गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

मीडिया में दलितों की भागीदारी



02102012
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कला-साहित्य/समीक्षा/मीडिया


सामाजिक बदलावों को सबसे ज्यादा अगर कोई सहारा दे सकता है वो है मीडिया. पर क्या आज मीडिया इस तरफ कोई काम कर रहा है? इसका जवाब कैसे मिले. आज सारे मीडिया घरानें सिर्फ पैसा बनानें में लगे है. इसमें कोई भी समाज के सकारात्मक बदलाव के बारे नही सोच रहा है. राष्ट्रीय आंदोलन और पत्रकारिता, खासकर भाषाई पत्रकारिता का रिश्ता तो ज्यादा ही गहरा रहा है. अब निश्चित रूप से पत्रकारिता में कैरियर और कमाई वालों का अनुपात बढ़ा है. पत्रकारिता भी बदली है. बाजार का प्रभाव और इस पर निर्भरता भी बढ़ी है. लेकिन इन सब ने समाज में बदलाव के लिए काफी कुछ किया है.
लोकतंत्र और बाजार के साथ मिलकर पत्रकारिता ने सामाजिक बदलाव में बड़ी भूमिका निभाई है. हम सब अपनें-अपनें अनुभवों के आधार पर कह सकतें है कि हमारे होश संभालनें से लेकर आज तक में काफी अंतर आ चुका है. और ज्यादातर बदलाव सकारात्मक है.
मीडिया का शोध छात्र होने के नाते यह दावा करना सुखद लगता है कि सकारात्मक बदलाव लाने में मीडिया की भी भूमिका रही है. और इधर समाज में जिन चीजों का महत्व और सम्मान बढ़ा है, उनमें मीडिया भी एक है. यहां मैं न तो मीडिया की और न ही लोकतंत्र की कमजोरियों की अनदेखी कर रहा हूं, न अपने समाज में अभी भी मौजूद गड़बड़ियों की. इन गडबड़ियों में जिस एक ने हाल में सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है, वह है दलितों की स्थिति. दलितों की आवाज सबसे आगे है. अभी आदिवासियों की आवाज सुनाई ही नही दे रही है. दलितों में यह चेतना क्यों और कैसे विकसित हुई है, इस विवरण में जाने की जरूरत नही है. लेकिन निश्चित रूप से यह एक बहुत ही मुश्किल और कष्टप्रद प्रक्रिया रही है. यह कहनें में भी कोई हर्ज नहीं है कि इसे बाहरी व्यवस्थाओं या समूहों से कम ही मदद मिली है. उल्टे उसे काफी सारी परेशानियां ही उठानी पड़ी है. आज अगर हम दलितों के समूहों से आने वाली आवाजों पर गौर करें तो पाएंगे की उन्हें लोकतंत्र और संविधान से बनी व्यवस्थाओं से जितनी शिकायतें हैं, उनमें कहीं ज्यादा शिकायतें मीडिया से है. आज के मीडिया में ही नहीं बल्कि अभी तक चली पत्रकारिता में जो कमियां रही है. उनमें कमजोर जमातों की आवाज को उनके असली हक के हिसाब से जगह नहीं दी जा रही है. आज मीडिया पर बाजार की मजबूत होती पकड़ के कारण दलित, पिछड़े समेत सारे कमजोर समूहों को सही जगह दे पाना ज्यादा मुश्किल होने लगा है. यह स्थिति जल्दी बदलेगी इसकी गुंजाइश कम ही दिखती है.
यह स्थिति तब है जब भाषाई मीडिया, खासकर हिन्दी मीडिया की पैठ जिन मामलों, जिन जमातों में सबसे तेजी से हो रही है, और जहॉं उसके विस्तार की सबसे ज्यादा गुंजाइश दिखती है वह दलित और कमजोर वर्गो का ही है. इन्ही में साक्षरता दर तेजी से बढ़ रही है, इन्ही में पढ़ने की ललक और सीखने की ललक ज्यादा दिखाई पड़ती है. इनमें ही राजनैतिक-सामाजिक चेतना का विस्फोट सा हुआ है. बीते दो-ढाई दशक में पूरे मुल्क में, खासतौर पर हिन्दी भाषी इलाके में जो बड़ा बदलाव दिखता है, उसके अगुवा दलित और पिछड़े ही है. अब यह हिन्दी क्षेत्र की सामाजिक संरचना की ताकत का लचीलापन भी है जिसमें इतने बडे़ बदलाव बहुत आसानी से हो गये. हजारों साल के इतिहास में ऐसे बडे़ सामाजिक-राजनैतिक बदलाव इतनी आसानी से नही हुए है.
