गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

सामाजिक सरोकार और भाषाई पत्रकारिता


Publish Date : 2011-07-16 15:07:11 | special news, articles, linguistic Journalism
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विकास के साथ बाजारवादी विभीषिका का भी अनवरत विस्तार हो रहा है। भाषाई पत्रकारिता भी इस विभीषिका से अछूती नहीं रही। इसकी झलक कुछ अखबारों में पेज -थ्री नाम की नई संस्कृति, तो कुछ में अर्धनग्न तस्वीरें परोसने की होड़ के रूप में देखने को मिल रही है। कारण.. हिंदी के अखबारों पर प्रासंगिक और तेज बने रहने के साथ व्यावसायिकता का भारी दबाव है। लिहाजा भौगोलिक सीमाओं को पार करके व्यावसायिक अवसरों का दोहन करने के फेर में हिंदी पत्रकारिता में मानवोचित मूल्यों को स्थान देने में पूर्व की अपेक्षा कमी आई है। भाषाई समाचार पत्रों का 1780 में जेम्स आगस्टस हिक्की ने बंगाल गजट या कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर के रूप में आरंभ किया था,लेकिन यह अंग्रेजी में था। हिन्दी की पत्रकारिता का आरंभ उदंत मार्तण्य से हुआ जो करीब 185 साल पहले 1826 में आरंभ हुआ। उदंत मार्तण्ड को हिंदी पत्रकारिता की शुरु आत का मानक मानें तो इन 185 वर्षो में हिंदी पत्रकारिता में बड़े आमूल चूल परिवर्तन आए हैं। उस समय पत्रकारिता का उद्देश्य समाज सुधार और रूढ़ियों का उन्मूलन था। तब पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार शीर्ष पर थे और व्यावसायिक प्रतिबद्धताएं इनमें बाधक नहीं थीं,लेकिन विकासवादी युग में कागज से शुरू हुई पत्रकारिता पर तकनीकी हावी है। इस तकनीकी विकास ने पत्रकारिता को वैश्विक तो बना दिया है, लेकिन हिन्दी पत्रकारिता के प्रभाष जोशी, जगदीश चंद्र माथुर जैसे सिद्धांतवादी और मूल्यों की हिंदी पत्रकारिता करने वालों के युग का अवसान कर दिया है। प्रिंट मीडिया के इस पतन के बावजूद कुछ संपादकों ने पत्रकारिता के इतिहास पुरु षों की थाथी को संभालकर रखा है, लेकिन नैतिक पतन के दौर में यह दृढ़ता कितनी देर तक टिकी रहेगी सदैव आशंका बनी रहती है। क्योंकि पहले संपादकों की स्वीकृति के बिना अखबारों में कुछ नहीं होता था, अब पेड न्यूज का जमाना है। आज किसी भी संपादक को यह पता नही होता कि कौन सा विज्ञापन छप रहा है। अखबारों में छपने वाली हर वस्तु के लिए पीआरबी एक्ट के तहत भले ही संपादक जिम्मेदार है, पर प्रबंधन ने बिना संपादकों को भरोसे में लिए किसी भी तरह के विज्ञापनों के प्रकाशन की परंपरा सी बना ली है। कई जगहों पर राजनीतिक अपराधियों और सीधे अपराधियों से पत्रकारों की सांठगांठ है और वे प्रेस की आड़ लेते हैं। भाषाई पतन का सिलिसला भी तेजी से बढ़ रहा है। बिहार में लालू यादव की जगह जब राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं तो एक पत्रिका ने राबड़ी सरकार को पेटीकोट सरकार करार दिया। ऐसी नई शब्दावली और व्याख्या कम से कम हिंदी पत्रकारिता के लिए तो शुभ नहीं कही जा सकती। पत्रकारिता में अहंकार और अज्ञानता काफी बढ़ रही है। पत्रकार खुद को विशिष्ट जमात में शामिल करते हुए वीआईपी समझकर आम आदमी से लगातार कटते जा रहे हैं। समाचार माध्यमों को गांव और गरीबों की चिंता कहीं नही नजर आती है। उनके बुनियादी सवालों को नजरंदाज करके हम कौन सी पत्रकारिता कर रहे हैं?लेकिन सुखद यह है कि सामाजिक सरोकार वस्तुत: हिंदी पत्रकारिता का नैसर्गिक स्वभाव  है। इसके उद्भव और विकास की बुनियाद वास्तव में मानवीय मूल्यों पर ही केंद्रित है। प्रतिस्पर्धी दौर में पत्रकारिता भले ही आज महंगी तकनीक के आगे मजबूर हो लेकिन भाषाई पत्रकारिता इन तमाम वजर्नाओं के खिलाफ संघर्षरत है।

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