शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

क्या हो नए राज्यों के निर्माण की कसौटी.

विचार -विमर्श|Shortlink: 2011/11/24 4:09 pm


नए राज्यों के निर्माणतेलंगाना पर राजनीतिक दलों द्वारा बिछाई जा रही बिसात के बीच आंध्र के एक पडोसी राज्य का हालिया वाकया गौरतलब है. छत्तीसगढ़ प्रदेश की सीमा से लगे ओडिशा के कुछ गांव के लोग सामूहिक धरना-प्रदर्शन पर थे. उनकी मांग अपने आप आप में अनोखी थी. वो चाहते थे कि उनके गांव समेत कुछ हिस्से को छत्तीसगढ़ में मिला दिया जाय ताकि वहां हो रहे विकास से वे लोग भी लाभान्वित हों. ओडिशा का वो इलाका उस बस्तर से लगता हैं जहां दुनिया की नज़र में तो गृह युद्ध जैसे हालात हैं. लेकिन किसी छोटे इकाई में समेट कर अगर राज्य को स्थायित्व मिले और खास कर ज़मीन से जुड़ा ज़मीर वाला नेतृत्व हो तो किस तरह से जनभावनाओं की पूर्ति हो सकती है उसका उदाहरण माना जा सकता है उस घटना को.

हालांकि राज्य चाहे छोटा हो या बड़ा, कुशल नेतृत्व की दरकार तो हमेशा है. लेकिन भारत जैसे प्रभुता संपन्न राष्ट्र की छतरी के नीचे अधिकार संपन्न छोटी-छोटी इकाईयां वास्तव में विकास का पैमाना बन सकता है. यहां पर एक मौलिक सवाल ज़रूर है कि आखिर हम छोटा कहें किसे ? मोटे तौर पर जनसंख्या को आधार बना कर ही हम यह निर्धारित करते हैं कि किस राज्य को छोटा या बड़ा कहा जाय. अन्यथा छोटा कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ तो बिहार से भी बड़ा है. यहां तक कि प्रदेश का बस्तर ही केरल जैसे राज्यों से बड़ा है. अगर हम जनसंख्या के आधार पर ही आकार निर्धारित करें तब तो अमेरिका को भारत की तुलना में काफी छोटा देश कहा जाएगा क्यूंकि आकार में तिगुना होना के बावजूद उसकी जनसंख्या भारत का लगभग एक तिहाई ही है. खैर.

आशय यह कि आज़ादी के सातवें दशक में आने के बाद भी आज तक हम यह ही नहीं तय कर पाये हैं कि आखिर भारत में राज्यों के निर्माण का आधार क्या हो? उसका आकार-प्रकार, जनसंख्या, संस्कृति, भाषा या क्या? किसी स्थापित मानदंड के अभाव में सत्ताधारी दल अपनी सुविधा या वोटों के समीकरण के लिहाज़ से राज्यों का निर्माण करते रहते हैं. फलतः अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरह का आक्रोश पनपना स्वाभाविक है. आज़ादी से अभी तक देश के लगभग हर कोने में नए राज्यों की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन, खून-खराबा, हिंसा का दौर जारी है. तमाम हिंसक आंदोलनों के बावजूद दशकों से तेलंगाना का मामला लंबित है. लेकिन बात केवल तेलंगाना की ही नहीं है. कहीं हलके तौर पर तो कहीं काफी मुखरता के साथ मिथिलांचल, गोरखालेंड, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड, बघेलखंड, विदर्भ आदि की मांग सामने है ही.

अभी तक के राज्य निर्धारण में बस एक आधार सामने आया, जब आन्ध्र प्रदेश का सबसे पहले भाषा के आधार पर निर्माण हुआ. उस समय तब के प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध करते रहे थे. लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामालू की मद्रास से आंध्र प्रदेश को अलग किए जाने की मांग को लेकर 58 दिन के आमरण अनशन के बाद मौत ने उन्हें अलग तेलुगू भाषी राज्य बनाने पर मजबूर कर दिया था. न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग रिपोर्ट आने के बाद ही 1956 में नए राज्यों का निर्माण हुआ और 14 राज्य व 6केन्द्र शासित राज्य बने.

फिर 1960 में पुनर्गठन का दूसरा दौर में 1960 में बंबई राज्य को तोड़कर महाराष्ट्र और गुजरात बनाया गया. 1966 में पंजाब का बंटवारा हुआ और हरियाणा और हिमाचल प्रदेश दो नए राज्यों का गठन हुआ. इसके बाद अनेक राज्यों में बंटवारे की मांग उठी.1972 में मेघालयमणिपुर, और त्रिपुरा बनाए गए। 1987 में मिजोरम का गठन किया गया और केन्द्र शासित राज्य अरूणाचल प्रदेश और गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया. आखिर में साल 2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल मेंउत्तराखण्डझारखण्ड और छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आए.

