मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

खामोश, मीडिया शोध जारी है! -- हेमंत जोशी



 





आजकल मीडिया ही मीडिया की खबर देता है। समाचारों में मीडिया से जुड़े समाचार पर्याप्त से कहीं ज्यादा मिल जाते हैं। लेकिन पिछले महीने दिल्ली के मेरिडियन होटल में चार दिन तक देश और विदेश के अनेक संचार विशेषज्ञ, मीडिया के अनेक संपादक और संचारकर्मी, बड़ी संख्या में मीडिया प्रशिक्षक और प्रशिक्षार्थी मीडिया, लोकतंत्र और प्रशासनजैसे गंभीर मुद्दे पर चर्चा करते रहे, लेकिन देश के अंग्रेजी या भारतीय भाषाओं के किसी अख़बार या टेलीविज़न चैनल ने विस्तार से इसके समाचार देने की परवाह नहीं की। कारण शायद यह भी है कि सामान्यत: ऐसी संगोष्ठियों के समाचार तब कुछ विस्तार से छपते हैं जब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, आदि उनका उद्घाटन करें। दुनिया भर में शायद यही रिवाज है।
अगर यह मान भी लें कि यही रिवायत है तो भी समाचार-पत्रों के संपादकीय पृष्ठों पर तो कुछ लेख ऐसे अवसरों पर दिख ही जाने चाहिए। कुछ विभिन्न सत्रों की रिपोर्टिंग भी हो जाए तो अनेक लोगों को इसका लाभ इसलिए भी मिल सकता है कि अब मीडिया केवल पत्रकारों और संचार विशेषज्ञों के जानने-समझने की चीज नहीं रह गया है। आम पढ़े-लिखे या जनतंत्र में भागीदारी करने वाले इंसान को भी इस तरह की सामग्री का लाभ मिलना चाहिए। एक तऱफ तो हम स्कूल के पाठ्यक्रम में मीडिया को एक विषय के तौर पर पढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं, दूसरी तरफ मीडिया के बारे में विभिन्न माध्यमों में केवल बेहद महत्वपूर्ण या उथली और सनसनीखेज ख़बरें ही लोगों को मिल पाती हैं।
भले ही लोकतंत्र और प्रशासन से मीडिया के संबंधों पर समाचार माध्यमों में गाहे-बगाहे लेख छपते रहते हैं, लेकिन देश-विदेश के विद्वानों के इस विषय में विचार जानने का मीडिया में दिलचस्पी रखने वाले नागरिकों के पास कोई साधन नहीं हैं। हा, पुस्तकालयों में उन्हें अनेक पुस्तकें मिल सकती हैं।
आजकल अगले सौ दिन में शिक्षा का स्वरूप बदलने को लेकर काफी अधिक शोर है। यशपाल समिति की रिपोर्ट आने के बाद शिक्षा में होने वाले संभावित परिवर्तनों के बारे में शिक्षा मंत्री के बयान आए हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण कदम 1986 में उठाया गया था। उस समय अंतिम दस्तावेज़ जारी किए जाने से पहले देश भर में अनेक संगोष्ठिया हुईं थी, अलग-अलग स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी ने सत्ता की कमान संभालते ही कुमारमंगलम बिड़ला और अनिल अंबानी के नेतृत्व में कुछ बुद्धिजीवियों से भविष्य की शिक्षा नीति पर दस्तावेज तैयार करवाया था। यहा इस बात का जिक्र इसलिए आवश्यक है कि हम जनतंत्र और प्रशासन के बीच की कड़ी को देख सकें और इस बात की भी जाच कर सकें कि इन दोनों को अधिक या कम जनतांत्रिक बनाने में मीडिया की क्या भूमिका होती है। जब देश में शिक्षा दिन-ब-दिन महगी होती जा रही है, शिक्षा का स्तर गिरता दिखाई पड़ रहा है और सरकार बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय, आई.आई.टी. और मेडिकल कॉलेज खोलने का निर्णय ले रही है, तब पुरानी संस्थाओं को समाप्त करके एक नई समेकित संस्था बनाने का विचार तो नेक है, लेकिन वह कहा तक व्यावहारिक है इस पर विचार करने की आवश्यकता है। किसी भी राष्ट्रीय स्तर के विमर्श में अधिकाधिक लोगों की भागीदारी मीडिया के बिना संभव नहीं है।
विश्व भर में आजकल सुशासन की जो अवधारणा बनी है, उसमें नागरिक समाज की भागीदारी पर विशेष जोर दिया जा रहा है। अनेक स्तरों पर देश-विदेश में स्वयंसेवी संगठन ऐसे कई काम कर रहे हैं, जो सरकारों को करने चाहिए। इसके अलावा अनेक संस्थाए एवं लोग विभिन्न सामाजिक मुद्दों की वकालत और प्रचार के काम में भी लगे हुए हैं। एक समय था, जब लॉबिंग करना अच्छा नहीं माना जाता था, लेकिन आजकल यह सकारात्मक काम माना जाने लगा है। सरकारें भी नीतियां बनाने के लिए संबंधित लोगों से व्यापक तौर पर विचार-विमर्श करती हैं। कई बार तो ऐसी नीतियों का जि सरकारें संचार माध्यमों के जरिए इसलिए भी करती हैं ताकि जनता के मूड़ को भापा जा सके।
इसके विपरीत सरकारों के कई निर्णयों पर जब जनाक्रोश उभर कर आता है तो मीडिया उस पर आम बहस का माहौल तैयार करता है, जिसके फलस्वरूप कई बार सरकारों को अपने निर्णय वापस लेने पड़ते हैं या उन पर फिर से विचार करने को बाध्य होना पड़ता है। आरक्षण का मुद्दा हो, कोल्ड ड्रिंक्स में जहरीले पदार्थो का मामला हो या हाल ही में समलैंगिक लोगों की आजादी का मसला हो, यह सभी जनतंत्र और प्रशासन में मीडिया की भूमिका को रेखांकित करते हैं। ऐसे माहौल में मीडिया शोध चुपचाप अकेले क्यों हो और लोगों को इसकी जानकारिया भी क्यों न मुहैया करवाई जाए? sabhar-hindustan

 

 

 

 

