गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

भारतीय भाषाओं को बचाने की जरूरत / उर्दू पत्रकारिता पर संगोष्ठी





संजय द्विवेदी / मुद्दा / यह मध्यप्रदेश का सौभाग्य है कि उसकी राजधानी भोपाल से उर्दू पत्रकारिता के भविष्य पर सार्थक विमर्श की शुरूआत हुई है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल और इसके कुलपति प्रो.बृजकिशोर कुठियाला इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने हिंदी ही नहीं भारतीय भाषा परिवार की सभी भाषाओं के विकास और उन्हें एकता के सूत्र में बांधने का लक्ष्य अपने हाथ में लिया है।
यह सुखद संयोग है कि गत 22 जनवरी को विश्वविद्यालय के परिसर में उर्दू भाषा पर संवाद हुआ और 23 जनवरी को भोपाल के शहीद भवन में भारतीय भाषाओं पर बातचीत हुयी। यह शुरूआत मध्यप्रदेश जैसे राज्य से ही हो सकती है, इसे यूं ही देश का ह्दय प्रदेश नहीं कहा जाता। मप्र का भोपाल एक ऐसा शहर है जहां हिंदी और उर्दू पत्रकारिता ही नहीं दोनों भाषाओं का साहित्य फला-फूला है। अपनी सांस्कृतिक विरासतों,भाषाओं व बोलियों का सहेजने का जो उपक्रम मध्यप्रदेश में हुआ है वैसा अन्य स्थानों पर नहीं दिखता।
उर्दू पत्रकारिताः चुनौतियां और अपेक्षाएं विषय पर आयोजित इस सेमीनार में जुटे उर्दू संपादकों, पत्रकारों और अध्यापकों ने जो बातचीत की वह बताती है हमें उर्दू के विकास को एक खास नजर से देखने की जरूरत है और देश के विकास में उसका एक बड़ा योगदान सुनिश्चित किया जा सकता है। शायद इसीलिए पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ बेग का कहते है कि उर्दू अपने घर में ही बेगानी हो चुकी है। सियासत ने इन सालों में सिर्फ देश को तोड़ने का काम किया है। अब भारतीय भाषाओं का काम है कि वे देश को जोड़ने का काम करें।
आजादी के आंदोलन में भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का खास योगदान रहा है। उसमें उर्दू पत्रकारिता अग्रणी रही है। लाला लाजपत राय जैसे हिंद समाचार के संस्थापक और क्रांतिकारियों ने इसे एक नई दिशा दी। अनेक अखबारों के संपादकों को जेल हुयी, यातनाएं दी गयीं। हिंदी के बड़े लेखक के रूप में जाने जाने वाले मुंशी प्रेमचंद की पहली किताब सोजे वतन को अंग्रेजी सरकार ने जब्त कर लिया था। ऐसे संघर्षों से ही भाषा फली-फूली है। आजादी के आंदोलन की भाषा हिंदी और उर्दू रही है। इन दोनों भाषाओं के अखबारों ने जैसी अलख जगाई उसका एक इतिहास है। इन्होंने राजनीतिक जागरूकता लाने में एक अहम भूमिका निभाई। सामाजिक और राजनीतिक तौर पर समाज को जागृत करने में इन अखबारों की एक खास भूमिका रही है।
उर्दू ,भारत में पैदा हुयी भाषा है जिसका अपना एक शानदार इतिहास है। उसका साहित्य एक प्रेरक विषय है। देश के नामवर शायरों की वजह से दुनिया में हमारी एक पहचान बनी है। लेखकों ने हमें एक उँचाई दिलाई है। उर्दू मीडिया ने भी आजादी के बाद काफी तरक्की की है। नई प्रौद्योगिकी को अपनाने के बाद उर्दू के अखबारों को काफी ताकत मिली है। वे व्यापक कवरेज पर ध्यान दे रहे हैं। किंतु यह दुखद है कि नयी पीढ़ी में उर्दू के प्रति जागरूकता कम हो रही है। वह अब व्यापक रूप से संवाद की भाषा नहीं रह पा रही है।
नए समय में हमें अपनी भारतीय भाषाओं को बचाने की जरूरत है। उनके अच्छे साहित्य का अनुवाद करने की जरूरत है ताकि विविध भाषाओं में लिखे जा रहे अच्छे ज्ञान से हमारा अपरिचय न रह सके। हम एक दूसरे के बेहतर साहित्य से रूबरू हो सकें। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि उर्दू अखबारों की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। खासकर पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र तथा देश के दक्षिणी हिस्से में उर्दू के अखबार लोकप्रिय हो रहे हैं। आज ये अखबार कहीं भी अंग्रेजी या भारतीय भाषाओं के मुकाबले कमजोर नहीं है। सहारा उर्दू रोजनामा (नई दिल्ली) के ब्यूरो चीफ असद रजा की राय में हिंदी व उर्दू पत्रकारिता करने के लिए दोनों भाषाओं को जानना चाहिए। उर्दू अखबारों को अद्यतन तकनीकी के साथ साथ अद्यतन विपणन ( लेटेस्ट मार्केटिंग) को भी अपनाना चाहिए।
तमाम समस्याओं के बीच भी उर्दू मीडिया की एक वैश्विक पहचान बन रही है। वह आज सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया की भाषा बन रही है। यह सौभाग्य ही है कि हिंदी, उर्दू , पंजाबी, मलयालम और गुजराती जैसी भाषाएं आज विश्व मानचित्र पर अपनी जगह बना रही है। दुनिया के तमाम देशों में रह रहे भारतवंशी अपनी भाषाओं के साथ हैं और भारत के समाचार पत्र और टीवी चैनल ही नहीं, फिल्में भी विदेशों में बहुत लोकप्रिय हैं। यह सारी भाषाएं मिलकर हिंदुस्तान की एकता को मजबूत करती हैं। एक ऐसा परिवेश रचती हैं जिसमें हिंदुस्तानी खुद को एक दूसरे के करीब पाते हैं।
यह कहना गलत है कि उर्दू किसी एक कौम की भाषा है। वह सबकी भाषा है। कृश्नचंदर, प्रेमचंद, कृष्णबिहारी नूर, रधुपति सहाय फिराक गोरखपुरी, चकबस्त, लालचंद फलक, सत्यानंद शाकिर, गुलजार, उपेंद्र नाथ अश्क, चंद्रभान ख्याल, गोपीचंद नारंग जैसे तमाम लेखकों ने उर्दू को समृद्ध किया है। ऐसी एक लंबी सूची बनाई जा सकती है। इसी तरह आप देखें तो धर्म के आधार पर पाकिस्तान का विभाजन तो हुआ किंतु भाषा के नाम पर देश टूट गया और बांगलाभाषी मुसलमान भाईयों ने अपना अलग देश बांग्लादेश बना लिया। इसलिए यह सोच गलत है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है। यह एक ऐसी भाषा है जिसमें आज भी हिंदुस्तान की सांसें हैं। उसके तमाम बड़े कवि रहीम,रसखान ने देश की धड़कनों को आवाज दी है। हमारे सूफी संतों और कवियों ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया है। इसलिए भाषा के तौर पर इसे जिंदा रखना हमारा दायित्व है।
प्रमुख उर्दू अखबार सियासत (हैदराबाद) के संपादक अमीर अली खान का कहना है कि उर्दू अखबार सबसे ज्यादा धर्म निरपेक्ष होते हैं। उर्दू पत्रकारिता का अपना एक रुतबा है।सेकुलर कयादत के संपादक कारी मुहम्मद मियां मोहम्मद मजहरी (दिल्ली) भी मानते हैं कि उर्दू पत्रकारिता गंगा-जमनी तहजीब की प्रतीक है। इसी तरह जदीद खबर, दिल्ली के संपादक मासूम मुरादाबादी का मानना है कि जबानों का कोई मजहब नहीं होता, मजहब को जबानों की जरुरत होती है। किसी भी भाषा की आत्मा उसकी लिपि होती है जबकि उर्दू भाषा की लिपि मर रही है इसे बचाने की जरूरत है।
ऐसे में अपनी भाषाओं और बोलियों को बचाना हमारा धर्म है। इसलिए मप्र की सरकार ने भोपाल में हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना का फैसला किया है। इस बहाने हम हिंदी और इसकी तमाम बोलियों की रक्षा कर पाएंगें। हम देखें तो हमारे सारे बड़े कवि खड़ी बोली हिंदी के बजाए हमारे लोकजीवन में चल रही बोलियों से आते हैं। सूरदास, कबीरदास, तुलसीदास, मीराबाई, रहीम, रसखान सभी कवि बोलियों से ही आते हैं। इसलिए अंग्रेजी और अंग्रेजियत के हमलों के बीच हमें हमारी भाषाओं और बोलियों के बचाने के लिए सचेतन प्रयास करने चाहिए। यह हम सबका सामाजिक और नैतिक दायित्व है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश की आजादी के बाद कहा था दुनियावालों से कह दो गांधी अंग्रेजी भूल गया है, पर हमने उनका रास्ता छोड़कर अपनी भाषाओं की उपेक्षा प्रारंभ कर दी। अब हमें फिर से एक बार अपनी जड़ों को जानने की जरूरत है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक हैं)


