बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

सामुदायिक रेडियो का मतलब केवल मनोरंजन नहीं होता Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post




Radio-प्रतिभा ज्योति
   झारखंड के रांची जिले के खिजरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक सावना लकड़ा को उस दिन आनन-फानन में अनगड़ा प्रखंड ब्लाक पहुंच कर गांववालों से यह वादा करना पड़ा कि वे जल्दी ही गांव में स्कूल खुलवाएंगे। बार-बार आवेदन करने और प्रार्थनापत्र देने से जिस प्रशासन और सरकार की नींद नहीं टूटी थी, वह चमत्कार गांववालों ने रेडियो के जरिए कर दिखाया था।
   हुआ यूं कि 31 अक्तूबर, 2004 को अनगड़ा में सामुदायिक रेडियो के उद्घाटन वाले दिन गांव में स्कूल की कमी को लेकर एक नाटक प्रसारित किया गया था। यह गांववालों का अपना विचार था कि सरकार और प्रशासन का ध्यान सबसे पहले स्कूल की कमी की तरफ दिलाया जाए, क्योंकि इसके चलते बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही थी।
   उम्मीद के मुताबिक यह नाटक विधायक सावना लकड़ा ने भी सुना और वे तुरंत हरकत में आ गए। अनगड़ा प्रखंड सामुदायिक रेडियो के क्षेत्रीय संयोजक एतवा बेदिया बताते हैं कि जब से प्रखंड में रेडियो की शुरूआत हुई है, गांववालों में जैसे जान आ गई है। वे कहते हैं कि सामुदायिक रेडियो के रूप में गांववालों को एक ऐसा हथियार मिल गया है जिसके माधयम से वे नीति-निर्माताओं तक अपनी पीड़ा पहुंचा सकते हैं। हमें विश्वास है कि अब हम अपने क्षेत्र के विकास के लिए सरकार और प्रशासन को मजबूर कर देंगे।
हाशिए के लोगों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने और सामुदायिक गतिविधियों के हर स्तर पर इनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली स्थित चरखा डेवलपमेंट कम्यूनिकशन नेटवर्क ने स्थानीय संगठन मंथन युवा संस्थान की मदद से झारखंड में सामुदायिक रेडियो की शुरूआत की है। रांची जिले के अनगड़ा प्रखंड के 17 गांवों में चलाए जा रहे सामुदायिक रेडियो ने यहां के लोगों में जनजागृति तो पैदा की ही है, साथ ही उनमें अपनी तकलीफ और दुखों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों तक अपनी आवाज बुलंद करने का हौसला भी भर दिया है। सामुदायिक रेडियो का स्वरूप लोकतांत्रिक है जिसमें हर व्यक्ति को बोलने, सुनने और कार्यक्रम बनाने की पूरी छूट है। यह रेडियो संचार का एक ऐसा माध्यम है जिससे ग्रामीणों के विकास और सशक्तिकरण की राह खुलती है और निरक्षर भी अपनी भागीदारी निभा सकते हैं।
   यह कार्यक्रम हर रविवार शाम साढे छह बजे एफ एम रांची से प्रसारित होता है। इस रेडियो प्रसारण में अनगड़ा के ग्रामीण न केवल श्रोता हैं, बल्कि कार्यक्रम के निर्माता और कलाकार भी वही है। यह रेडियो कार्यक्रम 17 गांवों के 79 टोलों के ग्रामीणों के सहयोग से तैयार किया जाता है। कार्यक्रमों, जनमुद्दों पर आधारित नाटक, लोकगीत, विकास की बातें, परिचर्चा और गांवनामा शामिल है। अगस्त के आखिरी सप्ताह में ग्रामीणों को पांच दिनों का प्रशिक्षण दिया गया था जिसमें उन्हें तकनीकी जानकारी के साथ-साथ गीत, संगीत और नाटक के माधयम से कार्यक्रम प्रस्तुत करने की जानकारी दी गई।