आज दलितों-कमजोरों, दूर-दराज के गॉंवों में रहने वालों तक खबरों को पहुंचाने की व्यवस्था बाजार की मदद के बिना संभव भी न थी. बल्कि जिस लोकतान्त्रिक बदलाव की चर्चा ऊपर की गई है, उसमें मीडिया की भूमिका ने तभी बड़ा रंग-रूप लिया है, जब बाजार खुल कर उसके साथ आया है. जाहिर है कुछ बीमारियां काफी बड़ी पुरानी और गहरी है. उनमें जाति व्यवस्था सबसे बड़ी है मीडिया पर उच्च जातियों के कब्जे से ज्यादा गड़बड़ हुई है. एक मामला तो मिल्कियत और विज्ञापन के जरिये मीडिया पर कब्जे का है, और हम उसमें यह उम्मीद भी नही कर सकते है कि दलित या कोई भी कमजोर जमात ज्यादा बड़ी भूमिका निभा सकती है. उसके पास न तो इतनी विशाल पूंजी है, न व्यवसाय का हुनर है. उसने न तो ऐसा काम किया है, न आगे कर सकता है और न ही वह भविष्य में प्रभावी होने की उम्मीद है. बल्कि दलित जातियों के लोग जिन कामों के कौशल में आगे रहे है और पीढ़ियों से जो काम करते आये है उसमें भी सारा बड़ा व्यवसाय बड़ी जातियों के लोगों ने समेट लिया है. जूते बनाने जैसे कामों को हम इस श्रेणी में रख सकते है. लेकिन यह बड़ा मसला नहीं है. मीडिया या कोई व्यवसाय सिर्फ अपने मालिकों या शेयरधारकों के लिए नही चलता. उसमें दर्शक-पाठक लेखक-प्रोड्यूसर जैसे लोगों की भूमिका रहती है. दलित जमातों को इन दोनों ही स्तरों पर अपनी उपेक्षा की शिकायत रही है जो एकदम वाजिब है.
विषय के तौर पर भी दलित से जुड़े मुद्दे मीडिया में जगह नही पाते है और मीडियाकर्मियों में दलितों की हिस्सेदारी नहीं होती है. पिछले दिनों उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के फैसले के बाद मीडिया के ब्राह्मणवादी व्यवहार को देखकर योगेन्द्र यादव, अनिल चमड़िया और जितेन्द्र कुमार जैसे पत्रकारों-शोधकर्ताओं ने जो एक अध्ययन किया (जो 37 मीडिया संस्थानों के प्रमुख पदों पर विराजमान 315 लोगों से संबंधित था) किया जिसमें स्पष्ट होता है उच्च पदों पर 71 फीसदी उच्च जाति सवर्ण काबिज है, जबकि आबादी में उनका हिस्सा मात्र आठ फीसदी है. इन 315 लोगों में एक भी दलित या आदिवासी नही था. यह बात पहले हुए अध्ययनों से भी जाहिर होती रही है. 1996 में अमेरिकी समाचारपत्र वाशिंगटन पोस्ट के नई दिल्ली ब्यूरो प्रमुख कैनेथ कूपर ने जो शोध किया उसमें पाया गया कि भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकारों में एक भी दलित नहीं है. पत्रकार अनिल चमड़िया ने 1995 में बिहार में ऐसा एक सर्वेक्षण किया था तब उन्हे मात्र एक दलित पत्रकार मिला था- वह भी दूसरे राज्य का था और अपनी जातिगत पहचान छुपा कर काम करता था. जाहिर है कि अगर इतने कम पत्रकार हों या एकदम न हों तो खबरों का चुनाव जातिगत पूर्वाग्रह से प्रेरित होगा ही. श्योराज सिंह की किताब हिन्दी मीडिया में दलित उवाचश् या आज रोज इंटरनेट के माध्यम से दलितों से जुड़ी खबरें उपलब्ध कराने वाले ‘दलित मत’ जैसे साइट इस बात के हजारों उदाहरण देते हैं कि दलितों से जुड़ी खबरों का हमारा मीडिया क्या करता है. जो अपमान दलितों के अपनें गांव, कस्बे, दफ्तर या खेत- खलिहान में नहीं झेलना पड़ता है. जितना जातिवाद समाज, शासन और सरकारी कामकाज में है उससे ज्यादा मीडिया में है. मीडिया में खबर से लेकर मीडियाकर्मियों के चुनाव तक में – किसी में किसी भी तरह के आरक्षण की व्यवस्था नहीं हुई है. यह न तब हुई न आज हुई है. सरकारी मीडिया -दूरदर्शन और आकाशवाणी में संभव है कोई एकाध दलित ढंग के पद तक आया हो लेकिन उसकी भी खास चली हो यह नही कहा जा सकता. दलितों को प्रतिनिधित्व देने या उनकी खबरों को उचित जगह देनें में सरकारी मीडिया का रिकॉर्ड भी औरों से बेहतर है, यह नही कहा जा सकता.
