मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

मीडिया शिक्षा के पुरोधाओं में से एक प्रो. के. ई. ईपन का इंटरव्यू

कैमरे की नजर से


अधिकाधिक व्यावहारिक प्रशिक्षण के पक्षधर थे प्रो. ईपन

Audio of Prof. Eapen's interview




भारत में मीडिया शिक्षा के पुरोधाओं में से एक प्रो. के. ई. ईपन का  अक्तूबर 2010 में स्वर्गवास हो गया। देश में तीन पत्रकारिता विभागों की स्थापना करने वाले प्रो. ईपन ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की जनसंचार विषयक विशेषज्ञ समिति के पहले संयोजक के रूप में कार्य किया। उन्हें भारत में पत्रकारिता शिक्षा को दिशा देने के उनके प्रयासों के लिए सदैव याद रखा जाएगा। उनके विद्यार्थी आज भारत में ही नहीं दुनिया के कई दूसरे देशों में भी महत्वपूर्ण स्थानों पर कार्यरत हैं। निधन से पूर्व एमिक के सालाना अंतराष्टीय सम्मेलन के दौरान चैधरी देवीलाल विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष और सामुदायिक रेडियो के निदेशक वीरेन्द्र सिंह चौहान  ने भारत में मीडिया शिक्षा के अतीत,वर्तमान और भविष्य को लेकर विभिन्न मसलों पर प्रो. ईपन से बातचीत की। प्रो. ईपन भारत में पत्रकारिता शिक्षा के तंत्र में अधिकाधिक व्यावहारिक प्रशिक्षण के समावेश की पक्षधर थे। उन्होंने विश्वविद्यालयों में अपने प्रकाशन प्रारंभ किए जाने और टेलीविजन प्रोडक्शन यूनिट स्थापित करने की भी वकालत की।




प्रो. ईपन भारत में पत्रकारिता शिक्षा की  शुरूआत कब और कहां से हुई ?


आजादी से पहले लाहौर में पत्रकारिता पढ़ाई जाती थी। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी कुछ प्रयास हुए। मगर मौजूदा विश्वविद्यालय स्तरीय पत्रकारिता शिक्षा की जडें स्वतंत्र भारत में में नागपुर के हिस्लप कालेज में मानी जाती हैं, जहां इसका श्रीगणेश 1950 में हुआ। वहां से प्रारंभ हुए कोर्स को उस दौर में अन्य विश्वविद्यालयों ने भी मॉडल मानकर इस दिशा में आगे कदम बढ़ाए। हिस्लप कॉलेज मे अमरीका से पढ़कर आए प्रोफेसरों ने पत्रकारिता शिक्षा की शुरूआत की।



भारत में पत्रकारिता शिक्षा का ढ़ांचा साठ बरस बाद भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया। क्यूं ?


प्रारंभ के दिनों में देश में अंग्रेजी पत्रकारिता के दिग्गजों का मानना था कि पत्रकार पैदा होते हैं और पत्रकारिता पढ़ा कर सिखाई नहीं जा सकती।इसके चलते पत्रकारिता शिक्षा व प्रशिक्षण की उपयोगिता उद्योग के लोगों के  गले उतारने में खासा समय लगा। हमारे जैसे लोगों को इसके लिए खूब जूझना पड़ा। मगर कालांतर में पत्रकारिता विभागों से पढ़कर निकले स्नातकों ने अंग्रेजी, हिंदी और दक्षिण भारतीय भाषाओं में बिना प्रशिक्षण के आए लोगों के मुकाबले कहीं बेहतर काम किया तो यह धारण टूटी।


मीडिया शिक्षक में किस प्रकार के गुण होने चाहिएं ?


पत्रकारिता पढ़ाने वालों के पास पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा के साथ साथ उद्योग यानि मीडिया के काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव होना भी
 आवश्यक है। उसके बगैर वे प्रभावी ढंग से अध्यापन नहीं कर पाएंगे।


साठ बरस बाद भी भारत पत्रकारिता की अच्छी पाठ्यपुस्तकों की भारी कमी हैं ?