   इस रेडियो के माध्यम से विभिन्न सरकारी योजनाओं, पंचायती राज और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर स्थानीय भाषा पंच परगनिया में कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं। अब गांववालों को यह जानकारी मिलने लगी है कि इंदिरा आवास योजना के तहत कितने घर आवंटित किए जाएंगे और जनवितरण प्रणाली की दुकान पर कितना अनाज बांटा जाएगा। हर रविवार शाम के छह बजते-बजते सभी ग्रामीण रेडियो सेट के सामने जमा होने लगते हैं। गांव के माल्या बेटिया कहते हैं रेडियो एक ऐसा माध्यम है जो सस्ता है और इसकी पहुंच सब लोगों तक है। यही वजह है कि जब से रेडियो गांव में बजने लगा है, ज्यादातर लोगों ने रेडियो सेट खरीद लिया है। उन्हें लगने लगा है कि यह रेडियो उनका अपना है, जहां वे अपनी हर बात रख सकते हैं।
   क्षेत्रीय संयोजक मोहम्मद शकील के अनुसार कार्यक्रम तैयार करने के लिए दस संवाददाताओं की टीम अलग-अलग गांवों का दौरा करती है। सप्ताहभर वहां रहकर कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की जाती है और फिर उसे रीता और रामधन बेटिया की आवाज में रिकार्ड किया जाता है। ये ग्रामीण बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होने के बावजूद जिस कुशलता से कार्यक्रम तैयार करते हैं, वह किसी को भी अचंभे में डाल सकता है। शकील बताते हैं कि कार्यक्रम तैयार करने के लिए गांववाले खुद विषय का चुनाव करते हैं।
   रीता इस रेडियो की प्रस्तोता है और उसकी दिनचर्या कार्यक्रम के स्क्रिप्ट पढ़ने के अभ्यास से शुरू होती है। इसके लिए उसे तीन किलोमीटर पैदल चलकर मुंगाडीह गांव आना पड़ता है। वे बताती हैं कि गांव में रेडियो आने से महिला-पुरूष के बीच असमानता की खाई भी पटने लगी हैं। वे कहती हैं, ‘जब मंथन वालों ने मुझे कार्यक्रम प्रस्तोता बनने का सुझाव दिया और मैंने हामी भर दी तो मेरे पति और मेरी सास ने मुझसे खूब झगड़ा किया और बहुत बुरा-भला कहा। लेकिन मैंने भी हिम्मत नहीं हारी और चुपचाप कार्यक्रम की रिकार्डिंग के लिए आने लगी। दो-तीन कार्यक्रमों के प्रसारण के बाद अब मेरे पति सबको गर्व से बताते हैं कि पांचवीं तक पढ़ी उनकी पत्नी रेडियो में काम करती है।’
रीता बताती है कि गांव की महिलाएं आज भी अत्यंत संकुचित माहौल में रहती है और अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं तक किसी से नहीं कह पाती हैं। ऐसे में सामुदायिक रेडियो ने उन्हें एक ऐसा अवसर दिया है जहां वे परिवार नियोजन, स्त्री रोग, बच्चों के टीकाकरण और गर्भावस्था में स्वास्थ्य की देखभाल संबंधी जानकारी पा सकती हैं और अपने सवाल पूछ सकती हैं। रीता बताती हैं कि अब महिलाएं खुलकर परिवार नियोजन और गर्भनिरोधक उपायों के बारे में बात करने लगी हैं।
   सामुदायिक रेडियो के लिए अनगड़ा प्रखंड का चुनाव क्यों? इसके जवाब में मंथन युवा संस्थान के संचालक सुधीर पाल कहते हैं कि वैसे तो झारखंड निर्माण के बाद भी यहां की गांवों के हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ है लेकिन अनगड़ा एक ऐसा प्रखंड है जहां अब तक विकास की रोशनी नहीं पहुंची है। यहां लोगों को सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं तक मुहैया नहीं हैं। इसलिए हमने इस प्रखंड का चुनाव किया है जिससे यह रेडियो हाशिए पर खड़े लोगों को अपनी आवाज उठाने के लिए मंच तो मुहैया कराएगा ही, साथ ही उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में भी मदद करेगा।
