सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

आज का मीडिया निर्लज्ज और नपुंसक हो चुका है-आलोकधन्वा




‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेला में बिहार खोज खबर डाट काम की ओर से ‘मीडिया में साहित्य और संस्कृति’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार में बड़ी संख्या में युवा, संस्कृतिकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार एवं मीडिया से जुड़े छात्र शामिल हुए। इसके अलावा भी आम लोगों ने भी वक्ताओं को सुना।
सर्वप्रथम समकालीन तापमान से जुड़े युवा पत्रकार  अमित कुमार ने वेब पोर्टल बिहार खोज खबर डाट काम के बारे में बताया कि कैसे यह पोर्टल विश्लेषणपरक रिपोर्टों के साथ-साथ साहित्य व संस्कृति से जुड़ी खबरों को सामने लाने की केाशिश कर रहा है। अमित कुमार ने बताया  मौर्या कांपलेक्स में युवा पत्रकारों, संस्कृतिकर्मियों आदि ने मिलकर इस पोर्टल केा शुरू किया। तय हुआ कि सिर्फ बातचीत ही न की जाए बल्कि सार्थक भी हस्तक्षेप किया जाए। जिसके माडरेटर का जिम्मा सामाजिक सराकारों वाले पत्रकार अरूण सिंह ने संभाला। मुख्य धारा की मीडिया अपने स्वभावगत चरित्र की वजह से जिन खबरों, खासकर साहित्य-संस्कृति से जुड़ी खबरों को, तरजीह नहीं देता उसे बिहार खोज खबर डाट काम में सामने लाने की केाशिश की जा रही है। अमित कुमार ने वहां उपस्थित श्रोताओं से यह आग्रह भी किया कि आप एक बार इस पोर्टल के देखें। मीडिया के बारे में बोलते हुए अमित कुमार ने बताया ‘‘एक दशक पहले तक अखबारों के पुलआउट संजोकर रखने लायक होते थे। अखबार भले बिक जाए पर वो पन्ना रहता था पर अब तो हम उसे देखते तक नहीं हैं। उसे निकालकर किनारे कर देते हैं। ऐसा माना जाता है कि बाजार के प्रभाववश साहित्य-संस्कृति को जगह नहीं मिलती। लोकसंस्कृति के बारे में खबर ही नहीं होती। ’’उदाहरण देते हुए अमित ने बताया ‘‘खुदीराम बोस के बारे में हमलोगों ने अपने पोर्टल पर लिखा। जबकि अखबारों ने कुछ भी उस पर नहीं छापा। कोई आयोजन भी नहीं हुआ। लेकिन बिहार खोज खबर डाट काम पर छपने के बाद उस पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई। आज हम अपने नायकोें केा भूलने वाले कृतघ्न समाज हो गए हैं। पत्रकारिता की गिरावट यही है कि हम पत्रकार अपना स्वभाव भूल गए हैं। बाजार और पूंजी तो हमें अपने ढ़ंग से बदलना चाहेगी ही लेकिन हम क्यों अपना स्वभाव छोड़ंेगे? पत्रकारों को समावेशी चरित्र लेकर साथ-साथ जनपक्षधरता के नहीं भूलना चाहिए। इस बात में कोई दम नहीं है कि बाजार हमें बदल रहा है बल्कि दोष हममें है।’’
विमर्श की शुरूआत करते हुए युवा पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता निखिल आनंद ने उदाहरण देते हुए कहा कि ‘‘अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त इतिहासकार एवं बिहार के महान विभूति  रामशरण शर्मा की मृत्यु की खबर सीतामढ़ी में रहने वाले एक जागरूक व्यक्ति को नहीं लग पाती। इससे अंदाजा होता है कि मीडिया की नजर में ऐसे लोग जिन्होंने इस राज्य के साथ-साथ देश भर में महत्वपूर्ण योगदान दिया उसके लिए कोई मतलब नहीं है।’’ निखिल आनंद ने आगे बताया कि ‘‘70 का दशक संक्रमण का काल था। 90 का दशक मंडल-मंदिर का समय था। देश में बड़े परिवर्तन आ रहे थे, आर्थिक उदारीकरण आ रहा था, विदेश नीति में रणनीतिक किस्म के बदलाव आ रहे थे, फिलीस्तीन की जगह अपने देश के लिए इजरायल जैसा देश महत्वपूर्ण होता जा रहा था।’’ निखिल ने यहीं एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा‘‘ यही वो दौर है जब हमें बताया गया कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं प्रोफेशन हो गया है। देश की 80 प्रतिशत आबादी के लिए खबरों में जगह नहीं है। गांव, किसान, समाज खबरों में नहीं दिखता है।’’