कलम की विनम्रता और पत्रकारिता के संस्कार

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साल के दो महीने खास होते हैं जिनमें पहला महीना अप्रेल का होता है। इस महीने पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, पंडित माधवराव सप्रे और राजेन्द्र माथुर के नाम है तो दूसरा महीना मई का है। मई की पहली तारीख श्रमजीवियों के नाम है जिसे हम मजदूर दिवस के नाम पर जानते हैं। इसी महीने की तीन तारीख को प्रेस दिवस है और तीस मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। ये दोनों महीने बेहद अर्थवान हैं, खासकर पत्रकारिता के लिये। यहां मैं मीडिया षब्द से परहेज करने की कोषिष करूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि मीडिया का अर्थ पत्रकारिता से एकदम जुदा है।
बहरहाल, हम पत्रकारिता के संदर्भ में बात करेंगे। पत्रकारिता के संदर्भ में दो बातें हैं कि इन दोनों महीनों की तारीख पत्रकारिता के पुरोधाओं से जुड़ी हुई है और इन तारीखों का सीधा संबंध कलम से है। मेरी बातें उलझी उलझी लग सकती हैं किन्तु इस पर जब विस्तार से लिखी गयी मेरी बातों को पढ़ेंगे, मनन करेंगे तो षायद आप भी मुझसे सहमत होंगे। दादा माखनलाल की विष्व प्रसिद्व रचना है पुश्प की अभिलाशा। इस कविता में उन्होंने फूल की विन्रमता का बखान किया है और इससे जुड़ी बात कलम की मैं कहता हूं। कलम भी आपको विनम्रता सिखाती है। आप देखेंगे कि आमतौर पर कलम नीचे की तरफ होती है अर्थात वह विनम्र है। पत्रकारिता भी विनम्रता सिखाती है और विनम्र पत्रकारिता ही दुनिया बदलने की ताकत रखती है। तलवार नीचे की तरफ होगी तो वह भीरूपन का परिचायक होगी किन्तु कलम ऊपर की तरफ होगी तो उसकी अकड़ दिखेगी। क्या कलम अकड़ दिखा सकती है? नहीं, कभी नहीं। कलम की प्रकृति रचने की है, सिखाने की है और रचियता हमेषा विनम्र होता है। जो लोग आस्तिक नहीं हैं वे भी इस बात को मानेंगे कि ईष्वर, अल्लाह, ईषु, गुरूनानक किसी ने भी, कहीं भी विनयषील व्यवहार के अलावा कोई सीख नहीं दी है। जब हम यह मानते हैं कि कलम विन्रम है तो भला हममें विनम्रता क्यों नहीं आना चाहिए। पत्रकारिता का दायित्व समाज के किसी भी दायित्व से बड़ा है। दूसरे दायित्व कम नहीं हो सकते हैं किन्तु उनमें कहीं न कहीं, लाभ की लालसा बनी होती है किन्तु पत्रकारिता में लाभ का कोई लोभ नहीं होता है। पत्रकारिता सहज रूप् से एक सुंदर, विचारवान और विकसित समाज की रचना करने की कोषिष है। कुछ लोग इस बात को हजम नहीं कर पाएंगे कि आज जब चौतरफा पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात चल रही है, कदाचित प्रमाणित भी हो चुकी है तब मेरा यह कहना केवल काल्पनिक बातें हो सकती हैं। मेरा उन सभी लोगों से आग्रह है कि वे इसे दूसरी नजर से देखें। पत्रकारिता तो आज भी नफा-नुकसान से परे है। आप एक पत्रकार हैं तो आप खबर लिखते हैं समाज के लिये किन्तु जिस कागज पर खबर छपती है वह वस्तु है और वस्तु का सौदा होता है। आपकी लिखी खबर षब्द सत्ता है और इसकी कोई कीमत नहीं होती है। पत्रकार का लाभ इतना ही होता है कि उसे जीवनयापन के लिये वेतन के रूप् में कुछ हजार रुपये मिल जाते हैं। यदि आप और हम पत्रकार नहीं भी होते तो किसी और व्यवसाय में भी यही करते। संभवतः इसलिये ही हमें श्रमजीवि कहा जाता है क्योंकि श्रम ही हमारे जीवन का आधार है। हम सरस्वती के उपासक हैं और हमारी उपासना का माध्यम हमारी कलम है। इस कलम की विन्रमता देखिये कि यदि इसे आप सीधा कर देते हैं तो यह लिखने का उपक्रम रोक देती है किन्तु जैसे ही यह झुकती है, वह नदी के पानी की तरह बहने लगती है। हमारे विचार और कलम की स्याही एक सुंदर अभिव्यक्ति का माध्यम बनते हैं। मेरा यह विचार महज एक लेख नहीं है बल्कि एक आग्रह है उस युवा पत्रकार पीढ़ी से जो इस महायज्ञ में षामिल तो हो गये हैं किन्तु उन्हे अपनी ताकत का अहसास नहीं है। वे हर समय भ्रम की स्थिति में रहते हैं। अच्छा लिखना जानते हैं, अच्छा सोचते हैं और अच्छा करने का जज्बा भी उनमें है किन्तु उन्हें इस बात का इल्म नहीं है  िकवे फकीरी के पेषे में आये हैं। वे लिखेंगे तो समाज और देष में षुचिता का निर्माण होगा और उनके इस लिखे से अखबार का मालिक कदाचित मालामाल बनेगा। षुचिता और माल के बीच हमारी नयी पीढी को तय करना होगा कि वे आखिर उनका रास्ता क्या हो? वे माल की तरफ भागें या समाज में षुचिता के लिये जो जवाबदारी उनके कंधों पर है, उसे पूरा करें। इस बात को लिखने में मुझे परहेज नहीं है कि हममे से अनेक दिग्गज पत्रकार भावी पीढ़ी में कलम का संस्कार उत्पन्न करने के बजाय कमाने की संस्कृति पैदा कर रहे हैं। भावी पत्रकारों को इस गफलत में नहीं पड़ना चाहिए। हमें महान पत्रकार दादा माखनलाल की पत्रकारिता को, गांधीजी की पत्रकारिता को स्मरण में रखकर कलम के संस्कार को आगे बढ़ाना है। झुकने का अर्थ समझौता नहीं है बल्कि यह विनम्रता है और पत्रकारिता विनम्रता की पहली सीढ़ी है। पत्रकारिता के अवधूतों के प्रसंग में जो बातें लिखी हैं, वह मेरी भावना है और मेरा विष्वास है कि कलम के संस्कार की  पत्रकारिता हमेषा अपनी आभा बिखरेते रहेगी।





हरियल कबूतरों ने पक्षी विहार में बनाया बसेरा

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दिल्ली (ब्यूरो)। ग्रीन पिजन के समूह ने आज कल नोएडा का ओखला पक्षी विहार में डेरा डाला है। एक बरगद पेड़ पर करीब 150 कबूतर दिख रहे हैं। इन खूबसूरत कबूतरों को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी है। इस कबूतर के बारे में पक्षी विशेषज्ञ सालेम अली ने भी काफी लिखा है। पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि ये कबूतर यहां वसंत तक रहेंगे। हल्की गरमी पड़ते ही यहां से फुर्र हो जाएंगे।


ट्रेरोन साइनीकोप्टेरा को पीले पंजों वाले खूबसूरत हरे कबूतर (हरियल) के नाम से भी जाना जाता है। फलों पर निर्भर रहने वाले हरे कबूतरों का इन दिनों डेरा नोएडा का ओखला पक्षी विहार बना हुआ है। करीब सवा सौ की संख्या में हरियल कबूतर पक्षी विहार में स्थित बरगद के पेड़ पर डेरा डाले हुए हैं। ओखला पक्षी विहार में खूबसूरत कबूतरों के अजब रंग को देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक आ रहे हैं। इनकी खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद करने की ललक इन पर्यटकों को ओखला पक्षी विहार खींच ला रही है। हालांकि, अपने रंग के अनुरूप यह बरगद के विशालकाय पेड़ के पत्तों पर कुछ इस तरह घुल मिल जाते हैं कि इनको देखना आसान नहीं होता।


हरियलमहाराष्ट्र का स्टेट बर्ड है। ओखला पक्षी विहार के रेंजर जीएम बनर्जी ने बताया कि कई अलग-अलग प्रजातियों के होते हैं और फलों को अपना आहार बनाते हैं। बरगद के पेड़ पर निकलने वाले लाल रंग का फल (गूलर) इनका विशेष आहार है। रेंजर ने बताया कि इस वर्ष यह पक्षी बड़ी संख्या में ओखला पक्षी विहार पहुंचे हैं। आमतौर पर नीले कबूतरों के स्थान पर हरे कबूतरों का दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में दिखना अपवाद है। हरियल घने जंगलों में एकदम सुबह के समय पेड़ की टहनियों में बैठे दिखाई देते हैं। इन कबूतरों के मार्च के अंत तक पक्षी विहार में रहने का अनुमान है।


रेंजर बनर्जी ने बताया कि हरियल कबूतर ओखला पक्षी विहार में सुरक्षित रूप से अंडे देने आए हैं। यह जनवरी में अंडे देते हैं। 21 से 25 दिनों के बीच में अंडे में से बच्चे निकल आते हैं। इस दौरान नर कबूतर खाने और अन्य इंतजाम रखता है और घोंसले के पास हमेशा बना रहता है। वहीं, मादा कबूतर घोंसला छोड़कर नहीं जाती है। लगभग दो महीने या मार्च तक ये बच्चे घोंसले से निकलकर उड़ने के काबिल हो जाएंगे।

सत्ता पलट की संभावनाओं के बीच मीरा जाएंगी पाक

दिल्ली (ब्यूरो)। पाकिस्तान में तख्ता पलट की संभावनाओं के बीच पड़ोसी देश में लोकतंत्र की बयार के लिए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार पहली बार पाक दौरे पर जा रही हैं। 21 फरवरी से शुरू हो रहे पांच दिवसीय पाकिस्तानी दौरे में वह देश की आंतरिक राजनीति पर भी चर्चा करेंगी कि कैसे यहां लोकतंत्र की नींव को मजबूत किया जाए।


यह महज संयोग ही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में इस वक्त महिला स्पीकर हैं। और दोनों ही स्पीकरों में रिश्ते भी काफी मधुर हैं। मीरा कुमार को पाकिस्तान दौरे का न्योता मार्च 2011 में प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने भारत यात्रा के दौरान दिया था। वैसे भारत की लोकसभा अध्यक्ष भले ही पहली बार पाकिस्तान जा रही हों, लेकिन पाकिस्तान की नेशनल असेंबली स्पीकर फहमीदा मिर्जा 2010 में भारत आ चुकी हैं। कॉमनवेल्थ देशों के पीठासीन अधिकारियों की बैठक में मिर्जा भारत आई थी। इतना ही नहीं गत वर्ष त्रिनिदाद-टोबेगो में गत वर्ष आयोजित कॉमनवेल्थ देशों के संसदीय अधिकारियों के कार्यक्रम में भी मीरा कुमार और फहमीदा मिर्जा की मुलाकात हुई थी।


उधर, रक्षा मंत्री रक्षा मंत्री ए के एंटनी की अगुवाई में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल सउदी अरब के सोमवार को रवाना हो गया। यह प्रतिनिधिमंडल द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मुद्दों, खास कर रक्षा क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर सउदी अरब में अपने समकक्षों के साथ विचार विमर्श करेगा।


एंटनी आज सउदी अरब के रक्षा मंत्री शहजादा सलमान से मुलाकात करेंगे। उनके साथ रक्षा सचिव शशि के शर्मा, सेना उप प्रमुख एस के सिंह, नौसेना उप प्रमुख वाइस एडमिरल सतीश सोनी और एयर वाइस मार्शल एम आर पवार भी रहेंगे।

 

पीओके की विवादित जगह चीन को दे सकता है पाक

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वाशिंगटन। पड़ोसी देश पाकिस्‍तान और चीन अब सीधे तौर पर दबंगई पर उतर आए हैं। ची और पाकिस्‍तान ने भारत को घेरने की रणनीति बनाई है। जिसके लिए पाकिस्‍तान ने कश्‍मीर की अपने कब्‍जे की गिलगित-बाल्टिस्‍तान की 72,971 वर्ग किलोमीटर की विवादास्‍पद जगह को चीन को 50 साल के लिए लीस पर देने की रणनीति बनाई है।


