सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

पत्रकारिता की दशा-दिशा पर कुछ आलेख

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आगे-आगे देखिए होता है क्या ?/ निराला

http://www.biharkhojkhabar.com/wp-content/uploads/2011/11/indian-Media.jpgपत्रकारिता में मूल्यों के लिए संघर्ष पर 1941 में एक फिल्म बनी थी। नाम था नया संसार। सात दशक पहले। कहने का आशय यह कि उस जमाने से ही पत्रकारिता में मूल्यों पर संकट छाने लगा था। फिर बीच में कई फिल्मों में पत्रकार और पत्रकारिता की झलक दिखायी पड़ती रही। नई दिल्ली टाईम्स, पेज थ्री आदि फिल्में भी आयीं। मीडिया की अंदरूनी बातों को लोग सिनेमा जैसे मास मीडिया के माध्यम से जानने-समझने लगे। इसी बीच एक और फिल्म आनेवाली थी, जो अब तक आ नहीं सकी है। इस फिल्म का नाम तय है-अभी अभी। फिल्म की कहानी, पटकथा को रचा-बुना है दामुलवाले शैवाल ने।
शैवाल ने एक दफा उस फिल्म की कहानी का सार बताया था। संक्षेप में कहानी यह कि एक लड़का पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद नौकरी की तलाश में दर-दर भटकता है। साथ में उसकी प्रेमिका भी होती है। लड़के ने इलेक्ट्रानिक मीडिया की पढ़ाई की थी, सो वह चाकरी के लिए चैनलों के दरवाजे दस्तक देता है। कहीं फरियाद नहीं सुनी जाती। आखिर में कई शर्तों के साथ एक जगह ट्रेनी के तौर पर रख लिया जाता है। वह लड़का हर रोज सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई स्टोरी लाता है। उसकी स्टोरी कबाड़खाने में डाली जाती है। बास डांटता-फटकारता है। उसे कहा जाता है कि सामाजिक सरोकार निभाने आये हो तो जाओ कहीं सामाजिक संस्थाओं से जुड़ जाओ। गांव-कस्बे में रहो, यहां दिल्ली में क्या कर रहे हो? कोई हाट-सेलेबल न्यूज स्टोरी नहीं ला सकते तो रास्ता देख लो। हाट स्टोरी लाने का डेडलाईन भी तय कर दिया जाता है। ऐसा कर सकने में सफल नहीं होने पर आफिस नहीं आने का फरमान भी सुना दिया जाता है। लड़का परेशान। वह दिल्ली छोड़ भी नहीं सकता था। उसके सामने कई मजबूरियां होती हैं। प्रेेम का संघर्ष, स्त्री का संघर्ष और उसके साथ ही जीवनयापन का भी संघर्ष उसके सामने होता है। अपने प्रेमी को परेशान देख लड़की यानि उसकी प्रेमिका रास्ता निकालती है। लड़के को खुद पर स्टिंग आपरेशन करने के लिए तैयार करती है। वह कुछ लड़कों को मायाजाल में फांसती है। अपने घर तक लाती है। खुफिया कैमरा भी आन रखती है। हमबिस्तर होती है। लड़का अगले दिन बास को टेप सौंपता है। बाॅस का वही रवैया रहता है। यह सोचकर कि कचरा ही लाया होगा, टेप को किनारे रख देता है। लड़का कहता है-सर गांव, कस्बा, संघर्ष, सृजन, उद्यमिता, अनुसंधान जैसा कचरा नहीं है यह, आज डेडलाइन को हाट आइटम लाया हूं। बास आननफानन में टेप को देखता है। लड़के को गला लगाता है। पागलों की तरह घूम-घूमकर ऐलान करता है कि देखो-मैं कहता था न कि इसमें संभावनाएं शेष हैं, इसे चांस दो, कुछ न कुछ जरूर करेगा। आज स्टिंग