कई उदाहरण देकर निखिल ने बताया कि कैसे हमारे मीडिया में एक क्लास बायस-वर्गीय पूर्वाग्रह- काम करता है। जहां गरीब लोगों की आवाज नहीं पहुंच पाती। निखिल ने साथ ही ये भी बताया कि कैसे छोटी जगहों की खबरों को हमसे दबाया जा रहा है। ‘‘नाॅलेज सोसायटी के दौर में खबरों को सेंसर किया जा रहा है। खबरों को रोका जा रहा है, बाधित किया जा रहा है। मनेर, मुजफ्फरपुर की खबरों को हमसे छुपाया जा रहा है।’’ निखिल ने मीडिया में आ रही नयी पीढ़ी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा ‘‘विभिन्न मीडिया कालेज से पढ़े छात्र ऐसे आ रहे हैं जो सोमनाथ चटर्जी जैसे लोगों से इंटरव्यू लेने के बाद उनसे उनका नाम पूछता है।’’ अंत में निखिल आनंद ने मशहूर पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह को उद्धृत करते हुए कहा‘‘ वे कहा करते थे कि जिन खबरों का अंत ‘गा’ ‘गे’ ‘गी’ से होता है वो खबर ही नहीं है। आज सब अखबारों में देखिए सब ओर दिखाई देगा कि पुल बनेगा, सड़क बनेगा आदि आदि। सब ओर लग रहा है कि प्रचार चल रहा है, केाई एजेंडा है इसके पीछे।’’
‘आबादी’, ‘अग्नि पाथर’ एवं ‘गहरे पानी पैठ’ जैसे उपन्यासों की रचना करने वाले वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी व्यास जी ने पुराने समय को याद किया ‘‘जब देश की आजादी के बाद नेहरू-महालनोबिस माडल जिसमें पब्लिक सेक्टर केा कमाडिंग हाइट्स और अर्थव्यवस्था को ड्राईविंग फोर्स माना जाता था। विचारों का एक सरोकार था। हम दिनमान, धर्मयुग एवं साप्ताहिक हिंदुस्तान पढ़ा करते थे। इन पत्रिकाओं में कविता, कहानी और कलादीर्घाओं की खबरेें रहा करती थीं। विचार के क्षेत्र में ‘मेनस्ट्रीम’ पढ़ा जाता था। कई तरह के आंदोलन थे समाजवादी आंदोलन, वामपंथी आंदोलन, नक्सल आंादेलन का प्रभाव साहित्य-संस्कृति पर भी पड़ रहा था। उन दिनों का याद करने के कारण ऐसा लगता है कि अब पत्रकारिता में बदलाव आ गया है।’’ उन्होंने नेहरू की पीढ़ी के खत्म होने की बात करते हुए कहा ‘‘अब नेहरू को लेकर बचकानी किस्म की बहस होती है। ऐसा बताया जा रहा है कि नेहरू महत्वपूर्ण नहीं है उनका सपना खत्म हो गया है। दुनिया मल्टीपोलर से यूनीपोलर होती गयी। स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट के नाम पर पब्लिक सेक्टर के जनपक्षधर स्वरूप को खत्म कर उसे निजी हाथो में सौंप कर ‘रिफार्म’ का नाम दिया गया और ये सारा कुछ वल्र्ड बैंक के इशारे पर किया गया।’’
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3 Comments

  • Abhishek Keshav wrote on 26 November, 2011Kafi acha aur bewak tasweer hai media ki aur ascharya ye ki wo bhi media ke logon ke dwara .
  • मुसाफिर बैठा wrote on 26 November, 2011बिहार खोज खबर भी ‘ निर्लज्ज और नपुंसक’ का गोतिया भाई ही अनेक मौकों पर साबित हुआ है…………….यह काना मामा मात्र की भूमिका में है, कोई उल्लेखनीय अवदान इसका नहीं है अबतक…..
  • Ashish Anchinhar wrote on 9 December, 2011भाइ मुसाफिर आपके कथन से सहमति है मेरी।

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