हालांकि पहले राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश में राज्यों के बंटवारे का आधार भाषाई होने के पीछे तर्क दिया गया था कि प्रशासन को आम लोगों की भाषा में काम करना चाहिए, ताकि प्रशासन लोगों के नजदीक आ सके. लेकिन पिछले छः दशक का अनुभव यही कहता है कि सत्ताधारियों की ‘नीयत’ ही सबसे बड़ा आधार हो सकता है. देश के सामने सर उठाये खड़े बाहरी आतंकवाद एवं आंतरिक चुनौतियों के संकट के बीच यह सबसे ज्यादा ज़रूरी है कि देश की विभिन्नताओं का सम्मान करते हुए, उसकी वास्तविक ज़रूरतों के मुताबिक़ कदम उठाकर यथाशीघ्र राज्य निर्माण संबंधित मुद्दे का निपटारा किया जाना चाहिए.

फिलहाल ज़रूरत एक तीसरे निष्पक्ष राज्य पुनर्गठन आयोग की है. जिसमें हर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व हो. अगर वास्तव में इस मुद्दे का निपटारा करने की इच्छाशक्ति हो तो अलग-अलग क्षेत्रों की उप संस्कृतियों को आधार बनाया जाना सबसे सही तरीका हो सकता है. इस तरह एक बार देश में नए राज्य गठन आयोग का गठन कर, विशेषज्ञों की सेवा ले उसकी सिफारिशों को अमल में लाते हुए नए सिरे से राज्यों का निर्माण किया जाय. निश्चय ही अगर दस-पन्द्रह नए राज्य भी बनाने पड़ जाय तो यह संघ को मजबूती ही प्रदान करेगा. इससे तंत्र तक लोक का पहुचना भी सुगम होगा. साथ ही और जिस तरह संसदीय सीटों के लिए 2020 तक सीटों की संख्या नहीं बढाने का प्रावधान किया गया है उसी तर्ज़ पर एक बार राज्यों का निर्माण हो जाने के बाद संविधान संशोधन के द्वारा यह तय कर दिया जाय कि अगले पचास साल तक किसी नए राज्य का निर्माण संभव नहीं होगा. तो जैसे आज लोकसभा में सीटों को बढाए जाने के लिए कोई आंदोलन कहीं नहीं होता उसी तरह राज्य निर्माण का संघर्ष भी समाप्त होना संभव होगा.

अपने कार्यकाल में तीन राज्यों का निर्माण करने वाली भाजपा और उसके पूर्ववर्ती जनसंघ सदा से ही छोटे-छोटे राज्यों की पक्षधर रही है. पंडित दीन दयाल उपाध्याय पूर्व के 54 जनपदों की तर्ज़ पर इतने ही राज्य बनाए जाने के पक्षधर थे. इस तरह अभी भी देश में करीब बीस और राज्यों की गुंजाइश शेष है. इसके अलावा एक ही देश में जम्मू-कश्मीर को विशेष हैसियत देना, या दिल्ली राज्य का अनोखा मामला जिसमें अन्य तमाम राज्यों के उलट क़ानून व्यवस्था का मामला राज्य के बदले केन्द्र का विषय बना दिया जाना, सात केन्द्र शासित प्रदेशों का अस्तित्व आदि विसंगतियों को भी समाप्त किये जाने की ज़रूरत है. एक देश में एक ही तरह के राज्य हों. जिन्हें निश्चय ही अधिकाधिक अधिकार दिए जाय. सत्ता का अधिकतम विकेन्द्रीकरण हो. हर जगह ग्राम पंचायतों तक को मज़बूत किया जाय. कानूनी अधिकार और संवैधानिक हैसियत के मामले में भी सारे राज्य सामान हों. जनसंख्या तथा क्षेत्रफल में भी यथासंभव ज़मीन-आसमान का फर्क न हो.

इस तरह का प्रावधान कर साफ़ नीयत और सच्चे मन से अगर सत्ताधारी इस मामले में राज धर्म का पालन करें तो शायद कभी फिर न तेलंगाना के लिए खून की नदिया नहीं बहेगी न ही किसी और राज्य को बनाने के लिए उत्तराखंड के आंदोलनकारियों की तरह बलात्कार और प्रताडना झेलना होगा. इस तरह निर्मित हर राज्य खुद मज़बूत हो आखिरकार राष्ट्र की मजबूती में सहायक की भूमिका का निर्वहन करने में सक्षम हो सकता है.

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