संजय द्विवेदी,
अध्यक्षः जनसंचार विभाग,
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल-462011 (मप्र)
मोबाइलः 09893598888
January 22, 2011 at 7:16 pmadmin

भोपाल में उर्दू पत्रकारिता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न


भोपाल / खबर / पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ बेग का कहना है कि उर्दू अपने घर में ही बेगानी हो चुकी है। सियासत ने इन सालों में सिर्फ देश को तोड़ने का काम किया है। अब भारतीय भाषाओं का काम है कि वे देश को जोड़ने का काम करें। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में उर्दू पत्रकारिताः चुनौतियां और अपेक्षाएं विषय पर आज भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के शुभारंभ सत्र में मुख्यअतिथि की आसंदी से बोल रहे थे। उनका कहना था कि देश को जोड़ने वाले सूत्रों की तलाश करनी पड़ेगी, भाषाई पत्रकारिता इसमें सबसे खास भूमिका निभा सकती है।
आयोजन के मुख्य वक्ता प्रमुख उर्दू अखबार सियासत (हैदराबाद) के संपादक अमीर अली खान ने कहा कि उर्दू अखबार सबसे ज्यादा धर्म निरपेक्ष होते हैं। उर्दू पत्रकारिता का अपना एक रुतबा है। लोकिन उर्दू अखबारों की प्रमुख समस्या अच्छे अनुवादकों की कमी है। संगोष्ठी में स्वागत उदबोधन करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि इस संगोष्ठी का लक्ष्य उर्दू पत्रकारिता के बारे में एक समान कार्ययोजना का मसौदा तैयार करना है। उर्दू किसी तबके , लोगों की जबान नहीं बल्कि मुल्क की जबान है। मुल्क की तरक्की में उर्दू की महती भूमिका है। वरिष्ठ पत्रकार एवं सेकुलर कयादत के संपादक कारी मुहम्मद मियां मोहम्मद मजहरी (दिल्ली) ने कहा कि उर्दू पत्रकारिता गंगा-जमनी तहजीब की प्रतीक है।
प्रथम सत्र में उर्दू पत्रकारिता की समस्याएं और समाधान पर बोलते हुए दैनिक जागरण भोपाल के समाचार संपादक सर्वदमन पाठक ने कहा कि उर्दू अखबारों की प्रमुख समस्या पाठकों व संसाधनों की कमी है। उर्दू हिंदी पत्रकारों में तो समन्वय है परंतु इन दोनों भाषायी अखबारों में समन्वय की भारी कमी है। आकाशवाणी भोपाल के सवांददाता शारिक नूर ने कहा कि एक समय में भोपाल की सरकारी जबान उर्दू थी व भोपाल उर्दू का गढ़ था। उर्दू सहाफत(पत्रकारिता) को बढ़ाना है तो उर्दू की स्कूली तालीम को बढ़ावा देना होगा। स्टार न्यूज एजेंसी, हिसार की संपादक सुश्री फिरदौस खान ने कहा कि हिंदी, उर्दू व अंग्रेजी अखबारों की सोच में बुनियादी फर्क है, उर्दू भाषा की तरक्की उर्दू मातृभाषी लोगों व सरकार दोनों पर निर्भर है।
जदीद खबर, दिल्ली के संपादक मासूम मुरादाबादी ने कहा कि जबानों का कोई मजहब नहीं होता, मजहब को जबानों की जरुरत होती है। किसी भी भाषा की आत्मा उसकी लिपि होती है जबकि उर्दू भाषा की लिपि मर रही है इसे बचाने की जरूरत है।बरकतउल्ला विवि, भोपाल की डा. मरजिए आरिफ ने कहा की उर्दू पत्रकारिता में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है। उन्होंने उर्दू पत्रकारिता का पाठ्यक्रम शुरु करने की आवश्यकता बताई। वरिष्ठ पत्रकार तहसीन मुनव्वर (दिल्ली) ने कहा की उर्दू अखबारों में प्रमुख समस्या संसाधनों भारी कमी है। उर्दू अखबारों में मालिक, संपादक, रिपोर्टर, सरकुलेशन मैनेजर व विज्ञापन व्यवस्थापक कई बार सब एक ही आदमी होता है। सहारा उर्दू रोजनामा (नई दिल्ली) के ब्यूरो चीफ असद रजा ने कहा कि हिंदी व उर्दू पत्रकारिता करने के लिए दोनों भाषाओं को जानना चाहिए। उर्दू अखबारों को अद्यतन तकनीकी के साथ साथ अद्यतन विपणन ( लेटेस्ट मार्केटिंग) को भी अपनाना चाहिए। इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात हिंदी आलोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने कहा कि देश में शक्तिशाली लोगों को केवल अंग्रेजी ही पसंद है। हिंदी व उर्दू को ये लोग देखना नहीं चाहते और यही लोग दूसरे लोगों के बच्चों को मदरसे बुलाते हैं परंतु अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजते हैं।
संगोष्ठी के समापन सत्र में उर्दू पत्रकारिता शिक्षण की वर्तमान स्थिति और अपेक्षाएं विषय पर बोलते हुए मुख्य वक्ता प्रो.जेड यू हक (दिल्ली) ने उर्दू पत्रकारिता पर रोजगार की भाषा बनाए जाने के रास्ते में आने वाली समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उर्दू में प्रशिक्षित पत्रकारों की कमी है। इसके अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में उर्दू के गलत शब्दों के उच्चारण पर भी उन्होंने चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि उर्दू अखबारों की समस्या उसकी बिखरी हुई रीडरशिप है इसका समाधान कर इनका प्रसार बढाने की जरुरत है। मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में मासकम्युनिकेशन के रीडर एहतेशाम अहमद ने उर्दू अखबारों के आर्थिक बदहाली पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आज उर्दू पत्रकारिता में रुचि रखने वालों की कमी नहीं बल्कि संसाधनों की समस्या अधिक है। उन्होंने अन्य बड़े मीडिया घरानों द्वारा उर्दू अखबार निकालने की वकालत की। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि, रायपुर के डॉ शाहिद अली ने कहा कि देश में उर्दू पत्रकारिता के शिक्षण संस्थानों की कमी रही है अब इस दिशा में प्रयास हो रहे है जो सराहनीय है। इस सत्र में डा. श्रीकांत सिंह और डा. रामजी त्रिपाठी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने उर्दू में एक सक्षम न्यूज एजेंसी की स्थापना पर बल दिया और अंग्रेजियत से मुक्त होने की अपील की। उन्होंने घोषणा कि पत्रकारिता विवि में मास्टर कोर्स में वैकल्पिक विषय के रूप में उर्दू पत्रकारिता पढ़ाने का प्रस्ताव वे अपनी महापरिषद में रखेंगें। साथ ही उर्दू मीडिया संस्थानों को प्रशिक्षित करने के लिए वे सहयोग देने के लिए तैयार हैं। विवि मप्र मदरसा बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम बनाने और संचालित करने में मदद करेगा। सत्रों में आभार प्रदर्शन राघवेंद्र सिंह, डा. पवित्र श्रीवास्तव एवं प्रो. आशीष जोशी ने किया। इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार रेक्टर चैतन्य पुरुषोत्म अग्रवाल, आरिफ अजीज प्रो. एसके त्रिवेदी, दीपक शर्मा, शिवअनुराग पटैरया, पुष्पेंद्रपाल सिंह, डा. माजिद हुसैन, मोहम्मद बिलाल, सौरभ मालवीय, लालबहादुर ओझा, डा. राखी तिवारी आदि मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन और संयोजन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।
- संजय द्विवेदी
मोबाइलः 09893598888

न्यू मीडिया पर पुस्तक का लोकार्पण


नई दिल्ली / खबर / इंडिया पॉलिसी फाउनडेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तिका न्यू मीडिया : चुनौतियाँ और संभावनाएं का लोकार्पण 29 जनवरी को श्री अच्युतानंदन मिश्र के द्वारा मालवीय स्मृति भवन के सभागार में संपन्न हुआ | इस पुस्तक में न्यू मीडिया के इतिहास , समस्याएं , संभावनाएं , चुनौतियां समेत विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला गया है जिनकी चर्चा आई पी एफ द्वारा आयोजित दो ब्रेन स्टोर्मिंग सेशन में की गयी थी | वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय और उदय सिन्हा के न्यू मीडिया पर विचार पुस्तिका का खास आकर्षण है | पुस्तिका की भूमिका न्यू मीडिया के हस्ताक्षर बालेन्दु दाधीच ने लिखी है |
लोकार्पण से पहले चर्चा करते हुए आई पी एफ के मानद निदेशक प्रो. राकेश सिन्हा ने कहा कि न्यू मीडिया में साम्यवाद है | प्रत्येक व्यक्ति को सूचना प्राप्त करने और सूचना देने का समान अवसर प्राप्त है | उन्होंने कहा कि न्यू मीडिया के ऊपर दो ब्रेन स्टोर्मिंग सेशन और उस पर आधारित इस दस्तावेज को पुस्तकाकार रूप देने का उद्देश्य इसके लिए सैद्धांतिक जमीन तैयार करना है ताकि यह लोकतान्त्रिक परिवेश में अपनी महत्वपूर्ण और रचनात्मक भूमिका अदा कर सके |
इस अवसर पर द सन्डे इन्डियन के कार्यकारी संपादक ओम्कारेश्वर पाण्डेय ने कहा कि न्यू मीडिया ने पूंजीपति वर्ग और बाजार केन्द्रित मीडिया घरानों के एकाधिकार को ध्वस्त कर दिया है | अब जानकारी , समाचार या विचार को दबाना असंभव हो गया है | वर्तमान ट्रेंड को देखते हुए उन्होंने मीडिया पोर्टलों को विषय केन्द्रित होने का सुझाव दिया |
मुख्य वक्ता बालेन्दु शर्मा दाधीच ने न्यू मीडिया की उपलब्धियों का संछिप्त परिचय देते हुए भविष्य में झाँकने की कोशिश की | उन्होंने न्यू मीडिया की सबसे बड़ी चुनौतियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि एक दशक के लम्बे समय में भी अब तक न्यू मीडिया अपने लिए कोई आर्थिक मॉडल विकसित नहीं कर पाया है |
माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंदन मिश्र ने आधुनिक भारतीय इतिहास के विभिन्न चरणों मीडिया की भूमिका का तुलनात्मक विश्लेषण सभी के सामने रखा | उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता में नैतिकता और मूल्यों के नये मानदंड स्थापित किये गये थे जिनकी कमी वर्तमान में महसूस होती है |उन्होंने श्रोताओं से कहा कि न्यू मीडिया को भी उन्हीं ताकतों द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है जो दुनिया की अर्थव्यवस्था और राजनीति को नियंत्रित करते हैं |
आईपीएफ के कोषाध्यक्ष गोपाल अग्रवाल ने कार्यक्रम के सहभागियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि समाज और देश की राजनीति को बदलने में न्यू मीडिया सक्रिय पहल क़र रहा है |
कार्यक्रम में राजकरण सिंह ,राजकुमार शर्मा , जगदीश मित्तल ,श्याम जाजू , मनमोहन शर्मा ,नुसरत जफ़र , विजय कुमार ,श्रीरंग कुलकर्णी , उमेश चतुर्वेदी , राजीव रंजन राय ,हितेंद्र गुप्त ,संजय तिवारी ,जय कुमार झा , सैयद असदर अली , दीनबंधु सिंह , अमिताभ भूषण , प्रियंका भारद्वाज , शैलेन्द्र सिंह नेगी , रोहित वत्स ,कनिष्क कश्यप , विपुल त्यागी , नितिन शर्मा , दीपाली पाण्डेय , सृष्टि शर्मा ,हुदा जाकिर समेत दर्जनों पत्रकार मौजूद थे |

