसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि किसी भी प्रकार की राजनीति, किसी भी प्रकार के आंदोलन और किसी भी प्रकार के सामाजिक प्रयास करने वालों को मीडिया का महत्व ना सिर्फ समझना होगा बल्कि उनकी पूरी प्रतिष्ठा भी रखनी होगी, क्योंकि मीडिया ही वह तंत्र है जिसके माध्यम से छोटी सी बात बड़ी और बड़ी-बड़ी बातें छोटी बनायी जा सकती हैं.
संसद में कुछ नेताओं ने यह बात कही भी, खास कर शरद यादव और लालू यादव ने. शरद यादव ने परोक्ष रूप से कुछ बहुत बड़े पत्रकारों के नाम भी लिए पर उनकी बातों को उन्ही के खिलाफ इस्तेमाल किया गया और उन बातों को या तो कम महत्व दिया गया अथवा उन्हें उलटे रूप में प्रस्तुत किया गया. इससे एक बात स्पष्ट है कि यदि कोई भी आंदोलन सफल होना है तो सबसे पहले उसे मीडिया की पसंद बननी पड़ेगी. यह भी स्पष्ट हो गया है कि मीडिया अधिकाधिक मामलों में अब दर्पण की भूमिका में नहीं रही जो चीज़ों को जस का तस दिखाए. वे या तो मग्निफायिंग ग्लास बन जा रही हैं जहाँ तिल का ताड़ बना दिया जाए या फिर किसी बात को एकदम से दरकिनार कर दे रही है. यह एक ऐसी ताकत है जिसे स्वीकार करना पड़ेगा, यद्यपि इस ताकत का जिस रूप में प्रयोग हो रहा है उस पर भले कई प्रकार के मत हो सकते हैं.
अन्ना हजारे के आंदोलन में कभी भी मीडिया थमी नहीं. उसने इस दौरान शायद ही कुछ और दिखाया. ऐसा नहीं कि पूरे देश में कोई अन्य घटनाएँ नहीं घट रही होंगी पर जेके पिया भाये वही सुहागन की तर्ज पर मात्र अन्ना का आंदोलन ही खबरों की प्रमुखता बना रहा. यदि कोई अन्य बयान आया भी तो अन्ना के आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में- कैसे रजनीकांत अन्ना को अपना आदर्श मानते हैं, कैसे मराठी अभिनेत्री उनके आंदोलन से प्रभावित हो कर अर्धनग्न तस्वीरें खिचवा रही हैं, कैसे अन्य लोग अन्ना को अपना आदर्श मानने लगे है और तमाम बातें.
मैं इन में से किसी बात को गलत नहीं कह सकता क्योंकि इस देश में मीडिया की अपरम्पार शक्ति के दृष्टिगत कोई भी व्यक्ति अपने होशो-हवाश में उसे गलत ठहराने का काम नहीं कर सकता. पर एक सवाल लगातार बना रहेगा कि क्या कोई भी एक खबर पूरे देश के लिए चौबीस घंटों का आहार बनना चाहिए? क्या एक घटनाक्रम अथवा एक कार्यक्रम को अघोषित राष्ट्रीय कार्यक्रम बना देना चाहिए? क्या इस दौरान दुनिया की बाकी सारी बातों को दरकिनार कर देना चाहिए? क्या उस विषय पर भी मात्र एक विचारधारा को लगातार प्रकट करते हुए बाकी सारी बातों को रोंक देना चाहिए?
ये प्रश्न आज इस कथित “जनता के विजय” के समय बेवकूफी दिख सकते हैं पर सच यह है कि यह ट्रेंड अपने आप में खतरनाक है. यदि इस प्रश्न पर सम्यक विचार नहीं किया गया और एक निश्चित नीतिनिर्धारण नहीं हुआ तो कल को इससे मीडिया की भूमिका एकतरफा, उन्मादजनक और तानाशाह बन जाने की पूरी संभावना रहेगी.
लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं और इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें