गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

हस्तलिखित अखबार निकालते थे मोख्तार जयनाथपति



अशोक प्रियदर्शी / साहित्य / भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की इतिहास पल भर में नही गढ़ी गई थी। इसके लिए कई स्तर से प्रयास हुए थे जिसके बाद 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो सका था। नवादा जिले के मोख्तार जयनाथपति इसी कड़ी का एक अहम हिस्सा थे, जो स्वतंत्रता के लिए हस्तलिखित अखबार के जरिए जनजागरण कर रहे थे। आज नवादा जिला कांग्रेस कमेटि का कार्यालय है-वह मोख्तार जयनाथपति का आवास हुआ करता था, उसी आवास के तहखाने से वे हस्तलिखित अखबार निकालते थे। हस्तलिखित बुलेटिन को रात में ही जयनाथपति और उनकी पत्नी श्यामा देवी गांव-गांव जाकर पाठकों के बीच पहुँचा देते थे।
जयनाथपति कई भाषाओं के मर्मज्ञ थे, उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि वह एक ही समय में अपनी दोनों हाथों से अलग-अलग भाषाओं में लिखने में प्रवीण थे। इस तरीके से वे जीवन पर्यन्त हस्तलिखित अखबार निकालते रहे। इस अभूतपूर्व योगदान के कारण डा. राजेन्द्र प्रसाद के भी प्रिय पात्र थे। ब्रिटिश सवडिविजनल आफिसर ‘लूकस’ भी जयनाथपति की विद्वता के कायल थे। इनसे संस्कृत पढ़ने के लिए लूकस बग्धी से उनके आवास पर आया करते थे।
जयनाथपति एक साथ कई भूमिका का निर्वहन कर रहे थे। एक लेखक के नाते अखबार निकाल रहे थे। मोख्तार होने के कारण ब्रिटिश हुकुमत से कानूनी लड़ाइयां भी लड़ रहे थे। जयनाथपति नवादा नगर के प्रथम श्रेणी के मोख्तार थे। वे एक निर्भिक राष्ट्वादी थे। होमरूल आंदोलन के स्थानीय स्तर पर एकमात्र सदस्य थे। 1920 में गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन के समय नवादा कांग्रेस कमेटि के अध्यक्ष के रूप में भी नेतृत्व प्रदान किए थे। उनकी सक्रिय भूमिका के कारण नौ माह तक 1930 में केन्द्रीय कारागार हजारीबाग में जेल भी बिताना पड़ा था।
यही नही, सामाजिक बुराईयों पर प्रहार करने के लिए मगही भाषा में कई उपन्यास की रचना की। इसके चलते वह मगही के पहले उपन्यासकार के रूप में उनकी प्रसिद्धि मिली थी।
मोख्तार जयनाथपति ने 1928 में सुनीता और फूलबहादुर की रचना की। फिर उन्होंने गदहनीत उपन्यास की रचना की। उन्होंने गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1935 का मगही अनुवाद-स्वराज- को 1937 में छापा था। वे वेदशास्त्र के पंडित और इतिहास के गंभीर अध्येता थे। यही नही, नवादा नगर में एंग्लो संस्कृत स्कूल की स्थापना की थी, जो आज भी मौजूद है।
पहला उपन्यास सुनीता की रचना की जिसमें बेमेल शादी पर प्रहार किया गया। उच्च धराने की कम उम्र की सुनीता को एक वृद्ध के साथ शादी कर दी जाती है। लेकिन नायिका सुनीता सामाजिक बंधन को तोड़कर एक निम्न जाति के प्रेमी से शादी कर लेती है। सुनीता के विरादरी वाले कोर्ट के जरिए प्रेमी को दंडित करना चाहते हैं किन्तु वह अपने प्रेमी के पक्ष मे खड़ी होकर सच्चा प्रेमिका होने का परिचय देती है।
मगही उपन्यास फूलबहादूर में हास्य और व्यंग्यपूर्ण तरीके से पदलोलुप व्यक्ति की नैतिक पतन पर प्रहार किया गया है। नायक रामलाल बिहारशरीफ का मोख्तार है और वह रायबहादुर कहलाने के लिए अधिकारियों की खुशामद करता है। इसके लिए अधिकारियों को सुरा-सुन्दरी भी उपलब्ध कराता है। रामलाल की इस व्यग्रता को नगरवासी एक फर्जी संदेश के जरिए रायबहादुर बनने का संदेश देता है। लिहाजा, वह रायबहादुर तो बनते नही लेकिन वह फूलबहादुर जरूर बन जाते हैं।
तीसरी मगही रचना गदहनीत है जिसमें सामाजिक बुराईयों पर प्रहार किया गया है। हालांकि इसकी प्रति अब अनुपलब्ध है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी जयनाथपति का जन्म 1890 ई को नवादा जिले के सादीपुर गांव में एक सुप्रतिष्ठित कायस्थ परिवार में हुआ था, लेकिन अल्पआयु में ही टायफाइड बीमारी की चपेट में आने के कारण 21 सितंबर 1939 को पीएमसीएच के पेईंगवार्ड में उनका निधन हो गया। लेकिन दुर्भाग्य की उनकी स्मृति में एक अदद मूर्ति भी नही है। हां उनके पिता जवाहिरनाथ के नाम पर नवादा जवाहर नगर जरूर बसा है, जो आज भी उनकी अतीत को संयोए हैं।
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