न्यू मीडिया पर पुस्तक का लोकार्पण




नई दिल्ली / खबर / इंडिया पॉलिसी फाउनडेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तिका न्यू मीडिया : चुनौतियाँ और संभावनाएं का लोकार्पण 29 जनवरी को श्री अच्युतानंदन मिश्र के द्वारा मालवीय स्मृति भवन के सभागार में संपन्न हुआ | इस पुस्तक में न्यू मीडिया के इतिहास , समस्याएं , संभावनाएं , चुनौतियां समेत विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला गया है जिनकी चर्चा आई पी एफ द्वारा आयोजित दो ब्रेन स्टोर्मिंग सेशन में की गयी थी | वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय और उदय सिन्हा के न्यू मीडिया पर विचार पुस्तिका का खास आकर्षण है | पुस्तिका की भूमिका न्यू मीडिया के हस्ताक्षर बालेन्दु दाधीच ने लिखी है
|
लोकार्पण से पहले चर्चा करते हुए आई पी एफ के मानद निदेशक प्रो. राकेश सिन्हा ने कहा कि न्यू मीडिया में साम्यवाद है | प्रत्येक व्यक्ति को सूचना प्राप्त करने और सूचना देने का समान अवसर प्राप्त है | उन्होंने कहा कि न्यू मीडिया के ऊपर दो ब्रेन स्टोर्मिंग सेशन और उस पर आधारित इस दस्तावेज को पुस्तकाकार रूप देने का उद्देश्य इसके लिए सैद्धांतिक जमीन तैयार करना है ताकि यह लोकतान्त्रिक परिवेश में अपनी महत्वपूर्ण और रचनात्मक भूमिका अदा कर सके |
इस अवसर पर द सन्डे इन्डियन के कार्यकारी संपादक ओम्कारेश्वर पाण्डेय ने कहा कि न्यू मीडिया ने पूंजीपति वर्ग और बाजार केन्द्रित मीडिया घरानों के एकाधिकार को ध्वस्त कर दिया है | अब जानकारी , समाचार या विचार को दबाना असंभव हो गया है | वर्तमान ट्रेंड को देखते हुए उन्होंने मीडिया पोर्टलों को विषय केन्द्रित होने का सुझाव दिया |
मुख्य वक्ता बालेन्दु शर्मा दाधीच ने न्यू मीडिया की उपलब्धियों का संछिप्त परिचय देते हुए भविष्य में झाँकने की कोशिश की | उन्होंने न्यू मीडिया की सबसे बड़ी चुनौतियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि एक दशक के लम्बे समय में भी अब तक न्यू मीडिया अपने लिए कोई आर्थिक मॉडल विकसित नहीं कर पाया है |
माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंदन मिश्र ने आधुनिक भारतीय इतिहास के विभिन्न चरणों मीडिया की भूमिका का तुलनात्मक विश्लेषण सभी के सामने रखा | उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता में नैतिकता और मूल्यों के नये मानदंड स्थापित किये गये थे जिनकी कमी वर्तमान में महसूस होती है |उन्होंने श्रोताओं से कहा कि न्यू मीडिया को भी उन्हीं ताकतों द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है जो दुनिया की अर्थव्यवस्था और राजनीति को नियंत्रित करते हैं |
आईपीएफ के कोषाध्यक्ष गोपाल अग्रवाल ने कार्यक्रम के सहभागियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि समाज और देश की राजनीति को बदलने में न्यू मीडिया सक्रिय पहल क़र रहा है |
कार्यक्रम में राजकरण सिंह ,राजकुमार शर्मा , जगदीश मित्तल ,श्याम जाजू , मनमोहन शर्मा ,नुसरत जफ़र , विजय कुमार ,श्रीरंग कुलकर्णी , उमेश चतुर्वेदी , राजीव रंजन राय ,हितेंद्र गुप्त ,संजय तिवारी ,जय कुमार झा , सैयद असदर अली , दीनबंधु सिंह , अमिताभ भूषण , प्रियंका भारद्वाज , शैलेन्द्र सिंह नेगी , रोहित वत्स ,कनिष्क कश्यप , विपुल त्यागी , नितिन शर्मा , दीपाली पाण्डेय , सृष्टि शर्मा ,हुदा जाकिर समेत दर्जनों पत्रकार मौजूद थे |

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