यह रिपोर्ट मिडिल ईस्‍ट मीडिया रिसर्च इंस्‍टीट्यूट ने जारी की है। जिसके लिए उसने इस क्षेत्र के उर्दू अखबारों में छपी खबरों का हवाला दिया है। गौरतलब है कि पाकिस्‍तानी सेना के प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कियानी चीन के दौरे पर गए थे। उसी दौरान दोनों देशों ने मिलकर इस रणनीति को अंजाम दिया था।


पाकिस्‍तान और चीन की यह रणनीति भारत के लिए चिंता का कारण हो सकती है। दोनों देश मिलकर इस क्षेत्र में विकास के बहाने हथियारों का जखीरा तैयार कर सकते हैं। इस तरीके से चीन भारत को घेरने में भी कामयाब हो सकता है। पाकिस्‍तान इस क्षेत्र को लीज पर देने के पीछे विकास का बहाना बना रहा है।

गौरेया के लिए मुसीबत बन चुकीं ऊंची इमारतें

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Sparrow Bird
दिल्ली (ब्यूरो)। देश के सभी शहर कबूतरों के लिए आश्रय स्थल बनते जा रहे हैं। दूसरी ओर यह गौरेया के लिए मुसीबत बन गए हैं। नतीजा है कि गौरैया कम होती जा रही है और कबूतर अपनी आबादी बढ़ाने में कामयाब हो रहे हैं। ऊंची इमारतों में गौरेया नहीं रह सकती जबकि कबूतरों को ऊंचे मकान ही पसंद हैं। लगातार सिकुड़ती हरियाली और भोजन की कमी से गौरेया भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के महानगरों से गायब होती जा रही है। शहरों में छोटे मकानों की जगह गगनचुंबी इमारतें बढ़ने से गौरेया की जगह लगातार कबूतर लेते जा रहे हैं।


केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय भी मानता है कि देशभर में गौरेया की संख्या में कमी आ रही है। देश में मौजूद पक्षियों की 1200 प्रजातियों में से 87 संकटग्रस्त की सूची में शामिल हैं। हालांकि बर्ड लाइफ इंटरनेशनल ने गौरेया (पासेर डोमेस्टिक) को अभी संकटग्रस्त पक्षियों की सूची में शामिल नहीं किया है, लेकिन सलीम अली पक्षी विज्ञान केंद्र कोयंबटूर और प्राकृतिक विज्ञान केंद्र मुंबई समेत विभिन्न संगठनों के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि इनकी तादाद लगातार घट रही है। केंद्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय के एक अफसर का कहना था कि जैसे-जैसे शहरों में छोटे-छोटे मकानों की जगह ऊंची इमारतें लेती जाएंगी, गौरेया की जगह कबूतर बढ़ेंगे। ऊंची इमारतों में गौरेया नहीं रह सकती जबकि कबूतरों को ऊंचे मकान ही पसंद हैं।


गौरेया और कबूतर उन पक्षियों में हैं जो मनुष्य के आसपास आसानी से रह सकते हैं। खास बात यह है कि गौरेया को ज्यादातर लोग पसंद करते हैं जबकि कबूतर को भगाना चाहते हैं। पक्षी प्रेमी संगठनों के अध्ययन महानगरों में गौरेया की संख्या में कमी आने के कई कारण गिनाते हैं। प्रदूषण और शहरीकरण को इसका प्रमुख कारण माना गया है। इसके अलावा गौरेया के रहने व घोेंसले बनाने की जगह लगातार घट रही है। छोटे मकानों में तो उन्हें ठिकाना मिल जाता था, लेकिन ऊंची इमारतों में नहीं मिल पा रहा। खेती खत्म होने व शहरों में रहन-सहन की शैली बदलने से उन्हें भोजन नहीं मिल पा रहा है। खास बात यह है कि गौरेया के संरक्षण को लेकर 20 मार्च को विश्व घरेलू गौरेया दिवस मनाया जाता है लेकिन इसके बावजूद इस पक्षी पर संकट कायम है। पूरी दुनिया में गौरेया का यही हाल है। ब्रिटेन में तो ज्यादातर गौरेया अब गायब हो चुकी हैं।

 

आखिर प्रियंका के बच्चे क्यो बनें सेन्टर ऑफ अटरैक्शन?



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Priyanka Gandhi

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अंकुर शर्मा
कांग्रेस की स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी जब भी यूपी की सरजमीं पर कदम रखती हैं तो वो मीडिया और लोगों के लिए चर्चा का विषय बन जाती हैं। लोग उनके बोलने से लेकर चलने-फिरने, उठने-बैठने से लेकर हर चीज में दिलचस्पी दिखाते हैं। इसीलिए प्रियंका गांधी ने क्या कहा, इस बारे में कहने से पहले कहा जाता है कि प्रियंका गांधी ने अपनी दादी इंदिरा जी की साड़ी पहनकर यह बयान दिया।


लेकिन उसी प्रियंका गांधी ने गुरूवार को लोगों को बात करने का दूसरा टॉपिक दे दिया और वो है उनके क्यूट बच्चे। अपने दोनों बच्चों रिहान और मिराया के साथ वो रायबरेली के मंच पर नजर आयीं। जिसके बाद से सेन्टर ऑफ अटरैक्शन उनके बच्चे बन गये। चैनल वाले प्रियंका औऱ प्रियंका के बयान को छोड़कर उनके बच्चों की ओर मुड़ गये। लोगों की नजर में भी गांधी परिवार की छठीं पीढ़ी मंच पर खड़ी थी। टीवी स्‍क्रीन पर मोतीलाल नेहरू से लेकर प्रियंका गांधी वाड्रा तक सारे रिश्ते गिना दिये गये। और तो और सियासी दलों ने भी प्रियंका के बच्चों को लेकर बयानबाजी शुरू कर दी।


जहां कांग्रेसी, प्रियंका के बच्चों के लिए बोल रहे थे, कि वो गांव देखने आये हैं और अपनी मम्मी के साथ वो भी देश को करीब से देख रहे हैं, तो वहीं विरोधियों का कहना था कि प्रियंका देश की बदहाली अपने बच्चों को दिखा रही हैं। जिस तरह से पर्यटक नेशनल पार्क में बच्चों को बाघ दिखाने ले जाते हैं, अंडमान में लोग आदिवासियों को देखने जाते है, उसी तरह प्रियंका भी अपने बच्चों को उत्तरप्रदेश में गरीबों और गरीबी दिखाने आयी हैं और उनको बता रही है कि जो आपको सत्ता का सुख देते हैं, वो ऐसे रहते हैं। वो अपने बच्चों के साथ मिलकर जनता का मजाक उड़ा रही हैं।


लेकिन सोचने वाली बात यह है कि हम स्वतंत्र देश के बाशिंदे हैं, हर किसी को अधिकार है कि वो अपने बच्चों के साथ कहीं भी जाये। प्रियंका गांधी ने भी तो वो ही किया तो फिर इस तरह की बातें क्यों शुरू हो गयी?


लोग चुनावी रैली में अपने पूरे परिवार, दोस्तों के साथ घूम रहे हैं। चाहे वो सपा नेता मुलायम सिंह का परिवार हो या फिर भाजपा नेताओं की फैमिली। चुनाव प्रचार में हर परिवार,हर रिश्ता अपनों के लिए वोट मांग रहा है लेकिन कहीं कोई जिक्र नहीं होता तो फिर आखिर प्रियंका गांधी वाड्रा में ऐसे कौन से सुरखाब के पर लगे हैं जो चर्चा का विषय बन जाते हैं।


कभी उनके पति राबर्ट वाड्रा की बात होती है तो कभी उनके मासूम बच्चों की। गौर करने वाली बात यह है कि प्रियंका गांधी के चुनावी मंच पर उनके बच्चे जरूर थे, लेकिन उन्होंने मंच से भाषण में कहीं भी अपने परिवार और बच्चों का जिक्र नहीं किया। उनकी बातों में केवल कांग्रेस की ही बात थी, जिसके लिए वो कह रही थीं कि अगर प्रदेश में तरक्की चाहिए तो कांग्रेस को वोट कीजिये। अपने भाई राहुल और मां सोनिया का जिक्र भी देश और प्रदेश के कामों के लिए उन्होंने किया ना कि अपने पर्सनल रिश्तो को वो बताने के लिए चुनावी मंच पर खड़ी थीं। तो फिर प्रियंका के बच्चों पर इतना बवाल और चर्चा क्यों? अब जवाब आप दीजिये।

 

 

संचार सिद्धांत

हालांकि मनुष्य हमेशा कोई रास्ता या किसी अन्य रूप में संप्रेषित किया है, यह कुछ समय ले लिया से पहले ही संचार विश्लेषण किया गया. बीसवीं सदी में, लोगों को तीव्रता के साथ संचार की प्रक्रिया का अध्ययन करने लगे. समय के साथ, इस अध्ययन संचार सिद्धांत के रूप में जाना गया. क्योंकि संचार मानवीय अनुभव के लिए केंद्रीय है, यह संचार सिद्धांत का अध्ययन करने के लिए मुख्य ध्यान केंद्रित है.
संचार कार्यों के जैकबसन सिद्धांत
1980 में S.F., स्कुद्दर "यूनिवर्सल संचार कानून," जो कहा गया है कि "सभी जीवित संस्थाओं, प्राणी और जीव लगता है, प्रतिक्रियाओं, शारीरिक मुद्रा, आंदोलन, इशारों, भाषा, आदि के माध्यम से संवाद" निर्धारित इसके अलावा, स्कुद्दर अर्थ है कि संचार अक्सर जीवित रहने के एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया है, जैसे जब पोषण के लिए एक बच्चा रोता है, या एक संयंत्र परिवर्तन पानी की कमी के कारण रंग.
संचार सिद्धांत कई अलग अलग दृष्टिकोण के माध्यम से जांच की है. "मनोवैज्ञानिक" दृष्टिकोण चलता इंसान के बीच संचार विचारों और भावनाओं को रिसीवर के माध्यम से निर्धारित किया जाता है के बाद वह संदेश वह प्राप्त हुआ है व्याख्या की है कि. जैसे, अगर वक्ता रिसीवर है कि उसके घर में आग लगी है बताती है, रिसीवर तब झटका आतंक, लगता है, हो सकता है और होना करने के लिए प्रतिक्रिया का कारण बना. कैसे रिसीवर में इस बिंदु पर मानना ​​वास्तविक "संचार" हो रही है.