कर के लाया है। बास पागलों की तरह आदेश देते रहता है। आज रात टीआरपी की बाजी हमारे हाथों होगी। आन स्क्रीन चलाओ- आज रात दस बजे देखिए रईसजादों की अय्याशी, गोरे लोगों के काले कारनामे। वगैरह-वगैरह। एक के बाद एक नये हेडिंग को बके जा रहा था। रात को टीवी पर हाट न्यूज शुरू होता है। लड़का तब तक अपने घर लौट आया होता है। प्रेमिका के साथ टीवी पर देखते रहता है। दोनों एक-दूसरे को देख रोते रहते हैं। खबरें सनसनी बनकर फैल जाती है। अगले दिन अखबारां में छा जाती है।
फर्ज कीजिए कि यह फिल्म आ गयी। जनता देखेगी। तब उसके जेहन में मीडिया को लेकर कैसी धारणा बनेगी? वह धारणा कैसी होगी, यह मीडिया से जुड़े लोगों के लिए स्व-आकलन का विषय है। फिल्म अभी-अभी एक उदाहरण भर है। फिल्म इलेक्ट्रानिक मीडिया पर केंद्रित होकर बनाने को सोची गयी है, यह भी एक अलग बात है लेकिन हकीकत क्या दूसरे मीडिया माध्यमों में ऐसा ही नहीं। शैवाल की इस कथा का यहां उल्लेख इसलिए भी कि पत्रकारिता में जो नयी पौध आ रही है, उसे ही सिर्फ मीडिया के नये फार्मूले-थ्री सी प्लस वन एस यानि क्रिकेट, क्राईम, सिनेमा और सेक्स के लिए दोषी माना जाए!
मीडिया तेजी से बढ़ता हुआ उद्योग है। एक चमकता हुआ कारोबार। इससे बहुत आपत्ति भी नहीं क्योंकि आज पत्रकारों की स्थिति में थोड़ी सुधार हुई है तो उसमें मीडिया और बाजार के बीच बने सरोकारी रिश्ते की बड़ी भूमिका रही। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सरोकार में जन सरोकार भी शेष रहेगा? मीडिया जब अपने को बदलाव के साथ कदमताल करने का दावा करती है तो उसमें मानव की मूल संवेदना के लिए जगह बचेगी। और सबसे बड़ा सवाल यह कि चकाचैंधी युग में कंटेंट को लेकर भी कोई सुधार होगा! महानगरों के प्लाट की तरह अखबारों में स्पेस की प्लाटिंग की जा रही है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में टाइम का प्लाटिंग हो रहा है। खबर के रूप में विज्ञापन और विज्ञापन के रूप में खबर दिखाये जाने का दौर शुरू हुआ है। यह सब परवान चढ़ा तो कल क्या सिर्फ वही हावी रहेगा, जिसे बाजार पसंद करता है या फिर पाठकों-दर्शकों का भी ध्यान रखा जाएगा।
लोग प्रवृत्ति से हिंसा, सेंसेशन, अपराध, सेक्स के समर्थक नहीं होते। उन्हें बनाये जाने की मुहिम चल रही है। मीडिया इस मुहिम की अगुवाई कर रहा है। आप गौर करें तो पायेंगे कि किसी भी पेशे ने समाज को इतना प्रभावित नहीं किया, जितना कि पत्रकारिता ने। विश्वसनीयता के तमाम संकट के बावजूद आज भी अखबारों में छपे हुए एक-एक शब्द, टीवी में दिखाये जाने वाले एक-एक फुटेज पर जनता गौर करती है, नोटिस लेती है। विश्वास भी करती है। इसे बचाने की जिम्मेवारी किसकी है, इस पर सोचना होगा। सिर्फ मीडियाकर्मियों का या समाज का भी। जब समाज के मूल्य तिरोहित होने लगेंगे तो आदर्श पत्रकारिता की उम्मीद नहीं की जा सकती। मशाल बननेवाली कलम की स्याही का सूख जाना स्वाभाविक है। (खोजी पत्रकार निराला तहलका से संबद्ध हैं.)