   इस प्रखंड की एक झलक देखें तो झारखंड के सबसे पिछड़े इलाकों में यह एक है। यहां 45 फीसदी अनुसूचित जनजाति, 15 फीसदी अनुसूचित जाति (बेदिया समुदाय) और 40 फीसदी अन्य लोग रहते हैं और उनकी कुल आबादी एक लाख है। लोगों का जीवन मूल रूप से जंगल और खेती पर आधारित है। वे बमुश्किल गेहूं और मडुआ की खेती कर पाते हैं, क्योंकि सिंचाई का एकमात्र साधन हैंडपंप है। यूं तो प्रखंड में कई हैंडपंप हैं लेकिन पानी इक्के-दुक्के से ही मिल पाता है। ऐसे में यहां के ग्रामीणों के पास खेती के लिए भी एकमात्र सहारा बरसात का रह जाता है। यदि बारिश हुई तो कुछ अनाज पैदा हो जाता है लेकिन जिस साल किस्मत धोखा दे गई, उस समय गांववालों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है। गांव में जनवितरण प्रणाली की दुकान है लेकिन वह भी कभी-कभार और कुछ घंटों के लिए ही खुलती है। बिजली के खंभे गड़े हुए तो बीस साल हो गए लेकिन बिजली का दर्शन अब तक गांववालों को नहीं हुआ है।
   ऐसे में यह सामुदायिक रेडियो जो सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़े वर्गो की आवाज है, आज उनके विकास का एक प्रमुख माध्यम बन गया है। यह एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें अनेक समुदाय मिलकर कार्यक्रमों की कल्पना और उनका प्रसारण करते हैं। समुदाय के सदस्यों की भागीदारी की वजह से यह मुनाफे, प्रचार, ताकत, राजनीति और विशेषाधिकारों के लिए काम करने वाली मीडिया से भिन्न होता है। चरखा के अधयक्ष शंकर घोष कहते हैं कि सामुदायिक रेडियो की धारणा तब और मजबूत होगी जब सरकार संस्थाओं को रेडियो स्टेशन खोलने की आजादी देगी। जैसे, टीवी, अखबारों और अन्य पत्र-पत्रिकाओं को बोलने और लिखने की आजादी दी गई है, जब तक वैसी ही आजादी सामुदायिक रेडियो का नहीं मिलेगी, तब तक हम बहुत ज्यादा बदलाव की कल्पना नहीं कर सकते।
   वे कहते हैं कि इस रेडियो के व्यापक होने में कई बाधाएं है। 1995 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पी.बी.सावंत ने एक फैसले में कहा था कि रेडियो पर जनता का पूरा अधिकार होगा। बावजूद इसके आज तक प्रसार भारती ने हवाई तरंगों को एकाधिकार से पूरी तरह मुक्त नहीं किया है। वे बताते हैं कि सामुदायिक रेडियो चलाने के लिए लाइसेंस की जरूरत पड़ती है और इसकी प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कम से कम चार मंत्रालयों (गृह, रक्षा, मानव संसाधन विकास और विदेश) से इजाजत लेनी पड़ती है।
    हालांकि सामुदायिक रेडियो का ऐसा प्रयोग पहले कर्नाटक के कोलार जिले, गुजरात के भुज जिले और झारखंड के ही पलामू जिले में हुआ है और आज भी हो रहा है, वहां इस रेडियो ने जनजागृति लाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है। ऐसे में यह उम्मीद की जा सकती है कि यदि पुनरीक्षित प्रसारण विधेयक जो पिछले चार सालों से लंबित पड़ा है पारित हो जाता है तो सामुदायिक रेडियो देश के सभी राज्यों के सभी जिलों में काम करने लगेगा और ग्रामीणों का भी अपना एक रेडियो होगा जहां वे अपनी बोली में अपनी बात रख सकेंगे।

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