दूसरे छोर पर, "यंत्रवत" दृष्टिकोण एक संदेश की "" सही लेन - देन मानती है. यही है, वक्ता रिले रिसीवर को जानकारी है, और रिसीवर सुनता है और प्राप्त उससे बात की जानकारी. संचार का यह दृश्य है रिसीवर भावनाओं या विचारों की कोई भावना का चित्रण है, लेकिन बोलने और सुनने की शारीरिक कृत्यों पर ही केंद्रित है.
इसके अतिरिक्त, एक संदेश की जांच करने के लिए और यह कैसे पुनः व्याख्या की है, क्योंकि यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के लिए यात्रा एक संचार सिद्धांत के "व्यवस्थित" देख रहे हैं. यह समझता है कितना या कैसे छोटे संदेश बदल गया है के लिए, और संभावित कारण क्या किये गये हैं. अगले, एक से अधिक लोगों को बिजली और उत्पीड़न का उपयोग करने के हावी के साथ 'क्रिटिकल' संचार सौदों के दृश्य.
संचार सिद्धांत के "सामाजिक Constructionist" देखने के प्रेषक और अर्थ बनाने के लिए रिसीवर के बीच दृष्टिकोणों का आदान परख होती है. यह मानता है कि "कैसे" तुम कुछ कहना निर्धारित करता है क्या संदेश है. इसके अलावा, सामाजिक Constructionist सहूलियत से, "सच" और "विचारों" का आविष्कार कर रहे हैं. रॉबर्ट टी. क्रेग व्यक्त किया है कि constructionist दृष्टिकोण है "चल." इस वजह से, वह भी मानना ​​है कि हमारे व्यक्तिगत बन पहचान "का गठन और सुधार" इस ​​विशेष सिद्धांत के माध्यम से.
Constructionist गिनती के विरोध में, "संक्रमण" मॉडल बनाता है कि "ख़तम" संचार प्राथमिकता है. यह एक कंप्यूटर की तरह या रोबोट विधि में संचार comprehends. यह मनुष्य के बीच विचार और विचारों के संपर्क में नहीं स्वाद के रूप में Constructionist दृष्टिकोण नहीं करता है. यह तथ्यात्मक और लोगों के बीच जानकारी डाटा भेजने के सरल कार्य पर ध्यान केंद्रित करके मानव संचार के स्वभाव oversimplify प्रकट होता है.
संचार सिद्धांत के अध्ययन के अपेक्षाकृत युवा है और यह दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान के क्षेत्रों के साथ पाठ्यक्रम पार, और समाजशास्त्र. कि अंत करने के लिए, इस अध्ययन के इन क्षेत्रों के बीच एक आम सहमति अभी तक अवधारणा हो.

संचार सिद्धांत



संचार सिद्धांत
संचार कार्यों के जैकबसन सिद्धांत
करके संचार सिद्धांत हम इस तरह एक व्यक्ति जो संचार में एक ही रास्ता या दो तरीके या सतत प्रक्रिया माना जाता है मतलब है. संदेश रिसीवर के लिए विभिन्न तरीकों के माध्यम से रिसीवर तक पहुँचता है. संचार एक ऐसे विषय है जो में बदलाव दैनिक होते है. विषय - वस्तु, मध्यम, संचार की प्रक्रिया की जरूरत है और संचार और व्यापार गतिविधियों के आधुनिक साधनों के विस्तार के अनुसार विकसित की है. संचार प्रक्रिया में एक ही मूल और प्रमुख सिद्धांतों पर निर्भर करता है. प्रमुख प्रिंसिपल सिद्धांत इस प्रकार हैं: -
सूचना सिद्धांत
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संचार के इस सिद्धांत Shanan द्वारा 1750 में तैयार की गई थी और उसके बाद मिलर और Fick इस पर विकसित की है. इस सिद्धांत को भी एस सांड की आंख को सिद्धांत या shanan सिद्धांत कहा जाता है. संचरण की इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के बढ़ते उपयोग के साथ इस सिद्धांत प्रतिपादित कर ली.
संचार की सूचना सिद्धांत वर्णित विशेषताओं के नीचे है: -
संचार की प्रक्रिया रैखिक है.
इस प्रणाली के आधार पर काम परिणाम पर निर्भर करता है.
संचार एक तरह से एक गतिविधि है.
संचार संदेश के तहत हस्ताक्षर या आवक फार्म के रूप में दिया जाता है.
संचार कंप्यूटर, साइबर आदि दुनिया की तरह यांत्रिक उपकरणों द्वारा भेजा जा सकता है
इस जानकारी के सिद्धांत संचार में संदेश भेजने वाले की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस सिद्धांत संचार में एक तरह से एक सिद्धांत के रूप में लिया गया है. इसलिए प्रेषक एक स्पष्ट और सही संदेश दे दो ताकि रिसीवर सही अर्थ समझ सकते हैं चाहिए. यह इस सिद्धांत रूप में माना जाता है कि दोनों प्रेषक और रिसीवर के संदेश के संकेत और भाषा समझ सकता हूँ.
इंटरेक्शन संचार के सिद्धांत
संचार का यह सिद्धांत भी गोल या परिपत्र सिद्धांत कहा जाता है. संचार की प्रक्रिया में इस सिद्धांत के अनुसार वहाँ की जानकारी, विचारों, भावनाओं, और प्रेषक और रिसीवर के बीच संदेशों की एक सतत मुद्रा है. इस सिद्धांत में प्रतिक्रिया करने की प्रक्रिया संचार के अंतर्गत शामिल हो गया.
सहभागिता के सिद्धांत के संघटक
संचार के काम की बातचीत के सिद्धांत के तहत एक संगठित प्रक्रिया घटकों के भागों जिसका इस प्रकार हैं में चला जाता है: -
संदेश, एक विचार या जानकारी का जन्म.
संदेश या प्रेषक के दाता.
संदेश की भावना अंतर्निहित.
संचार के रास्ते.
मतलब या संचार का माध्यम.
संदेश का रिसीवर.
समझौता संदेश या कार्यान्वयन के ऊपर विचार रिसीवर द्वारा संदेश के अर्थ.
वापस फ़ीड.
संचार के इस सिद्धांत को एक पूरा सिद्धांत है. इसमें दोनों प्रेषक और रिसीवर सतर्क रहते हैं. इसके अंतर्गत संचार के लिए दो तरह की प्रक्रिया हो लिया जाता है. इसका अर्थ समझ पर संदेश का रिसीवर इस पर उसकी प्रतिक्रिया देता है.
आधुनिक युग में इस सिद्धांत का महत्व तेजी से प्रबंधन के क्षेत्र में बढ़ रही है, क्योंकि एक संदेश भेजा पर प्रतिक्रिया प्राप्त कर सकते हैं, और अगर यह किसी भी संदेह या विसंगति बनी हुई है यह हटाया जा सकता है.
संचार के लेनदेन थ्योरी
संचार के इस सिद्धांत की जानकारी का निरंतर आदान प्रदान पर आधारित है या देना और इस प्रक्रिया को ले लो. इस सिद्धांत संचार के अनुसार एक लगातार प्रक्रिया चल रही है. इसमें प्रेषक और रिसीवर दोनों एक आम रूप है और परस्पर विनिमय जानकारी के प्रतिभागी हैं. इस सिद्धांत के घटक इस प्रकार हैं: -
संदेश
प्रेषक
संदेश का अर्थ अंतर्निहित.
रास्ता
मध्यम
रिसीवर
अंतर्निहित अर्थ को समझना.
व्यवहार में परिवर्तन.
प्रति संभरण
संचार के इस सिद्धांत के लक्षण हैं: -
) 1 संचार प्रेषक और रिसीवर के बीच लगातार जा रहा पर रहता है.
) 2 दोनों संचार में पार्टियों के कारण और परिणाम से प्रभावित हैं,
) 3 संचार में हर क्रिया एक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है.
) 4 संचार संदेश की एक पुल का उपयोग करता है यह एक तार्किक निष्कर्ष तक ले आओ.
इस रास्ते में संचार के विभिन्न सिद्धांतों प्रचलित हैं. इन संचार की बातचीत के सिद्धांत का उपयोग करने में अधिक है क्योंकि यह में संचार के लिए एक तरह से दो प्रक्रिया हो लिया जाता है.
Source: http://hi.hicow.com/स-चन-स-द-ध-त/स-च-र/स-च-र-स-द-ध-त-1407086.html

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कलम की विनम्रता और पत्रकारिता के संस्कार

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साल के दो महीने खास होते हैं जिनमें पहला महीना अप्रेल का होता है। इस महीने पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, पंडित माधवराव सप्रे और राजेन्द्र माथुर के नाम है तो दूसरा महीना मई का है। मई की पहली तारीख श्रमजीवियों के नाम है जिसे हम मजदूर दिवस के नाम पर जानते हैं। इसी महीने की तीन तारीख को प्रेस दिवस है और तीस मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। ये दोनों महीने बेहद अर्थवान हैं, खासकर पत्रकारिता के लिये। यहां मैं मीडिया षब्द से परहेज करने की कोषिष करूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि मीडिया का अर्थ पत्रकारिता से एकदम जुदा है।
बहरहाल, हम पत्रकारिता के संदर्भ में बात करेंगे। पत्रकारिता के संदर्भ में दो बातें हैं कि इन दोनों महीनों की तारीख पत्रकारिता के पुरोधाओं से जुड़ी हुई है और इन तारीखों का सीधा संबंध कलम से है। मेरी बातें उलझी उलझी लग सकती हैं किन्तु इस पर जब विस्तार से लिखी गयी मेरी बातों को पढ़ेंगे, मनन करेंगे तो षायद आप भी मुझसे सहमत होंगे। दादा माखनलाल की विष्व प्रसिद्व रचना है पुश्प की अभिलाशा। इस कविता में उन्होंने फूल की विन्रमता का बखान किया है और इससे जुड़ी बात कलम की मैं कहता हूं। कलम भी आपको विनम्रता सिखाती है। आप देखेंगे कि आमतौर पर कलम नीचे की तरफ होती है अर्थात वह विनम्र है। पत्रकारिता भी विनम्रता सिखाती है और विनम्र पत्रकारिता ही दुनिया बदलने की ताकत रखती है। तलवार नीचे की तरफ होगी तो वह भीरूपन का परिचायक होगी किन्तु कलम ऊपर की तरफ होगी तो उसकी अकड़ दिखेगी। क्या कलम अकड़ दिखा सकती है? नहीं, कभी नहीं। कलम की प्रकृति रचने की है, सिखाने की है और रचियता हमेषा विनम्र होता है। जो लोग आस्तिक नहीं हैं वे भी इस बात को मानेंगे कि ईष्वर, अल्लाह, ईषु, गुरूनानक किसी ने भी, कहीं भी विनयषील व्यवहार के अलावा कोई सीख नहीं दी है। जब हम यह मानते हैं कि कलम विन्रम है तो भला हममें विनम्रता क्यों नहीं आना चाहिए। पत्रकारिता का दायित्व समाज के किसी भी दायित्व से बड़ा है। दूसरे दायित्व कम नहीं हो सकते हैं किन्तु उनमें कहीं न कहीं, लाभ की लालसा बनी होती है किन्तु पत्रकारिता में लाभ का कोई लोभ नहीं होता है। पत्रकारिता सहज रूप् से एक सुंदर, विचारवान और विकसित समाज की रचना करने की कोषिष है। कुछ लोग इस बात को हजम नहीं कर पाएंगे कि आज जब चौतरफा पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात चल रही है, कदाचित प्रमाणित भी हो चुकी है तब मेरा यह कहना केवल काल्पनिक बातें हो सकती हैं। मेरा उन सभी लोगों से आग्रह है कि वे इसे दूसरी नजर से देखें। पत्रकारिता तो आज भी नफा-नुकसान से परे है। आप एक पत्रकार हैं तो आप खबर लिखते हैं समाज के लिये किन्तु जिस कागज पर खबर छपती है वह वस्तु है और वस्तु का सौदा होता है। आपकी लिखी खबर षब्द सत्ता है और इसकी कोई कीमत नहीं होती है। पत्रकार का लाभ इतना ही होता है कि उसे जीवनयापन के लिये वेतन के रूप् में कुछ हजार रुपये मिल जाते हैं। यदि आप और हम पत्रकार नहीं भी होते तो किसी और व्यवसाय में भी यही करते। संभवतः इसलिये ही हमें श्रमजीवि कहा जाता है क्योंकि श्रम ही हमारे जीवन का आधार है। हम सरस्वती के उपासक हैं और हमारी उपासना का माध्यम हमारी कलम है। इस कलम की विन्रमता देखिये कि यदि इसे आप सीधा कर देते हैं तो यह लिखने का उपक्रम रोक देती है किन्तु जैसे ही यह झुकती है, वह नदी के पानी की तरह बहने लगती है। हमारे विचार और कलम की स्याही एक सुंदर अभिव्यक्ति का माध्यम बनते हैं। मेरा यह विचार महज एक लेख नहीं है बल्कि एक आग्रह है उस युवा पत्रकार पीढ़ी से जो इस महायज्ञ में षामिल तो हो गये हैं किन्तु उन्हे अपनी ताकत का अहसास नहीं है। वे हर समय भ्रम की स्थिति में रहते हैं। अच्छा लिखना जानते हैं, अच्छा सोचते हैं और अच्छा करने का जज्बा भी उनमें है किन्तु उन्हें इस बात का इल्म नहीं है  िकवे फकीरी के पेषे में आये हैं। वे लिखेंगे तो समाज और देष में षुचिता का निर्माण होगा और उनके इस लिखे से अखबार का मालिक कदाचित मालामाल बनेगा। षुचिता और माल के बीच हमारी नयी पीढी को तय करना होगा कि वे आखिर उनका रास्ता क्या हो? वे माल की तरफ भागें या समाज में षुचिता के लिये जो जवाबदारी उनके कंधों पर है, उसे पूरा करें। इस बात को लिखने में मुझे परहेज नहीं है कि हममे से अनेक दिग्गज पत्रकार भावी पीढ़ी में कलम का संस्कार उत्पन्न करने के बजाय कमाने की संस्कृति पैदा कर रहे हैं। भावी पत्रकारों को इस गफलत में नहीं पड़ना चाहिए। हमें महान पत्रकार दादा माखनलाल की पत्रकारिता को, गांधीजी की पत्रकारिता को स्मरण में रखकर कलम के संस्कार को आगे बढ़ाना है। झुकने का अर्थ समझौता नहीं है बल्कि यह विनम्रता है और पत्रकारिता विनम्रता की पहली सीढ़ी है। पत्रकारिता के अवधूतों के प्रसंग में जो बातें लिखी हैं, वह मेरी भावना है और मेरा विष्वास है कि कलम के संस्कार की  पत्रकारिता हमेषा अपनी आभा बिखरेते रहेगी।