यह सच है और पत्रकारिता के शिक्षकों के समक्ष बड़ी चुनौती भी। भारत में जो किताबें लिखी गई हैं, वे स्तरीय नहीं हैं। पत्रकारिता के शिक्षकों का अपने देश में किताबें लिखने के प्रति रूझान नहीं है। इसी वजह से गिने-चुने प्रोफेसरों ने किताबें लिखी हैं। ऐसे में विद्यार्थी विदेशी पुस्तकों पर निर्भर होने को विवश हैं। मगर विदेशी किताबें विदेशी परिस्थितियों व सदंर्भों के अनुरूप लिखी होने के कारण हमारे लिए उतनी उपयोगी नहीं हो सकती। मसलन भारत और अमरीका के मीडिया उद्योग की संरचना व कामकाज के तरीके में बहुत अंतर है। मेरा मानना है कि भारत में भारतीय संदर्भों व स्थितियों के अनुसार पुस्तकें लिखी जानी चाहिएं। अमरीका व अन्य पश्चिमी देशों के पुस्तकें लिखने के लिए प्रोफेसरों को एक साल तक का अवकाश मिल जाता है और इस अवधि के लिए उन्हें पूरा वेतन भी मिलता है। भारत में ऐसा प्रावधान नहीं है। पुस्तकें लिखने का कार्य दैनंदिन अध्यापन के काम के साथ साथ करना संभव नहीं है। जिन्होंने कभी रिपोर्टिंग नहीं की वे रिपोर्टिंग की पुस्तक लिखें और शोध से नाता न रखने वाले लोग शोध की पुस्तकें लिखें तो अच्छी किताबें लिखे जाने की उम्मीद नहीं की जा सकती।


केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड स्कूल स्तर पर मीडिया को एक विषय के रूप में शामिल करने की तैयारी कर रहा है। इस विषय में आपका क्या कहना है ?


यह स्वागतयोग्य कदम है। मगर इससे पूर्व स्कूल स्तर पर मीडिया की आधारभूत जानकारी देने वाली अच्छी पुस्तकें तैयार की जानी चाहिएं। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि स्कूलों में मीडिया के अध्यापन का कार्य भी मीडिया स्टडीज में डिग्री या डिप्लोमाधारक शिक्षकों द्वारा ही किया जाए। पाठ्यपुस्तकें विशेषज्ञों और वरिष्ठ प्रोफेसरों से तैयार कराई जानी चाहिएं।


आप मीडिया शिक्षा से पिछले पचास साल से जुडे़ं हैं। क्या भारत में कभी मीडिया शिक्षकों को कोई संगठन भी बना ?


आरंभ में प्रोफेसर पीपी सिंह के नेतृत्व में एक संगठन बना था। उस संगठन का नाम इंडियन एसोसिएसन आॅफ जर्नलिज्म एजुकेशन था। उस समय भारत में सिर्फ 3.4 ही मीडिया विभाग थे। परंतु यह एसोसिएशन बहुत दिन नहीं चल पाई। गुटबंदी और खींचतान में यह समाप्त हो गई। बाद में हम लोगों ने इंडियन कौंसिल फार कम्युनिकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग नाम से एक संगठन बनाया था।  इसका एक शोध जर्नल भी निकलता था। यह काफी लोकप्रिय हुआ और विदेशों से भी इसकी खूब मांग आती थी। कौंसिल समर्पित लोगों की कमी के कारण देखते देखते कागज में सिमट कई और कौंसिल के साथ इसका जर्नल भी ठप्प हो गया। ऐसे उपक्रमों को नए सिरे से बढ़ावा देने की आवश्यकता हैं।


भारत में आज मीडिया शिक्षा में सबसे बड़ी चुनौती क्या है ?


व्यावहारिक प्रशिक्षण की तरफ ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। बिना इसके काम नहीं चलेगा। इसके साथ ही देश की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर मीडिया शिक्षा का माडल पाठ्यक्रम बनाया जाना चाहिये। इस काम को करते हुए केवल अमरीका ही नहीं दूसरे देशों के मौजूदा प्रोग्राम्स का अध्ययन भी हो, यह आवश्यक है। इसी क्रम में विदेशी पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी आवश्यक है ताकि उनकी अच्छी चीजों को हम अपना सकें और उनके अनुभव का लाभ भारत को भी मिल पाए।




आपको यह विचार कैसा लगता है कि विश्वविद्यालयों के मीडिया विभागों के अपने समाचार पत्र व पत्रिकाएं हों ?


नागपुर विश्वविद्यालय में आरंभ में ऐसा था। हिस्लप हेराल्ड नाम से साप्ताहिक अखबार प्रकाशित होता था और हिस्लप जर्नलिस्ट के नाम से एक जर्नल था जो साल में दो बार निकलता था। ऐसा सभी मीडिया विभागों में होना चाहिए। हाल ही की बात करें तो बंगलूरू में यूजीसी की मदद से टेलीविजन प्रोडक्शन यूनिट स्थापित किया गया। विद्यार्थियों को इसके लिए फील्ड में रिपोर्टिंग के लिए भेजा जाता है। ऐसी ही प्रोडक्शन सुविधाएं हर विभाग में होनी चाहिएं।

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