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सामाजिक सरोकारों से दूर होती मीडिया / अमित कुमार

 

http://www.biharkhojkhabar.com/wp-content/uploads/2011/11/Print-Media.jpgहाल के दिनों में इंसेफ्लाइटिस से राज्य के दो महत्वपूर्ण जिले गया और मुजफ्फरपुर में सवा सौ से अधिक बच्चे असमय काल कलवित हो गये। लेकिन किसी भी अखबार के लिए यह सामान्य सामाचार मात्र से अधिक कुछ नहीं था। इस खबर को प्रथम पृष्ठ शायद ही नसीब हुआ। इसके बजाय दूध के दाम बढ़ने और पटना में जमीन तथा फ्लैट की कीमतों में भारी ईजाफा होने के अटकलों को मुख्य पृष्ठ पर बैनर लीड बनाया गया। अन्य समाचार माध्यमों मसलन टीवी चैनलों को भी सैकड़ों बच्चों के काल के ग्रास बन जाने के मामले में कोई दिलचस्पी नहीं थी। चैनल प्रबंधकों को इसका ओबी वैन के द्वारा सजीव प्रसारण टीआरपी बढ़ाने और आर्थिक दृष्टिकोण से भी आकर्षक नहीं लगा था। लिहाजा उन लोगों को इस मसले पर मुहिम चलाना मुनासिब नहीं लगा। जबकि वह प्रेमी युगल के पार्कों और अन्य सर्वाजनिक स्थलों पर विहार करने के खिलाफ खूब मुहिम चला रहे थे। इस मसले पर प्रख्यात पत्रकार पी. साईनाथ का वह चर्चित उद्धरण काफी समीचीन हैं कि विदर्भ के किसानों की आत्महत्या के मामले पर समाचार संकलन को मात्र तीन पत्रकार पहुंचे थे। वहीं फिल्म से संबंधित ग्लैमरस कार्यक्रम में चार सौ से अधिक पत्रकार मौजूद थे। यह पत्रकारिता के बदलते चरित्र को बयां करते हैं। उसके सामाजिक सरोकार पूरी तरह बदल गये हैं। साहित्य, संस्कृति, विरासत, धरोहर, ग्राम्य जीवन, कृषि और अन्य मूलभूत मुद्दे अखबारी दुनिया में हाशिये पर सिमट गये हैं। रियलीटी शो आदि से जुड़े मसले प्रमुख हो गये। कटू आलोचकों की राय में समाचार संगठन इवंट मैनेजरहो गये हैं और उनका सम्पादकीय विभाग जनसम्पर्क का सिर्फ एक माध्यम बनकर रह गया है।
इस सिलसिले में अग्रलिखित मामला काफी उपयुक्त है। पिछले दिनों ऐतिहासिक इतिहासवेत्ता डा. रामशरण शर्मा का निधन हो गया। लेकिन राज्य के अखबारों के नियमित पाठकों को यह अहसास ही नहीं हो पाया कि बिहार के इस विभूति का देहावसान हो गया। हमारे मित्र युवा प्रखर पत्रकार विनीत भाई किसी कार्य से विगत कुछ माह से सीतामढ़ी में थे। हाल ही में पटना लौटने के बाद एक चर्चा के दौरान जब उन्हें पता चला कि डाॅ. रामशरण शर्मा नहीं रहे, तो वह भौंचक रह गये। उन्होंने कहा कि वह वहां नियमित रूप से अखबार पढ़ते थे। लेकिन इस बारे में वह पूरी तरह अनभिज्ञ थे। उल्लेख्य है कि बिहार के निर्माण में भी डा. रामशरण शर्मा का महत्वपूर्ण योगदान था। उनके ही रिपोर्ट के आधार पर बिहार-बंगाल सीमा विवाद सुलझ पाया था। इस पहलू को शायद ही राज्य के किसी समाचार पत्र ने महत्ता दिया। इतिहास जगत के इस अंतर्राष्टीय व्यक्तित्व को बिहार का मीडिया जगत सम्मान नहीं दे पाया। अनावश्यक रूप से किसी खास व्यक्ति को पूरा पेज समर्पित करने में अखबार के संपादक संकोच नहीं करते हैं। लेकिन डा. रामशरण शर्मा के मामले में वह भी नहीं हुआ। आजकल अखबार राजनीतिक आहतों से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक सिमट कर रह गये हैं। उसके बाद शेष स्थान बाजार की भेंट चढ़ गये हैं। ऐसे में रामशरण शर्मा जैसे व्यक्तित्व और संजीदा मसलों को जगह मिलना मुश्कील तो होगा। एक बार हम अपने कुछ पत्रकार मित्रों के साथ एक मीडिया कार्यशाला से लौट रहे थे। उसमें हमारे साथ कुछ अंग्रेजीदां पत्रकार थे। उनलोंगो ने एक हिंदी अखबार में एक झोपड़पट्टी में आग लगने तथा सैकड़ों परिवार के बेघर होने की खबर पढ़ी। उनकी पहली प्रतिक्रिया थी कि इस तरह के समाचार उनके अंग्रेजी अखबार में छपेंगे तो उनके पाठक समाचार पत्र खरीदना ही छोड़ देंगे। यह समाचार जगत के एक वर्ग की सोच तो अवश्य बयां करता है।
समाचार पत्रों के स्वरूप में आमूलचूल बदलाव हुए हैं। उनके कलेवर में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। अब वह रंग से सराबोर हो रंगीन हो गया है। उसकी छपाई भी काफी उत्कृष्ट श्रेणी की हो गई है। कागज भी पूर्व से काफी बेहतर हैं। लेकिन इन सब के बावजूद समाचार-पत्र अपने वास्तविक आकर्षण खो रहे हैं। उनकी समाचार सामाग्री का चयन और उसके परोसने के अंदाज में व्यापक गिरावट हुई। सम्पादकीय नीति समझ से परे है। अखबारों के रविवारीय विशेषांक पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय और संग्रहणीय होते थे। इनमें प्रकाशित होने वाली सामाग्री बहुत ही उत्कृष्ट होती थी। किसी भी लाईब्रेरी में संग्रहित पुराने अखबारों के अवलोकन से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। अब तो तकरीबन प्रतिदिन दैनिक अखबारों के साथ विशेषांक होते हैं, लेकिन वह पाठक पर कोई छाप नहीं छोड़ते। उसमें आकर्षक रंगीन मादक तस्वीरें तो होती हैं। पाठक को सिर्फ एक बार देखने को विवश करती है। इससे अधिक इसका कोई खास वजूद नहीं होता। कतिपय सुधी पाठक तो शिकायती लहजे में कहते हैं कि अखबारों के साथ प्रकाशित होने वाले दैनिक विशेषांकों की उपादेयता उनके समझ से परे है। कैरियर से संबंधित विशेषांक अवश्य छात्रों के बीच उपयोगी माने जाते हैं। अलोचकों की राय है कि अखबार बौद्धिक दरिद्रता के शिकार हो रहे हैं। पहले माना जाता था कि सामान्य अध्ययन और अपने भाषा ज्ञान को समृद्ध करना है तो नियमित समाचार पत्र पढ़ें। लेकिन अब समाचार पत्र के नियमित पाठ से भाषा का अजीबो गरीब ज्ञान विकसीत हो जायेगा। एक हिन्दी अखबार ने कुछ दिन पूर्व शीर्षक लगाया था कि जेइ को पूरी तरह समाप्त कर दिया जायेगा। प्रायः लोगों ने समझा कि जेइ से अभिप्राय जुनियर इंजिनियरसे होगा। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से जेई का प्रयोग जपानी इंसेफ्लाइटिसके अर्थ में किया गया था। एक अन्य अखबार में बुद्धिस्ट से लूटपाटकी खबर छपी थी। जबकि बुद्धिस्टका हिन्दी में बौद्ध या, बौद्ध धर्म मताबलम्वी बहुत लोकप्रिय पर्यायवाची शब्द है। इसी तरह प्रशिक्षु दरोगा के बजाय पीएसआईका प्रयोग समझ से परे है।
बहरहाल, आज मीडिया सर्वव्यापी हो गया है। यह समाज की नीति और दिशा निर्धारक आवश्यक अव्यव बन गया है। किसी भी मसले पर समाज का हर आम और खास इसकी महत्ता को स्वीकार करने लगा है। बिहार जैसे राज्यों में इसका महत्व और बढ़ जाता है। राज्य पूर्णनिर्माण के दौर से गुजर रहा है। इस दौर में मीडिया को मूलभूत मसलों पर ध्यान केंद्रित कर सृजनात्मक भूमिका अदा करनी चाहिये। बिहार के पर्यटक स्थलों, राज्य के विभूतियों, प्रांत के प्रमुख धराहरों को उद्घाटित कर उपस्थापित करने में सार्थक योगदान कर सकते हैं। राज्य के नीति-नियंताओं का भी ध्यान आकर्षित कर उनका पथ प्रदर्शन किया जा सकता है। अमर शहीद खुदीराम बोस के जन्मशती पर राज्य सरकार की ओर से कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। तब कुछ मीडिया संगठन ने इस दिशा में सवाल उठा सत्ता प्रतिष्ठानों को सचेत किया था।

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मीडिया का संकट / प्रियरंजन

 

माज निर्माण में मीडिया की अहम भूमिका होने के कारण इसे लोकतंत्र का चैथा स्तंभ माना जाता है। किन्तु, बदलते परिवेश में जिस तरह से कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका पर ईमानदारी और सामाजिक दायित्व से जुड़े सवाल खड़े किये जा रहे हैं, उससे सभी चिंतित हैं। इन पर भ्रष्टाचार की काली साया मंडरा रही है। हमारा चैथा स्तंभ भी इससे अछूता नहीं है। पीत पत्रकारिता ने पत्रकारिता के चरित्र को प्रभावित करना शुरू किया था। इसका दायरा बढ़ता गया। पत्रकारों को तरह-तरह से लुभाकर या प्रभावित कर हकीकत पर परदा डाला जाता था। फिर एक दौर स्टिंग आपरेशन का आया, जिसमें पत्रकारिता को एक नई पहचान मिली। धन लेकर संसद में सवाल पूछने का भंडाफोड़ कर स्टिंग आपरेशन ने राजनीतिक जगत में एक नयी उथ-पुथल पैदा कर दी। फिर एक दौर आया विकिलिक्स पत्रकारिता का। यह पत्रकारिता परंपरागत पत्रकारिता से अलग हटकर थी। स्टिंग और विकिलिक्स पत्रकारिता ने भ्रष्टाचार रूपी अंधेरा को चीरकर सच्चाई को बयां करने का साहस दिखाया। पेड न्यूज का नंगा रूप 2009 के चुनाव में सिर चढ़कर बोलने लगा। फिर नीरा राडिया कांड ने तो मीडिया को बेनकाब कर दिया। इसके पश्चात तो मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तंभ, निर्भीक तथा सच्चाई का रखवाला बताने की जुर्रत करना कोई मूर्ख ही कर सकता है।
मीडिया पर कारपोरेट घरानों, रियल इस्टेट के उस्तादों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, दौलतमंदों का वर्चस्व कायम होता चला गया। इन बड़े औद्योगिक घरानों, मुनाफाखोरों को धन अर्जित कराने के लिए राडिया जैसे लाबिंब करनेवालों का एक वर्ग भारतीय पत्रकारिता पर ग्रहण लगाने लगा। ये बड़े कारपोरेट घराने पत्रकारिता जगत की प्रमुख हस्तियों को अपने मुनाफे के लिए चुन-चुन कर शिकार बनाने लगे। पैसा लेकर सवाल पूछनेवाले सांसदों, सरकार बनाने-बिगाड़ने के लिए धन लूटनेवाले, दौलत और दारू के बल पर समाचार प्रकाशित करनेवाले, सांसदों की खरीद-फरोख्त को उजागर करनेवाले वरिष्ठ पत्रकारों को कारपोरेट घरानों का खैरख्वाह बनना लुभाने लगा। इनमें साधारण स्तर के पत्रकार नहीं, बल्कि प्रभु चावला, राजदीप सरदेसाई, वीर सांघवी, बरखा दत्त, एम.के. वेणु सरीखे मीडियाकर्मियों के नाम शुमार होने लगे। कारपोरेट घराने और मुनाफा को बढ़ाने के लिए कुछ भी कर व करा सकते हैं।
प्रिंट मीडिया के साथ-साथ इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की भूमिका भी हमारे समाज में बढ़ती जा रही है। प्रिंट से अधिक इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रभावशाली बनता जा रहा है। इसके दर्शकों की संख्या में इजाफ होना एक महत्वपूर्ण घटना है। इस पर समाज के उच्च मध्य वर्ग का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। इस पर ऐसे दृश्य प्रसारित हो रहे हैं, जिससे हमारा सामाजिक ढांचा बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इन चैनलों पर बलात्कार, लूट, हत्या, भ्रष्टाचार और हिंसा से भरी खबरों को प्रमुखता से परोसा जाता है। नृत्य-संगीत के भोंड़े प्रदर्शनों से हमारे समाज को अपसंस्कृति के गर्त में ढकेला जाता है।