  1. हेमंत जोशी



आजकल मीडिया ही मीडिया की खबर देता है। समाचारों में मीडिया से जुड़े समाचार पर्याप्त से कहीं ज्यादा मिल जाते हैं। लेकिन पिछले महीने दिल्ली के मेरिडियन होटल में चार दिन तक देश और विदेश के अनेक संचार विशेषज्ञ, मीडिया के अनेक संपादक और संचारकर्मी, बड़ी संख्या में मीडिया प्रशिक्षक और प्रशिक्षार्थी मीडिया, लोकतंत्र और प्रशासनजैसे गंभीर मुद्दे पर चर्चा करते रहे, लेकिन देश के अंग्रेजी या भारतीय भाषाओं के किसी अख़बार या टेलीविज़न चैनल ने विस्तार से इसके समाचार देने की परवाह नहीं की। कारण शायद यह भी है कि सामान्यत: ऐसी संगोष्ठियों के समाचार तब कुछ विस्तार से छपते हैं जब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, आदि उनका उद्घाटन करें। दुनिया भर में शायद यही रिवाज है।
अगर यह मान भी लें कि यही रिवायत है तो भी समाचार-पत्रों के संपादकीय पृष्ठों पर तो कुछ लेख ऐसे अवसरों पर दिख ही जाने चाहिए। कुछ विभिन्न सत्रों की रिपोर्टिंग भी हो जाए तो अनेक लोगों को इसका लाभ इसलिए भी मिल सकता है कि अब मीडिया केवल पत्रकारों और संचार विशेषज्ञों के जानने-समझने की चीज नहीं रह गया है। आम पढ़े-लिखे या जनतंत्र में भागीदारी करने वाले इंसान को भी इस तरह की सामग्री का लाभ मिलना चाहिए। एक तऱफ तो हम स्कूल के पाठ्यक्रम में मीडिया को एक विषय के तौर पर पढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं, दूसरी तरफ मीडिया के बारे में विभिन्न माध्यमों में केवल बेहद महत्वपूर्ण या उथली और सनसनीखेज ख़बरें ही लोगों को मिल पाती हैं।
भले ही लोकतंत्र और प्रशासन से मीडिया के संबंधों पर समाचार माध्यमों में गाहे-बगाहे लेख छपते रहते हैं, लेकिन देश-विदेश के विद्वानों के इस विषय में विचार जानने का मीडिया में दिलचस्पी रखने वाले नागरिकों के पास कोई साधन नहीं हैं। हा, पुस्तकालयों में उन्हें अनेक पुस्तकें मिल सकती हैं।
आजकल अगले सौ दिन में शिक्षा का स्वरूप बदलने को लेकर काफी अधिक शोर है। यशपाल समिति की रिपोर्ट आने के बाद शिक्षा में होने वाले संभावित परिवर्तनों के बारे में शिक्षा मंत्री के बयान आए हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण कदम 1986 में उठाया गया था। उस समय अंतिम दस्तावेज़ जारी किए जाने से पहले देश भर में अनेक संगोष्ठिया हुईं थी, अलग-अलग स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी ने सत्ता की कमान संभालते ही कुमारमंगलम बिड़ला और अनिल अंबानी के नेतृत्व में कुछ बुद्धिजीवियों से भविष्य की शिक्षा नीति पर दस्तावेज तैयार करवाया था। यहा इस बात का जिक्र इसलिए आवश्यक है कि हम जनतंत्र और प्रशासन के बीच की कड़ी को देख सकें और इस बात की भी जाच कर सकें कि इन दोनों को अधिक या कम जनतांत्रिक बनाने में मीडिया की क्या भूमिका होती है। जब देश में शिक्षा दिन-ब-दिन महगी होती जा रही है, शिक्षा का स्तर गिरता दिखाई पड़ रहा है और सरकार बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय, आई.आई.टी. और मेडिकल कॉलेज खोलने का निर्णय ले रही है, तब पुरानी संस्थाओं को समाप्त करके एक नई समेकित संस्था बनाने का विचार तो नेक है, लेकिन वह कहा तक व्यावहारिक है इस पर विचार करने की आवश्यकता है। किसी भी राष्ट्रीय स्तर के विमर्श में अधिकाधिक लोगों की भागीदारी मीडिया के बिना संभव नहीं है।
विश्व भर में आजकल सुशासन की जो अवधारणा बनी है, उसमें नागरिक समाज की भागीदारी पर विशेष जोर दिया जा रहा है। अनेक स्तरों पर देश-विदेश में स्वयंसेवी संगठन ऐसे कई काम कर रहे हैं, जो सरकारों को करने चाहिए। इसके अलावा अनेक संस्थाए एवं लोग विभिन्न सामाजिक मुद्दों की वकालत और प्रचार के काम में भी लगे हुए हैं। एक समय था, जब लॉबिंग करना अच्छा नहीं माना जाता था, लेकिन आजकल यह सकारात्मक काम माना जाने लगा है। सरकारें भी नीतियां बनाने के लिए संबंधित लोगों से व्यापक तौर पर विचार-विमर्श करती हैं। कई बार तो ऐसी नीतियों का जि सरकारें संचार माध्यमों के जरिए इसलिए भी करती हैं ताकि जनता के मूड़ को भापा जा सके।
इसके विपरीत सरकारों के कई निर्णयों पर जब जनाक्रोश उभर कर आता है तो मीडिया उस पर आम बहस का माहौल तैयार करता है, जिसके फलस्वरूप कई बार सरकारों को अपने निर्णय वापस लेने पड़ते हैं या उन पर फिर से विचार करने को बाध्य होना पड़ता है। आरक्षण का मुद्दा हो, कोल्ड ड्रिंक्स में जहरीले पदार्थो का मामला हो या हाल ही में समलैंगिक लोगों की आजादी का मसला हो, यह सभी जनतंत्र और प्रशासन में मीडिया की भूमिका को रेखांकित करते हैं। ऐसे माहौल में मीडिया शोध चुपचाप अकेले क्यों हो और लोगों को इसकी जानकारिया भी क्यों न मुहैया करवाई जाए? sabhar-hindustan

 

हरियल कबूतरों ने पक्षी विहार में बनाया बसेरा

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दिल्ली (ब्यूरो)। ग्रीन पिजन के समूह ने आज कल नोएडा का ओखला पक्षी विहार में डेरा डाला है। एक बरगद पेड़ पर करीब 150 कबूतर दिख रहे हैं। इन खूबसूरत कबूतरों को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी है। इस कबूतर के बारे में पक्षी विशेषज्ञ सालेम अली ने भी काफी लिखा है। पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि ये कबूतर यहां वसंत तक रहेंगे। हल्की गरमी पड़ते ही यहां से फुर्र हो जाएंगे।


ट्रेरोन साइनीकोप्टेरा को पीले पंजों वाले खूबसूरत हरे कबूतर (हरियल) के नाम से भी जाना जाता है। फलों पर निर्भर रहने वाले हरे कबूतरों का इन दिनों डेरा नोएडा का ओखला पक्षी विहार बना हुआ है। करीब सवा सौ की संख्या में हरियल कबूतर पक्षी विहार में स्थित बरगद के पेड़ पर डेरा डाले हुए हैं। ओखला पक्षी विहार में खूबसूरत कबूतरों के अजब रंग को देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक आ रहे हैं। इनकी खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद करने की ललक इन पर्यटकों को ओखला पक्षी विहार खींच ला रही है। हालांकि, अपने रंग के अनुरूप यह बरगद के विशालकाय पेड़ के पत्तों पर कुछ इस तरह घुल मिल जाते हैं कि इनको देखना आसान नहीं होता।


हरियलमहाराष्ट्र का स्टेट बर्ड है। ओखला पक्षी विहार के रेंजर जीएम बनर्जी ने बताया कि कई अलग-अलग प्रजातियों के होते हैं और फलों को अपना आहार बनाते हैं। बरगद के पेड़ पर निकलने वाले लाल रंग का फल (गूलर) इनका विशेष आहार है। रेंजर ने बताया कि इस वर्ष यह पक्षी बड़ी संख्या में ओखला पक्षी विहार पहुंचे हैं। आमतौर पर नीले कबूतरों के स्थान पर हरे कबूतरों का दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में दिखना अपवाद है। हरियल घने जंगलों में एकदम सुबह के समय पेड़ की टहनियों में बैठे दिखाई देते हैं। इन कबूतरों के मार्च के अंत तक पक्षी विहार में रहने का अनुमान है।


रेंजर बनर्जी ने बताया कि हरियल कबूतर ओखला पक्षी विहार में सुरक्षित रूप से अंडे देने आए हैं। यह जनवरी में अंडे देते हैं। 21 से 25 दिनों के बीच में अंडे में से बच्चे निकल आते हैं। इस दौरान नर कबूतर खाने और अन्य इंतजाम रखता है और घोंसले के पास हमेशा बना रहता है। वहीं, मादा कबूतर घोंसला छोड़कर नहीं जाती है। लगभग दो महीने या मार्च तक ये बच्चे घोंसले से निकलकर उड़ने के काबिल हो जाएंगे।

सत्ता पलट की संभावनाओं के बीच मीरा जाएंगी पाक

दिल्ली (ब्यूरो)। पाकिस्तान में तख्ता पलट की संभावनाओं के बीच पड़ोसी देश में लोकतंत्र की बयार के लिए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार पहली बार पाक दौरे पर जा रही हैं। 21 फरवरी से शुरू हो रहे पांच दिवसीय पाकिस्तानी दौरे में वह देश की आंतरिक राजनीति पर भी चर्चा करेंगी कि कैसे यहां लोकतंत्र की नींव को मजबूत किया जाए।


यह महज संयोग ही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में इस वक्त महिला स्पीकर हैं। और दोनों ही स्पीकरों में रिश्ते भी काफी मधुर हैं। मीरा कुमार को पाकिस्तान दौरे का न्योता मार्च 2011 में प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने भारत यात्रा के दौरान दिया था। वैसे भारत की लोकसभा अध्यक्ष भले ही पहली बार पाकिस्तान जा रही हों, लेकिन पाकिस्तान की नेशनल असेंबली स्पीकर फहमीदा मिर्जा 2010 में भारत आ चुकी हैं। कॉमनवेल्थ देशों के पीठासीन अधिकारियों की बैठक में मिर्जा भारत आई थी। इतना ही नहीं गत वर्ष त्रिनिदाद-टोबेगो में गत वर्ष आयोजित कॉमनवेल्थ देशों के संसदीय अधिकारियों के कार्यक्रम में भी मीरा कुमार और फहमीदा मिर्जा की मुलाकात हुई थी।


उधर, रक्षा मंत्री रक्षा मंत्री ए के एंटनी की अगुवाई में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल सउदी अरब के सोमवार को रवाना हो गया। यह प्रतिनिधिमंडल द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मुद्दों, खास कर रक्षा क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर सउदी अरब में अपने समकक्षों के साथ विचार विमर्श करेगा।


एंटनी आज सउदी अरब के रक्षा मंत्री शहजादा सलमान से मुलाकात करेंगे। उनके साथ रक्षा सचिव शशि के शर्मा, सेना उप प्रमुख एस के सिंह, नौसेना उप प्रमुख वाइस एडमिरल सतीश सोनी और एयर वाइस मार्शल एम आर पवार भी रहेंगे।

 

पीओके की विवादित जगह चीन को दे सकता है पाक

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वाशिंगटन। पड़ोसी देश पाकिस्‍तान और चीन अब सीधे तौर पर दबंगई पर उतर आए हैं। ची और पाकिस्‍तान ने भारत को घेरने की रणनीति बनाई है। जिसके लिए पाकिस्‍तान ने कश्‍मीर की अपने कब्‍जे की गिलगित-बाल्टिस्‍तान की 72,971 वर्ग किलोमीटर की विवादास्‍पद जगह को चीन को 50 साल के लिए लीस पर देने की रणनीति बनाई है।