बल्कि सामान्य प्रेस में ही आजादी की लड़ाई के दौरान सुधारवादी कोशिशें हुई. उसी के तहत सरस्वती के सम्पादक देवीदत्त शुक्ल जैसे लोगों ने अपने एक दलित कर्मचारी के साथ कुर्सी पर चाय पीते हुए तस्वीर खिंचाकर यह बताने की कोशिश भी की कि वे जात-पात नहीं मानते. कांग्रेसी राज में भी गांधीवादी कर्मकाण्ड की तरह हरिजन-हरिजन का मंत्र उचारनें जैसा काम मीडिया में कभी-कभार दिखता है. हीरा डोम कौन थे, पता नही पर उनकी कविता सरस्वती में छपी थी. स्पष्ट है कि सिर्फ सुधारवादी दिखावों और कर्मकांडों से काम नहीं चलेगा. यही भी हद तक साफ है कि उनकी तुलना में कानूनी प्रावधानों वाली बात ज्यादा प्रभावी है क्योंकि उसके बगैर तो दलितों के लिए प्रवेश निषेध का बोर्ड हर मीडिया संस्थान में लगा ही रहेगा. जब दलित आएंगे नही तो उनके मामलों की सुनवाई दूसरों की कृपा के भरोसे नही हो सकती है. बल्कि सुधारवादी उत्साह भी सामाजिक आंदोलनों के मरने और मीडिया पर बाजार की पकड़ बढ़ते जाने के साथ मरता गया और आगे ज्यादा कमजोर होगा. इसलिए नियुक्तियों के लिए साफ कानूनी प्रावधान बने- मीडिया के लिए ही नही अपने अनुभव में जो कुछेक दलित पत्रकारों का कामकाज और आचरण जानने का अवसर मिला वे किसी द्विज से कम हों यह नही कहा जा सकता- न प्रतिभा में, न बदमाशियों में, न कैरियर की होड़ में- भले ही उनकी सफलता का प्रतिशत कम हो. एक विश्वविद्यालय के दाखिले, अध्यापन और परीक्षक होने के अनुभव बताना जरूरी है. दाखिले के समय कोई भी दलित छात्र बिना आरक्षण के नहीं आ पाता. लेकिन साल-दो साल पढ़ने के बाद ही जब वह परीक्षा देता है तो परीक्षक के रूप में मुझे शायद ही ऐसा कोई फर्क दिखता है- कॉपी पर नाम न होने से पहचान जानना असंभव है. सो अगर अवसर मिले और साल दो साल में इतना फर्क आ जाए तो विशेष अवसर का प्रावधान जरूर किया जाना चाहिए.
यहॉं एक दिलचस्प बात की ओर इशारा करना जरूरी लगता है. अगर हम जीवन के बाकी क्षेत्रों की तरफ नजर डालते हैं तो दलितों की स्थिति को लेकर कुछ उत्साह जगता है-खास कर उनकी राजनैतिक-सामाजिक शक्ति में आए बदलाव को देखकर. अगर मीडिया में इसका जरा भी प्रभाव नहीं गया है तो उसके कुछ दोषी स्वयं दलित भी है. मीडिया का काम अपेक्षाकृत ज्यादा कौशल की मांग करता है और जो भी दलित (आज दो-दो,तीन-तीन पीढियों से सरकारी नौकरी के चलते पर्याप्त योग्य लडके-लड़कियां दलित परिवारों से भी आने लगे हैं) इस कौशल को पता है वह अपेक्षाकृत ज्यादा आराम और सुख-सुविधाओं से लैस सरकारी नौकरियों और अध्यापकी की तरफ मुड़ जाता है. अगर अच्छे विश्वविद्यालयों के कुलपति या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष के पद तक की योग्यता वाले दलित हमारे सामने आने लगे है तो संपादक की योग्यता क्या है. अगर देश के सबसे कुशल राष्ट्रपतियों में एक दलित भी गिना जाता है, देश के सबसे अच्छे मंत्रियों में दस-पांच दलित गिने जाऐं तो अच्छा राजनैतिक संवाददाता दलित क्यों नही हो सकता है.
आज दलितों को मीडिया में आने के लायक प्रतिभा है पर उक्त ब्राम्हणवादी सोच को बदलनें में नाकाम है पूरा मीडिया आज भी उपरी जाति के लोगों के पास है. सभी को पता है कि यह लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कितना महत्वपूर्ण है क्या दलित एक पत्रकार, सम्पादक बननें की योग्यता नही रखता है? लोकतंत्र जिसे जनता के लिए, जनता के द्वारा और जनता का शासन है इस शासन में सभी की समान सहभागिता का राग अलापा जाता है. पर क्या इन दलितों को समान अवसर इस चौथे स्तम्भ में है यह सोचनें की बात है. आज मीडिया में सभी वर्गो की समान भागीदारी होनी चाहिए जिससे खबरों की पूर्वाग्रह रहित हो और एक स्वस्थ खबरों से सबका वास्ता रहे और दलितों, पिछड़ो को भी वाजिब हक मीडिया में भी मिले है.


शोध छात्र,
जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग
बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय
लखनऊ, 226025

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