बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

बिहार बाढ़ का काला सच / हर साल बह जाते हैं लाखो घर

-बाढ़ और सरकार की कहर से बेहाल बदहाल कंगाल होते लोग


बिहार की प्रलयंकारी बाढ़ में हर साल औसतन एक लाख से ज्यादा मकान बह जाते हैं वही एक लाख से ज्यादा घर क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। बाढ़ से एक लाख परिवारों का मकान इतना ज्यादा क्षतिग्रस्त हो जाता है कि वह कभी भी ध्वस्त हो सकता है। इसके बावजूद लाखों परिवार इन क्षतिग्रस्त जर्जर मकानों में ही खतरे के बीच जीवन-बसर करते हैं।
बिहार की प्रलयंकारी बाढ़ एवं कटाव ने
1989 से 2009 तक 20 वर्षों में लगभग 69 लाख मकानों को नुकसान पहुंचाया है। इसमें लगभग 35 लाख मकान पानी में बह गये तो लगभग 34 लाख क्षतिग्रस्त हो गये। बाढ़ से लाखों परिवार बेघर हुए जिन्हें बसाने के नाम पर करोड़ों अरबों रुपये अब तक खर्च किये गये। किन्तु गिने-चुने लोगों का ही आशियाना बन पाया। बाढ़ से बेघर होनेवाले लाखों परिवार आज भी खुले आसमान के नीचे ही जीवन-बसर कर रहे हैं।
हर साल सरकार बाढ़ से निपटने के लिए राज्य सकता तरह-तरह के दावे करते हैं और करोड़ों
रुपये खर्च किये जाते हैं मगर हकीकत है कि हर साल राज्य बाढ़ की चपेट में आता है और जान-माल एवं मकान के साथ अरबों रुपये की सम्पत्ति का नुकसान होता है। इस बार भी मानसून के आने में देरी के बाद भी बाढ़ से निपटने के कारगर सरकारी उपाय के दावे  पहले की तरह ही अभी से ही किए किये जा रहे हैं। आपदा प्रबंधन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार सूबे में प्रतिवर्ष एक लाख से ज्यादा मकान कटाव एवं बाढ़ में बह जाते हैं। बाढ़ के इतिहास पर नजर डाली जाये तो 1987 की बाढ़ में सबसे ज्यादा 6 लाख 68 हजार 27 मकान बह गये थे तो 10 लाख 36 हजार 472 मकान क्षतिग्रस्त हुए थे। बाढ़ से सबसे कम नुकसान वर्ष 1992 में हुआ था। इस साल मात्र 1278 मकान ही बाढ़ में बहे थे।
आपदा प्रबंधन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बाढ़ में बहने एवं
क्षतिग्रस्त मकानों की संख्या वर्ष 1979 में 27816 मकान तो साल 1980 में 118507मकान साल 1981 में 75776 मकान तो साल1982 में 68242 मकान बहगए थे।  इसी प्रकार 1983 में 38679मकान, साल 1984 में 3 लाख 10 हजार 405मकान साल 1985 में 103279मकान तो साल 1986 में 13774 मकान, साल 1987 में 17 लाख 4 हजार 999 मकान साल  1988 में 14759 मकान साल 1989 में 7746 मकान और साल 1990 में 11009 मकान पानी में बह गए थे। इसी प्रकार साल 1991 में 27324  मकान साल  1992 में 1281 मकान  तो साल 1993 में 2 लाख 19 हजार 826, मकान और साल 1994 में 33876, एंव 1995 में 2 लाख 97 हजार 826,मकान पानी में डूब गए थे। साल 1994 में 33876, और 1995 में 2 लाख 97 हजार 765 मकान और साल 1996 में एक लाख 16 हजार 194 घर और साल  1997 में एक लाख 74 हजार 379 मकान पानी की भेट स्वाहा हो गए थे। साल 1998 में एक लाख 99 हजार 611 तथा साल 1999 में 91813 मकान बाढ़ में बह गये या क्षतिग्रस्त हुए। इसी प्रकार साल 2000 में 3 लाख 43 हजार 91मकान  साल 2001 में 2 लाख 22 हजार 74 मकान,  साल 2002 में 4 लाख 19 हजार 14 मकान और साल 2003 में 45262, 2004 में 9 लाख 29 हजार 773 मकान जबकि साल  2005 में 5538 साल 2006 में 18673 मकान साल  2007 में 7 लाख 84 हजार 328 मकान और साल  2008 में 2 लाख 97 हजार 916 मकान तथा 2009 में 7674 मकान बाढ़ में बह गये और क्षतिग्रस्त हुए।
इन सरकारी आंकडों को ही मानकर चले तो बाढ़ और सरकारी राहत की सच्चाई की पोल खुलती है। बाढ़ की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है कि हर साल मानसूनके आगमन के साथ ही लाखों परिवारों की बदहाली का नाता है. जिसे रोकने में सरकार अभी तक पूरी तरह नाकाम रही है।

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