यह रिपोर्ट मिडिल ईस्‍ट मीडिया रिसर्च इंस्‍टीट्यूट ने जारी की है। जिसके लिए उसने इस क्षेत्र के उर्दू अखबारों में छपी खबरों का हवाला दिया है। गौरतलब है कि पाकिस्‍तानी सेना के प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कियानी चीन के दौरे पर गए थे। उसी दौरान दोनों देशों ने मिलकर इस रणनीति को अंजाम दिया था।


पाकिस्‍तान और चीन की यह रणनीति भारत के लिए चिंता का कारण हो सकती है। दोनों देश मिलकर इस क्षेत्र में विकास के बहाने हथियारों का जखीरा तैयार कर सकते हैं। इस तरीके से चीन भारत को घेरने में भी कामयाब हो सकता है। पाकिस्‍तान इस क्षेत्र को लीज पर देने के पीछे विकास का बहाना बना रहा है।

गौरेया के लिए मुसीबत बन चुकीं ऊंची इमारतें

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दिल्ली (ब्यूरो)। देश के सभी शहर कबूतरों के लिए आश्रय स्थल बनते जा रहे हैं। दूसरी ओर यह गौरेया के लिए मुसीबत बन गए हैं। नतीजा है कि गौरैया कम होती जा रही है और कबूतर अपनी आबादी बढ़ाने में कामयाब हो रहे हैं। ऊंची इमारतों में गौरेया नहीं रह सकती जबकि कबूतरों को ऊंचे मकान ही पसंद हैं। लगातार सिकुड़ती हरियाली और भोजन की कमी से गौरेया भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के महानगरों से गायब होती जा रही है। शहरों में छोटे मकानों की जगह गगनचुंबी इमारतें बढ़ने से गौरेया की जगह लगातार कबूतर लेते जा रहे हैं।


केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय भी मानता है कि देशभर में गौरेया की संख्या में कमी आ रही है। देश में मौजूद पक्षियों की 1200 प्रजातियों में से 87 संकटग्रस्त की सूची में शामिल हैं। हालांकि बर्ड लाइफ इंटरनेशनल ने गौरेया (पासेर डोमेस्टिक) को अभी संकटग्रस्त पक्षियों की सूची में शामिल नहीं किया है, लेकिन सलीम अली पक्षी विज्ञान केंद्र कोयंबटूर और प्राकृतिक विज्ञान केंद्र मुंबई समेत विभिन्न संगठनों के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि इनकी तादाद लगातार घट रही है। केंद्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय के एक अफसर का कहना था कि जैसे-जैसे शहरों में छोटे-छोटे मकानों की जगह ऊंची इमारतें लेती जाएंगी, गौरेया की जगह कबूतर बढ़ेंगे। ऊंची इमारतों में गौरेया नहीं रह सकती जबकि कबूतरों को ऊंचे मकान ही पसंद हैं।


गौरेया और कबूतर उन पक्षियों में हैं जो मनुष्य के आसपास आसानी से रह सकते हैं। खास बात यह है कि गौरेया को ज्यादातर लोग पसंद करते हैं जबकि कबूतर को भगाना चाहते हैं। पक्षी प्रेमी संगठनों के अध्ययन महानगरों में गौरेया की संख्या में कमी आने के कई कारण गिनाते हैं। प्रदूषण और शहरीकरण को इसका प्रमुख कारण माना गया है। इसके अलावा गौरेया के रहने व घोेंसले बनाने की जगह लगातार घट रही है। छोटे मकानों में तो उन्हें ठिकाना मिल जाता था, लेकिन ऊंची इमारतों में नहीं मिल पा रहा। खेती खत्म होने व शहरों में रहन-सहन की शैली बदलने से उन्हें भोजन नहीं मिल पा रहा है। खास बात यह है कि गौरेया के संरक्षण को लेकर 20 मार्च को विश्व घरेलू गौरेया दिवस मनाया जाता है लेकिन इसके बावजूद इस पक्षी पर संकट कायम है। पूरी दुनिया में गौरेया का यही हाल है। ब्रिटेन में तो ज्यादातर गौरेया अब गायब हो चुकी हैं।

 

आखिर प्रियंका के बच्चे क्यो बनें सेन्टर ऑफ अटरैक्शन?



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अंकुर शर्मा
कांग्रेस की स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी जब भी यूपी की सरजमीं पर कदम रखती हैं तो वो मीडिया और लोगों के लिए चर्चा का विषय बन जाती हैं। लोग उनके बोलने से लेकर चलने-फिरने, उठने-बैठने से लेकर हर चीज में दिलचस्पी दिखाते हैं। इसीलिए प्रियंका गांधी ने क्या कहा, इस बारे में कहने से पहले कहा जाता है कि प्रियंका गांधी ने अपनी दादी इंदिरा जी की साड़ी पहनकर यह बयान दिया।


लेकिन उसी प्रियंका गांधी ने गुरूवार को लोगों को बात करने का दूसरा टॉपिक दे दिया और वो है उनके क्यूट बच्चे। अपने दोनों बच्चों रिहान और मिराया के साथ वो रायबरेली के मंच पर नजर आयीं। जिसके बाद से सेन्टर ऑफ अटरैक्शन उनके बच्चे बन गये। चैनल वाले प्रियंका औऱ प्रियंका के बयान को छोड़कर उनके बच्चों की ओर मुड़ गये। लोगों की नजर में भी गांधी परिवार की छठीं पीढ़ी मंच पर खड़ी थी। टीवी स्‍क्रीन पर मोतीलाल नेहरू से लेकर प्रियंका गांधी वाड्रा तक सारे रिश्ते गिना दिये गये। और तो और सियासी दलों ने भी प्रियंका के बच्चों को लेकर बयानबाजी शुरू कर दी।


जहां कांग्रेसी, प्रियंका के बच्चों के लिए बोल रहे थे, कि वो गांव देखने आये हैं और अपनी मम्मी के साथ वो भी देश को करीब से देख रहे हैं, तो वहीं विरोधियों का कहना था कि प्रियंका देश की बदहाली अपने बच्चों को दिखा रही हैं। जिस तरह से पर्यटक नेशनल पार्क में बच्चों को बाघ दिखाने ले जाते हैं, अंडमान में लोग आदिवासियों को देखने जाते है, उसी तरह प्रियंका भी अपने बच्चों को उत्तरप्रदेश में गरीबों और गरीबी दिखाने आयी हैं और उनको बता रही है कि जो आपको सत्ता का सुख देते हैं, वो ऐसे रहते हैं। वो अपने बच्चों के साथ मिलकर जनता का मजाक उड़ा रही हैं।


लेकिन सोचने वाली बात यह है कि हम स्वतंत्र देश के बाशिंदे हैं, हर किसी को अधिकार है कि वो अपने बच्चों के साथ कहीं भी जाये। प्रियंका गांधी ने भी तो वो ही किया तो फिर इस तरह की बातें क्यों शुरू हो गयी?


लोग चुनावी रैली में अपने पूरे परिवार, दोस्तों के साथ घूम रहे हैं। चाहे वो सपा नेता मुलायम सिंह का परिवार हो या फिर भाजपा नेताओं की फैमिली। चुनाव प्रचार में हर परिवार,हर रिश्ता अपनों के लिए वोट मांग रहा है लेकिन कहीं कोई जिक्र नहीं होता तो फिर आखिर प्रियंका गांधी वाड्रा में ऐसे कौन से सुरखाब के पर लगे हैं जो चर्चा का विषय बन जाते हैं।


कभी उनके पति राबर्ट वाड्रा की बात होती है तो कभी उनके मासूम बच्चों की। गौर करने वाली बात यह है कि प्रियंका गांधी के चुनावी मंच पर उनके बच्चे जरूर थे, लेकिन उन्होंने मंच से भाषण में कहीं भी अपने परिवार और बच्चों का जिक्र नहीं किया। उनकी बातों में केवल कांग्रेस की ही बात थी, जिसके लिए वो कह रही थीं कि अगर प्रदेश में तरक्की चाहिए तो कांग्रेस को वोट कीजिये। अपने भाई राहुल और मां सोनिया का जिक्र भी देश और प्रदेश के कामों के लिए उन्होंने किया ना कि अपने पर्सनल रिश्तो को वो बताने के लिए चुनावी मंच पर खड़ी थीं। तो फिर प्रियंका के बच्चों पर इतना बवाल और चर्चा क्यों? अब जवाब आप दीजिये।

 

 

संचार सिद्धांत

हालांकि मनुष्य हमेशा कोई रास्ता या किसी अन्य रूप में संप्रेषित किया है, यह कुछ समय ले लिया से पहले ही संचार विश्लेषण किया गया. बीसवीं सदी में, लोगों को तीव्रता के साथ संचार की प्रक्रिया का अध्ययन करने लगे. समय के साथ, इस अध्ययन संचार सिद्धांत के रूप में जाना गया. क्योंकि संचार मानवीय अनुभव के लिए केंद्रीय है, यह संचार सिद्धांत का अध्ययन करने के लिए मुख्य ध्यान केंद्रित है.
संचार कार्यों के जैकबसन सिद्धांत
1980 में S.F., स्कुद्दर "यूनिवर्सल संचार कानून," जो कहा गया है कि "सभी जीवित संस्थाओं, प्राणी और जीव लगता है, प्रतिक्रियाओं, शारीरिक मुद्रा, आंदोलन, इशारों, भाषा, आदि के माध्यम से संवाद" निर्धारित इसके अलावा, स्कुद्दर अर्थ है कि संचार अक्सर जीवित रहने के एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया है, जैसे जब पोषण के लिए एक बच्चा रोता है, या एक संयंत्र परिवर्तन पानी की कमी के कारण रंग.
संचार सिद्धांत कई अलग अलग दृष्टिकोण के माध्यम से जांच की है. "मनोवैज्ञानिक" दृष्टिकोण चलता इंसान के बीच संचार विचारों और भावनाओं को रिसीवर के माध्यम से निर्धारित किया जाता है के बाद वह संदेश वह प्राप्त हुआ है व्याख्या की है कि. जैसे, अगर वक्ता रिसीवर है कि उसके घर में आग लगी है बताती है, रिसीवर तब झटका आतंक, लगता है, हो सकता है और होना करने के लिए प्रतिक्रिया का कारण बना. कैसे रिसीवर में इस बिंदु पर मानना ​​वास्तविक "संचार" हो रही है.