चैनलों पर प्रदर्शित होनेवाले सीरियलों ने गरीबी और खटकर खानेवाले लोगों को निगल लिया है। झूठी शान-शौकत, कृत्रिमता ऐसी कि भौंड़ापन नजर आए, राजा-महाराजा की तरह का वस्त्र, केश-विन्यास, साज-शृंगार अमर्यादित आचरण का सार्वजनिक प्रदर्शन भारतीय मर्यादा व संस्कृति पर प्रहार कर रहा है। ऐसे कार्यक्रम प्रदर्शित होते हैं, जिन्हें परिवार के साथ बैठकर देखना संभव नहीं है। विज्ञापनों को कामुक और नग्न ढंग से परोसकर किस प्रकार की व्यवसायिक मानसिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है? अंगुली पर गिने-चुने कुछ ही चैनल हैं, जिन पर राष्ट्रीय एवं ज्वलंत मुद्दों पर बहस आयोजित होते हैं।
एक ओर महत्वपूर्ण सवाल है गांव-गंवई का-यह मीडिया से विलुप्तप्राय है। निचले स्तर की पत्रकारिता भी कम कलंकित नहीं है। यहां मीडियाकर्मियों को भी भारी समस्याओं से जुझना पड़ रहा है। गांव में लागू होनेवाली कल्याणकारी योजनाएं स्थानीय जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, दलालों की सांठ-गांठ से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं। किन्तु, इनकी तस्वीर सच्चाई के साथ उजागर नहीं होती है। थाना व प्रखंड स्तर पर कार्यरत पत्रकारों को लुभाने की कोशिश की जाती है। फिर धमकियां दी जाती है, ताकि सही खबरें प्रकाशित न हो सके। आज के संदर्भ में मीडिया के लिए यह एक बड़ी चुनौती है।
आम लोगों की समस्याएं, गरीबी, महंगाई, शिक्षा से दूर करोड़ों बच्चों की तस्वीर, दवा के अभाव में दम तोड़ते लोगों का दर्द, सर पर छत के अभाव में खुले आसमान तले सड़कों के किनारे रात गुजारनेवाले करोड़ों लोगों की पीड़ा, गगनचुंबी इमारतों के पास कुकुरमुत्ते की तरह उगती झोपरपट्टी, सड़क के किनारे बच्चों को जन्म देती माताओं की परेशानी, बेतहाशा बढ़ रही महंगाई के कारण थाली से एक-एक कर गायब होते खाद्य पदार्थ, बलात्कार की शिकार बनती युवतियों व बच्चियों का दर्द, दबंगों व सामंतों द्वारा जलायी जाती झोपड़ियों से निकलती कराह, रोजी-रोजगार की तलाश में पलायन करते करोड़ों युवाओं की कहानी, कारपोरेट घरानों की खुली लूट, गरीबी के मुंह में समाते करोड़ों की आह, आत्महत्या कर रहे लाखों किसानों की चीख मीडिया के लिए खबर नहीं है और न इसकी उसे परवाह है। असली भारत की तसवीर किसी मीडिया के लिए अहम सवाल नहीं बन रहा है।
जरूरत है मीडिया को जनसरोकारों के बीच सेतु बनने की। जरूरत है मीडिया को 26 रुपये अैर 32 रुपये वाले 85 फीसदी अमीरोंके पक्ष में मुस्तैदी से खड़ा होने की। जरूरत है बिना लाग-लपेट व निर्भीकता के साथ बातों को रखने की। आवश्यकता है भ्रष्टाचार महंगाई के पक्ष में लड़ने की, जनप्रतिनिधियों द्वारा जनता की हकमारी कर अपने लाभ के लिए किये जा रहे कुकृत्यों की सचई को उजागर करने की। तभी लोकतंत्र का चैथा स्तंभ मीडियाएक सजग व निर्भीक पहरेदार बनकर अपने दायित्वों को पूरा कर पायेगा।

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