दूसरे छोर पर, "यंत्रवत" दृष्टिकोण एक संदेश की "" सही लेन - देन मानती है. यही है, वक्ता रिले रिसीवर को जानकारी है, और रिसीवर सुनता है और प्राप्त उससे बात की जानकारी. संचार का यह दृश्य है रिसीवर भावनाओं या विचारों की कोई भावना का चित्रण है, लेकिन बोलने और सुनने की शारीरिक कृत्यों पर ही केंद्रित है.
इसके अतिरिक्त, एक संदेश की जांच करने के लिए और यह कैसे पुनः व्याख्या की है, क्योंकि यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के लिए यात्रा एक संचार सिद्धांत के "व्यवस्थित" देख रहे हैं. यह समझता है कितना या कैसे छोटे संदेश बदल गया है के लिए, और संभावित कारण क्या किये गये हैं. अगले, एक से अधिक लोगों को बिजली और उत्पीड़न का उपयोग करने के हावी के साथ 'क्रिटिकल' संचार सौदों के दृश्य.
संचार सिद्धांत के "सामाजिक Constructionist" देखने के प्रेषक और अर्थ बनाने के लिए रिसीवर के बीच दृष्टिकोणों का आदान परख होती है. यह मानता है कि "कैसे" तुम कुछ कहना निर्धारित करता है क्या संदेश है. इसके अलावा, सामाजिक Constructionist सहूलियत से, "सच" और "विचारों" का आविष्कार कर रहे हैं. रॉबर्ट टी. क्रेग व्यक्त किया है कि constructionist दृष्टिकोण है "चल." इस वजह से, वह भी मानना ​​है कि हमारे व्यक्तिगत बन पहचान "का गठन और सुधार" इस ​​विशेष सिद्धांत के माध्यम से.
Constructionist गिनती के विरोध में, "संक्रमण" मॉडल बनाता है कि "ख़तम" संचार प्राथमिकता है. यह एक कंप्यूटर की तरह या रोबोट विधि में संचार comprehends. यह मनुष्य के बीच विचार और विचारों के संपर्क में नहीं स्वाद के रूप में Constructionist दृष्टिकोण नहीं करता है. यह तथ्यात्मक और लोगों के बीच जानकारी डाटा भेजने के सरल कार्य पर ध्यान केंद्रित करके मानव संचार के स्वभाव oversimplify प्रकट होता है.
संचार सिद्धांत के अध्ययन के अपेक्षाकृत युवा है और यह दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान के क्षेत्रों के साथ पाठ्यक्रम पार, और समाजशास्त्र. कि अंत करने के लिए, इस अध्ययन के इन क्षेत्रों के बीच एक आम सहमति अभी तक अवधारणा हो.

संचार सिद्धांत



संचार सिद्धांत
संचार कार्यों के जैकबसन सिद्धांत
करके संचार सिद्धांत हम इस तरह एक व्यक्ति जो संचार में एक ही रास्ता या दो तरीके या सतत प्रक्रिया माना जाता है मतलब है. संदेश रिसीवर के लिए विभिन्न तरीकों के माध्यम से रिसीवर तक पहुँचता है. संचार एक ऐसे विषय है जो में बदलाव दैनिक होते है. विषय - वस्तु, मध्यम, संचार की प्रक्रिया की जरूरत है और संचार और व्यापार गतिविधियों के आधुनिक साधनों के विस्तार के अनुसार विकसित की है. संचार प्रक्रिया में एक ही मूल और प्रमुख सिद्धांतों पर निर्भर करता है. प्रमुख प्रिंसिपल सिद्धांत इस प्रकार हैं: -
सूचना सिद्धांत
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संचार के इस सिद्धांत Shanan द्वारा 1750 में तैयार की गई थी और उसके बाद मिलर और Fick इस पर विकसित की है. इस सिद्धांत को भी एस सांड की आंख को सिद्धांत या shanan सिद्धांत कहा जाता है. संचरण की इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के बढ़ते उपयोग के साथ इस सिद्धांत प्रतिपादित कर ली.
संचार की सूचना सिद्धांत वर्णित विशेषताओं के नीचे है: -
संचार की प्रक्रिया रैखिक है.
इस प्रणाली के आधार पर काम परिणाम पर निर्भर करता है.
संचार एक तरह से एक गतिविधि है.
संचार संदेश के तहत हस्ताक्षर या आवक फार्म के रूप में दिया जाता है.
संचार कंप्यूटर, साइबर आदि दुनिया की तरह यांत्रिक उपकरणों द्वारा भेजा जा सकता है
इस जानकारी के सिद्धांत संचार में संदेश भेजने वाले की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस सिद्धांत संचार में एक तरह से एक सिद्धांत के रूप में लिया गया है. इसलिए प्रेषक एक स्पष्ट और सही संदेश दे दो ताकि रिसीवर सही अर्थ समझ सकते हैं चाहिए. यह इस सिद्धांत रूप में माना जाता है कि दोनों प्रेषक और रिसीवर के संदेश के संकेत और भाषा समझ सकता हूँ.
इंटरेक्शन संचार के सिद्धांत
संचार का यह सिद्धांत भी गोल या परिपत्र सिद्धांत कहा जाता है. संचार की प्रक्रिया में इस सिद्धांत के अनुसार वहाँ की जानकारी, विचारों, भावनाओं, और प्रेषक और रिसीवर के बीच संदेशों की एक सतत मुद्रा है. इस सिद्धांत में प्रतिक्रिया करने की प्रक्रिया संचार के अंतर्गत शामिल हो गया.
सहभागिता के सिद्धांत के संघटक
संचार के काम की बातचीत के सिद्धांत के तहत एक संगठित प्रक्रिया घटकों के भागों जिसका इस प्रकार हैं में चला जाता है: -
संदेश, एक विचार या जानकारी का जन्म.
संदेश या प्रेषक के दाता.
संदेश की भावना अंतर्निहित.
संचार के रास्ते.
मतलब या संचार का माध्यम.
संदेश का रिसीवर.
समझौता संदेश या कार्यान्वयन के ऊपर विचार रिसीवर द्वारा संदेश के अर्थ.
वापस फ़ीड.
संचार के इस सिद्धांत को एक पूरा सिद्धांत है. इसमें दोनों प्रेषक और रिसीवर सतर्क रहते हैं. इसके अंतर्गत संचार के लिए दो तरह की प्रक्रिया हो लिया जाता है. इसका अर्थ समझ पर संदेश का रिसीवर इस पर उसकी प्रतिक्रिया देता है.
आधुनिक युग में इस सिद्धांत का महत्व तेजी से प्रबंधन के क्षेत्र में बढ़ रही है, क्योंकि एक संदेश भेजा पर प्रतिक्रिया प्राप्त कर सकते हैं, और अगर यह किसी भी संदेह या विसंगति बनी हुई है यह हटाया जा सकता है.
संचार के लेनदेन थ्योरी
संचार के इस सिद्धांत की जानकारी का निरंतर आदान प्रदान पर आधारित है या देना और इस प्रक्रिया को ले लो. इस सिद्धांत संचार के अनुसार एक लगातार प्रक्रिया चल रही है. इसमें प्रेषक और रिसीवर दोनों एक आम रूप है और परस्पर विनिमय जानकारी के प्रतिभागी हैं. इस सिद्धांत के घटक इस प्रकार हैं: -
संदेश
प्रेषक
संदेश का अर्थ अंतर्निहित.
रास्ता
मध्यम
रिसीवर
अंतर्निहित अर्थ को समझना.
व्यवहार में परिवर्तन.
प्रति संभरण
संचार के इस सिद्धांत के लक्षण हैं: -
) 1 संचार प्रेषक और रिसीवर के बीच लगातार जा रहा पर रहता है.
) 2 दोनों संचार में पार्टियों के कारण और परिणाम से प्रभावित हैं,
) 3 संचार में हर क्रिया एक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है.
) 4 संचार संदेश की एक पुल का उपयोग करता है यह एक तार्किक निष्कर्ष तक ले आओ.
इस रास्ते में संचार के विभिन्न सिद्धांतों प्रचलित हैं. इन संचार की बातचीत के सिद्धांत का उपयोग करने में अधिक है क्योंकि यह में संचार के लिए एक तरह से दो प्रक्रिया हो लिया जाता है.
Source: http://hi.hicow.com/स-चन-स-द-ध-त/स-च-र/स-च-र-स-द-ध-त-1407086.html

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